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सनातन के स्त्री प्रतीकों के प्रति तिरस्कार, हिंदू विरोध और घृणा का लंबा दौर: जब इस्लाम में अनिवार्य नहीं तो गाय की कुर्बानी पर क्यों मुस्लिमों का इतना जोर?

कुरान के अनुसार ईद-उल-अजहा पर बकरा, भेड़, गाय, भैंस और ऊँट की कुर्बानी दी जा सकती है। कुरान में कहीं भी विशेष रूप से गाय की कुर्बानी को अनिवार्य नहीं बताया गया है, भले ही गोमांस का सेवन 'हलाल' माना जाता हो।

भारत कई धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। संविधान के अनुसार भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है लेकिन यहाँ की सांस्कृतिक जड़ें लंबे समय से सनातन परंपराओं और मान्यताओं से जुड़ी रही हैं। ऐसे में कई बार धार्मिक मान्यताओं के टकराव से जुड़े मुद्दे विवाद का कारण बनते हैं जिनमें ‘गो हत्या’ का मुद्दा भी शामिल है।

ईद-उल-अजहा यानी बकरीद के मौके पर मुस्लिम समुदाय में कुर्बानी की परंपरा निभाई जाती है जिसमें आमतौर पर बकरों समेत कुछ अन्य जानवरों की कुर्बानी दी जाती है। हालाँकि, समय-समय पर गाय की कुर्बानी को लेकर भी विवाद सामने आते रहे हैं। कई मामलों में अदालतों तक यह मामला पहुँचा जहाँ गाय की कुर्बानी की अनुमति की माँग की गई।

इसी बीच, हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया जिनमें बकरीद के मौके पर गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने वाले नोटिफिकेशन को चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और माकपा (CPIM) से जुड़े पक्ष भी शामिल थे।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में BJP सरकार ने ईद-उल-अजहा के दौरान गाय और बैलों की कुर्बानी पर रोक लगाने का नोटिफिकेशन जारी किया था। हाई कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि गाय की कुर्बानी न तो ईद-उल-अजहा का अनिवार्य हिस्सा है और न ही इस्लाम में इसे जरूरी बताया गया है। इससे पहले, 27 मई को मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह का फैसला सुनाया था।

संविधान में गो-संरक्षण और अदालतों के अहम फैसले

भारत के संविधान में गायों की सुरक्षा को लेकर विशेष प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्य सरकारों को यह प्रयास करने के लिए कहा गया है कि गाय, बछड़ों और दूध देने या खेती में उपयोग होने वाले पशुओं के वध पर रोक लगाई जाए। यह प्रावधान राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) का हिस्सा है। हालाँकि, यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है लेकिन सरकारों को कानून और नीतियाँ बनाते समय इसका पालन करने की सलाह दी गई है।

देश के कई राज्यों में गो हत्या पर रोक लगाने वाले कानून लागू हैं लेकिन केरल, कुछ पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल (अब तक) में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं है।

गोहत्या को लेकर अदालतों में भी कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। 1975 में मोहम्मद हनीफ कुरैशी & अन्य बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में गो हत्या पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम की अनिवार्य मजहबी प्रथा का हिस्सा नहीं है। इसलिए अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सवाल इस मामले में लागू नहीं होता। इसके बाद 2005 में गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात मामले में सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की पीठ ने भी अहम फैसला सुनाया। अदालत ने बॉम्बे एनिमल प्रिजर्वेशन (गुजरात संशोधन) अधिनियम, 1994 को संवैधानिक रूप से वैध माना। इस कानून के तहत गायों और बैलों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था जिसे कोर्ट ने सही ठहराया।

संविधान और अदालतें मानती हैं कि गो हत्या ना हो लेकिन मुस्लिम समुदाय नहीं

ईद-उल-अजहा इस्लामी मान्यता के अनुसार पैगंबर इब्राहिम द्वारा अल्लाह के प्रति समर्पण की याद में मनाई जाती है। मान्यता है कि इब्राहिम अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए थे। हालाँकि, आज मुस्लिम समुदाय ठीक उसी तरह उनका अनुसरण नहीं करता। कुरान के अनुसार ईद-उल-अजहा पर बकरा, भेड़, गाय, भैंस और ऊँट की कुर्बानी दी जा सकती है।

हालाँकि, कुरान में कहीं भी विशेष रूप से गाय की कुर्बानी को अनिवार्य नहीं बताया गया है, भले ही गोमांस का सेवन ‘हलाल’ माना जाता हो। जहाँ एक ओर संविधान के नीति निदेशक तत्व (DPSP) और अदालतों ने गो हत्या पर रोक लगाने की बात कही है। वहीं, मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इन प्रावधानों की अनदेखी करते हुए गायों की कुर्बानी देता है जिसे हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचा सके।

जो हिंदुओं के लिए ‘अघ्न्या’ वो मुस्लिमों के लिए ‘हलाल’

हिंदू सनातन परंपरा में गाय को गौ माता के रूप में पूजनीय माना जाता है। गाय को मातृत्व, पोषण, पवित्रता, अहिंसा और जीवनदायिनी का प्रतीक माना गया है। वेदों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- ‘जिसे मारा या नुकसान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए’। हिंदू ग्रंथों, विशेष रूप से ‘ऋग्वेद’ और ‘अथर्ववेद’ में गाय को समृद्धि, पवित्रता, दिव्यता और जीवन-निर्वाह से जोड़ा गया है। वैदिक यज्ञों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में दूध और उससे बने उत्पादों का विशेष महत्व बताया गया है।

ऋग्वेद (1.164.27) में लिखा है– ‘अघ्न्येयं सा व॑र्धतां महते सौभ॑गाय’ जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि गाय को अघ्न्येयं (जिसे नहीं मारा जाना चाहिए) गाय स्वास्थ्य और समृद्धि लाती है। कुछ वैदिक व्याख्याओं में गोवध करने वालों के लिए कठोर दंड का उल्लेख भी मिलता है।

हालाँकि, सदियों के इस्लामी आक्रमणों, ब्रिटिश उपनिवेशवाद और दशकों के कॉन्ग्रेस शासन के बाद राजनीतिक लाभ के लिए मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू मान्यताओं, परंपराओं और गौरव को दबा दिया गया है। दूसरी ओर मुस्लिमों का जोर गाय की कुर्बानी पर ही रहता है।

सनातन के स्त्री प्रतिनिधित्व का इस्लामी अपमान

नवंबर 2023 में अमरेली सेशंस कोर्ट ने 3 मुस्लिम पुरुषों कासिम हाजी सोलंकी, सत्तार इस्माइल सोलंकी और अकरम हाजी सोलंकी को गाय की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अमरेली सेशंस कोर्ट की छापेमारी के दौरान, एक मुखबिर की सूचना पर बहारपारा गाँव के मोताखटकीवाड इलाके में एक घर पर छापा मारा गया। पुलिस ने तीनों नामजद मुस्लिम पुरुषों के घर से 40 किलो मांस बरामद किया।

मार्च 2025 में एक पुलिस को उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक गाँव में एक खेत में बछड़े के अवशेष मिले। समीर नामक एक व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आजीवन कारावास की सजा दी गई क्योंकि उसने पिछले साल होली के मौसम में जंगल में दो बछड़ों और एक गाय को मार डाला था।

इसी साल फरवरी में गुजरात के सूरत में गाय की हत्या रोकने के लिए चलाए जा रहे एक अभियान के दौरान एक मुस्लिम भीड़ ने हिंदू गौ रक्षकों और पुलिस पर धारदार हथियारों से हमला किया। मुस्लिम कसाई इस्लामी महीने रमजान के दौरान गायों को काटना चाहते थे जबकि राज्य में गाय की हत्या पर सख्त प्रतिबंध है।

27 फरवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के जालौन में हिंदू त्योहार नवरात्रि के दौरान गायों की हत्या करने पर सिकंदर, सैय्यद अली और हसनैन की हिरासत को बरकरार रखा। आरोपी तिकड़ी को 31 मार्च को गिरफ्तार किया गया था जब पुलिस ने लगभग 2-3 क्विंटल गोमांस, चाकू और अन्य सामग्री जब्त की। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें गायों के अवशेष नालियों और सुनसान जगहों पर फेंके हुए मिले और जाँच में मुस्लिम व्यक्ति दोषी पाए गए।

पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों के सामने मांस के टुकड़े फेंकने की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है और अधिकतर मामलों में मुसलमान ही दोषी पाए गए हैं। असम के मुस्लिम बहुल धुबरी में 2025 में बकरीद के दिन एक हनुमान मंदिर के पास गाय का सिर मिला था।

असम के श्रीभूमि जिले में एक हिंदू बहुल इलाके में स्थित हिंदू मंदिर के पास भी बकरीद के दिन एक गाय की हत्या की गई। गोलपारा में हजरत अली और 4 अन्य लोगों ने काली मंदिर के पास गाय का कटा हुआ सिर फेंका। जून 2025 में असम के लखीमपुर में एक नमाज स्थल के पास गाय की खोपड़ियाँ मिलने के बाद 7 मुस्लिम पुरुषों को गिरफ्तार किया गया। अक्टूबर 2024 में कट्टरवादियों ने नवरात्रि जुलूस के दौरान हिंदुओं पर मांस के टुकड़े फेंके। 2021 में दिल्ली के कालिंदी कुंज में 4 गायों की हत्या की गई और उनके अवशेष मंदिर के पास फेंक दिए गए।

ऑपइंडिया ने हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से ऐसी ही घटनाएँ दर्ज की हैं जिनमें हिंदू मंदिरों के अंदर गोमांस, कटे हुए सिर और अन्य अवशेष फेंके गए जो साफ तौर पर हिंदुओं और उनकी धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाने का कृत्य है।

ईद पर गाय की हत्या और मंदिरों में गाय के अवशेष फेंकने के अलावा ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें मुसलमानों को हिंदुओं को गोमांस भरे समोसे बेचते हुए पकड़ा गया। अप्रैल 2024 में गुजरात पुलिस ने वडोदरा के एक समोसे की दुकान ‘हुसैनी समोसा सेंटर‘ पर छापा मारा और गोमांस (गाय के मांस) से भरे समोसे बेचने के आरोप में दुकान मालिक इमरान यूसुफ कुरैशी और नईम शेख सहित छह लोगों को गिरफ्तार किया।

अप्रैल 2023 में, गुजरात के नवासी में अहमद मोहम्मद और चाचा अजीम भाई द्वारा चलाई जा रही एक खाने की दुकान में गोमांस से भरे समोसे बेचे जा रहे थे, जिन्हें चिकन और मटन समोसे बताकर बेचा जा रहा था।

पिछले कुछ वर्षों में लव जिहाद के हजारों मामले सामने आए हैं, जिनमें मुस्लिम युवक हिंदू महिलाओं को प्रेम का नाटक करके और कभी-कभी धार्मिक पहचान छुपाकर फँसाते हैं, विवाह का बहाना बनाकर शारीरिक संबंध बनाते हैं, ब्लैकमेल करते हैं, हिजाब या बुर्के जैसे इस्लामी पहनावे को थोपते हैं और अंततः उन्हें इस्लाम कबूल करने और उनसे शादी करने पर मजबूर करते हैं। अधिकतर ऐसे मामलों में एक सामान्य बात यह पाई गई है कि हिंदू महिलाओं को जबरन गोमांस खिलाया जाता है।

दुर्गा पूजा, नवरात्रि और छठ से लेकर गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदियों की देवी के रूप में पूजा तक हिंदू धर्म में दिव्य स्त्री प्रतिनिधित्व को विशेष महत्व दिया गया है। इसके विपरीत, इस्लामी परंपरा में महिलाओं को द्वितीय श्रेणी की नागरिक के रूप में देखा जाता है जिनकी पहचान उनके पुरुष ‘संरक्षकों’ के इर्द-गिर्द घूमती है।

इस्लामी ग्रंथों में मुस्लिम महिलाओं के लिए पूरा शरीर ढकना, घर पर नमाज पढ़ना, किसी पुरुष महरम के साथ ही बाहर जाना अनिवार्य बताया गया है और पुरुषों को चार पत्नियाँ रखने और पत्नी को मारने-पीटने तक की अनुमति दी गई है।

जहाँ एक ओर मुस्लिम पुरुषों को अपनी महिलाओं की रक्षा करना और उन्हें लगभग छुपाकर रखना अनिवार्य है, वहीं इस्लामी ग्रंथ काफिर महिलाओं को युद्ध की लूट या माल-ए-गनीमत के रूप में स्वीकार्य मानते हैं। वास्तव में, कई समकालीन इस्लामी विद्वानों ने यह भी टिप्पणी की है कि इस्लाम मुसलमानों को काफिरों या गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद के दौरान महिलाओं को यौन दासी बनाने और अपमानजनक कृत्य के रूप में बलात्कार करने की अनुमति देता है।

यह विकृत मानसिकता कि काफिर महिलाएँ काफिर पुरुषों और उनके धर्म को अपमानित करने का साधन हैं, दुनिया भर के कट्टरपंथी मुसलमानों में समान रूप से पाई जाती है। रेप जिहाद के मामलों से लेकर भारत में हिंदू महिलाओं को निशाना बनाने वाले मुस्लिम बलात्कार गिरोहों और ब्रिटेन में पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग तक इस्लामवादी धार्मिक विजय और वर्चस्व स्थापित करने के साधन के रूप में रेप को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

केरल के लव जिहाद मामले और हाल ही के TCS नासिक कन्वर्जन जिहाद मामले से यह भी पता चलता है कि कभी-कभी मुस्लिम महिलाएँ भी अपने हम-मजहब पुरुषों की हिंदू महिलाओं को रेप जिहाद और इस्लाम में धर्मांतरण का निशाना बनाने में सहायता करती हैं। गाय की हत्या हो या काफिर महिलाओं का बलात्कार इस्लामवादी गैर-मुसलमानों, विशेष रूप से मूर्तिपूजक हिंदुओं का अपमान करना अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं क्योंकि कुरान में मूर्तिपूजा को सबसे बड़ा पाप बताया गया है।

ये कुछ ताजा उदाहरण हैं जो यह दिखाते हैं कि इस्लामी आक्रमणकारियों के हिंदू पीड़ितों की चौथी और पाँचवीं पीढ़ी के वंशज किस प्रकार हिंदुओं के प्रति अपनी घृणा प्रकट करते हैं। भूलिए मत, मध्यकाल में भी जब इस्लामी बर्बर आक्रमणकारी भारत पर चढ़ाई करते थे तो वे अक्सर अपनी सेनाओं के आगे गायों को रखते थे, यह जानते हुए कि हिंदू गायों की पूजा करते हैं और उन पर आक्रमण नहीं करेंगे।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

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Shraddha Pandey
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