बुंदेलखंड की पहचान कभी सिर्फ सूखे, पलायन और बदहाली से जुड़ी रही। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला यह क्षेत्र हर साल भीषण गर्मी झेलता है, जहाँ तापमान कई बार 47 डिग्री तक पहुँच जाता है। बारिश कम होने और जमीन के पथरीले होने की वजह से खेती हमेशा संकट में रही। लेकिन अब यही तेज धूप और विशाल खाली जमीन बुंदेलखंड की सबसे बड़ी ताकत बन गई है।
जिस इलाके को कभी विकास की दौड़ में पीछे माना जाता था, वही आज देश के सबसे बड़े सोलर (सौर) ऊर्जा केंद्रों में शामिल होने की तैयारी कर रहा है। बता दें कि बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जो सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए आदर्श मानी जाती है। यही वजह है कि जो धूप कभी किसानों के लिए मुसीबत थी, वही अब हजारों करोड़ रुपये के निवेश और रोजगार का आधार बन रही है।
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं पर बड़ा दाँव लगाया है, जिसके बाद बुंदेलखंड की तस्वीर तेजी से बदल रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे भी बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाओं की योजना तैयार की गई है। सरकार का लक्ष्य इस पूरे क्षेत्र को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के रूप में विकसित करना है, ताकि उत्तर प्रदेश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा हो सके।
4995 मेगावाट के 8 सोलर पार्कों से बदलता बुंदेलखंड
बुंदेलखंड में जिस जमीन को कभी खेती के लिए अनुपयोगी माना जाता था, अब उसी जमीन पर 4995 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता के 8 बड़े सोलर पार्क विकसित किए जा रहे हैं। केंद्र सरकार की सोलर पार्क योजना के तहत उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें सबसे बड़ा 1200 मेगावाट का सोलर पार्क जालौन में प्रस्तावित है।
इसके अलावा चित्रकूट में 800 मेगावाट, झाँसी और ललितपुर में 600-600 मेगावाट, छतरपुर में 950 मेगावाट, बरेठी में 630 मेगावाट और कल्पी में 65 मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी परियोजनाओं को मिलाकर बुंदेलखंड देश के बड़े सौर ऊर्जा क्लस्टरों में शामिल हो रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार और यूपी नेडा (UPNEDA) इन परियोजनाओं के जरिए बुंदेलखंड को सौर ऊर्जा हब के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। सरकार का फोकस उन इलाकों पर है जहाँ लगातार सूखा, कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती प्रभावित रही। यही वजह है कि बड़ी मात्रा में उपलब्ध बंजर और कम उत्पादक जमीन को सौर परियोजनाओं के लिए चिन्हित किया गया।
वैसे बुंदेलखंड में साल के करीब 300 दिन तेज धूप रहती है, जिसे सोलर पावर उत्पादन के लिए आदर्श माना जाता है। इसी प्राकृतिक स्थिति को आधार बनाकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस इलाके में बड़े स्तर पर सौर निवेश बढ़ाने की रणनीति तैयार की है।
कबरई से बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे तक, सोलर कॉरिडोर का विस्तार
बुंदेलखंड में सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार सिर्फ झाँसी और जालौन तक सीमित नहीं है। महोबा के कबरई में भी बड़े सोलर प्लांट पर काम चल रहा है, जिसे इस पूरे क्षेत्र के ऊर्जा नेटवर्क का अहम हिस्सा माना जा रहा है। कबरई प्लांट को बुंदेलखंड में तेजी से बढ़ रहे सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसके साथ ही करीब 296 किलोमीटर लंबे बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के किनारे 450 से 500 मेगावाट क्षमता की सोलर परियोजनाएँ विकसित करने की योजना भी तैयार की गई है। उत्तर प्रदेश सरकार एक्सप्रेसवे और सोलर परियोजनाओं को जोड़कर ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर मॉडल पर काम कर रही है।
इसका मकसद बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और औद्योगिक निवेश को एक साथ बढ़ाना है। इसी वजह से एक्सप्रेसवे से जुड़े इलाकों में जमीन चिन्हित करने और निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने की प्रक्रिया तेज की गई है।
यूपी पीपीटीसीएल के प्रबंध निदेशक मयूर महेश्वरी ने कहा, “चरखारी, डकोर, बांगरा, बमौर, बिरधा, जैतपुर, हमीरपुर, बांदा और मड़ावरा उपकेंद्र जल्द हो जाएँगे। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर-2 परियोजना के तहत पहली बार सोलर प्लांट से हरित ऊर्जा की सफल निकासी शुरू होना प्रदेश की विद्युत व्यवस्था के लिए उपलब्धि है।”
बंजर जमीन अब किसानों की कमाई का नया जरिया
बुंदेलखंड में खेतों में भी सोलर लग रहे हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक झाँसी और आसपास के कई गाँवों में किसान अपनी जमीन सोलर कंपनियों को लीज पर दे रहे हैं। किसानों का कहना है कि खेती से सालभर में जितनी कमाई नहीं हो पाती थी, उससे ज्यादा रकम अब तय किराये के रूप में मिल रही है।
कई किसानों ने बताया कि कम बारिश और सिंचाई संकट की वजह से खेती लगातार घाटे में जा रही थी। ऐसे में सोलर कंपनियों के साथ 25 से 30 साल तक के अनुबंध उनके लिए स्थायी आय का जरिया बन गए हैं।
रिपोर्ट में ऐसे किसानों का भी जिक्र है जिनकी जमीन पहले बंजर या कम उत्पादक मानी जाती थी। उन्हीं जमीनों पर अब बड़े स्तर पर सोलर परियोजनाएँ विकसित हो रही हैं। झाँसी, ललितपुर, जालौन और महोबा जैसे जिलों में कंपनियां किसानों से सीधे समझौते कर रही हैं। किसानों का कहना है कि पहले फसल बारिश पर निर्भर रहती थी और हर साल नुकसान का डर बना रहता था, लेकिन अब उन्हें निश्चित आय मिल रही है।
इसी वजह से कई गाँवों में खेती छोड़कर जमीन लीज पर देने का मॉडल तेजी से बढ़ा है। सरकार भी उन इलाकों को प्राथमिकता दे रही है जहाँ पानी की कमी और कम उत्पादन की वजह से खेती लंबे समय से प्रभावित रही है।


