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गीता को पाक से लाने वाली ‘सुपर मॉम’ जो जॉर्ज की हथकड़ी लगी तस्वीर लेकर पहुॅंची थी मुजफ्फरपुर

भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में 6 अगस्त को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। दिल्ली के एम्स अस्पताल में उन्होंने मंगलवार देर रात आखिरी साँस ली। आज शाम राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

एक प्रखर वक्ता से कुशल राजनेत्री का सफर तय करने वाली पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 25 साल की उम्र में ही विधायक बन गईं थी। जब 1977 में जॉर्ज फर्नां​डीस ने जेल से लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन भरा तो सुषमा ही दिल्ली से मुजफ्फरपुर पहुॅंचीं और हथकड़ियों में जकड़ी जॉर्ज की तस्वीर दिखा प्रचार किया। उन दिनों ‘जेल का फाटक टूटेगा, जॉर्ज हमारा छूटेगा’ का उनका दिया नारा सबकी ज़ुबान पर था।

1970 में ABVP से जुड़ीं

  • 14 फरवरी 1952 को सुषमा स्वराज हरियाणा के अंबाला कैंट में पैदा हुईं।
  • 1970 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ीं।
  • उनके पिता हरदेव शर्मा आरएसएस से जुड़े थे।
  • अम्बाला छावनी के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत और राजनीतिक विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की और फिर चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की।
  • कॉलेज के दिनों में लगातार 3 वर्षों NCC की सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुनी गईं।
  • इस दौरान हरियाणा सरकार द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में लगातार तीन वर्षों तक सर्वश्रेष्ठ हिंदी वक्ता का पुरस्कार भी मिला।
  • 1973 में कानून की पढ़ाई पूरी करके उन्होंने वकालत शुरू की।
  • 1975 में स्वराज कौशल से प्रेम विवाह किया। स्वराज सुप्रीम कोर्ट में उनके सहकर्मी थे।

25 की उम्र में विधायक

  • आपातकाल के दौरान सुषमा स्वराज ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण आंदोलन में हिस्सा लिया था। आपातकाल के बाद वह जनता पार्टी की सदस्य बनीं।
  • 1977 में पहली बार उन्होंने हरियाणा का विधानसभा चुनाव जीता और केवल 25 वर्ष की उम्र में वह चौधरी देवी लाल सरकार में राज्य की श्रम मंत्री बन गईं। 
  • श्रम मंत्री बनते ही उन्होंने सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनने की उपलब्धि हासिल की।
  • जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष बनीं। फिर भाजपा का गठन हुआ तो उसमें शामिल हुईं।

1990 में पहुँची राज्यसभा

  • 1990 में वह राज्यसभा सदस्य बनीं। 1996 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनावों में जीत हासिल की।
  • अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन वाली सरकार में वे सूचना प्रसारण मंत्री बनीं और उन्होंने लोकसभा में चल रही बहस के लाइव प्रसारण का फैसला किया।
  • 1998 में वे फिर दक्षिण दिल्ली संसदीय सीट के लिए लोकसभा से निर्वाचित हुईं। लेकिन इस बार दूरसंचार मंत्रालय का भी जिम्मा सौंपा गया।
  • अपने इस कार्यकाल में सुषमा स्वराज ने भारतीय फिल्म को एक उद्योग घोषित करने का अहम्क फैसला लिया।
  • उनके इस फैसले ने फिल्म जगत की संभावनाओं को विस्तार दिया।
  • वर्ष 1998 के अक्टूबर में उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया। जिसके बाद दिल्ली को उसकी पहली महिला मुख्यमंत्रा सुषमा स्वराज के रूप में मिली।
  • दिसंबर 1998 में उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में वापसी करने के लिए विधानसभा से इस्तीफ़ा दे दिया।
  • 1999 में वे कर्नाटक के बेल्लारी से सोनिया गाँधी के खिलाफ़ मैदान में उतरीं।
  • साल 2000 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद के रूप में उनकी फिर वापसी हुई और वे फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में सूचना प्रसारण मंत्री बनीं।
  • हालाँकि बाद में उन्होंने स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों का जिम्मा सौंपा गया।

2009 में नेता प्रतिपक्ष

  • 2009 में मध्यप्रदेश के विदिशा से लोकसभा पहुँची। 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनीं।
  • 2014 में विदेश मंत्री बनीं।
  • 2014-2019 विदेश मंत्री के रूप में दूर-दराज देशों में फँसे अपने लोगों को भारत वापसी करवाने में अहम भूमिका निभाई। पाकिस्तान से गीता की वापसी सुषमा स्वराज के कार्यकाल में ही संभव हो पाई।
  • ट्विटर से लेकर हर सोशल प्लेटफॉर्म पर वे लोगों की मदद के लिए तत्पर रहीं। उनकी सोशल मीडिया पर दिखाई गई सक्रियता के कारण वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें ‘सुपर मॉम’ के नाम से भी नवाजा था।
  • अपनी वाकपटुता के गुण के कारण वे अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे लोकप्रिय वक्ता रहीं।
  • सुषमा एक मात्र भाजपा नेता थीं जिन्होंने उत्तर और दक्षित भारत क्षेत्र से चुनाव लड़ा।

गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के अपने सफर में सुषमा स्वराज ने 7 बार सांसद, 3 बार विधायक, दिल्ली की 5वीं मुख्यमंत्री, संसदीय कार्य मंत्री, केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री, 15वीं लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष और विदेश मंत्री के रूप में काम किया था।

1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के बगल में खड़े होकर दिया गया उनका भाषण और 29 सितंबर 2018 में संयुक्त राष्ट्र में दिया गया भाषण शायद ही कभी कोई भूल पाए। इसके अलावा साल 2015 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा में दिया गया उनका भाषण भी सबकी स्मृतियों में है जब वे भरी सभा में जमकर पाकिस्तान पर बरसीं थी।

साल 2016 में उन्होंने नवंबर माह में ट्वीट के जरिए अपने किडनी खराब होने की सूचना दी थी। इस दौरान उनका किडनी ट्रांस्प्लांट हुआ था। नवंबर 2018 में उन्होंने ऐलान किया कि वो आगामी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगीं।

प्रखर वक्ता, कुशल नेत्री, ओजस्वी व्यक्तित्व वाली सुषमा स्वराज को शायद ही कोई अपनी स्मृतियों से निकाल पाए। विपक्ष से लेकर विदेश तक में सुषमा स्वराज ने अपने कार्यों से बहुत स्नेह जुटाया। उनका इस तरह अचानक चले जाना भारतीय राजनीति और भारतीय जनता पार्टी को एक बहुत बड़ी क्षति है।

सुषमा स्वराज: बेल्लारी की नायिका, जिसने कहा था-हॉं, हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि धारा 370 हटाने की बात करते हैं

“हॉं, हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि हम वन्दे मातरम् गाने की वकालत करते हैं। हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के लिए लड़ते हैं। हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि धारा 370 को समाप्त करने की मॉंग करते हैं। हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान में गोरक्षा के वंश और वर्धन की बात करते हैं। हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान में समान नागरिक संहिता बनाने की मॉंग करते हैं। हम साम्प्रदायिक हैं, क्योंकि काश्मीरी शरणार्थियों के दर्द को जुबान देने का काम करते हैं।”

11 जून 1996 को सुषमा स्वराज ने संयुक्त मोर्चा सरकार के विश्वास मत का विरोध करते हुए लोकसभा में यह बात कही थी। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर राष्ट्रीय बहस की जरूरत पर जोर देते हुए कहा था, “इस देश के संविधान निर्माताओं ने धर्म निरपेक्षता की क्या कल्पना की थी और इस देश के शासकों ने उसे किस स्वरुप में ढाल दिया इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।”

और अनंत ​यात्रा पर निकलने से महज तीन घंटे पहले उन्होंने आखिरी ट्वीट भी धारा 370 हटाने के लेकर ही किया था। ट्वीट में उन्होंने कहा था, “प्रधानमंत्री जी-आपका हार्दिक अभिनंदन। मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।”

यह बताता है कि अपने विचारों के प्रति सुषमा स्वराज कितनी प्रतिबद्ध थीं। खराब स्वास्थ्य के कारण वो भले कुछ दिनों से सक्रिय राजनीति से दूर थीं, लेकिन अपने विचारों को लेकर अंतिम क्षण तक सक्रिय बनी रहीं।

प्रखर वक्ता सुषमा स्वराज ने चार दशक से ज्यादा लंबे अपने राजनीतिक जीवन में हमेशा कठिन मोर्चे ही चुने। 4 राज्यों से 11 चुनाव लड़ने वाली इस नेत्री ने 1999 में कर्नाटक की बेल्लारी में जाकर सोनिया गॉंधी को चुनौती दी थी। उस समय बेल्लारी कॉन्ग्रेस का सुरक्षित गढ़ माना जाता था और भाजपा को विरोधी ‘काउ बेल्ट’ पार्टी कहते थे।

उस चुनाव में सुषमा स्वराज भले हार गईं, लेकिन अपने सहज संवाद के कारण वहॉं के मतदाताओं के दिल में न केवल खुद उतरीं, बल्कि भाजपा को भी बसा दिया। अब बेल्लारी का कॉन्ग्रेसी गढ़ होना अतीत की बात है। 1999 के बाद से हुए संसदीय चुनावों में बेल्लारी से भाजपा 2018 के लोकसभा उपचुनाव को छोड़ कभी नहीं हारी। यह था सुषमा स्वराज का असर। उन्होंने अपनी जुझारू छवि से कर्नाटक में ऐसी नींव रखी कि दक्षिण का दरवाजा भी भाजपा के लिए खुल गया।

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वे विदेश मंत्री रहीं। ट्विटर डिप्लोमेसी का उन्होंने दरवाजा खोला। ट्विटर पर सक्रिय रहते हुए लोगों की मदद करना इतना चर्चित हुआ कि वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें ‘सुपरमॉम ऑफ द स्टेट’ कहा। उनके देहांत के साथ ही भारतीय राजनीति का एक शालीन अध्याय समाप्त हो गया है।

Article 370: कॉन्ग्रेस में आंतरिक टकराव, अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी किया समर्थन

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल मंगलवार को लोकसभा में भी पारित हो गया है। बिल के समर्थन में 370 वोट पड़े, जबकि विरोध में 70 वोट पड़े। आर्टिकल 370 का ‘पावर’ कम करने के मोदी सरकार के इस कदम का कई कॉन्ग्रेस के नेताओं ने भी पार्टी लाइन से हटकर समर्थन किया है। मिलिंद देवड़ा और जनार्दन द्विवेदी के बाद अब इस कड़ी में राहुल गाँधी के करीबी और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी जुड़ गया है।

कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्विटर पर लिखा है- “मैं जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर किए गए फैसले का समर्थन करता हूँ। साथ ही भारत में इसके पूर्ण एकीकरण का भी समर्थन करता हूँ। हालाँकि, अगर संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया होता। तब इस मामले पर कोई भी सवाल नहीं उठाया जा सकता था। फिर भी, यह हमारे देश के हित में है और मैं इसका समर्थन करता हूँ।”

सोमवार (अगस्त 05, 2019) को यह बिल राज्यसभा से पारित हो गया है। राज्यसभा में सोमवार को इस बिल के पक्ष में 125 वोट पड़े थे, वहीं विपक्ष में 61 सांसदों में मतदान किया। राज्यसभा में बिल के पास होने के बाद मंगलवार को यह बिल लोकसभा में पेश किया गया।

देखा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस में अनुच्छेद-370 को लेकर दो-फाड़ जारी है। इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता रंजीत रंजन, मुंबई कॉन्ग्रेस के बड़े नेता मिलिंद देवड़ा ने भी केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 को हटाने के फैसले का समर्थन किया।

वहीं, दीपेंद्र हुड्डा ने अनुच्छेद 370 को लेकर कहा कि 21वीं सदी में इसकी कोई जगह ही नहीं है। हालाँकि, कुछ देर बाद उन्होंने अपना यह ट्वीट हटा लिया। अपने इस ट्वीट के साथ उन्होंने एक अखबार की पुरानी खबर भी ट्वीट की थी, जिसमें उनके हवाले से 370 हटाने की वकालत की गई थी।

कश्मीर पर भारत का रुख़ देख कर POK से भी उठी भारत में मिलने की माँग

जम्मू-कश्मीर से अनुच्‍छेद-370 का पावर खत्म कर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बाँटने का विधेयक सोमवार को राज्‍यसभा और मंगलवार को लोकसभा से पारित होने के बाद अब पाक अधिकृत कश्‍मीर से भी भारत में शामिल किए जाने की माँग जोर पकड़ने लगी है।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर के POK वाले हिस्से पर पाकिस्तान ने अनाधिकृत तौर पर कब्‍जा कर रखा है। भारत की संसद में अनुच्‍छेद-370 को लेकर चल रही चर्चा पर गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोगों की भी नज़र थी।

ANI के खबर के अनुसार, गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोगों का कहना है कि उन्हें भारत के संविधान पर पूरा भरोसा है। भारत पर भरोसा है। इसलिए अब POK के लोग भारत में शामिल होना चाहते हैं। उन्होंने भारतीय संविधान में अपना प्रतिनिधित्व भी माँगा है। बता दें कि अभी तक जम्मू-कश्मीर राज्य की विधानसभा में POK की सीटें छूटती रही हैं। इस उम्मीद में कि एक दिन स्थितियाँ सामान्य होने पर वहाँ के प्रतिनिधियों को भी चुनाव प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।

गिलगिट-बाल्टिस्तान से पहले भी इस तरह की माँग उठती रही है लेकिन इस बार इस तरह की आवाज उठने पर पहले से ही परेशान चल रही, पाकिस्तान की इमरान खान सरकार की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अपने एक वीडियो में, गिलगिट के लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे सेंग एच. सेरिंग ने गृह मंत्री अमित शाह से कहा है कि क्षेत्र के लोग भारत के साथ जुड़ना चाहते हैं। साथ ही माँग की है कि उन्हें भी भारतीय संविधान में प्रतिनिधित्व दिया जाए।

सेरिंग ने अनुसार, “गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पाक अधिकृत कश्‍मीर जम्मू-कश्मीर का अभिन्न हिस्सा है। हम मानते हैं कि गिलगिट-बाल्टिस्तान भी भारत का अभिन्न हिस्सा है। गिलगिट-बाल्टिस्तान लद्दाख का विस्तार है। हम भारतीय संघ और संविधान के तहत अपने लिए अधिकार की माँग करते हैं।”

अपने वीडियो में सेरिंग ने कहा, “हम भारत की विधायी इकाई में अपना प्रतिनिधित्व माँग रहे हैं। जम्‍मू-कश्‍मीर को बाँटकर बनाए गए दोनों केंद्रशासित प्रदेशों में रिजर्व सीटों पर गिलगिट-बाल्टिस्तान के लिए भी सीटें होनी चाहिए। हमारा मानना है कि भारत की राज्यसभा और लोकसभा में भी हमारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। हम भारत का अभिन्न हिस्सा हैं।”

लोकसभा में चर्चा के दौरान Article-370 पर मोदी सरकार के फैसले का विरोध कर रहे विपक्षी नेताओं ने पीओके का मुद्दा उठाया‌‌ था। इस पर शाह ने कहा कि जब मैं जम्मू-कश्मीर की बात करता हूँ। तो उसका मतलब पाक अधिकृत कश्‍मीर से भी होता है। हम POK वापस लेने के लिए जान दे देंगे।

रोटी-नान से जूझते इमरान ने संसद में दी धमकी: कहा- 370 हटाने से भारत में होंगी पुलवामा जैसी घटनाएँ

पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संसद के संयुक्‍त सत्र में अनुच्छेद-370 के विषय पर बयान दिया है।इमरान खान ने पाकिस्तान के संसद सत्र के दौरान धमकी देते हुए कहा है कि जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाने के कारण भारत में पुलवामा जैसी घटनाएँ होंगी। उन्‍होंने कहा कि वो इस मामले को संयुक्त राष्‍ट्र लेकर जाएँगे। इमरान खान का कहना है कि पाकिस्तान अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय को बताएगा कि बीजेपी की नस्‍लवादी विचारधारा के कारण भारत में अल्‍पसंख्‍यकों के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा है।

पाकिस्तान के संसद में इमरान खान ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) को जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) की समस्‍या के लिए जिम्‍मेदार ठहराया। उन्‍होंने कहा कि मौजूदा माहौल में भारत के सभी नागरिकों के अधिकार समान नहीं हैं।

मोहम्‍मद अली जिन्‍ना का जिक्र करते हुए इमरान खान ने कहा, “कायदे आजम ने पहले ही बता दिया था कि अविभाजित भारत में कैसे बहुसंख्‍यक हिंदू भारतीय मुस्लिमों को बंधक बना लेंगे।”

पाकिस्‍तान ने जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाने के भारत सरकार के फैसले की निंदा की है। पाकिस्‍तान ने इसे भारत का गैर-कानूनी और एकपक्षीय कदम बताते हुए कहा है कि वह इसके खिलाफ हरसंभव विकल्‍प पर काम करेंगे।

‘Article-370 हटाने के लिए 367 में संशोधन असंवैधानिक’, SC में सरकार को चुनौती

जम्मू और कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 370 पर राष्ट्रपति के आदेश की वैधानिकता को मंगलवार (अगस्त 6, 2019) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। वकील मनोहर लाल शर्मा ने इस मामले में एक याचिका दायर की है। 

उन्होंने अपनी याचिका में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-A को लेकर जारी की गई अधिसूचना को असंवैधानिक बताया है और कहा कि सरकार इस तरीके का काम करके देश में मनमानी कर रही है। इसके अलावा याचिका में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रपति का आदेश असंवैधानिक है और केंद्र को संसदीय मार्ग अपनाना चाहिए। 

साथ ही याचिका में कहा गया है कि आर्टिकल 370 को हटाने के लिए सरकार ने आर्टिकल 367 में जो संशोधन किया है, वह असंवैधानिक है। सरकार ने मनमाने और असंवैधानिक ढंग से ये बदलाव किया। इसलिए सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि इस अधिसूचना को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाए।

एडवोकेट ने उच्चतम न्यायालय से अपील की है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की अधिसूचना ही संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। मनोहर लाल शर्मा बुधवार (अगस्त 7, 2019) को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी याचिका की तुरंत सुनवाई का अनुरोध कर सकते हैं।

इससे पहले शाह फैसल की पार्टी से जुड़ीं शेहला रशीद ने मोदी सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कही थी। शेहला ने कहा था कि सरकार को गवर्नर मान लेने और संविधान सभा की जगह विधानसभा को रखने का फैसला संविधान के साथ धोखा है। सभी प्रगतिशील ताकतें एकजुट होकर लड़ाई लड़ेंगी। शेहला ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि देश के संघीय ढाँचे और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को मजबूत करने के बजाय, सरकार उसे कमजोर कर रही है। यह देश के संघीय व्यवस्था का अपमान है।

लोकसभा से भी जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल-2019 पास, पक्ष में 370 और विपक्ष 70 वोट पड़े

राज्यसभा के बाद लोकसभा से भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 बिल पास हो गया है। लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की ओर लाए गए संकल्प प्रस्ताव पर सदन का मत लिया गया। विपक्षी सांसदों ने सदन में वोटिंग की माँग की, जिसके बाद इसकी प्रक्रिया हुई और इलेक्ट्रॉनिक मशीन से सदन में वोट डाले गए।

लोकसभा में अमित शाह की ओर से लाया गया संकल्प स्वीकार किया गया है। इसके पक्ष में 370 और विपक्ष में 70 वोट पड़े हैं। एक सांसद ने अपना मत नहीं डाला, जबकि कुल 441 सदस्यों ने वोटिंग में हिस्सा लिया है। इसके साथ ही लोकसभा से भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 पास हो गया है।

बता दें कि गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार को लोकसभा में जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने और अनुच्छेद 370 की अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव संबंधी संकल्प चर्चा एवं पारित करने के लिए पेश किया।  

इससे पहले राज्यसभा ने सोमवार को अनुच्छेद 370 की अधिकतर धाराओं को खत्म कर जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख को दो केन्द्र शासित क्षेत्र बनाने संबंधी सरकार के दो संकल्पों को मंजूरी दे दी थी।

34 साल के सांसद ने कॉन्ग्रेसियों के लिए ऐसा क्या कहा कि PM मोदी को शेयर करनी पड़ गई Video

लोक सभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पर सभी को उम्मीद थी कि भाजपा के प्रचंड बहुमत और कमज़ोर विपक्ष के चलते अधिनियम बिना किसी खास बहस के पास हो जाएगा। लेकिन लोक सभा में इस मामले में बहस राज्य सभा से अधिक दिलचस्प हो रही है। सुबह शुरूआत कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी के विवादस्पद बयानों से हुई। उसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोकसभा सांसद हसनैन मसूदी ने दावा किया कि संविधान का विवादस्पद अनुच्छेद-370 जनसंघ के संस्थापक-अध्यक्ष और भाजपा के पितृ-पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आशीर्वाद से बना।

और अब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार से कहा है कि अगर जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन सच में दीवाली जैसा मौका है, जैसा कि भाजपा सांसद दावा कर रहे हैं, तो कश्मीरियों पर भी कर्फ्यू हटाकर उन्हें भी जश्न मनाने दिया जाए। उन्होंने भाजपा से आग्रह किया कि कर्फ्यू हटाया जाए और हिरासत में लिए गए सभी कश्मीरी नेताओं को रिहा किया जाए। इसके पहले उन्होंने भाजपा पर अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए संवैधानिक जिम्मेदारी भूलने और (कश्मीरियों से किया गया तथाकथित) संवैधानिक वादा तोड़ने का आरोप लगाया।

‘हमने कहा था कहीं भी भेज दो, कश्मीर के साथ मत रखो’

भाजपा की ओर से लोक सभा में मोर्चा संभालने वालों में से एक थे लद्दाख के सांसद जाम्यांग त्सेरिंग नामग्याल, जिन्होंने राज्य के विभाजन के समर्थन में लद्दाख का पक्ष रखा। उनका भाषण इतना प्रभावशाली रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अलग से उसे ट्वीट कर उनकी तारीफ़ की।

अपने भाषण में नामग्याल ने कई महत्वपूर्ण बिंदु गिनाए। उन्होंने शुरूआत पूर्व-प्रधानमंत्री नेहरू पर तंज़ कसते हुए की। उन्होंने कहा कि 70 साल से लद्दाख को कश्मीर के साथ रखने वालों को वहाँ की स्थानीय संस्कृति, वहाँ की सभ्यता, वहाँ की आकांक्षाओं के बारे में ज्ञान नहीं था; उनके लिए तो यह बंजर भूमि थी जिसपर घास का तिनका भी नहीं उगता। मालूम हो कि अक्साई चिन पर चीन के कब्ज़े पर पंडित नेहरू ने संसद में कहा था कि अरुणाचल और लद्दाख के पहाड़ों पर तो एक पत्ता घास का भी नहीं उगता, तो ऐसे में उनकी समझ में नहीं आ रहा कि उसके पीछे संसद का कीमती समय बर्बाद करने का क्या मतलब है

नामग्याल ने दावा यह भी किया कि लद्दाख के लोगों ने शुरू से ही सरकार को बता दिया था कि उन्हें (मुस्लिम-प्रभुत्व वाले) कश्मीर के अलावा किसी भी और तरीके से देश में रहना मंज़ूर है- भले ही वह केंद्र-शासित प्रदेश (UT) के रूप में हो, पूर्वी पंजाब के साथ विलय हो, या कुछ और। हिंदी में बोल रहे नामग्याल ने कहा कि हिंदुस्तान का हिस्सा बने रहने के लिए ही लद्दाख ने 70 साल UT बनने की लड़ाई लड़ी, लेकिन पिछली सरकारों ने लद्दाख को ‘फेंककर’ रखा।

गुस्साए लोगों ने लाठी मार वामपंथी नेताओं का फोड़ा सिर, Article 370 के फैसले का कर रहे थे विरोध

अनुच्छेद 370 और 35-A खत्म होने के बाद पूरे देश में जश्न का माहौल है। पटना समेत बिहार के कई जिलों में भी लोगों ने अपने अपने तरीके से जश्न मनाया। पटना के कारगिल चौक पर कई संगठनों ने विजय जुलूस निकाला। युवकों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई और चेहरों पर गुलाल लगाया। इस दौरान वहाँ पर इस फैसले के विरोध में मीटिंग कर रहे वामपंथ के कार्यकर्ताओं से जश्न मना रहे समर्थकों की भिड़ंत हो गई।

दोनों गुटों में बढ़ती बहस ने बाद में हिंसक रूप ले लिया। केंद्र सरकार के फैसले के समर्थन में जश्न मना रहे युवकों ने लाठी-डंडे से हमला कर सीपीआई के सुमंत कुमार का सिर फोड़ दिया, जबकि आशीष व एक अन्य को भी काफी चोटें आईं हैं। फिलहाल, सुमंत कुमार को इलाज के लिए पीएमसीएच ले जाया गया, जहाँ उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।

सुमंत कुमार ने बताया कि सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 में किए गए बदलाव के विरोध में मार्च निकालने का प्रोग्राम बनाया गया था और फिर बाद में मीटिंग होने लगी, जिसमें संगठन के कई लोग शामिल थे। इसी बीच भगवा धारी झंडा लिए युवकों ने एक युवक की पिटाई कर दी। उन लोगों ने जब बचाने की कोशिश की तो उन पर हमला कर दिया और सिर फोड़ दिया। 2-3 अन्य को भी चोटें आई हैं।

साथ ही, सीपीआई के राज्य सचिव सत्यनारायण सिंह ने बजरंग दल पर मारपीट करने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि बजरंग दल के सदस्यों ने मारपीट की है। उन्होंने इसे निंदनीय बताते हुए इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

वहीं, पटना के गाँधी मैदान थानाध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने बताया कि अभी तक किसी पक्ष की तरफ से लिखित शिकायत नहीं मिली है। जानकारी के मुताबिक, एसएसपी गरिमा मलिक ने वायरलेस से हर थाना पुलिस को सतर्क रहने व गश्ती करने का निर्देश दिया है और खुद ही सुरक्षा व्यवस्था की मॉनीटरिंग करने के लिए सड़क पर उतर पड़ी हैं। एसएसपी के निर्देश के बाद सभी थाना पुलिस ने हर चौक-चौराहों पर पुलिस बल की तैनाती कर दी है और साथ ही सीसीटीवी कैमरे से भी नजर रखी जा रही है।

संपादकीय नोट: आए दिन इस तरह की मारपीट की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। ऑपइंडिया किसी भी तरह की हिंसा या मारपीट की घटना की निंदा करता है। इससे माहौल बिगड़ता है। देश में कानून व्यवस्था है, लोगों को इसके दायरे में ही रहना चाहिए।

वो दिग्विजय सिंह है, वो कुछ भी कह सकता है

जंग और बहस 35-A पर छिड़ी रही लेकिन जब सही देश-काल-वातावरण आया तो अनुच्छेद 35-A की जमीन ही खिसका दी गई। हुआ ये कि सरकार से सिर्फ किसी भी बात को लेकर नाराज रहने वाले प्रदर्शनकारियों को 370 के मुद्दे से ही हाथ धोना पड़ गया। 370 के अस्तित्व पर विचार को लेकर हर तरह के विरोध और समर्थन के स्वर सोशल मीडिया से लेकर बाजारों में देखने को मिले। लेकिन, इस पर अगर कोई जोरदार तरीके से डटा रहा तो वो था नेहरूघाटी सभ्यता से जन्मे देश का लगभग सबसे वयस्क राजनीतिक दल!

कॉन्ग्रेस अभी तक ठीक से नहीं समझ पाई है कि आखिर बेड़ागर्क कहाँ हुआ है। शायद यही वजह भी है कि प्रलाप जारी रखने की सौगंध निभाने के लिए उन्होंने अपना मुद्दा चुन लिया। नेहरू का ही खाने और बजाने वाले देश के इस सबसे वयस्क दल को ‘काटो तो खून नहीं’ वाला दौरा पड़ा है। इसलिए अच्छा है कि सब मुद्दों के बजाए आदरणीय नेहरू जी को अर्घ्य लगा दिया जाए।

वैसे तो हमेशा ही, लेकिन विगत कुछ समय कॉन्ग्रेस ने अपनी डूबती नाव बचाने का यह तरीका अपना लिया है कि किसी तरह नेहरू के नाम पर प्रासंगिक बने रहें। यही हुआ भी। इसरो के अभियानों से लेकर सांड के उन्माद तक के लिए खोजकर नेहरू और इंदिरा से लेकर राजीव गाँधी तक को सब सफलताओं का क्रेडिट दिया गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर समस्या से लेकर विवादित 370 के लिए कॉन्ग्रेस ने नेहरू को कभी क्रेडिट नहीं दिया।

यूँ तो दिग्विजय सिंह के बयानों को बहुत गम्भीरता से लेना अपने आप में एक मजाक है फिर भी जब यही आवाज सारे कॉन्ग्रेस की आवाज बन जाए तो गंभीरता से लेना वाजिब हो जाता है। जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता संसद में जेब में त्यागपत्र लेकर बैठे हों, उस कॉन्ग्रेस के पास अब अपनी डूब चुकी सभ्यता बचाने के अलावा कोई आखिरी विकल्प मौजूद नहीं है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि नेहरू जी ने ही देश को सिक्किम दिया और इंदिरा ने गोआ। साथ ही, इंदिरा गाँधी ने ही पाकिस्तान को दो हिस्सों में बाँटा जिससे बांग्लादेश का जन्म हुआ। वैसे इस सन्दर्भ में दिग्विजय जी को गोवा की याद क्यों आई, ये किसी को पता नहीं। एक सांसद ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ की याद करते हैं, दूसरे गोवा की, जबकि चर्चा कश्मीर की हो रही है!

गोवा विलय में नेहरू को उनकी ‘भूमिका’ RSS ने सौंपी थी

जिस गोवा के विलय का श्रेय नेहरू को दिया जा रहा है उसकी सच्चाई संघ से होकर गुजरती है। दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। जुलाई 21, 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था। संघ (RSS) के स्वयंसेवकों ने अगस्त 02, 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे।

गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुँच कर आंदोलन शुरू किया। बदले में परिणाम यह निकला कि जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गई। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।

खैर, दिग्विजय को इस सब से क्या? वो दिग्विजय सिंह है, वो कुछ भी कह सकता है।

कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी तो दिग्विजय से एक कदम आगे हैं। उन्होंने 370 पर कॉन्ग्रेस के मत की तुलना एक अमेरिकन अश्लील साहित्य से ही कर ली है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस की राय अनुच्छेद 370 पर ‘50 शेड्स ऑफ़ ग्रे‘ वाली है। दरअसल, कॉन्ग्रेस का मर्म 370 पर भी वोट बैंक से ज्यादा नहीं है।

उसे भय है कि समर्थन करने में मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धोना पड़ सकता है और विरोध करने में हाल ही में अपनाया गया ताजातरीन हिंदुत्व खतरे में पड़ सकता है इसलिए बेहतर है कि इस सब चर्चा से ऊपर उठकर नेहरू जी के नाम का कलमा पढ़ा जाए। फिलहाल जमीन बचाने के लिए कॉन्ग्रेस के पास न ज्यादा संख्याबल है, न ही सत्ता ना मुद्दे, और तो और एक अध्यक्ष तक बाकी नहीं बचा है।