Thursday, April 15, 2021
Home राजनीति न दलित सुरक्षित न महिला, राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार बनते ही चौपट हुई कानून-व्यवस्था

न दलित सुरक्षित न महिला, राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार बनते ही चौपट हुई कानून-व्यवस्था

राजस्थान के सुदूर इलाकों की तो छोड़िए राजधानी जयपुर में समुदाय विशेष के आगे प्रशासन बौना साबित हो रहा है। 12 अगस्त को बकरीद पर इतना उत्पात मचा कि आँसू गैस के गोले दागने पड़े। साम्प्रदायिक तनाव के एक हफ्ते बाद भी हालात काबू में नहीं हैं। धारा 144 लागू है।

  • 13 अप्रैल 2019: जोधपुर में रामनवमी पर शोभायात्रा से लौट रहे लोगों पर एक समुदाय विशेष के लोगों ने पथराव किया। वाहनों को फूँक दिया।
  • 24 अप्रैल 2019: जयपुर जिले के चौमूं कस्बे में हिंदू नववर्ष समारोह समिति पर निकाली गई रैली पर समुदाय
    विशेष के लोगों ने पथराव किया।
  • 11 जुलाई 2019: राजस्थान यूनिवर्सिटी की 150 से ज्यादा महिला प्रोफेसरों को फोन कॉल के जरिए प्रताड़ित किया गया। बलात्कार की धमकियाँ दी गई।
  • 20 जुलाई 2019: अलवर में मुस्लिम भीड़ ने एक नेत्रहीन पिता के पुत्र हरीश जाटव को बेहरमी से मार दिया।
  • 8 अगस्त 2019: पुलिस प्रताड़ना से तंग आकर दलित महिला ने आत्महत्या कर ली।
  • 13 अगस्त 2019: जयपुर में कांवड़ियों पर पत्थर, डंडे, सरिया से मुस्लिम समुदाय के लोगों का हमला।

ये तो बस चुनिंदा उदाहरण हैं। बीते साल के अंत में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद से चौपट होती कानून-व्यवस्था की। समुदाय विशेष का उपद्रव और कानून को ठेंगा दिखाते उसके ही रखवाले। न महिलाएँ महफूज, न दलित और न पिछड़े।

बीते साल के मुकाबले इस साल के शुरुआती चार महीनों के आँकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। आँकड़े बताते हैं कि प्रदेश में गहलोत सरकार के आने के बाद अपराधों में बड़ा उछाल आया है। पुलिसिया आँकड़ों के मुताबिक बीते साल जनवरी से अप्रैल के बीच 55,102 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे, जो इस साल बढ़कर जनवरी से अप्रैल के बीच 62,666 हो गए।

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में पिछले साल के मुकाबले 40.56% उछाल आया। सिर्फ चार महीनों के भीतर बलात्कार के मामलों में 15.02% की वृद्धि दर्ज की गई है। दलितों पर अत्याचार में पिछले साल के मुकाबले 7.66% का इजाफा हुआ है।

इन आँकड़ों के बचाव में गहलोत सरकार का तर्क बेहद पुराना है। उनका कहना है कि पूववर्ती भाजपा सरकार के जमाने में एफआईआर ही दर्ज नहीं किए जाते थे। अब मामले दर्ज किए जाते हैं सो आँकड़ों में उछाल स्वभाविक है।

लेकिन उन मामलों का क्या जो गहलोत सरकार के इस दावे की चुगली करते हैं। पुलिसिया जॉंच से तंग आकर हरीश जाटव के नेत्रहीन पिता के जहर खाकर जान देने का मामला तो चंद दिन पुराना ही है। हरीश के परिजनों का कहना है कि पुलिस मॉब लिंचिंग के इस मामले को एक्सीडेंट साबित करने पर तुली है।

भरतपुर की वह महिला भी दलित ही थी जिसने पुलिस प्रताड़ना और पिटाई के कारण आत्महत्या कर ली। इस महिला का पति जुलाई 2019 में पड़ोस की एक लड़की के साथ भाग गया था। लड़की के परिजनों ने शिकायत दर्ज कराई तो पुलिस ने महिला को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

चूरू में चार बच्चों की मॉं 35 वर्षीय दलित महिला को कथित तौर पर तो पुलिस वालों ने बंधक बनाकर रख लिया। पुलिस स्टेशन में ही गैंगरेप किया। पीड़ित महिला की माने तो पुलिस ने चोरी के एक मामले में उसके देवर को 6 जुलाई को पकड़ा था। पुलिसवालों ने देवर को हिरासत में इतना प्रताड़ित किया कि उसकी मौत हो गई। अलवर में तो सामूहिक बलात्कार का मामला चुनाव का हवाला देकर दबा दिया गया।

फिर भी कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं। कोई शोर नहीं। हरीश जाटव की मौत की खबर तभी चर्चा में आई जब उसके पिता ने आत्महत्या की। जब उसके पिता के शव के साथ लोग सड़क पर उतरे। चर्चा है तो बस पहलू खान की हत्या के आरोपितों के बरी होने की। उसका दोष भी पुरानी सरकार पर गहलोत ने मढ़ दिया है।

राज्य के सुदूर इलाकों की तो छोड़िए राजधानी जयपुर में समुदाय विशेष के आगे प्रशासन बौना साबित हो रहा है। 12 अगस्त को बकरीद और सावन का आखिरी सोमवार एक साथ पड़ा। मुस्लिमों ने इतना उत्पात मचाया कि जयपुर-दिल्ली रोड जाम हो गया। भीड़ पर काबू पाने के लिए आँसू गैस के गोले दागने पड़े। साम्प्रदायिक तनाव के एक हफ्ते बाद भी जयपुर में हालात काबू में नहीं हैं। वहाँ धारा 144 लागू है।

देश की राजधानी दिल्ली से जयपुर करीब 281 किलोमीटर दूर है। फिर भी वहॉं की कानून-व्यवस्था की कोई चर्चा नहीं। जबकि, जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य जहॉं आतंकवाद का खतरा हर पल मौजूद है, वहाँ सुरक्षा के लिहाज से उठाए गए एहतियातन कदम पर हो रहे शोर को आप सुन ही रहे होंगे।

लेकिन, राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है तो किसी को भी न महिला के अधिकारों की चिंता है, न दलितों की और न ही मानवाधिकारों की। राज्य की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी जिन पर है वे आपसी राजनीतिक नूरा-कुश्ती में व्यस्त हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गॉंधी को नाराजगी जताते हुए कहना पड़ा था कि कुछ लोग अपने बेटे की ही चिंता में व्यस्त हैं।

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