Home Blog Page 58

राहुल गाँधी का ‘हीरो’ मोहम्मद दीपक एक्सपोज, मदद मिली फिर भी नहीं दिया किराया: दुकान खाली करने का मिला नोटिस तो हिंदू मकान मालिक पर मढ़ने लगा दोष

उत्तराखंड के कोटद्वार में ‘मोहब्बत की दुकान’ चलाने का नाटक करने वाले जिम ट्रेनर ‘मोहम्मद दीपक’ की असलियत अब पूरी तरह खुल चुकी है। इस साल जनवरी 2026 में एक विवाद के बाद खुद को इंटरनेट सेंसेशन बताने वाले मोहम्मद दीपक अब अपनी कंगाली का रोना रो रहे हैं। वे मीडिया में जाकर विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं कि उनका ‘आर्थिक बहिष्कार’ किया जा रहा है।

लेकिन असलियत यह है कि जब वे विवादों में आए थे, तब देश के बड़े-बड़े नेताओं और वामपंथी गैंग ने उनके पीछे पैसों की बरसात कर दी थी। उनके जिम की मेंबरशिप खरीदने के लिए होड़ मच गई थी। लाखों रुपए हाथ में आने के बाद मोहम्मद दीपक ने उस पैसे का इस्तेमाल अपने जिम को चलाने या किराया देने में नहीं किया।

उसने वह सारा पैसा अपने घर की EMI और बच्चों की फीस जैसी निजी चीजों में उड़ा दिया। अब जब मकान मालिक ने चार महीने से किराया न मिलने पर दुकान खाली करने को कहा, तो मोहम्मद दीपक इस पूरी कानूनी और व्यावहारिक बात को सांप्रदायिक रंग देने में जुट गए हैं।

जनता से मिला पैसा निजी खर्चों में उड़ाया, अब हिंदू मकान मालिक को बता रहे ‘विलेन’

पॉलिटिक्स और सोशल मीडिया की इस हवा के बाद मोहम्मद दीपक के जिम में आने वाले लोगों की संख्या 15 से बढ़कर सीधे 70 तक पहुँच गई। मेंबरशिप ड्राइव से उसके पास मोटा पैसा आया। लेकिन मोहम्मद दीपक की नीयत यहीं डोल गई। लोगों ने पैसा इसलिए दिया था ताकि उनका जिम बिना किसी रुकावट के चल सके। मगर दीपक ने उस पैसे से जिम का 40 हजार रुपए महीना किराया नहीं चुकाया।

दीपक ने खुद मीडिया के सामने कबूल किया है कि मेंबरशिप से मिले सारे पैसों को उन्होंने अपने घर के लोन की किश्तें (EMI) भरने और बच्चों की स्कूल फीस में उड़ा दिया। जब चार महीने तक मकान मालिक को एक रुपया किराया नहीं मिला, तो उसने स्वाभाविक रूप से जिम खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया। अब अपनी इस बड़ी नाकामी और धोखेबाजी को छिपाने के लिए मोहम्मद दीपक अपने हिंदू मकान मालिक को ही विलेन साबित करने में तुला है। वे आरोप लगा रहा है कि मकान मालिक उसे इसलिए हटा रहा है क्योंकि उन्होंने मुस्लिमों का साथ दिया था।

यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर मकान मालिक इतना ही नफरती था, तो उसने चार महीने तक बिना किराए के दीपक को जिम चलाने की छूट क्यों दी? कोई भी आम इंसान कोर्ट-कचहरी के मामलों में फँसे किराएदार को एक महीने का भी समय नहीं देता, लेकिन मकान मालिक ने चार महीने तक सब्र किया।

राहुल गाँधी से लेकर स्वरा भास्कर तक ने बनाया था ‘फर्जी हीरो’

यह पूरा तमाशा 26 जनवरी 2026 को शुरू हुआ था। कोटद्वार में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने एक मुस्लिम दुकानदार से अपनी दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने को कहा था। वहाँ जिम चलाने वाले दीपक कुमार ने बीच में कूदकर मुस्लिम दुकानदार का पक्ष लिया। जब लोगों ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। बस फिर क्या था, देश के तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी गैंग को देश को बदनाम करने का एक नया चेहरा मिल गया।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने तो 1st फरवरी को सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर दीपक को देश का ‘हीरो’ और ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान‘ का जीता-जागता प्रतीक तक घोषित कर दिया। इसके बाद राहुल गाँधी ने मोहम्मद दीपक को दिल्ली में अपने घर पर भी बुलाया। वहाँ उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए दीपक को शेर दिल योद्धा बताया और वादा किया कि वे कोटद्वार आकर उनके जिम की मेंबरशिप लेंगे। हालाँकि, राहुल गाँधी कभी वहाँ नहीं पहुँचे।

राहुल गाँधी के अलावा उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर और एक्टिविस्ट हर्ष मंदर जैसे बड़े नामों ने भी सोशल मीडिया पर दीपक के सपोर्ट में कसीदे पढ़े।

इन सबने लोगों से दीपक के जिम की मेंबरशिप खरीदने की अपील की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 15 सीनियर वकीलों ने 10-10 हजार रुपए देकर उनके जिम की सालाना मेंबरशिप खरीदी। CPIM के सांसद जॉन ब्रिटास ने भी खुद जाकर जिम की मेंबरशिप ली। यानी दीपक के पास पैसों की कोई कमी नहीं होने दी गई।

जिस समुदाय के लिए दीपक बना ‘मोहम्मद’, उसी ने फेर लिया मुँह

दीपक कुमार ने हिंदुओं को नीचा दिखाने और वामपंथियों से वाहवाही लूटने के लिए अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ रख लिया था। उसने सोशल मीडिया पर यहाँ तक कह दिया था कि ‘मोहम्मद’ नाम में बहुत ताकत है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह रही कि जिस मुस्लिम समुदाय का मसीहा बनने के चक्कर में उसने अपना नाम बदला, उसी मुस्लिम समुदाय ने मुसीबत के समय उनका साथ नहीं दिया।

इतने बड़े विवाद और सोशल मीडिया हाइप के बाद भी उसके जिम की मेंबरशिप केवल 70 तक ही सिमट कर रह गई। किसी भी स्थानीय मुस्लिम संगठन या व्यक्ति ने ग्राउंड पर आकर उनके जिम को बचाने के लिए आर्थिक मदद नहीं की। वे सिर्फ सोशल मीडिया पर बयानबाजी तक ही सीमित रहे।

संदिग्ध रहा है मोहम्मद दीपक का पुराना इतिहास

जाँच में यह भी सामने आया है कि मोहम्मद दीपक का इतिहास पहले से ही काफी विवादित और संदिग्ध रहा है। उसके संबंध दुबई के एक बिजनेसमैन चांद मौला बख्श से रहे हैं, जो उनके लिए बॉडीबिल्डिंग के इवेंट्स आयोजित कराता था। इसके अलावा दीपक यूथ कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष विजय रावत के भी बेहद करीबी रहा है। सोशल मीडिया पर उसके पुराने पोस्ट्स में बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषा का इस्तेमाल देखने को मिलता रहा है।

मार्च के महीने में उनके खिलाफ पुलिस में FIR भी दर्ज हुई थी, जिसे रद्द कराने के लिए वे उत्तराखंड हाई कोर्ट पहुँचा था। तब हाई कोर्ट ने उसे फटकार लगाते हुए सोशल मीडिया पर किसी भी तरह के भड़काऊ वीडियो या मैसेज पोस्ट न करने की सख्त हिदायत दी थी।

जाहिर है कि पीड़ित होने का ढोंग करने वाला मोहम्मद दीपक असल में कोई पीड़ित नहीं हैं। उसने केवल एक घटना का फायदा उठाकर देश के बड़े नेताओं से पैसे और पब्लिसिटी बटोरी। जब वह पैसा खत्म हो गया और अपनी ही गलती से जिम बंद होने की कगार पर आ गया, तो वे एक बार फिर देश का माहौल खराब करने के लिए विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं।

19 साल के रिसर्चर ने किया ‘CBSE मार्किंग पोर्टल’ को हैक करने का दावा, कहा- ना OTP की जरूरत, ना पासवर्ड की: बोर्ड ने कहा- असली सिस्टम सुरक्षित, वो थी टेस्टिंग साइट

CBSE की कॉपियाँ जाँचने वाले ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) पोर्टल में एक बड़ी गड़बड़ी का दावा सामने आया। टेक बिजनेसमैन दीदी दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर 19 साल के साइबर सुरक्षा रिसर्चर निसर्ग अधिकारी के हवाले से एक पोस्ट शेयर की। इस पोस्ट में दावा किया गया कि CBSE मार्किंग पोर्टल की सुरक्षा में बड़ी चूक थी, जिसका फायदा उठाकर कोई भी बाहर का व्यक्ति छात्रों के नंबर देख और बदल सकता था। निसर्ग के इस खुलासे के बाद इंटरनेट पर यह मामला काफी वायरल होने लगा और लोगों ने CBSE की इसे बड़ी अनदेखी करार दिया।

जब इस मामले ने सोशल मीडिया पर तूल पकड़ा तो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस पर अपना आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया। CBSE ने हैकिंग और डेटा लीक के इन सभी दावों को पूरी तरह से खारिज किया है। बोर्ड ने साफ किया है कि जिस वेबसाइट (http://cbse.onmark.co.in) को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग साइट थी। इस पर किसी छात्र का असली डेटा या नंबर मौजूद नहीं था। कॉपियाँ जाँचने वाला असली पोर्टल बिल्कुल अलग और पूरी तरह सुरक्षित है, इसलिए किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है।

कैसे शुरू हुआ हैकिंग का यह पूरा खेल?

निसर्ग अधिकारी ने इसी साल अपनी 12वीं क्लास पास की है। उन्हें कंप्यूटर सुरक्षा यानी साइबर सिक्योरिटी में बहुत दिलचस्पी है। CBSE ने इस साल कॉपियाँ जाँचने के लिए एक ऑनलाइन वेबसाइट शुरू की थी। इस वेबसाइट को ‘ऑन-स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) पोर्टल नाम दिया गया। निसर्ग ने ध्यान दिया कि इस वेबसाइट का लिंक पूरी तरह खुला हुआ था। इसे इंटरनेट पर कोई भी इंसान आसानी से खोल सकता था।

निसर्ग अधिकारी ने सिर्फ अपनी उत्सुकता के कारण इस वेबसाइट को थोड़ा गहराई से देखना शुरू किया। उन्होंने इसके पीछे चल रहे कंप्यूटर कोड की जाँच की। बाहर से देखने पर यह वेबसाइट बिल्कुल आम वेबसाइटों जैसी ही लगती थी। इसके लॉगिन पेज पर यूजर ID, स्कूल कोड और पासवर्ड माँगा जाता था। इसके बाद मोबाइल पर आने वाला ओटीपी (OTP) भी डालना पड़ता था। बाहर से इसमें कोई खराबी नहीं दिख रही थी। लेकिन जैसे ही निसर्ग ने इसके अंदरूनी कोड को खंगाला, तो उनके होश उड़ गए। कोड के अंदर सुरक्षा की बहुत बड़ी कमियाँ छिपी हुई थीं।

कोडिंग के अंदर खुलेआम लिखा था ‘मास्टर पासवर्ड’

निसर्ग अधिकारी ने अपने ब्लॉग में इस वेबसाइट के काम करने का तरीका समझाया है। उन्होंने बताया कि यह एक आधुनिक ‘एंगुलर’ एप्लीकेशन वेबसाइट है। इस तरह की वेबसाइटें अपनी पूरी कोडिंग को एक बंडल (फाइल) में समेट देती हैं। फिर यह मुख्य जावास्क्रिप्ट फाइल यूजर के कंप्यूटर या मोबाइल ब्राउजर पर भेज दी जाती है। यह फाइल इंटरनेट पर पूरी तरह से पब्लिक थी। यानी कोई भी इंसान इस फाइल को आसानी से देख और डाउनलोड कर सकता था।

निसर्ग अधिकारी ने इसी कोडिंग वाली फाइल को डाउनलोड कर लिया। इसके बाद उन्होंने इसे ध्यान से पढ़ना शुरू किया। पढ़ते-पढ़ते उन्हें कोडिंग के अंदर एक ‘मास्टर पासवर्ड’ लिखा हुआ मिल गया। यह पासवर्ड बिल्कुल साफ-साफ अक्षरों में लिखा था। इसे किसी सुरक्षित कोड या गुप्त रूप में नहीं छिपाया गया था।

ब्लॉग स्क्रीनशॉट

इस ‘मास्टर पासवर्ड’ की सबसे खतरनाक बात यह थी कि यह पूरी वेबसाइट का ताला खोल सकता था। इसे लॉगिन पेज पर डालते ही वेबसाइट की सारी सुरक्षा खत्म हो जाती थी। इसे डालने के बाद मोबाइल पर आने वाले ओटीपी (OTP) की जरूरत भी नहीं पड़ती थी। इस पासवर्ड के जरिए कोई भी हैकर कॉपियाँ जाँचने वाले किसी भी टीचर के अकाउंट में सीधे घुस सकता था। इसके लिए हैकर को बस टीचर की यूजर ID और स्कूल कोड का पता होना जरूरी था। यह दोनों जानकारियाँ इंटरनेट पर बहुत आसानी से मिल जाती हैं।

सुरक्षा के नाम पर ‘OTP’ का खेल निकला महज एक नाटक

निसर्ग ने आगे दावा किया कि इस वेबसाइट का ओटीपी (OTP) सिस्टम पूरी तरह से बेकार था। यह सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक दिखावा या नाटक था। आम तौर पर जब हम किसी वेबसाइट पर लॉगिन करते हैं, तो OTP हमारे मोबाइल फोन पर आता है। इसके बाद वेबसाइट का मुख्य कंप्यूटर (Server) जाँच करता है कि आपने सही OTP डाला है या नहीं। लेकिन CBSE की इस वेबसाइट में पूरा खेल ही उल्टा चल रहा था।

इस वेबसाइट में जब कोई लॉगिन करने की कोशिश करता था, तो मुख्य सर्वर खुद ही सही OTP का जवाब कोडिंग के अंदर आपके कंप्यूटर ब्राउजर को भेज देता था। इसके बाद ब्राउजर के अंदर चल रहा कोड खुद ही यह चेक करता था कि यूजर ने जो OTP डाला है, वह सही है या नहीं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जैसे कोई छात्र खुद ही अपनी परीक्षा ले रहा हो और खुद ही अपने आप को नंबर भी दे रहा हो।

इंटरनेट और नेटवर्क की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति अपने कंप्यूटर की स्क्रीन पर ही सही OTP को साफ-साफ देख सकता था। कोडिंग में थोड़ी सी चालाकी करके बिना कोई OTP डाले भी सीधे वेबसाइट के अंदर एंट्री पाई जा सकती थी। इसी बात पर निसर्ग ने अपने ब्लॉग में एक बड़ी बात लिखी। उन्होंने लिखा, “जो सुरक्षा चक्र हमलावर के खुद के कंप्यूटर पर चलता है, वह असल में कोई सुरक्षा चक्र होता ही नहीं है।”

बिना लॉगिन के ही खुल रहे थे अंदरूनी डैशबोर्ड

इस वेबसाइट में कमियों की लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती है। निसर्ग अधिकारी के मुताबिक वेबसाइट के अंदर के कई जरूरी पन्ने पूरी तरह से खुले पड़े थे। इनमें मुख्य डैशबोर्ड, प्रोफाइल पेज और कॉपियाँ देखने वाला पेज शामिल थे। इसके अलावा वेरिफिकेशन डैशबोर्ड भी बिना किसी सुरक्षा के खुला था। इन सभी महत्वपूर्ण पन्नों पर सुरक्षा का कोई ताला नहीं लगा था।

ब्लॉग स्क्रीनशॉट

इन पन्नों को खोलने के लिए किसी असली पासवर्ड की जरूरत नहीं थी। कंप्यूटर के ब्राउजर स्टोरेज में सिर्फ कुछ फर्जी शब्द डालने होते थे। इसके बाद कुछ साधारण कमांड देकर इन सभी गुप्त पन्नों को सीधे खोला जा सकता था।

इस वेबसाइट को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि उसे खोलने वाला यूजर असली है या नकली। यह सुरक्षा जाँच के लिए किसी असली टोकन या पास की माँग नहीं करती थी। यह बिना किसी रोक-टोक के किसी भी अनजान व्यक्ति को सीधे मुख्य डैशबोर्ड पर पहुँचा देती थी।

पुराना पासवर्ड जाने बिना बदल जाता था नया पासवर्ड

इस वेबसाइट का पासवर्ड बदलने वाला सिस्टम तो सबसे ज्यादा कमजोर था। आम तौर पर जब हम किसी अकाउंट का पासवर्ड बदलते हैं, तो हमसे पुराना पासवर्ड पूछा जाता है। लेकिन इस वेबसाइट में पुराना पासवर्ड चेक करने का कोई इंतजाम ही नहीं था। कंप्यूटर की कोडिंग में ऐसी गड़बड़ी थी कि पुराना पासवर्ड मुख्य कंप्यूटर (Server) के पास जाता ही नहीं था।

ब्लॉग स्क्रीनशॉट

इसका फायदा उठाना किसी भी हैकर के लिए बहुत आसान था। हैकर को बस कॉपियाँ जाँचने वाले शिक्षक की आईडी (Valuator ID) बदलनी होती थी। वह किसी भी शिक्षक की ID डालकर उसका पासवर्ड अपनी मर्जी से बदल सकता था। कंप्यूटर की दुनिया में इस बड़ी कमी को ‘सिस्टेमिक IDOR’ कहा जाता है।

इन दोनों गलतियों की वजह से कोई भी हैकर किसी भी शिक्षक के अकाउंट पर पूरी तरह कब्जा कर सकता था। इसके बाद वह वेबसाइट के अंदर आसानी से घुस जाता था। वह वहाँ रखी छात्रों की जाँची गई कॉपियों को आराम से देख सकता था। सबसे डरावनी बात यह है कि वह छात्रों के नंबरों को भी अपनी मर्जी से बदल सकता था।

ब्लॉग स्क्रीनशॉट

तीन महीने पहले सरकार को बताया, पर नहीं सुधरी गलती

निसर्ग अधिकारी ने बताया कि उन्होंने इस बड़े खतरे की जानकारी समय रहते सरकार को दे दी थी। उन्होंने 25 फरवरी 2026 को ही भारत सरकार की मुख्य साइबर सुरक्षा एजेंसी ‘CERT-In’ को एक ईमेल भेजा था। अपने पहले ईमेल में उन्होंने मास्टर पासवर्ड के लीक होने की बात बताई थी। साथ ही उन्होंने ओटीपी (OTP) सिस्टम की कमजोरी का भी जिक्र किया था।

इसके बाद सरकारी एजेंसी ने उनसे और जानकारी माँगी। एजेंसी ने उनसे कमियों को साबित करने के लिए सबूत भी माँगे। निसर्ग अधिकारी ने बकायदा कंप्यूटर की स्क्रीन रिकॉर्ड करके Video बनाए। उन्होंने लाइव वीडियो के जरिए पूरे पोर्टल को हैक करके दिखा दिया। उन्होंने सारे वीडियो सबूत के तौर पर एजेंसी को भेज दिए।

यह सब करने के बाद निसर्ग को एजेंसी से एक ईमेल मिला। यह सिर्फ एक साधारण और ऑटोमैटिक ईमेल था। इसमें बस उनकी शिकायत दर्ज होने का एक नंबर लिखा था। निसर्ग का दावा है कि इसके बाद उन्होंने कई बार ईमेल भेजे। उन्होंने अधिकारियों को बार-बार इस खतरे की याद दिलाई। इसके बावजूद महीनों तक इस राष्ट्रीय स्तर की वेबसाइट की कमियों को सुधारा नहीं गया।

निसर्ग अधिकारी को प्राप्त मेल

इस लापरवाही पर निसर्ग अधिकारी ने तंज भी कसा है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा, “अगर यह मेरा सिस्टम होता, तो मैं इन कमियों को एक या दो घंटे में ठीक कर देता।” उन्होंने सरकारी अधिकारियों के इस ढीले रवैये पर गहरी हैरानी जताई है।

ब्लॉग स्क्रीनशॉट

CBSE गड़बड़ी ठीक करने दिल्ली बुलाए गए IIT कानपुर-मद्रास के वैज्ञानिक

CBSE पोर्टल में आ रही लगातार गड़बड़ियों को देख केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस तकनीकी समस्या को तुरंत ठीक करने के लिए एक विशेष टीम बनाई है। इस टीम में IIT कानपुर के 2 और IIT मद्रास के 2 सीनियर वैज्ञानिकों को शामिल किया गया है।

इनमें IIT कानपुर से प्रोफेसर कलोल मंडल और डॉक्टर आनंद हांडा जैसे बड़े नाम हैं। शिक्षा मंत्री ने इन चारों वैज्ञानिकों को तुरंत दिल्ली तलब किया है। उन्हें इस तकनीकी चुनौती का जल्द से जल्द समाधान खोजने का सख्त निर्देश दिया गया है।

CBSE की वेबसाइट हैकिंग मामले पर बोर्ड का स्पष्टीकरण

CBSE ने सोशल मीडिया पर फैले इस पूरे विवाद को शांत करते हुए साफ किया है कि जिस वेबसाइट को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग साइट थी।

वेबसाइट का लिंक अलग है: बोर्ड ने साफ किया है कि छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की जाँच करने के लिए जिस असली पोर्टल का इस्तेमाल किया गया था, उसका इंटरनेट लिंक (URL) बिल्कुल अलग था।

यह केवल एक टेस्टिंग साइट थी: सोशल मीडिया पर जिस लिंक को हैक करने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ आंतरिक जाँच और समीक्षा के लिए बनाई गई एक टेस्टिंग (सैंपल) साइट थी।

कोई असली डेटा लीक नहीं हुआ: इस टेस्टिंग साइट पर किसी भी छात्र के असली नंबर, कॉपियों का मूल्यांकन या कोई अन्य जरूरी डेटा मौजूद नहीं था। इसमें सिर्फ काल्पनिक डेटा डाला गया था।

सुरक्षा में कोई चूक नहीं: बोर्ड ने भरोसा दिलाया है कि कॉपियाँ जाँचने वाले असली पोर्टल में कोई भी गड़बड़ी नहीं थी और न ही उसकी सुरक्षा से कोई समझौता हुआ है।

सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित है: CBSE के अनुसार, यह सिस्टम मूल्यांकन को और बेहतर व पारदर्शी बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसमें सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम हैं, इसलिए सभी छात्र और अभिभावक पूरी तरह निश्चिंत रहें।

सुनो Newslaundary वाली ‘तिलचट्टी’ मनीषा पांडे, हमें पता है हिंदू घृणा होती है जिनकी रिपोर्टिंग स्टाइल, उनकी फैन फॉलोइंग पाकिस्तान में ही होती है

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को उसके तथाकथित संस्थापक अभिजीत दिपके जितनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा वामपंथी-लिबरल गैंग इसके जरिए अपने प्रोपेगेंडा को हवा देने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। आज हर वामपंथी-लिबरल गैंग के व्यक्ति के मुँह पर सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी का ही नाम सुनाई दे रहा है। इसी सटायर पार्टी की एक फैन न्यूजलॉन्ड्री (Newslaundry) वाली मनीषा पांडे भी हैं। लेकिन ‘मैडम’ खुशी-खुशी में कुछ ज्यादा ही बोल गईं।

इतना ज्यादा कि कल को न्यूजलॉन्ड्री पर एक और आपराधिक मुकदमा दर्ज हो जाए तो इसकी जिम्मेदार मनीषा पांडे ही होंगी, जैसे वो मानहानि वाले केस में थीं। वही मानहानि वाला केस, जिसमें मनीषा पांडे को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके पत्रकार होने पर दुत्कार दिया था, उन्हें न्यूजलॉन्ड्री बाहर निकालने तक को कह दिया था। बेचारी इतना जलील होने के बाद भी अपने पैरों पर खड़ी हैं.. यहाँ पैरों में ‘र’ कि जगह ‘स’ पढ़ा जाए क्योंकि यह मेरा सटायर मूव है। ठीक वही मूव जिसे मनीषा पांडे अपनी ‘पत्रकारिता’ बताती हैं। खैर इसकी बात आगे करेंगे।

अभी बात करते हैं मनीषा पांडे की फुहड़ता की। तो हुआ कुछ ऐसा कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ बनने की खुशी में प्रोपेगेंडाबाज कॉमेडियन कुणाल कामरा ने अपने यूट्यूब चैनल पर ‘दावत’ रखी। इस दावत में पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके चीफ गेस्ट के रूप में आमंत्रित थे और बाकी वामपंथी जखीरे से न्यूजलॉन्ड्री की मनीषा पांडे, ‘डॉ. मेदुसा’ नाम से फेमस डॉ. माधुरी काकोटी और दावत का परमानेंट पैनल रोफल गाँधी और आम्या देशपांडे हिस्सा थे।

इस दावत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी‘ के भविष्य, वर्तमान और भूतकाल को लेकर चर्चा हुई। मजाक-मजाक में राजनीतिक दल बनाने वाले अभिजीत पांडे भी सन्न रह गए कि जिसे वे ‘जोकरों का शो’ समझकर आए थे, वहाँ ऐसी गंभीर चर्चा क्यों हो रही है। वह बार-बार बोलते: “मुझे तो लगा ही नहीं कि सब इतना सीरियस हो जाएँगे।”

लेकिन बातों-बातों में अभिजीत भी सच बोल गए। उन्होंने बताया कि कैसे CJP को विदेशों से प्रेम मिल रहा है, यहाँ तक कि सरकार विरोधी गतिविधियों पर नजरें गाढ़कर बैठने वाले अल जजीरा, द टेलीग्राफ जैसे विदेशी मीडिया संस्थान उनकी इस ऑनलाइन ट्रेंड को फॉलो भी कर रहे हैं। जैसे बाकी लोगों को पता ही नहीं कि इन विदेशी मीडिया में भारत के खिलाफ कैसी खबरें लिखी जाती हैं।

दावत के सभी गणमान्य लोगों ने मिलकर एक संकल्प भी लिया। यह संकल्प था, अपने-अपने पिता के फोन से BJP का कंटेन्ट हटाना है, उनका एल्गोरिदम बिगाड़कर उन्हें सिर्फ न्यूजलॉन्ड्री जैसे वामपंथी संस्थान का कंटेन्ट देखने को मजबूर करना है। यानी CJP को गंभीरता से लेने का ड्रामा करते हुए पूरी तरीके से BJP-विरोधी माहौल बनाया गया।

इस बीच मनीषा पांडे ने भी सरकार पर खूब गुस्सा निकाला और CJP बनने की खुशी में खूब बातें की। पहली चीज कि मनीषा पांडे ने CJP को नेपाल में GenZ प्रदर्शन से जोड़ा और कहा कि CJP की ही तरह नेपाल में भी सोशल मीडिया से सत्ता परिवर्तन का सिलसिला शुरू हुआ था। अपनी बातों में उन्होंने देश के युवाओं को नेपाल जैसा ही कुछ हिंसक करने के लिए भड़काया। इसीलिए मैंने कहा था कि अगर कल को मनीषा पांडे पर कानूनी कार्रवाई हुई तो वह खुद इसकी जिम्मेदार होंगी और खुद तो डूबेंगी ही अपनी रोजी-रोटी के संसाधन न्यूजलॉन्ड्री को भी ले डूबेंगी।

ऐसा भी इसीलिए क्योंकि मनीषा पांडे ने न्यूजलॉन्ड्री की पोल भी खोलकर रख दी। उन्होंने कबूल किया कि वह जो Newsance शो करती हैं, जिसमें वह भारत के पत्रकारों की हँसी-मजाक करते हुए आलोचना करती हैं, उसको देखने वाले अधिकतर पाकिस्तानी ही हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि वह अपने शो में एक QR स्कैनर दिखाती हैं, जिसमें पैसा माँगती हैं। यानी अगर मनीषा के अनुसार उनके शो के अधिकतर फैंस पाकिस्तानी हैं तो क्या पैसा देने वाले भी पाकिस्तानी ही हैं, और उसी पैसे से यह न्यूजलॉन्ड्री सरकार-विरोधी और मीडिया-विरोधी प्रोपेगेंडा गढ़ भी रहा है?

मनीषा पांडे ने चाहे व्यंग्य में चाहे गंभीर होकर जो भी पोल खोली है, उसका अंदाजा पहले ही उनकी रिपोर्टिंग स्टाइल और भारत में हुए उनसे जुड़े विवाद को देखकर लगाया जा सकता था कि उनके फैंस पाकिस्तान में ही हो सकते हैं।

2024 में जब हल्द्वानी में अवैध मस्जिद गिराने गई पुलिस टीम पर मुस्लिम दंगाइयों ने हमला किया, लेकिन मनीषा पांडे ने उन हमलावरों को ‘मुस्लिम’ कहने से परहेज किया औऱ सिर्फ ‘भीड़’ बताकर मामला पेश किया। उस दौरान न्यूजलॉन्ड्री भी लगातार उन्हें पीड़ित साबित करने में जुटा रहा।

उधर, जनवरी 2024 में जब महाराष्ट्र के थाने जिले स्थित मीरा रोड पर जब मुस्लिमों ने हिंदुओं पर हमला किया, तब भी मनीषा पांडे का वही रवैया देखने को मिला। न्यूजलॉन्ड्री ने खबरें चलाईं कि हिंदू भगवान राम के नारे लगाकर मुस्लिमों को उकसा रहे थे, जबकि हिंसा करने वालों की पहचान पर चुप्पी साध ली गई।

यहाँ तक कि जब मई 2025 में नैनीताल में 73 साल के एक मुस्लिम ने 12 साल की बच्ची का रेप किया, तब भी न्यूजलॉन्ड्री ने इसे मुस्लिम और हिंदू के बीच अफेयर बताकर पेश करने की कोशिश की। लगातार ऐसे मामलों में एक ही नैरेटिव आगे बढ़ाया गया।

तो अब तो कोई सवाल ही नहीं बचा कि ऐसे पत्रकार जिनका काम ही हिंदुओं के प्रति घृणा दिखाना, भारत पर सवाल उठाना और इस्लामी कट्टरपंथियों के कारनामों को ‘भीड़ के अपराध’ के तौर पर पेश करना हो… उनका फैनबेस कहाँ से होगा?

आखिर में सिर्फ यही, मनीषा पांडे के इस बड़बोलापन से लगता हैं कि वह पत्रकारिता बिरादरी की ‘सस्ती आलिया भट्ट’ हैं, जिनकों नहीं पता कि कहाँ क्या बोलना है और जो कॉमेडी तो करना चाहती हैं लेकिन कर नहीं पातीं। तो अब पत्रकारिता बिरादरी की सस्ती आलिया भट्ट का क्या होगा, ये तो समय बताएगा। लेकिन अभी जिस तरह खुलेआम सटायर, कॉमेडी और पत्रकारिता के नाम पर पूरा प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है, उससे इतना तो साफ है कि मामला सिर्फ मजाक तक सीमित नहीं है। पहले लगता था कि न्यूजलॉन्ड्री बस एक खास नैरेटिव चला रहा है, लेकिन अब खुद उसकी स्टार एंकर यह बता रही हैं कि उनके शो को सबसे ज्यादा पाकिस्तान में देखा जाता है और वहीं से उन्हें प्यार भी मिलता है। और यह कोई भी कंटेन्ट क्रिएटर बता सकता है कि ऑडियंस के हिसाब से कंटेन्ट देना कितना जरूरी होता है।

केवल कारों को EV बनाने से नहीं खत्म होगा तेल संकट क्योंकि 59% पेट्रोल बाइक वाले फूँक डालते हैं: जानिए क्यों ग्रीन एनर्जी मिशन के लिए जरूरी है टू-व्हीलर्स और ट्रक्स में बदलाव

जब आप देश के हाईवे, एक्सप्रेसवे या फिर शहरों की सड़कों पर चलते होंगे, तो कारों की लंबी-लंबी कतारें देखते होंगे। आपको यकीनन लगता होगा कि देश में सबसे ज्यादा पेट्रोल की खपत (Consumption) यही गाड़ियाँ करती हैं।

और अगर आप आज-कल के वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) के संकट से वाकिफ हैं, तो सोचते होंगे कि अगर ये गाड़ियाँ इलेक्ट्रिक हो जाएँ, तो हम बाहर से तेल मंगवाने की मजबूरी से मुक्त हो जाएँगे। शायद ऐसा ही विचार आपके मन में तब भी आता होगा, जब आप शहरों में डीजल से धुआँ उड़ाती बसें देखते होंगे।

लेकिन शायद आप सही समस्या का गलत इलाज ढूँढ रहे हैं! आपके इस नजरिए ने आपको यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बना देने से पूरी समस्या का समाधान हो जाएगा। लेकिन ऐसा कतई नहीं होने वाला। और इसकी वजह यह नहीं है कि हमारे पास बिजली कम है, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है या इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ महँगी हैं, बल्कि इसका कारण कुछ और ही है।

सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक बनाने से हमारे कच्चे तेल के आयात (Import) की समस्या क्यों हल नहीं होगी, यह मैं आपको बस कुछ ही देर में समझाता हूँ। उससे पहले एक हालिया खबर सुनिए। ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार लगभग 9,000 करोड़ रुपए की एक नई स्कीम की तैयारी कर रही है, जिसका इस्तेमाल देश में ट्रक्स और बसों को इलेक्ट्रिफाई (Electrify) करने के लिए किया जाएगा।

अब हम अपने पहले सवाल पर वापस आते हैं कि आखिर सिर्फ कारों को ही इलेक्ट्रिक करने से बात क्यों नहीं बनेगी? इसके लिए पहले यह समझना होगा कि असल में देश में सबसे ज्यादा तेल की खपत करता कौन है।

दोपहिया वाहन पीते हैं सबसे ज्यादा पेट्रोल

चिंता मत करिए, इसके लिए हमें किसी पेट्रोल पंप पर जाकर एक-एक गाड़ी गिनने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह काम पहले ही हो चुका है। मिनिस्ट्री ऑफ पेट्रोलियम की ‘पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल’ (PPAC) और रेटिंग एजेंसी CRISIL ने देश के करीब 3,000 पेट्रोल पंपों पर इसी बात का पता लगाने के लिए एक सर्वे किया था।

इस सर्वे के नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। पहले बात करते हैं पेट्रोल की। सर्वे से पता चला कि सड़कों पर सबसे ज्यादा दिखने वाली कारें नहीं, बल्कि हमारी बाइक्स और स्कूटर्स, यानी टू-व्हीलर्स (2-Wheelers) इस देश में पेट्रोल के सबसे बड़े कंज्यूमर हैं। देश के कुल पेट्रोल कंजम्पशन का 59% हिस्सा अकेले ये टू-व्हीलर्स डकार जाते हैं!

वहीं, जो कारें आपको ट्रैफिक, हाईवे और एक्सप्रेसवे पर सबसे ज्यादा नजर आती हैं, उनका कुल पेट्रोल खपत में शेयर सिर्फ 39.91% है। इसमें से भी अगर कमर्शियल टैक्सियों को हटा दें, तो पर्सनल कारों का हिस्सा सिर्फ 36.62% ही रह जाता है।

यानी, जिस कार सेगमेंट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है, अगर उसे हम पूरी तरह इलेक्ट्रिक में शिफ्ट कर भी दें, तो भी पेट्रोल की समस्या सिर्फ एक-तिहाई ही हल होगी; करोड़ों लीटर पेट्रोल की खपत फिर भी बनी रहेगी। अब आपके मन में आएगा कि फिर तो हमें टू-व्हीलर्स को भी तेजी से इलेक्ट्रिक में शिफ्ट करना चाहिए।

लेकिन यहाँ भी एक पेंच है। ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) का डेटा कहता है कि साल 2025-26 में देश में जितने भी टू-व्हीलर्स बिके, उनमें से सिर्फ 6.5% ही इलेक्ट्रिक थे। वहीं फोर-व्हीलर्स (कारों) के मामले में यह आँकड़ा महज 4.4% था। साफ है कि ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन की यह राह अभी बहुत लंबी और चुनौतीपूर्ण है।

असली खेल तो डीजल का है

मान लेते हैं कि हम किसी तरह जादू की छड़ी घुमाकर अपने सारे टू-व्हीलर्स और फोर-व्हीलर्स को इलेक्ट्रिक में बदल भी दें, तब भी कच्चे तेल के इम्पोर्ट का संकट खत्म नहीं होगा। आप सोचेंगे कि जब सड़कों से पेट्रोल गाड़ियाँ गायब हो जाएँगी, तब भी समस्या क्यों रहेगी? इसके लिए आपको डेटा की एक दूसरी लेन में चलना होगा।

दरअसल, भारत में पेट्रोल से कहीं ज्यादा डीजल की खपत होती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि भारत का अधिकांश मालभाड़ा (Freight) सड़कों के जरिए तय होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश का लगभग 65% माल रोड ट्रांसपोर्ट के जरिए एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है।

इस भारी-भरकम मूवमेंट को संभालते हैं ट्रक्स। ये ट्रक्स छोटी-मोटी दूरी नहीं, बल्कि महीने भर में 15,000 किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं। स्वाभाविक है कि इनका फ्यूल कंजम्पशन भी बहुत ज्यादा होता है और ये सभी ट्रक्स डीजल पर चलते हैं।

हमारे देश में डीजल की मांग पेट्रोल के मुकाबले ढाई गुना से भी ज्यादा है। उदाहरण के लिए, साल 2024-25 में जहाँ देश में 40 मिलियन मीट्रिक टन पेट्रोल की खपत हुई, वहीं डीजल की खपत 90 मिलियन मीट्रिक टन को पार कर गई थी।

यही वजह है कि सिर्फ कार या बाइक को EV में बदलने से देश का इम्पोर्ट बिल कम नहीं होने वाला। PPAC की रिपोर्ट बताती है कि देश के कुल डीजल कंजम्पशन में से 64% हिस्सा अकेले ट्रक्स और पिक-अप गाड़ियाँ पी जाती हैं। एक आम ट्रक एक बार में करीब 111 लीटर डीजल भरवाता है। जब तक हैवी कमर्शियल व्हीकल्स (Heavy Commercial Vehicles) को इलेक्ट्रिफाई नहीं किया जाएगा, तब तक कच्चे तेल पर हमारी निर्भरता बनी रहेगी।

चीन का मॉडल और भारत की तैयारी

हमारे पड़ोसी देश चीन ने इस दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन में बिकने वाले नए भारी ट्रकों (Heavy Trucks) में से अब एक-चौथाई (25%) इलेक्ट्रिक हो चुके हैं, और हालिया ईरान-इजराइल संकट के बाद इस रफ्तार में और तेजी आई है। अगर भारत को भी अपना फ्यूल बिल और कार्बन एमिशन कम करना है, तो उसे पर्सनल व्हीकल्स के साथ-साथ इस हैवी सेगमेंट पर फोकस करना ही होगा।

राहत की बात यह है कि अब भारत सरकार भी इस दिशा में कदम बढ़ा रही है। जैसा कि मैंने शुरुआत में बताया, मोदी सरकार जल्द ही इलेक्ट्रिक ट्रक्स और बसों के लिए ठीक वैसे ही इंसेंटिव्स (FAME स्कीम की तरह) लाने की तैयारी में है, जैसे टू-व्हीलर्स और कारों के लिए दिए गए थे। इससे न सिर्फ तेल का आयात घटेगा, बल्कि सड़कों पर होने वाले प्रदूषण का सबसे बड़ा सोर्स भी खत्म हो जाएगा।

बसों से ज्यादा डीजल पीते हैं खेतों के पंप

इसी सर्वे से जुड़ा एक और दिलचस्प आँकड़ा बसों और खेतों में चलने वाले पंपों का है। अमूमन हमें लगता है कि देश भर में चलने वाली लाखों बसें बहुत ज्यादा डीजल खाती होंगी। लेकिन डेटा के मुताबिक, कुल डीजल खपत में बसों का शेयर सिर्फ 4.1% है, जबकि कृषि कार्यों (जैसे सिंचाई के पंप और ट्रैक्टर) में 4.7% डीजल का इस्तेमाल होता है। यानी हमारी बसें, खेतों से कम डीजल कंज्यूम करती हैं।

सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना मर्ज की दवा नहीं

आज जब भी वैश्विक तनाव या युद्ध (जैसे ईरान क्राइसिस) की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि सिर्फ कारों को इलेक्ट्रिक कर देना इस मर्ज की दवा नहीं है। असली समाधान छुपा है टू-व्हीलर्स और देश की लाइफलाइन कहे जाने वाले ट्रक्स को ग्रीन एनर्जी पर शिफ्ट करने में।

वैसे इस चौंकाने वाले डेटा को जानने के बाद आपकी क्या राय है? क्या आपको पहले से पता था कि कारें नहीं, बल्कि आपकी बाइक देश का सबसे ज्यादा पेट्रोल पीती है?

किसी को उठाया कच्छे में, किसी को अय्याशी करते हुए दबोचा: बंगाल में BJP आने के बाद पुलिस निकाल रही गुंडों की परेड, 1 हफ्ते में 70+ TMC नेता-कार्यकर्ता गिरफ्तार

पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।

कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार

अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इनलोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।

बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।

इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।

टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।

जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।

ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।

बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।

बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।

कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।

उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।

पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।

टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।

दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।

घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान

अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।

हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।

हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।

बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।

तमिलनाडु में TVK सरकार बने हुए मात्र 16 दिन, फिर भी जनता CM विजय से पूछने को मजबूर- पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों में एक नया बदलाव तेजी से देखने को मिला है। अब राजनीति सिर्फ पुराने नेताओं या पारंपरिक पार्टियों तक सीमित नहीं रही। आंदोलन से निकले चेहरे और फिल्मी सितारे सीधे सत्ता तक पहुँचने लगे हैं। जनता भी ऐसे चेहरों को जल्दी अपनाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद ये लोग पुराने सिस्टम से अलग कुछ नया करेंगे।

लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी शुरू होता है। क्या सिर्फ लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव के दम पर सरकार चलाई जा सकती है? क्योंकि आंदोलन करना, भाषण देना और लोगों की उम्मीद बन जाना एक अलग बात है लेकिन सत्ता संभालना बिल्कुल अलग खेल होता है। वहाँ सिर्फ नारे नहीं, आपके फैसले काम आते हैं।

तमिलनाडु की राजनीति इस समय कुछ ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। राज्य को एक नया और बेहद लोकप्रिय चेहरा मिल चुका है। फिल्म स्टार जोसेफ विजय 10 मई 2026 को मुख्यमंत्री बने। जनता ने उन्हें उम्मीदों के साथ सत्ता तक पहुँचाया लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर विजय सरकार की असली दिशा क्या है? क्योंकि अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसमें एक साफ विचारधारा से ज्यादा प्रयोग, विरोधाभास और असमंजस दिखाई देता है।

विजय की लोकप्रियता और सरकार चलाने की चुनौती

इसमें कोई शक नहीं, विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता है। उन्होंने फिल्मों के जरिए खुद को हमेशा आम लोगों से जुड़ा हुआ चेहरा दिखाया। वैसे भी तमिलनाडु की राजनीति में फिल्म स्टार्स का असर कोई नई बात नहीं है। एमजीआर से लेकर जयललिता तक जनता पहले भी सिनेमा के चेहरों को सत्ता तक पहुँचाती रही है। इसलिए विजय का मुख्यमंत्री बनना पूरी तरह हैरान करने वाला नहीं था।

लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना, दोनों अलग चीजें हैं। यही असली परीक्षा होती है। और फिलहाल ऐसा लग रहा है कि विजय सरकार अभी उसी परीक्षा में उलझी हुई है।

अब जैसे सरकार बनने के तुरंत बाद मंत्रालयों का बंटवारा शुरू हुआ और उसी समय से सवाल भी उठने लगे। उदाहरण के लिए राजमोहन अरुमुगम को फिल्म टेक्नोलॉजी और सिनेमाटोग्राफी मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद खुद फिल्म इंडस्ट्री के भीतर से विरोध शुरू हो गया।

मशहूर तमिल अभिनेता विशाल ने खुलेआम सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री की समस्याओं और काम करने के तरीके की समझ ही नहीं है, उसके सामने इंडस्ट्री अपनी परेशानियाँ कैसे रखे?

इस सवाल को आप अगर ऐसे देखें कि ये केवल फिल्म इंडस्ट्री की बात नहीं है। ये सवाल सरकार के फैसले लेने की क्षमता पर था क्योंकि लोगों को लगा कि अगर विजय खुद इसी इंडस्ट्री से आते हैं, तो शायद इसे वो ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल सकते थे।

ओएसडी विवाद और फैसलों में असमंजस

खैर इसके पहले ओएसडी वाला विवाद भी सामने आया था जिसने सरकार की छवि को और उलझा दिया। विजय के करीबी ज्योतिषी राधन पंडित को ओएसडी बनाया गया। शुरुआत में सरकार ने इस फैसले को सामान्य नियुक्ति की तरह पेश किया, लेकिन जब विधानसभा में इसका जमकर विरोध हुआ और विपक्ष कहने लगा कि अगर वो आपके निजी ज्योतिषी हैं तो उन्हें निजी दायरे में रखिए, शासन-प्रशासन में क्यों ला रहे हैं? इसके बाद उनके ज्योतिषी को ओएसडी नहीं बनाया गया।

अब यहाँ फिर सवाल सीधा खड़ा होता है कि क्या सरकार, फैसले किसी साफ प्रशासनिक प्रक्रिया से ले रही है या फिर निजी घेरे और निजी आस्थाओं का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है? क्योंकि अगर फैसला सही था तो वापस क्यों लिया गया? और अगर गलत था तो शुरुआत में किया ही क्यों गया?

यही चीज सरकार की छवि को कमजोर करती है। ऐसा लगता है जैसे सरकार कई बार योजना बनाकर नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने के ढर्रे पर काम कर रही है।

TVK और खुद विजय की विचारधारा को लेकर विरोधाभास

सबसे बड़ा असमंजस सिर्फ फैसलों में नहीं है बल्कि असमंजस विजय की विचारधारा को लेकर भी है। एक तरफ वो खुद को उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का चेहरा दिखाना चाहते हैं, वो हाथ में कड़ा, कलावा पहनते हैं, ज्योतिष में भरोसा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ डीएमके की राजनीति से पूरी दूरी भी नहीं बनाते। तमिलनाडु में डीएमके लंबे समय से द्रविड़ राजनीति और सनातन विरोध जैसे मुद्दों पर अपनी पहचान बनाती रही है।

पिछले कुछ वर्षों में डीएमके नेताओं के कई बयान विवादों में रहे हैं। हाल ही में विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को मिटाने का अपना बयान फिर से दोहराया। “सनातन कब मिटेगा जब सनातनी यानी हिन्दू ख़तम होगा…” उदयनिधि ने जब ये बयान दिया तब विजय भी सदन में मौजूद थे लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर विजय की अपनी राजनीतिक लाइन क्या है? इसी बीच उनकी कैबिनेट के एक आईयूएमएल मंत्री सचिवालय में इस्लामी रस्म-रिवाज करते भी दिखाई दिए। इसके बाद फिर सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि पर बहस शुरू हो गई।

अब जनता के मन में असमंजस होना स्वाभाविक है। क्या सरकार डीएमके की वैचारिक लाइन पर चल रही है? क्या हर वर्ग को खुश रखने की कोशिश हो रही है? या फिर खुद विजय अभी तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें किस तरह की राजनीति करनी है?

देखिए, सबको साथ लेकर चलने की बात सुनने में हमेशा अच्छी लगती है। लोकतंत्र में समावेशी राजनीति जरूरी भी है। लेकिन सिर्फ संतुलन बनाने के खेल से सरकारें नहीं चलतीं।

सरकार को आखिरकार एक साफ दिशा चाहिए। क्योंकि अगर हर तरफ थोड़ा-थोड़ा खुश करने की कोशिश होगी, तो धीरे-धीरे सरकार की अपनी अलग पहचान ही खो जाती है।

आर्थिक मोर्चा और मुफ्त योजनाओं का मॉडल

यहाँ आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। तमिलनाडु पहले से ही भारी कर्ज के दबाव में है। विजय सरकार लगातार पिछली डीएमके सरकार पर आर्थिक हालत खराब करने के आरोप लगा रही है। लेकिन दूसरी तरफ उनकी खुद की राजनीति भी कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।

अब सवाल है कि अगर राज्य पहले से कर्ज में दबा हुआ है, तो लगातार मुफ्त योजनाओं के सहारे यह मॉडल कितने समय तक चलेगा?

जनता को मुफ्त सुविधाएँ देना राजनीतिक तौर पर हमेशा लोकप्रिय रहता है। हर सरकार चाहती है कि लोग खुश रहें। लेकिन लंबे समय में किसी भी राज्य को सिर्फ मुफ्त की योजनाओं से नहीं चलाया जा सकता।

उसे निवेश चाहिए। उद्योग चाहिए। नौकरियाँ चाहिए। वित्तीय अनुशासन चाहिए और फिलहाल विजय सरकार की तरफ से ऐसा कोई बड़ा आर्थिक रोडमैप साफ नजर नहीं आता जिससे लगे कि वो सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के शासन पर भी ध्यान दे रही है।

दिल्ली का उदाहरण और शासन का सच

यहाँ दिल्ली का उदाहरण भी याद आता है। कट्टर ईमानदारी की कसमे खाकर अरविंद केजरीवाल ने भी सत्ता हासिल की थी। अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान उन्होंने खुद को सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में पेश किया था। संयोग की बात ये है कि उस समय विजय भी उस आंदोलन के समर्थन में दिखाई दिए थे। जनता को लगा था कि नई राजनीति आएगी, पुरानी व्यवस्था बदलेगी और राजनीति का स्तर ऊपर जाएगा। लेकिन समय के साथ दिल्ली में भी लोगों ने देखा कि आंदोलन की राजनीति और शासन की राजनीति में बहुत फर्क होता है।

विरोध करना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल होता है प्रशासन चलाना। जब तक आप विपक्ष में होते हैं, तब तक हर समस्या का जवाब आपके पास होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही समस्याएँ आपकी जिम्मेदारी बन जाती हैं।

अब तमिलनाडु में भी यही परीक्षा विजय के सामने है। क्या उनकी राजनीति सिर्फ लोकप्रियता और जन-छवि तक सीमित रह जाएगी? या वो वास्तव में एक मजबूत प्रशासक बन पाएँगे?

शुरुआत में जनता छवि से प्रभावित होती है लेकिन कुछ समय बाद लोग सिर्फ भाषण नहीं देखते, वो नतीजे देखते हैं, जिसमें…

  • कौन मंत्री है?
  • कैसे फैसले लिए जा रहे हैं?
  • कानून-व्यवस्था कैसी है?
  • निवेश आ रहा है या नहीं?
  • सरकार विवादों को कैसे संभाल रही है?

ये सारी चीजें धीरे-धीरे छवि से ज्यादा बड़ी हो जाती हैं और फिलहाल इन सवालों पर विजय सरकार पूरी स्पष्टता देती नजर नहीं आ रही।

सरकार चलाने के लिए राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता जरूरी

तमिलनाडु की राजनीति वैसे भी बेहद उलझी हुई रही है। यहाँ पहचान की राजनीति है, भाषा की राजनीति है, क्षेत्रीय गौरव है, कल्याणकारी मॉडल है और सिनेमा संस्कृति भी है। ऐसे राज्य में सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा होना काफी नहीं होता। वहाँ राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता दोनों चाहिए।

फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि विजय मुख्यमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन उनकी सरकार की असली दिशा अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है।

एक तरफ उदारवादी छवि बनाने की कोशिश है, दूसरी तरफ गठबंधन की राजनीति का दबाव है। एक तरफ कल्याणकारी राजनीति है, दूसरी तरफ बढ़ता कर्ज है। एक तरफ नई राजनीति का दावा है, दूसरी तरफ पुराने सत्ता के प्रयोग दिखाई दे रहे हैं।

अब आने वाला समय ही तय करेगा कि जोसेफ विजय सिर्फ भीड़ खींचने वाले मुख्यमंत्री बनकर रह जाएँगे या सच में तमिलनाडु की राजनीति को कोई नई और स्पष्ट दिशा दे पाएँगे।

‘कन्या केलवणी’ से ‘लाडली लक्ष्मी’ तक: PM मोदी के विजन को MP का मुख्यमंत्री रहते शिवराज सिंह चौहान ने कैसे बनाया जन-आंदोलन

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘अपनापन’ पुस्तक का लोकार्पण करने जा रहे हैं, किताब में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक किस्सा लिखा है कि कैसे गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले महिला सशक्तिकरण के उस विजन को मध्य प्रदेश में उतारा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पुस्तक ‘अपनापन: नरेंद्र मोदी के साथ मेरे अनुभव’ का लोकार्पण करेंगे। यह पुस्तक पीएम मोदी के साथ शिवराज सिंह चौहान के तीन दशक से अधिक लंबे सार्वजनिक और राजनीतिक अनुभवों का दस्तावेज है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व,
संगठन क्षमता, सुशासन और राष्ट्र-समर्पण से जुड़ी अनेक घटनाओं को साझा किया है।

पुस्तक के एक बेहद दिलचस्प अध्याय में शिवराज सिंह चौहान बताते हैं कि आज जिस प्रधानमंत्री मोदी को देश ‘नारी शक्ति’ के सबसे बड़े समर्थकों में गिनता है, महिलाओं और बेटियों के कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कोई नई बात नहीं है। यह सोच उस दौर से चली आ रही है जब पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी सोच को सामाजिक आंदोलन का रूप देने में जुटे थे।

शिवराज लिखते हैं कि गुजरात में मोदी के नेतृत्व में चल रहे अभियानों को करीब से देखने का अवसर उन्हें तब मिला, जब मोदी मुख्यमंत्री थे। उस समय गुजरात में ‘कन्या केलवणी अभियान’ और बेटियों की शिक्षा को लेकर चल रहे जन-जागरण कार्यक्रमों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने देखा कि मोदी इस विषय को केवल सरकारी योजना नहीं मानते थे, बल्कि समाज के हर वर्ग, धार्मिक नेताओं, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को इसमें भागीदार बनाते थे।

शिवराज के अनुसार, मोदी का संदेश सीधा लेकिन प्रभावशाली था- “अपनी बेटियों की रक्षा करो, उन्हें शिक्षित करो और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर दो।” यही वह विचार था जिसने धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम का रूप छोड़कर सामाजिक चेतना का स्वरूप ग्रहण कर लिया।

शिवराज बताते हैं कि उन्होंने गुजरात में स्वयं देखा कि किस तरह गाँव-गाँव जाकर बेटियों के स्कूल में दाखिले को उत्सव बनाया जाता था। सरकारी अधिकारी, मंत्री और जनप्रतिनिधि भीषण गर्मी में दूर-दराज़ के गाँवों तक पहुँचते थे और अभिभावकों को अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते थे। मोदी स्वयं भी इन अभियानों में भाग लेते थे। यही मॉडल बाद में शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में अपनाने का निर्णय लिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में ‘बेटी बचाओ अभियान’ शुरू किया। इसके तहत राज्यभर में यात्राएँ निकाली गईं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, संतों, स्थानीय नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को साथ लेकर गाँव-गाँव जागरूकता अभियान चलाया गया। रास्ते में बेटियों का सम्मान किया जाता, उनके माथे पर तिलक लगाया जाता और लोगों को समझाया जाता कि बेटी बोझ नहीं, परिवार और समाज की शक्ति है।

शिवराज लिखते हैं कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल बेटियों को स्कूल भेजना नहीं था। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना था कि वे शिक्षा पूरी करें, आत्मनिर्भर बनें और सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसी सोच से प्रेरित होकर मध्य प्रदेश में ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ शुरू की गई। इस योजना के तहत बेटियों के नाम से निवेश किया जाता था, शिक्षा के विभिन्न चरणों में आर्थिक सहायता दी जाती थी और बाल विवाह को हतोत्साहित किया जाता था।

पुस्तक में शिवराज सिंह चौहान एक भावुक प्रसंग का भी उल्लेख करते हैं। एक सामूहिक विवाह समारोह में एक बुज़ुर्ग महिला ने उनसे कहा था कि समाज में लोग अक्सर कहते हैं, “बेटी को आने दो, फिर उसकी शादी के लिए पैसे कहाँ से आएँगे?” यह बात शिवराज को भीतर तक छू गई। तभी उन्होंने तय किया कि बेटियों के जन्म को आर्थिक चिंता नहीं, उत्सव का विषय बनाया जाना चाहिए।

यही सोच आगे चलकर ‘स्वागतम लक्ष्मी’, ‘मुख्यमंत्री कन्यादान योजना’, छात्रवृत्ति योजनाओं, साइकिल वितरण कार्यक्रम और बाद में मातृ स्वास्थ्य से जुड़ी पहलों तक पहुँची। पुस्तक में दावा किया गया है कि इन प्रयासों का असर केवल सरकारी आँकड़ों में नहीं दिखा, बल्कि समाज की मानसिकता में भी दिखाई दिया। मध्य प्रदेश का लिंगानुपात 2001 में 919 से बढ़कर 2021 में 970 तक पहुँच गया और बेटियों के जन्म को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता में उल्लेखनीय सुधार आया।

शिवराज सिंह चौहान का निष्कर्ष स्पष्ट है कि पीएम नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने महिला और बालिका कल्याण को सिर्फ सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। गुजरात में जिस विचार का बीजारोपण हुआ, उसी को मध्य प्रदेश में अपने तरीके से आगे बढ़ाकर उन्होंने जन-अभियान बनाया। और आज जब देश ‘नारी शक्ति’ को विकास के केंद्र में रखकर आगे बढ़ रहा है, तो उसकी जड़ें उस दौर तक जाती हैं जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और शिवराज उनके उस विजन को करीब से देख रहे थे।

बकरीद से पहले चर्चा में पश्चिम बंगाल और केरल, छुट्टियाँ असली मुद्दा या तुष्टिकरण?: जानें ये कॉन्ग्रेस का मुस्लिमों से प्रेम है या राजनीतिक मजबूरी

भारत में त्योहारों का मौसम आते ही राजनीतिक सरगर्मियाँ और तीखी बहसें तेज हो जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन बकरीद (ईद-उल-अजहा) से ठीक पहले पश्चिम बंगाल और केरल दोनों ही राज्य देश के राजनीतिक पटल पर अचानक सबसे बड़ी चर्चा का केंद्र बन गए हैं।

एक तरफ जहाँ पूर्वी भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में त्योहार की सरकारी छुट्टियों को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ा बदलाव देखने को मिला है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारत के केरल में विपक्षी दल कॉन्ग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को नजरअंदाज करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

इन दोनों राज्यों की वर्तमान परिस्थितियाँ, प्रशासनिक फैसले और राजनीतिक बयानबाजी देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और क्षेत्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप की एक नई कहानी बयाँ कर रही हैं। आइए दोनों राज्यों के इन अलग-अलग विवादों और उनके पीछे की पूरी राजनीतिक कड़ियों, जनसांख्यिकीय आँकड़ों और सियासी रसूख को विस्तार से समझते हैं।

पश्चिम बंगाल में बकरीद की छुट्टियों पर छिड़ा घमासान

पश्चिम बंगाल की राजनीति में त्योहारों और उनके लिए मिलने वाले सरकारी अवकाशों का हमेशा से एक विशेष महत्व रहा है, लेकिन इस बार बकरीद से ठीक पहले राज्य के वित्त विभाग द्वारा जारी किए गए एक नए नोटिफिकेशन ने पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा कर दी है।

दरअसल, राज्य की नवनिर्वाचित शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले प्रशासन द्वारा घोषित की गई दो दिनों की सरकारी छुट्टी के फैसले को पलट दिया है। पहले के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, राज्य में 26 और 27 मई को बकरीद के उपलक्ष्य में दो दिनों के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई थी, जिसमें ईद से एक दिन पहले का अवकाश भी शामिल था।

राज्य सरकार के नए आदेश के तहत पहले से घोषित 26 और 27 मई की इन दोनों छुट्टियों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है और उनकी जगह केवल 28 मई को बकरीद की एकमात्र सार्वजनिक छुट्टी घोषित की गई है। सरकार ने अपने इस फैसले के पीछे केंद्रीय कैलेंडर के साथ तालमेल बिठाने और चाँद दिखने की संशोधित तारीखों का हवाला दिया है।

वित्त विभाग के आधिकारिक आदेश में स्पष्ट किया गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में इस्लामी कैलेंडर और चांद के दीदार की समीक्षा के बाद अब राज्य में 28 मई को ही मुख्य त्योहार मनाया जाएगा, इसलिए केवल इसी दिन पर निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत सार्वजनिक अवकाश रहेगा।

तुष्टिकरण बनाम प्रशासनिक कार्य संस्कृति की बहस

इस प्रशासनिक बदलाव ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। सत्ता पक्ष के करीबियों और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय राज्य में ‘वर्क कल्चर’ (कार्य संस्कृति) को मजबूत करने और सरकारी कार्यालयों में उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है।

सरकार का तर्क है कि त्योहारों के नाम पर अत्यधिक और बेवजह की लंबी छुट्टियाँ देने से आम जनता से जुड़े प्रशासनिक कार्य और जरूरी जनसेवाएँ प्रभावित होती हैं। इस फैसले के जरिए संदेश देने की कोशिश की गई है कि प्रशासनिक जवाबदेही और कार्यकुशलता को किसी भी अन्य एजेंडे से ऊपर रखा जाएगा।

दूसरी ओर विपक्ष ने इस कदम को सीधे तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और एक खास राजनीतिक एजेंडे को लागू करने का प्रयास बताया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि जानबूझकर त्योहार से ठीक पहले छुट्टियों में कटौती करके राज्य के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

इसके साथ ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी बकरीद के दौरान पशु वध को लेकर जारी सरकारी नियमों और दिशा-निर्देशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिससे इस बार बंगाल में त्योहार से जुड़े प्रशासनिक नियम पहले की तुलना में काफी सख्त नजर आ रहे हैं।

बंगाल की राजनीति में मुस्लिम आबादी और सीटों का समीकरण

पश्चिम बंगाल में छुट्टियों और त्योहारों पर होने वाली इस सियासत को समझने के लिए वहाँ के जनसांख्यिकीय (demographic) फैक्ट्स को देखना जरूरी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27% है, जो मौजूदा समय में बढ़कर करीब 30% के आसपास आंकी जाती है।

राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से लगभग 100 से 110 सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनमें मुर्शिदाबाद (करीब 66% मुस्लिम आबादी), मालदा (करीब 51%), उत्तर दिनाजपुर (करीब 49%) और दक्षिण 24 परगना जैसे जिले शामिल हैं।

पिछली सरकारों पर हमेशा यह आरोप लगता रहा कि वे इस विशाल वोटबैंक को सहेजने के लिए इफ्तार पार्टियों से लेकर त्योहारों की लंबी छुट्टियों और मानदेय जैसी घोषणाओं का सहारा लेती थीं। यही कारण है कि नई सरकार आते ही सबसे पहला प्रशासनिक प्रहार इन छुट्टियों के सरलीकरण और केंद्रीय नियमों के एकीकरण पर किया गया है, जिसे सत्तापक्ष ‘तुष्टिकरण का अंत’ और विपक्ष ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ कदम बता रहा है।

केरल में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग का सियासी गठबंधन

बंगाल से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण के राज्य केरल में बकरीद के आते ही तुष्टिकरण की राजनीति का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। केरल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है।

राज्य में इस बार बकरीद से पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के मुख्य घटक दल कॉन्ग्रेस पर यह आरोप लग रहे हैं कि वह मुस्लिम लीग और अपने खास वोटबैंक को रिझाने के लिए बहुसंख्यक समाज के हितों और राज्य की साझा संस्कृति की अनदेखी कर रही है।

केरल में त्योहारों के अवसर पर दो दिनों की व्यापक छुट्टियों और विशेष रियायतों की घोषणा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम लीग के दबाव में काम कर रही है।

चुनाव और त्योहारों के इस नाजुक दौर में कॉन्ग्रेस के नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों और पार्टी की नीतियों को लेकर यह आरोप लगाया जा रहा है कि पार्टी केवल एक विशेष वर्ग के तुष्टिकरण में जुटी है ताकि उत्तरी केरल के कासरगोड, मल्लपुरम और कन्नूर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ को और मजबूत किया जा सके।

केरल की सत्ता और सियासत में मुस्लिमों की ताकत

केरल की जनसांख्यिकी देश के अन्य राज्यों से काफी अलग है। यहाँ मुस्लिम आबादी लगभग 26.56% है, जबकि ईसाई आबादी करीब 18% और हिंदू आबादी लगभग 54.73% है। केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद मजबूत और प्रभावशाली रहा है। मौजूदा विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या कुल क्षमता का एक बड़ा हिस्सा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केरल में ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) राज्य की दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) गठबंधन की रीढ़ मानी जाती है।

मुस्लिम लीग की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य की 140 सीटों में से वह अकेले 15 से 20 सीटें जीतने का माद्दा रखती है, विशेषकर मल्लपुरम जिले में, जहाँ की आबादी में 70% से अधिक मुस्लिम हैं। कॉन्ग्रेस के लिए केरल में बिना मुस्लिम लीग के समर्थन के सत्ता में आना या मजबूत विपक्ष बने रहना असंभव है।

लोकसभा चुनाव में भी वायनाड जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर कॉन्ग्रेस को मिलने वाली जीत में मुस्लिम लीग के कैडर और वोटबैंक की सबसे बड़ी भूमिका होती है। इसी राजनीतिक लाचारी के कारण कॉन्ग्रेस पर आरोप लगते हैं कि वह राज्य की नीतियों, स्कूल-कॉलेजों के समय और त्योहारों की छुट्टियों को तय करने में मुस्लिम लीग के एजेंडे के सामने पूरी तरह सरेंडर कर देती है।

तुष्टिकरण के आरोपों के बीच क्षेत्रीय संतुलन का संकट

केरल में कॉन्ग्रेस पर लग रहे तुष्टिकरण के आरोपों का असर वहाँ के सामाजिक संतुलन पर भी देखने को मिल रहा है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, विशेषकर सत्तारूढ़ वामपंथी गठबंधन और भाजपा का आरोप है कि कॉन्ग्रेस का यह रवैया राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ है। आलोचकों के अनुसार, जब बात बहुसंख्यक समाज के त्योहारों या सामान्य प्रशासनिक सुधारों की आती है, तो नियम बेहद कड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन बकरीद जैसे अवसरों पर वोटबैंक को ध्यान में रखकर विशेष ढील दी जाती है।

केरल की इस राजनीति ने ईसाई और हिंदू समुदायों के बीच भी एक छिपी हुई नाराजगी को जन्म दिया है, जो यह महसूस कर रहे हैं कि पारंपरिक राजनीतिक दल केवल जनसांख्यिकीय लाभ उठाने के लिए एक विशेष वर्ग को प्राथमिकता दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेतृत्व पर यह भी आरोप है कि वे विकास और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों (जैसे कासरगोड में एम्स स्तर के अस्पताल की माँग) से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार की भावनात्मक और तुष्टिकरण की राजनीति का सहारा ले रहे हैं।

इसके अलावा राज्य के सरकारी स्कूलों में शुक्रवार की नमाज के लिए समय देने या रमजान और बकरीद पर लंबी छुट्टियों को लेकर समय-समय पर गैर-मुस्लिम संगठनों द्वारा आपत्ति जताई जाती रही है, जिसे कॉन्ग्रेस मुस्लिम लीग की नाराजगी के डर से हमेशा दबाने का प्रयास करती है।

दोनों राज्यों की स्थिति अलग क्यों है?

पश्चिम बंगाल और केरल दोनों राज्यों में बकरीद से पहले उपजा यह विवाद भारत की क्षेत्रीय राजनीति के दो अलग-अलग छोरों को प्रदर्शित करता है। जहाँ पश्चिम बंगाल में नई सरकार पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए छुट्टियों में कटौती कर प्रशासनिक कड़ाई और एक समान नीति लागू करने का प्रयास कर रही है, वहीं केरल में पारंपरिक दल अपने पुराने वोटबैंक को बचाए रखने के लिए तुष्टिकरण के उसी पुराने ढर्रे पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

बंगाल जहाँ 30% मुस्लिम आबादी के ध्रुवीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण की नई प्रयोगशाला बना हुआ है, वहीं केरल में 26.56% मुस्लिम आबादी और मुस्लिम लीग के 20 विधायकों की संगठित ताकत के आगे कॉन्ग्रेस पूरी तरह नतमस्तक नजर आती है। इन दोनों ही मामलों से यह स्पष्ट होता है कि त्योहारों का सामाजिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन उनके इर्द-गिर्द बुनी जाने वाली राजनीति देश के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक वातावरण को गहराई से प्रभावित करती है।

केरल HC ने मधु मॉब लिंचिंग के मुख्य आरोपित हुसैन को किया बरी, 12 की सजा बरकरार: समझिए- कैसे इस केस ने ‘दलित-मुस्लिम एकता’ के नरेटिव को किया ध्वस्त

देशभर में भारी आक्रोश पैदा करने वाले 2018 के अट्टापडी मॉब लिंचिंग मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केरल हाई कोर्ट ने सोमवार को इस मामले के आरोपित नंबर 1 हुसैन को ही बरी कर दिया है। यह मामला मधु नाम के एक मानसिक रूप से कमजोर जनजातीय युवक (ST Youth) की हत्या से जुड़ा है, जिस पर खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में भीड़ ने बेरहमी से हमला किया था।

यह फैसला जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने दोषियों, राज्य सरकार और मधु की माँ मल्ली द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

हाई कोर्ट ने आरोपित नंबर 4 अनीश और आरोपी नंबर 11 अब्दुल करीम को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालाँकि अदालत ने मरक्कर, शम्सुद्दीन, राधाकृष्णन, अबू बकर, सिद्दीक, उबैद, नजीब, जयजुमोन, सजीव, सतीश, हरीश और बीजू की सजा को बरकरार रखा है।

अदालत ने आपराधिक दायित्व के दायरे को बढ़ाते हुए दोषियों को आईपीसी की धाराओं (जिसमें 304 पार्ट II, 326, 367, 323, 324, 342, 143, 147 और 149 शामिल हैं) के अलावा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत भी दोषी ठहराया। आरोपित नंबर 16 मुनीर जिसे पहले केवल आईपीसी की धारा 352 के तहत दोषी ठहराया गया था, उसे भी एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(va) के साथ पठित आईपीसी की धारा 323 के तहत दोषी पाया गया।

इस मामले का विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है। इस मामले को बाद में बदली हुई सजा पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।

केरल हाई कोर्ट के सामने हुसैन के पक्ष की दलील

हुसैन ने अपनी सजा को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वह उस समूह का हिस्सा नहीं था जो शुरू में जंगल के इलाके में गया था और मधु को मुक्कली लेकर आया था, जहाँ उसके साथ मारपीट की गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, हुसैन बाद में भीड़ में शामिल हो गया था और उसने मधु की छाती पर लात मारी थी, जिससे उसका सिर दीवार से टकरा गया था। मेडिकल साक्ष्यों से संकेत मिला था कि इन चोटों के कारण पीड़ित की मौत हुई थी।

हालाँकि उसकी कानूनी टीम ने दलील दी कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो मधु के प्रति किसी पुरानी दुश्मनी को दिखाता हो या उसके गैरकानूनी रूप से इकट्ठा हुई भीड़ से जुड़े होने का कोई कारण बताता हो। बचाव पक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया था कि निचली अदालत ने उसे एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत दोषी नहीं पाया था।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला 22 फरवरी 2018 का है, जब केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टापडी के रहने वाले 27 वर्षीय ST युवक मधु की एक इस्लामी भीड़ ने स्थानीय दुकान से चावल सहित खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

मानसिक रूप से कमजोर मधु अपने परिवार से बहुत कम संपर्क रखता था, अट्टापडी में जंगल के इलाकों और उसके आसपास रहता था। जाँचकर्ताओं के अनुसार, वह जंगल के इलाके के पास छुपा हुआ मिला था, जहाँ स्थानीय लोगों के एक समूह ने उसे पकड़ लिया, उसके साथ गंभीर मारपीट की और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

अभियोजन पक्ष ने बताया कि मधु को सिर पर चोट, पसलियों में फ्रैक्चर और आंतरिक रक्तस्राव सहित गंभीर चोटें आई थीं। बाद में अस्पताल ले जाते समय वह गिर गया और उसने दम तोड़ दिया।

इस घटना के बाद घटनास्थल की तस्वीरें ऑनलाइन सामने आने पर देश भर में भारी गुस्सा देखा गया था। जनता की तीखी आलोचना का कारण बनने वाली तस्वीरों में एक ऐसी तस्वीर भी थी, जिसमें मधु साफ तौर पर घायल और परेशान दिख रहा था, जबकि उबैद नाम का एक व्यक्ति उसके पास खड़ा होकर सेल्फी ले रहा था।

पुलिस ने बाद में मुक्कली थोडियिल उबैद उम्मर को गिरफ्तार कर लिया और मामले में उसे आरोपितों में नामजद किया। उस पर आईपीसी, एससी/एसटी एक्ट और घटना की तस्वीरें व वीडियो प्रसारित करने से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानूनों के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।

उस समय की रिपोर्टों में कुछ आरोपितों के कथित राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे आरोप सामने आए थे कि उबैद के संबंध इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से थे। हालाँकि तत्कालीन विधायक एन. शम्सुद्दीन ने किसी भी औपचारिक संबंध से इनकार किया था और कहा था कि उबैद ने केवल चुनाव से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया था।

मुकदमे में देरी और अभियोजन पक्ष को लेकर आरोप

इसके बाद मुकदमे की कार्यवाही के दौरान बार-बार देरी देखी गई, जिससे पीड़ित के परिवार और कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना की।

जनवरी 2022 में, एससी/एसटी एक्ट के तहत मन्नारकाड की विशेष अदालत ने कथित तौर पर मधु का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त विशेष लोक अभियोजक (स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) के बार-बार अनुपस्थित रहने पर सवाल उठाए थे। अभियोजक के कई मौकों पर पेश न होने के बाद अदालत ने पहले भी सुनवाई टाल दी थी।

अगस्त 2019 में विशेष अभियोजक नियुक्त किए गए एडवोकेट वी.टी. रघुनाथ कथित तौर पर कार्यवाही के दौरान अदालत के सामने पेश नहीं हुए और बाद में चिकित्सा कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया।

अभियोजकों की बार-बार अनुपस्थिति के कारण मुकदमे की कार्यवाही में देरी हुई। मधु के परिवार ने आरोप लगाया कि न्याय की प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया जा रहा था। मधु की माँ मल्ली ने इस देरी पर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा था कि उनके बेटे की मौत को कई साल बीत चुके हैं, जबकि मुकदमा आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।

घटना के बाद गठित विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने मई 2018 में लगभग 3,500 पन्नों की चार्जशीट तैयार की थी, जिसमें 16 आरोपितों के नाम थे। हत्या के प्रावधानों और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपों का सामना करने के बावजूद कार्यवाही के दौरान सभी आरोपितों को जमानत मिल गई थी।

मामले में स्थायी अभियोजक की नियुक्ति में देरी को लेकर भी आलोचकों द्वारा सवाल उठाए गए थे। इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद सामने आया कि आरोपियों में से एक शम्सुद्दीन को सितंबर 2021 में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का शाखा सचिव चुना गया था, हालाँकि विरोध के बाद कथित तौर पर यह फैसला वापस ले लिया गया था।

आरोपितों पर लगाई गई थी कौन सी धाराएँ?

मधु के हत्यारों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था, जो गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने से लेकर हत्या तक के अपराधों से जुड़े थे। इनमें धारा 143 (गैरकानूनी जनसमूह), धारा 147 (बलवा), धारा 148 (घातक हथियार से लैस होकर बलवा करना), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना), धारा 324 (खतरनाक हथियारों से चोट पहुँचाना), धारा 326 (गंभीर चोट पहुँचाना), धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), धारा 352 (हमला), धारा 364 (हत्या के इरादे से अपहरण या अगवा करना), धारा 367 (गंभीर चोट पहुँचाने के लिए अपहरण करना), धारा 368 (अपहृत व्यक्ति को गलत तरीके से छिपाकर रखना) और धारा 302 के साथ पठित धारा 149 शामिल थी, जो एक सामान्य उद्देश्य के साथ गैरकानूनी जनसमूह द्वारा की गई हत्या से संबंधित है।

आरोपितों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत भी मामला दर्ज किया गया था, जिसमें धारा 3(1)(d), 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(v) और 3(2)(va) शामिल हैं, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ किए गए अपराधों से संबंधित हैं, जिसमें सामाजिक पहचान के आधार पर किए गए अपराधों के लिए अपमान, भेदभाव और सख्त सजा का प्रावधान है।

‘दलित-मुस्लिम एकता’ का नरेटिव हुआ ध्वस्त

मधु मॉब लिंचिंग मामले ने एक बार फिर उस बहुप्रचारित ‘जय भीम-जय मीम‘ के ढाँचे की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है, जिसे वाम-उदारवादी इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों द्वारा एक स्वाभाविक सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन के रूप में पेश किया जाता रहा है।

सालों से इस फर्जी नरेटिव का इस्तेमाल दलितों और मुसलमानों के बीच एक स्वाभाविक साझेदारी के रूप में प्रचारित किया गया है, जिसका बड़ा राजनीतिक उद्देश्य अक्सर हिंदू चुनावी एकजुटता के खिलाफ एक मजबूत विकल्प तैयार करना होता है। हालाँकि जमीन पर होने वाली घटनाएँ अक्सर टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तैयार किए गए आदर्श नैरेटिव की तुलना में अधिक जटिल दिखाई देती हैं।

महज खाने-पीने का सामान चुराने के आरोपित एक कमजोर ST युवक मधु की बेरहमी से की गई हत्या उन लोगों के लिए असहज करने वाले सवाल खड़े करती है जो इस तरह के गठबंधनों की वकालत करते रहे हैं। यदि इस एकजुटता को एक राजनीतिक रणनीति के बजाय एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता के रूप में पेश किया जाता है, तो इस तरह की घटनाओं को समझाना मुश्किल हो जाता है। मुद्दा केवल आरोपित व्यक्तियों की पहचान का नहीं है; बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक नारे वास्तव में जमीनी सामाजिक सच्चाइयों और स्थानीय तनावों पर काबू पा सकते हैं।

यह आलोचना इसलिए भी अधिक तीखी हो जाती है क्योंकि मधु का मामला कोई अकेला मामला नहीं है। अतीत में दलित पीड़ितों और इस्लामी अपराधियों से जुड़ी कई घटनाएँ इस धारणा को उजागर करती हैं कि ‘दलित-मुस्लिम एकता’ जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं के प्रतिबिंब के बजाय वामपंथी हलकों में गूँजने वाले एक राजनीतिक नारे के रूप में अधिक काम करती है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

असम विधानसभा में UCC विधेयक, बहुविवाह पर रोक, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: जानिए हिमंता सरकार के नए कानून के बारे में सबकुछ

असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया है।

सोमवार (25 मई 2026) को विधानसभा में पेश किए गए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026’ बिल के जरिए सरकार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढाँचे में लाना चाहती है।

हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को इस कानून से बाहर रखा गया है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने और सभी विवाह तथा तलाक का पंजीकरण जरूरी करने की बात कही गई है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड और क्यों है इसकी चर्चा?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा कानून है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। अभी भारत में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट आदि।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करने की बात कही गई है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र स्तर पर पूरे देश में UCC लागू नहीं हो सका। असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले BJP ने अपने घोषणा पत्र में UCC लागू करने का वादा किया था।

असम UCC बिल में क्या-क्या बड़े प्रावधान हैं?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान बहुविवाह पर प्रतिबंध है। यानी अब किसी भी समुदाय में एक से अधिक शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।

विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप है, लेकिन अब इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। बिल के अनुसार, सभी विवाहों और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा।

यानी केवल धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी करने के अलावा उसका कानूनी रजिस्ट्रेशन भी जरूरी होगा। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवादों की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। विधेयक उत्तराधिकार यानी संपत्ति के बंटवारे के लिए भी समान नियम लागू करने की बात करता है।

सरकार का दावा है कि इससे संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता आएगी और महिलाओं को परिवार की संपत्ति में अधिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे चर्चित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। पहली बार किसी कानून में लिव-इन संबंधों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है।

इसके तहत शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी पहचान और सुरक्षा मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर कानून क्यों बना रही है सरकार?

असम UCC बिल का सबसे नया और बहस वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी नियमन है। सरकार का तर्क है कि समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण कई बार महिलाएँ और बच्चे असुरक्षित रह जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी साथी के साथ रहकर बाद में उसे छोड़ देता है, तो मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई जटिल हो जाती है। सरकार का कहना है कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और जरूरत पड़ने पर महिला अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

बिल में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा। इससे उत्तराधिकार और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने की कोशिश होगी। हालाँकि अभी तक विधेयक के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि रजिस्ट्रेशन कितने दिनों के भीतर कराना होगा, रजिस्ट्रेशन न कराने पर क्या सजा होगी, किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी और सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी। इन बिंदुओं पर विधानसभा में चर्चा और अंतिम अधिसूचना के बाद स्थिति साफ हो सकती है।

विधेयक यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप में कोई साथी पहले से विवाहित है या नाबालिग है, तो ऐसे संबंध का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

किन लोगों को UCC से रखा गया है बाहर?

असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सरकार ने इस बिल में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी है। विधेयक के अनुसार राज्य की अनुसूचित जनजातियों यानी शेड्युल्ड ट्राइब्स (Scheduled Tribes) पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसमें पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की जनजातियाँ शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की लगभग 12.45 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। सरकार का कहना है कि इन समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है।

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक रस्मों के अनुसार विवाह करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। यानी लोग अपने धर्म और समुदाय की परंपराओं के अनुसार शादी कर सकेंगे, लेकिन उसका कानूनी पंजीकरण जरूरी होगा।

BJP ने अपने चुनावी वादे में भी स्पष्ट किया था कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी जाएगी। इससे सरकार जनजातीय संगठनों की आशंकाओं को कम करना चाहती है।

उत्तराखंड और गुजरात के UCC से कितना अलग है असम मॉडल?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से उसे लागू भी कर दिया। उत्तराखंड UCC में भी लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ किसी जोड़े को साथ रहने के एक महीने के भीतर अपना संबंध पंजीकृत कराना होता है।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो तीन महीने तक की जेल, 10 हजार रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान रखा गया है। उत्तराखंड कानून में रजिस्ट्रार को यह अधिकार भी दिया गया कि यदि कोई साथी 21 वर्ष से कम उम्र का है, तो उसके माता-पिता को जानकारी दी जाए। इसके अलावा संबंध समाप्त होने की सूचना पुलिस को देने का प्रावधान भी था।

इनमें से कुछ प्रावधानों को लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठे थे। बाद में उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कुछ नियमों में बदलाव की जानकारी दी। उदाहरण के लिए आधार कार्ड और सामुदायिक प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाई गई तथा गर्भावस्था की सूचना देने वाला नियम भी समाप्त किया गया।

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना UCC बिल पारित किया। वहाँ भी लिव-इन रिलेशनशिप को ‘विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध’ बताया गया और लगभग उत्तराखंड जैसे प्रावधान रखे गए।

असम का मॉडल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात से प्रेरित माना जा रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय समुदायों को स्पष्ट छूट देकर स्थानीय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है।

असम में UCC लागू होने से क्या बदल सकता है?

यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो असम में पारिवारिक और व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा बनने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।

सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों के मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक लगने से एकल विवाह व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी पहचान मिल सकती है। इससे भविष्य में उत्तराधिकार, भरण-पोषण और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा विवाह और तलाक के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से सरकारी रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित होंगे और कानूनी मामलों में प्रमाण जुटाना आसान हो सकता है। असम सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानूनी समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।

अब विधानसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा और मतदान होना है। यदि बिल पारित होता है, तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहाँ समान नागरिक संहिता को जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।