बुंदेलखंड की पहचान कभी सिर्फ सूखे, पलायन और बदहाली से जुड़ी रही। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला यह क्षेत्र हर साल भीषण गर्मी झेलता है, जहाँ तापमान कई बार 47 डिग्री तक पहुँच जाता है। बारिश कम होने और जमीन के पथरीले होने की वजह से खेती हमेशा संकट में रही। लेकिन अब यही तेज धूप और विशाल खाली जमीन बुंदेलखंड की सबसे बड़ी ताकत बन गई है।
जिस इलाके को कभी विकास की दौड़ में पीछे माना जाता था, वही आज देश के सबसे बड़े सोलर (सौर) ऊर्जा केंद्रों में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जो सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए आदर्श मानी जाती है। यही वजह है कि जो धूप कभी किसानों के लिए मुसीबत थी, वही अब हजारों करोड़ रुपये के निवेश और रोजगार का आधार बन रही है।
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं पर बड़ा दाँव लगाया है, जिसके बाद बुंदेलखंड की तस्वीर तेजी से बदल रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे भी बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाओं की योजना तैयार की गई है। सरकार का लक्ष्य इस पूरे क्षेत्र को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के रूप में विकसित करना है, ताकि उत्तर प्रदेश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा हो सके।
4995 मेगावाट के 8 सोलर पार्कों से बदलता बुंदेलखंड
बुंदेलखंड में जिस जमीन को कभी खेती के लिए अनुपयोगी माना जाता था, अब उसी जमीन पर 4995 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता के 8 बड़े सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की सोलर पार्क योजना के तहत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें सबसे बड़ा 1200 मेगावाट का सोलर पार्क जालौन में प्रस्तावित है।
इसके अलावा चित्रकूट में 800 मेगावाट, झाँसी और ललितपुर में 600-600 मेगावाट, छतरपुर में 950 मेगावाट, बरेठी में 630 मेगावाट और कल्पी में 65 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी परियोजनाओं को मिलाकर बुंदेलखंड देश के बड़े सौर ऊर्जा क्लस्टरों में शामिल हो रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार और यूपी नेडा (UPNEDA) इन परियोजनाओं के जरिए बुंदेलखंड को सौर ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। सरकार का फोकस उन इलाकों पर है जहाँ लगातार सूखा, कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती प्रभावित रही। यही वजह है कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध बंजर और कम उत्पादक जमीन को सौर परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया गया।
वैसे बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जिसे सोलर पावर उत्पादन के लिए आदर्श माना जाता है। इसी प्राकृतिक स्थिति को आधार बनाकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस इलाके में बड़े स्तर पर सौर निवेश बढ़ाने की रणनीति तैयार की है।
कबरई से बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे तक, सोलर कॉरिडोर का विस्तार
बुंदेलखंड में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार सिर्फ झाँसी और जालौन तक सीमित नहीं है। महोबा के कबरई में भी बड़े सोलर प्लांट पर काम चल रहा है, जिसे इस पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है। कबरई प्लांट को बुंदेलखंड में तेजी से बढ़ रहे सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसके साथ ही करीब 296 किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे 450 से 500 मेगावाट क्षमता की सोलर परियोजनाएँ विकसित करने की योजना भी तैयार की गई है। उत्तर प्रदेश सरकार एक्सप्रेसवे और सोलर परियोजनाओं को जोड़कर ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर मॉडल पर काम कर रही है।
इसका मकसद बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और औद्योगिक निवेश को एक साथ बढ़ाना है। इसी वजह से एक्सप्रेसवे से जुड़े इलाकों में जमीन चिन्हित करने और निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की प्रक्रिया तेज की गई है।
यूपी पीपीटीसीएल के प्रबंध निदेशक मयूर महेश्वरी ने कहा, “चरखारी, डकोर, बांगरा, बमौर, बिरधा, जैतपुर, हमीरपुर, बांदा और मड़ावरा उपकेंद्र जल्द हो जाएँगे। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 परियोजना के तहत पहली बार सोलर प्लांट से हरित ऊर्जा की सफल निकासी शुरू होना प्रदेश की विद्युत व्यवस्था के लिए उपलब्धि है।”
बंजर जमीन अब किसानों की कमाई का नया जरिया
बुंदेलखंड में खेतों में भी सोलर लग रहे हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक झाँसी और आसपास के कई गाँवों में किसान अपनी जमीन सोलर कंपनियों को लीज पर दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेती से सालभर में जितनी कमाई नहीं हो पाती थी, उससे ज्यादा रकम अब तय किराये के रूप में मिल रही है।
कई किसानों ने बताया कि कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती लगातार घाटे में जा रही थी। ऐसे में सोलर कंपनियों के साथ 25 से 30 साल तक के अनुबंध उनके लिए स्थायी आय का जरिया बन गए हैं।
रिपोर्ट में ऐसे किसानों का भी जिक्र है जिनकी जमीन पहले बंजर या कम उत्पादक मानी जाती थी। उन्हीं जमीनों पर अब बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाएँ विकसित हो रही हैं। झाँसी, ललितपुर, जालौन और महोबा जैसे जिलों में कंपनियां किसानों से सीधे समझौते कर रही हैं। किसानों का कहना है कि पहले फसल बारिश पर निर्भर रहती थी और हर साल नुकसान का डर बना रहता था, लेकिन अब उन्हें निश्चित आय मिल रही है।
इसी वजह से कई गाँवों में खेती छोड़कर जमीन लीज पर देने का मॉडल तेजी से बढ़ा है। सरकार भी उन इलाकों को प्राथमिकता दे रही है जहाँ पानी की कमी और कम उत्पादन की वजह से खेती लंबे समय से प्रभावित रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई 2026) को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) कराने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि इस कवायद का मकसद देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को मजबूत करना है। यह फैसला चुनाव आयोग द्वारा पिछले साल बिहार में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया शुरू करने के निर्णय को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर आया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ-साथ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और इसके तहत बने नियमों के तहत ऐसा संशोधन करने का संवैधानिक अधिकार है।
Big Victory For Election Commission, SC Upholds EC's Power To Conduct SIR — 'We Are Equally Satisfied…'https://t.co/sOU8GqdWBe
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेष गहन संशोधन सीधे तौर पर मतदाता सूचियों की ‘अखंडता, सटीकता और शुद्धता’ सुनिश्चित करने से जुड़ा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है।
सुप्रीम कोर्ट ने चार मुख्य सवाल तय किए
अदालत ने SIR अभ्यास की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर अपना फैसला सुनाते हुए (pdf), विचार के लिए चार प्रमुख प्रश्नों को चिन्हित किया।
क्या चुनाव आयोग के पास विवादित (Impugned) विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्ति है?
क्या यह SIR अभ्यास किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और यदि हां, तो क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उचित और अनुपातिक हैं?
क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के प्रावधानों के विपरीत या उनके उल्लंघन में है?
क्या अपने संवैधानिक दायित्व मतदाता सूची के निर्माण और रखरखाव के तहत और संबंधित वैधानिक शर्तों के पालन में, चुनाव आयोग को उन व्यक्तियों की नागरिकता स्थिति की जाँच करने का अधिकार है जो मतदाता सूची में शामिल होने या बने रहने के इच्छुक हैं?
कोर्ट ने कहा कि ECI के पास SIR कराने का संवैधानिक अधिकार है
पहले मुद्दे पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग के पास (SIR) कराने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत विधिवत रूप से अधिकृत है। साथ ही, अदालत ने उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि यह अभ्यास मौजूदा चुनाव कानूनों का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “विवादित SIR न तो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और न ही 1960 के नियमों को निष्प्रभावी करता है, बल्कि यह अनुच्छेद 324 के संवैधानिक जनादेश को और अधिक प्रभावी बनाता है।”
फैसले का एक अंश
पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि आवश्यकता महसूस हो, तो चुनाव आयोग को सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाने की अनुमति है।
अदालत के अनुसार, आयोग अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के तहत स्थिति के अनुसार अधिक सख्त या विशेष प्रक्रिया लागू कर सकता है, बशर्ते उसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना हो।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक चुनाव आयोग कानून के दायरे में काम करता है, विशेष शक्ति के प्रयोग के लिए कारण दर्ज करता है, और अधिनियम या नियमों में किसी स्पष्ट निषेध का उल्लंघन नहीं करता, तब तक केवल इस आधार पर कि उसने सामान्य पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाई है, उस निर्णय को रद्द नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी कहा कि SIR को सीधे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक आवश्यकता से जोड़ा जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते, बल्कि वे मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और शुचिता पर भी आधारित होते हैं।”
जजों ने यह भी उल्लेख किया कि पिछली बार व्यापक पुनरीक्षण को दो दशकों से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान तेज़ शहरीकरण, जनसंख्या प्रवास तथा मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नामों के जुड़ने और हटने जैसी परिस्थितियों ने एक नए सत्यापन अभ्यास को उचित ठहराया है।
कोर्ट ने कहा कि SIR का एक जायज मकसद है
दूसरे प्रश्न पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SIR अभ्यास के पीछे का उद्देश्य न केवल वैध है, बल्कि संवैधानिक रूप से आवश्यक भी है।
कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा जिस उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश की जा रही है, मतदाता सूची की सटीकता, पूर्णता और शुद्धता को बहाल करना वह न केवल वैध है, बल्कि चुनाव आयोग को दिए गए संवैधानिक दायित्व का अभिन्न हिस्सा है।
अदालत ने यह भी कहा कि SIR को लेकर यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इसका कोई उचित उद्देश्य नहीं है या यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है। पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कारणों का एक ‘प्रत्यक्ष और तार्किक संबंध’ एक विश्वसनीय और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को बनाए रखने से है।
फैसले का एक अंश
तीसरे पहलू पर विचार करते हुए, पीठ ने यह भी जांचा कि SIR के दौरान अपनाए गए तरीके उद्देश्य के अनुपात में हैं या नहीं। अदालत ने पाया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय जैसे घर-घर जाकर सत्यापन और अद्यतन फॉर्मों का संग्रह उचित और तर्कसंगत हैं।
कोर्ट ने कहा कि “ये उपाय न केवल निर्धारित उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़े हुए हैं, बल्कि वास्तव में उसी को प्राप्त करने के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किए गए हैं।”
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि फिजिकल वेरिफिकटीओन से पुराने या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करने में मदद मिलती है, जबकि मानकीकृत फॉर्मों से पूरे निर्वाचन क्षेत्रों में एक समान और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित होती है।
फैसले में यह भी कहा गया कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जैसे अधिकारियों द्वारा जांच, संदिग्ध मामलों में नोटिस जारी करना, सुनवाई का अवसर और अपील की व्यवस्था।
कोर्ट ने कहा कि “ये सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय अपनाए गए साधनों और प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के बीच तर्कसंगत संबंध को और मजबूत करते हैं।”
अंत में इस मुद्दे को समाप्त करते हुए अदालत ने कहा, “हम संतुष्ट हैं कि विवादित SIR का मतदाता सूची की शुद्धता और सटीकता सुनिश्चित करने से प्रत्यक्ष और निकट संबंध है।”
कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की
तीसरे मुद्दे की जाँच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन दावों को खारिज कर दिया कि SIR प्रक्रिया मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 21A (Rule 21A) का उल्लंघन करती है।
याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया था कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना नामों को मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR ढांचे के भीतर भी नोटिस जारी करना, जाँच, सुनवाई का अवसर और कारण सहित निर्णय जैसे सभी आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं।
इस आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया कानून के अनुरूप है और इसमें मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त मौजूद हैं।
फैसले का एक अंश
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सुरक्षा उपाय प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में फैले हुए हैं, जिनमें गणना, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया शामिल हैं।
पीठ ने कहा कि “कानूनी ढाँचा किसी कठोर या एकल प्रक्रिया प्रारूप की माँग नहीं करता, बल्कि कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की अपेक्षा करता है।”
अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई दस्तावेज सत्यापन प्रणाली को भी सही ठहराया। पीठ के अनुसार, दस्तावेज़ों की आवश्यकता का उद्देश्य ‘प्रशासनिक एकरूपता और साक्ष्यगत विश्वसनीयता’ सुनिश्चित करना है।
याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि राशन कार्ड और वोटर ID कार्ड जैसे दस्तावेजों को स्वीकार्य सूची से बाहर रखा गया है। हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग के विवेकाधिकार में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
अदालत ने टिप्पणी की कि “मतदाता सूची के सत्यापन के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा और उनके साक्ष्य मानक क्या होंगे, यह निर्णय स्वाभाविक रूप से आयोग के विवेकाधिकार के दायरे में आता है।”
अंत में कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ी ढाँचा न तो मनमाना है और न ही अवैध। पीठ ने निष्कर्ष देते हुए कहा, “हम मानते हैं कि आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेज व्यवस्था उसके संवैधानिक जनादेश के अनुरूप एक सुविचारित प्रशासनिक विवेक का प्रयोग है।”
फैसले का एक अंश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ECI वोटर रोल के लिए कर सकता है नागरिकता की जाँच
चौथे मुद्दे पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने के दौरान चुनाव आयोग के पास सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जाँच करने का अधिकार है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं।
हालाँकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा की गई ऐसी जाँच या निष्कर्ष किसी व्यक्ति की नागरिकता के अंतिम निर्धारण के बराबर नहीं होंगे। पीठ ने कहा, “यह केवल आयोग की शक्तियों के दायरे से संबंधित मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात से जुड़ा है कि इन शक्तियों का प्रयोग उस क्षेत्र में किस प्रकार किया जाए जो सीधे नागरिकता की स्थिति को प्रभावित करता है।”
फैसले का एक अंश
कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के साथ-साथ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के तहत आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह यह सत्यापित कर सके कि कोई व्यक्ति मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकता एक गंभीर संवैधानिक विषय है और इसका अंतिम और निर्णायक निर्धारण केवल चुनाव आयोग द्वारा नहीं किया जा सकता।
न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह होता है, तो उसे इस मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजना अनिवार्य होगा।
न्यायालय के अंतिम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कई सवालों पर स्पष्टता देते हुए संदिग्ध नागरिकता और अफवाहों पर आधारित दावों से जुड़े मामलों के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।
कोर्ट ने कहा, “जिन मामलों में आयोग संतुष्ट नहीं है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने की वैधानिक शर्तें पूरी करता है, तो उसका यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे व्यक्ति को कानून के अनुसार निर्णय के लिए केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकरण को भेजे।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि चुनाव आयोग के निष्कर्ष केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित रहेंगे और उनसे किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं होगा।
कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह भी निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उन सभी मामलों को सक्षम प्राधिकरण के पास भेजे, जिनमें 2003 की मतदाता सूची से नाम नागरिकता संबंधी आधार पर हटाए गए थे।
साथ ही नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह प्रभावित व्यक्तियों को उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर देकर इन मामलों का निर्णय करे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बाद में यह पाया जाता है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए थे वे वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, तो उनके नाम मतदाता सूची में पुनः बहाल किए जाने चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत पिछले वर्ष तब हुई जब चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के SIR का आदेश दिया। इस प्रक्रिया को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन विमेन (NFIW) सहित कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया से मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा सकते हैं और इससे लाखों वास्तविक नागरिकों का मताधिकार छिन सकता है।
वहीं चुनाव आयोग ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह संशोधन मतदाता सूची से डुप्लीकेट, गलत और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाने के लिए आवश्यक था।
शुरुआत में 1 अगस्त को प्रकाशित बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे। बाद में अपील और सुधार प्रक्रिया के बाद यह संख्या घटकर लगभग 47 लाख रह गई।
लंबे समय तक चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बीच में संतुलित सुरक्षा उपाय भी जोड़े। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह एक औपचारिक नोटिस जारी करे, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाए कि SIR प्रक्रिया के तहत तैयार की जा रही संशोधित मतदाता सूचियों में आधार को पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
बिहार में SIR प्रक्रिया 30 सितंबर को पूरी कर ली गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, संशोधन से पहले बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे, जबकि प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई।
बाद में चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया का विस्तार अन्य राज्यों में भी किया और 27 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की। इसी के बाद नए कानूनी विवाद खड़े हुए और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में इस अभ्यास को बरकरार रखा।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
भारत कई धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। संविधान के अनुसार भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है लेकिन यहाँ की सांस्कृतिक जड़ें लंबे समय से सनातन परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ी रही हैं। ऐसे में कई बार धार्मिक मान्यताओं के टकराव से जुड़े मुद्दे विवाद का कारण बनते हैं जिनमें ‘गो हत्या’ का मुद्दा भी शामिल है।
ईद-उल-अजहा यानी बकरीद के मौके पर मुस्लिम समुदाय में कुर्बानी की परंपरा निभाई जाती है जिसमें आमतौर पर बकरों समेत कुछ अन्य जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। हालाँकि, समय-समय पर गाय की कुर्बानी को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। कई मामलों में अदालतों तक यह मामला पहुँचा जहाँ गाय की कुर्बानी की अनुमति की माँग की गई।
इसी बीच, हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें बकरीद के मौके पर गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने वाले नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और माकपा (CPIM) से जुड़े पक्ष भी शामिल थे।
दरअसल, पश्चिम बंगाल में BJP सरकार ने ईद-उल-अजहा के दौरान गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने का नोटिफिकेशन जारी किया था। हाई कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि गाय की कुर्बानी न तो ईद-उल-अजहा का अनिवार्य हिस्सा है और न ही इस्लाम में इसे जरूरी बताया गया है। इससे पहले, 27 मई को मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह का फैसला सुनाया था।
संविधान में गो-संरक्षण और अदालतों के अहम फैसले
भारत के संविधान में गायों की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्य सरकारों को यह प्रयास करने के लिए कहा गया है कि गाय, बछड़ों और दूध देने या खेती में उपयोग होने वाले पशुओं के वध पर रोक लगाई जाए। यह प्रावधान राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है। हालाँकि, यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है लेकिन सरकारों को कानून और नीतियाँ बनाते समय इसका पालन करने की सलाह दी गई है।
देश के कई राज्यों में गो हत्या पर रोक लगाने वाले कानून लागू हैं लेकिन केरल, कुछ पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल (अब तक) में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं है।
गोहत्या को लेकर अदालतों में भी कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। 1975 में मोहम्मद हनीफ कुरैशी & अन्य बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में गो हत्या पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम की अनिवार्य मजहबी प्रथा का हिस्सा नहीं है। इसलिए अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सवाल इस मामले में लागू नहीं होता। इसके बाद 2005 में गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात मामले में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने भी अहम फैसला सुनाया। अदालत ने बॉम्बे एनिमल प्रिजर्वेशन (गुजरात संशोधन) अधिनियम, 1994 को संवैधानिक रूप से वैध माना। इस कानून के तहत गायों और बैलों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था जिसे कोर्ट ने सही ठहराया।
संविधान और अदालतें मानती हैं कि गो हत्या ना हो लेकिन मुस्लिम समुदाय नहीं
ईद-उल-अजहा इस्लामी मान्यता के अनुसार पैगंबर इब्राहिम द्वारा अल्लाह के प्रति समर्पण की याद में मनाई जाती है। मान्यता है कि इब्राहिम अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। हालाँकि, आज मुस्लिम समुदाय ठीक उसी तरह उनका अनुसरण नहीं करता। कुरान के अनुसार ईद-उल-अजहा पर बकरा, भेड़, गाय, भैंस और ऊँट की कुर्बानी दी जा सकती है।
हालाँकि, कुरान में कहीं भी विशेष रूप से गाय की कुर्बानी को अनिवार्य नहीं बताया गया है, भले ही गोमांस का सेवन ‘हलाल’ माना जाता हो। जहाँ एक ओर संविधान के नीति निदेशक तत्व (DPSP) और अदालतों ने गो हत्या पर रोक लगाने की बात कही है। वहीं, मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इन प्रावधानों की अनदेखी करते हुए गायों की कुर्बानी देता है जिसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचा सके।
जो हिंदुओं के लिए ‘अघ्न्या’ वो मुस्लिमों के लिए ‘हलाल’
हिंदू सनातन परंपरा में गाय को गौ माता के रूप में पूजनीय माना जाता है। गाय को मातृत्व, पोषण, पवित्रता, अहिंसा और जीवनदायिनी का प्रतीक माना गया है। वेदों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- ‘जिसे मारा या नुकसान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए’। हिंदू ग्रंथों, विशेष रूप से ‘ऋग्वेद’ और ‘अथर्ववेद’ में गाय को समृद्धि, पवित्रता, दिव्यता और जीवन-निर्वाह से जोड़ा गया है। वैदिक यज्ञों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में दूध और उससे बने उत्पादों का विशेष महत्व बताया गया है।
ऋग्वेद (1.164.27) में लिखा है– ‘अघ्न्येयं सा व॑र्धतां महते सौभ॑गाय’ जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि गाय को अघ्न्येयं (जिसे नहीं मारा जाना चाहिए) गाय स्वास्थ्य और समृद्धि लाती है। कुछ वैदिक व्याख्याओं में गोवध करने वालों के लिए कठोर दंड का उल्लेख भी मिलता है।
हालाँकि, सदियों के इस्लामी आक्रमणों, ब्रिटिश उपनिवेशवाद और दशकों के कॉन्ग्रेस शासन के बाद राजनीतिक लाभ के लिए मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू मान्यताओं, परंपराओं और गौरव को दबा दिया गया है। दूसरी ओर मुस्लिमों का जोर गाय की कुर्बानी पर ही रहता है।
सनातन के स्त्री प्रतिनिधित्व का इस्लामी अपमान
नवंबर 2023 में अमरेली सेशंस कोर्ट ने 3 मुस्लिम पुरुषों कासिम हाजी सोलंकी, सत्तार इस्माइल सोलंकी और अकरम हाजी सोलंकी को गाय की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अमरेली सेशंस कोर्ट की छापेमारी के दौरान, एक मुखबिर की सूचना पर बहारपारा गाँव के मोताखटकीवाड इलाके में एक घर पर छापा मारा गया। पुलिस ने तीनों नामजद मुस्लिम पुरुषों के घर से 40 किलो मांस बरामद किया।
मार्च 2025 में एक पुलिस को उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक गाँव में एक खेत में बछड़े के अवशेष मिले। समीर नामक एक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई क्योंकि उसने पिछले साल होली के मौसम में जंगल में दो बछड़ों और एक गाय को मार डाला था।
इसी साल फरवरी में गुजरात के सूरत में गाय की हत्या रोकने के लिए चलाए जा रहे एक अभियान के दौरान एक मुस्लिम भीड़ ने हिंदू गौ रक्षकों और पुलिस पर धारदार हथियारों से हमला किया। मुस्लिम कसाई इस्लामी महीने रमजान के दौरान गायों को काटना चाहते थे जबकि राज्य में गाय की हत्या पर सख्त प्रतिबंध है।
27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के जालौन में हिंदू त्योहार नवरात्रि के दौरान गायों की हत्या करने पर सिकंदर, सैय्यद अली और हसनैन की हिरासत को बरकरार रखा। आरोपी तिकड़ी को 31 मार्च को गिरफ्तार किया गया था जब पुलिस ने लगभग 2-3 क्विंटल गोमांस, चाकू और अन्य सामग्री जब्त की। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें गायों के अवशेष नालियों और सुनसान जगहों पर फेंके हुए मिले और जाँच में मुस्लिम व्यक्ति दोषी पाए गए।
पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों के सामने मांस के टुकड़े फेंकने की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है और अधिकतर मामलों में मुसलमान ही दोषी पाए गए हैं। असम के मुस्लिम बहुल धुबरी में 2025 में बकरीद के दिन एक हनुमान मंदिर के पास गाय का सिर मिला था।
असम के श्रीभूमि जिले में एक हिंदू बहुल इलाके में स्थित हिंदू मंदिर के पास भी बकरीद के दिन एक गाय की हत्या की गई। गोलपारा में हजरत अली और 4 अन्य लोगों ने काली मंदिर के पास गाय का कटा हुआ सिर फेंका। जून 2025 में असम के लखीमपुर में एक नमाज स्थल के पास गाय की खोपड़ियाँ मिलने के बाद 7 मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। अक्टूबर 2024 में कट्टरवादियों ने नवरात्रि जुलूस के दौरान हिंदुओं पर मांस के टुकड़े फेंके। 2021 में दिल्ली के कालिंदी कुंज में 4 गायों की हत्या की गई और उनके अवशेष मंदिर के पास फेंक दिए गए।
ऑपइंडिया ने हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से ऐसी ही घटनाएँ दर्ज की हैं जिनमें हिंदू मंदिरों के अंदर गोमांस, कटे हुए सिर और अन्य अवशेष फेंके गए जो साफ तौर पर हिंदुओं और उनकी धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाने का कृत्य है।
ईद पर गाय की हत्या और मंदिरों में गाय के अवशेष फेंकने के अलावा ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें मुसलमानों को हिंदुओं को गोमांस भरे समोसे बेचते हुए पकड़ा गया। अप्रैल 2024 में गुजरात पुलिस ने वडोदरा के एक समोसे की दुकान ‘हुसैनी समोसा सेंटर‘ पर छापा मारा और गोमांस (गाय के मांस) से भरे समोसे बेचने के आरोप में दुकान मालिक इमरान यूसुफ कुरैशी और नईम शेख सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया।
अप्रैल 2023 में, गुजरात के नवासी में अहमद मोहम्मद और चाचा अजीम भाई द्वारा चलाई जा रही एक खाने की दुकान में गोमांस से भरे समोसे बेचे जा रहे थे, जिन्हें चिकन और मटन समोसे बताकर बेचा जा रहा था।
पिछले कुछ वर्षों में लव जिहाद के हजारों मामले सामने आए हैं, जिनमें मुस्लिम युवक हिंदू महिलाओं को प्रेम का नाटक करके और कभी-कभी धार्मिक पहचान छुपाकर फँसाते हैं, विवाह का बहाना बनाकर शारीरिक संबंध बनाते हैं, ब्लैकमेल करते हैं, हिजाब या बुर्के जैसे इस्लामी पहनावे को थोपते हैं और अंततः उन्हें इस्लाम कबूल करने और उनसे शादी करने पर मजबूर करते हैं। अधिकतर ऐसे मामलों में एक सामान्य बात यह पाई गई है कि हिंदू महिलाओं को जबरन गोमांस खिलाया जाता है।
दुर्गा पूजा, नवरात्रि और छठ से लेकर गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदियों की देवी के रूप में पूजा तक हिंदू धर्म में दिव्य स्त्री प्रतिनिधित्व को विशेष महत्व दिया गया है। इसके विपरीत, इस्लामी परंपरा में महिलाओं को द्वितीय श्रेणी की नागरिक के रूप में देखा जाता है जिनकी पहचान उनके पुरुष ‘संरक्षकों’ के इर्द-गिर्द घूमती है।
इस्लामी ग्रंथों में मुस्लिम महिलाओं के लिए पूरा शरीर ढकना, घर पर नमाज पढ़ना, किसी पुरुष महरम के साथ ही बाहर जाना अनिवार्य बताया गया है और पुरुषों को चार पत्नियाँ रखने और पत्नी को मारने-पीटने तक की अनुमति दी गई है।
जहाँ एक ओर मुस्लिम पुरुषों को अपनी महिलाओं की रक्षा करना और उन्हें लगभग छुपाकर रखना अनिवार्य है, वहीं इस्लामी ग्रंथ काफिर महिलाओं को युद्ध की लूट या माल-ए-गनीमत के रूप में स्वीकार्य मानते हैं। वास्तव में, कई समकालीन इस्लामी विद्वानों ने यह भी टिप्पणी की है कि इस्लाम मुसलमानों को काफिरों या गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद के दौरान महिलाओं को यौन दासी बनाने और अपमानजनक कृत्य के रूप में बलात्कार करने की अनुमति देता है।
यह विकृत मानसिकता कि काफिर महिलाएँ काफिर पुरुषों और उनके धर्म को अपमानित करने का साधन हैं, दुनिया भर के कट्टरपंथी मुसलमानों में समान रूप से पाई जाती है। रेप जिहाद के मामलों से लेकर भारत में हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने वाले मुस्लिम बलात्कार गिरोहों और ब्रिटेन में पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग तक इस्लामवादी धार्मिक विजय और वर्चस्व स्थापित करने के साधन के रूप में रेप को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।
केरल के लव जिहाद मामले और हाल ही के TCS नासिक कन्वर्जन जिहाद मामले से यह भी पता चलता है कि कभी-कभी मुस्लिम महिलाएँ भी अपने हम-मजहब पुरुषों की हिंदू महिलाओं को रेप जिहाद और इस्लाम में धर्मांतरण का निशाना बनाने में सहायता करती हैं। गाय की हत्या हो या काफिर महिलाओं का बलात्कार इस्लामवादी गैर-मुसलमानों, विशेष रूप से मूर्तिपूजक हिंदुओं का अपमान करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं क्योंकि कुरान में मूर्तिपूजा को सबसे बड़ा पाप बताया गया है।
ये कुछ ताजा उदाहरण हैं जो यह दिखाते हैं कि इस्लामी आक्रमणकारियों के हिंदू पीड़ितों की चौथी और पाँचवीं पीढ़ी के वंशज किस प्रकार हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा प्रकट करते हैं। भूलिए मत, मध्यकाल में भी जब इस्लामी बर्बर आक्रमणकारी भारत पर चढ़ाई करते थे तो वे अक्सर अपनी सेनाओं के आगे गायों को रखते थे, यह जानते हुए कि हिंदू गायों की पूजा करते हैं और उन पर आक्रमण नहीं करेंगे।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
हमारे देश में कुछ ऐसे पढ़े-लिखे लोग हैं जो खुद को बहुत उदारवादी (लिबरल) कहते हैं। लेकिन इनका एक तय एजेंडा बन चुका है। इनका काम सिर्फ दो हैं। पहला- इस्लामी कट्टरपंथ और पुरानी कुप्रथाओं का आँख मूँदकर समर्थन करना। दूसरा- हिंदू त्योहारों और रीतियों के खिलाफ बातें करना। इनकी सारी बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और ज्ञान सिर्फ इसी एक काम में खर्च होते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद के एक लेख ने इस चेहरे को फिर से सबके सामने ला दिया है।
बकरीद से ठीक पहले प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ‘द वायर‘ (The Wire) पर एक लेख लिखा। यह कोई निष्पक्ष लेख नहीं है, बल्कि एकतरफा रोना है। इस लेख की हर बात में देश के सिस्टम और हिंदुओं के प्रति साफ गुस्सा दिखता है। पूरे लेख में बस एक ही खेल खेला गया है। किसी भी तरह मुसलमानों को ‘बेचारा और पीड़ित’ साबित किया जाए। वहीं दूसरी तरफ, हिंदुओं और देश की चुनी हुई सरकार को ‘विलेन’ (दोषी) बना दिया जाए।
इस तरह की सोच को ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता कहा जाता है, जिसका सच सामने आना बहुत जरूरी है। इसलिए हम प्रोफेसर साहब के इस लेख का सीधा और बिंदुवार विश्लेषण कर रहे हैं। हम हवा में बात नहीं करेंगे, बल्कि तथ्यों और सबूतों के साथ बताएँगे कि सच क्या है और फैलाया जा रहा झूठ क्या है।
कानून के शासन से लिबरलों को इतनी चिढ़ क्यों?
अपूर्वानंद का तर्क- “बकरीद करीब आ रही है। हमें यह कैसे पता चलता है? यह किसी स्थानीय मौलवी की बात नहीं है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और बीजेपी-नीत सरकारों के मुख्यमंत्रियों के बयान हैं, जो सभी मुसलमानों को चेतावनी और धमकियों से भरे होते हैं… पश्चिम बंगाल में, मंत्री दिलीप घोष ने हिंदी में चेतावनी दी कि सब कुछ ‘कानून के मुताबिक’ होना चाहिए और किसी को भी इसका उल्लंघन करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लेकिन किस संदर्भ में और किसे वे यह बात कह रहे थे?”
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब- अपूर्वानंद के इस प्रोपेगेंडा को पढ़कर यह समझना मुश्किल नहीं है कि उन्हें असल में इस बात से चिढ़ है कि आखिर भारत का प्रशासनिक तंत्र मुस्लिम समुदाय से कानून का पालन करने को कह ही कैसे रहा है। दशकों तक मुस्लिम तुष्टिकरण की गंदी राजनीति देखने वाले इन अर्बन नक्सलियों को यह बात हजम नहीं हो रही है कि देश में सबके लिए एक कानून (Rule of Law) लागू हो रहा है। वे चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार मिले रहें और उन्हें सड़कों पर मनमर्जी करने की खुली छूट हो। जब सरकारें कहती हैं कि त्योहार कानून के दायरे में रहकर मनाएँ, तो इन्हें इसमें ‘चेतावनी’ और ‘धमकी’ नजर आने लगती है।
सड़कों को बंधक बनाने की वकालत क्यों?
अपूर्वानंद का तर्क- हर कोई जानता है कि ये चेतावनियाँ बकरीद से पहले मुसलमानों को निशाना बनाकर दी गई थीं। इससे पहले भी, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने धमकी दी थी कि किसी को भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी… उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि उन्हें सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर वे यह संदेश नहीं समझते हैं, तो उन्हें दूसरे तरीकों से ‘समझाया जाएगा’। हम सभी जानते हैं कि वे ‘दूसरे तरीके’ क्या हैं।
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब- सड़क घेरकर सामूहिक रूप से नमाज पढ़ने की जिद का समर्थन केवल एक अराजक मानसिकता का व्यक्ति ही कर सकता है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने साफ किया है कि सड़कें आम जनता, एम्बुलेंस और यातायात के लिए हैं, न कि किसी मजहबी गतिविधि को रोककर सार्वजनिक व्यवस्था ठप करने के लिए। क्या अपूर्वानंद को लगता है कि राहगीरों का रास्ता रोकना कोई मजहबी अधिकार है? जब यूपी के मुख्यमंत्री कानून के उल्लंघन पर ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ की बात करते हैं, तो उसे ‘दूसरे तरीके’ कहकर डराने का नैरेटिव गढ़ना बंद होना चाहिए। कानून का डंडा अपराधियों और उपद्रवियों पर चलता है, शांतिपूर्ण नागरिकों पर नहीं।
‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान करने की सलाह से मिर्ची क्यों लगी?
अपूर्वानंद का तर्क- असम के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को सलाह दी कि वे कुर्बानी ‘ठीक ढंग से’ करें। उन्होंने उन मुस्लिम आवाजों की तारीफ की जिन्होंने गाय की कुर्बानी के खिलाफ अपील की थी। हिमंता बिस्वा सरमा तो यहाँ तक कह गए कि बकरीद को आखिरकार कुर्बानी से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहिए। उन्होंने ऐलान किया कि मुसलमान ‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान कर रहे हैं, और उन्होंने कहा कि इससे समाज में शांति बनी रहेगी।
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब- भारत जैसे विविधता वाले देश में अगर कोई मुख्यमंत्री सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुसंख्यक समाज की ‘सनातन भावनाओं’ और गोवंश के सम्मान की अपील करता है, तो वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठने लगती है? असम के मुख्यमंत्री ने समाज में शांति और भाईचारे के लिए यह बात कही। लेकिन अपूर्वानंद जैसों को समाज में शांति नहीं, बल्कि तनाव पसंद है। वे चाहते हैं कि ऐसी बातें उठती रहें जिससे ध्रुवीकरण हो और उनका बुद्धिजीवी होने का धंधा चलता रहे।
गौ-तस्करी और अवैध गतिविधियों का खुला बचाव
अपूर्वानंद का तर्क- ऐसे Video घूम रहे हैं जिनमें हम देखते हैं कि गाड़ियों को रोका जा रहा है और उन पर हमला किया जा रहा है, इस शक पर कि गायों को कुर्बानी के लिए गैर-कानूनी तरीके से ले जाया जा रहा है। लेकिन अब यह मामला सिर्फ गायों तक ही सीमित नहीं रहा। बकरियों को भी जब्त किया जा रहा है। दिल्ली में, बकरीद से ठीक पहले, नेहरू हिल पार्क में लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी… ‘गौ रक्षक’ टोलियाँ बनाई जा रही हैं।”
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब- इस देश में गोवंश की हत्या और उसकी तस्करी पर कानूनी प्रतिबंध है। अपूर्वानंद बड़ी चालाकी से अवैध गौ-तस्करी को ‘कुर्बानी के लिए परिवहन’ का मासूम नाम दे रहे हैं। हकीकत यह है कि अवैध रूप से ले जाए जा रहे जानवरों को रोकना कानूनन सही है। यह वामपंथी प्रोफेसर इस बात से पूरी तरह अनजान बन जाते हैं कि कैसे अवैध गौ-तस्करी को रोकते वक्त इस्लामी भीड़ द्वारा पुलिस और आम नागरिकों पर जानलेवा हमले किए जाते हैं। नेहरू हिल पार्क जैसी सार्वजनिक जगहों पर अगर प्रशासन अवैध खरीद-बिक्री और गंदगी रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ाता है, तो उसे ‘मुसलमानों पर पाबंदी’ के रूप में दिखाना इनकी कुंठा को दर्शाता है।
मक्का के सच और PETA के अभियान से चिढ़
अपूर्वानंद का तर्क- एक टेलीविजन चैनल तो यह जाँचने के लिए मक्का तक चला गया कि क्या वहाँ गायों और ऊँटों की कुर्बानी दी जा रही है… पीटा (PETA) ने एक अभियान शुरू किया, जिसमें एक बकरी लोगों से गुहार लगाती है कि वे उसकी कुर्बानी न दें… PETA के इस अभियान में बकरियों के प्रति करुणा कम है, और मुसलमानों के प्रति द्वेष ज्यादा है। क्या PETA कामाख्या मंदिर या देवघर में भी ऐसा ही कोई अभियान चला सकता है, जहाँ रस्मों के दौरान कई जानवरों की कुर्बानी दी जाती है? उसने ऐसा कभी नहीं किया।
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब – जब कोई मीडिया चैनल यह दिखाता है कि मूल इस्लामी देशों (जैसे सऊदी अरब या मक्का) में भी स्थानीय कानूनों और व्यवस्था के तहत ही चीजें होती हैं, तो भारतीय लिबरलों का झूठ बेनकाब हो जाता है। इसलिए वे मीडिया को कोसने लगते हैं। रही बात PETA की, तो जब होली पर पानी बचाने या दिवाली पर पटाखे न फोड़ने के ज्ञान भरे ज्ञान-पत्र PETA द्वारा जारी किए जाते हैं, तब अपूर्वानंद जैसों की आँखें क्यों नहीं खुलतीं? तब उन्हें वो पोस्ट कभी हिंदू-विरोधी नहीं लगते। और तो और होली पर तरुण हत्याकांड में क्यों चुप रहें, जिसमें एक हिंदू युवक की मुस्लिमों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इसमें भी तो इस्लामी कट्टरपंथियों को पीड़ित दिखाते हुए अपूर्वानंद ने एक लेख छापा था।
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
बकरीद पर बकरे काटे जाने को सही ठहराने के लिए उन्होंने कामाख्या और देवघर जैसे पवित्र देवस्थानों को बदनाम करने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि जहाँ भी हिंदू समाज में ऐसी कुछ प्राचीन परंपराएँ बची भी हैं, वहाँ सड़कों पर सरेआम खून नहीं बहाया जाता, न ही बीच सड़क पर जानवरों को काटा जाता है। इसके विपरीत, पशु क्रूरता के खिलाफ खुद हिंदू समाज के ही लोग सबसे पहले अदालतों और सुधार आंदोलनों में आगे आते हैं।
हिंदू त्योहारों पर कीचड़ उछालने का घिनौना प्रयास
अपूर्वानंद का तर्क- कई हिंदू भोलेपन से पूछते हैं कि सड़कों पर नमाज पढ़ी ही क्यों जानी चाहिए। वे नमाज पर लगी पाबंदियों को सही कदम मानते हैं… लेकिन वे कभी यह नहीं पूछते कि हर मंगलवार को हनुमान मंदिरों के बाहर सड़कें घंटों तक क्यों बंद रहती हैं। लगभग हर हिंदू त्योहार के दौरान, सड़कों पर मूर्तियाँ और जुलूस ही छाए रहते हैं… चाहे गणेश चतुर्थी हो, रथ यात्रा हो, राम नवमी हो, दुर्गा पूजा हो… सड़कें सिर्फ एक दिन के लिए ही नहीं, बल्कि अक्सर कई-कई दिनों तक लगातार बंद रहती हैं। और फिर एक महीने तक चलने वाली कांवड़ यात्रा भी है…
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब- एक बकरीद और सार्वजनिक स्थानों पर मनमानी को सही ठहराने के लिए अपूर्वानंद ने हिंदुओं के लगभग सभी प्रमुख त्योहारों- गणेश चतुर्थी, रथ यात्रा, राम नवमी, दुर्गा पूजा और काँवड़ यात्रा पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन इस वामपंथी प्रोफेसर ने यह छुपा लिया कि हिंदुओं के त्योहारों में सड़कों पर दिखने वाली भीड़ साल में केवल एक बार, एक निश्चित समय के लिए होती है, और वह भी पूरी तरह प्रशासन द्वारा तय किए गए रूट और अनुमति (Permission) के अनुसार होती है। हिंदू समाज सरकारी व्यवस्था का सम्मान करता है। DJ की आवाज से लेकर जुलूस के रास्ते तक, सब कुछ पुलिस तय करती है।
इसके उलट, सड़क घेरकर हर हफ्ते पढ़ी जाने वाली शुक्रवार की नमाज का कोई अंत नहीं होता। देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी मुख्य मार्ग पर अचानक हजारों की इस्लामी भीड़ इकट्ठा होकर ट्रैफिक ठप कर देती है। मस्जिद से अचानक ईंट-पत्थर लेकर पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर हमला होने लगता है। यह नजारा उत्तर प्रदेश के बरेली और अन्य जिलों में बखूबी देखने को मिला था। मुस्लिम बहुल इलाकों से शुक्रवार को गुजरना आम नागरिकों के लिए कितना बड़ा सिरदर्द बन जाता है, यह वहाँ रहने वाले लोग ही इस वामपंथी को बेहतर समझा सकते हैं।
‘मुस्लिम संयम’ बनाम ‘मस्जिदों के बाहर पथराव’ का कड़वा सच
अपूर्वानंद तर्क- मुसलमान अपने त्योहारों के दौरान कोई हंगामा या उन्माद नहीं मचाते… वे कभी भी मंदिरों के सामने से जुलूस निकालते हुए बलि नहीं देते… सिर्फ हिंदू ही मस्जिदों के सामने जोर-जोर से संगीत बजाने, मस्जिद परिसर में घुसने और मुसलमानों के धार्मिक प्रतीकों का अपमान करने के अधिकार की माँग करते हैं… मुसलमानों में उनके त्योहारों के दौरान एक तरह का संयम देखने को मिलता है। लेकिन बदकिस्मती से, इन मौकों पर, हिंदू समाज के भीतर मुसलमानों के प्रति जो नफरत छिपी होती है…
द वायर के लेख का एक पैराग्राफ
जवाब – यह केवल एक अर्बन नक्सल का ही शुतुरमुर्गी विचार हो सकता है जो जमीनी हकीकत से आँखें मूँदकर यह दावा करे कि मुस्लिम त्योहारों पर ‘संयम’ दिखता है। क्या अपूर्वानंद को नहीं पता कि रामनवमी या दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान देश के दर्जनों राज्यों में हिंदू शोभायात्राओं पर मस्जिदों और मुस्लिम छतों से पत्थरों, पेट्रोल बमों और तलवारों से हमले किए जाते हैं? क्या हनुमान जयंती के जुलूसों पर होने वाली हिंसक घटनाओं में भी उन्हें हिंदुओं की ही गलती नजर आती है?
मोहर्रम के जुलूसों में लहराई जाने वाली नंगी तलवारों और हथियारों से क्या आम जनता को कोई असुविधा या डर महसूस नहीं होता? हिंदुओं को ‘मानसिक बीमार’ बताने वाले अपूर्वानंद ताजिया जुलूसों के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा और आगजनी पर पूरी तरह मौन साध लेते हैं, क्योंकि वहाँ उनके एजेंडे को ‘पीड़ित कार्ड’ खेलने का मौका नहीं मिलता।
वैचारिक घृणा और दंगों की साजिश का पुराना इतिहास
इन खुद को ‘ज्ञानी’ समझने वाले झोलाछापों का दिमाग पूरी तरह खोखला हो चुका है। इनका दोहरा चरित्र देखना हो, तो सबरीमाला मंदिर वाले मामले को याद कर लीजिए। तब यही वामपंथी कोर्ट के फैसलों का पन्ना लेकर कूद पड़े थे। हिंदू परंपराओं को ‘पिछड़ा’ और ‘महिलाओं का विरोधी’ बताने के लिए इन्होंने अपनी पूरी एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन जैसे ही बकरीद आती है, इनकी बोलती बंद हो जाती है। जब सड़कों को जाम किया जाता है और बीच राह पर खुलेआम पशुबलि दी जाती है, तब इन्हें अचानक ‘मजहबी आजादी’ याद आने लगती है। तब ये सारा ज्ञान भूलकर दुबक जाते हैं।
आज बकरीद पर हिंदुओं के त्योहारों को ज्ञान देने वाले इस प्रोफेसर अपूर्वानंद का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी देख लीजिए। यह कोई पहली बार नहीं है जब यह नफरत उगल रहा है। दिल्ली में जो हिंदू विरोधी दंगे हुए थे, उनकी चार्जशीट में भी इस प्रोफेसर का नाम आ चुका है। इन पर दंगों की साजिश रचने और भीड़ को भड़काने के बेहद गंभीर आरोप लगे थे।
ऐसे में ‘द वायर’ (The Wire) जैसी बदनाम वेबसाइट पर बैठकर इस प्रोफेसर का यह लेख लिखना कोई समाज सुधार की बात नहीं है। यह सीधे-सीधे भारत के कानून को ठेंगा दिखाना है। यह देश के बहुसंख्यक समाज को पूरी दुनिया में बदनाम करने की एक घटिया और सोची-समझी साजिश है।
पश्चिम बंगाल में नई बीजेपी सरकार बनने के बाद अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ यानी पहचान करो, रिकॉर्ड हटाओ और वापस भेजो नीति लागू करने की शुरुआत कर दी है।
इसी के बाद उत्तर 24 परगना जिले के बिथारी-हकीमपुर बॉर्डर पर सैकड़ों बांग्लादेशी नागरिकों की भीड़ देखने को मिली, जो भारत छोड़कर अपने देश वापस जाना चाहते हैं।
इनमें कई लोग ऐसे हैं जो सालों से बिना वैध दस्तावेजों के पश्चिम बंगाल में रह रहे थे और अलग-अलग जगहों पर मजदूरी, घरेलू काम, होटल और निर्माण कार्य में लगे हुए थे। सरकार द्वारा होल्डिंग सेंटर बनाए जाने और जाँच तेज होने के बाद इन लोगों में डर का माहौल बन गया है। कई लोगों ने कहा कि वे गिरफ्तार होने या जबरन डिपोर्ट किए जाने से पहले खुद ही वापस लौटना चाहते हैं।
People have once again gathered at the Hakimpur border area in North 24 Parganas, to return to Bangladesh.
Similar scenes were witnessed when the SIR process began. Now, after the opening of holding centres and the tough stance taken by the BJP government against illegal… pic.twitter.com/NLyDMtsMoD
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा कि अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी नागरिक जल्द से जल्द राज्य छोड़ दें। कल्याणी में एक प्रशासनिक बैठक के बाद उन्होंने कहा, “जल्दी-जल्दी भागो, नहीं तो सरकार जो करना होगा वो करेगी।”
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाए। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि ऐसे लोगों को जेल में रखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि कानून पहले से मौजूद था, लेकिन राजनीतिक कारणों से उसका इस्तेमाल नहीं किया गया।
शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “क्या वे हमारे रिश्तेदार हैं कि देश उनके खाने, कपड़े और दवाइयों का खर्च उठाए? अगर वे बांग्लादेशी हैं तो उनके देश को उन्हें स्वीकार करना चाहिए।”
सरकार का कहना है कि पुलिस सीधे ऐसे लोगों को BSF के हवाले कर सकती है। इसके बाद BSF और बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) मिलकर पहचान की पुष्टि करेंगे और फिर उन्हें वापस भेजा जाएगा।
होल्डिंग सेंटर बनने के बाद बढ़ा डर
राज्य सरकार ने मालदा और मुर्शिदाबाद में पहले दो होल्डिंग सेंटर शुरू किए हैं। इन सेंटरों में उन लोगों को रखा जाएगा जिनके पास भारत में रहने के वैध दस्तावेज नहीं हैं और जिनकी डिपोर्टेशन प्रक्रिया चल रही है।
सरकारी आदेश जारी होने के 48 घंटे के भीतर ही इन सेंटरों को तैयार कर लिया गया। सोमवार तक 12 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को वहाँ भेजा भी जा चुका है।
इसी के बाद बड़ी संख्या में लोग बॉर्डर की ओर पहुँचने लगे। बॉर्डर पर पुरुष, महिलाएँ और बच्चे अपने सामान के साथ दिखाई दिए। BSF जवान पहले उनकी पहचान की जाँच कर रहे हैं, फिर औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें बांग्लादेश अधिकारियों को सौंपा जा रहा है।
एक BSF अधिकारी ने बताया कि हर व्यक्ति से पूछताछ की जाती है, फिंगरप्रिंट लिए जाते हैं और फोटो रिकॉर्ड किया जाता है। इसके बाद उनकी नागरिकता और पृष्ठभूमि की पुष्टि होती है।
हमें डर था कि पकड़ लिए जाएँगे: काँप रहे घुसपैठिए
भारत छोड़कर लौट रहे कई लोगों ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि वे डर की वजह से वापस जा रहे हैं। खुलना की रहने वाली तकलीमा खातून ने बताया कि वह दो साल पहले घोजाडांगा बॉर्डर के जरिए भारत आई थी और घरेलू काम करती थी।
उसने कहा, “मैं नहीं चाहती कि मुझे होल्डिंग सेंटर भेजा जाए या जबरन धक्का देकर निकाला जाए। इसलिए मैं खुद वापस जा रही हूँ।” सतखीरा के शाहिदुल गाजी ने कहा कि वह तीन साल पहले एक दलाल की मदद से भारत आया था और राजमिस्त्री का काम करता था।
उसने कहा, “मेरे पास कोई नागरिकता दस्तावेज नहीं है। सैकड़ों लोगों की तरह मुझे भी अब लौटना पड़ रहा है।” जेसोर के मोहम्मद अली शेख ने बताया कि वह करीब सात साल से कोलकाता के मेटियाब्रुज इलाके में रह रहा था और होटल में काम करता था।
उसने कहा कि नई सरकारी नीति और होल्डिंग सेंटर की खबर के बाद उसने वापस लौटने का फैसला किया। एक अन्य महिला नुसरत बीबी ने कहा कि वो और उसका पति मजदूरी के लिए भारत आए थे, लेकिन अब माहौल बदल चुका है। सरकार कभी भी पकड़कर वापस भेज सकती थी, इसलिए हमने खुद लौटने का फैसला किया।
बीजेपी सरकार के लिए बड़ा चुनावी मुद्दा था अवैध घुसपैठ
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और जनसंख्या बदलाव को बड़ा मुद्दा बनाया था। पार्टी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
नई सरकार बनने के तुरंत बाद सुवेंदु अधिकारी ने डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट नीति लागू करने की घोषणा कर दी। सरकार का दावा है कि इससे राज्य में लंबे समय से चली आ रही अवैध घुसपैठ की समस्या पर रोक लगेगी।
पिछली TMC सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाई। पार्टी का कहना है कि कई लोग फर्जी दस्तावेज बनवाकर सरकारी योजनाओं का लाभ भी उठा रहे थे।
बीजेपी नेताओं का दावा है कि इससे राज्य के संसाधनों पर दबाव बढ़ा, जनसंख्या संतुलन बदला और सुरक्षा एजेंसियों के लिए खतरे पैदा हुए। वहीं TMC पहले भी ऐसे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती रही है।
अमित शाह ने डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट को बताया था NDA की पॉलिसी
डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट पर चर्चा नई या सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिसंबर 2025 में संसद में इसे NDA की पॉलिसी बताया था। अमित शाह ने तब घुसपैठ के मुद्दे पर कड़ी कार्रवाई की बात की थी। उन्होंने कहा था कि क्या कोई भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित रह सकता है, जब देश का प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री कौन हो, यह घुसपैठिए तय करेंगे। उन्होंने कहा था, “हम घुसपैठियों को डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करेंगे।”
झारखंड चुनाव से पहले भी एक अखबार के साथ बातचीत में शाह ने इस नीति का जिक्र किया था। नवंबर 2024 में शाह ने कहा था, “हमने ये वादा किया है कि डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट, ये तीन हमारी नीति होगी। एक सर्वे करके सबसे पहले घुसपैठियों को आइडेंटिफाई किया जाएगा, उसके बाद में मतदाता सूची से उनका नाम डिलीट किया जाएगा। और अंततोगत्वा डिपोर्ट करने की भी कार्रवाई हम करेंगे”
क्या है ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ पॉलिसी?
‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ पॉलिसी का मतलब है पहचान करो, रिकॉर्ड हटाओ और वापस भेजो। यानी सरकार सबसे पहले यह पता लगाएगी कि देश में कौन लोग अवैध तरीके से रह रहे हैं और उनके पास वैध नागरिकता या रहने के दस्तावेज हैं या नहीं। गृह मंत्रालय और सरकार के पुराने आँकड़ों में अलग-अलग समय पर देश में लाखों से लेकर करोड़ों तक अवैध बांग्लादेशियों के होने का दावा किया गया है।
इस नीति का दूसरा हिस्सा कार्रवाई से जुड़ा है। जिन लोगों के दस्तावेज सही नहीं पाए जाते, उन्हें होल्डिंग सेंटर्स में रखा जा सकता है। देश में बंगाल के अलावा असम, दिल्ली, अलवर, अमृतसर और गोवा में होल्डिंग सेंटर्स बने हुए हैं।
इसके बाद पहचान पूरी होने पर ऐसे लोगों को BSF या तटीय इलाकों में कोस्ट गार्ड के जरिए बांग्लादेश वापस भेजा जा सकता है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद अवैध घुसपैठ पर रोक लगाना और उन इलाकों में डेमोग्राफिक बदलाव को नियंत्रित करना है, जहाँ लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर बहस होती रही है।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश से लगती लंबी सीमा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रही है। कई बार मानव तस्करी, मवेशी तस्करी, फर्जी दस्तावेज और आतंकी नेटवर्क से जुड़े मामलों में भी अवैध घुसपैठ का मुद्दा सामने आता रहा है।
अब केंद्र और राज्य दोनों में एक जैसी राजनीतिक सोच होने के कारण कार्रवाई तेज होती दिखाई दे रही है। सरकार ने पहचान पत्रों की जाँच, दस्तावेज सत्यापन और बॉर्डर निगरानी को भी मजबूत करने के संकेत दिए हैं।
हालाँकि इस अभियान को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। एक तरफ बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था का मुद्दा बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे मानवीय संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देख रहे हैं।
बकरीद पर बकरा काटने वाले इस्लामी कट्टरपंथी ने नया चलन शुरू किया है। यह चलन है, रोना-पीटना करने का। ये लोग अब विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। बकरीद पर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियोज सामने आ रही हैं। इन वीडियोज में रोना मचा हुआ है कि इन लोगों से बकरीद मनाने की आजादी छीनी जा रही है।
इसे सरकार के खिलाफ अलग नैरेटिव के रूप में गढ़ा जा रहा है क्योंकि सरकार ने सड़क पर नमाज ने पढ़ने, खुले में जानवरों का न काटने जैसे कुछ नियम पालन करने को कह दिया है। उन नियमों का पालन करने से बचने के लिए ये इस्लामी कट्टरपंथी आजादी की बात कर रहे हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि मुस्लिमों को उनके त्यौहार मनाने नहीं दिया जाता है। इस तरीके से यह नैरेटिव फैला रहे हैं कि लोग अपने देश, अपनी ही संस्कृति और अपनी ही चुनी हुई सरकार पर सवाल उठाने लगें।
नैरेटिव फैलाने में ये और कोई नहीं बल्कि नौजवान इस्लामी कट्टरपंथियों की कौम है, जो आए दिन रीलों में अपने मजहब का प्रचार करती घूमती है। अदनान शेख, एजाज खान और सहर यूनुस शेख जैसे सोशल मीडिया से उभरे चेहरों ने बकरीद को लेकर इसी तरह के वीडियो बनाए हैं। इन वीडियो में दिखाया कि मुस्लिमों के साथ कितना गलत हो रहा है।
‘चीच्चा’ अदनान शेख ने मीरा रोड के मामले में मजहब की आजादी का रोना रोया
मजहब के आगे किसी को नहीं मानने वाले अदनान शेख ने मीरा रोड वाले मामले में सवाल उठाने वाले लोगों ‘बेरोजगार’ बताते वीडियो बनाया। ‘चीच्चा’ ने वीडियो में जो तर्क दिया उसका सोर्स उन्होंने चैटजीपीटी को बताया। अदनान ने चैटजीपीटी का हवाला देकर दावा किया कि भारत की 80% आबादी नॉन-वेज है, तो मुस्लिमों को खाने से क्यों रोका जाता है।
This scum named Adnan Shaikh is complaining about society objecting mass goat sacrifice and laughing at this sensitive issue
We have no problem you following your religion, but why did you convert your Hindu wife Riddhi to Ayesha? When you have such low tolerance, why do you… https://t.co/ERKMb2wkJbpic.twitter.com/QkQ6wuPC2s
भूलना नहीं है कि मजहब की आजादी की बात करने वाला ये वही अदनान शेख है जिसने हिंदू लड़की से निकाह कर उसे भी मुस्लिम में परिवर्तित कर दिया है। जो सबसे ऊपर अल्लाह को मानता है लेकिन जब हिंदू लड़की के मजहब की बात आई तो उससे वह छीन लिया और अपना मजहब थोप डाला।
एजाज खान ने बदला लेने की चेतावनी दी
ऐसे ही एजाज खान ने भी ‘नॉन-वेज’ खाने को मुद्दा बनाकर वीडियो बनाया है। उसने भी मुस्लिमों पर अत्याचार का रोना रोया और फिर धमकी दी कि अगर मुस्लिम बदला लेने पर आए तो मुश्किल हो जाएगी।
अब एजाज खान को कौन नहीं जानता? जानता भी सिर्फ लफड़ों की वजह से ही है। यहाँ इतने अहम और संवेदनशील मुद्दे में भी एजाज खान ने मारने-काटने की धमकी दे डाली। उसको नहीं पता कि नॉन-वेज और वेज में क्या फर्क है लेकिन उसे यह पता है कि बदला कैसे लिया जाता है? क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी की एक पहचान यह भी है।
मुंब्रा को हरा रंग में रंगने का ख्वाब देखने के बाद सहर शेख मजहब की बात नहीं करना चाहतीं
यहाँ बात अगर ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ की होने लगी तो मुंब्रा को हरे रंग में रंगने का ख्वाब देखने वाली मेयर सहर यूनुस शेख कैसे पीछे हट सकती थीं। सहर यूनुस शेख एक कदम आगे निकली। सहर ने रोना रोते हुए सीधा हिंदुओं की मान्यताओं पर हमला बोला। सहर ने बकरा काटने की तुलना पशु बलि से की। यहाँ सहर कहती है कि मजहब की बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि दुनिया में और भी कई समस्याएँ हैं।
सहर शेख AIMIM की मुंब्रा से मेयर हैं, पार्टी को केवल मजहब के नाम ही वोट मिलते हैं। और सहर यूनुस शेख को भी मुंब्रा में मजहब की बात करने के लिए ही चुना गया। यह खुद सहर शेख अपनी विक्ट्री स्पीच में बता चुकी है। जब सहर शेख ने मुंब्रा को हरे रंग में रंगने के अपने ख्वाब को पब्लिक किया था, और सामने खड़ी मुस्लिम भीड़ ने खूब तालियाँ बजाई थीं। वह आए दिन अपनी वीडियो में केवल मजहब की ही बात करती है, और अब बकरीद पर रोना रोते हुए सहर को मजहब की बात करने से चिढ़ हो रही है।
सरकार के नियम मुस्लिमों पर अत्याचार?
ये वही सोशल मीडिया की दुनिया में उभरे चेहरे हैं, जिन्हें देश की बड़ी संख्या में शामिल युवाओं ने फेमस किया है। इनमें से कोई नाच-गाना करके, कोई इधर-उधर लफड़ेबाजी करके तो कोई राजनीति के नाम पर नफरत फैलाकर आगे बढ़ा है। इनके पास न कोई तर्क है और न ही अपनी बात को साबित करने के लिए कोई तथ्य। इनके दावे सिर्फ भड़ास से भरे हैं।
अगर भारत में अलग-अलग राज्यों की सरकारें बकरीद को लेकर कुछ नियम तय कर रही है तो उसका मकसद ये कैसे हो सकता है कि मुस्लिमों के साथ भेदभाव हो? भारत में आखिर कब और किसने मुस्लिमों को बकरीद मनाने से रोका है? सरकार और प्रशासन का केवल इतना ही तो कहना है कि कानून के दायरे में रहकर, तय स्थानों पर और स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए त्यौहार मनाएँ। क्या कानून व्यवस्ता की बात करना अत्याचार है?
सच्चाई यह है कि ये फेमस चेहरे अपनी वीडियोज के जरिए भारत की एक डरावनी और झूठी तस्वीर पेश करने की कोशिश में लगे हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया पर, विशेषकर खाड़ी देशों और विदेशी दर्शकों के बीच यह नैरेटिव सेट किया जा सके कि भारत में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहा है।
‘पीड़ित’ का नकाब पहनने वालों को घिनौनी असलियत
याद रहे कि ये वही चेहरे हैं जो आम दिनों में विशुद्ध कट्टरपंथी और मजहबी कंटेंट पर फलते-फूलते हैं और जिनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ‘नारा-ए-तकबीर’ जैसी बातें आम होती हैं, लेकिन जैसे ही कोई कानूनी बंदिश आती है, ये अचानक ‘शांतिप्रिय और पीड़ित’ होने का नाटक रचने लगते हैं। यही अदनान शेख और एजाज खान हैं, जिन्होंने 2019 में तबरेज अंसारी मामले पर अपनी मुस्लिम गैंग के साथ रील बनाई थी और मुस्लिमों के आतंकी बनने को जायज दिखाया था।
अब यही चेहरे सार्वजनिक स्थानों, सड़कों या रिहायशी सोसायटियों में खुलेआम दी जाने वाली कुर्बानी को सही ठहराने के लिए ये बार-बार तर्क देते हैं कि हिंदू भी तो मांस खाते हैं।
सवाल है कि क्या कोई हिंदू मीट खाने के लिए खुली सड़क पर मांस काटने की जिद करता है, क्या उनके खान-पान की वजह से सोसायटियों की नालियों में खून बहता नजर आता है। कोई भी सभ्य समाज यह स्वीकार नहीं कर सकता कि त्यौहार के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध किया जाए, सार्वजनिक नमाज से ट्रैफिक रोका जाए या खुले में जानवरों को काटकर बच्चों और नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य व स्वच्छता से खिलवाड़ किया जाए।
सालों से सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में सक्रिय वामपंथी जमात ने हमेशा हिंदुओं के त्योहारों को निशाना बनाया है। दीपावली आते ही इन्हें प्रदूषण याद आता है, होली पर पानी की बर्बादी और रंगों के केमिकल पर ज्ञान दिया जाता है, और महाशिवरात्रि पर दूध की बर्बादी का रोना रोया जाता है। तब सनातनियों ने कभी इस तरह का ‘अंतरराष्ट्रीय रोना’ नहीं रोया।
लेकिन, आज जब प्रशासन सिर्फ इतना कहता है कि गाय, जिसे हिंदू पूजते हैं, उसकी कुर्बानी नहीं होगी और बकरे की कुर्बानी खुले में नहीं, बल्कि कड़े नियमों के तहत बंद जगहों पर होगी, तो इनका त्योहार खतरे में आ जाता है।
हमें समझना होगा कि इस्लामी कट्टरपंथियों का यह पूरा खेल ‘अधिकारों’ से जुड़ा नहीं, बल्कि ‘विशेषाधिकारों’ की जिद का है। इन्हें देश में रहना है और ये भी चाहते हैं कि कानून इनके मुताबिक चले। लेकिन अब समय है इन्हें समझना होगा कि भारत में नियम अगर हिंदुओं के लिए हैं तो दूसरे समुदाय पर भी वो वैसे ही लागू होंगे। इसलिए सोशल मीडिया पर आंसू बहाकर देश को बदनाम करने का यह ड्रामा अब पूरी तरह बंद होना चाहिए। न इस साल, न किसी साल ऐसी हरकतें बर्दाश्त की जानी चाहिए।
NCERT के किताब का झोल बच्चों पर भारी पड़ रहा है। किताबों का ठिकाना नहीं और नया सेशन शुरू हुए करीब दो महीने बीत गए हैं। इतना ही नहीं, गर्मी की छुट्टियाँ भी जारी हैं, लेकिन अब तक खासकर क्लास 9 के छात्र-छात्राओं की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही हैं।
किताबें पीडीएफ फाइल के रूप में डिजिटल फॉर्म में मौजूद है। सिलेबस में बड़े बदलाव किए गए हैं, ऐसे में पढ़ाई जो अप्रैल में शुरू हो जानी चाहिए थी, वो अब तक नहीं हो पाई है। यहाँ तक की स्कूलों के बुक शॉप से ये भी नहीं पता चल पा रहा है कि किताबें अब तक मिलेंगी। केन्द्रीय विद्यालय और दूसरे सरकारी स्कूलों का तो और भी बुरा हाल है। बच्चे परेशान, टीचर परेशान और पैरेंट्स बिचारे सारी बातें जानकर पूरे सिस्टम को कोस रहे हैं।
पैरेंट्स जानना चाहते हैं कि आखिर सिलेबस बदले, तो किताबें पहले क्यों नहीं छपी। अगर किताबों की छपाई न कर पाए तो इस साल नया सिलेबस लागू करने की जरूरत क्या थी। तीन भाषा की जानकारी देने वाला फॉर्मूला क्लास 9 में क्यों इस तरह से थोपा गया। बच्चे पहले से परेशान हैं, वो पूरी चीजों को कैसे मैनेज करेंगे।
किताबों की अनिश्चितता को लेकर टीचर चिंतित
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के एक बड़े स्कूल में साइंस टीचर मिस शिवानी ( बदला हुआ नाम) ने बदले हुए क्लास 9 सिलेबस में बदलाव के बाद टेक्स्टबुक्स की देरी से चिंता जताई। उनका कहना है कि स्कूलों को इस बारे में साफ जानकारी नहीं मिली है कि किताबें कब तक मिल पाएँगी।
टीचर के मुताबिक, “बदकिस्मती से यह बार-बार होने वाली दिक्कत बन गई है। एकेडमिक सेशन अप्रैल में शुरू होता है, फिर भी टेक्स्टबुक्स अक्सर कई महीनों तक अवेलेबल नहीं रहतीं। थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला लागू होने के साथ क्लास 9 के स्टूडेंट्स से अब तीसरी भाषा पढ़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इन कोर्स के लिए जरूरी टेक्स्टबुक्स भी मौजूद नहीं हैं।”
उन्होंने कहा कि एक टीचर और CBSE स्टूडेंट के पेरेंट्स के तौर पर पूरी परिस्थिति चिंताजनक है। इस तरह की देरी स्कूलों, टीचरों, स्टूडेंट्स और पेरेंट्स, सभी के लिए अनिश्चितता वाली है। सबसे अहम बात यह है कि इससे पूरे सिस्टम की लापरवाही, निरंतरता और तैयारी की कमी का पता चलता है। एजुकेशनल रिफॉर्म्स और करिकुलम में बदलावों को समय पर प्लानिंग, सही रिसोर्स और लागू करने के लिए सही रणनीति की जरूरत होती है, ताकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर न पड़े।
दिल्ली-एनसीआर की एक केन्द्रीय विद्यालय में टीचर सीमा (बदला हुआ नाम) सोशल साइंस पढ़ाती हैं। इनका कहना है कि क्लास 9 के सोशल साइंस में काफी बदलाव आए हैं। छात्रों को पीडीएफ से पढ़ाना पड़ता है। क्लास में बच्चों के पास किताब नहीं है, इसलिए उन्हें समझाना अपने आप में बड़ा चैलेंज है। बच्चों को पीडीएफ फाइल की कॉपी निकालने के लिए कहा, ताकि उन्हें जो बताया जा रहा है, वह समझ सकें। इस बीच गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, किताबों का कोई अता-पता नहीं है। बच्चों की परीक्षा भी शुरू हो जाएगी, आखिर शिक्षक क्या करे?
एडवांस मैथ्स के बाद एडवांस साइंस की एंट्री
क्लास 9 में इस साल से एडवांस मैथ्स के साथ एडवांस साइंस भी शुरू हो गया है। 2024 में सीबीएसई के स्कूलों में एडवांस मैथ्स की शुरुआत हुई थी। आज तक इसके लिए एनसीईआरटी ने कोई किताब नहीं छापा है। अगर छापा भी होगा तो बच्चों के हाथों तक नहीं पहुँचा। ऐसे में टीचर जो किताब मौजूद है, उससे ही मैथ्स करवाते हैं। जो थोड़ा टफ होता है, उसे एडवांस मैथ्स का सवाल बता दिया जाता है और जो आसान होते हैं उसे बेसिक मैथ्स का। अब सोचा जा सकता है कि एक ही क्लासरूम में जो बच्चा एडवांस मैथ्स वाला सवाल कर रहा होगा, उस वक्त बेसिक मैथ्स लिया बच्चा क्या कर रहा होगा।
ऐसी स्थिति में अब एडवांस साइंस की पढ़ाई शुरू हो रही है। आगे जो बच्चे साइंस पढ़ना चाहते हैं, उन्हें एडवांस मैथ्स और एडवांस साइंस लेना है। ह्यूमेनिटी और कॉमर्स लेने वाले बच्चों को अभी से साइंस पर ज्यादा मेहनत नहीं करना है। आखिर क्लास 11 में ये अंतर आ ही जाता है, तो क्लास 9 में इसकी जरूरत क्या थी।
किताब जिसे मिले, वे छात्र भी परेशान
डीपीएस नोएडा में पढ़ने वाली क्लास 9 की छात्रा अक्षरा का कहना है कि उन्हें दो-तीन दिन पहले किताब मिल गई है। लेकिन अभी भी सोशल साइंस की किताब नहीं मिली है। वैसे भी मैथ्स की तो अलग किताब स्कूल पहले से ही पढ़ाता रहा है। साइंस के लिए एनसीईआरटी की किताब मिल गई है। उसका कहना है कि साइंस की किताब पूरी तरह बदल गई है। मैथ्स का पहला चैप्टर पहले नंबर सिस्टम हुआ करता था, लेकिन अब ज्योमेट्री का है। पहले बच्चे के लिए कैलकुलेशन वाले सवाल ज्यादा आते थे, लेकिन अब लैंग्वेज बेस सवाल ज्यादा हैं। गणित में भी ऐसा लगता है कि लैंग्वेज समझना पड़ेगा। काफी मुश्किल लग रहा है इसे समझना।
उसने कहा कि साइंस की किताब भी काफी मुश्किल लग रही है। बहुत ज्यादा गहराई से समझना पड़ेगा। इसे वही छात्र खुद से कर पाएगा, जिसे साइंस पढ़ना काफी पसंद हो। समरबिल स्कूल, दिल्ली में पढ़ने वाली छात्रा रियाना का कहना है कि उसे तो अभी तक किताब भी नहीं मिली है। स्कूल के अंदर जो बुक शॉप हैं, वहाँ पूछने पर बोला जाता है कि अभी तक उन्हें कोई जानकारी नहीं है कि किताब कब तक मिलेगा। टीचर ने बच्चों को पीडीएफ भेज कर उसकी कॉपी करवा कर लाने के लिए कहा था। अप्रैल में जैसे-तैसे उनलोगों ने पढ़ा है। मैम भी परेशान रहती हैं। बच्चे भी किताब नहीं मिलने से परेशान हैं। उनकी तो टर्म 1 की परीक्षा भी हो गई है, लेकिन किताब का ठिकाना नहीं है।
जब स्कूल में मौजूद किताब के दुकानदार से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा कि अभी तक तो किताबें नहीं आई हैं। कब तक आएगी उन्हें भी नहीं पता। अब तो गर्मी की छुट्टियाँ चल रही है। अब बच्चों को जुलाई में स्कूल खुलने के बाद ही पता चलेगा कि किताब मिल पाएगी या नहीं। हालाँकि स्कूल से अलग कोंडली के ‘उत्तराखंड बुक शॉप’ के दुकानदार का कहना है कि उनके यहाँ सारी किताबें मिल रही हैं, सिर्फ क्लास 9 की सोशल साइंस की किताब अब तक नहीं आई है। उन्होंने जानकारी दी कि जल्द ही एडवांस मैथ्स के साथ-साथ एडवांस साइंस की किताब बाजार में आने वाली है।
तीन लैंग्वेज पढ़ने की अनिवार्यता से सभी परेशान
बच्चे जब किताब नहीं मिलने से परेशान हैं, वहीं इस साल तीन लैंग्वेज पढ़ना भी क्लास 9 में अनिवार्य कर दिया गया है। एक मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा और एक विदेशी भाषा। ज्यादातर स्कूलों में इसके लिए हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है। ऐसे में जर्मन, फ्रेंच, स्पेनिश जैसी विदेशी भाषा अब नहीं पढ़ाई जा रही है। इससे जुड़े शिक्षकों को भी स्कूलों ने बाय-बाय कर दिया है।
डीएवी स्कूल गाजियाबाद में क्लास 10 में पढ़ने वाली छात्रा की माँ अल्पना राय, जो माँ के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी हैं, उनका कहना है कि बच्चों को दो-तीन दिन पहले किताबें मिली है। उन्होंने किताबों में कई कमियाँ पाई हैं। साइंस में बहुत ज्यादा सिलेबस है, उसे इस तरह से बनाया गया है कि बच्चों के लिए खुद से समझना काफी मुश्किल है। टीचर को भी पढ़ना पड़ेगा। मैथ्स का भी वही हाल है। सोशल साइंस की किताब मिली नहीं है। अप्रैल से अब तक बच्चों के पास किताबें नहीं थी, सिलेबस बदल दिया गया और किताब भी न मिले, तो बच्चा क्या करे। क्लास 9 बच्चे का आधार होता है। इस क्लास में लापरवाही काफी गंभीर बात है। ऐसी स्थिति में तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता बच्चों पर भारी पड़ रही है।
समरविल स्कूल नोएडा में पढ़ने वाली एक छात्रा की माँ जैस्मिन तिर्की का कहना है कि उन्होंने तीन लैंग्वेज की अनिवार्यता के खिलाफ स्कूल प्रबंधन से विरोध जताया है। उनका कहना है कि उन्होंने अप्रैल में स्कूल से पुरानी किताबें खरीद ली थी। तभी वही किताबें बेची जा रही थी। अब सिलेबस बदल गया है, तो फिर खरीदना पड़ रहा है। ये दोहरा खर्च भी उन्हें परेशान कर रहा है।
हालाँकि, उनका कहना है कि सिलेबस को वक्त-वक्त पर परखा जाना चाहिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आज के परिवेश में बदलाव होना चाहिए। लेकिन सिलेबस में बदलाव के बाद वक्त पर किताबों का मिलना भी जरूरी है। अगर किताब नहीं मिलेंगे तो पीडीएफ फाइल से बच्चे पढ़ते हैं। मोबाइल से दूर रखने की हमारी सारी कोशिश बेकार हो जाती है, इसलिए बदलाव से पहले सही रणनीति बनाना जरूरी है। बदलाव करिए, लेकिन बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता को तोड़ कर नहीं। अगर अगले साल इसे लागू किया जाता, तो किताबें भी मार्केट में आ जाती और बच्चों को सहूलियत भी होती।
ये हाल सिर्फ क्लास 9 के बच्चों का नहीं हुआ है। साल 2025 में क्लास 4 से क्लास 8 तक का सिलेबस बदल गया था। उस वक्त भी कई महीनों तक बच्चों को किताबें नहीं मिल पाई। क्लास 5 और क्लास 8 के बच्चों ने तो जून तक इंतजार किया था। इसके बावजूद एनसीईआरटी ने कोई सबक नहीं लिया और साल 2026 में क्लास 9 का सिलेबस बदल कर किताब उपलब्ध कराने में असफल रहे। फिर वही पीडीएफ फाइल और टीचर्स के नोट्स पर बच्चों की निर्भरता। गाँवों-कस्बों के बच्चे क्या पीडीएफ फाइल खोल पाएँगे? क्या इंटरनेट की ऐसी सुविधा उन्हें मिलती है, ये भी बड़ा सवाल है। कई बार अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकें पहले छप जाती हैं, हिन्दी में बाद में आती है। इसको लेकर भी असमानता का आरोप एनसीईआरटी पर लगता है।
नकली किताबों से सावधान रहें
एक बात और है कि प्राइवेट स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महँगी किताबें स्कूल में पढ़ाते हैं, इसे खरीदने का दबाव अभिभावकों पर होता है। इसको लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है और पूछा है कि जब एनसीईआरटी की किताबें कम पैसों में उपलब्ध है, तो स्कूल क्यों महँगी किताबों से पढ़ाती है। लेकिन, एनसीईआरटी की किताबें उपलब्धता पर भी बड़ा सवाल है।
एनसीईआरटी की किताबों में कमी की वजह से कई जगहों पर नकली किताबें मिल रही हैं। इन किताबों की भारी माँग रहती है। उसके अनुपात में आपूर्ति नहीं हो पाती। इसके कारण बाजार में नकली और पायरेटेड किताबों का बड़ा गिरोह सक्रिय है। ये किताबें घटिया कागज, हल्की स्याही और बिना लोगो के छपती हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई और आँखों पर बुरा असर पड़ता है।
2020 में सिर्फ मेरठ और आसपास के इलाकों में करीब 5.64 करोड़ रुपये की नकली किताबें खपाने की बात सामने आई थी। 2025 में दिल्ली के शाहदरा में नकली किताबों का एक रैकेट पकड़ा गया था जिसके पास से 1.7 लाख से अधिक नकली किताबें जब्त की गई थी, जिसकी कीमत करीब 2.4 करोड़ बताई गई थी। कहने का मतलब यह है कि एनसीईआरटी की नकली किताबों से भी सावधान रहने की जरूरत है। किताबों की कमी की वजह से ‘नकली का धँधा’ भी जोरों से चल रहा है।
NCERT की किताबों में संशोधन और विवाद
एनसीईआरटी की किताबों में हाल ही में कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ के मुद्दे पर जमकर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया। इसके बाद एनसीईआरटी को माफी माँगनी पड़ी और किताब को बाजार से हटाना पड़ा।
कक्षा 8 के सोशल साइंस की किताब में राजपूत राजघरानों के मराठा साम्राज्य में दिखाए जाने पर जमकर बवाल मचा। दरअसल किताब में संस्थान ने 1759 का एक मैप प्रकाशित किया, जिसमें राजस्थान के स्वतंत्र राजघरानों जैसे- जैसलमेर, बीकानेर, बूंदी को मराठा साम्राज्य में दिखाया गया। सवाल उठने के बाद NCERT को बदलाव करना पड़ा। उसने एक कमेटी बनाई और समीक्षा के बाद संस्थान ने माना कि उससे बड़ी गलती हुई थी और इस मैप का कोई सोर्स नहीं था।
कक्षा 7वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम से मुगल साम्राज्य और दिल्ली सल्तनत से जुड़े अध्याय हटाने पर विपक्ष ने भारी हंगामा खड़ा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कुछ हिस्सों को हटाने को लेकर एनसीईआरटी ने खेद जताया और इसे आगामी शैक्षणिक सत्र में संशोधित कर पेश करने की बात कही।
कोरोना काल में एनसीआरटी ने क्लास 10 के पाठ्यक्रम से डार्विन का विकासवाद यानी evolution और आवर्त सारणी यानी periodic table हटा दिया था। इसको लेकर शिक्षाविदों ने जमकर लताड़ लगाई। हालाँकि एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि डार्विन का विकासवाद और आवर्त सारणी को हटाया नहीं गया है, बल्कि कक्षा 11वीं और 12वीं के विज्ञान के विस्तृत पाठ्यक्रम में इन्हें शामिल रखा गया है।
शिक्षाविदों का मानना था कि यह छात्रों को विज्ञान की समझ से दूर करने वाला कदम है। इसके अलावा पर्यावरण से जुड़े चैप्टर जैसे ऊर्जा के स्रोत, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन भी हटा दिए गए। इस पर भी बवाल हुआ।
कुल मिलाकर एनसीईआरटी को किताबों में संशोधन से लेकर नई किताब बाजार में लाने के लिए सही रणनीति की जरूरत है। सालों से किताबों की कमी का सामना बच्चे कर रहे हैं। आखिर किताबें कम क्यों छापी जाती है? यह जानते हुए कि इससे कालाबाजारी होती है और नकली किताबों के ढेर में से असली को छाँटना छात्रों के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में अगर किताब बाजार में ही उपलब्ध न हो तो बच्चे क्या करें? उनकी पढ़ाई में गैप आता है। मन नहीं करता पढ़ने का। स्कूल भी हाथ खड़े कर देते हैं। जरा सोचिए ऐसे स्टूडेंट्स का क्या हाल होगा, जो गाँव में बगैर सिलेबस और किताब के पढ़ने की कोशिश करते होंगे।
कोलकाता की प्रसिद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘रेड रोड’ की कहानी पिछले कुछ सालों में पूरी तरह बदल गई है। साल 2011 से 2025 तक, ममता बनर्जी के शासनकाल में इस सड़क का नजारा कुछ अलग ही होता था। मुस्लिम वोट बैंक को साधने और तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इस मुख्य VIP कॉरिडोर को ईद की नमाज के लिए घंटों तक पूरी तरह बंद कर दिया जाता था।
खुद ममता बनर्जी हर साल इस मंच पर मौजूद रहती थीं, जिसके कारण एम्बुलेंस से लेकर दमकल विभाग जैसी आपातकालीन सेवाएँ और दफ्तर जाने वाले आम लोग भीषण ट्रैफिक जाम में फँसे रहते थे। ब्रिटिश काल की यह ऐतिहासिक सड़क, जो कभी द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाकू विमानों की लैंडिंग के काम आती थी, उसे प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर एक तरह से बँधक बना दिया जाता था और शहरी व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती थी।
लेकिन साल 2026 में राज्य की सत्ता बदलते ही एक नई तस्वीर सामने आई। 1978 के बाद और 107 साल बाद रेड रोड पर नमाज अदा नहीं हुई। शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली BJP सरकार ने कानून और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता दी। शुभेंदु सरकार ने एक बड़ा और व्यावहारिक फैसला लेते हुए ईद की मुख्य नमाज को रेड रोड से हटाकर पास के खुले ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शिफ्ट कर दिया, जिससे सालों बाद इस पर्व पर रेड रोड पूरी तरह खाली और चालू रही।
For the first time, Calcutta’s important Red Road isn’t blocked for Namaz on Eid. pic.twitter.com/OwqoWqM3mN
प्रशासन के इस कदम को कुछ मजहबी नेताओं ने भी सराहा क्योंकि नमाजियों को अब ज्यादा खुली जगह मिली और शहर की लाइफलाइन बिना किसी रुकावट के दौड़ती रही। यह बदलाव साफ दिखाता है कि कैसे एक तरफ सालों तक मजहब और सियासत को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ सूझबूझ से धार्मिक आस्था का सम्मान भी हुआ और कोलकाता के आम नागरिकों को घंटों लंबे जाम से हमेशा के लिए आजादी मिल गई।
WHEN RELIGION ISN’T PUT ON A PEDESTAL ABOVE THE LAW. Eid prayers offered in government mandated Kolkata Bridage Parade Ground and NOT on the RED ROAD for the first time in a very long time. pic.twitter.com/Bvvot33MWw
साल-दर-साल का इतिहास: ममता बनर्जी सरकार में कैसे ठप रहती थी व्यवस्था (2011 से 2025)
2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए मुस्लिम समर्थकों को रिझाना शुरू किया। इन शुरुआती सालों में रेड रोड पर ईद की नमाज के भव्य आयोजन को सरकारी संरक्षण मिलना शुरू हुआ। मुख्यमंत्री खुद हर साल नमाज के मंच पर उपस्थित रहने लगीं। इस दौरान उत्तर और दक्षिण कोलकाता को जोड़ने वाली इस मुख्य सड़क को घंटों बंद रखा जाने लगा, जिससे आपातकालीन सेवाएँ और आम जनता परेशान होने लगी, लेकिन सरकार ने इसे परंपरा का नाम देकर जारी रखा। अब हम सिलसिलेवार तरीके से तस्वीरों को देखते हैं।
यह तस्वीर साल 2013 की है। जब कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों ने ईद पर नमाज अदा की।
साल 2013 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर (फोटो साभार: Rangan Datta)
यह तस्वीर साल 2014 की है। ममता बनर्जी की सरकार ने कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों के लिए सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया था।
साल 2014 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2015 की है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद ईद पर वहाँ उपस्थित थीं। ममता बनर्जी ने X पर पोस्ट कर लिखा, “आज सुबह मैंने रेड रोड पर ईद की नमाज अदा की।”
यह तस्वीर साल 2016 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद के दौरान नमाजियों ने नमाज अदा की।
साल 2016 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2017 की है। कोलकाता में 25,000 से ज्यादा मुसलमान नमाज अदा करने के लिए रेड रोड पर सबसे बड़ी जमात में इकट्ठा हुए थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस जश्न में हिस्सा लेने पहुँची थीं।
साल 2017 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2018 की है। कोलकाता के रेड रोड से ममता बनर्जी ने मंच से संदेश दिया था। रमजान के महीने में रोजा भी रखा था। ममता बनर्जी ने खुद X पर पोस्ट कर लिखा, “यह ईद खुशियाँ और सर्वशक्तिमान का असीम आशीर्वाद लेकर आए। ईद मुबारक”
साल 2018 की तस्वीर। मंच से नमाजियों को ममता बनर्जी संबोधित करते हुए
यह तस्वीर साल 2019 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फितर के अवसर पर नमाज अदा करते मुस्लिम इकट्ठा हुए थे। तस्वीर में देख सकते हैं कि पूरी रोड को जाम कर किस प्रकार ईद मनाया जा रहा था।
साल 2019 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
साल 2020 और 2021 में कोरोना काल के दौरान लोगों को एकत्रित होने के लिए सख्त मनाही थी। जिस कारण कोलकाता की रेड रोड पर नमाज के लिए परमिशन नहीं मिली थी। फिर साल 2022 में दोबारा इस रोड पर नमाज अदा की गई। ममता ने रेड रोड पर ईद के मौके पर आयोजित सामूहिक नमाज को संबोधित किया था।
साल 2022 की तस्वीर, ममता बनर्जी ईद पर नमाजियों को संबोधित करते हुए
यह तस्वीर साल 2023 की है। कलकत्ता खिलाफत कमेटी ने रेड रोड पर ईद-उल-अजहा की नमाज अदा करने के लिए ईस्टर्न कमांड और राज्य सरकार को एक चिट्ठी लिखकर खुले में नमाज अदा की इजाजत माँगी थी, जिससे ममता सरकार ने स्वीकार किया था। इस तस्वीर में देख सकते हैं कि कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में मुस्लिम एकत्रित हो रखे हैं।
साल 2023 की तस्वीर, ममता बनर्जी की सरकार में रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए
यह तस्वीर साल 2024 की है। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी कोलकाता की रेड रोड पर ईद-उल-फितर की नमाज में नमाजियों को संबोधित करते हुए।
साल 2024 की तस्वीर, ममता बनर्जी और भतीजा अभिषेक बनर्जी
यह तस्वीर साल 2025 की है। कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में एक कतार में ईद के दिन नमाज अदा करते हुए।
साल 2025 की तस्वीर, कोलकाता के रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए
दोनों सरकारों के बीच का बड़ा अंतर: तुष्टिकरण बनाम कानून का शासन
ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की सरकार के कामकाज के तरीके में यह साफ अंतर दिखाता है कि कैसे एक तरफ मजहब और वोट बैंक को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधार को प्राथमिकता दी गई।
ममता सरकार के दौरान कानून और शहरी व्यवस्था को ताक पर रखकर केवल मुस्लिम समर्थकों को खुश करने की राजनीति की गई। एक बेहद संवेदनशील, सैन्य महत्व वाली और मुख्य यातायात सड़क को घंटों ब्लॉक करके नमाज अदा करवाई जाती थी, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय में यह संदेश जाए कि सरकार उनके लिए प्रशासनिक नियमों को भी बदल सकती है।
वहीं वर्तमान में शुभेंदु सरकार के सत्ता में आते ही यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कानून और नागरिक सुविधाएँ किसी भी धार्मिक आयोजन से ऊपर हैं। सरकार ने परंपरा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता निकाला और नमाज को पास के ही बड़े मैदान (ब्रिगेड परेड ग्राउंड) में शिफ्ट कर दिया। इससे नमाजियों को भी ज्यादा जगह मिली और शहर की जीवनरेखा ‘रेड रोड’ भी एंबुलेंस, दमकल और आम जनता के लिए पूरी तरह खुली रही।
यह बदलाव दिखाता है कि जब सरकारें तुष्टिकरण की जगह कानून के शासन और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता देती हैं, तो धार्मिक परंपराओं की पवित्रता भी बनी रहती है और शहर की सामान्य जिंदगी भी प्रभावित नहीं होती।
दोपहर का वक्त था। दरवाजे की घंटी बजी तो बाहर दो लोग मोबाइल और टैबलेट लिए खड़े थे। उन्होंने घर के कमरों की संख्या पूछी, फर्श पक्का है या कच्चा, टीवी-फ्रिज है या नहीं, बाइक और इंटरनेट की सुविधा है या नहीं सब कुछ नोट किया। लेकिन जब वे बिना परिवार के सभी लोगों की गिनती किए आगे बढ़ गए, तो घर वालों को लगा कि आखिर ये कैसी जनगणना है?
आपके पास भी अगर जनगणना वाले आएँ होंगे तो आपको भी ये कन्फ्यूजन होगा कि भई ये सब क्या हो रहा है? या जब आपके पास जनगणना वाले आएँगे तब आपको ये कन्फ्यूजन होना तय है, तो चलिए हम आपका सारा कन्फ्यूजन दूर कर देते हैं, उन सारे सवालों के जवाब देने की कोशिश करते हैं जो आपने मन में जनगणना को लेकर हों। बात शुरू से ही शुरू करते हैं।
दरअसल जनगणना 2027 की प्रक्रिया दो चरणों में होगी। पहले चरण में घर और उसमें मौजूद सुविधाओं की जानकारी जुटाई जाएगी, जबकि दूसरे चरण में परिवार के सदस्यों, उनकी शिक्षा, नौकरी, भाषा, जाति और दूसरी सामाजिक जानकारी दर्ज की जाएगी।
यही वजह है कि कई लोगों को शुरुआत में लग सकता है कि जनगणना वाले आए, टीवी-फ्रिज और मोटरसाइकिल गिनकर चले गए लेकिन लोगों के बारे में तो पूछा ही नहीं।
भारत में होने वाली जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना और आजादी के बाद की 8वीं जनगणना होगी। यह कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से कराया जाएगा। गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे जबकि आम लोगों को भी सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल के जरिए खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी।
यह जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसी डेटा के आधार पर सरकार यह तय करती है कि किस इलाके में सड़क, स्कूल, अस्पताल, पानी और दूसरी सुविधाओं की कितनी जरूरत है। संसद और विधानसभा सीटों का परिसीमन, SC-ST सीटों का आरक्षण और कई सरकारी योजनाओं का वितरण भी जनगणना के आँकड़ों पर आधारित होता है।
इस बार की जनगणना इसलिए भी सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की गणना की जाएगी। ऐसे में लोगों के मन में सवाल भी कई हैं, जनगणना वाले क्या पूछेंगे, क्या नहीं पूछेंगे और आखिर यह पूरी प्रक्रिया कैसे चलेगी।
जनगणना 2027 कितने चरणों में होगी और पूरा प्रोसेस क्या रहेगा
जनगणना 2027 को सरकार दो बड़े चरणों में पूरा करेगी। पहला चरण ‘हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस’ कहलाएगा, जबकि दूसरा चरण ‘पॉपुलेशन एन्यूमरेशन’ यानी आबादी की गणना का होगा।
पहला चरण अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 तक अलग-अलग राज्यों में चलेगा। इसमें गणनाकर्मी हर घर जाकर मकान और घर से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करेंगे। दूसरे चरण में फरवरी 2027 में लोगों की व्यक्तिगत जानकारी दर्ज की जाएगी।
पहले चरण में घर की स्थिति, मकान की दीवार, छत और फर्श किस चीज से बने हैं, कितने कमरे हैं, पानी और बिजली की सुविधा है या नहीं, शौचालय है या नहीं, खाना किस ईंधन से बनता है, मोबाइल, टीवी, इंटरनेट, वाहन जैसी सुविधाएँ हैं या नहीं इन सबकी जानकारी ली जाएगी।
दूसरे चरण में परिवार के हर सदस्य का नाम, उम्र, लिंग, शिक्षा, नौकरी, वैवाहिक स्थिति, धर्म, जाति, जन्म स्थान, माइग्रेशन और दिव्यांगता जैसी जानकारी दर्ज होगी। सरकार ने कहा है कि बेघर लोगों की भी अलग से गणना की जाएगी ताकि कोई छूट न जाए।
इस बार करीब 31 लाख गणनाकर्मी और सुपरवाइजर लगाए जाएँगे। सरकार का दावा है कि डिजिटल सिस्टम की वजह से डेटा जल्दी तैयार होगा और गलतियों की संभावना भी कम होगी।
पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी जनगणना, क्या-क्या बदल जाएगा
जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी डिजिटल जनगणना होगी। इससे पहले 2011 की जनगणना कागज पर हुई थी, जिसमें डेटा प्रोसेस करने में कई साल लग गए थे। अब गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए सीधे जानकारी अपलोड करेंगे। इससे डेटा तुरंत सर्वर तक पहुँचेगा और सरकार रियल टाइम में निगरानी कर सकेगी।
सरकार ने एक खास डिजिटल सिस्टम तैयार किया है, जिसमें मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, GPS मैपिंग और लाइव मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। गणनाकर्मी अगर कोई गलत जानकारी दर्ज करेंगे, जैसे किसी बच्चे की उम्र माता-पिता से ज्यादा लिख देना या परिवार के सदस्यों की संख्या असामान्य होना, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट देगा। इससे गलतियाँ कम होंगी।
इस बार GPS और जियोफेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल भी होगा। इससे यह पता चलेगा कि कौन-सा इलाका कवर हो चुका है और कौन-सा नहीं। इससे किसी घर या इलाके के छूटने की संभावना कम हो जाएगी।
सरकार ने यह भी कहा है कि डेटा सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। लोगों की जानकारी सुरक्षित रखने के लिए मजबूत डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है। ऑनलाइन सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, ताकि अलग-अलग राज्यों के लोग आसानी से अपनी जानकारी भर सकें।
सेल्फ-एन्यूमरेशन क्या है और लोग खुद कैसे भर सकेंगे जानकारी
जनगणना 2027 में पहली बार लोगों को खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी। इसे सेल्फ-एन्यूमरेशन कहा गया है। इसके लिए सरकार ने एक ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल आधारित सिस्टम तैयार किया है।
कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल नंबर से लॉगिन करके अपने परिवार की जानकारी खुद भर सकेगा। इस प्रक्रिया में सबसे पहले व्यक्ति पोर्टल पर लॉगिन करेगा, फिर मैप पर अपना स्थान चुनेगा और उसके बाद परिवार और घर से जुड़ी जानकारी भरेगा।
सारी जानकारी जमा करने के बाद उसे एक यूनिक सेल्फ-एन्यूमरेशन ID मिलेगी। जब गणनाकर्मी घर आएँगे, तब केवल इस ID को दिखाना होगा और वे जानकारी सत्यापित कर देंगे।
सरकार का कहना है कि इससे लोगों को सुविधा मिलेगी और समय की बचत होगी। खासकर शहरों में रहने वाले नौकरीपेशा लोग या ऐसे परिवार जो दिन में घर पर नहीं रहते, वे पहले से अपनी जानकारी भर सकेंगे।
हालाँकि, सेल्फ-एन्यूमरेशन पूरी तरह अनिवार्य नहीं है। अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन जानकारी नहीं भरना चाहता, तो गणनाकर्मी पहले की तरह घर-घर जाकर जानकारी दर्ज करेंगे। सरकार का कहना है कि डिजिटल और पारंपरिक दोनों व्यवस्था साथ-साथ चलेंगी ताकि कोई व्यक्ति छूट न जाए।
जनगणना के दौरान लोगों से कौन-कौन से सवाल पूछे जाएँगे
जनगणना 2027 के पहले चरण में कुल 34 सवाल पूछे जाएँगे। ये सवाल मुख्य रूप से मकान, सुविधाओं और घरेलू सामान से जुड़े होंगे। इसमें बिल्डिंग नंबर, घर नंबर, मकान की छत, दीवार और फर्श किस सामग्री से बने हैं, घर की स्थिति कैसी है और उसमें कितने लोग रहते हैं, जैसी जानकारी ली जाएगी।
इसके अलावा घर में कितने कमरे हैं, कितने शादीशुदा जोड़े रहते हैं, पीने का पानी कहाँ से आता है, बिजली की व्यवस्था कैसी है, शौचालय और नहाने की सुविधा है या नहीं ये सवाल भी शामिल हैं। खाना बनाने के लिए LPG, PNG या लकड़ी जैसे किस ईंधन का इस्तेमाल होता है, इसकी भी जानकारी ली जाएगी। इसमें जाति से जुड़ा केवल यह प्रश्न होगा कि घर के मुखिया की जाति क्या है।
फोटो साभार: PIB
घरेलू सुविधाओं से जुड़े सवालों में TV, रेडियो, इंटरनेट, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, बाइक, कार जैसी चीजों की जानकारी भी माँगी जाएगी। सरकार यह जानना चाहती है कि देश में कितने लोगों तक आधुनिक सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं।
एक दिलचस्प सवाल यह भी होगा कि परिवार मुख्य रूप से कौन-सा अनाज खाता है। इसके साथ मोबाइल नंबर भी दर्ज किया जाएगा ताकि जरूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके। इन सवालों के जरिए सरकार देश के लोगों की जीवनशैली और बुनियादी सुविधाओं की असली तस्वीर समझ पाएगी।
जनगणना से जुड़े पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब
जनगणना क्या है?
जनगणना यानी देश में रहने वाले हर व्यक्ति और हर घर की गिनती करने की सरकारी प्रक्रिया। इसमें लोगों से नाम, उम्र, शिक्षा, नौकरी, भाषा, परिवार, घर और सुविधाओं जैसी जानकारी ली जाती है।
यह काम सरकार तय समय पर करती है ताकि देश की आबादी, लोगों की स्थिति और जरूरतों का सही आंकड़ा मिल सके। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार योजनाएँ बनाती है और लोगों की सुविधा के लिए योजना तैयार करती है। भारत में आमतौर पर हर 10 साल में होती है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। 2021 में होनी थी लेकिन कोरोना के कारण टल गई।
अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर शहर में रहने लगा है, तो जनगणना में उसकी गिनती कहाँ होगी? क्या किराये या झुग्गी में रहने वालों की भी गिनती होगी?
जनगणना में किसी व्यक्ति की गिनती वहीं की जाती है जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा होता है। अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर दिल्ली, मुंबई या किसी दूसरे शहर में नौकरी, मजदूरी या पढ़ाई के लिए रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में होगी।
एक व्यक्ति की गिनती सिर्फ एक ही जगह होती है, गाँव और शहर दोनों जगह नहीं। भले ही उसका नाम गाँव के राशन कार्ड या वोटर लिस्ट में हो, फिर भी जनगणना में वही स्थान माना जाएगा जहाँ वह उस समय रह रहा है।
कुछ इस तरह नक्शा बना रहे जनगणना करने वाले
बाहर काम करने वाले मजदूरों, किराये पर रहने वालों और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों की भी जनगणना में पूरी गिनती की जाएगी, ताकि कोई भी व्यक्ति छूट न जाए।
बेघर लोगों की गिनती कैसे होगी?
जनगणना में बेघर लोगों की भी अलग से गिनती की जाती है। इसके लिए सरकारी कर्मचारी रात के समय सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, फुटपाथों, मंदिरों या खुले स्थानों पर जाकर उन लोगों की जानकारी दर्ज करते हैं, जिनके पास रहने के लिए पक्का घर नहीं होता। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी व्यक्ति जनगणना से छूट न जाए।
क्या इस बार जनगणना मोबाइल ऐप से होगी, क्या आधार जरूरी होगा और इसमें कौन-कौन सी जानकारी पूछी जाएगी?
इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से कराने की तैयारी है। अधिकारी मोबाइल ऐप के जरिए जानकारी दर्ज करेंगे और लोगों को सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी खुद अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी मिल सकता है।
जनगणना के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। NRC और जनगणना दोनों अलग प्रक्रियाएँ हैं, क्योंकि जनगणना का मुख्य उद्देश्य आबादी और सामाजिक जानकारी जुटाना होता है, नागरिकता तय करना नहीं।
जनगणना के दौरान धर्म, शिक्षा, नौकरी और परिवार से जुड़ी जानकारी पूछी जा सकती है। घर में कितने कमरे हैं, मकान की स्थिति और सुविधाओं से जुड़े सवाल भी पहले चरण में पूछे जाते हैं। बैंक बैलेंस सीधे नहीं पूछा जाता लेकिन काम-धंधे और जीवन स्तर से जुड़ी जानकारी लिया जाता है।
अगर कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता है तो क्या ये मुमकिन है?
जनगणना में किसी भी नागरिक की जाति बताना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता, तो उसे अवर्गीकृत (अनक्लासिफाइड) या जाति-विहीन के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
क्या जनगणना का असर आरक्षण पर पड़ेगा?
जनगणना का सीधे तौर पर आरक्षण पर असर नहीं पड़ेगा यानी जो अभी आरक्षण मिल रहा है वही मिलता रहेगा। हालाँकि, जाति आधारित आँकड़े सामने आने से आरक्षण के प्रतिशत और उसकी सीमा में बदलाव की माँग तेज हो सकती है। राजनीतिक दल और आम लोग आरक्षण में बदलाव की माँग कर सकते हैं।
क्या जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होगा?
हाँ, आगामी जनगणना पूरी होने के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) किया जाना तय है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के अनुसार, हर नई जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों के पुनर्गठन के लिए संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम पारित किया जाता है।
दक्षिण भारत में लोग परिसीमन को लेकर क्यों चर्चा कर रहे हैं?
कुछ राज्यों में आबादी नियंत्रण बेहतर रहा है, इसलिए सीटों के बँटवारे को लेकर राजनीतिक चर्चा चल रही है।
क्या जनगणना से सरकारी योजनाएँ तय होती हैं?
हाँ, कई योजनाओं में जनसंख्या से जुड़ी जानकारी और डेटा काम आता है।
क्या जनगणना में गलत जानकारी देने पर कार्रवाई हो सकती है?
हाँ, जनगणना में जानबूझकर गलत जानकारी देना या सही जानकारी छिपाना एक कानूनन अपराध है। जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act 1948) के तहत ऐसा करने वाले व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है या जेल की सजा भी हो सकती है।
क्या जनगणना का डेटा सार्वजनिक होगा?
व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रखी जाती है, लेकिन कुल आँकड़े जारी किए जाते हैं।
क्या जनगणना में फोन नंबर पूछा जाएगा?
हाँ, संपर्क करने के लिए माँगा जाता है।
क्या विदेश में रहने वाले भारतीयों की गिनती होगी?
हाँ, विदेश में रहने वाले भारतीयों की भी आधिकारिक तौर पर गिनती होती है। विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी प्रवासी भारतीयों की आबादी के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में फैले अनिवासी भारतीयों (NRIs) और भारतीय मूल के लोगों (PIOs) की सटीक संख्या का ट्रैक रखा जाता है।
अगर कोई छात्र दूसरे शहर में पढ़ रहा है तो उसकी गिनती कहाँ होगी?
जनगणना के नियमों के अनुसार, यदि कोई छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में की जाएगी जहाँ वह वर्तमान में रहकर पढ़ाई कर रहा है। जनगणना में व्यक्ति के ‘सामान्य निवास स्थान’ (जहाँ वह अधिकांश समय रहता है) को आधार माना जाता है।
अगर परिवार का कोई सदस्य बाहर कमाने गया है?
उसकी मौजूदगी और रहने की स्थिति के हिसाब से जानकारी दर्ज होती है।
क्या ऑनलाइन फॉर्म भरने के बाद अधिकारी फिर आएँगे?
हाँ, आएँगे और उन्हें आप वो ID नंबर देंगे जिस के जरिए आप ने जानकारी भारी है। जिसका वो मिलान करेंगे।
क्या जनगणना में भाषा भी पूछी जाएगी?
हाँ, जनगणना में भाषा संबंधी जानकारी मुख्य रूप से पूछी जाएगी। जनगणना फॉर्म में आपसे आपकी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य ज्ञात भाषाओं (जिन भाषाओं को आप बोल, समझ या लिख सकते हैं) का विवरण भी लिया जाएगा।
क्या जनगणना से पता चलेगा कि किस जाति की आबादी कितनी है?
हाँ, आने वाली राष्ट्रीय जनगणना से यह पता चल जाएगा कि किस जाति की आबादी कितनी है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित आगामी जनगणना में जातिगत गणना (Caste Census) को शामिल किया गया है।
क्या पहली बार जाति गणना हो रही है?
नहीं, जाति गणना पहली बार नहीं हो रही है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1931 में देश में अंतिम बार विस्तृत जाति आधारित जनगणना जारी की गई थी। इसके बाद, आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में पहली बार पूर्ण जाति आधारित जनगणना की जा रही है।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1881 से 1931 तक जनगणना में जाति गणना एक नियमित प्रक्रिया थी जबकि वर्ष 1941 की जनगणना में भी जातिगत जानकारी एकत्र की गई थी। हालाँकि, द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया गया।
वर्ष 1951 की जनगणना से लेकर अब तक जाति गणना केवल SC और ST के लिए की जाती रही है, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अन्य जाति समूहों पर कोई विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है।
क्या हर राज्य में एक साथ जनगणना होगी?
नहीं, हर राज्य में जनगणना एक ही समय पर पूरी तरह से एक साथ नहीं होती भारत की जनगणना 2026-27 दो चरणों में हो रही है, जिसे राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अवधि के अंदर किया जाता है।
क्या जनगणना में लोगों को उनके काम या पेशे के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है, जैसे आम नागरिक, सेना के जवान, डॉक्टर, शिक्षक आदि?
हाँ, भारतीय जनगणना में लोगों को उनके काम और पेशे (आक्यूपेशन) के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में बाँटा जाता है। जनगणना के दौरान लोगों से उनके काम (जैसे टीचर, डॉक्टर, सेना आदि) के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है
अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन शहर में नौकरी करता है तो गिनती कहाँ होगी?
अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन नौकरी या पढ़ाई के कारण शहर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी गिनती वहीं होगी जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा है। यानी जिस जगह वह ज्यादातर समय बिताता है, उसी स्थान की आबादी में उसे शामिल किया जाएगा।
अगर कोई व्यक्ति जनगणना अधिकारी बनकर घर आए, तो असली और नकली अधिकारी की पहचान कैसे करें?
अगर कोई व्यक्ति जनगणना के नाम पर घर आए, तो सबसे पहले उसका सरकारी ID कार्ड और नियुक्ति पत्र जरूर देखें। असली अधिकारी के पास सरकारी पहचान पत्र, मोहर और अक्सर जनगणना/NPR वाली जैकेट या कैप होती है।
ध्यान रखें कि जनगणना में सिर्फ सामान्य जानकारी पूछी जाती है, जैसे परिवार, उम्र और घर से जुड़े सवाल। अगर कोई बैंक डिटेल, ATM PIN या पासवर्ड माँगे, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ। शक होने पर नजदीकी पुलिस या 112 नंबर पर सूचना दें।
क्या जनगणना से बेरोजगारी का अंदाजा लगेगा?
हाँ, जनगणना में लोगों के कामकाज और रोजगार से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कितने लोग नौकरी कर रहे हैं, कितने बेरोजगार हैं और कितने लोग किस तरह के काम में लगे हुए हैं। इन आँकड़ों के आधार पर सरकार देश में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति का अंदाजा लगाती है।
क्या वोटर आईडी का पता ही माना जाएगा और बिना दस्तावेज वाले लोगों की भी गिनती होगी?
जनगणना में सिर्फ वोटर आईडी या किसी एक दस्तावेज का पता ही अंतिम नहीं माना जाता, बल्कि व्यक्ति वास्तव में जहाँ रह रहा होता है उसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। अगर कोई व्यक्ति साल का कुछ समय गाँव और कुछ समय शहर में बिताता है, तो आमतौर पर जनगणना के समय वह जहाँ रह रहा होगा, उसी जगह उसकी गिनती की जाती है।
किरायेदार और मकान मालिक दोनों की अलग-अलग गिनती होती है, क्योंकि घर में रहने वाले हर व्यक्ति को शामिल किया जाता है। वहीं अगर किसी के पास आधार, राशन कार्ड या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज नहीं भी हैं, तब भी उसकी जनगणना में गिनती हो सकती है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य देश की पूरी आबादी का रिकॉर्ड तैयार करना होता है।
क्या PG और हॉस्टल में रहने वालों की अलग सूची बनेगी?
हाँ, आमतौर पर PG, हॉस्टल, छात्रावास, धर्मशाला, जेल, सेना कैंप, वृद्धाश्रम जैसी जगहों पर रहने वालों की अलग तरीके से गिनती की जाती है। जनगणना में इन्हें अक्सर संस्थागत परिवार (Institutional Household) की श्रेणी में रखा जाता है। यानी ऐसे लोग जो किसी सामान्य परिवार की तरह घर में नहीं, बल्कि किसी संस्था या सामूहिक जगह पर रह रहे हों।
अगर जनगणना के समय घर बंद मिला या कोई जानकारी देने से मना कर दे तो क्या होगा?
अगर जनगणना कर्मचारी जब घर पहुँचे और उस समय घर बंद मिले, तो आमतौर पर बाद में दोबारा आने की कोशिश की जाती है ताकि सही जानकारी दर्ज हो सके। वहीं अगर कोई व्यक्ति जानकारी देने से मना करता है।
तो कर्मचारी उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि जनगणना एक राष्ट्रीय प्रक्रिया है और इसका मकसद सिर्फ देश की आबादी, सुविधाओं और सामाजिक स्थिति से जुड़ा डेटा जुटाना होता है। इसलिए लोगों से सही जानकारी देकर सहयोग करने की अपील की जाती है।
क्या जनगणना में जनजातीय इलाकों और LGBTQ समुदाय के लिए अलग व्यवस्था हो सकती है?
हाँ, जनगणना के दौरान दूरदराज, पहाड़ी और जनजातीय इलाकों तक पहुँचने के लिए विशेष टीमें और अलग व्यवस्था की जाती है ताकि वहाँ रहने वाले लोगों की गिनती छूटे नहीं। कई बार स्थानीय भाषा और इलाके को समझने वाले कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है।
वहीं LGBTQ समुदाय को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं। पहले की जनगणना में थर्ड जेंडर का विकल्प जोड़ा जा चुका है, इसलिए इस बार भी ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक पहचान रखने वाले लोगों की अलग पहचान दर्ज की जा सकती है, ताकि उनकी आबादी और सामाजिक स्थिति से जुड़ा सही डेटा सामने आ सके।
बकरीद को देखते हुए देश के अलग-अलग राज्यों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। स्थिति देखते हुए कहीं पर सड़कों पर नमाज पढ़ने से साफ मना किया गया है, कहीं खुले में कु्र्बानी देने से मना किया गया है तो कहीं पर पहले ही दंगा नियंत्रण बल की तैनाती कर दी गई है।
ये तैयारी सामान्य त्योहारों की तैयारी से इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई बार इस त्योहार को मनाने के नाम पर देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाएँ आहत करने का काम होता है। ऐसे में सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द, कानून-व्यवस्था और स्वच्छता को बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि त्योहार से पहले प्रशासन को कई कड़े नियम लागू करने पड़ते हैं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होते हैं।
बकरीद के दिन दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार से लेकर बंगाल-असम तक में सुरक्षाबल की तैनाती की गई है। कहाँ-क्या व्यवस्था है और सरकार ने क्या निर्देश दिए हैं आइए जानते हैं-
बंगाल में कुर्बानी और नमाज को लेकर सख्ती
बकरीद पर बंगाल इस बार काफी बदला नजर आ रहा है। शुभेंदु सरकार के 1950 के पशु वध नियंत्रण अधिनियम को सख्ती से लागू करने के बाद सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने पर सख्त मनाही है। तय बुचड़खानों में ही पशुओं को काटा जा सकता है।
सड़क किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर नहीं। सड़कों पर नमाज नहीं पढ़ने को लेकर पहले ही आदेश जारी किया जा चुका है। यहाँ तक कि कोलकात केरेड रोड पर होने वाला नमाज भी इस बार नहीं होगा। इसकी जगह बदल दी गई है। ये वही जगह है, जहाँ पूर्व सीएम ममता बनर्जी 2011 से हर साल बकरीद में आया करती थी और अपने वोट बैंक को संबोधित करती थी। इस बार वह ऐसा नहीं कर पाएँगी।
The first ever Eid when Calcutta's important Red Road isn't blocked for Namaz. pic.twitter.com/nbGDNZj6Mk
— Sudhanidhi Bandyopadhyay (@SudhanidhiB) May 28, 2026
असम में बकरीद पर व्यवस्था
असम सरकार ने बकरीद पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने, सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करने और मवेशियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। राज्य में गाय की कुर्बानी पर सख्त रोक है। असम कैटल प्रिजर्वेशन एक्ट 2021 में गाय और प्रतिबंधित मवेशियों की कुर्बानी पर रोक लगा दिया गया था। इसको देखते हुए कई ईदगाह कमिटियों ने आगे आकर गाय की कुर्बानी नहीं करने का आग्रह किया है। राज्य में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ईदगाह समितियों के इस फैसले का स्वागत किया है और मुस्लिम समुदाय से मौजूदा कानूनों का पालन करने और शांतिपूर्ण तरीके से त्योहार मनाने की अपील की है।
उत्तर प्रदेश में बकरीद पर नजारा
उत्तर प्रदेश सरकार ने बकरीद पर शांति, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। व्यापक इंतजाम किए हैं।योगी सरकार ने पहले ही सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है। जगह तय किए गए हैं, वहीं नमाज अता किए जाएँगे। सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने की भी मनाही है। गोवंश और दूसरे प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है। कुर्बानी के बाद बुचड़खानों की साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि गंदगी न फैले।
#WATCH | Ayodhya, Uttar Pradesh: On tight security arrangements during Eid al-Adha prayers being held at Ayodhya Eidgah, SSP Ayodhya, Dr Gaurav Grover, says, “Tight security arrangements have been done for all the places where namaz is being offered. Under the supervision of… pic.twitter.com/bEqVB7yuwD
बकरा ईद पर सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ-साथ पैरामिलिट्री फोर्सेस को भी ग्राउंड पर उतारा गया है। दरअसल हाल ही में भारत-अफ्रीका फोरम समिट के टलने के कारण राजधानी में तैनात की गई पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियों को अब दिल्ली के अलग-अलग जिलों में सुरक्षा के मद्देनजर सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात किया गया है। विशेषकर उन इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे गए हैं, जो सांप्रदायिक या धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।
#WATCH | Delhi Police monitors the city using drones in the national capital on the occasion of Eid al-Adha. The police force has also been deployed to maintain security; visuals from the Jahangir Puri PS area
जम्मू-कश्मीर में बकरीद के दौरान शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के बेहद कड़े और व्यापक इंतजाम किए गए हैं। प्रमुख मस्जिदों, संवेदनशील इलाकों और बाजारों में अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है ताकि पर्व शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।ईदगाहों और हजरतबल दरगाह, जामिया मस्जिद जैसे जगहों के आसपास सुरक्षा का विशेष घेरा बनाया गया है, ताकि नमाजियों को कोई असुविधा न हो।
महाराष्ट्र- बिहार में सुरक्षा इंतजाम
महाराष्ट्र में जगह जगह पर पुलिस तैनात हैं, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो, वही बिहार में पुलिस हाई अलर्ट पर है। दंगा नियंत्रण बल के जवानों को भी तैनात किया गया है। ड्रोन से निगरानी की जा रही है और सोशल मीडिया पर नजर रखी जा रही है। अधिकारियों ने असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए सख्त इंतजाम कर लिए हैं।