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हम 44 साल पुराने मिग-21 उड़ा रहे, इतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता: IAF चीफ

इंडियन एयरफोर्स में तकरीबन 44 साल पहले शामिल हुआ मिग-21 फाइटर जेट इस साल दिसंबर में फेजआउट हो जाएगा। इसके साथ ही मिग-27 भी फेजआउट हो जाएगा। एयरचीफ मार्शल बी एस धनोआ ने भारतीय वायु सेना के पुराने पड़ चुके फाइटर जेट्स और हथियारों पर बात करते हुए कहा कि वायुसेना 40 साल से भी ज्‍यादा पुराने फाइटर जेट्स उड़ा रही है। इतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता है।

एयरचीफ मार्शल ने कहा, “हम स्वदेशी तकनीक द्वारा पुराने हो चुके लड़ाकू उपकरणों को बदलने का इंतज़ार नहीं कर सकते, न ही हर रक्षा उपकरण को विदेश से आयात करना समझदारी होगी। हम अपने पुराने हो चुके हथियारों को स्वदेश-निर्मित हथियारों से बदल रहे हैं।” 

वायु सेना प्रमुख ने यह बात दिल्ली स्थित एयरफोर्स ऑडिटोरियम में एयरफोर्स के आधुनिकीकरण और स्वदेशीकरण पर आयोजित एक सेमिनार में कही। इस सेमिनार में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे। एयरचीफ मार्शल धनोआ ने कहा, “वायु सेना अभी भी 44 साल पुराने मिग-21 जेट्स उड़ा रही है, जबकि इतने साल बाद कोई अपनी कार तक नहीं चलाता। वायु सेना का मिग-21 विमान चार दशक से ज्यादा पुराना हो गया है। लेकिन अभी भी यह विमान वायु सेना की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। दुनिया में शायद ही कोई देश इतना पुराना फाइटर जेट उड़ाता है। वजह है वायु सेना के पास मिग 21 के विकल्प के तौर पर कोई फाइटर जेट नहीं है। इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वायु सेना पूरे दमखम के साथ इसके भरोसे न केवल सरहद की हिफाजत करती है, बल्कि दुश्मन की चुनौतियों का जवाब भी देती है।”

इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारतीय वायुसेना एक पेशेवर वायुसेना है। बालाकोट हमले के बाद जिसका लोहा दुनिया ने माना है। भारत पाकिस्तान सीमा पर तनाव पर एयरफोर्स चीफ ने कहा कि वायुसेना हमेशा से सतर्क है। ऐसा नहीं है कि तनाव हुआ है तो सेना सतर्क है। एयर डिफेंस सिस्टम की जिम्मेदारी वायुसेना की है और वह चौकन्‍नी है।

न दलित सुरक्षित न महिला, राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार बनते ही चौपट हुई कानून-व्यवस्था

  • 13 अप्रैल 2019: जोधपुर में रामनवमी पर शोभायात्रा से लौट रहे लोगों पर एक समुदाय विशेष के लोगों ने पथराव किया। वाहनों को फूँक दिया।
  • 24 अप्रैल 2019: जयपुर जिले के चौमूं कस्बे में हिंदू नववर्ष समारोह समिति पर निकाली गई रैली पर समुदाय
    विशेष के लोगों ने पथराव किया।
  • 11 जुलाई 2019: राजस्थान यूनिवर्सिटी की 150 से ज्यादा महिला प्रोफेसरों को फोन कॉल के जरिए प्रताड़ित किया गया। बलात्कार की धमकियाँ दी गई।
  • 20 जुलाई 2019: अलवर में मुस्लिम भीड़ ने एक नेत्रहीन पिता के पुत्र हरीश जाटव को बेहरमी से मार दिया।
  • 8 अगस्त 2019: पुलिस प्रताड़ना से तंग आकर दलित महिला ने आत्महत्या कर ली।
  • 13 अगस्त 2019: जयपुर में कांवड़ियों पर पत्थर, डंडे, सरिया से मुस्लिम समुदाय के लोगों का हमला।

ये तो बस चुनिंदा उदाहरण हैं। बीते साल के अंत में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद से चौपट होती कानून-व्यवस्था की। समुदाय विशेष का उपद्रव और कानून को ठेंगा दिखाते उसके ही रखवाले। न महिलाएँ महफूज, न दलित और न पिछड़े।

बीते साल के मुकाबले इस साल के शुरुआती चार महीनों के आँकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। आँकड़े बताते हैं कि प्रदेश में गहलोत सरकार के आने के बाद अपराधों में बड़ा उछाल आया है। पुलिसिया आँकड़ों के मुताबिक बीते साल जनवरी से अप्रैल के बीच 55,102 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे, जो इस साल बढ़कर जनवरी से अप्रैल के बीच 62,666 हो गए।

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में पिछले साल के मुकाबले 40.56% उछाल आया। सिर्फ चार महीनों के भीतर बलात्कार के मामलों में 15.02% की वृद्धि दर्ज की गई है। दलितों पर अत्याचार में पिछले साल के मुकाबले 7.66% का इजाफा हुआ है।

इन आँकड़ों के बचाव में गहलोत सरकार का तर्क बेहद पुराना है। उनका कहना है कि पूववर्ती भाजपा सरकार के जमाने में एफआईआर ही दर्ज नहीं किए जाते थे। अब मामले दर्ज किए जाते हैं सो आँकड़ों में उछाल स्वभाविक है।

लेकिन उन मामलों का क्या जो गहलोत सरकार के इस दावे की चुगली करते हैं। पुलिसिया जॉंच से तंग आकर हरीश जाटव के नेत्रहीन पिता के जहर खाकर जान देने का मामला तो चंद दिन पुराना ही है। हरीश के परिजनों का कहना है कि पुलिस मॉब लिंचिंग के इस मामले को एक्सीडेंट साबित करने पर तुली है।

भरतपुर की वह महिला भी दलित ही थी जिसने पुलिस प्रताड़ना और पिटाई के कारण आत्महत्या कर ली। इस महिला का पति जुलाई 2019 में पड़ोस की एक लड़की के साथ भाग गया था। लड़की के परिजनों ने शिकायत दर्ज कराई तो पुलिस ने महिला को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

चूरू में चार बच्चों की मॉं 35 वर्षीय दलित महिला को कथित तौर पर तो पुलिस वालों ने बंधक बनाकर रख लिया। पुलिस स्टेशन में ही गैंगरेप किया। पीड़ित महिला की माने तो पुलिस ने चोरी के एक मामले में उसके देवर को 6 जुलाई को पकड़ा था। पुलिसवालों ने देवर को हिरासत में इतना प्रताड़ित किया कि उसकी मौत हो गई। अलवर में तो सामूहिक बलात्कार का मामला चुनाव का हवाला देकर दबा दिया गया।

फिर भी कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं। कोई शोर नहीं। हरीश जाटव की मौत की खबर तभी चर्चा में आई जब उसके पिता ने आत्महत्या की। जब उसके पिता के शव के साथ लोग सड़क पर उतरे। चर्चा है तो बस पहलू खान की हत्या के आरोपितों के बरी होने की। उसका दोष भी पुरानी सरकार पर गहलोत ने मढ़ दिया है।

राज्य के सुदूर इलाकों की तो छोड़िए राजधानी जयपुर में समुदाय विशेष के आगे प्रशासन बौना साबित हो रहा है। 12 अगस्त को बकरीद और सावन का आखिरी सोमवार एक साथ पड़ा। मुस्लिमों ने इतना उत्पात मचाया कि जयपुर-दिल्ली रोड जाम हो गया। भीड़ पर काबू पाने के लिए आँसू गैस के गोले दागने पड़े। साम्प्रदायिक तनाव के एक हफ्ते बाद भी जयपुर में हालात काबू में नहीं हैं। वहाँ धारा 144 लागू है।

देश की राजधानी दिल्ली से जयपुर करीब 281 किलोमीटर दूर है। फिर भी वहॉं की कानून-व्यवस्था की कोई चर्चा नहीं। जबकि, जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य जहॉं आतंकवाद का खतरा हर पल मौजूद है, वहाँ सुरक्षा के लिहाज से उठाए गए एहतियातन कदम पर हो रहे शोर को आप सुन ही रहे होंगे।

लेकिन, राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है तो किसी को भी न महिला के अधिकारों की चिंता है, न दलितों की और न ही मानवाधिकारों की। राज्य की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी जिन पर है वे आपसी राजनीतिक नूरा-कुश्ती में व्यस्त हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गॉंधी को नाराजगी जताते हुए कहना पड़ा था कि कुछ लोग अपने बेटे की ही चिंता में व्यस्त हैं।

स्ट्रिप शो के लिए 2000 से 1000 रु. का टिकट, मोहिउद्दुल अहमद और सुपर्णा दास की चाल में फँसे लड़के

स्ट्रिप शो के नाम पर कलकत्ता में बैठकर लोगों को लूटने वाले गिरोह का साइबर क्राइम सेल ने पता लगा लिया है। इस गिरोह को चलाने के पीछे एक दंपत्ति का हाथ है। सुपर्णा दास और संजीव दास नाम का ये जोड़ा मेरठ में कंकरखेड़ा क्षेत्र के एक रिसॉर्ट में स्ट्रिप शो का लालच देकर लोगों को ठग रहा था। जिसका पता चलते ही साइबर क्राइम सेल ने इनके 2 अकॉउंटों को बंद कर दिया। ये अकॉउंट सुपर्णा दास और मोहिउद्दुल अहमद के नाम पर थे।

साइबर सेल के मुताबिक उन्हें अपनी जाँच में मालूम चला कि जिन 2 खातों में पैसे डलवाए जा रहे हैं वो बैंक खाते कलकत्ता के हैं। जिसमें एक खाते में 70 हजार और दूसरे खाते में 40 हजार रुपए मौजूद है। जानकारी मिलते ही इसपर कार्रवाई हुई और दोनों अकॉउंट को पुलिस ने बंद करवा दिया।

एसपी ट्रैफिक ने बताया कि एमएम घोष रोड, नार्थ 24 परगना पश्चिम बंगाल की सुपर्णादास ने अपने पति संजीव दास के साथ मिलकर स्ट्रिप शो की फर्जी बुकिंग कराई। पुलिस ने महिला से संपर्क किया तो महिला ने अपने मोबाइल फोन बंद कर दिए। जिसके बाद उनपर मुकदमे के निर्देश दिए गए हैं।

एसपी के मुताबिक पश्चिम यूपी के अलावा मध्यप्रदेश और बंगाल में भी इस दंपत्ति ने ठगी का जाल बिछा रखा है, जिसके चलते भारी संख्या में ऑनलाइन टिकट बुक करवाए गए। इस दंपत्ति ने पैसे हड़पने के लिए ऑनलाइन 2000, 1500 और 1000 का टिकट रखा था। जो लोग इस शो के लिए बुकिंग करते थे उनके द्वारा दी गई राशि सीधा सुपर्णा और मोहउद्दुल के बैंक अकॉउंट में जाती थी।

मीडिया खबरों की मानें तो सुपर्णा का पति संजीव दास इस पूरे गिरोह का मास्टरमाइंड है। पुलिस का कहना है कि मेरठ में स्ट्रिप शो आयोजन का सपना दिखाकर केवल लोगों को ठगा जा रहा था। पुलिस का मानना है कि यह गिरोह पश्चिम बंगाल के नक्सली इलाके में छिपा हुआ है, जहाँ से बैठकर वह इस ऑनलाइन ठगी को अंजाम देने में लगा हैं।

क्या है मामला?

पिछले महीने मेरठ के कंकरखेड़ा क्षेत्र के एक रिसॉर्ट में स्ट्रिप शो के नाम पर ऑनलाइन बुकिंग का लिंक फेसबुक पर आ रहा था, जिसमें बाकायदा ऑनलाइन फॉर्म भरकर फीस जमा करानी होती थी। इसमें 2 बैंक खाते दिए गए थे। लेकिन जिस दिन स्ट्रिप शो का आयोजन होना था उस तारीख पर वहाँ कुछ नहीं हुआ। बल्कि रिसॉर्ट मालिक ने इस दौरान एसएसपी को इस पूरे मामले की तहरीर दी और ऐसे किसी आयोजन के होने से मना किया। इस दौरान रिसॉर्ट में आयोजन के नाम पर ठगी की आशंका जताते हुए वहाँ के मालिक ने जाँच की माँग की थी।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: कमलनाथ के भाँजे रतुल पुरी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज

अगस्ता वेस्टलैंड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली की हाई कोर्ट ने कमलनाथ के भाँजे रतुल पुरी द्वारा दायर की गई अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। उल्लेखनीय है कि इस याचिका का प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कोर्ट में विरोध किया गया था।

न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सुनील गौड़ ने ईडी और पुरी के वकीलों की दलीलें सुनकर कहा था कि वह याचिका पर आज बाद में फैसला सुनाएँगे।

सुनवाई के दौरान रतुल पुरी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने निदेशालय पर आरोप लगाए थे कि उनका मुवक्किल पूरे मामले की जाँच में सहयोग करने को तैयार है। लेकिन एजेंसी का बर्ताव कानूनी दुर्भावना और प्रतिशोध से भरा हुआ था। जबकि ईडी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिस्टर जनरल अमन लेखी ने पुरी की अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि पुरी जाँच के दौरान सवालों का जवाब देने से बच रहे हैं और उनके उत्तर भी ईडी को भ्रामक लग रहे हैं।

बता दें 6 अगस्त को रतुल पुरी ने अधिवक्ता विजय अग्रवाल के माध्यम से अपनी याचिका में निचली अदालत में दायर की थी, लेकिन उस समय उनकी अग्रिम जमानत को निचली अदालत द्वारा खारिज कर दिया गया था। बाद में 9 अगस्त को अदालत ने पुरी के ख़िलाफ़ गैर जमानती वारंट जारी किया था।

इसके अलावा उनपर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने 354 करोड़ रुपए के बैंक घोटाले में मोजरबियर के पूर्व कार्यकारी निदेशक रतुल पुरी और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था

डियर शेहला सबूत तो जरूरी है, वरना चर्चे तो आपके बैग में कंडोम मिलने के भी थे

डियर शेहला रशीद शोरा,

आशा है आप सानंद होंगी। अब ये मत कहिएगा कि सेना की फटकार, सोशल मीडिया पर दुत्कार और कानून के कसते शिकंजे के बीच आनंद कैसा! पार्ट टाइम पढ़ाई और फुल टाइम पॉलिटिक्स की आपकी मेहनत को जानता हूॅं। दुख इस बात का है कि सोशल मीडिया ने लाइमलाइट में आने के आपके ट्रिक में गली के लौंडों को भी उस्ताद बना दिया है। फेक और फैक्ट का फर्क मिटा दिया है।

दुख इस बात का भी है कि आईएएस से नेता बने जिस शाह फैसल के साथ आप जम्मू-कश्मीर में दुकानदारी जमाने की ख्वाहिश पाल बैठीं थी, मोदी-शाह ने उस पर डाका डाल दिया। आपको अब्दुल्ला, मुफ्ती की तरह मलाई खाने का मौका नहीं मिला। अफसोस!

जानता हूॅं आप सदमे में हैं। इसलिए तो सबूत के नाम पर बहाने बना रही हैं। देती तो आप हैं नहीं और पूछ रहीं, दूॅंगी तो क्या सेना कार्रवाई करेगी। आप ही बताइए हवा-हवाई दावों से तो व्यवस्था नहीं चलेगी न। सबूत तो चाहिए ही। तब तो यकीनन चाहिए जब मामला देश से जुड़ा हो। लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा हो। या फिर हम मान लें कि दो जून की रोटी में बस ये पाकिस्तानी प्रोपगेंडा का रोना भर है।

वरना चर्चे तो बेगूसराय में पुलिस जॉंच के दौरान आपके बैग से भारी मात्रा में कंडोम बरामद होने के भी थे। हवा इतने जोर से फैली थी कि जिस सखा कन्हैया को जिताने आप बेगूसराय पहुॅंची थी वह ही चर्चे से हवा-हवाई हो गए थे।

लेकिन, किसी ने इस हवा पर भरोसा नहीं किया। मूढ़ मतियों की हवा में दम भी नहीं होता। अब इस मामले में कानून अपना काम कर रही है। उसे करना भी चाहिए, क्योंकि ऐसी बातें आपकी गरिमा, आपकी निजता पर आघात हैं।

पर हमने कभी इस अफवाह को लिबरलों की करतूत बता न हवा दी और न इस मामले में शिकायत दर्ज कराने वाली के चरित्र को खारिज किया। न उसकी निष्पक्षता पर शक किया। हमें तो आपके प्रति उसकी सद्भावना ही दिखी। लेकिन, आपने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले, पुलिस से शिकायत करने वाले वकील को भक्त बता दिया। एक ही झटके में उसकी निष्ठा और देश के प्रति उसके भाव को खारिज कर दिया।

आपके समर्थकों के ट्वीट को हमने गिरोह विशेष का कैंपेन नहीं कहा। और आपने ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड को पार्टी विशेष की करतूत बता दिया।

संवाद का आपका तरीका भी एकतरफा है। बस अपनी ही अपनी रटती हैं। मुश्किल में फँसती हैं तो अपने जैसों की ही रटती हैं। जब से लाइमलाइट में आईं हैं पक्ष में खड़े लोगों को ही रिट्वीट कर रही हैं। आजादी तो आपका पसंदीदा तराना है। हमारा भी है। इसलिए आपकी अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान करते हैं। पर हमारी उन अपेक्षाओं का क्या जो आजादी को लेकर आपसे है?

आप भी न अच्छा खेलती हैं। पर खुदा कसम पकड़ी जाती हैं। इसलिए हम चाहते हैं कि एक बार सबूत मारिए सरकार और सेना के मुॅंह पर। आपको यह करना भी चाहिए। क्योंकि आप व्यक्तिगत आरोप नहीं लगा रहीं। कंडोम जैसी टुच्ची बात नहीं कर रहीं। आपका दावा है सेना कश्मीर में घरों में घुस कर लड़कों को उठा रही है। राशन जमीन पर बिखेर रही है। लोगों को आतंकित करने के लिए सार्वजनिक रूप से युवाओं को प्रताड़ित कर रही है। और ये सारे तथ्य आपने दिल्ली में बैठे-बैठे बड़ी मिहनत से जुटाए हैं। ट्वीट करने में अंगुलियों को हुआ दर्द अलग। आपकी इस मिहनत और दर्द का सम्मान होगा वह सबूत।

इससे उस पवित्र किताब पर हमारा भरोसा भी डोलेगा जिसे हम संविधान कहते हैं। जो हमें अपनी सेना और सरकार की बातों पर यकीन करने का भरोसा देती है। आप जैसी सुघड़ महिला भी इस किताब पर यकीन करती ही होंगी। यकीनन आप उस जमात में नहीं होंगी जो खुद को उड़ाकर, बेगुनाहों का खून बहाकर हूर पाने का रास्ता दिखाने वाली पवित्र किताब पर भरोसा करती है।

लाइमलाइट में आने और फिर खुद को पीड़ित बताने का स्टाइल पुराना हो गया। तो कुछ नया क्यूॅं नहीं करती। वैसे हम आपकी आजादी का सम्मान करते हैं। करना न करना आपकी मर्जी। लेकिन, नहीं चाहते कि य​ह आजादी उन टुच्चों को भी मिले जो आपके कंडोम प्रेम की अफवाहें फैलाते रहते हैं। बस यही हमारे और आपके बीच का फर्क है। यही भक्त और लिबरल होने का भी फर्क है।

आपके राजनीतिक भविष्य की उज्ज्वल कामनाओं के साथ!

आपका

(भक्त वगैरह जो आपकी मर्जी हो खुद डाल लीजिएगा)

वॉर होगा ही नहीं, हम तो शांति की बात करते हैं… और नेहरू ने ठुकरा दी थी CDS के गठन की सलाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS)’ का पद गठित करने की घोषणा की। सीडीएस भारत की तीनों सशस्त्र सेनाओं के बीच अच्छी तरह तालमेल बिठाने का कार्य करेगा। इसकी माँग कारगिल युद्ध के समय से ही चली आ रही थी। इससे पहले भी कई बार सीडीएस के पद के गठन की माँग उठी थी क्योंकि सेना के कई उच्चाधिकारियों ने भी इसकी ज़रूरत पर प्रकाश डाला था। कारगिल युद्ध के बाद बनी मंत्रीमंडलीय समिति ने भी यही सुझाव दिया था। लेकिन, किन्हीं कारणों से उस समय यह संभव नहीं हो पाया। अब इतिहास में थोड़ा और पीछे चलते हैं।

लॉर्ड माउंटबेटन ने लेफ्टिनेंट जनरल एमएल छिबर को इस बारे में 1977 में कुछ अहम जानकारियाँ दी थीं। तब माउंटबेटन ने छिबर को बताया था कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को शुरुआत में ही आगाह किया था कि अगर युद्ध की स्थिति आती है तो भारतीय सेना नहीं टिक पाएगी और तुरंत हार जाएगी। इसीलिए माउंटबेटन ने नेहरू को सलाह दी थी कि जनरल थिमय्या को सीडीएस नियुक्त कर दें। माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि उन्हें सैन्य स्तर पर काफ़ी समस्याएँ दिख रही हैं और इसीलिए वह ये निर्णय तुरंत लें। लेकिन नेहरू ने माउंटबेटन की बात को नकार दिया।

नेहरू ने माउंटबेटन को अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि युद्ध की स्थिति आएगी ही नहीं क्योंकि भारत तो सभी देशों के साथ शांति से रहना चाहता है। माउंटबेटन ने नेहरू को समझाया कि पाकिस्तान या चीन, किसी के साथ भी आपके देश का युद्ध हो सकता है क्योंकि युद्ध में दो पक्ष सम्मिलित रहते हैं, एक नहीं। भारतीय सेना के कई उच्चाधिकारियों द्वारा लिखी गई पुस्तक में कहा गया है कि नेहरू अपनी ख़ुद की ही बनाई एक दुनिया में रह रहे थे और उन्हें समसामयिक भौगोलिक-राजनीतिक परिस्थितियों का भान नहीं था।

और जब बात आई नेहरू के नेतृत्व क्षमता के परीक्षा की, अनुभवी सैन्य अधिकारी साफ़-साफ़ कहते हैं कि वे फेल हो गए। ‘Indian Defence Review Vol 30.2 Apr-Jun 2015‘ नामक इस पुस्तक में लिखा है कि न सिर्फ़ नेहरू, बल्कि उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन भी इस प्रस्ताव के खिलाफ़ थे। उत्तर पूर्वी राज्यों और भारत-चीन युद्ध पर पुस्तक लिख चुके शिव कुणाल वर्मा की एक पुस्तक का हवाला लें तो हमें साफ़ पता चल जाता है कि नेहरू द्वारा थिमय्या को सीडीएस न बनाने के पीछे कुछ और भी कारण थे। वर्मा लिखते हैं कि नेहरू जनरल थिमय्या को खतरे के रूप में देखते थे।

नेहरू सार्वजनिक रूप से ऐसा दिखाते थे कि थिमय्या उनके पसंदीदा व्यक्ति हैं लेकिन पीठ पीछे जनरल के ख़िलाफ़ साज़िश रचते थे। उन्हें ऐसा लगता था कि थिमैय्या भारतीय गणराज्य की सत्ता उनसे हथिया सकते हैं। थिमय्या को इस कारण इस्तीफा भी देना पड़ा था लेकिन नेहरू सार्वजनिक रूप से ख़ुद की वाहवाही कराने के लिए यह कहते रहे कि उन्होंने थिमय्या को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लिया है। अब यह सोचने लायक बात है कि जिस देश के नेता के मन में सेना के विरुद्ध जलन की भावना हो, वो रक्षा सम्बन्धी निर्णय सही से कैसे ले पाएगा?

अगर सीडीएस की बात करें तो अब तक सेना सम्बन्धी अधिकतर निर्णय केंद्रीय रक्षा सचिव लेते रहे हैं, जो कि ब्यूरोक्रेट होते हैं। केंद्रीय रक्षा सचिन को न तो सेना के आंतरिक मसलों का उतना ज्यादा अनुभव होता और न ही तीनों सेनाओं के बीच सही से तालमेल बिठाने में वो कामयाब रहते हैं। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि मंत्रालय में नियुक्त ब्यूरोक्रेट किसी भी क्षेत्र से आया हुआ हो सकता है, इसीलिए ज़रूरी नहीं कि उसकी दक्षता सेना को लेकर सही ही हो। अभी तक कई देशों में सीडीएस की व्यवस्था है या फिर ऐसा ही एक समान पद है।

अधिकतर देश अपने शुरुआती युद्ध के दौर से ही समझ गए कि थल, जल और वायु सेनाओं के ऊपर एक व्यक्ति होना चाहिए, जो तीनों सेनाओं को समझे और फिर सरकार को उनकी राय के आधार पर सलाह दे। ध्यान दें कि यहाँ सेनाओं के बीच तालमेल बिठाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि तीनों आपस में लड़ते रहते हैं। हर परिस्थिति के लिए तीनों सेनाओं की अलग-अलग राय हो सकती है या फिर अधिकारीयों में रणनीतिक मतभेद हो सकते हैं। सीडीएस के रहते सरकार तक उनकी बात पहुँचाने और जल्दी उचित निर्णय लेने में सुविधा मिलेगी। कहते हैं, अगर कारगिल युद्ध के समय सीडीएस की व्यवस्था रहती तो वायुसेना का प्रयोग और अच्छी तरह हो सकता था।

आज जब आतंकी हर तरफ से घुसपैठ में लगे हैं और नभ, जल, थल- तीनों स्तर पर युद्ध की सम्भावनाएँ बनी रहती हैं, एक ऐसे वरिष्ठ अधिकारी का होना ज़रूरी है जो तीनों सेनाओं के कार्यान्वयन में सरकार और सशस्त्र सेनाओं के बीच सेतु का कार्य कर सके। इसके लिए आपको मैनेजमेंट और कमांड के बीच अंतर समझने की ज़रूरत है। तक्षशिला इंस्टिट्यूट के सह-संस्थापक नितिन पाई के अनुसार, अगर सीडीएस कैबिनेट को सैन्य मुद्दों पर सलाह देगा तो ऑपरेशनल कार्यों में सेना को कमांड करने का कार्य सेना प्रमुख करेंगे।

कुल मिला कर हमने यह देखा कि जवाहरलाल नेहरू ने अगर सीडीएस पद गठन करने की की माँग या सलाह मान ली होती तो उसके बाद हुए युद्धों में भारत और भी बेहतर स्थिति में होता लेकिन, नेहरू सेना को भंग करने की बात करते थे। उनकी बनाई दुनिया में उन्हें लगता था कि सबकी सोच उनके जैसी ही है। शायद इसीलिए कई विश्लेषक कहते हैं कि भारत का प्रथम प्रधानमंत्री किसी ऐसे व्यक्ति को होना चाहिए था, जिसे सैन्य प्रबंधन, संचालन और ऑपरेशन का अच्छा अनुभव और ज्ञान हो। शायद, सुभाष चंद्र बोस!

जनसंख्या नियंत्रण कानून ज़रूरी है, लेकिन 3 बच्चों तक इजाज़त दो: सपा नेता हसन

जनसंख्या नियंत्रण की प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद अब समाजवादी पार्टी के सांसद डॉ. एसटी हसन ने जनसंख्या नियंत्रण के विचार का समर्थन किया है। लेकिन मुरादाबाद के सांसद डॉ. हसन ने साथ में यह चेतावनी दी कि अगर भारत ने यह कानून बहुत समय तक लागू किया तो हमारी हालत चीन जैसी हो जाएगी, जहाँ वृद्धों की जनसंख्या में हिस्सेदारी बहुत अधिक हो गई है।

‘देश की जनसंख्या सेचुरेशन पर है’

मीडिया से बात करते हुए एसटी हसन ने कहा कि उनकी निजी राय है कि जनसंख्या नीति में तीन बच्चों तक की इजाज़त दी जानी चाहिए। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि कई बार लोगों के दोनों बच्चे एक ही लिंग के (दो बेटे या बेटियाँ) होते हैं, और वे बेटा-बेटी दोनों चाहते हैं, इसलिए ऐसे दम्पत्तियों के लिए एक बार और कोशिश का मौका होना चाहिए।

उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण कानून की वकालत अवश्य की, लेकिन यह विचार भी रखा कि इसे केवल सीमित समय के लिए लागू किया जाना चाहिए। “अब हम देख रहे हैं कि देश की जनसंख्या सेचुरेशन पर है। देश के संसाधन अपने सेचुरेशन पर हैं लिहाजा ऐसे कानून बने जिससे इस पर रोक लगे। लेकिन ये कानून कुछ वक्त के लिए ही बनना चाहिए।”

उन्होंने साथ में इस कानून को अधिक समय तक चलाते रहने के खिलाफ भी चेताया। उनके अनुसार यदि भारत ने यह नीति बहुत दिनों तक अपनाई तो हमारा हाल चीन जैसा हो जाएगा। एक-बच्चा नीति कई पीढ़ियों से चली आने के चलते चीन ने जनसंख्या-वृद्धि को तो नियंत्रित कर लिया, लेकिन अब वह जनसंख्या में वृद्ध लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा बढ़ जाने और उनकी देखभाल करने लायक युवाओं की कमी के चलते स्वास्थ्य और सामाजिक संकट से जूझ रहा है।

Breaking: चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका HC से ख़ारिज, ₹305 करोड़ के घोटाले का मामला

INX मीडिया घोटाले के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व गृह और वित्तमंत्री पी चिदंबरम को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया है। कॉन्ग्रेस नेता के मामले में जस्टिस सुनील गौड़ ने 25 जनवरी को फैसला सुरक्षित कर लिया था, जिसे आज सुनाया गया है। इसके पहले कानून मंत्रालय ने भी उनके खिलाफ मामला चलाने की मंजूरी सीबीआई को दे दी थी। सीबीआई और ED दोनों ने ही अदालत से कहा था कि चिदंबरम से पूछताछ के लिए उन्हें हिरासत में लिया जाना ज़रूरी है क्योंकि सामान्य पूछताछ में वे गोलमोल जवाब दे रहे थे

₹305 करोड़ का घोटाला

दरअसल यह पूरा मामला 2007 का है, जब पी चिदंबरम वित्त मंत्री थे। आरोप है कि कार्ति चिदंबरम ने अपने पिता के जरिए आईएनएक्स मीडिया को विदेशी निवेश प्रमोशन बोर्ड से विदेशी निवेश की मंजूरी दिलाई थी। ज्ञात हो कि आईएनएक्स मीडिया को 305 करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हासिल हुआ था।

कार्ति चिदंबरम ने ही आईएनएक्स मीडिया की प्रमोटर इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी को पी चिदंबरम से मिलवाया था। इसके बदले कार्ति चिदंबरम ने घूस के तौर पर करोड़ो रुपए लिए थे। जबकि ऐसे मामलों में स्पष्ट निर्देश है कि विदेशी निवेश के लिए कैबिनेट की आर्थिक मामलों की सलाहकार समिति की इजाज़त लेना जरूरी है।

बता दें कि इस मामले में पी चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री (साल 2007) रहते हुए गलत तरीके से विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपने अलग आरोप पत्र में कहा है कि कार्ति चिदंबरम के पास से मिले उपकरणों में से कई ई-मेल मिली हैं, जिनमें इस सौदे का जिक्र है।

सलमान ने अपनी ही बेगम की ‘गंदी’ फोटो और फोन नंबर डाल दिया फेसबुक पर, हुआ गिरफ्तार

मेरठ के रहने वाले सलमान पर आरोप है कि उसने बेगम से झगड़ा होने पर उसकी फेसबुक पर नकली आईडी बना कर अश्लील फोटो अपलोड कर दी। महिला द्वारा पुलिस से शिकायत करने पर सलमान और उसके परिवार के चार लोगों पर मुकदमा दर्ज कर सलमान को गिरफ्तार कर लिया गया है। सलमान पर आरोप आईटी एक्ट की गंभीर धाराओं के अंतर्गत लगे हैं।

दहेज एक्ट में पत्नी ने दर्ज कराया मुकदमा

शाहजहाँपुर निवासी पत्नी के आरोपों के अनुसार जून 2018 में सलमान से निकाह होने के बाद दोनों के बीच दहेज को लेकर विवाद होने लगा, जिसके बाद पत्नी ने सलमान के खिलाफ दहेज-निरोधी अधिनियम (498A) और घरेलू हिंसा अधिनियम का मुकदमा किठौर थाने में दर्ज कराया था। लेकिन सलमान को उच्च न्यायालय से से स्टे मिल गया। इसके बाद पत्नी जनवरी, 2019 में मायके आ गई

इसी कालखंड में उसकी नकली फेसबुक आईडी बनी और उसकी अश्लील तस्वीर प्रोफाइल पिक्चर में लगा कर अनजान लोगों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी गई। आईडी पर उसकी और भी अश्लील तस्वीरें डालीं गईं और उसका असली फ़ोन नंबर भी प्रदर्शित था। जब महिला को अनजान लोगों के फ़ोन आने लगे तो उसने पुलिस को इत्तला दी

साइबर सेल ने किया गिरफ़्तार

पुलिस की साइबर क्राइम सेल ने मामले की तहकीकात शुरू की। पहले तो IP एड्रेस फेसबुक से प्राप्त कर जिस डिवाइस (मोबाइल) से यह आईडी बनी और तस्वीरें अपलोड हुईं, उसकी जानकारी निकलवाई गई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मोबाइल का IMEI नंबर मिलने के बाद पुलिस को पता चला कि इस मोबाइल में जो नंबर लगा है, वह शिकायतकर्ता के ही शौहर सलमान के नाम पर रजिस्टर्ड है।

साइबर क्राइम सेल और किठौर पुलिस ने जब सलमान को गिरफ्तार किया तो दावा किया कि उसके मोबाइल में शिकायतकर्ता पत्नी के और भी कई अश्लील फोटो मिले। सलमान को गिरफ्तार करने के साथ ही पत्नी की तहरीर पर जेठ कामरान, जेठानी हिना, बहन रिजवाना, ससुर उमरदराज के खिलाफ आईटी एक्ट सहित गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। हालाँकि, पुलिस ने आश्वस्त किया है कि दोषी पाए जाने पर ही अन्य आरोपितों के खिलाफ वह कोई कार्रवाई करेगी।

चोटी काटो और 12000 रुपए इनाम में ले जाओ… मोईन सिद्दीकी (चोटी कटवा) हुआ गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश, बरेली के किला थाने में हुए हंगामे के बाद पुलिस ने ‘चोटी कटवा’ को गिरफ्तार कर लिया। चोटी कटवा मोईन सिद्दीकी नूरी ने शनिवार को प्रेस कॉफ्रेंस कर केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की बहन व मेरा हक फाउंडेशन की अध्यक्ष फरहत नकवी व निदा खान को तीन दिन के भीतर देश छोड़ देने की धमकी दी थी। इस बाबत उसने फतवा भी जारी किया था। वैसे यह पहली बार नहीं है। मोईन इससे पहले भी दोनों महिलाओं की चोटी काटने और पत्थर मारकर देश से बाहर निकालने का फतवा जारी कर विवादों में रह चुका है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बरेली में सिर कलम करने से लेकर कई ऊल जलूल बयान देने और वीडियो वायरल करने के आरोपित मोईन सिद्दीकी उर्फ चोटी कटवा इससे पहले भी दोनों महिलाओं की चोटी काटने और पत्थर मारकर देश से बाहर निकालने का फतवा जारी कर चुका है। मोईन वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी का सर कलम करने पर भी इनाम की घोषणा कर चुका है। वहीं, रविवार को किला थाने में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी की बहन और मेरा हक़ फाउंडेशन की अध्यक्ष फरहत नक़वी ने दर्जनों तलाक़शुदा महिलाओं के साथ मोईन सिद्धकी की गिरफ्तारी को लेकर धरना भी दिया था।

फरहत नकवी ने किला पुलिस को बताया था की उन्हें जान का खतरा है। उनके साथ कभी भी कोई अप्रिय घटना हो सकती है। बता दें कि मोईन सिद्दीकी ने एक साल पहले चोटी काटने पर 12 हजार रूपये का इनाम रखा था और जान से मारने की धमकी भी दी थी। तब से वह खुलेआम घूम रहा था। लेकिन फरहत नकवी द्वारा पुलिस की कार्यशैली की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने पर किला पुलिस ने चोटी कटवा के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर घर में दबिश देकर उसे गिरफ्तार कर लिया।

हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तार होने के बाद चोटी कटवा ने कहा कि मीडिया की सुखियाँ बनने के लिए फरहत नकवी और निदा खान ने षडयंत्र रचा था। उन्होंने विवादस्पद बयान देने के लिए रुपए देने का वायदा किया था। वे चाहती थीं कि तीन तलाक का मुद्दा उठाकर वह सरकार में मंत्री बन जाएँ। निदा फरहत महिलाओं को ठग रहीं हैं। देश और संविधान को बदनाम कर रहीं हैं। ऐसी महिलाओं से शासन और प्रशासन को सतर्क रहना चाहिए। मैं अपने बयान पर अडिग हूँ। मैंने देश से निकालने का कोई बयान नहीं दिया। किसी धर्म जाति और व्यक्ति से मेरी रंजिश नहीं है।