कोलकाता की प्रसिद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘रेड रोड’ की कहानी पिछले कुछ सालों में पूरी तरह बदल गई है। साल 2011 से 2025 तक, ममता बनर्जी के शासनकाल में इस सड़क का नजारा कुछ अलग ही होता था। मुस्लिम वोट बैंक को साधने और तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इस मुख्य VIP कॉरिडोर को ईद की नमाज के लिए घंटों तक पूरी तरह बंद कर दिया जाता था।
खुद ममता बनर्जी हर साल इस मंच पर मौजूद रहती थीं, जिसके कारण एम्बुलेंस से लेकर दमकल विभाग जैसी आपातकालीन सेवाएँ और दफ्तर जाने वाले आम लोग भीषण ट्रैफिक जाम में फँसे रहते थे। ब्रिटिश काल की यह ऐतिहासिक सड़क, जो कभी द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाकू विमानों की लैंडिंग के काम आती थी, उसे प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर एक तरह से बँधक बना दिया जाता था और शहरी व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती थी।
लेकिन साल 2026 में राज्य की सत्ता बदलते ही एक नई तस्वीर सामने आई। 1978 के बाद और 107 साल बाद रेड रोड पर नमाज अदा नहीं हुई। शुभेंदु अधिकारी की अगुवाई वाली BJP सरकार ने कानून और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता दी। शुभेंदु सरकार ने एक बड़ा और व्यावहारिक फैसला लेते हुए ईद की मुख्य नमाज को रेड रोड से हटाकर पास के खुले ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शिफ्ट कर दिया, जिससे सालों बाद इस पर्व पर रेड रोड पूरी तरह खाली और चालू रही।
For the first time, Calcutta’s important Red Road isn’t blocked for Namaz on Eid. pic.twitter.com/OwqoWqM3mN
प्रशासन के इस कदम को कुछ मजहबी नेताओं ने भी सराहा क्योंकि नमाजियों को अब ज्यादा खुली जगह मिली और शहर की लाइफलाइन बिना किसी रुकावट के दौड़ती रही। यह बदलाव साफ दिखाता है कि कैसे एक तरफ सालों तक मजहब और सियासत को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ सूझबूझ से धार्मिक आस्था का सम्मान भी हुआ और कोलकाता के आम नागरिकों को घंटों लंबे जाम से हमेशा के लिए आजादी मिल गई।
WHEN RELIGION ISN’T PUT ON A PEDESTAL ABOVE THE LAW. Eid prayers offered in government mandated Kolkata Bridage Parade Ground and NOT on the RED ROAD for the first time in a very long time. pic.twitter.com/Bvvot33MWw
साल-दर-साल का इतिहास: ममता बनर्जी सरकार में कैसे ठप रहती थी व्यवस्था (2011 से 2025)
2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए मुस्लिम समर्थकों को रिझाना शुरू किया। इन शुरुआती सालों में रेड रोड पर ईद की नमाज के भव्य आयोजन को सरकारी संरक्षण मिलना शुरू हुआ। मुख्यमंत्री खुद हर साल नमाज के मंच पर उपस्थित रहने लगीं। इस दौरान उत्तर और दक्षिण कोलकाता को जोड़ने वाली इस मुख्य सड़क को घंटों बंद रखा जाने लगा, जिससे आपातकालीन सेवाएँ और आम जनता परेशान होने लगी, लेकिन सरकार ने इसे परंपरा का नाम देकर जारी रखा। अब हम सिलसिलेवार तरीके से तस्वीरों को देखते हैं।
यह तस्वीर साल 2013 की है। जब कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों ने ईद पर नमाज अदा की।
साल 2013 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर (फोटो साभार: Rangan Datta)
यह तस्वीर साल 2014 की है। ममता बनर्जी की सरकार ने कोलकाता के रेड रोड पर नमाजियों के लिए सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया था।
साल 2014 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2015 की है, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद ईद पर वहाँ उपस्थित थीं। ममता बनर्जी ने X पर पोस्ट कर लिखा, “आज सुबह मैंने रेड रोड पर ईद की नमाज अदा की।”
यह तस्वीर साल 2016 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद के दौरान नमाजियों ने नमाज अदा की।
साल 2016 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2017 की है। कोलकाता में 25,000 से ज्यादा मुसलमान नमाज अदा करने के लिए रेड रोड पर सबसे बड़ी जमात में इकट्ठा हुए थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस जश्न में हिस्सा लेने पहुँची थीं।
साल 2017 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
यह तस्वीर साल 2018 की है। कोलकाता के रेड रोड से ममता बनर्जी ने मंच से संदेश दिया था। रमजान के महीने में रोजा भी रखा था। ममता बनर्जी ने खुद X पर पोस्ट कर लिखा, “यह ईद खुशियाँ और सर्वशक्तिमान का असीम आशीर्वाद लेकर आए। ईद मुबारक”
साल 2018 की तस्वीर। मंच से नमाजियों को ममता बनर्जी संबोधित करते हुए
यह तस्वीर साल 2019 की है। कोलकाता के रेड रोड पर ईद-उल-फितर के अवसर पर नमाज अदा करते मुस्लिम इकट्ठा हुए थे। तस्वीर में देख सकते हैं कि पूरी रोड को जाम कर किस प्रकार ईद मनाया जा रहा था।
साल 2019 में ममता बनर्जी की सरकार में नमाज अदा करने की तस्वीर
साल 2020 और 2021 में कोरोना काल के दौरान लोगों को एकत्रित होने के लिए सख्त मनाही थी। जिस कारण कोलकाता की रेड रोड पर नमाज के लिए परमिशन नहीं मिली थी। फिर साल 2022 में दोबारा इस रोड पर नमाज अदा की गई। ममता ने रेड रोड पर ईद के मौके पर आयोजित सामूहिक नमाज को संबोधित किया था।
साल 2022 की तस्वीर, ममता बनर्जी ईद पर नमाजियों को संबोधित करते हुए
यह तस्वीर साल 2023 की है। कलकत्ता खिलाफत कमेटी ने रेड रोड पर ईद-उल-अजहा की नमाज अदा करने के लिए ईस्टर्न कमांड और राज्य सरकार को एक चिट्ठी लिखकर खुले में नमाज अदा की इजाजत माँगी थी, जिससे ममता सरकार ने स्वीकार किया था। इस तस्वीर में देख सकते हैं कि कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में मुस्लिम एकत्रित हो रखे हैं।
साल 2023 की तस्वीर, ममता बनर्जी की सरकार में रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए
यह तस्वीर साल 2024 की है। तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी कोलकाता की रेड रोड पर ईद-उल-फितर की नमाज में नमाजियों को संबोधित करते हुए।
साल 2024 की तस्वीर, ममता बनर्जी और भतीजा अभिषेक बनर्जी
यह तस्वीर साल 2025 की है। कोलकाता की रेड रोड पर हजारों की संख्या में एक कतार में ईद के दिन नमाज अदा करते हुए।
साल 2025 की तस्वीर, कोलकाता के रेड रोड पर नमाज अदा करते हुए
दोनों सरकारों के बीच का बड़ा अंतर: तुष्टिकरण बनाम कानून का शासन
ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की सरकार के कामकाज के तरीके में यह साफ अंतर दिखाता है कि कैसे एक तरफ मजहब और वोट बैंक को कानून से ऊपर रखा गया, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक सुधार को प्राथमिकता दी गई।
ममता सरकार के दौरान कानून और शहरी व्यवस्था को ताक पर रखकर केवल मुस्लिम समर्थकों को खुश करने की राजनीति की गई। एक बेहद संवेदनशील, सैन्य महत्व वाली और मुख्य यातायात सड़क को घंटों ब्लॉक करके नमाज अदा करवाई जाती थी, ताकि अल्पसंख्यक समुदाय में यह संदेश जाए कि सरकार उनके लिए प्रशासनिक नियमों को भी बदल सकती है।
वहीं वर्तमान में शुभेंदु सरकार के सत्ता में आते ही यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कानून और नागरिक सुविधाएँ किसी भी धार्मिक आयोजन से ऊपर हैं। सरकार ने परंपरा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता निकाला और नमाज को पास के ही बड़े मैदान (ब्रिगेड परेड ग्राउंड) में शिफ्ट कर दिया। इससे नमाजियों को भी ज्यादा जगह मिली और शहर की जीवनरेखा ‘रेड रोड’ भी एंबुलेंस, दमकल और आम जनता के लिए पूरी तरह खुली रही।
यह बदलाव दिखाता है कि जब सरकारें तुष्टिकरण की जगह कानून के शासन और नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता देती हैं, तो धार्मिक परंपराओं की पवित्रता भी बनी रहती है और शहर की सामान्य जिंदगी भी प्रभावित नहीं होती।
दोपहर का वक्त था। दरवाजे की घंटी बजी तो बाहर दो लोग मोबाइल और टैबलेट लिए खड़े थे। उन्होंने घर के कमरों की संख्या पूछी, फर्श पक्का है या कच्चा, टीवी-फ्रिज है या नहीं, बाइक और इंटरनेट की सुविधा है या नहीं सब कुछ नोट किया। लेकिन जब वे बिना परिवार के सभी लोगों की गिनती किए आगे बढ़ गए, तो घर वालों को लगा कि आखिर ये कैसी जनगणना है?
आपके पास भी अगर जनगणना वाले आएँ होंगे तो आपको भी ये कन्फ्यूजन होगा कि भई ये सब क्या हो रहा है? या जब आपके पास जनगणना वाले आएँगे तब आपको ये कन्फ्यूजन होना तय है, तो चलिए हम आपका सारा कन्फ्यूजन दूर कर देते हैं, उन सारे सवालों के जवाब देने की कोशिश करते हैं जो आपने मन में जनगणना को लेकर हों। बात शुरू से ही शुरू करते हैं।
दरअसल जनगणना 2027 की प्रक्रिया दो चरणों में होगी। पहले चरण में घर और उसमें मौजूद सुविधाओं की जानकारी जुटाई जाएगी, जबकि दूसरे चरण में परिवार के सदस्यों, उनकी शिक्षा, नौकरी, भाषा, जाति और दूसरी सामाजिक जानकारी दर्ज की जाएगी।
यही वजह है कि कई लोगों को शुरुआत में लग सकता है कि जनगणना वाले आए, टीवी-फ्रिज और मोटरसाइकिल गिनकर चले गए लेकिन लोगों के बारे में तो पूछा ही नहीं।
भारत में होने वाली जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना और आजादी के बाद की 8वीं जनगणना होगी। यह कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि पहली बार इसे पूरी तरह डिजिटल तरीके से कराया जाएगा। गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए डेटा दर्ज करेंगे जबकि आम लोगों को भी सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल के जरिए खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी।
यह जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसी डेटा के आधार पर सरकार यह तय करती है कि किस इलाके में सड़क, स्कूल, अस्पताल, पानी और दूसरी सुविधाओं की कितनी जरूरत है। संसद और विधानसभा सीटों का परिसीमन, SC-ST सीटों का आरक्षण और कई सरकारी योजनाओं का वितरण भी जनगणना के आँकड़ों पर आधारित होता है।
इस बार की जनगणना इसलिए भी सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की गणना की जाएगी। ऐसे में लोगों के मन में सवाल भी कई हैं, जनगणना वाले क्या पूछेंगे, क्या नहीं पूछेंगे और आखिर यह पूरी प्रक्रिया कैसे चलेगी।
जनगणना 2027 कितने चरणों में होगी और पूरा प्रोसेस क्या रहेगा
जनगणना 2027 को सरकार दो बड़े चरणों में पूरा करेगी। पहला चरण ‘हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस’ कहलाएगा, जबकि दूसरा चरण ‘पॉपुलेशन एन्यूमरेशन’ यानी आबादी की गणना का होगा।
पहला चरण अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 तक अलग-अलग राज्यों में चलेगा। इसमें गणनाकर्मी हर घर जाकर मकान और घर से जुड़ी जानकारी इकट्ठा करेंगे। दूसरे चरण में फरवरी 2027 में लोगों की व्यक्तिगत जानकारी दर्ज की जाएगी।
पहले चरण में घर की स्थिति, मकान की दीवार, छत और फर्श किस चीज से बने हैं, कितने कमरे हैं, पानी और बिजली की सुविधा है या नहीं, शौचालय है या नहीं, खाना किस ईंधन से बनता है, मोबाइल, टीवी, इंटरनेट, वाहन जैसी सुविधाएँ हैं या नहीं इन सबकी जानकारी ली जाएगी।
दूसरे चरण में परिवार के हर सदस्य का नाम, उम्र, लिंग, शिक्षा, नौकरी, वैवाहिक स्थिति, धर्म, जाति, जन्म स्थान, माइग्रेशन और दिव्यांगता जैसी जानकारी दर्ज होगी। सरकार ने कहा है कि बेघर लोगों की भी अलग से गणना की जाएगी ताकि कोई छूट न जाए।
इस बार करीब 31 लाख गणनाकर्मी और सुपरवाइजर लगाए जाएँगे। सरकार का दावा है कि डिजिटल सिस्टम की वजह से डेटा जल्दी तैयार होगा और गलतियों की संभावना भी कम होगी।
पहली बार पूरी तरह डिजिटल होगी जनगणना, क्या-क्या बदल जाएगा
जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी डिजिटल जनगणना होगी। इससे पहले 2011 की जनगणना कागज पर हुई थी, जिसमें डेटा प्रोसेस करने में कई साल लग गए थे। अब गणनाकर्मी मोबाइल ऐप के जरिए सीधे जानकारी अपलोड करेंगे। इससे डेटा तुरंत सर्वर तक पहुँचेगा और सरकार रियल टाइम में निगरानी कर सकेगी।
सरकार ने एक खास डिजिटल सिस्टम तैयार किया है, जिसमें मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, GPS मैपिंग और लाइव मॉनिटरिंग जैसी सुविधाएँ शामिल हैं। गणनाकर्मी अगर कोई गलत जानकारी दर्ज करेंगे, जैसे किसी बच्चे की उम्र माता-पिता से ज्यादा लिख देना या परिवार के सदस्यों की संख्या असामान्य होना, तो सिस्टम तुरंत अलर्ट देगा। इससे गलतियाँ कम होंगी।
इस बार GPS और जियोफेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल भी होगा। इससे यह पता चलेगा कि कौन-सा इलाका कवर हो चुका है और कौन-सा नहीं। इससे किसी घर या इलाके के छूटने की संभावना कम हो जाएगी।
सरकार ने यह भी कहा है कि डेटा सुरक्षा पर खास ध्यान दिया गया है। लोगों की जानकारी सुरक्षित रखने के लिए मजबूत डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था बनाई गई है। ऑनलाइन सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल 16 भाषाओं में उपलब्ध होगा, ताकि अलग-अलग राज्यों के लोग आसानी से अपनी जानकारी भर सकें।
सेल्फ-एन्यूमरेशन क्या है और लोग खुद कैसे भर सकेंगे जानकारी
जनगणना 2027 में पहली बार लोगों को खुद अपनी जानकारी भरने की सुविधा मिलेगी। इसे सेल्फ-एन्यूमरेशन कहा गया है। इसके लिए सरकार ने एक ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल आधारित सिस्टम तैयार किया है।
कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल नंबर से लॉगिन करके अपने परिवार की जानकारी खुद भर सकेगा। इस प्रक्रिया में सबसे पहले व्यक्ति पोर्टल पर लॉगिन करेगा, फिर मैप पर अपना स्थान चुनेगा और उसके बाद परिवार और घर से जुड़ी जानकारी भरेगा।
सारी जानकारी जमा करने के बाद उसे एक यूनिक सेल्फ-एन्यूमरेशन ID मिलेगी। जब गणनाकर्मी घर आएँगे, तब केवल इस ID को दिखाना होगा और वे जानकारी सत्यापित कर देंगे।
सरकार का कहना है कि इससे लोगों को सुविधा मिलेगी और समय की बचत होगी। खासकर शहरों में रहने वाले नौकरीपेशा लोग या ऐसे परिवार जो दिन में घर पर नहीं रहते, वे पहले से अपनी जानकारी भर सकेंगे।
हालाँकि, सेल्फ-एन्यूमरेशन पूरी तरह अनिवार्य नहीं है। अगर कोई व्यक्ति ऑनलाइन जानकारी नहीं भरना चाहता, तो गणनाकर्मी पहले की तरह घर-घर जाकर जानकारी दर्ज करेंगे। सरकार का कहना है कि डिजिटल और पारंपरिक दोनों व्यवस्था साथ-साथ चलेंगी ताकि कोई व्यक्ति छूट न जाए।
जनगणना के दौरान लोगों से कौन-कौन से सवाल पूछे जाएँगे
जनगणना 2027 के पहले चरण में कुल 34 सवाल पूछे जाएँगे। ये सवाल मुख्य रूप से मकान, सुविधाओं और घरेलू सामान से जुड़े होंगे। इसमें बिल्डिंग नंबर, घर नंबर, मकान की छत, दीवार और फर्श किस सामग्री से बने हैं, घर की स्थिति कैसी है और उसमें कितने लोग रहते हैं, जैसी जानकारी ली जाएगी।
इसके अलावा घर में कितने कमरे हैं, कितने शादीशुदा जोड़े रहते हैं, पीने का पानी कहाँ से आता है, बिजली की व्यवस्था कैसी है, शौचालय और नहाने की सुविधा है या नहीं ये सवाल भी शामिल हैं। खाना बनाने के लिए LPG, PNG या लकड़ी जैसे किस ईंधन का इस्तेमाल होता है, इसकी भी जानकारी ली जाएगी। इसमें जाति से जुड़ा केवल यह प्रश्न होगा कि घर के मुखिया की जाति क्या है।
फोटो साभार: PIB
घरेलू सुविधाओं से जुड़े सवालों में TV, रेडियो, इंटरनेट, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, बाइक, कार जैसी चीजों की जानकारी भी माँगी जाएगी। सरकार यह जानना चाहती है कि देश में कितने लोगों तक आधुनिक सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं।
एक दिलचस्प सवाल यह भी होगा कि परिवार मुख्य रूप से कौन-सा अनाज खाता है। इसके साथ मोबाइल नंबर भी दर्ज किया जाएगा ताकि जरूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके। इन सवालों के जरिए सरकार देश के लोगों की जीवनशैली और बुनियादी सुविधाओं की असली तस्वीर समझ पाएगी।
जनगणना से जुड़े पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब
जनगणना क्या है?
जनगणना यानी देश में रहने वाले हर व्यक्ति और हर घर की गिनती करने की सरकारी प्रक्रिया। इसमें लोगों से नाम, उम्र, शिक्षा, नौकरी, भाषा, परिवार, घर और सुविधाओं जैसी जानकारी ली जाती है।
यह काम सरकार तय समय पर करती है ताकि देश की आबादी, लोगों की स्थिति और जरूरतों का सही आंकड़ा मिल सके। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार योजनाएँ बनाती है और लोगों की सुविधा के लिए योजना तैयार करती है। भारत में आमतौर पर हर 10 साल में होती है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। 2021 में होनी थी लेकिन कोरोना के कारण टल गई।
अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर शहर में रहने लगा है, तो जनगणना में उसकी गिनती कहाँ होगी? क्या किराये या झुग्गी में रहने वालों की भी गिनती होगी?
जनगणना में किसी व्यक्ति की गिनती वहीं की जाती है जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा होता है। अगर कोई व्यक्ति गाँव छोड़कर दिल्ली, मुंबई या किसी दूसरे शहर में नौकरी, मजदूरी या पढ़ाई के लिए रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में होगी।
एक व्यक्ति की गिनती सिर्फ एक ही जगह होती है, गाँव और शहर दोनों जगह नहीं। भले ही उसका नाम गाँव के राशन कार्ड या वोटर लिस्ट में हो, फिर भी जनगणना में वही स्थान माना जाएगा जहाँ वह उस समय रह रहा है।
कुछ इस तरह नक्शा बना रहे जनगणना करने वाले
बाहर काम करने वाले मजदूरों, किराये पर रहने वालों और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों की भी जनगणना में पूरी गिनती की जाएगी, ताकि कोई भी व्यक्ति छूट न जाए।
बेघर लोगों की गिनती कैसे होगी?
जनगणना में बेघर लोगों की भी अलग से गिनती की जाती है। इसके लिए सरकारी कर्मचारी रात के समय सड़कों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, फुटपाथों, मंदिरों या खुले स्थानों पर जाकर उन लोगों की जानकारी दर्ज करते हैं, जिनके पास रहने के लिए पक्का घर नहीं होता। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी व्यक्ति जनगणना से छूट न जाए।
क्या इस बार जनगणना मोबाइल ऐप से होगी, क्या आधार जरूरी होगा और इसमें कौन-कौन सी जानकारी पूछी जाएगी?
इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से कराने की तैयारी है। अधिकारी मोबाइल ऐप के जरिए जानकारी दर्ज करेंगे और लोगों को सेल्फ-एन्यूमरेशन यानी खुद अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी मिल सकता है।
जनगणना के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं है। NRC और जनगणना दोनों अलग प्रक्रियाएँ हैं, क्योंकि जनगणना का मुख्य उद्देश्य आबादी और सामाजिक जानकारी जुटाना होता है, नागरिकता तय करना नहीं।
जनगणना के दौरान धर्म, शिक्षा, नौकरी और परिवार से जुड़ी जानकारी पूछी जा सकती है। घर में कितने कमरे हैं, मकान की स्थिति और सुविधाओं से जुड़े सवाल भी पहले चरण में पूछे जाते हैं। बैंक बैलेंस सीधे नहीं पूछा जाता लेकिन काम-धंधे और जीवन स्तर से जुड़ी जानकारी लिया जाता है।
अगर कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता है तो क्या ये मुमकिन है?
जनगणना में किसी भी नागरिक की जाति बताना अनिवार्य नहीं है। यदि कोई अपनी जाति नहीं बताना चाहता, तो उसे अवर्गीकृत (अनक्लासिफाइड) या जाति-विहीन के रूप में दर्ज किया जा सकता है।
क्या जनगणना का असर आरक्षण पर पड़ेगा?
जनगणना का सीधे तौर पर आरक्षण पर असर नहीं पड़ेगा यानी जो अभी आरक्षण मिल रहा है वही मिलता रहेगा। हालाँकि, जाति आधारित आँकड़े सामने आने से आरक्षण के प्रतिशत और उसकी सीमा में बदलाव की माँग तेज हो सकती है। राजनीतिक दल और आम लोग आरक्षण में बदलाव की माँग कर सकते हैं।
क्या जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होगा?
हाँ, आगामी जनगणना पूरी होने के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों का परिसीमन (Delimitation) किया जाना तय है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के अनुसार, हर नई जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों के पुनर्गठन के लिए संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम पारित किया जाता है।
दक्षिण भारत में लोग परिसीमन को लेकर क्यों चर्चा कर रहे हैं?
कुछ राज्यों में आबादी नियंत्रण बेहतर रहा है, इसलिए सीटों के बँटवारे को लेकर राजनीतिक चर्चा चल रही है।
क्या जनगणना से सरकारी योजनाएँ तय होती हैं?
हाँ, कई योजनाओं में जनसंख्या से जुड़ी जानकारी और डेटा काम आता है।
क्या जनगणना में गलत जानकारी देने पर कार्रवाई हो सकती है?
हाँ, जनगणना में जानबूझकर गलत जानकारी देना या सही जानकारी छिपाना एक कानूनन अपराध है। जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act 1948) के तहत ऐसा करने वाले व्यक्ति पर जुर्माना लगाया जा सकता है या जेल की सजा भी हो सकती है।
क्या जनगणना का डेटा सार्वजनिक होगा?
व्यक्तिगत जानकारी गोपनीय रखी जाती है, लेकिन कुल आँकड़े जारी किए जाते हैं।
क्या जनगणना में फोन नंबर पूछा जाएगा?
हाँ, संपर्क करने के लिए माँगा जाता है।
क्या विदेश में रहने वाले भारतीयों की गिनती होगी?
हाँ, विदेश में रहने वाले भारतीयों की भी आधिकारिक तौर पर गिनती होती है। विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा जारी प्रवासी भारतीयों की आबादी के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में फैले अनिवासी भारतीयों (NRIs) और भारतीय मूल के लोगों (PIOs) की सटीक संख्या का ट्रैक रखा जाता है।
अगर कोई छात्र दूसरे शहर में पढ़ रहा है तो उसकी गिनती कहाँ होगी?
जनगणना के नियमों के अनुसार, यदि कोई छात्र पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में रह रहा है, तो उसकी गिनती उसी शहर में की जाएगी जहाँ वह वर्तमान में रहकर पढ़ाई कर रहा है। जनगणना में व्यक्ति के ‘सामान्य निवास स्थान’ (जहाँ वह अधिकांश समय रहता है) को आधार माना जाता है।
अगर परिवार का कोई सदस्य बाहर कमाने गया है?
उसकी मौजूदगी और रहने की स्थिति के हिसाब से जानकारी दर्ज होती है।
क्या ऑनलाइन फॉर्म भरने के बाद अधिकारी फिर आएँगे?
हाँ, आएँगे और उन्हें आप वो ID नंबर देंगे जिस के जरिए आप ने जानकारी भारी है। जिसका वो मिलान करेंगे।
क्या जनगणना में भाषा भी पूछी जाएगी?
हाँ, जनगणना में भाषा संबंधी जानकारी मुख्य रूप से पूछी जाएगी। जनगणना फॉर्म में आपसे आपकी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य ज्ञात भाषाओं (जिन भाषाओं को आप बोल, समझ या लिख सकते हैं) का विवरण भी लिया जाएगा।
क्या जनगणना से पता चलेगा कि किस जाति की आबादी कितनी है?
हाँ, आने वाली राष्ट्रीय जनगणना से यह पता चल जाएगा कि किस जाति की आबादी कितनी है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित आगामी जनगणना में जातिगत गणना (Caste Census) को शामिल किया गया है।
क्या पहली बार जाति गणना हो रही है?
नहीं, जाति गणना पहली बार नहीं हो रही है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1931 में देश में अंतिम बार विस्तृत जाति आधारित जनगणना जारी की गई थी। इसके बाद, आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में पहली बार पूर्ण जाति आधारित जनगणना की जा रही है।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1881 से 1931 तक जनगणना में जाति गणना एक नियमित प्रक्रिया थी जबकि वर्ष 1941 की जनगणना में भी जातिगत जानकारी एकत्र की गई थी। हालाँकि, द्वितीय विश्व युद्ध शुरू होने के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया गया।
वर्ष 1951 की जनगणना से लेकर अब तक जाति गणना केवल SC और ST के लिए की जाती रही है, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अन्य जाति समूहों पर कोई विश्वसनीय डेटा उपलब्ध नहीं है।
क्या हर राज्य में एक साथ जनगणना होगी?
नहीं, हर राज्य में जनगणना एक ही समय पर पूरी तरह से एक साथ नहीं होती भारत की जनगणना 2026-27 दो चरणों में हो रही है, जिसे राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अवधि के अंदर किया जाता है।
क्या जनगणना में लोगों को उनके काम या पेशे के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है, जैसे आम नागरिक, सेना के जवान, डॉक्टर, शिक्षक आदि?
हाँ, भारतीय जनगणना में लोगों को उनके काम और पेशे (आक्यूपेशन) के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में बाँटा जाता है। जनगणना के दौरान लोगों से उनके काम (जैसे टीचर, डॉक्टर, सेना आदि) के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है
अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन शहर में नौकरी करता है तो गिनती कहाँ होगी?
अगर कोई व्यक्ति गाँव में वोटर है लेकिन नौकरी या पढ़ाई के कारण शहर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी गिनती वहीं होगी जहाँ वह सामान्य रूप से रह रहा है। यानी जिस जगह वह ज्यादातर समय बिताता है, उसी स्थान की आबादी में उसे शामिल किया जाएगा।
अगर कोई व्यक्ति जनगणना अधिकारी बनकर घर आए, तो असली और नकली अधिकारी की पहचान कैसे करें?
अगर कोई व्यक्ति जनगणना के नाम पर घर आए, तो सबसे पहले उसका सरकारी ID कार्ड और नियुक्ति पत्र जरूर देखें। असली अधिकारी के पास सरकारी पहचान पत्र, मोहर और अक्सर जनगणना/NPR वाली जैकेट या कैप होती है।
ध्यान रखें कि जनगणना में सिर्फ सामान्य जानकारी पूछी जाती है, जैसे परिवार, उम्र और घर से जुड़े सवाल। अगर कोई बैंक डिटेल, ATM PIN या पासवर्ड माँगे, तो तुरंत सतर्क हो जाएँ। शक होने पर नजदीकी पुलिस या 112 नंबर पर सूचना दें।
क्या जनगणना से बेरोजगारी का अंदाजा लगेगा?
हाँ, जनगणना में लोगों के कामकाज और रोजगार से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कितने लोग नौकरी कर रहे हैं, कितने बेरोजगार हैं और कितने लोग किस तरह के काम में लगे हुए हैं। इन आँकड़ों के आधार पर सरकार देश में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति का अंदाजा लगाती है।
क्या वोटर आईडी का पता ही माना जाएगा और बिना दस्तावेज वाले लोगों की भी गिनती होगी?
जनगणना में सिर्फ वोटर आईडी या किसी एक दस्तावेज का पता ही अंतिम नहीं माना जाता, बल्कि व्यक्ति वास्तव में जहाँ रह रहा होता है उसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। अगर कोई व्यक्ति साल का कुछ समय गाँव और कुछ समय शहर में बिताता है, तो आमतौर पर जनगणना के समय वह जहाँ रह रहा होगा, उसी जगह उसकी गिनती की जाती है।
किरायेदार और मकान मालिक दोनों की अलग-अलग गिनती होती है, क्योंकि घर में रहने वाले हर व्यक्ति को शामिल किया जाता है। वहीं अगर किसी के पास आधार, राशन कार्ड या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज नहीं भी हैं, तब भी उसकी जनगणना में गिनती हो सकती है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य देश की पूरी आबादी का रिकॉर्ड तैयार करना होता है।
क्या PG और हॉस्टल में रहने वालों की अलग सूची बनेगी?
हाँ, आमतौर पर PG, हॉस्टल, छात्रावास, धर्मशाला, जेल, सेना कैंप, वृद्धाश्रम जैसी जगहों पर रहने वालों की अलग तरीके से गिनती की जाती है। जनगणना में इन्हें अक्सर संस्थागत परिवार (Institutional Household) की श्रेणी में रखा जाता है। यानी ऐसे लोग जो किसी सामान्य परिवार की तरह घर में नहीं, बल्कि किसी संस्था या सामूहिक जगह पर रह रहे हों।
अगर जनगणना के समय घर बंद मिला या कोई जानकारी देने से मना कर दे तो क्या होगा?
अगर जनगणना कर्मचारी जब घर पहुँचे और उस समय घर बंद मिले, तो आमतौर पर बाद में दोबारा आने की कोशिश की जाती है ताकि सही जानकारी दर्ज हो सके। वहीं अगर कोई व्यक्ति जानकारी देने से मना करता है।
तो कर्मचारी उसे समझाने की कोशिश करते हैं कि जनगणना एक राष्ट्रीय प्रक्रिया है और इसका मकसद सिर्फ देश की आबादी, सुविधाओं और सामाजिक स्थिति से जुड़ा डेटा जुटाना होता है। इसलिए लोगों से सही जानकारी देकर सहयोग करने की अपील की जाती है।
क्या जनगणना में जनजातीय इलाकों और LGBTQ समुदाय के लिए अलग व्यवस्था हो सकती है?
हाँ, जनगणना के दौरान दूरदराज, पहाड़ी और जनजातीय इलाकों तक पहुँचने के लिए विशेष टीमें और अलग व्यवस्था की जाती है ताकि वहाँ रहने वाले लोगों की गिनती छूटे नहीं। कई बार स्थानीय भाषा और इलाके को समझने वाले कर्मचारियों की भी मदद ली जाती है।
वहीं LGBTQ समुदाय को लेकर भी लोगों के मन में सवाल हैं। पहले की जनगणना में थर्ड जेंडर का विकल्प जोड़ा जा चुका है, इसलिए इस बार भी ट्रांसजेंडर और अन्य लैंगिक पहचान रखने वाले लोगों की अलग पहचान दर्ज की जा सकती है, ताकि उनकी आबादी और सामाजिक स्थिति से जुड़ा सही डेटा सामने आ सके।
बकरीद को देखते हुए देश के अलग-अलग राज्यों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। स्थिति देखते हुए कहीं पर सड़कों पर नमाज पढ़ने से साफ मना किया गया है, कहीं खुले में कु्र्बानी देने से मना किया गया है तो कहीं पर पहले ही दंगा नियंत्रण बल की तैनाती कर दी गई है।
ये तैयारी सामान्य त्योहारों की तैयारी से इसलिए भी अलग है, क्योंकि कई बार इस त्योहार को मनाने के नाम पर देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाएँ आहत करने का काम होता है। ऐसे में सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द, कानून-व्यवस्था और स्वच्छता को बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि त्योहार से पहले प्रशासन को कई कड़े नियम लागू करने पड़ते हैं और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होते हैं।
बकरीद के दिन दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार से लेकर बंगाल-असम तक में सुरक्षाबल की तैनाती की गई है। कहाँ-क्या व्यवस्था है और सरकार ने क्या निर्देश दिए हैं आइए जानते हैं-
बंगाल में कुर्बानी और नमाज को लेकर सख्ती
बकरीद पर बंगाल इस बार काफी बदला नजर आ रहा है। शुभेंदु सरकार के 1950 के पशु वध नियंत्रण अधिनियम को सख्ती से लागू करने के बाद सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने पर सख्त मनाही है। तय बुचड़खानों में ही पशुओं को काटा जा सकता है।
सड़क किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर नहीं। सड़कों पर नमाज नहीं पढ़ने को लेकर पहले ही आदेश जारी किया जा चुका है। यहाँ तक कि कोलकात केरेड रोड पर होने वाला नमाज भी इस बार नहीं होगा। इसकी जगह बदल दी गई है। ये वही जगह है, जहाँ पूर्व सीएम ममता बनर्जी 2011 से हर साल बकरीद में आया करती थी और अपने वोट बैंक को संबोधित करती थी। इस बार वह ऐसा नहीं कर पाएँगी।
The first ever Eid when Calcutta's important Red Road isn't blocked for Namaz. pic.twitter.com/nbGDNZj6Mk
— Sudhanidhi Bandyopadhyay (@SudhanidhiB) May 28, 2026
असम में बकरीद पर व्यवस्था
असम सरकार ने बकरीद पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने, सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करने और मवेशियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। राज्य में गाय की कुर्बानी पर सख्त रोक है। असम कैटल प्रिजर्वेशन एक्ट 2021 में गाय और प्रतिबंधित मवेशियों की कुर्बानी पर रोक लगा दिया गया था। इसको देखते हुए कई ईदगाह कमिटियों ने आगे आकर गाय की कुर्बानी नहीं करने का आग्रह किया है। राज्य में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ईदगाह समितियों के इस फैसले का स्वागत किया है और मुस्लिम समुदाय से मौजूदा कानूनों का पालन करने और शांतिपूर्ण तरीके से त्योहार मनाने की अपील की है।
उत्तर प्रदेश में बकरीद पर नजारा
उत्तर प्रदेश सरकार ने बकरीद पर शांति, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। व्यापक इंतजाम किए हैं।योगी सरकार ने पहले ही सड़कों पर नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है। जगह तय किए गए हैं, वहीं नमाज अता किए जाएँगे। सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी देने की भी मनाही है। गोवंश और दूसरे प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी नहीं दी जा सकती है। कुर्बानी के बाद बुचड़खानों की साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए हैं, ताकि गंदगी न फैले।
#WATCH | Ayodhya, Uttar Pradesh: On tight security arrangements during Eid al-Adha prayers being held at Ayodhya Eidgah, SSP Ayodhya, Dr Gaurav Grover, says, “Tight security arrangements have been done for all the places where namaz is being offered. Under the supervision of… pic.twitter.com/bEqVB7yuwD
बकरा ईद पर सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने के लिए दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ-साथ पैरामिलिट्री फोर्सेस को भी ग्राउंड पर उतारा गया है। दरअसल हाल ही में भारत-अफ्रीका फोरम समिट के टलने के कारण राजधानी में तैनात की गई पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियों को अब दिल्ली के अलग-अलग जिलों में सुरक्षा के मद्देनजर सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात किया गया है। विशेषकर उन इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल भेजे गए हैं, जो सांप्रदायिक या धार्मिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।
#WATCH | Delhi Police monitors the city using drones in the national capital on the occasion of Eid al-Adha. The police force has also been deployed to maintain security; visuals from the Jahangir Puri PS area
जम्मू-कश्मीर में बकरीद के दौरान शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा के बेहद कड़े और व्यापक इंतजाम किए गए हैं। प्रमुख मस्जिदों, संवेदनशील इलाकों और बाजारों में अतिरिक्त पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है ताकि पर्व शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके।ईदगाहों और हजरतबल दरगाह, जामिया मस्जिद जैसे जगहों के आसपास सुरक्षा का विशेष घेरा बनाया गया है, ताकि नमाजियों को कोई असुविधा न हो।
महाराष्ट्र- बिहार में सुरक्षा इंतजाम
महाराष्ट्र में जगह जगह पर पुलिस तैनात हैं, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो, वही बिहार में पुलिस हाई अलर्ट पर है। दंगा नियंत्रण बल के जवानों को भी तैनात किया गया है। ड्रोन से निगरानी की जा रही है और सोशल मीडिया पर नजर रखी जा रही है। अधिकारियों ने असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए सख्त इंतजाम कर लिए हैं।
पश्चिम बंगाल में अब भाजपा की सरकार बन गई है। ममता बनर्जी की सत्ता को लोगों ने उखाड़ फेंका है और BJP को बंपर सीटें मिली हैं। BJP की इस जीत के पीछे जो सबसे बड़ा कारण माना जाता है वो TMC के कार्यकर्ताओं-नेताओं की गुंडागर्दी थी जिससे लोग डरे हुए थे। ये डर बेजा नहीं था और भाजपा महिला मोर्चा की सक्रिय कार्यकर्ता रहीं रंजीता प्रमाणिक इस डर की मिसाल हैं।
रंजीता को अपनी और परिवार की जान बचाने के लिए 2021 में रातों-रात कोलकाता छोड़ना पड़ा था। गुंडई का वो दौर कैसा रहा होगा उसका अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि रंजीता और उनका परिवार अब भी कोलकाता लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में रंजीता ने अपने साथ हुई प्रताड़ना की पूरी कहानी बताई है। रंजीता बताती हैं कि 2015-16 के आसपास वह भाजपा महिला मोर्चा से जुड़ी जबकि भाई रंजन हिंदूवादी संगठनों के साथ सक्रिय होने लगे। वह बताती हैं कि शुरुआत में सब सामान्य था लेकिन जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति गर्माने लगी, वैसे-वैसे उनके लिए हालात बदलते गए।
तेजाब अटैक से लेकर रेप की धमकियों तक
रंजीता बताती हैं कि BJP के साथ सक्रिय रूप से जुड़ने के बाद उन्हें रास्ते में रोकना, गंदे कमेंट करना, छेड़खानी और घर पर पत्थर फेंकने जैसी घटनाएँ शुरू हो गईं। शुरुआत में परिवार ने इन घटनाओं को नजरअंदाज कर दिया लेकिन जैस 2021 विधानसभा चुनाव के दौरान हालात और तनावपूर्ण हो गए।
रंजीता का कहना है कि चुनाव के बाद उन्हें लगातार धमकियाँ मिलने लगीं। एकादशी के दिन जब वह गो-माता को खाना खिलाने बाहर गईं, तभी उन पर तेजाब से हमला हुआ। झुक जाने की वजह से उनका चेहरा बच गया लेकिन शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह जल गया। समय के साथ हालत और बिगड़ती गई, शरीर सिकुड़ने लगा और चलना-फिरना मुश्किल हो गया। वह अब भी व्हील चेयर पर ही रहती हैं।
परिवार का आरोप है कि कोर्ट तक मामला पहुँचने के बाद भी हमलावर उन्हें केस वापस लेने की धमकी देते रहे। रंजीता कहती हैं, “हमला करने वाले बोले- केस वापस लो, नहीं तो तुम्हारी माँ का रेप कर देंगे। पूरे परिवार को जिंदा जला देंगे।” डर के कारण परिवार ने मामला वापस ले लिया। रंजीता के पिता रबिन प्रमाणिक का कहना है कि चुनाव के बाद धमकियाँ इतनी बढ़ गईं कि उन्हें पीढ़ियों पुराना घर और काम छोड़कर रातों-रात कोलकाता से भागना पड़ा।
कोलकाता छोड़ने के बाद परिवार सबसे पहले जयपुर पहुँचा और वहाँ रंजीता का इलाज हुआ। उनके पैर तक टेढ़े हो गए थे जिन्हें डॉक्टरों ने रॉड डालकर सीधा किया। इसके बाद परिवार की जमा पूँजी खत्म होने लगी तो परिवार अपनी जिंदगी बिताने के लिए काशी पहुँच गया। वहाँ जाकर रामकृष्ण मिशन और कई आयुर्वेदिक संस्थानों में इलाज कराया। वे बताती हैं कि कई संतों और धार्मिक संस्थाओं ने भी कठिन समय में उनका साथ दिया।
वाराणसी में जिला अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी उनकी स्थानीय लोगों ने खूब मदद की थी। समाजसेवियों ने इलाज के लिए पैसे इकट्ठा किए और इलाज में जो मदद संभव थी वो सब की गई। वहाँ भर्ती रहने के दौरान रंजीता ने बताया था कि कोरोना काल में जॉब चले जाने के बाद हम लोग मदद माँगने के लिए पहुँचे तो कहा गया कि तुम लोग BJP कार्यकर्ता हो बीजेपी वालों से जाकर मदद माँग और इसके बाद हम लोगों को प्रताड़ित किया जाने लगा।
भोपाल में रह रहा परिवार, कोलकाता लौटने का डर बरकरार
कई शहरों में भटकने के बाद परिवार भोपाल पहुँचा जहाँ कुछ स्थानीय लोगों और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने उनकी मदद की। परिवार को आधार-वोटर कार्ड, राशन और रहने की जरूरी चीजें मिलीं। मध्य प्रदेश में आने पर मंत्री विश्वास सारंग ने भी रंजीता प्रमाणिक से मुलाकात की थी और उन्हें सारी मदद का भरोसा दिया था।
विश्वास सारंग ने X पर एक पोस्ट में लिखा था, “अपना घर-आँगन और अपनी मिट्टी छोड़कर पश्चिम बंगाल से पलायन होकर भोपाल पहुँची हिंदू बेटी रंजीता प्रमाणिक की व्यथा सुनकर हृदय व्यथित हो उठता है। हिंदू बेटी रंजीता की आँखों में छिपा भय, उसके टूटे सपनों की कसक और असुरक्षा की छाया हमारी अंतरात्मा को झकझोर देती है।”
उन्होंने लिखा था, “आज वह नरेला विधानसभा में अपने परिवार सहित सुरक्षित है। अब बेटी और उसके परिवार का भविष्य, सुरक्षा और मुस्कान हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। बेटी के आँखों के आँसू मिटाना, उसके सपनों को नई उड़ान देना और उसे सम्मान व सुरक्षा का वातावरण देना ही हमारा संकल्प है।”
इस पोस्ट के साथ सारंग ने एक वीडियो भी पोस्ट किया था जिसमें रंजीता अपनी प्रताड़ना की कहानी बता रही थीं। उन्होंने बताया था, “ममता बनर्जी के, TMC के गुंडों ने हमारे ऊपर अत्याचार किया। जिहादियों ने मेरे ऊपर तेजाब डाल दिया था।”
अपना घर-आँगन और अपनी मिट्टी छोड़कर पश्चिम बंगाल से पलायन होकर भोपाल पहुँची हिंदू बेटी रंजीता प्रमाणिक की व्यथा सुनकर हृदय व्यथित हो उठता है।
हिंदू बेटी रंजीता की आँखों में छिपा भय, उसके टूटे सपनों की कसक और असुरक्षा की छाया हमारी अंतरात्मा को झकझोर देती है।
आज वे एक छोटे किराए के कमरे में रहते हैं लेकिन आर्थिक हालत इतनी खराब है कि दवाइयों का खर्च उठाना भी मुश्किल हो जाता है। रंजीता के पिता रबिन प्रमाणिक कहते हैं कि कोलकाता में उनका घर और काम था लेकिन अब बेटी के इलाज के लिए मदद माँगनी पड़ती है। वहीं, रंजीता के भाई रंजन का आरोप है कि हिंदूवादी संगठनों से जुड़े होने के कारण कोविड काल में उन्हें खंभे से बाँधकर पीटा गया और धमकियाँ दी गईं।
परिवार का कहना है कि लगातार डर और प्रताड़ना के कारण उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। अब भोपाल में नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश हो रही है लेकिन पुराने डर अब भी बने हुए हैं। रंजीता कहती हैं कि उन्हें पश्चिम बंगाल लौटने से डर लगता है और अब वापस जाने की हिम्मत नहीं है।
रंजीता की माँ बताती हैं कि उनकी बेटी आज भी रात में डरकर उठ जाती है और कई बार पुरानी बातें याद कर रोने लगती है। वहीं, रंजीता कहती हैं कि अब वहाँ जाने से डर लगता है। उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है मार देंगे। परिवार अब पश्चिम बंगाल लौटना नहीं चाहता। BJP की सरकार बनने के बाद भी उनमें वापस लौटने की हिम्मत नहीं है।”
साल 2026 की कक्षा 12वीं के नतीजों के बाद CBSE भारी विवादों में घिर गया है। इस बार बोर्ड का पास प्रतिशत 88.39 से गिरकर 85.29 पर आ गया है। साथ ही 90% से अधिक नंबर लाने वाले छात्र भी 16% कम हो गए हैं। इस गिरावट की बड़ी वजह पहली बार लागू हुआ डिजिटल मूल्यांकन यानी ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) सिस्टम है।
रिजल्ट में गड़बड़ी के कारण देश में पहली बार हर चौथे छात्र ने अपनी कॉपी की स्कैन प्रति माँगी है। इस बड़े बदलाव से छात्र और अभिभावक बेहद परेशान हैं। सबके मन में सवाल है कि क्या अब कॉपियाँ जाँचने का पारंपरिक तरीका खत्म हो गया है। लोग यह भी सोच रहे हैं कि क्या अब शिक्षकों की जगह कंप्यूटर और AI बच्चों का भविष्य तय करेंगे। इस पूरी व्यवस्था को लेकर स्कूलों और सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चिंताएँ और अफवाहें तैर रही हैं।
कॉपियों की री-चेकिंग के लिए उमड़ा छात्रों का सैलाब, माँगी कॉपी
13 मई को CBSE का रिजल्ट आते ही देश भर में हड़कंप मच गया। बच्चों के नंबर उम्मीद के मुताबिक नहीं आए थे। छात्रों का आरोप है कि डिजिटल चेकिंग के कारण कॉपियाँ बहुत सख्ती से जाँची गईं। कंप्यूटर स्क्रीन पर देखने की वजह से शिक्षकों से बड़ी चूक हुई। कुछ छात्रों ने कॉपियों की अदला-बदली की भी शिकायत की।
छात्रों के गुस्से को देखते हुए बोर्ड ने कॉपियों की स्कैन कॉपी मँगाने की फीस 700 रुपए से घटाकर सिर्फ 100 रुपए कर दी। इसके बाद 19 मई को पोर्टल खुलते ही शुरुआती तीन घंटे में 1.26 लाख से ज्यादा आवेदन आ गए। इस भारी लोड से CBSE का सर्वर और पेमेंट गेटवे क्रैश हो गया।
इस वजह से आवेदन की तारीख को बढ़ाकर 25 मई करना पड़ा। बोर्ड के अनुसार, परीक्षा में बैठे कुल 17,68,962 छात्रों में से 4,04,319 (यानी लगभग 23 प्रतिशत) छात्रों ने अपनी आंसर शीट की स्कैन कॉपी माँगी है। इन छात्रों ने कुल 11,31,961 कॉपियों के लिए आवेदन किया है। इनमें से 8,98,214 कॉपियाँ मंगलवार (26 मई 2026) शाम तक छात्रों को ऑनलाइन भेजी जा चुकी थीं। पिछले साल की तुलना में इस बार कॉपियों की माँग 4 गुना ज्यादा बढ़ गई है।
छात्रों ने लगाए धुंधली तस्वीरें और गायब पन्नों के गंभीर आरोप
जिन भाग्यशाली छात्रों को शुरुआती चरण में अपनी कॉपियों की स्कैन प्रतियाँ मिल चुकी हैं, उन्होंने CBSE के दावों की पोल खोलते हुए बेहद गंभीर विसंगतियाँ उजागर की हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कई छात्रों ने शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें जो डिजिटल कॉपियाँ भेजी गई हैं, उनकी तस्वीरें बेहद धुंधली (Blurred) हैं और उन्हें पढ़ना नामुमकिन है। कुछ छात्रों की कॉपियों से महत्वपूर्ण पन्ने ही गायब हैं, जिससे उनके लिखे हुए जवाबों का मूल्यांकन ही नहीं हो पाया।
सबसे हैरान करने वाला और सनसनीखेज मामला तब सामने आया जब कुछ छात्रों को अपनी जगह किसी दूसरे ही छात्र की आंसर शीट थमा दी गई। इसके अलावा फीस भुगतान के दौरान तकनीकी खराबी के चलते कई छात्रों के खातों से डबल पैसे कट गए तो कुछ के कम कटे, जिसके लिए बोर्ड को अब IIT कानपुर, IIT मद्रास और चार बड़े सरकारी बैंकों की मदद लेनी पड़ रही है।
हालाँकि, CBSE और शिक्षा मंत्रालय ने इस पूरे डिजिटल सिस्टम का पुरजोर बचाव किया है। CBSE के चेयरमैन राहुल सिंह का कहना है कि यह नया OSM सिस्टम पूरी तरह पारदर्शी, सुरक्षित और मानवीय गलतियों से मुक्त है। उन्होंने बताया कि इस बार कुल 98 लाख कॉपियों में से केवल 13,000 कॉपियाँ ऐसी थीं जो धुंधली होने के कारण कंप्यूटर पर पढ़ी नहीं जा सकती थीं और उन्हें तुरंत रिजेक्ट करके पारंपरिक मैन्युअल तरीके से जाँचा गया।
बोर्ड का दावा है कि कंप्यूटर स्क्रीन पर कॉपी जाँचने से शिक्षकों का क्लेरिकल काम (जैसे नंबरों को जोड़ना, टोटल को आगे बढ़ाना और पोर्टल पर अपलोड करना) पूरी तरह खत्म हो गया है और वे बिना किसी गलती के शांति से मूल्यांकन कर पाए हैं। धुंधली कॉपियों के आरोपों पर बोर्ड ने कहा कि कॉपियों को तीन स्तरों के क्वालिटी चेक से गुजारा गया था और छात्रों की शिकायतों का निपटारा री-इवैल्युएशन पोर्टल के माध्यम से पूरी तरह किया जाएगा।
परीक्षा हॉल में AI की एंट्री: क्या अब शिक्षकों की छुट्टी होने वाली है?
इस पूरे डिजिटल विवाद के बीच एक और बड़ी खबर ने पैरेंट्स और शिक्षकों की नींद उड़ा दी है। CBSE अब चुनिंदा स्कूलों में AI आधारित असेसमेंट टूल्स का पायलट प्रोजेक्ट यानी परीक्षण कर रहा है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर यह अफवाह तेजी से फैल गई है कि अब बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियां जाँचने के लिए इंसानी टीचरों की जरूरत ही नहीं बचेगी और AI ही बच्चों को पास या फेल करेगा।
लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है। CBSE ने साफ किया है कि AI का इस्तेमाल शिक्षकों को रिप्लेस करने या उनकी नौकरी छीनने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद के लिए किया जा रहा है। इस समय AI टूल्स का परीक्षण मुख्य रूप से लंबे निबंधों की बनावट, प्रोजेक्ट्स की मौलिकता और छात्रों के अंग्रेजी बोलने के तौर-तरीकों (उच्चारण और प्रवाह) को अधिक सटीक और निष्पक्ष बनाने के लिए किया जा रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत भारतीय शिक्षा व्यवस्था को रट्टा मार प्रणाली से हटाकर व्यावहारिक ज्ञान पर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। AI का काम केवल यह देखना होगा कि छात्र ने व्याकरण, वाक्य संरचना या स्पेलिंग की कोई बुनियादी गलती तो नहीं की है, जिससे शिक्षकों का समय बचे और वे छात्र की रचनात्मकता और सोचने की क्षमता को बेहतर ढंग से परख सकें। ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट और कंप्यूटर लैब्स की भारी कमी के कारण भारत में पूरी तरह से AI आधारित कॉपियों की जाँच फिलहाल निकट भविष्य में मुमकिन नहीं है।
क्या है यह ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) तकनीक और कैसे काम करता है नया सिस्टम?
CBSE ने इस साल कक्षा 12वीं की कॉपियों को जाँचने के लिए जिस ऑन-स्क्रीन मार्किंग यानी OSM सिस्टम को लागू किया है, वह पूरी तरह से एक डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली है। इस नए सिस्टम के तहत छात्रों को परीक्षा हॉल में पेन और पेपर से ही पारंपरिक तरीके से एग्जाम लिखना होता है। परीक्षा खत्म होने के बाद इन सभी उत्तर पुस्तिकाओं को देश भर के परीक्षा केंद्रों से सुरक्षित तरीके से CBSE के संबंधित क्षेत्रीय कार्यालयों (Regional Offices) में भेजा जाता है।
वहाँ कॉपियों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उन पर एक सीक्रेट बारकोड लगाया जाता है। इसके बाद विशेष रूप से डिजाइन किए गए आधुनिक ‘लैंप और बुक स्कैनर्स’ की मदद से पूरी कॉपी को हूबहू स्कैन किया जाता है। इन स्कैनर्स की खासियत यह होती है कि कॉपी को स्कैन करने के लिए उसकी बाइंडिंग या सिलाई को काटने की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती।
स्कैन होने के बाद इन उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल कॉपियों को CBSE के एक सुरक्षित मूल्यांकन पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाता है। इसके बाद बोर्ड से जुड़े देश भर के प्रमाणित शिक्षकों को उनके व्यक्तिगत लॉगिन क्रेडेंशियल (ID और पासवर्ड) दिए जाते हैं।
शिक्षक अपने घर या स्कूल में कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बैठकर माउस की मदद से इन स्कैन की गई कॉपियों को चेक करते हैं। कंप्यूटर स्क्रीन पर ही कॉपियों को जाँचने के लिए शिक्षकों को डिजिटल मार्किंग स्कीम और विभिन्न प्रकार के टूल्स उपलब्ध कराए जाते हैं। शिक्षक हर प्रश्न के सामने उसके नंबर कंप्यूटर में दर्ज करते जाते हैं और पूरा पेपर चेक होने के बाद कंप्यूटर का सिस्टम खुद-ब-खुद सारे नंबरों को बिना किसी गलती के जोड़ देता है।
उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली को लेकर एक बार फिर सियासत तेज है। विपक्षी दल राज्य में बिजली संकट होने का दावा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लोग नाराज हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कथित बिजली संकट को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की। साथ ही, उन्होंने यह दावा भी किया कि उनके शासनकाल में बिजली व्यवस्था कहीं बेहतर थी।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? क्या उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था कभी इतनी सुचारु थी कि आज की परिस्थितियों की तुलना उससे की जा सके? इन सवालों के जवाब तलाशने पर एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जिसमें बिजली संकट, बिजली चोरी, ट्रांसफॉर्मर फुंकने, घंटों की कटौती, VIP जिलों को विशेष सप्लाई और बिजली विभाग की बदहाल आर्थिक स्थिति जैसे कई पहलू शामिल हैं। इसी बहस के बीच अचानक साल 2013 में आई एक चर्चित डॉक्यूमेंट्री की याद भी ताजा हो जाती है- कटियाबाज।
कानपुर के बिजली संकट पर बनी थी ‘कटियाबाज’
साल 2013 में रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री ‘कटियाबाज’ का निर्देशन फहद मुस्तफा और दीप्ति कक्कड़ ने किया था। यह फिल्म कानपुर के बिजली संकट, बिजली चोरी और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों पर आधारित थी। कहानी कानपुर को बिजली देने वाली सरकारी कंपनी KESCO और उसकी तत्कालीन प्रबंध निदेशक ऋतु माहेश्वरी के इर्द-गिर्द भी घूमती है।
इस डॉक्यूमेंट्री में सिर्फ बिजली चोरी नहीं दिखाई गई थी बल्कि बिजली विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप, भीषण गर्मी में परेशान जनता का गुस्सा, बिजली न आने की स्थिति और पूरे सिस्टम की अक्षमता को भी विस्तार से दिखाया गया था। ‘कटियाबाज’ को 2013 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ इन्वेस्टिगेटिव फिल्म का पुरस्कार भी मिला था।
क्या अखिलेश यादव के दौर में सचमुच बेहतर थी बिजली व्यवस्था?
उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दावों की पड़ताल करने पर सबसे पहले सवाल बिजली आपूर्ति के घंटों पर उठता है। अगर आप उत्तर प्रदेश से आते हैं, तो संभव है कि आपको वह दौर याद हो जब इटावा, मैनपुरी, अमेठी और रायबरेली जैसे जिलों को ‘VIP जिला’ कहा जाता था। आरोप लगते थे कि इन इलाकों में अधिक बिजली दी जाती थी जबकि बाकी प्रदेश घंटों अंधेरे में रहता था।
उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे श्रीकांत शर्मा ने साल 2021 में दावा किया था कि अखिलेश यादव सरकार के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 12 घंटे बिजली आपूर्ति होती थी। हालाँकि, यह आँकड़ा भी स्थिर नहीं था क्योंकि कई जगह ट्रांसफॉर्मर फुंक जाने, लाइन टूटने या स्थानीय तकनीकी खराबियों के चलते बिजली सप्लाई और भी कम हो जाती थी।
अगर कोई यह तर्क दे कि श्रीकांत शर्मा भाजपा के विधायक थे और इसलिए विपक्षी सरकार की आलोचना स्वाभाविक थी, तो इस दावे को परखने के लिए स्वतंत्र रिपोर्टों की ओर देखना जरूरी हो जाता है।
देश में ऊर्जा और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था Council on Energy, Environment and Water (CEEW) की State of Electricity Access in India रिपोर्ट बताती है कि साल 2015 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में औसतन सिर्फ 9 घंटे बिजली आपूर्ति हो रही थी। यानी प्रदेश के बड़े हिस्से में दिन का आधा समय बिजली के बिना गुजरता था।
इसका अर्थ सिर्फ इतना नहीं था कि लोग एसी या कूलर नहीं चला पा रहे थे। साल 2015 का ग्रामीण उत्तर प्रदेश आज की तुलना में कहीं कम बिजली-निर्भर था। उस दौर में एसी और फ्रिज ग्रामीण इलाकों में आम नहीं थे बल्कि कई घरों में पंखा और बल्ब चलना ही पर्याप्त माना जाता था। लेकिन स्थिति ऐसी थी कि बुनियादी बिजली जरूरतें भी नियमित रूप से पूरी नहीं हो रही थीं।
यानी आज बिजली कटौती पर जो शोर सुनाई देता है, वैसी व्यापक प्रतिक्रिया उस दौर में शायद इसलिए कम दिखती थी क्योंकि बहुत से क्षेत्रों में बिजली का लंबे समय तक न आना ही सामान्य स्थिति बन चुका था।
पीक पावर डिमांड में सपा के काल में पिछड़ता रहा उत्तर प्रदेश
आजकल ट्विटर पर हर दूसरे-तीसरे दिन ऊर्जा मंत्रालय का एक ना एक ट्वीट वायरल हो जाता है, इसमें बताया जाता है कि आज देश में बिजली की माँग नया रिकॉर्ड बना गई और उसे सप्लाई भी कर दिया गया। अब मई का महीना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भीषण गर्मी लेकर आता है, इसके चलते बिजली की माँग बेतहाशा बढ़ती है।
इसे पीक पॉवर डिमांड कहते हैं। अगर किसी राज्य का अपना बिजली ढाँचा ठीक होता है और उसके पास बिजली सप्लाई के साधन मौजूद होते हैं तो वो ये बिजली आपूर्ति कर ले जाता है। लेकिन इस मामले में अखिलेश यादव की सरकार एकदम फिसड्डी थी।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करने वाले थिंक टैंक पालिसी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के डेटा के अनुसार, 12 जुलाई 2012 को उत्तर प्रदेश में 13,900 मेगावाट की पीक बिजली माँग दर्ज हुई थी। लेकिन राज्य सरकार केवल लगभग 12,000 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध करा सकी। यानी करीब 14.11 प्रतिशत बिजली की कमी रही।
स्थिति अगले वर्षों में सुधरने के बजाय और गंभीर होती दिखाई दी। साल 2013 में बिजली सप्लाई का शॉर्टफॉल करीब 1,500 मेगावाट या लगभग 11 प्रतिशत तक दर्ज किया गया। लेकिन सबसे गंभीर संकट साल 2014 में देखने को मिला जब 14 जून 2014 को बिजली की कमी 26.9 प्रतिशत तक पहुँच गई।
यानी जिस समय गर्मी अपने चरम पर थी, उसी समय राज्य की बिजली व्यवस्था माँग के अनुरूप सप्लाई करने में लगभग एक-चौथाई तक पिछड़ रही थी।
2014 में क्यों बिगड़ी थी स्थिति? जब पावर प्लांट ठप पड़ने लगे और पूरे प्रदेश में बढ़ी कटौती
बिजली संकट के इन आँकड़ों को अगर जमीनी कारणों से जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर और साफ होती है। साल 2014 उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए सबसे मुश्किल वर्षों में गिना गया। उस समय प्रदेश के कई बिजली उत्पादन संयंत्र एक के बाद एक प्रभावित होने लगे थे। नतीजा यह हुआ कि राज्य सरकार को शहरों और गाँवों में बड़े पैमाने पर बिजली कटौती करनी पड़ी।
उस दौर की मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालत सिर्फ सामान्य जिलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि कथित तौर पर VIP माने जाने वाले क्षेत्रों में भी बिजली कटौती शुरू हो गई थी। यानी वह व्यवस्था, जिस पर विपक्ष आज “बेहतर बिजली सप्लाई” का दावा करता है, गर्मियों के चरम समय में माँग के सामने लड़खड़ाती दिख रही थी।
उस समय हालात कितने खराब थे, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि इन्वर्टर बाजार अचानक तेजी से बढ़ गया था। एक रिपोर्ट में एक छोटे दुकानदार के हवाले से बताया गया था कि उसने महज कुछ महीनों में हजारों इन्वर्टर बेच दिए। यह सिर्फ कारोबार नहीं था, बल्कि उस दौर के बिजली संकट की सामाजिक तस्वीर भी थी।
उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में तब इन्वर्टर-बैटरी की दुकानें तेजी से बढ़ीं। ग्रामीण इलाकों में लोग ट्रांसफॉर्मर फुँकने के बाद प्रदर्शन करते दिखाई देते थे। कई जगहों पर रातें छतों पर गुजरती थीं क्योंकि बिजली का कोई निश्चित शेड्यूल नहीं था। तेज हवा चलना भी लोगों के लिए संकेत बन जाता था कि अब बिजली कभी भी जा सकती है।
सिर्फ बिजली की कमी नहीं, पूरा विभाग में आर्थिक संकट
बिजली आपूर्ति की समस्या एक हिस्सा थी लेकिन असली संकट वितरण व्यवस्था के भीतर भी था। उत्तर प्रदेश का बिजली तंत्र आर्थिक रूप से भी भारी दबाव में था। इसे समझने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले एक महत्वपूर्ण शब्द AT&C लॉसेस (Aggregate Technical & Commercial Losses) को समझना जरूरी है।
सरल भाषा में कहें तो इसका मतलब यह होता है कि जितनी बिजली सप्लाई की गई, उसमें से कितने का भुगतान वापस आया। अगर बिजली सप्लाई तो हो रही है लेकिन उसका पैसा नहीं लौट रहा, तो वितरण कंपनी लगातार घाटे में जाएगी।
नीति आयोग के ICED डैशबोर्ड के अनुसार, साल 2016-17 के आसपास उत्तर प्रदेश में बिजली सप्लाई की गई रकम का लगभग 40 प्रतिशत राजस्व वापस नहीं आ रहा था। इस घाटे का कुछ हिस्सा तकनीकी कारणों जैसे लाइन लॉस और ट्रांसमिशन लॉस से जुड़ा था लेकिन बड़ा कारण बिजली चोरी था।
नीति आयोग के आँकड़े बताते हैं कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के अंतर्गत आने वाले जिलों में AT&C लॉसेस करीब 53 प्रतिशत तक पहुँच गए थे। यानी आधी से ज्यादा बिजली का भुगतान वापस नहीं मिल रहा था।
बिजली चोरी को सपा का समर्थन
सत्ता में रहते हुए अखिलेश यादव स्वयं ही इसे प्रोत्साहित कर रहे थे। मुजफ्फरनगर में एक रैली में खुद अखिलेश यादव ने कहा था कि उन्हें कटिया से कोई समस्या नहीं है। और उन्हें समस्या होती भी क्यों? अमर उजाला की ही रिपोर्ट कहती है कि उनके खुद के ही जिले में सबसे ज्यादा बिजली चोरी होती थी।
अमर उजाला की रिपोर्ट कहती है कि इटावा में 73% बिजली चोरी हो जाती थी। वैसे इस बिजली चोरी पर अकेले अखिलेश यादव का संरक्षण नहीं था बल्कि उनकी पूरी पार्टी ही इस मॉडल को अपना रही थी। आज जुल्म जुल्म चिल्लाने वाले आजम खान के रामपुर में 50% से ज्यादा बिजली चोरी होती थी।
आजम खान का कहना था कि कोई भी ठेकेदार, बिजली विभाग का कर्मचारी छापा मारने नहीं आ सकता। यहाँ तक कि बिजली चोरी में खलल ना पड़े इसके लिए आजम खान ने रामपुर में बिजली के तार अंडरग्राउंड करने से रुकवा दिए थे और बाकायदा इसका ऐलान भी कर रहे थे।
आजमगढ़, मैनपुरी, संभल और कन्नौज जैसे जिले जहाँ जहाँ भी समाजवादी पार्टी की पकड़ मजबूत थी, सब जगह बिजली चोरी पूरा कारोबार था। यहाँ 60% तक बिजली चोरी हो रही थी। और बिजली चोरी करने वालों को पकड़ने की किसी की हिम्मत नहीं थी क्योंकि उन्हें सीधा संरक्षण समाजवादी पार्टी से मिल रहा था।
ऐसा भी नहीं है कि ये बिजली चोरी गाँव के इलाके में होती हो, यहाँ तक कि समाजवादी पार्टी की सरकार जाने के बाद भी आजम खान और शफीकुर्रहमान बर्क के घर में बिजली चोरी हो रही थी। और ये सिलसिला उनकी सत्ता जाने के सालों बाद तक जारी है।
शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव ने बदायूँ में खुले तौर पर कहा था कि सपा सरकार में तो कटिया पर भी एक्शन नहीं हुआ। समाजवादी पार्टी में बिजली चोरी का सिस्टम सिस्टेम्टिक तरीके से चलता था, संभल में साल 2026 में मुस्लिम इलाकों में हुई छापेमारी में मस्जिद से लेकर घरों तक करोड़ों की बिजली चोरी पकड़ी गई थी। संभल का ही पूर्व सपा जिलाध्यक्ष भी बिजली चोरी में पकड़ा गया था।
योगी सरकार में कितनी बदली तस्वीर?
यह बात बिल्कुल सही है कि भीषण गर्मी के बीच उत्तर प्रदेश के कई हिस्से पॉवर कट्स का सामना कर रहे हैं। लेकिन आपको आज की स्थिति और पहले की स्थिति में अन्तर समझना होगा। आज जहाँ लोड बढ़ने के चलते लोड शेडिंग हो रही है या फिर ट्रिपिंग हो रही है तो वहीं पहले घुप्प अँधेरे की स्थिति थी।
पहले कुछ जिले VIP थे, जिनकी बिजली सप्लाई कैसे भी इंश्योर की जाती थी और बाकी को अनाथ छोड़ दिया जाता था। योगी सरकार आने के बाद ये भेदभाव खत्म हुआ है और साथ ही बिजली का इंफ्रा भी सुधरा है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि योगी सरकार आने के पहले उत्तर प्रदेश में 1.21 लाख बस्तियों में ही बिजली पहुँचती थी।
अब ये आँकड़ा बढ़ चुका है और 2023 तक ही सरकार इस नंबर में 1.2 लाख बस्तियों का एडिशन कर चुकी थी। और सिर्फ ऐसा नहीं है कि बिजली के खंभे लग गए हैं बल्कि घरों तक भी बिजली पहुँची है। साल 2017 में 1 करोड़ 80 लाख घरों में ही बिजली पहुँच रही थी, ये नंबर भी अब बढ़ कर 3 करोड़ 63 लाख हो चुका है।
कनेक्शन देने के साथ ही योगी सरकार ने बिजली का इंफ्रा सुधारने पर भी जोर लगाया है। यूपी में बिजली की जनरेशन कैपैप्सिटी भी 5600 मेगावॉट से 8600 मेगावॉट हुई है। और जो पॉवर सब स्टेशंस इस बिजली की रीढ़ है, वो भी 700 से अधिक योगी सरकार ने बनाए हैं ।
अब यूपी में बिजली चोरी पर कंट्रोल हुआ है तभी संभल में सपा के बिजली चोर भी पकड़े जा रहे हैं और इसका सीधा असर AT&C लॉसेस में इंप्रूवमेंट से दिख रहा है। अखिलश के राज में जहाँ 100 रुपए की बिजली बिकने के बाद जहाँ केवल 60 रुपए ही रेवेन्यू में वापस आ रहे थे तो वहीं अब योगी सरकार में साल 2024-25 में आँकड़ा 80 रुपए पर पहुँच गया है।
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 में घुसपैठ का मुद्दा सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा। बीजेपी ने पूरे चुनाव में लगातार बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाया, जबकि ममता बनर्जी और TMC इसे पूरी तरह नकारती रहीं। उल्टा ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घुसपैठिया घोषित कर डाला। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अब जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
राज्य में शुभेंदु सरकार के बनते ही घुसपैठियों के खिलाफ ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत सख्त कार्रवाई शुरू हुई तो बंगाल से से ऐसे वीडियो सामने आने लगे, जहाँ घुसपैठिए अपने देश वापस लौटते दिखाई दे रहे हैं। कहीं लोग बॉर्डर पार जाने का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं प्रशासन की कार्रवाई के डर से राज्य को छोड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब ममता बनर्जी कहती थीं कि बंगाल में घुसपैठिए हैं ही नहीं तो आखिर ये लोग कौन हैं जो कार्रवाई शुरू होते ही दुम दबाकर भागते नजर आ रहे हैं?
बंगाल में घुसपैठियों की बदलती तस्वीर
बंगाल में सरकार बनाते ही बीजेपी ने घुसपैठ के मुद्दे को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार गठन के तुंरत बाद साफ कर दिया कि अब बंगाल में ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति लागू होगी। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को चेतावनी दी, “जल्दी-जल्दी भागो। हम उन्हें जेल में रखकर खिलाना नहीं चाहते। आखिर हम जेल में उन्हें खाना खिलाने पर अपना पैसा क्यों बर्बाद करें?”
सरकार की इस कार्रवाई के बाद बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, वह विपक्ष की आँखों को चुभने वाली थीं। उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेकपोस्ट पर 100 से ज्यादा बांग्लादेशी परिवार अपने सामान के साथ बॉर्डर के पास जमा दिखाई दिए। यहाँ बांग्लादेशी खुद बता रहे थे कि उन्होंने भारत में घुसपैठ की है।
#WATCH | North 24 Parganas, West Bengal | A large group of allegedly illegal Bangladeshi immigrants gather at the Hakimpur checkpost near the Bangladesh border, after the newly formed, BJP-led, West Bengal government, launched its 'detect, delete and deport' policy. (26.05) pic.twitter.com/RBN79D0cfP
हावड़ा में तीन साल से रहे एक घुसपैठिए ने कहा कि एक व्यक्ति की मदद से वह भारत आया था, उसके साथ 10 और लोग थे और यहाँ वह बिना आधार कार्ड और राशन कार्ड के तीन साल तक रहा। उसने बताया कि उन 10 लोगों में से अब वह अकेला लौट रहा है।
#WATCH | North 24 Parganas, West Bengal | A Bangladeshi migrant says, "There is a lot of trouble going on here right now, so we are leaving. We cannot find any work, and no one is allowing us to stay… It has been two or three years since we arrived here from Bangladesh. We were… pic.twitter.com/9Ow4jRCcUe
इन्हीं में से एक बांग्लादेशी महिला ने कहा कि TMC ने उन्हें ‘लक्ष्मी भंडार’ से पैसे दिए। इतना ही नहीं महिला ने बताया कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी भी बनाकर दिए, इसके बदले उन्हें सिर्फ TMC को वोट देना था।
SHOCKER FROM WEST BENGAL
Illegal Bangladeshi Immigrant says Trinamool Congress helped her get: -Money from Lakshmi Bhandar -Aadhar Card, Ration Card and Voter Card -Only asked her to vote for TMC in return
— Sensei Kraken Zero (@YearOfTheKraken) May 27, 2026
बंगाल में बीजेपी सरकार की घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई
बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उनके पीछे या सिर्फ डर या अफवाह नहीं, बल्कि सरकार की घुसपैठियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई है। विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था और दावा किया था कि बंगाल में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या नेटवर्क तेजी से बढ़ा है।
अब वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में उसी मुद्दे पर तेजी से फैसले लेती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा है कि उनकी सरकार ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति पर काम करेगी। इसी दौरान उनका बयान भी काफी चर्चा में रहा, जब उन्होंने कहा, “क्या ये घुसपैठिए हमारे दामाद हैं? उन्हें जल्दी-जल्दी भगाओ।”
घुसपैठ के मुद्दे को केवल चुनाव तक सीमित न रखकर बीजेपी ने सरकार गठन के महज दो दिन बाद, 11 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी की हुई पहली कैबिनेट बैठक में भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए बीएसएफ को जमीन देने का फैसला लिया गया। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ऐलान किया कि सीमा के 27 किलोमीटर हिस्से में फेंसिंग के लिए करीब 75 एकड़ जमीन बीएसएफ को सौंपी जाएगी और अगले 45 दिनों में प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
सरकार ने बीएसएफ को जमीन देकर सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय से अधूरी फेंसिंग की वजह से घुसपैठ के संकट को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन वहीं, ममता सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को कोर्ट तक घसीटा लेकिन बीएसएफ को जमीन नहीं दी।
अब राज्य में घुसपैठियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के लिए सरकार 23 जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर‘ यानी डिटेंशन सेंटर बनवा रही है मालदा और मुर्शिदाबाद में ये सेंटर बन भी चुके हैं, जिनमें 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़कर रखा गया है। इन घुसपैठियों पर ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति लागू होगी। सबसे पहले इन घुसपैठियों की पहचान कर डिटेंशन सेंटर तक लाया जा चुका है, अब अगले पड़ाव में इनकी सरकारी रिकॉर्ड खंगालकर डिलीट किए जाएँगे और फिर बीएसएफ को सौंप दिया जाएगा। बीएसएफ ने सीमा पार करवाकर वापस बांग्लादेश भेज देगी।
सरकार की इसी कार्रवाई के बाद ही उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में घुसपैठिए वापस बांग्लादेश लौटने का इंतजार करते दिखे।
ममता बनर्जी लगातार घुसपैठ से करती रही इनकार
बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जहाँ बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, वहीं ममता बनर्जी लगातार इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक एजेंडा बताती रहीं। चुनाव से पहले कई रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों ने ममता बनर्जी ने बीजेपी पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ बंगाल को बदनाम करने के लिए उठाया जा रहा है।
20 मार्च 2026 को कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज के बाद ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही ‘सबसे बड़ा घुसपैठिया‘ बता दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को घुसपैठिया कहकर उनके वोटिंग अधिकार छीने जा रहे हैं और बीजेपी धर्म के नाम पर देश को बाँटने की कोशिश कर रही है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर भी ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ खड़ी दिखीं। उन्होंने 3 अप्रैल 2026 को दक्षिण दिनाजपुर की रैली में उन्होंने कहा कि अगर घुसपैठियों के वोट से सरकार बनी है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसे पहले जनवरी 2025 में ममता बनर्जी ने घुसपैठ को लेकर केंद्र सरकार और बीएसएफ पर ही आरोप मढ़ दिया।
लेकिन जब बीजेपी ने ममता सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने और वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया तो मता बनर्जी ने इससे मुँह मोड़ लिया। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रहीं कि घुसपैठ का मुद्दा असल में बंगाल चुनाव को ध्रुवीकृत करने की रणनीति है। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई और बॉर्डर इलाकों से लौटते घुसपैठियों की तस्वीरें सामने आने लगीं तो अब ममता बनर्जी चुप हैं।
TMC की तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल की कहाँ लाकर खड़ा कर दिया?
बंगाल में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली TMC सरकार में पिछले 15 सालों तक घुसपैठ के मुद्दे को या तो नकारा गया या फिर उसे राजनीति कहकर टाल दिया गया। लेकिन सरकार बदलते ही जिसे तेजी से सीएम शुभेंदु के नेतृत्व में फेंसिंग, डिटेंशन सेंटर, पहचान और डिपोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई और उसके बाद बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने ममता बनर्जी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। अगर बंगाल में घुसपैठिए थे ही नहीं, तो फिर कार्रवाई शुरू होते ही बॉर्डर पर लौटने वालों की भीड़ क्यों दिखाई देने लगी?
असल फर्क सरकार की नीयत और इरादों का होता है। जब सरकार कानून लागू करने की इच्छा रखती है तो सिस्टम जमीन पर दिखने लगता है। लेकिन जब राजनीति तुष्टिकरण और वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तब घुसपैठ भी ‘मुद्दा’ नहीं लगता। यही वजह रही कि वर्षों तक सीमा से जुड़े सवाल दबे रहे और बंगाल की कानून-व्यवस्था, पहचान और सुरक्षा पर लगातार सवाल उठते रहे। अब पहली बार कार्रवाई के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने यह बहस फिर जिंदा कर दी है कि आखिर बंगाल का यह हाल बनने दिया किसने?
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में 15 वर्षीय गोपाल शर्मा की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शन का सिलसिला लगातार जारी है। परिजन का आरोप है कि 9वीं कक्षा का छात्र गोपाल शर्मा की बेरहमी से हत्या की गई है और पुलिस ने अब तक हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया है। वहीं, पुलिस की इस पर अलग थ्योरी है। इस बीच कई ब्राह्मण संगठन सड़कों पर उतर आए हैं और जल्द से जल्द आरोपितों को गिरफ्तार किए जाने की माँग कर रहे हैं।
21 मई से लापता था गोपाल शर्मा: जानें- पहली FIR की डिटेल्स
जेवर कोतवाली क्षेत्र के बनवारी बाँस गाँव के रहने वाले रवि भूषण उर्फ बंटी का बेटा गोपाल 21 मई से लापता था। परिवार ने तलाश की लेकिन कोई सुराग नहीं मिला और शुक्रवार (22 मई 2026) को जेवर कोतवाली में गुमशुदगी की FIR दर्ज कराई।
ऑपइंडिया के पास मौजूद इस FIR कॉपी के मुताबिक, पिता ने शिकायत में लिखा, “मेरा पुत्र गोपाल शर्मा, 21 मई 2026 को अपने घर से समय 3:30 से 4:00 बजे के बीच घर से कही चला गया है और अभी तक घर वापस नही आया है। हमने अपने सब रिश्तेदार को फोन करके पता लगाया गया है। आपसे निवेदन है कि इस मामले को गंभीरता से लें, उसकी खोजबीन जल्द से जल्द शुरु करने की कृपा करें।”
FIR का एक हिस्सा
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार को FIR कराए जाने के बाद पुलिस भी जाँच में जुट गई। इसके बाद शनिवार (23 मई 2026) को गोपाल शर्मा का शव उसके गाँव से 4 किलोमीटर दूर रोही गाँव में एक खाली मकान के कमरे से बरामद हुआ था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि किशोर के सिर पर गहरे चोट के निशान मिले और कमरे में काफी मात्रा में खून फैला हुआ था। इसके बाद परिजन ने उसकी हत्या की आशंका जताई। इसके बाद पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी।
आँखे निकालीं, एसिड से जलाया: नाबालिग के साथ वीभत्सता का दावा
इस मामले में गोपाल शर्मा के साथ वीभत्सता का दावा किया गया है। गोपाल के पिता बंटी ने ZEE न्यूज को बताया कि बच्चे का शव इतनी गंदी हालात में था कि देखा भी नहीं जा रहा था। आँखें निकली हुई थीं, तेजाब डला हुआ था, जीभ कटी हुई थी। वहीं, गोपाल की माँ सरोज शर्मा ने बताया कि बहुत खराब हालत थी और मुझसे देखा तक नहीं गया। मृतक गोपाल की दादी ने बताया कि उसके मुँह में कुछ ठूँस दिया गया था, आँखें भी बाहर निकली हुई थीं।
बंटी ने एक अन्य चैनल से बातचीत में दावा किया कि हमने खुद ही शव ढूँढा था। उन्होंने बताया कि पुलिस ने बताया है कि हमने 6 लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन बेटे के साथ क्या हुआ यह अभी तक कोई नहीं बता रहा है। उन्होंने कहा कि मुझे एनकाउंटर चाहिए, मुझे बुलडोजर कार्रवाई चाहिए।
उन्होंने बताया, “बेटे का प्राइवेट पार्ट काट लिया गया, इतना अत्याचार किया है। मेरे बेटे को एक गोली मार दी होती तो मुझे इतना दुख ना होता जितना इन बातों को सुनकर हुआ है। हाथों में कील गाड़ दी गई, तेजाब डाला और उसके ऊपर पेशाब किया है।”
पुलिस ने क्या बताया?
पुलिस ने इस मामले में बच्चे के साथ वीभत्सता की खबरों को खारिज किया है। ग्रेटर नोएडा के DCP प्रवीण रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि बच्चे के शव का पोस्टमार्टम किया गया है, उसकी वीडियोग्राफी हुई है और उसमें वीभत्सता जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, यह सिर्फ अफवाह उड़ाई गई है। DCP ने बच्चे के शव के वायरल फोटो पर भी बातचीत की है।
बच्चे के शव का वायरल फोटो
DCP प्रवीण रंजन ने वायरल तस्वीर और उसमें दिख रही वीभत्सता को लेकर बताया है कि वो शव के ‘डीकंपोज’ होने की वजह से ऐसे नजर आ रहा है और भी अंग कटा-फटा नहीं है। तस्वीर में आँखें बाहर दिखने पर उन्होंने बताया, “शव ‘डीकंपोजड’ हो रहा था, गरमी थी और कमरा भट्टी जैसा तप रहा था।” वहीं, सोशल मीडिया पर बच्चे का रेप किए जाने के दावों को भी खारिज किया है।
वहीं, मौत की वजह को लेकर DCP ने बताया कि पोस्टमार्ट रिपोर्ट में सिर पर चोट लगने की बात है लेकिन मृत्यु का सही कारण अभी नहीं पता चला है। साथ ही, उन्होंने इसे यकीनी तौर पर हत्या भी नहीं बताया है।
ग्रेटर नोेएडा DCP ने X पर लिखा, “थाना जेवर पर वादी द्वारा अपने पुत्र गोपाल उम्र करीब 15 वर्ष के घर से बिना बताए चले जाने के संबंध में अभियोग पंजीकृत कराया गया। थाना जेवर पुलिस द्वारा तत्काल सूचना प्राप्त होते ही परिजनों के साथ मिलकर गोपाल की तलाश की जा रही थी, इसी दौरान स्थानीय पुलिस को सूचना प्राप्त हुई कि उक्त बालक का शव ग्राम रोही में खाली मकान में है।”
DCP ने आगे लिखा, “प्राप्त सूचना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस बल तत्काल मौके पर पहुँचा व फील्ड यूनिट / फॉरेंसिक टीम बुलाकर घटना स्थल का निरीक्षण कराया गया। मृतक के शव का पंचायतनामा भरकर पोस्टमार्टम कराया जा चुका है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लगाए गए कथित आरोप ‘प्राइवेट पार्ट का काटना, आँखें पर एसिड अटैक’ पूर्णतः असत्य एवं भ्रामक हैं। घटना के अनावरण के लिए 4 पुलिस टीमें गठित है, इस संबध मे महत्तवपूर्ण सुराग मिले है। शीघ्र सफल अनावरण किया जायेगा।”
— DCP Greater Noida (@DCPGreaterNoida) May 27, 2026
दरिंदों के साथ, दरिंदों जैसी कार्रवाई होगी: BJP विधायक
देवरिया सदर से BJP के विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने बताया है कि उन्होंने इस घटना को लेकर यूपी के डीजीपी से बातचीत की है। शलभ मणि ने X पर लिखा, “ग्रेटर नोएडा में मासूम बालक गोपाल शर्मा की जघन्य हत्या से हृदय अत्यंत व्यथित है, इस घटना को अंजाम देने वाले इंसान नहीं कहे जा सकते, वे दरिंदे हैं और उनके साथ दरिंदों जैसी ही कार्रवाई होगी।”
उन्होंने आगे लिखा, “योगी आदित्यनाथ जी की सरकार इस प्रकरण पर तेजी से कार्रवाई कर रही है, मैंने भी इस घटना पर उत्तर प्रदेश के डीजीपी राजीव कृष्ण एवं एसटीएफ चीफ अमिताभ यश से वार्ता कर हैवानों के खिलाफ कठोरतम के कार्रवाई के लिए कहा है। हम सभी की संवेदना पीड़ित परिवार के साथ है, घटना का शीघ्र खुलासा होगा।”
ग्रेटर नोएडा में मासूम बालक गोपाल शर्मा की जघन्य हत्या से हृदय अत्यंत व्यथित है, इस घटना को अंजाम देने वाले इंसान नहीं कहे जा सकते, वे दरिंदे हैं और उनके साथ दरिंदों जैसी ही कार्रवाई होगी, माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी की सरकार इस प्रकरण पर तेजी से कार्रवाई कर रही है,…
— Dr. Shalabh Mani Tripathi (@shalabhmani) May 27, 2026
पुलिस की कार्रवाई से नाराज लोगों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और कई सामाजिक संगठन अब पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे हैं। राष्ट्रीय विप्र एकता मंच के लोगों ने पीड़ित परिजन से मुलाकात की है और कार्रवाई ना किए जाने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। ब्राह्मण समाज के कई संगठन भी आक्रोशित हैं तो वहीं पुलिस ने जल्द से जल्द मामले का खुलासा करने की बात कही है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर राज्य की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी की जानकारी दी है। असम में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब तेजी से घटकर महज 84 पर आ गई है। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब असम का यह आँकड़ा देश के राष्ट्रीय औसत यानी 88 से भी नीचे चला गया है।
मुख्यमंत्री ने इस पल को अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे भावुक करने वाला क्षण बताया है। उन्होंने इस सफलता का पूरा श्रेय असम के हजारों डॉक्टरों, नर्सों, आशा बहुओं और स्वास्थ्य कर्मियों को दिया है। CM हिमंता ने बताया कि साल 2006 में जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग संभाला था, तब राज्य में मातृ मृत्यु दर 480 थी। उस समय इस स्थिति को सुधारना बिल्कुल नामुमकिन लगता था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के लगातार काम और त्याग से आज यह सच हो चुका है।
There are some moments in public life which touch you very deeply. Today is one such moment for me.
Assam’s Maternal Mortality Rate has come down to 84. For the first time in our history, Assam is now below the national average of 88.
When I took over the Health Department in…
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) May 26, 2026
क्या है मातृ मृत्यु दर?
अगर हम आम लोगों की बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।
स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में इसे ठीक से मापने के लिए एक पैमाना बनाया गया है जिसे मातृ मृत्यु अनुपात कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि समाज में हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म लेने पर कितनी माताओं को अपनी जान गँवानी पड़ी है। यह विशेष आँकड़ा किसी भी राज्य या देश की अस्पताल व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और इलाज की असली मजबूती को दुनिया के सामने साफ-साफ दिखाता है।
असम में पहले और अब के आँकड़ों में अंतर
असम राज्य ने पिछले दो दशकों के भीतर गर्भवती माताओं की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अगर हम साल 2006 के पुराने आँकड़ों को देखें तो असम की स्थिति पूरे देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक और डरावनी मानी जाती थी। उस समय असम में हर एक लाख बच्चों के जन्म पर 480 माताओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती थी।
इसके बाद सरकार, अस्पतालों और जमीनी स्वास्थ्य कर्मियों ने मिलकर एक लंबा और कठिन सफर तय किया। इसी लगातार की गई मेहनत का नतीजा है कि साल 2026 में यह आँकड़ा बहुत तेजी से नीचे गिरकर केवल 84 पर टिक गया है। भारत सरकार के ताजा आँकड़ों के अनुसार इस समय पूरे देश की मातृ मृत्यु दर का औसत आँकड़ा 88 बना हुआ है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि असम अब देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची से बाहर निकलकर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा बेहतर और शानदार काम कर रहा है।
आखिर किन वजहों से होती है गर्भवती माताओं की मौत
गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की अचानक जान जाने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं। डॉक्टरों के अनुसार इनमें सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या डिलीवरी के तुरंत बाद महिला के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह जाना है। अगर इस खून के बहाव को समय पर नहीं रोका जाए तो महिला की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है। इसके अलावा प्रसव के समय या उसके बाद अस्पतालों या घरों में पूरी तरह साफ-सफाई न होने से महिला के शरीर में बहुत तेजी से इंफेक्शन यानी संक्रमण फैल जाता है।
गर्भावस्था के दिनों में अचानक ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप का बहुत ज्यादा बढ़ जाना भी दिमाग और दिल पर गहरा असर डालता है जिसे चिकित्सा की भाषा में एक्लेम्पसिया कहा जाता है। कई बार समाज में बिना डॉक्टरी सलाह के या दाइयों के जरिए गलत तरीके से कराया गया असुरक्षित गर्भपात भी सीधे मौत का कारण बन जाता है। इन सभी समस्याओं के साथ ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के शरीर में पहले से पोषण की कमी और खून की भारी कमी यानी एनीमिया का होना स्थिति को प्रसव के समय और ज्यादा नाजुक बना देता है।
माताओं की जान बचाने के सबसे सरल उपाय
चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गर्भवती माताओं की होने वाली इन अधिकांश मौतों को बहुत ही आसान उपायों से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी और प्राथमिक उपाय यह है कि बच्चे का जन्म हमेशा किसी अच्छे और मान्यता प्राप्त अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों की देखरेख में ही होना चाहिए। पुराने तौर-तरीकों से घरों पर प्रसव कराने से अचानक पैदा होने वाले खतरों को संभालना नामुमकिन हो जाता है।
इसके अलावा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों से ही महिला की कम से कम चार बार नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त जाँच होनी चाहिए और समय पर सभी जरूरी टीके लगने चाहिए। गर्भवती महिला के रोज के खान-पीने का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, दूध और सरकार द्वारा दी जाने वाली आयरन की गोलियाँ नियमित रूप से शामिल हों। इसके साथ ही किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस या गाड़ी की व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए ताकि बिना समय गँवाए मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके।
सुरक्षा के लिए देश और राज्य में चलाई जा रही योजनाएँ
गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कई बेहतरीन और बेहद मजबूत योजनाएँ चला रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य गरीब से गरीब परिवार की महिला को भी बिना किसी खर्च के बड़े अस्पतालों में इलाज की सुविधा देना है।
जननी सुरक्षा योजना– इस दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की गर्भवती महिलाओं को सीधे नकद पैसे की मदद देती है ताकि वे पैसों की तंगी छोड़कर अस्पताल में आकर ही सुरक्षित डिलीवरी करवाएँ। इसी तरह जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को शुरू किया गया है, जिसका पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं के इलाज में जेब से होने वाले हर एक पैसे के खर्च को पूरी तरह खत्म करना है।
इस योजना के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में महिला का सीजेरियन ऑपरेशन, प्रसव, सभी जरूरी दवाइयाँ, जाँच, खून की जरूरत और डॉक्टर द्वारा बताया गया भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है। इतना ही नहीं, महिला को घर से अस्पताल लाने और डिलीवरी के बाद वापस घर सुरक्षित छोड़ने के लिए एम्बुलेंस की गाड़ी भी पूरी तरह बिना किसी पैसे के सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है।
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत पूरे देश में हर महीने की 9 तारीख को एक विशेष दिन तय किया गया है। इस दिन सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा हर एक गर्भवती महिला की व्यापक और बिल्कुल मुफ्त जाँच की जाती है। इस अभियान के तहत जिन महिलाओं की गर्भावस्था में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उनकी पहचान करके सुरक्षित प्रसव होने तक आशा वर्कर्स के जरिए लगातार उनकी व्यक्तिगत ट्रैकिंग की जाती है।
माताओं के स्वास्थ्य को और ज्यादा सम्मानजनक बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षित मातृत्व आश्वासन यानी ‘सुमन’ योजना भी शुरू की है, जिसमें अस्पताल आने वाली हर महिला को बिना किसी कोताही के गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज की गारंटी दी जाती है। लेबर रूम की कमियों को दूर करने के लिए ‘लक्ष्य’ नाम का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिससे अस्पतालों के प्रसव कक्षों को आधुनिक और पूरी तरह साफ-सुथरा बनाया जा सके।
पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के अच्छे खान-पान के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सीधे बैंक खाते में 5,000 रुपए भेजे जाते हैं, और मिशन शक्ति के तहत दूसरा बच्चा लड़की होने पर परिवार को 6,000 रुपए की मातृत्व सहायता दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में खून की कमी को खत्म करने के लिए एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत स्कूलों और गाँवों में आयरन की दवाइयाँ मुफ्त बाँटी जा रही हैं और RCH पोर्टल के जरिए हर गर्भवती महिला का नाम लिखकर ऑनलाइन कंप्यूटर पर उसकी हर जाँच का हिसाब रखा जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का वैश्विक नजरिया और 2030 का बड़ा संकल्प
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO पूरी दुनिया के स्तर पर मातृ मृत्यु दर को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या मानता है। इस वैश्विक संगठन के अनुसार साल 2023 के आँकड़ों को देखें तो दुनिया भर में हर दिन गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी रोकी जा सकने वाली कमियों के कारण 700 से अधिक महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ती थी, जिसका मतलब है कि हर दो मिनट में एक माँ दुनिया छोड़ देती थी।
WHO ने दुनिया के सभी देशों के साथ मिलकर सतत विकास लक्ष्य के तहत एक बड़ा संकल्प लिया है कि साल 2030 तक पूरी दुनिया में मातृ मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख जन्म पर 70 से भी नीचे लेकर आना है। WHO की रिपोर्ट साफ बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मातृ मौतों में से लगभग 92% मौतें सिर्फ कम आय वाले और पिछड़े देशों में होती हैं, जहाँ अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बड़ा अंतर है।
संगठन का मानना है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल प्रणालियों की खराब जवाबदेही, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी, दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महिलाओं के अधिकारों को कम प्राथमिकता देना जैसे बड़े सामाजिक कारण शामिल हैं। WHO लगातार अनुसंधान और तकनीकी दिशा-निर्देशों के जरिए भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर रहा है।
संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यदि गर्भावस्था और प्रसव के समय हर एक महिला को प्रशिक्षित डॉक्टर या दाई की सही देखरेख मिल जाए, तो दुनिया की अधिकांश माताओं को एक नया और सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय ने अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी टिमोथी इनिशिएटिव यानी टीटीआई की जाँच की है, जिसके बाद भारत में लाखों हिंदुओं के धर्मांतरण के पीछे मौजूद विदेशी चर्च तंत्र को लेकर सवाल खड़ा हो गया है। यह सर्वविदित है कि कई मिशनरी, चाहे व्यक्तिगत रूप से हों या किसी चर्च से जुड़े हुए, पर्यटक वीजा पर भारत आते हैं और ईसाइयत का प्रचार करते हैं। ये वीजा नियमों का भी उल्लंघन है। जाँच में ये बात भी सामने आई है कि गाँव-गाँव तक ये फैले हुए हैं और चर्च आपस में मिलकर यानी गठजोड़ बना कर काम करते हैं, जो बिल्कुल एक अलग कहानी है।
टीटीआई ने खुद माना है कि 2007 में ‘द इंडिया प्रोजेक्ट’ बना कर उसने भारत में लाखों चर्च स्थापित किए। ऑप इंडिया की जाँच में पता चला है कि कम से कम बारह प्रमुख विदेशी चर्च टीटीआई के साथ मिलकर हिंदुओं और दूसरे समुदाय के लोगों को ईसाइयत का पाठ पढ़ा रहे हैं।
चर्च दस्तावेज, मिशन के बुक, न्यूजलेटर, अभियान अपडेट और दूसरी सामग्री से पता चलता है कि टीटीआई का भारत में कार्य किसी एक विदेशी संगठन तक सीमित नहीं रहा है। अंतरराष्ट्रीय चर्चों, विदेशी फंडिंग और मिशनरी की भागीदारी का एक व्यापक नेटवर्क बन गया है। ये वर्षों से टीटीआई की ‘हर गाँव में चर्च’ स्थापना के मिशन में खुल कर मदद कर रहा है।
ऑपइंडिया ने टीटीआई से जुड़े भारतीय संदर्भों वाले कम से कम बारह गैर-भारतीय संस्थाओं की पहचान की है, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित चर्च और एक कनाडाई संप्रदाय नेटवर्क शामिल हैं। ये संबंध केवल सामान्य मिशन संबंधी काम तक सीमित नहीं थे। कई मामलों में, चर्चों ने धन जुटाने के अभियानों, पादरी प्रशिक्षण, क्षेत्रीय दौरों, लोकल लेवल पर चर्चों की स्थापना, भारत से जुड़े डोनेशन जैसे मुद्दों पर बात की है।
इन नामों में केंसिंग्टन चर्च, मिशन ग्रोव चर्च, नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च, वुडडेल चर्च, राइज सिटी चर्च, मिशन हिल्स चर्च, फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ हैनफोर्ड, स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च और बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस ऑफ कनाडा शामिल हैं। लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल, साल्टबॉक्स चर्च और वुडसाइड बाइबल चर्च के नेटवर्क और चर्चों से जुड़े संगठन भी टीटीआई तंत्र का हिस्सा थे।
टीटीआई की भारत में जड़ें और ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ की शुरुआत
टीटीआई का मुख्यालय उत्तरी कैरोलिना के रैले में है। यह एक वैश्विक चर्च स्थापना संगठन के रूप में कार्य करता है। हालाँकि इसकी जड़ें भारत से गहराई से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। संगठन की वैचारिक उत्पत्ति कथित तौर पर डेविड नेल्म्स की 1992 में भारत की प्रारंभिक खोज यात्राओं से जुड़ी है, जिसके बारे में ओपइंडिया ने इस श्रृंखला के पिछले लेख में बताया था। इसके क्षेत्रीय संचालन की औपचारिक शुरुआत 2007 में आंतरिक नाम ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के तहत हुई थी।
शुरुआत से ही घोषित उद्देश्य आक्रामक और व्यापक था। टीटीआई भारत के हर गाँव में कम से कम एक चर्च स्थापित करना चाहता था। 2009 में संगठन ने वैश्विक स्तर पर विस्तार करने के उद्देश्य से अपना नाम बदलकर द टिमोथी इनिशिएटिव कर लिया। हालाँकि भारत इसके सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों में से एक बना रहा।
टीटीआई का मकसद तेजी से चर्च बनाना और लोगों को जोड़ना है। इसमें ‘पॉल’, ‘तिमोथी’ और ‘टाइटस’ होते हैं। ‘पॉल’ स्थानीय प्रशिक्षक हैं, जो स्थानीय प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करते हैं और छात्रों के समूहों को प्रशिक्षित करते हैं। ‘तिमोथी’ शिष्य बनाने वाले और चर्च स्थापित करने वाले हैं, जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं। ‘टाइटस’ नए धर्मान्तरित लोग हैं, जिन्हें आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया जाता है। बाद में उन्हें भावी कार्यकर्ताओं के रूप में आगे बढ़ाया जा सकता है।
पश्चिमी चर्चों को टीटीआई का मकसद काफी आकर्षित करता है, क्योंकि इससे उसकी लागत कम हो जाती है और तेजी से ईसाइयत का प्रचार होता है। संगठन का दावा है कि एक ‘स्वदेशी चर्च’ संस्थापक को प्रशिक्षित कर करीब 240 से 400 डॉलर में स्थानीय स्तर पर चर्च स्थापित किया जा सकता है। इससे विदेशी चर्चों और डोनेशन नेटवर्क को भारत में बड़े पैमाने पर चर्च स्थापना अभियान प्रायोजित करने में मदद मिली।
इस मामले को इस तरह समझा जा सकता है। जाँच में ईडी ने बताया कि टीटीआई ने विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके छह महीनों में 95 करोड़ रुपए निकाले। अगर हम यह भी मान लें कि इसमें से केवल 40 करोड़ रुपए ही सीधे चर्चों की स्थापना के लिए इस्तेमाल किए गए, बाकी राशि पादरियों के वेतन, प्रार्थना सभाओं के आयोजन, दौरों, स्थानीय समन्वय और अन्य परिचालन खर्चों में खर्च हुई होगी, और अगर मान लें कि 1 अमेरिकी डॉलर 88 रुपये के बराबर थी, तब भी यह लगभग 454 लाख डॉलर बनता है, जो टीटीआई के बताए गए 400 डॉलर प्रति चर्च मॉडल के अनुसार 11300 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह केवल छह महीनों का अनुमान है।
जरा सोचिए, 2007 में अपनी स्थापना के बाद से यह समूह क्या कर सकता था। यह भी न भूलें कि उनके अपने दावे के अनुसार, उन्होंने 50 देशों में 268000 से अधिक चर्च स्थापित किए हैं, और भारत उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
स्रोत: टीटीआई
केंसिंग्टन चर्च और उत्तरी भारत में चर्च स्थापना
केंसिंग्टन चर्च अमेरिका के मिशिगन में मौजूद एक बहुद्देशीय चर्च है। हमारे रिसर्च के दौरान, यह टीटीआई के भारत नेटवर्क से जुड़े प्रमुख विदेशी चर्चों में से एक के रूप में सामने आया। इसके आधिकारिक टीटीआई दस्तावेज में ‘दक्षिण एशिया में 3000 से अधिक गृह चर्चों की शुरुआत’ का उल्लेख किया गया है। चर्च से संबंधित अन्य सार्वजनिक दस्तावेजों में उत्तरी भारत में चर्च स्थापित करने के लिए 200000 डॉलर से अधिक की धनराशि जुटाने का उल्लेख है।
केंसिंग्टन आठ चर्चों के एक बड़े नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ था, जिन्होंने कथित तौर पर चर्च स्थापित करने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया था। इसकी सार्वजनिक सामग्री में न केवल साझेदारी की भाषा शामिल थी, बल्कि भारत यात्रा के लिए व्यावहारिक बुनियादी ढाँचा भी था, जिसमें भारत के लिए सामान की सूची भी शामिल थी। इससे पता चलता है कि यह संबंध केवल प्रतीकात्मक या प्रार्थना कराने तक सीमित नहीं था।
इसके भारत पेज के अनुसार , यह चर्च, चर्च संस्थापकों और पादरियों के रूप में पुरुषों और महिलाओं को दो साल के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए भर्ती करता है। यही लोग पूरे भारत में हिंदुओं को इस चर्च के माध्यम से धर्मांतरित करते हैं। इन्होंने देश भर में अस्पताल स्थापित किए हैं, चिकित्सा शिविर चलाए हैं, अनाथालय स्थापित किए हैं और भी बहुत कुछ किया है।
स्रोत: केंसिंग्टन चर्च
स्वयं चर्च के अनुसार, उसका ‘ग्रेस चिल्ड्रन्स होम’ एक समय में 125 बच्चों को ‘आश्रय’ प्रदान करता है। उसका लक्ष्य केवल वयस्क ही नहीं, बल्कि भारत में 1 करोड़ बेघर बच्चे भी हैं। चर्च के पादरी की अगली भारत यात्रा नवंबर के दूसरे सप्ताह में निर्धारित है। हालाँकि इस विशेष कार्यक्रम में टीटीआई का उल्लेख नहीं है, लेकिन भारतीय एजेंसियों द्वारा इसकी जाँच की जानी चाहिए, क्योंकि चर्च का दावा है कि वह 2000 से भारत में इस तरह की गतिविधियों से जुड़ा हुआ है।
स्रोत: केंसिंग्टन चर्च
केंसिंग्टन से जुड़े तथ्यों से साफ होता है कि यह धन जुटाने, जन लामबंदी और जमीनी स्तर पर व्यावहारिक भागीदारी को सुनिश्चित करता है। इसका उत्तरी भारत से जुड़ाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि टीटीआई के भारत में परिचालन पर अब एफसीआरए ढाँचे के बाहर विदेशी धन के कथित हस्तांतरण के लिए नियामक जाँच चल रही है।
मिशन ग्रोव चर्च ने जुटाए करीब 15.32 करोड़ रुपए
एरिजोना के केव क्रीक में स्थित मिशन ग्रोव चर्च लगातार चर्चों की स्थापना और धर्मांतरण में लगा हुआ है। मिशन ग्रोव के एक पेज में कथित तौर पर ‘अगले 4 वर्षों में उत्तरी भारत और नेपाल में 4000 चर्च स्थापित करने’ का उल्लेख किया गया था। बाद में चर्च द्वारा जारी एक लिखित दस्तावेज में कहा गया कि भारत और बांग्लादेश में 4000 से अधिक चर्च स्थापित करने के लिए 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।
मिशन ग्रोव मामले के संबंध में पादरी जॉन क्रैगेल का नाम सामने आया है। सार्वजनिक घटनाक्रम से पता चलता है कि चर्च ने पहले भारत और नेपाल के लिए चार साल का लक्ष्य रखा था, लेकिन बाद में भारत और बांग्लादेश के अभियान की जानकारी दी । बताया जाता है कि एरिजोना में 81 व्यक्तियों, चर्चों और संगठनों की भागीदारी से 1.6 मिलियन डॉलर जुटाए गए थे।
स्रोत: मिशन ग्रोव चर्च
मिशन ग्रोव इस बात का एक अहम उदाहरण है कि कैसे टीटीआई के भारत से जुड़े अभियानों को विदेशों में चर्च स्थापना अभियानों के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
वुडडेल चर्च और भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा
मिनेसोटा के ईडन प्रेयरी में मौजूद वुडडेल चर्च भी टीटीआई से जुड़ा दिखाई देता है। इसके बुलेटिन में कथित तौर पर कहा गया है कि पादरी डेल और रिचर्ड पायने ‘भारत, नेपाल और बांग्लादेश की टिमोथी इनिशिएटिव प्रशिक्षण यात्रा’ से लौट आए हैं।
वुडडेल की 2015 की वार्षिक रिपोर्ट में लिखा था , “2015 में, टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी में एशिया में 600 से अधिक नए चर्च स्थापित करने के लिए 1000 से अधिक नए लोगों को प्रशिक्षित किया गया। #चर्चस्थापना”। 2023 में चर्च ने दावा किया कि उसने टीटीआई की मदद से 2000 से अधिक चर्च स्थापित किए।
स्रोत: वुडडेल चर्च
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वुडडेल के कुछ आँकड़े एशिया सेंट्रिक थे। यह सिर्फ भारत से जुड़ा नहीं था। हालाँकि भारत, नेपाल और बांग्लादेश की प्रशिक्षण यात्रा से यह स्पष्ट होता है कि चर्च और टीटीआई ने दक्षिण एशिया को टारगेट किया।
राइज सिटी चर्च और उत्तर भारत
ओरेगन के ग्रेशम में स्थित राइज सिटी चर्च ने भारत के संदर्भ में अपनी टीटीआई साझेदारी के बारे में बताया है। 2021 में चर्च ने कहा, “भारत में पादरियों को प्रशिक्षित करने और चर्च स्थापित करने में मदद करने” के लिए टीटीआई के साथ साझेदारी की है। 2022 में इसने टीटीआई को ‘भारत में तेजी से चर्च स्थापित करने वाली संस्था’ बताया।
इसके 2022 के अंत में जानकारी दी थी कि एक प्रतिनिधि ने उत्तर भारत की यात्रा की थी, ताकि उन कुछ चर्चों का दौरा कर सके, जिन्हें टिमोथी इनिशिएटिव के माध्यम से स्थापित की गई थी। यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि संबंध केवल विदेशी फंडिंग तक सीमित नहीं था। राइज सिटी ने उत्तरी भारत में स्थापित चर्चों के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ाव की जानकारी दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, राइज सिटी के किंगडम बिल्डर्स फंड ने शुरुआती चरण में लगभग 10000 डॉलर जुटाए थे , जबकि बाद के एक योजना पृष्ठ में कहा गया कि किंगडम बिल्डर्स का बजट बढ़कर लगभग 100000 डॉलर हो गया था। इसके अपडेट में यह भी बताया गया कि किंगडम बिल्डर्स ने दो वर्षों में दुनिया भर में 56 चर्च स्थापित किए।
मिशन हिल्स चर्च और 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन
कोलोराडो के लिटिलटन में स्थित मिशन हिल्स चर्च ने टिमोथी इनिशिएटिव को अपने ‘वर्ल्ड आउटरीच पार्टनर‘ के रूप में अपने लिस्ट में शामिल किया है । इसके अपडेट में कहा गया है कि 2025 तक इसने 1000 नए चर्चों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की होगी। इसी अपडेट में भारत में एक पार्टनर को 600 से अधिक भारतीय पादरियों के लिए एक पादरी सम्मेलन आयोजित करने में सहायता करने का भी उल्लेख किया गया है।
स्रोत: मिशन हिल चर्च
1000 चर्चों की स्थापना की बात पूरे विश्व के लिए कहा गया होगा, ऐसा लगता है। हालाँकि 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन करने की बात स्पष्ट रूप से भारत से जुड़ा मामला है। यह टीटीआई के भारत में मौजूद तंत्र का एक और पहलू है, जिसमें न केवल चर्चों की स्थापना शामिल है, बल्कि पादरी प्रशिक्षण और नेतृत्वकर्ता पैदा करना भी शामिल है।
बीजीसी कनाडा और प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल
कनाडा के बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस (बीजीसी कनाडा) के संबंध भी साफ जाहिर होते हैं। इसके आधिकारिक दस्तावेज में कहा गया है कि यह टिमोथी इनिशिएटिव के साथ साझेदारी कर रहा है। इसने बताया है कि एक चर्च स्थापित करने की लागत लगभग 400 अमेरिकी डॉलर है।
स्रोत: बीजीसी
अगस्त 2022 में भारत से प्रकाशित एक न्यूजलेटर में कथित तौर पर कहा गया था, ‘बीजीसी, टीटीआई के साथ मिलकर चर्च स्थापित कर रहा है,’ और यह भी बताया गया था कि टीटीआई को डोनेशन एडमोंटन के बीजीसी कार्यालय के माध्यम से दिया जा सकता है। न्यूजलेटर का लिंक बीजीसी कनाडा के कार्यकारी निदेशक केविन शूलर से था।
इससे पता चलता है कि किस प्रकार विदेशी संगठन टीटीआई की चर्च स्थापना से जुड़े हुए हैं और डोनेशन दे रहे हैं। हर चर्च के लिए 400 डॉलर का प्रस्ताव यह भी दर्शाता है कि कैसे अभियान को अंतरराष्ट्रीय ईसाई डोनर के लिए सरल बनाया गया, जिससे भारत में चल रहा नेटवर्क आसानी से काम कर सके।
नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट, हैनफोर्ड और स्प्रिंगब्रुक
वाशिंगटन के बेलिंगहैम स्थित नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च ने ईसाइयत के प्रचार-प्रसार करने वाले संगठन के लिस्ट में टिमोथी इनिशिएटिव को शामिल किया है और इसे भारत और नेपाल के ‘हर गाँव में एक चर्च’ स्थापित करने पर केंद्रित बताया। हालाँकि यहाँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी केंसिंग्टन या मिशन ग्रोव की तुलना में कम है, फिर भी टीटीआई चर्च के सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय मिशनों की सूची में शामिल था।
कैलिफोर्निया के हैनफोर्ड स्थित फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च का जिक्र चर्च के न्यूजलेटर के माध्यम से सामने आया । न्यूजलेटर में कहा गया था कि ‘डैन एस’ भारत के नेताओं से मजबूत संबंध बना कर चर्च स्थापना के लिए टीटीआई की मदद करवा रहे थे। इसके लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा था।
स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च 2014 की भारत यात्रा से जुड़ा था । पास्टर रिच के भारत पेज पर कथित तौर पर कहा गया था कि यह यात्रा द टिमोथी इनिशिएटिव और कन्वर्ज वर्ल्डवाइड के साथ साझेदारी में होगी। इस यात्रा में दक्षिण और उत्तर भारत के नेताओं और चर्च संस्थापकों से सीखने का अवसर मिलेगा।
लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल और दूसरी संस्थाएँ
टीटीआई के सिस्टम में चर्च से जुड़ी दूसरी संस्थाएँ और नेटवर्क भी शामिल थे । लिबर्टी चर्च नेटवर्क ने कथित तौर पर 2011 में टीटीआई के साथ साझेदारी की और 2011 से 2012 के दौरान पूरे भारत में 780 चर्चों को आर्थिक मदद की। यह 2012 से 2013 के दौरान पूर्वोत्तर भारत के 200 चर्चों से भी जुड़ा हुआ था।
ऑल एक्सेस इंटरनेशनल ने कथित तौर पर 2026 से 2027 तक ‘अचीव साउथ एंड साउथईस्ट एशिया’ पोर्टफोलियो का प्रबंधन किया , जिसके लिए 4578240 डॉलर का बजट आवंटित किया गया था। योजना के तहत 1050 ‘पॉल’ और 19000 ‘टिमोथी’ को प्रशिक्षित करके भारत और आसपास के क्षेत्रों में 11000 ‘हाउस चर्च’ स्थापित किया जाना है। ये उन इलाकों में होगा, जहाँ तक ईसाइयत की पहुँच काफी कम है।
खबरों के मुताबिक, साल्टबॉक्स चर्च ने अपने अंतरराष्ट्रीय मिशन पोर्टफोलियो के तहत मिशन इंडिया के साथ-साथ टीटीआई के वैश्विक चर्च स्थापना मंच को भी शामिल किया । वुडसाइड बाइबल चर्च ने भारत में अपनी अलग उपस्थिति बनाए रखी और 28 भारतीय राज्यों के 180 पादरियों और चर्च संस्थापकों के प्रशिक्षण के लिए टीमें भेजीं।
कुल मिलाकर इन सभी संस्थाओं की कार्यप्रणाली देखने से पता चलता है कि टीटीआई का भारत से संबंधित कार्य कोई अनौपचारिक या हवा में नहीं हो रहा। यह चर्चों, नेटवर्कों, दानदाताओं, प्रशिक्षकों और मिशन निकायों के एक व्यापक गठजोड़ का हिस्सा है।
जाति आधारित रणनीति
विदेशी चर्च नेटवर्क की मौजूदगी तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब इसे टीटीआई की क्षेत्रीय रणनीति के संदर्भ में देखा जाता है। स्थानीय प्रशिक्षण केन्द्र और स्थानीय लोगों को टारगेट करने के सुनियोजित चाल का पता चलता है, ताकि हिंदू बहुसंख्यक ग्रामीण समुदायों में पैठ बनाया जा सके। इससे स्थानीय विरोध को कम किया जा सकता है।
सबसे विवादित जाति आधारित मध्यस्थ रणनीति थी। आम जनता को उपदेश देने के बजाय, टीटीआई के माध्यम से चर्च संस्थापकों को निर्देश दिया गया था कि वे अलग-अलग जातियों के प्रमुख नेताओं की पहचान करें और उनका धर्म परिवर्तन कराएँ। इसके पीछे का तर्क आसान था। चूँकि जातियाँ स्थानीय सामाजिक जीवन को प्रभावित करती हैं, इसलिए किसी विशेष जाति के नेता को धर्म परिवर्तन कराने से उसी समूह के अन्य लोगों को भी धर्म परिवर्तन कराने का मार्ग प्रशस्त हो सकता था।
एक बार जब ऐसा कोई प्रभावशाली व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो उसे समुदाय को भीतर से प्रभावित करने के लिए मध्यस्थ के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि भारत की मौजूदा सामाजिक संरचनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यापक रणनीति के तहत धर्मांतरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
हिंदू धर्म की कर्म- पुनर्जन्म जैसी बातों को टारगेट करना
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई के पाठ्यक्रम में कर्म और पुनर्जन्म जैसे प्रमुख हिंदू विचारों को भी टारगेट किया गया था। इसके दसवें मैनुअल में ग्रामीण दर्शकों के सामने हिंदू दार्शनिक अवधारणाओं को नए सिरे से प्रस्तुत करने के तरीके बताए गए थे।
कथित तौर पर कर्म को एक ऐसा चक्र बताया गया, जिसमें क्षमा नहीं मिलती। ईसाइयत में चर्च में जाकर माफी माँगने से मसीह के माध्यम से तत्काल मुक्ति मिलने और दिव्य कृपा होने की बात कही गई। इसी प्रकार पाप के बारे में बताया गया।
यह महज एक धार्मिक चर्चा नहीं थी। यह गैर-ईसाई समुदायों को आकर्षित करने और उनके धर्मांतरण पाठ्यक्रम का हिस्सा था।
प्रतिरोध से बचने के लिए रणनीति
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीआई ने कार्यकर्ताओं को उन क्षेत्रों में खुलेआम ईसाइयत के प्रचार से बचने की सलाह दी गई थी, जहाँ विरोध की आशंका थी। बाइबिल ले जाना, पर्चे बाँटना या धार्मिक फिल्में दिखाने से विरोध हो सकता था। इसलिए यहाँ रणनीति में बदलाव किया गया।
कार्यकर्ताओं को धर्मग्रंथों को याद करने और मौखिक तौर पर बताने, कहानियाँ सुनाने और धीरे-धीरे लोगों से संबंध मजबूत करने के निर्देश दिए गए, ताकि गाँवों के रोजमर्रा के कामों और सामाजिक जीवन में घुला-मिला जा सके।
इससे पता चलता है कि परिचालन मॉडल केवल आर्थिक मदद और प्रशिक्षण तक ही सीमित नहीं था। इसमें स्थानीय माहौल के हिसाब से बदलाव भी शामिल था।
FCRA उल्लंघन की ED कर रही जाँच
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच ने टीटीआई के भारत में संचालन को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया है। अप्रैल 2026 में ईडी ने टीटीआई संचालकों से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। एजेंसी ने पाया कि टीटीआई विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत पंजीकृत नहीं थी, जिसके कारण यह भारत में विदेशी दान प्राप्त करने या वितरित करने के लिए कानूनी रूप से अयोग्य थी।
जाँचकर्ताओं ने पाया कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और विदेशी नागरिक ट्रांजिट हब के माध्यम से भारत में प्रवेश करते थे। बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर माइग्रेशन से जुड़े अधिकारियों ने ‘मिका मार्क’ या ‘जोस बेल’ नाम एक कूरियर को पकड़ा, जो कथित तौर पर लुक आउट सर्कुलर के तहत काम कर रहा था।
खबरों के मुताबिक, उसकी तलाशी के दौरान 24 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड बरामद किए गए, जो अमेरिका के ट्रूइस्ट बैंक द्वारा जारी किए गए और विदेशों में खातों से जुड़े थे। फॉरेंसिक जाँच में पता चला कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच, कई राज्यों में सुनियोजित तरीके से एटीएम से बड़ी रकम निकाले गए। इनमें से 95 करोड़ रुपए भारत में भेजे गए।
खबरों के मुताबिक, इस पैसे को एक विदेशी नियंत्रण वाले ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग डेटाबेस के माध्यम से ट्रैक किया गया था। संवेदनशील क्षेत्रों में कथित तौर पर 6.5 करोड़ रुपए का पता चला जाँचकर्ताओं को उस वक्त ज्यादा हैरान हुई जब लगभग 6.5 करोड़ रुपए छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतारी के साथ-साथ झारखंड में पाया गया। ये रकम संवेदनशील, आदिवासी बहुल और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भेजे गए थे।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चिंता की बात है। जनजातीय संवेदनशीलता और विदेशी फंडिंग वाले मिशनरी गतिविधियों के कारण ये क्षेत्र पहले से ही असुरक्षित हैं। इन क्षेत्रों में औपचारिक एफसीआरए चैनलों के बाहर एक नकदी-प्रधान समानांतर सिस्टम चल रहा है।
विदेशी चर्च नेटवर्क क्यों महत्वपूर्ण है?
अंतर्राष्ट्रीय चर्चों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दर्शाते हैं कि टीटीआई का भारत में संचालन केवल स्थानीय या अचानक नहीं था। विदेशी चर्चों ने सार्वजनिक रूप से धन जुटाया, चर्च स्थापना लक्ष्यों को बढ़ावा दिया, टीमें या प्रतिनिधि भेजे, पादरियों के प्रशिक्षण का समर्थन किया और भारत को एक ‘रणनीतिक मिशन क्षेत्र’ बनाया।
केंसिंग्टन का उत्तरी भारत अभियान, मिशन ग्रोव का 1.6 मिलियन डॉलर का धन उगाहना, बीजीसी कनाडा का प्रति चर्च 400 डॉलर का मॉडल, राइज सिटी की उत्तरी भारत यात्रा, मिशन हिल्स का 600 भारतीय पादरियों का सम्मेलन और वुडडेल की दक्षिण एशिया प्रशिक्षण यात्रा, ये सभी एक वैश्विक नेटवर्क की ओर इशारा करते हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि टीटीआई को विदेशी मदद मिल रही है या नहीं। असली सवाल यह है कि एक विदेशी समर्थित चर्च स्थापना प्रणाली ने नकदी का कारोबार कैसे भारत में करने लगा। उसने नेटवर्क कैसे बनाया। इसके बारे में जाँचकर्ताओं का कहना है कि यह एफसीआरए की निगरानी से बाहर चल रहा था।
सबूतों से पता चलता है कि भारत में टीटीआई की उपस्थिति सीमित नहीं थी। इसके पास धन, प्रशिक्षण प्रणाली, विदेशी चर्च की मदद, जातियों और संप्रदायों के नेटवर्क, स्थानीय स्तर पर जन अभियान में वह शामिल था। दूसरे शब्दों में, टीटीआई के इर्द-गिर्द फैला नेटवर्क एक संगठन से कहीं अधिक व्यापक था और भारत पर केंद्रित एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय चर्च ढाँचे का एक हिस्सा था।