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2024 तक रहने दो राष्ट्रीय पार्टी: तृणमूल और CPI ने EC से लगाई गुहार

तृणमूल कॉन्ग्रेस और सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) ने चुनाव आयोग से गुजारिश की है कि 2024 तक राष्ट्रीय पार्टी का उनका दर्जा बरकरार रखा जाए। दोनों दलों ने आयोग से कहा कि इस सम्बन्ध में कोई भी निर्णय 2024 में लोकसभा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद ही लिए जाए।

हालिया लोकसभा चुनावों में ख़राब प्रदर्शन के बाद दोनों दलों को मिले ‘राष्ट्रीय पार्टी’ के दर्जे पर तलवार लटक रही है। इन दोनों दलों के अलावा शरद पवार की एनसीपी पर भी तलवार लटक रही है। 18 जुलाई को चुनाव आयोग ने इन तीनों पार्टियों को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनका ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का दर्जा क्यों ख़त्म नहीं किया जाए? इन दलों से 5 अगस्त तक जवाब देने को कहा गया था।

चुनाव आयोग द्वारा तय मानकों के अनुसार नेशनल पार्टियों को कम से कम चार राज्यों में लोकसभा चुनाव में कम से कम 6% मत प्राप्त करने होते हैं। अगर कम से कम तीन राज्यों में कुल लोकसभा सीटों की संख्या का 2% प्राप्त होता है, तो भी नेशनल पार्टी का दर्जा बरकरार रहता है। अगर कोई पार्टी इन दोनों ही शर्तों को पूरा करने में नाकाम साबित होती है तो उसे स्टेट पार्टी का ही दर्जा मिलेगा। अगर किसी पार्टी को 4 अलग-अलग राज्यों में स्टेट पार्टी का दर्जा मिला हुआ है, तो भी वह नेशनल पार्टी कहलाएगी।

तृणमूल कॉन्ग्रेस ने आयोग की नोटिस का जवाब देते हुए कहा है कि उसे नेशनल पार्टी का दर्जा 2016 में ही मिला है, अतः उसे कम से कम 2024 तक समय दिया जाना चाहिए। बसपा सहित कई अन्य दलों को रियायत देते हुए चुनाव आयोग ने उन्हें नेशनल पार्टी का दर्जा बचाए रखने के लिए अतिरिक्त समय दिया था। अगर किसी पार्टी से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन जाता है तो वह एक ही चुनाव चिह्न पर पूरे देश में चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रह जाती है।

भाजपा विधायक जी, शर्म नहीं आई ‘गोरी लड़कियों’ के बारे में बेहूदगी से बोलते हुए

जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 का पावर खत्म होने के बाद उद्योगपतियों से लेकर आम जनता को वहाँ हर क्षेत्र में संभावनाओं का विस्तार दिख रहा है। सोशल मीडिया पर लोग सक्रियता से इस कदम की सराहना कर रहे हैं और इससे जुड़े कई विषयों पर चर्चा भी हो रही है। लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर कुछ मीम भी शेयर हो रहे हैं, जिसमें कुछ सोशल मीडिया यूजर्स कश्मीर में प्लॉट लेने की बात कर रहे हैं, तो कुछ वहाँ बसने की। कुछ को ये फैसला कश्मीरी लड़कियों से इश्क फरमाने का N0C लग रहा है, तो कुछ में कश्मीरी दामाद बनने का उतावलपन दिख रहा है।

इन सूची में सिर्फ़ ओछी और घटिया मानसिकता से लबरेज सोशल मीडिया यूजर्स ही नहीं हैं, बल्कि इसमें नेताओं के नाम भी शामिल हैं। जी हाँ, भाजपा नेता और उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के खतौली सीट से भाजपा विधायक विक्रम सिंह जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 खत्म होने के पीछे सिर्फ़ यही उपलब्धि समझते हैं कि अब वे वहाँ कि गोरी-गोरी लड़कियों से शादी कर सकेंगे।

वे खुलेआम जनता के बीच जाकर निहायत बेशर्मी से बयानबाजी करते हुए कह रहे हैं कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता 370 खत्म होने के बाद इसलिए उत्साहित हैं क्योंकि अब वह कश्मीर की गोरी लड़कियों से शादी कर पाएँगे। सोचिए, जिस पार्टी ने कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जिससे अन्य पार्टियाँ हमेशा बचती रहीं। उस पार्टी से जुड़ा यह नेताजी कैसी ओछी मानसिकता दिखा रहा है। उन्हें न पार्टी के उद्देश्य से कोई लेना-देना है, न देश से और न ही कश्मीर से। उन्हें सिर्फ़ गोरी लड़कियों से मतलब है। जो उनके लिए सुंदरता का मानक हैं और उनकी फैंटसी का चेहरा।

वायरल वीडियो में वह कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने पर खुशी मनाते नजर आ रहे हैं, लेकिन उन्हें शाय़द यही नहीं मालूम कि भारत सरकार ने ऐसा क्यों किया है। सोशल मीडिया की मीम मानसिकता से ग्रसित नेताजी अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं के बलिदान और उनके समर्पण को अपनी हँसी-ठिठोली में नकार चुके हैं, वह आतंकवाद की गंभीरता को गोरी लड़कियों से रिप्लेस कर चुके हैं। उन्हें कोई मतलब नहीं है कि उनके बयानों का असर पार्टी की छवि पर क्या पड़ेगा?

विक्रम सिंह का बयान सुनकर और सोशल मीडिया पर पसरे गंध को देखकर लगता है कि कुछ पुरूषों की मानसिकता सिर्फ़ लड़की और लड़की के रंग तक सीमित होती जा रही है। वह न केवल ऐसे बयान देकर खुद की दबी इच्छाओं को जगजाहिर कर रहे हैं, बल्कि सरकार द्वारा लिए बड़े फैसले की भी जगहँसाई करवा रहे हैं। इसके अलावा विरोधियों को जो बोलने का मौक़ा मिल रहा है वो अलग…।

विक्रम सिंह जैसे लोग प्रमाण हैं कि भाजपा के शीर्ष नेताओं की नीतियों और कार्यशैली से प्रभावित होकर जनता ने कुछ घटिया लोगों को भी सत्ता का हिस्सा बनवा दिया है जो न राजनीति की जमीन के लिए ठीक है और न ही इंसानियत के लिए।

वायरल वीडियो में विक्रम सैनी कहते नजर आ रहे हैं, “कार्यकर्ता बहुत उत्सुक हैं और जो कुँवारे हैं, उनकी शादी वहीं करवा देंगे, कोई दिक्कत नहीं है। क्या दिक्कत है? पहले वहाँ महिलाओं पर कितना अत्याचार था। वहाँ की लड़की अगर किसी उत्तर प्रदेश के छोरे (लड़के) से शादी कर ले, तो उसकी नागरिकता खत्म। भारत की नागरिकता अलग, कश्मीर की अलग… और जो मुस्लिम कार्यकर्ता हैं यहाँ पर, उनको खुशी मनानी चाहिए… शादी वहाँ करो न, कश्मीरी गोरी लड़की से। खुशी मनानी चाहिए। ये पूरे देश के लिए उत्साह का विषय है।”

हैरानी की बात ये है कि जब इस बयान के बाद मीडिया ने जोर देकर इस विषय पर उन्हें एहसास दिलाने की कोशिश की कि उन्होंने विवादित बयान दिया है, तब भी उन्होंने कहा, “मैंने कुछ गलत नहीं बोला। अब कोई भी बिना किसी विवाद के कश्मीरी लड़की से शादी कर सकता है। मैंने यही तो कहा है और यह सच्चाई है। यह कश्मीर के लोगों की आजादी है। इसलिए हमने मंगलवार को यह कार्यक्रम आयोजित किया। अब कश्मीरियों ने आजादी हासिल कर ली है।”    

वीडियो में विक्रम सैनी जनता को कहते नजर आ रहे हैं, “… कि मोदी जी आपने मेरा सपना पूरा कर दिया। पूरा भारत खुश है। सारी जगह नगाड़े बज रहे हैं। पूरा उल्लास है। चाहे वो लद्दाख हो, लेह हो। मैंने कल फोन किया… हमारे एक जानने वाले हैं। कोई मकान है…”

उनके मुताबिक वह कश्मीर में घर बनाना चाहते हैं क्योंकि वहाँ हर चीज़ खूबसूरत है, “जगह, पुरुष और महिलाएँ। सबकुछ।”

हम आजम खान जैसे नेताओं के सेक्सिस्ट कमेंट पर हैरान नहीं होते क्योंकि जिस पार्टी के वो नेता हैं उसके संस्थापक ही रेप जैसी घटनाओं को जस्टिफाई करते हैं, लेकिन भाजपा से जुड़े लोग भी जब ऐसी ही भाषा में बात करने लगे और वह भी 370 के संदर्भ में तो यह केवल महिलाओं को लेकर उनकी ओछी सोच ही नहीं है, बल्कि उनको भी नीचा दिखाता है जिन्होंने एक विधान-एक निशान के लिए अपनी जिंदगी खपा दी।

पार्टी ने अपनी कट्टर राष्ट्रवाद वाली छवि के कारण भले ही तथाकथित सेकुलर’ विपक्ष की बहुत आलोचनाएँ सहीं लेकिन महिलाओं के नाम पर इस तरह के कीचड़ पार्टी पर कभी नहीं उछले। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का जम्मू-कश्मीर से 370 खत्म करने के पीछे जो उद्देश्य था वह सबके सामने स्पष्ट है। पार्टी ने आतंकवाद से लड़ने के लिए और जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए इस अनुच्छेद को निष्प्रभावी किया है। पार्टी ने इस फैसले के साथ उस नासूर को ठीक करने का प्रयास किया है जिसने दशकों से हजारों जिंदगियों को प्रभावित किया, जिसने कश्मीरी पंडितों का पलायन करवाया, जिसने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग होने के बावजूद भी संशय की स्थिति में बनाए रखा।

ये बात सच है कि कश्मीर में महिलाओं पर अत्याचार हुए। उन्हें प्रेम करने के नाम पर राज्य की सीमा में बाँधा गया। उनमें उनके हकों से वंचित करने का डर भरा गया। कभी इस आर्टिकल 370 के कारण किसी दूसरे राज्य के प्रेमी को अपनी जान गँवानी पड़ी तो कभी सब कुछ छोड़कर फरार होना पड़ा। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाकर दूसरे युवकों को अवसर दिए है कि वो वहाँ जाए और लड़कियों से सिर्फ़ इसलिए शादी करें कि क्योंकि वो अव्वल कश्मीरी हैं और दूसरा गोरी हैं।

मोदी सरकार का फैसला उन प्रेमी जोड़ो को उनके हक दिलाने के लिए आया है जिन्होंने सीमा की परवाह किए बिना एक-दूसरे का हाथ थामा। न कि रंग-जाति-धर्म देखकर। 

शिक्षा के लिहाज से हो या फिर सुरक्षा के लिहाज से, प्रेम के लिहाज से हो या विकास के लिहाज से हर रूप में मोदी सरकार का फैसला उचित उद्देश्यों के तहत लिया गया है। सोशल मीडिया पर हतोत्साहित होकर यूजर्स द्वारा फैलाया गया गंध और विक्रम सिंह जैसे नेता सिर्फ़ इस बात का सबूत हैं कि इस फैसले के महत्व से कुछ लोग कितने बेखबर हैं। ऐसा नहीं होता तो इतने बड़े फैसले के बाद हमें ऐसे घटिया मीम और बयान नहीं देखने पड़ते।

विक्रम सिंह के बयान में न केवल पितृसत्ता का दंभ है, बल्कि गोरेपन को लेकर भारतीय समाज का पागलों वाला ऑब्सेशन भी है। साथ ही मूर्खतापूर्ण बयानबाज़ी से नित नए प्रतिमान स्थापित करने की नेताओं के बीच लगी होड़ का भी यह नमूना है।

Breaking: अफगानिस्तान में तालिबान का कार बम धमाका, 95 घायल

अभी-अभी खबर आ रही है कि अफगानिस्तान के काबुल पश्चिम में 95 लोग एक कार बम धमाके में घायल हो गए हैं। मृतकों की संख्या का पता नहीं चल पाया है। घायलों में महिलाएँ और बच्चें भी शामिल हैं। सुबह के ‘रश आवर’ (व्यस्त समय) में हुआ यह धमाका कार को एक पुलिस चेकपॉइंट पर रोके जाने के बाद हुआ। आंतरिक मंत्रालय के प्रवक्ता नसरत रहीमी ने बताया कि हताहतों में पुलिस और सेना के भी लोग हैं

यह धमाका अप्रत्याशित था क्योंकि अमेरिका और तालिबान के सुलह के अंतिम समझौते के करीब पहुँचने की खबरें आ रहीं थीं।

यह डेवलपिंग स्टोरी है। सूचनाएँ मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा।

शिवलिंग पर पैर रखकर कराया फोटोशूट, यूपी पुलिस ने कहा- ‘आरोपितों की तलाश जारी’

उत्तर प्रदेश में धार्मिक भावनाएँ भड़काने के लिए 2 लोगों द्वारा भगवान शिव का अपमान करने का मामला सामने आया है। यदुनंदन पांडेय नामक व्यक्ति ने एक फोटो ट्वीट कर यूपी पुलिस को टैग किया और लिखा- “यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर स्थित कोरझा गाँव की है। हिन्दुओं की भावनाओं को SC/ST एक्ट को ढाल बनाकर कुचला जा रहा है।” अभिषेक आजाद नामक व्यक्ति ने भी इस फोटो को ट्वीट कर सीएम योगी आदित्यनाथ को टैग किया है।

तस्वीर में देखा जा सकता है कि 2 लोग शिवलिंग पर पाँव रख कर खड़े हैं। लोगों ने पुलिस से पूछा है कि उक्त मामले में क्या कार्रवाई की गई है? अम्बेडकर नगर पुलिस ने ट्वीट का जवाब देते हुए कहा कि जैतपुर थाने ने इस मामले में शिकायत दर्ज कर ली है और आगे की कार्रवाई की जा रही है। हालाँकि, अभी तक दोनों आरोपितों की पहचान सामने नहीं आई है, इसीलिए फिलहाल व्यक्तिगत ट्वीट्स में बताए जा रहे पहचान की पुष्टि नहीं की जा सकती।

हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें हिन्दू प्रतीक चिह्नों और देवी-देवताओं का अपमान किया गया। कुछ दिनों पहले इरशाद नामक व्यक्ति द्वारा शिवलिंग पर पेशाब करने की बात सामने आई थी। ताज़ा मामले में पुलिस ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही कार्रवाई की जाएगी।

Article370: महबूबा, उमर अब्दुल्ला पर मुराद अली ने दर्ज कराया देशद्रोह का मुकदमा

बिहार के बेतिया की सत्र अदालत में एडवोकेट मुराद अली ने कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल का विरोध कर रहे अन्य नेताओं के खिलाफ देशद्रोह समेत कई संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया है। बकौल मुराद अली, इन नेताओं ने देश में शत्रुता और वैमनस्य बढ़ाने और हिंसा भड़काने वाले बयान दिए हैं।

24 सितंबर को सुनवाई

मुराद अली ने समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुआ बताया कि अदालत ने उनकी बात को सुना और केस न्यायिक मजिस्ट्रेट केके शाही के हवाले कर दिया। उन्होंने बताया, “मैंने मुकदमा भारतीय दंड विधान की धाराओं 124A (देशद्रोह), 153A (विभिन्न पंथिक समूहों, नस्लों, जन्मस्थान वालों, भाषाई समूहों और स्थान पर रहने वालों के बीच दुश्मनी बढ़ाना), 153B किसी भी समूह पहचान पर उनकी राष्ट्रीय निष्ठा पर सवाल उठाना या उनके हक़ छीनने की वकालत करना), 504 (अशांति भड़काने के इरादे से अपमानजनक बात कहना) और 120B (आपराधिक षड्यंत्र) में मुकदमा दर्ज कराया है।” मुराद ने बताया कि उनको अगली तारीख 24 सितंबर की मिली है।

मुराद ने कहा है कि विभिन्न संचार माध्यमों से मुफ़्ती और अब्दुल्ला ने देश की सरकार के ख़िलाफ़ जनता को भड़काते हुए 370 हटाने का विरोध किया है। उनके मुताबिक, “इन नेताओं ने देश के अन्य राज्यों के लोगों के बीच दुश्मनी बढ़ाने की कोशिश की है। उन्होंने देश की एकता और अखंडता चोट पहुँचाई है।”

गौरतलब है कि महबूबा ने भारत को कश्मीर में ‘कब्जा की हुई ताकत’ (occupation force) बताया था और कश्मीर को ‘मुस्लिमों का राज्य’ कहा था, वहीं उमर अब्दुल्ला ने भी इस बिल का विरोध किया था।

बाबरी मस्जिद के पैरोकार को CJI गोगोई ने फटकारा, कहा- मर्यादा में रहिए

सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की नियमित सुनवाई का दौर बुधवार (अगस्त 6, 2019) से शुरू हो गया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने निर्मोही अखाड़ा ने अपनी दलीलें रखीं। अखाड़ा ने अदालत को बताया कि ये ज़मीन बाबरी मस्जिद की नहीं है। अखाड़ा के वकील सुशील कुमार ने कहा कि उस स्थल को मस्जिद कहा ही नहीं जा सकता, क्योंकि वहाँ नमाज नहीं पढ़ी जाती है। अखाड़ा ने कहा कि राम जन्मस्थान का प्रबंधन और स्वामित्व हमेशा से निर्मोही अखाड़ा के पास ही रहा है।

इस दौरान बाबरी मस्जिद की तरफ से पैरवी कर रहे वकील राजीव धवन को सीजेआई गोगोई ने फटकार लगाई। निर्मोही अखाड़ा द्वारा दलील पेश किए जाने के दौरान धवन बीच में टोक रहे थे, जिसके बाद सीजेआई गोगोई ने उन्हें अदालत की मर्यादा बनाए रखने को कहा। इस पर धवन ने कहा कि वो सिर्फ़ अदालत द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब दे रहे थे। सीजेआई गोगोई ने कहा- “सवाल का जवाब देने का एक लहजा होता है। अदालत के तौर-तरीकों से आप परिचित हैं।”

वहीं, निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि वे सैकड़ों वर्षों से राम जन्मस्थान के आंतरिक परिसर से लेकर बाहरी परिसर में मौजूद ‘सीता रसोई’, ‘चबूतरा’ और ‘भंडार गृह’ का भी स्वामित्व रखते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सब उनके अधिकारों के दायरे में रहा है। अखाड़ा ने खुद को एक पंजीकृत संस्था बताते हुए कहा कि विवादित भूमि पर उसका दावा 1934 से है, जबकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस पर अपना दावा उसके कई वर्षों बाद 1961 में किया था। वकील सुशील कुमार जैन ने कहा कि कई दशक पहले मुस्लिमों ने वहाँ नमाज पढ़ना बंद कर दिया था।

बता दें कि राम मंदिर मुद्दे की नियमित सुनवाई चालू हो गई है, जिसके अंतर्गत सप्ताह में 3 दिन सुनवाई की जाएगी। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि कुछ ही महीनों में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय आ जाएगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन को तीनों पक्षों- निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच तीन हिस्सों में बाँटने का आदेश दिया था।

क्या कश्मीर के विशेष दर्जे के खात्मे के साथ कॉन्ग्रेस के अंत की भी शुरुआत हो चुकी है?

नेहरू ने गोवा को आज़ाद कराया, इंदिरा गाँधी ने सिक्किम दिया,कश्मीर हिंदुस्तान का आंतरिक नहीं द्विपक्षीय/अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है, 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और कश्मीर के विभाजन में समानता है- कश्मीर के पुनर्गठन और विशेष दर्जे के खात्मे के मुद्दे पर ये कॉन्ग्रेस नेताओं के बयान हैं। आज कॉन्ग्रेस की भाषा देश की विपक्षी पार्टी, या केवल भाजपा की विरोधी पार्टी की नहीं, हिंदुस्तान के दुश्मनों और पाकिस्तान के हिमायतियों जैसी है।

कई सांसद, विधायक और देश के सबसे बड़े राज्यों में से एक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह का यह ट्वीट पढ़िए:

इस ट्वीट के पहला इरादा ज़रूर किसी तरह नेहरू-गाँधी परिवार की आड़ में श्रेय लूटने का था, लेकिन इसके अलावा? इसके अलावा इसका यह सिला होगा कि देश के बँटवारे को इस तरह कश्मीर के विभाजन से जोड़ने को पाकिस्तान एक ‘वरिष्ठ’ हिंदुस्तानी सियासतदां का अपने स्टैंड कि कश्मीर हिंदुस्तान का नहीं, उसका है, पर मुहर के रूप में प्रचारित करेगा।

इसके अलावा भी झूठों की कमी नहीं है। गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त नेहरू ने नहीं, आज़ाद गोमंतक दल के बलिदानों और यूनाइटेड फ़्रंट ऑफ़ गोअन्स जैसे राजनीतिक संगठनों के लम्बे संघर्ष ने कराया था

1947 में आज़ाद रियासत बना सिक्किम 1975 में जनमत संग्रह से बना था हिंदुस्तान का राज्य। इसमें इंदिरा गाँधी की क्या भूमिका थी?

दिग्विजय अकेले नहीं हैं कॉन्ग्रेस में। पार्टी के तौर पर जहाँ कॉन्ग्रेस ने दोनों सदनों में बिल के खिलाफ मतदान किया, वहीं लोकसभा में कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर मसले पर बिल लाने की सरकार की हैसियत को ही चुनौती दे डाली थी। उनके इस बयान पर भड़के गृह मंत्री और भाजपा सुप्रीमो अमित शाह ने तो उन्हें खरी-खोटी सुनाई ही, खुद सोनिया गाँधी भौंचक्की नज़र आईं। शाह ने सदन में यह भी साफ़ किया कि भाजपा नेता कश्मीर के लिए जान भी दे देंगे, और वह जब भी “कश्मीर” बोलेंगे, तो उनका तात्पर्य पाकिस्तान और चीन के कब्ज़े वाले गुलाम कश्मीर से भी होगा

कॉन्ग्रेस के कई नेता पार्टी-लाइन से इतर इस मुद्दे पर राय रख रहे हैं। गुना के पूर्व सांसद और कभी राहुल गाँधी के करीबी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व सांसद रंजीत रंजन और मुंबई कॉन्ग्रेस के बड़े नेता मिलिंद देवड़ा इनमें शामिल हैं।

सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस की राजनीति जा किस दिशा में रही है। किसी तरह रोते-गाते वह 2014 के मुकाबले 2019 में सीटों में मामूली बढ़ोतरी करा ले गई हो, लेकिन उसका जनाधार सिकुड़ ही रहा है। ऐसे में देश के लोगों को खुद से और दूर धकेलना अपने ही ताबूत में खुद कील ठोंकना नहीं तो क्या है?

Article 370: अब इश्क़ करने पर महबूब कश्मीर छोड़ने को नहीं मजबूर, ताहिर का नहीं होगा कत्ल

आर्टिकल 370 के बेअसर होने के बाद जहाँ पूरे देश में खुशी का माहौल है। इस बीच, कुछ ऐसी प्रेम कहानियाँ सामने आई हैं जो बताती हैं कि आर्टिकल 370 के कारण कश्मीर में प्रेम करने की कीमत या तो जान देकर या फिर वहाँ से फरार होकर चुकानी पड़ती थी।

इन प्रेम कहानियों में एक किस्सा यूपी के बिजनौर जिले का है। जिले के नजीबाबाद के महबूब और कश्मीर की आतिका को प्यार करने के कारण कश्मीर से भागना पड़ा।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नजीबाबाद निवासी कारपेंटर महबूब 15 साल पहले जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सेना के कैंप में काम करने गया था। वहाँ उसे मझगाँव निवासी कश्मीरी युवती आतिका से प्यार हो गया। जिसके बाद उसने आतिका से निकाह कर लिया।

युवती के परिजनों ने इसका विरोध किया। मजबूरन महबूब को आतिका को छोड़ नजीबाबाद भागना पड़ा। इस बीच दोनों के बीच बात होती रही। कुछ दिन बाद कश्मीर की पुलिस नजीबाबाद पहुँच गई, लेकिन वे महबूब को पकड़ने में नाकाम रहे।

करीब 6 साल पहले महबूब की अपने ससुराल वालों से बात होनी शुरू हुई। जिसके बाद हालात थोड़े सामान्य हुए। आतिका कुछ समय पहले महबूब के पास नजीबाबाद आईं और अब दोनों के 4 बच्चे हैं। जिनमें एक बेटा और तीन बेटियाँ है।

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का पॉवर खत्म हो जाने से इस परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है। आतिका ने भी सरकार द्वारा लिए इस फैसले पर खुशी जताई है और कहा है कि अब खौफ़ का माहौल खत्म हो जाएगा।

इसके अलावा नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक बिजनौर जिले के रेहड़ निवासी ताहिर को तो कश्मीर में सायरा नाम की युवती से प्यार करने के कारण झांसा देकर मार दिया गया था। लड़की के परिजनों ने ताहिर के आतंकी हमले में मारे जाने की जानकारी उसके परिवारवालों को दी थी। लोगों का मानना है कि अगर 370 नहीं होता तो ताहिर की जान नहीं जाती।

रेप आरोपित बिशप के खिलाफ प्रदर्शन करना पड़ा महंगा, नन को FCC ने बाहर निकाला

यौन शोषण के आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बचाने के लिए चर्च व ईसाई संगठन लगातार प्रयास कर रहे हैं। आरोपित बिशप के खिलाफ आवाज उठाने वाली ननों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और ऐसा कई दिनों से चालू है। ताजा खबर के अनुसार, बलात्कार आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करने वाली नन सिस्टर लूसी कलाप्पुरा को ईसाइयों के धार्मिक संगठन एफसीसी (Franciscan Clarist Congregation) से निकाल दिया गया है।

इससे पहले इस वर्ष की शुरुआत में चार ननों का सिर्फ़ इसीलिए ट्रांसफर कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने बलात्कार आरोपित पादरी के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया था। तमाम विरोध-प्रदर्शनों के बाद बिशप मुलक्कल को पिछले वर्ष सितम्बर में गिरफ़्तार किया गया था, बाद में उसे जमानत मिल गई थी। मुलक्कल के जमानत पर बाहर आने के बाद उसके अनुयायियों ने बड़ी संख्या में इकठ्ठा होकर उसका स्वागत किया था।

पीड़ित ननों ने बार-बार आरोप लगाया है कि चर्च प्रशासन और ईसाई संगठन आरोपित बिशप को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और इसमें कुछ नेता भी उनका साथ दे रहे हैं। ननों ने आरोपित बिशप पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ के भी आरोप लगाए थे। ऐसी रिपोर्ट्स भी आई थी कि केरल सरकार ने इस मामले की जाँच कर रहे दो पुलिस अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया था।

बता दें कि एक नन ने उक्त बिशप पर कई बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था। मामला अभी अदालत में लंबित है और जाँच चल रही है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा था कि आरोपित बिशप ने उसके साथ अप्राकृतिक यौनाचार किया। पीड़िता के अनुसार, 2014 से 2016 के बीच बिशप ने 13 बार उसका बलात्कार किया। हालाँकि, आरोपित बिशप मुलक्कल इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपने ख़िलाफ़ बदले की साजिश बताता रहा है।

दो परिवारों को लगता था कश्मीर उनके बाप की जागीर है- नहीं रहा, नहीं है: सांसद लद्दाख

लद्दाख के 34-वर्षीय सांसद जाम्यांग त्सेरिंग नामग्याल ने अपने लोक सभा वक्तव्य में जम्मू-कश्मीर के विभाजन का विरोध करने वालों की कलई खोल कर रख दी। अपने भाषण में उन्होंने लद्दाख के प्रति फ़र्ज़ी चिंता दिखाने की आड़ में 370/35A हटाने और लद्दाख को अलग केंद्र-शासित प्रदेश बनाने का विरोध कर रही घाटी की पार्टियों पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) की तो जमकर पोल खोली ही, कॉन्ग्रेस की 2008 की राज्य सरकार से लेकर के पूर्व-प्रधानमंत्री नेहरू तक को अपने लपेटे में लिया। उनके भाषण की खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर तारीफ़ की।

‘हमने कहा था कश्मीर के साथ के अलावा कुछ भी चलेगा’

अपने भाषण में नामग्याल ने कई महत्वपूर्ण बिंदु गिनाए। उन्होंने शुरूआत पूर्व-प्रधानमंत्री नेहरू पर तंज़ कसते हुए की। उन्होंने कहा कि 70 साल से लद्दाख को कश्मीर के साथ रखने वालों को वहाँ की स्थानीय संस्कृति, वहाँ की सभ्यता, वहाँ की आकांक्षाओं के बारे में ज्ञान नहीं था; उनके लिए तो यह बंजर भूमि थी जिस पर घास का तिनका भी नहीं उगता। मालूम हो कि अक्साई चिन पर चीन के कब्ज़े पर पंडित नेहरू ने संसद में कहा था कि अरुणाचल और लद्दाख के पहाड़ों पर तो एक पत्ता घास का भी नहीं उगता, तो ऐसे में उनकी समझ में नहीं आ रहा कि उसके पीछे संसद का कीमती समय बर्बाद करने का क्या मतलब है

नामग्याल ने कहा कि लद्दाख के लोगों ने शुरू से ही सरकार को बता दिया था कि उन्हें कश्मीर के अलावा किसी भी और तरीके से देश में रहना मंज़ूर है- भले ही वह केंद्र-शासित प्रदेश (UT) के रूप में हो। हिंदी में बोल रहे नामग्याल ने कहा कि हिंदुस्तान का हिस्सा बने रहने के लिए ही लद्दाख ने 70 साल UT बनने की लड़ाई लड़ी, लेकिन पिछली सरकारों ने लद्दाख को ‘फेंककर’ रखा।

‘क्या यही है आपका लोकतंत्र?’

मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह पर लग रहे ‘लोकतंत्र की हत्या’ के आरोप के जवाब में नामग्याल ने PDP-NC-कॉन्ग्रेस द्वारा लद्दाख में बार-बार की गई लोकतंत्र की हत्याएँ गिनाईं। उन्होंने बताया कि समूचा लद्दाख अपने लिए UT का दर्जा चाहता है। उन्होंने बताया कि कैसे तत्कालीन गृह-मंत्री (अब रक्षा-मंत्री) राजनाथ सिंह सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ कश्मीर आने पर गृह सचिव को साथ लेकर लद्दाख गए और वहाँ हर आस्था और पंथ- हिन्दू महासभा, बौद्ध काउन्सिल, ईसाई और मुस्लिम संगठनों- ने UT के दर्जे की ही माँग की।

“और कुछ नहीं चाहिए, बस UT चाहिए।”

नामग्याल ने याद दिलाया कि कैसे घाटी की पार्टियों PDP-NC ने अपने तत्कालीन लेह जिलाध्यक्षों को केवल इसलिए पार्टी से बर्खास्त कर दिया कि उन दोनों ने अपने इलाके के लोगों की माँग का सम्मान करते हुए UT की माँग के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने कहा,

“आज लोकतंत्र की बात कर रहे हैं ये लोग! क्या वो था आपका लोकतंत्र? लोगों का आवाज़ बंद करना? दबे-कुचले रखना? ये आपका लोकतंत्र था क्या?”

जब नामग्याल इस बारे में बता रहे थे, तो विपक्ष ने उनके भाषण के बीच में टोका-टाकी शुरू कर दी, जिस पर खुद उन्हें झिड़कते हुए नामग्याल ने कहा, “सुनने की क्षमता रखिए।”

‘करगिल पर सदन को भ्रमित कर रहे हैं’

विपक्ष ने UT बनने में करगिल की कथित असहमति का ज़िक्र किया था। इसपर नामग्याल ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे सदन को भ्रमित कर रहे हैं। बकौल नामग्याल, “मैं करगिल से चुन के आता हूँ। मैं गर्व से कहता हूँ कि करगिल वालों ने UT के ही लिए वोट दिया था।” उन्होंने बताया कि करगिल के भाजपा घोषणापत्र में UT बनाने का वादा 2014 में सबसे ऊपर था। लेकिन जब वह 2014 में हो नहीं पाया तो 2014-19 में भाजपा ने लद्दाख के UT बनने के फायदे एक-एक घर जाकर समझाए। इसी के चलते लद्दाख संसदीय सीट पर भाजपा को आज़ादी के इतिहास की रिकॉर्ड-तोड़ जीत हासिल हुई।

उन्होंने ‘करगिल-बंद’ के विपक्ष के दावे को भी सिरे से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “आप कह रहे हैं आज करगिल बंद है। किसने कहा करगिल बंद है? लद्दाख से चुन के मैं आ रहा हूँ, आप नहीं आ रहे! आप आराम से बैठिए।” जब शोर-शराबा फिर से बढ़ा तो नामग्याल ने कटाक्ष किया, “आज तक आप लोगों (PDP-NC-कॉन्ग्रेस) ने बोला। आज हमारा बोलने का मौका है।”

उन्होंने विपक्ष पर करगिल से पूरी तरह अनभिज्ञ होने का भी आरोप लगाया। “ये सिर्फ़ एक रोड और छोटा-से मार्केट को कारगिल समझ बैठे हैं।” उन्होंने विपक्ष को चुनौती दी कि अगर असली करगिल देखना है तो ज़न्स्कार, वाखा, मुलबेक, शर्गोल, आर्यन घाटी आदि जगहों पर जाना चाहिए। 70% भू-भाग के लोग निर्णय का स्वागत करते हैं।

कुछ छिटपुट विरोध कर रहीं आवाज़ों के बारे में भी उन्होंने PDP-NC-कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा कि जो लोग करगिल में अशांति की बात कर रहे हैं, असल में वही लोग फ़ोन कर के अशांति पैदा करवा रहे हैं। जो ज़मीन पर उनके हुक्म का पालन कर रहे हैं, वे नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं। उन्हें इनकी (PDP-NC-कॉन्ग्रेस) बातों पर यकीन करने की बजाय खुद के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।

‘बराबरी’ और सेक्युलरिज़्म

‘बराबरी’ और सेक्युलरिज़्म के मुद्दे पर भी PDP-NC-कॉन्ग्रेस को घेरते हुए नामग्याल ने कई खुलासे किए। उन्होंने लद्दाख के साथ हुए सौतेले व्यवहार का विवरण पेश किया। उन्होंने बताया कि लद्दाख के नाम पर केंद्र सरकार से लिया जा रहा पैसा कश्मीर में खर्च हो जाता है, लद्दाख नहीं पहुँचता। कश्मीर की दो राजधानियों, दो सचिवालयों में कितने लद्दाखी हैं, उन्होंने पूछा। नामग्याल ने दावा किया कि अगर पिछली सरकारें 1,000 नौकरियों का निर्मांण करतीं थीं, तो उनमें से 10 भी लद्दाख के हिस्से में नहीं आती थीं।

उन्होंने और भी उदाहरण दिए। 2011 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस-यूपीए की केंद्र सरकार ने कश्मीर को एक केंद्रीय विश्वविद्यालय दिया। बहुत लड़-झगड़ कर जम्मू को भी एक मिल गया। लेकिन, बकौल तत्कालीन छात्रसंघ नेता नामग्याल, माथे पर काली पट्टियाँ बाँध कर प्रदर्शन करने के बाद भी लद्दाख को केंद्रीय विश्वविद्यालय नहीं मिला। वह अंत में जाकर मोदी सरकार ने दिया।

उन्होंने याद दिलाया कि 2008 में सरकार बनाने पर कॉन्ग्रेस ने कश्मीर में 4 नए ज़िले बनाए। जम्मू को अपने लिए 4 नए ज़िले लड़-झगड़कर लेने पड़े। लेकिन लद्दाख को एक भी नहीं मिला।

भाषा के मुद्दे पर उन्होंने याद दिलाया कि कोई तय, मानक लिपि न होने के बाद भी कश्मीरी भाषा को मान्यता मिल गई। जम्मू के आंदोलन के बाद डोगरी को भी मान्यता दे दी गई। नामग्याल ने पूछा कि लद्दाख की भाषा ‘बोटी’ को भी मान्यता क्यों नहीं दी गई?

उन्होंने विपक्ष को इस पर भी आड़े हाथों लिया कि विपक्ष ‘गर्व से’ दावा करता है कि 370 के चलते कभी बौद्ध-बहुसंख्य लद्दाख आज मुस्लिम-बहुल इलाका बन गया है। नामग्याल ने आरोप लगाया कि PDP-NC-कॉन्ग्रेस ने 370 का दुरुपयोग लद्दाख के बौद्धों को खत्म करने के लिए किया। विपक्ष के जनसांख्यिकीय बदलाव की ‘आशंका’ और सेक्युलरिज़्म के मुद्दे पर उन्होंने लद्दाख के बौद्धों और घाटी के कश्मीरी पण्डितों का ज़िक्र करते हुए पूछा कि क्या यही विपक्ष का ‘सेक्युलरिज़्म’ है? 

‘ दो परिवारों’ की खोली पोलपट्टी

अपने पूरे भाषण में नामग्याल ने ‘दो परिवारों’- PDP-NC के अब्दुल्ला-मुफ़्ती परिवारों की कई बार पोल-पट्टी खोली। उन्होंने शुरू में ही NC सांसद मसूदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे (मसूदी) कह रहे हैं कि इसपर विचार होना चाहिए कि 370 जाने से किस चीज़ का नुकसान होगा; केवल 2 परिवारों की रोज़ी-रोटी का। इसपर मसूदी को भी झेंप कर मुस्कुराना पड़ा। इसके अलावा गृह-मंत्री अमित शाह समेत सभी भाजपा सांसदों ने मेजें थपथपा कर इसका समर्थन किया।

फिर इसके कुछ देर बाद उन्होंने कश्मीर पर “शासन नहीं, राज करने वाले” दो परिवारों को फिर आड़े हाथों लेते हुए उनपर लद्दाख- और करगिल-रूपी दो भाइयों को आपस में लड़वाने का भी आरोप लगाया। बकौल नामग्याल, PDP-NC ने करगिल को बौद्ध-बहुल लद्दाख से काट कर जानबूझकर मुस्लिम-बहुल इलाकों से साथ एक जिले में जोड़ दिया।

उन्होंने कटाक्ष यह भी किया कि ये दोनों परिवार कश्मीर को अपने बाप की जागीर समझ बैठे थे। इस पर सभी भाजपा सदस्यों की मेजों के थपथपाने से सदन गूँज उठा। उन्होंने कहा,

“ये सोचते हैं कश्मीर मेरा बाप का जागीर है। नहीं है, नहीं रहा।”

श्यामा प्रसाद मुखर्जी

भाजपा के पितृ-पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नारे “एक देश में दो प्रधान, दो विधान, और दो निशान, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा” को याद करते हुए PDP-NC-कॉन्ग्रेस को याद दिलाया कि लद्दाख स्वायत्तशासी पहाड़ी विकास काउन्सिल, जिसके अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है, 2011 में ही कश्मीर के दूसरे विधान-निशान-प्रधान को नकार कर हिंदुस्तान के झंडे और चिह्न को आत्मसात कर चुका है। लद्दाख हिंदुस्तान का अभिन्न अंग बनना चाहता है।

अपने भाषण के अंत में मोदी-शाह और भाजपा सांसदों के अलावा बिल के समर्थन में वोट देने जा रहे गैर-भाजपाई दलों और सांसदों का भी धन्यवाद नामग्याल ने किया। साथ ही उन्होंने कहा कि पहली बार किसी सरकार ने चीन-पाकिस्तान दोनों से सीमा साझा करने वाले लद्दाख के महत्व को समझा है।