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सहर-अदनान-एजाज… बकरीद पर क्यों चला रहे ‘रोने’ का अभियान? समझिए क्या है मुस्लिम इन्फ्लुएंसर्स का ‘मकसद’

सरकार ने सड़क पर नमाज ने पढ़ने, खुले में जानवरों का न काटने जैसे कुछ नियम पालन करने को कह दिया है। उन नियमों का पालन करने से बचने के लिए ये इस्लामी कट्टरपंथी 'मजहब की आजादी' छीनने की बात कर रहे हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि मुस्लिमों को उनके त्यौहार मनाने नहीं दिया जाता है।

बकरीद पर बकरा काटने वाले इस्लामी कट्टरपंथी ने नया चलन शुरू किया है। यह चलन है, रोना-पीटना करने का। ये लोग अब विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। बकरीद पर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियोज सामने आ रही हैं। इन वीडियोज में रोना मचा हुआ है कि इन लोगों से बकरीद मनाने की आजादी छीनी जा रही है।

इसे सरकार के खिलाफ अलग नैरेटिव के रूप में गढ़ा जा रहा है क्योंकि सरकार ने सड़क पर नमाज ने पढ़ने, खुले में जानवरों का न काटने जैसे कुछ नियम पालन करने को कह दिया है। उन नियमों का पालन करने से बचने के लिए ये इस्लामी कट्टरपंथी आजादी की बात कर रहे हैं। माहौल बनाया जा रहा है कि मुस्लिमों को उनके त्यौहार मनाने नहीं दिया जाता है। इस तरीके से यह नैरेटिव फैला रहे हैं कि लोग अपने देश, अपनी ही संस्कृति और अपनी ही चुनी हुई सरकार पर सवाल उठाने लगें।

नैरेटिव फैलाने में ये और कोई नहीं बल्कि नौजवान इस्लामी कट्टरपंथियों की कौम है, जो आए दिन रीलों में अपने मजहब का प्रचार करती घूमती है। अदनान शेख, एजाज खान और सहर यूनुस शेख जैसे सोशल मीडिया से उभरे चेहरों ने बकरीद को लेकर इसी तरह के वीडियो बनाए हैं। इन वीडियो में दिखाया कि मुस्लिमों के साथ कितना गलत हो रहा है।

‘चीच्चा’ अदनान शेख ने मीरा रोड के मामले में मजहब की आजादी का रोना रोया

मजहब के आगे किसी को नहीं मानने वाले अदनान शेख ने मीरा रोड वाले मामले में सवाल उठाने वाले लोगों ‘बेरोजगार’ बताते वीडियो बनाया। ‘चीच्चा’ ने वीडियो में जो तर्क दिया उसका सोर्स उन्होंने चैटजीपीटी को बताया। अदनान ने चैटजीपीटी का हवाला देकर दावा किया कि भारत की 80% आबादी नॉन-वेज है, तो मुस्लिमों को खाने से क्यों रोका जाता है।

भूलना नहीं है कि मजहब की आजादी की बात करने वाला ये वही अदनान शेख है जिसने हिंदू लड़की से निकाह कर उसे भी मुस्लिम में परिवर्तित कर दिया है। जो सबसे ऊपर अल्लाह को मानता है लेकिन जब हिंदू लड़की के मजहब की बात आई तो उससे वह छीन लिया और अपना मजहब थोप डाला।

एजाज खान ने बदला लेने की चेतावनी दी

ऐसे ही एजाज खान ने भी ‘नॉन-वेज’ खाने को मुद्दा बनाकर वीडियो बनाया है। उसने भी मुस्लिमों पर अत्याचार का रोना रोया और फिर धमकी दी कि अगर मुस्लिम बदला लेने पर आए तो मुश्किल हो जाएगी।

अब एजाज खान को कौन नहीं जानता? जानता भी सिर्फ लफड़ों की वजह से ही है। यहाँ इतने अहम और संवेदनशील मुद्दे में भी एजाज खान ने मारने-काटने की धमकी दे डाली। उसको नहीं पता कि नॉन-वेज और वेज में क्या फर्क है लेकिन उसे यह पता है कि बदला कैसे लिया जाता है? क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी की एक पहचान यह भी है।

मुंब्रा को हरा रंग में रंगने का ख्वाब देखने के बाद सहर शेख मजहब की बात नहीं करना चाहतीं

यहाँ बात अगर ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ की होने लगी तो मुंब्रा को हरे रंग में रंगने का ख्वाब देखने वाली मेयर सहर यूनुस शेख कैसे पीछे हट सकती थीं। सहर यूनुस शेख एक कदम आगे निकली। सहर ने रोना रोते हुए सीधा हिंदुओं की मान्यताओं पर हमला बोला। सहर ने बकरा काटने की तुलना पशु बलि से की। यहाँ सहर कहती है कि मजहब की बात नहीं करनी चाहिए क्योंकि दुनिया में और भी कई समस्याएँ हैं।

सहर शेख AIMIM की मुंब्रा से मेयर हैं, पार्टी को केवल मजहब के नाम ही वोट मिलते हैं। और सहर यूनुस शेख को भी मुंब्रा में मजहब की बात करने के लिए ही चुना गया। यह खुद सहर शेख अपनी विक्ट्री स्पीच में बता चुकी है। जब सहर शेख ने मुंब्रा को हरे रंग में रंगने के अपने ख्वाब को पब्लिक किया था, और सामने खड़ी मुस्लिम भीड़ ने खूब तालियाँ बजाई थीं। वह आए दिन अपनी वीडियो में केवल मजहब की ही बात करती है, और अब बकरीद पर रोना रोते हुए सहर को मजहब की बात करने से चिढ़ हो रही है।

सरकार के नियम मुस्लिमों पर अत्याचार?

ये वही सोशल मीडिया की दुनिया में उभरे चेहरे हैं, जिन्हें देश की बड़ी संख्या में शामिल युवाओं ने फेमस किया है। इनमें से कोई नाच-गाना करके, कोई इधर-उधर लफड़ेबाजी करके तो कोई राजनीति के नाम पर नफरत फैलाकर आगे बढ़ा है। इनके पास न कोई तर्क है और न ही अपनी बात को साबित करने के लिए कोई तथ्य। इनके दावे सिर्फ भड़ास से भरे हैं।

अगर भारत में अलग-अलग राज्यों की सरकारें बकरीद को लेकर कुछ नियम तय कर रही है तो उसका मकसद ये कैसे हो सकता है कि मुस्लिमों के साथ भेदभाव हो? भारत में आखिर कब और किसने मुस्लिमों को बकरीद मनाने से रोका है? सरकार और प्रशासन का केवल इतना ही तो कहना है कि कानून के दायरे में रहकर, तय स्थानों पर और स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए त्यौहार मनाएँ। क्या कानून व्यवस्ता की बात करना अत्याचार है?

सच्चाई यह है कि ये फेमस चेहरे अपनी वीडियोज के जरिए भारत की एक डरावनी और झूठी तस्वीर पेश करने की कोशिश में लगे हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर की मीडिया पर, विशेषकर खाड़ी देशों और विदेशी दर्शकों के बीच यह नैरेटिव सेट किया जा सके कि भारत में अल्पसंख्यकों पर जुल्म हो रहा है।

‘पीड़ित’ का नकाब पहनने वालों को घिनौनी असलियत

याद रहे कि ये वही चेहरे हैं जो आम दिनों में विशुद्ध कट्टरपंथी और मजहबी कंटेंट पर फलते-फूलते हैं और जिनके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ‘नारा-ए-तकबीर’ जैसी बातें आम होती हैं, लेकिन जैसे ही कोई कानूनी बंदिश आती है, ये अचानक ‘शांतिप्रिय और पीड़ित’ होने का नाटक रचने लगते हैं। यही अदनान शेख और एजाज खान हैं, जिन्होंने 2019 में तबरेज अंसारी मामले पर अपनी मुस्लिम गैंग के साथ रील बनाई थी और मुस्लिमों के आतंकी बनने को जायज दिखाया था।

अब यही चेहरे सार्वजनिक स्थानों, सड़कों या रिहायशी सोसायटियों में खुलेआम दी जाने वाली कुर्बानी को सही ठहराने के लिए ये बार-बार तर्क देते हैं कि हिंदू भी तो मांस खाते हैं।

सवाल है कि क्या कोई हिंदू मीट खाने के लिए खुली सड़क पर मांस काटने की जिद करता है, क्या उनके खान-पान की वजह से सोसायटियों की नालियों में खून बहता नजर आता है। कोई भी सभ्य समाज यह स्वीकार नहीं कर सकता कि त्यौहार के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध किया जाए, सार्वजनिक नमाज से ट्रैफिक रोका जाए या खुले में जानवरों को काटकर बच्चों और नागरिकों के मानसिक स्वास्थ्य व स्वच्छता से खिलवाड़ किया जाए।

सालों से सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया में सक्रिय वामपंथी जमात ने हमेशा हिंदुओं के त्योहारों को निशाना बनाया है। दीपावली आते ही इन्हें प्रदूषण याद आता है, होली पर पानी की बर्बादी और रंगों के केमिकल पर ज्ञान दिया जाता है, और महाशिवरात्रि पर दूध की बर्बादी का रोना रोया जाता है। तब सनातनियों ने कभी इस तरह का ‘अंतरराष्ट्रीय रोना’ नहीं रोया।

लेकिन, आज जब प्रशासन सिर्फ इतना कहता है कि गाय, जिसे हिंदू पूजते हैं, उसकी कुर्बानी नहीं होगी और बकरे की कुर्बानी खुले में नहीं, बल्कि कड़े नियमों के तहत बंद जगहों पर होगी, तो इनका त्योहार खतरे में आ जाता है।

हमें समझना होगा कि इस्लामी कट्टरपंथियों का यह पूरा खेल ‘अधिकारों’ से जुड़ा नहीं, बल्कि ‘विशेषाधिकारों’ की जिद का है। इन्हें देश में रहना है और ये भी चाहते हैं कि कानून इनके मुताबिक चले। लेकिन अब समय है इन्हें समझना होगा कि भारत में नियम अगर हिंदुओं के लिए हैं तो दूसरे समुदाय पर भी वो वैसे ही लागू होंगे। इसलिए सोशल मीडिया पर आंसू बहाकर देश को बदनाम करने का यह ड्रामा अब पूरी तरह बंद होना चाहिए। न इस साल, न किसी साल ऐसी हरकतें बर्दाश्त की जानी चाहिए।

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