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देशभर से गिरफ्तार हुए 9 आतंकी, चर्चा में आया मुन्ना झिंगाड़ा: जानिए डी कंपनी से उसका क्या है कनेक्शन, पाकिस्तान से कैसे रची जा रही भारत विरोधी साजिशें

कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खतरनाक शार्पशूटर और दाऊद इब्राहिम के सबसे करीबियों में एक मुन्ना झिंगाडा एक बार फिर एक्टिव है। ISI और दाऊद इब्राहिम की आतंकी साजिश में मुन्ना झिंगाडा का नाम आने के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ ​​अलर्ट हो गई हैं। हाल ही में 9 आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद से वह एक बार फिर चर्चा में है। वह पाकिस्तान में बैठकर भारत में आईएसआई के आतंकी हमलों के नेटवर्क को हैंडल कर रहा था।

झिंगाड़ा के मॉड्यूल का पता चलते ही ये बात भी सामने आ गई है कि दाऊद इब्राहिम के आपराधिक गिरोह और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच पुराना गठजोड़ एक बार फिर भारत के खिलाफ साजिश रच रहा है। लंबे समय से चले आ रहे इस गठजोड़ ने ही मुंबई समेत देश के कई हिस्सों को दहलाया था। अधिकारियों ने कहा कि यह दाऊद इब्राहिम द्वारा सिकुड़ते डी-कंपनी नेटवर्क में अपनी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करने के प्रयासों का संकेत देता है।

मुंबई के जोगेश्वरी की गलियों से शुरू हुआ मुन्ना का सफर अब पाकिस्तान से भारत पर हमला करने के मंसूबे तक पहुँच गया है।

कौन है मुन्ना झिंगाड़ा?

मुन्ना झिंगाडा उर्फ सैयद मुदस्सर हुसैन उर्फ सैयद मुजक्किर हुसैन अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी का एक कुख्यात शार्प शूटर है। वह मुंबई के जोगेश्वरी का रहने वाला है। 90 के दशक में वह दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील के गैंग में एक खतरनाक शूटर के तौर पर जाना जाता था। दाऊद को उसके अचूक निशाने पर इतना भरोसा था कि गैंग के सबसे मुश्किल काम भी मुन्ना को सौंपे जाते थे। उसपर मर्डर, एक्सटॉर्शन और गैंग वॉर से जुड़े 70 से ज्यादा केस दर्ज हैं।

झिंगाड़ा का आपराधिक इतिहास दाऊद इब्राहिम और उसके पूर्व सहयोगी छोटा राजन के बीच हुए गैंगवार से भी जुड़ा हुआ है।

थाईलैंड में छोटा राजन पर हमला किया

2000 में बैंकॉक में छोटा राजन की हत्या करने की कोशिश की गई थी। उस वक्त झिंगाड़ा काफी सुर्खियों में आया था। दाऊद के खासमखास छोटा शकील के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए झिंगाड़ा अपने गिरोह के कुछ शूटरों के साथ थाईलैंड गया और राजन पर जानलेवा हमला किया। राजन बुरी तरह घायल हुआ, लेकिन उसकी जान बच गई, लेकिन उसका करीबी रोहित वर्मा इस हमले में मारा गया।

इस हमले के कारण छोटा राजन को लगभग दो साल तक छिपकर रहना पड़ा। इस दौरान अंडरवर्ल्ड के गुटों के बीच काफी खूनखराबा हुआ।

थाईलेंड में झिंगाड़ा को वहाँ की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और रोहित वर्मा की हत्या के आरोप में उसे 10 साल जेल की सजा सुनाई। जब थाई पुलिस ने मुन्ना झिंगाड़ा को गिरफ्तार किया, तो उसके पास से ‘मोहम्मद सलीम’ के नाम का एक पाकिस्तानी पासपोर्ट भी मिला था।

इसके बाद उसकी राष्ट्रीयता और निर्वासन को लेकर लगभग दो दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच थाईलेंड की कोर्ट में लड़ाई चली। झिंगाड़ा ने मोहम्मद सलीम नाम से पाकिस्तानी पासपोर्ट पर थाईलैंड में प्रवेश किया था, इसलिए पाकिस्तान का दावा था कि वह पाकिस्तानी नागरिक है, जबकि भारत का कहना था कि वह मुंबई के जोगेश्वरी में पैदा हुआ भारतीय नागरिक है।

हालाँकि थाई कोर्ट ने शुरू में भारत के प्रत्यर्पण करने की माँग के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन बाद में कानूनी कार्यवाही के बाद 2019 में थाईलैंड ने झिंगाडा को पाकिस्तान को सौंप दिया। इससे झिंगाड़ा को भारत लाने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा।

कराची से नए हमले की प्लानिंग बना रहा झिंगाड़ा

2019 में बैंकॉक जेल से रिहा होने के बाद आईएसआई मुन्ना को सीधे कराची ले गई। वहाँ पहुँच कर वह फिर से दाऊद के नेटवर्क में शामिल हो गया। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 9 आतंकवादियों की जांच में यह बात सामने आई है कि मुन्ना झिंगाडा अब पाकिस्तान में बैठकर भारत विरोधी गतिविधियों को कोऑर्डिनेट कर रहा है। मुन्ना और उसके साथियों को दिल्ली, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में हमला करने का काम सौंपा है।

मुंबई धमाकों के बाद दाऊद गैंग जिस तरह से आतंकी कार्रवाईयों को अंजाम देता रहा है, उसमें मुन्ना झिंगाडा का रोल अहम है। सिर्फ गैंगस्टर के तौर पर जाना जाने वाला मुन्ना अब ISI के कहने पर सीधे आतंकवादी मॉड्यूल संभाल रहा है। मुन्ना झिंगाडा नाम एक बार फिर भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, सुरक्षा एजेंसियां ​​अब उसके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।

9 आतंकियों की हुई थी गिरफ्तारी

जिन 9 आतंकियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उससे पूछताछ और प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि ये लोग देश की राजधानी समेत अन्य प्रमुख शहरों में संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। स्पेशल सेल के अनुसार, गिरफ्तार आरोपितों के संपर्क विदेशी हैंडलरों से थे, जो उन्हें एन्क्रिप्टेड ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से निर्देश दे रहे थे।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि गिरफ्तार आतंकियों को महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रेकी करने, स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने और संभावित हमलों की योजना बनाने का जिम्मा सौंपा गया था।

पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से हथियारों, ग्रेनेड और विस्फोटक सामग्री का बड़ा जखीरा बरामद किया है। बरामद सामग्री की जाँच की जा रही है, ताकि उसके स्रोत और संभावित उपयोग का पता लगाया जा सके। जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित देश के रणनीतिक महत्व वाले स्थानों, जैसे ऊर्जा प्रतिष्ठान, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन को निशाना बना सकते थे।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि हाल के वर्षों में विदेशों में बैठे आतंकी संचालक भारत में भर्ती, कट्टरपंथी फैलाने और स्लीपर सेल सक्रिय करने के लिए डिजिटल माध्यमों का अधिक उपयोग कर रहे हैं।

गाँव की बिजली काटकर इस्लामी भीड़ ने हिंदू परिवारों पर किया हमला, पुलिस पर भी पत्थर बरसाए: गुजरात के कच्छ का मामला, 23 के खिलाफ FIR

गुजरात के कच्छ जिले के माधापार पुलिस स्टेशन के रायधनपार गाँव में पड़ोसी गाँव के कुछ लोगों ने मामूली कहासुनी के बाद हिंदू समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया। यह घटना 30 मई 2026 की रात को हुई। शिकायत के मुताबिक, हमलावरों ने पहले गाँव की बिजली बंद कर दी और फिर पहले से प्लान बनाकर हमला किया। इस हिंसा में कई हिंदू युवक और पुलिसवाले घायल हो गए।

स्थानीय हिंदू युवक दर्शन बरडिया की शिकायत के आधार पर माधापार पुलिस ने 23 नामजद लोगों और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।

क्या है मामला

FIR और शिकायतकर्ता दर्शन बरडिया ने ऑपइंडिया को बताया कि घटना 30 मई की रात करीब 10:30 बजे शुरू हुई, जब वह और उसके दोस्त गाँव के बाहरी इलाके में बैठे थे। पड़ोस के वरनोरा गाँव के मुस्लिम युवकों का एक ग्रुप उनके गाँव पहुँचे। इनमें सलीम, अबू सुफियान, साहिल, अब्बास, समीर और अन्य शामिल थे। उन्होंने गाली-गलौज देते हुए धमकी की और कहा, “तुम हमें क्यों घूर रहे हो? अगर तुमने दोबारा देखा, तो हम तुम्हें पीटेंगे।”

यह बहस जल्द ही हाथापाई में बदल गई। इस दौरान, रजाक सिद्दीकी नाम का एक आदमी बोलेरो पिकअप गाड़ी में आया और हिंदू युवकों के साथ लड़ाई में शामिल हो गया। फिर वह चला गया। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि मामला खत्म हो गया है। हालाँकि यह एक बड़ी घटना की शुरुआत थी।

जब गाँव वाले झड़प के जवाब में इकट्ठा हुए, तो रजाक फिरोज रजक मेमन, शोएब सिद्दीकी मोखा, अमन करीम मेमन, अकरम जुसब मेमन, माजिद इब्राहिम केवरा और दूसरे लोगों के साथ वापस आ गया। बताया जाता है कि उन्होंने इकट्ठा हुए गाँव वालों की तरफ तेज रफ्तार में बोलेरो चलाई, ताकि उन्हें कुचल सकें। हालाँकि गाँव वाले किसी तरह हट गए, लेकिन गाड़ी एक खड़ी मोटरसाइकिल से टकरा गई। FIR में इसे हत्या की कोशिश के तौर पर दर्ज किया गया है।

मुस्लिम युवकों ने हथियारों से हमला किया

इस दौरान आरोपितों ने और लोगों को बुलाया। जल्द ही वर्नोरा गाँव से बड़ी संख्या में मुस्लिम मोटरसाइकिल और दूसरी गाड़ियों पर लाठी, पाइप, पत्थर और दूसरे हथियारों से लैस होकर आ गए। हनीफ, उमर, रेहान, दाऊद, एजाज, आफताब, अल्ताफ और दूसरे लोगों को लेकर एक और बोलेरो भी मौके पर पहुँच गई।

शिकायत के मुताबिक, भीड़ ने पहले बिजली के खंभे पर तारों से छेड़छाड़ करके पूरे गाँव की बिजली काट दी। फिर उन्होंने गांव के एंट्री गेट पर जमा हिंदू गाँववालों और रिहायशी इलाकों के घरों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। पत्थरबाजी से दहशत फैल गई, जिससे कई लोगों को अपने घरों के अंदर छिपना पड़ा।

दर्शन बरदिया और राजेश चावड़ा समेत कई हिंदू नौजवान घायल हो गए। राजेश चावड़ा की बाईं आँख के पास गंभीर चोटें आई। कम से कम एक नौजवान गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि तीन से चार अन्य को मामूली चोटें आईं। इतना ही नहीं, पुलिस की गाड़ियों पर भी हमला किया गया।

जब माधापार पुलिस स्टेशन और लोकल क्राइम ब्रांच (LCB) की पुलिस टीमें मौके पर पहुंची, तो भीड़ ने उनकी गाड़ियों को भी निशाना बनाया। पथराव में एक LCB गाड़ी समेत दो से तीन पुलिस गाड़ियाँ डैमेज हो गईं। एक पुलिसवाला भी घायल हो गया।

हिंदू संगठन ने सोची समझी साजिश करार दिया

हिंदू युवा संगठन के नेता रघुवीर सिंह जडेजा ने इस हमले को ‘जिहादी सोच’ का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए पहले से योजनाबद्ध तरीके से साज़श रची गई। ऑपइंडिया से बात करते हुए, उन्होंने दावा किया कि ऐसा बहुत कम होता है कि किसी पूरे हिंदू गाँव को इस तरह से टारगेट किया जाए और हमले से पहले बिजली और CCTV कथित तौर पर बंद कर दिए गए हों।

उन्होंने कहा कि साजिश के तहत भीड़ हथियारों से लैस होकर आई थी। वे चेन लेकर आए थे जिन्हें उन्होंने बिजली के खंभों पर तारों पर लगाकर शॉर्ट सर्किट करके पूरे गाँव की बिजली बंद कर दी थी। रघुवीर सिंह ने आगे कहा कि देश के दूसरे हिस्सों में हिंदू समुदाय को भी इस घटना से सीखना होगा। उन्होंने कहा कि जिला पुलिस प्रमुख की मौजूदगी में मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया।

उन्होंने वर्नोरा गाँव की तलाशी लेने की माँग की। इसे ‘जिहादी का केंद्र’ कहा और इलाके से गोहत्या और गैर-कानूनी बीफ के व्यापार के पिछले मामलों का हवाला दिया। उन्होंने मुस्लिम बहुल गाँव की पूरी जाँच की माँग की है।

पुलिस ने की कार्रवाई

कच्छ पश्चिम के पुलिस अधीक्षक विकास सुंडा ने कहा कि पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और उसी रात लगभग 23 लोगों को हिरासत में लिया। 23 नामजद आरोपितों और 5-7 अज्ञात लोगों के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं, 109(1), 115(2), 118(1), 125(F), 125(B), 189(2), 190, 191(2), 191(3), 351(3), 296(B), और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत FIR दर्ज की गई है। आरोपों में हत्या की कोशिश, गैर-कानूनी तरीके से जमा होना, जानलेवा हथियारों के साथ दंगा करना और लापरवाही से गाड़ी चलाकर जान को खतरे में डालना शामिल है।

नामजद आरोपियों में जिनके नाम हैं, उनमें सलीम ममद मोखा, अबू सुफियान मोखा, साहिल सिद्दीकी मोखा, अब्बास ममद मोखा, समीर अब्दुल मेमन, रजाक सिद्दीकी मेर, फिरोज रजाक मेमन, शोएब सिद्दीकी मोखा, अमन करीम मेमन, अकरम जुसब मेमन, मजीद इब्राहिम केवरा, हनीफ रमजू केवरा, हनीफ अजीज मेमन, उमर अजीज मेमन, रेहान हनीफ खलीफा, इब्राहिम ममद मेमन, दाऊद इब्राहिम केवरा, एजाज उमर मेर, समीर अजीज मेमन, आफताब हनीफ केवरा, आजाद ममद केवरा, अल्ताफ लतीफ केवरा, और ममद लाखा मोखा शामिल हैं।

पुलिस ने वरनोरा गाँव में गैर-कानूनी बिजली कनेक्शन के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की है। इलाके में गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन के खिलाफ जल्द ही बुलडोजर एक्शन देखने में आ सकता है। इलाके में अभी हालात काबू में हैं और भारी पुलिस बल तैनात है। पूरे मामले की जाँच जारी है।

(ये खबर मूल रूप से गुजराती में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

UP में 33000+ माध्यमिक शिक्षकों की नियुक्ति, योगी सरकार ने मिशन मोड में की भर्तियाँ: योग्यता को मिला सम्मान, जानें कैसे लाखों छात्रों का संवरा भविष्य

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य की माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए वर्षों से चले आ रहे भर्ती संकट को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। प्रदेश में एक समय ऐसा था जब माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में नियुक्तियाँ पूरी तरह से ठप पड़ी थीं, जिससे न केवल शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा था बल्कि युवाओं का सरकारी तंत्र से भरोसा भी उठने लगा था। लेकिन साल 2017 में सत्ता की कमान संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरी व्यवस्था को सुधारने का बीड़ा उठाया और ठप पड़ी चयन प्रक्रिया को रफ्तार दी।

ऐतिहासिक आँकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 से लेकर 2017 तक माध्यमिक शिक्षा विभाग में भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से ठहराव का शिकार रही। पूर्ववर्ती सरकार के पाँच सालों के कार्यकाल के दौरान विद्यालयों में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति तो होती रही, लेकिन नए पदों पर भर्ती के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। इसका सीधा खामियाजा प्रदेश के लाखों छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ा, जो बिना विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के पढ़ाई करने को मजबूर थे। विद्यालयों में प्रशासनिक नेतृत्व का भी अकाल पड़ चुका था क्योंकि प्रधानाचार्यों के पद भी सालों से खाली पड़े थे।

साल 2017 में सूबे में योगी सरकार के गठन के बाद स्थिति में अभूतपूर्व और तेज बदलाव देखा गया। मुख्यमंत्री ने माध्यमिक शिक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए रिक्त पदों को भरने के लिए सख्त निर्देश जारी किए। सरकार ने पुरानी सुस्त कार्यप्रणाली को दरकिनार करते हुए पूरी चयन प्रक्रिया को ‘मिशन मोड’ में आगे बढ़ाया। इस नई कार्ययोजना के तहत किसी भी स्तर पर भाई-भतीजावाद या भ्रष्टाचार की गुंजाइश को खत्म कर पूरी तरह से पारदर्शिता, सुशासन और मेरिट (योग्यता) को चयन का मुख्य आधार बनाया गया।

इसी पारदर्शी व्यवस्था का सुखद परिणाम आज उत्तर प्रदेश के सामने है, जहाँ अप्रैल 2017 के बाद से कुल 33,401 पदों पर योग्य उम्मीदवारों का सफल चयन किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड द्वारा जारी किए गए आधिकारिक और प्रामाणिक आँकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2017 से लेकर वर्ष 2022 की अवधि के भीतर ही रिकॉर्ड स्तर पर नियुक्तियाँ की गईं। इसमें प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने के लिए 783 प्रधानाचार्यों, उच्च शिक्षण स्तर को सुधारने के लिए 5,321 प्रवक्ताओं (पीजीटी) तथा जमीनी स्तर पर कक्षाओं को संभालने के लिए 27,297 प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों (टीजीटी) की चयन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराया गया।

माध्यमिक शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और सरकार के नीति निर्धारकों ने इस प्रशासनिक और शैक्षिक क्रांति पर प्रसन्नता व्यक्त की है। सरकार की इस ऐतिहासिक उपलब्धि और दूरगामी विजन को स्पष्ट करते हुए विभागीय अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से अपना संयुक्त बयान जारी किया है।

शासन और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों ने अपने साझा बयान में कहा, “उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा में 33 हजार से अधिक पदों पर की गई यह बंपर भर्ती केवल एक प्रशासनिक आँकड़ा या सामान्य उपलब्धि मात्र नहीं है। यह असल में राज्य के भीतर उस बड़े व्यवस्था परिवर्तन और नीतिगत बदलाव की जीवंत कहानी है, जिसमें सालों से ठप पड़ी चयन प्रक्रिया को न सिर्फ गति मिली, बल्कि प्रदेश के मेधावी युवाओं को उनकी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का उचित अवसर भी प्राप्त हुआ।”

बयान में आगे कहा गया, “राज्य सरकार की नीति हमेशा से साफ रही है कि विद्यालयों में शिक्षकों की किसी भी प्रकार की कमी को तुरंत दूर किया जाए। हमारी नीयत पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करने की रही, जिसके सुखद नतीजे आज सबके सामने हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रशासनिक क्रियान्वयन के बल पर ही हमने इस पांच साल पुराने ठहराव को तोड़कर शिक्षा जगत को एक नई और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान की है।”

इस बड़े भर्ती अभियान का सबसे सकारात्मक असर स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी दूर होने के रूप में सामने आया है। लंबे समय से गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और कंप्यूटर जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों के पद खाली होने से ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के सरकारी स्कूल गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे थे। विषय विशेषज्ञों की तैनाती होने से अब छात्रों की पढ़ाई की गुणवत्ता में भारी सुधार दर्ज किया गया है। इसके अलावा स्कूलों में स्थायी प्रधानाचार्यों की नियुक्ति होने से विद्यालयों का प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत हुआ है, जिससे दैनिक शैक्षणिक माहौल और अनुशासन दोनों में गुणात्मक सुधार हुआ है।

शिक्षकों की इस बड़े पैमाने पर हुई नियुक्तियों ने उत्तर प्रदेश सरकार के व्यापक शिक्षा सुधार एजेंडे को एक बेहद मजबूत और ठोस आधार प्रदान कर दिया है। वर्तमान में राज्य के माध्यमिक विद्यालयों का कायाकल्प करने के लिए ‘ऑपरेशन अलंकार’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसके तहत जर्जर भवनों को आधुनिक रूप दिया जा रहा है। इसके साथ ही स्कूलों में स्मार्ट क्लासेस की स्थापना, अत्याधुनिक आईसीटी लैब्स (इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी), विज्ञान एवँ कंप्यूटर प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण और डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन सभी भौतिक संसाधनों की उपयोगिता तभी संभव थी, जब इन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षक मौजूद हों। अब जबकि प्रदेश के विद्यालयों को पारदर्शी तरीके से चुने गए ऊर्जावान और योग्य शिक्षक मिल चुके हैं, तो राज्य की नकलविहीन परीक्षा प्रणाली और इन डिजिटल सुधारों का लाभ सीधे तौर पर राज्य के अंतिम पायदान पर खड़े छात्र तक पहुँच रहा है।

ऐसे में पारदर्शी और मेरिट आधारित इस पूरी प्रक्रिया ने न केवल उत्तर प्रदेश के युवाओं के भीतर सरकारी भर्ती प्रणालियों के प्रति खोए हुए विश्वास को दोबारा बहाल किया है, बल्कि राज्य के सरकारी स्कूलों को एक नई पहचान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनने की नई ऊर्जा भी प्रदान की है।

जिस हिंदू की हत्या हुई, अपराधी भी वही: वाह रे सपाइयों तुम्हारें आगे तो गिरगिट भी शरमा जाए, असद के खिलाफ बोलने में जबान कटती है क्या?

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सूर्या चौहान की कट्टरपंथियों ने बकरीद के दिन बेरहमी से हत्या कर दी। उसकी चिता की आग अभी ठंडी भी ना हुई थी कि समाजवादी पार्टी ने उस पर राजनीतिक करनी शुरू कर दी। राजनीति, फिर भी संयमित शब्द लगता है, अगर साफ शब्दों में कहें तो सपा ने हत्यारों के लिए ही बैटिंग करनी शुरू कर दी। सपा ने ये दिखाने की कोशिश की जो मारा गया, वो इसलिए मारा गया क्योंकि मारा जाना ही उसकी नियति थी। ऐसे लोगों के लिए हिंदुओं की नियति मारा जाना ही है।

खैर, वापस मुद्दे पर लौटते हैं और समझते हैं कि सपा ने किस तरह झूठ के सहारे एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है। सपा के प्रवक्ता अमीक जामेई ने X पर एक पोस्ट किया। अमीक ने लिखा, “असद का एनकाउंटर हुआ सूर्य (सूर्या) के परिवार को बेशक न्याय मिला जो मिलना चाहिए था।” अब ये पढ़कर आपको लगेगा कि सपा ने तुष्टिकरण करना छोड़ दिया है लेकिन अगली ही लाइन में अमीक ने जो लिखा, उसे पढ़कर आपको शायद इस सपाई सोच से घिन आएगी।

अमीक ने लिखा, “पर जाँच हो तो पता चलेगा कि गाजियाबाद में नाबालिग असद और सूर्य दोस्त थे, एक ही गली मे रहते थे, सूर्य (सूर्या) के असद की बहन से दोस्ती थी। जो असद को पसंद न था जिसे लेकर विवाद चल रहा था। जिसके बाद असद के परिवार ने मुहल्ला बदल लिया पर दोस्ती का सिलसिला न रुका यह मुद्दा सूर्य (सूर्या) की जान पर बन आया।”

अमीक ने मनगढ़ंत कहानी के जरिए झूठ परोसने की पूरी कोशिश की। या यूँ कहें कि यह दिखाने की कोशिश की कि हिंदू युवक ने एक मुस्लिम युवती से दोस्ती कैसे कर ली? अमीक ने साफ तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि यह मामला ‘कथित दोस्ती’ या व्यक्तिगत विवाद से जुड़ा था, मानो इससे हत्या की गंभीरता किसी तरह कम हो जाती हो। लेकिन क्या यह हत्या को जायज ठहराने की कोशिश नहीं है?

मान लीजिए, तर्क के लिए ही सही कि यदि किसी युवक और युवती के बीच संबंध थे तो क्या इसका अर्थ यह हो जाता है कि किसी की जान ले ली जाए? यदि किसी परिवार या व्यक्ति को किसी संबंध पर आपत्ति थी, तो उसके लिए कानूनी रास्ते मौजूद थे। बातचीत, शिकायत, पुलिस, कानून देश में इन सबकी व्यवस्था है। लेकिन किसी युवक को निर्ममता से चाकूओं से गोदकर मार देना? यह कैसे जायज हो सकता है। यह कट्टरता का चरम है और अमीक ने इसे भी जायज बताने की कोशिश की है।

सिर्फ इतना ही नहीं, इस पोस्ट में अमीक ने एक और झूठ भी परोसा है। अमीक ने लिखा, “हम देखते है की उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार हत्यारा PDA यानि दलित हो मुसलमान हो ब्रह्मण या यादव हो तो उसे मीडिया द्वारा खूब हेट का मुद्दा बनाया जाता है क्या यह सही नहीं की असद को पुलिस ने डिटेन कर रखा था बाद मे उसका फुल एनकाउंटर हुआ?”

यानी जो ‘पाप’ अमीक ने पहली लाइन में ‘न्याय’ लिखकर किया था अब वो उसको पूरी तरह धो रहे हैं। पुलिस भी अमीक के लिए झूठी हो गई है। हमने अमीक की प्रोफाइल भी खँगाली कि क्या उन्हें सूर्या की हत्या का कोई दुख था, क्या उन्हें असद से कोई नाराजगी थी। जवाब है- नहीं। असद के खिलाफ, या सूर्या की निर्मम हत्या पर अमीक ने कुछ भी नहीं लिखा है।

असद के एनकाउंटर की पूरी कहानी पुलिस खुद ही बता चुकी है जिसे आप नीचे लिंक में पढ़-सुन सकते हैं।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुए सूर्यप्रताप उर्फ सूर्या चौहान हत्याकांड और उसके मुख्य आरोपी असद के पुलिस एनकाउंटर के बाद अब इस मामले पर गंभीर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता अमीक जामेई द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, जिसमें अमीक जामेई के बयान को विभाजनकारी बताया जा रहा है।

‘असद ने सूर्या को गली में कोल्ड ड्रिंक पिलाई, फिर चाकुओं से गोद डाला’: चश्मदीद ने बताई सूर्य चौहान हत्याकांड की पूरी कहानी, पढ़ें ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया। यहाँ खोड़ा थाना क्षेत्र में बकरीद के दिन एक 17 वर्षीय हिंदू किशोर सूर्या चौहान की उसके ही पूर्व परिचित मुस्लिम दोस्तों ने बेरहमी से चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी।

इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने से ठीक पहले कट्टरपंथी हमलावरों ने पीड़ित से पूछा, “क्या तुमने कभी बकरा हलाल होते देखा है? आज तुझे दिखाते हैं।”

यह कहते ही उन्होंने सूर्या पर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला कर दिया। नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में इलाज के दौरान तड़प-तड़प कर इस हिंदू लड़के ने दम तोड़ दिया। पुलिस की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जो इस पूरी खौफनाक साजिश की गवाही दे रही है।

सूर्या चौहान हत्याकांड में मुख्य आरोपितअ सद को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में पाँच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। तीन आरोपितों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था, जबकि मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था।

उस पर 50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया गया था। इस मामले में ऑपइंडिया की टीम उस गली तक पहुँची, जहाँ सूर्या को चाकू मारा गया था। एक स्थानीय व्यक्ति ने मामले को लेकर कई और भी खुलासे किए।

जहाँ असद ने सूर्या को मारा था चाकू वहाँ पहुँची ऑपइंडिया की टीम

ऑपइंडिया के रिपोर्टर को स्थानीय व्यक्ति ने वह जगह दिखाई, जहाँ सूर्या को चाकू घोंपा गया था। उसने गली दिखाते हुए कहा, “ये वही पतली गली है, वे 7 बंदे थे वो, उसको प्यार से घर से बुलाए, बुलाकर के यहाँ लाकर के चाकू मारा। फिर पकड़कर गोद में ले जाने की कोशिश करने लगे कि ले जा कर फेंक दें, लेकिन दिन का टाइम था, फेंक नहीं पाए।”

उसने आगे कहा, “ये सब एक घंटे के अंदर ही हो गया। बहुत चाकू मारे उसे, कई बार मारा, घुमा दिया, मारा घुमा दिया, अकेला बंदा 7 लोगों के बीच में क्या कर सकता है।”

उस शख्स ने बताया कि पहले उसे पास की सीढ़ी पर बैठाकर कोल्डड्रिंक पिलाई गई, उसके बाद गली में लाकर उसे चाकू मारा गया। बातचीत में सामने आया कि असद की कोशिश तो यहीं थी कि उसकी लाश को ठिकाने भी लगा दिया जाए, लेकिन गली से निकल कर तिराहे तक आते-आते सूर्या गिर गया।

पुरानी रंजिश का बदला और बकरीद पर साजिश

मृतक सूर्या चौहान मूल रूप से एटा का रहने वाला था। वह नवनीत विहार, खोड़ा में अपनी माँ, बड़े भाई यश चौहान और छोटी बहन के साथ रहता था। उसके पिता कौशलेंद्र की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। सूर्या 11वीं कक्षा का छात्र था। जानकारी के मुताबिक, करीब 8 महीने पहले सूर्या का पड़ोस में रहने वाले असद नाम के युवक से किसी बात पर मामूली विवाद हुआ था।

इसी पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए असद ने बकरीद के पवित्र दिन को चुना। 28 मई की दोपहर को असद ने सूर्या को फोन किया। उसने सूर्या को बकरीद की पार्टी के बहाने मिलने के लिए चौधरी स्कूल के पास वाली गली नंबर 2 में बुलाया।

सूर्या अपने दोस्त आयुष और विक्की के साथ असद से मिलने पहुँचा था। विक्की और आयुष ने आँखों देखा हाल बताते हुए बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। विक्की ने बताया कि जैसे ही वे गली में पहुँचे, वहाँ पहले से ही असद, नवाब, फरहान, आतिफ और सारिक समेत 5 से 6 मुस्लिम युवक हथियारों के साथ घात लगाकर बैठे थे।

आते ही उन्होंने सूर्या को चारों तरफ से दबोच लिया। इसके बाद उन्होंने सांप्रदायिक और हिंसक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है? चश्मदीदों के मुताबिक, आरोपितों ने चिल्लाते हुए कहा कि आज बकरीद है और आज कुर्बानी इस हिंदू लड़के की देंगे।

यह कहते ही सभी आरोपितों ने सूर्या पर बड़े चाकुओं से हमला बोल दिया। उन्होंने सूर्या के पेट, सीने और शरीर के अन्य हिस्सों पर ताबड़तोड़ कई वार किए। हमला इतना बर्बर था कि चाकुओं की गोदने की वजह से सूर्या की आंतें तक बाहर आ गईं।

मौके पर चीख-पुकार और शोर मच गया। शोर सुनकर पास ही मौजूद सूर्या का भाई यश चौहान और उसकी माँ दौड़ते हुए घटना स्थल की तरफ भागे। परिजनों को अपनी तरफ आता देख सभी मुस्लिम हमलावर खून से लथपथ सूर्या को तड़पता हुआ छोड़कर मौके से फरार हो गए थे।

हर घटना में ‘मुस्लिम पर अत्याचार’ ढूँढने वाले लिबरल-वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज, बकरीद पर हिंदू की ‘कुर्बानी’ पर चुप: पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग की मुँह नहीं खुली।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, सीएम योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

(साभार- द क्विंट)

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।

अभिषेक बनर्जी पर अंडा फेंकने की घटना को ममता बनर्जी ने बताया जानलेवा, कहा- हेलमेट न होता तो जाती जान: यही TMC सुप्रीमो चुनावी हिंसाओं को बताती थी छोटी-मोटी घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर में शनिवार (30 मई 2026) को तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी पर नाराज स्थानीय लोगों ने अंडे फेंके और उनका विरोध किया। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी, जिन्होंने चुनाव परिणाम आने से पहले BJP कार्यकर्ताओं को चुनाव बाद हिंसा की धमकी दी थी, लोगों द्वारा फेंके जा रहे अंडों से बचने के लिए हेलमेट पहने हुए दिखाई दिए।

सड़क पर नाटकीय विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक ड्रामे के जरिए अपना राजनीतिक करियर बनाने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कोलकाता के बेल व्यू अस्पताल में हंगामा खड़ा कर दिया, जब अस्पताल ने अभिषेक बनर्जी को भर्ती करने से इनकार कर दिया।

दरअसल डॉक्टरों ने साफ कर दिया था कि उन्हें किसी तरह की गंभीर शारीरिक चोट नहीं लगी है। डॉक्टरों ने बताया कि TMC नेता पूरी तरह होश में थे, उनकी स्थिति सामान्य थी और उनकी छाती पर केवल मामूली चोट के निशान थे।

ममता बनर्जी और TMC ने इस घटना को भुनाने की कोशिश करते हुए पहले नाराज स्थानीय लोगों को ‘भाजपा समर्थित उपद्रवी’ बताया और दावा किया कि शासक ही हत्यारे बन गए हैं।

इसके बाद TMC सुप्रीमो ने यह विवादित दावा किया कि अगर अभिषेक बनर्जी ने हेलमेट नहीं पहना होता तो अंडे लगने से उनकी मौत भी हो सकती थी। उन्होंने कहा, “एक स्थानीय व्यक्ति ने उन्हें हेलमेट दिया था, नहीं तो वह मौके पर ही मर जाते।”

उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में भाजपा सरकार ने एक निजी अस्पताल को उनके भतीजे को भर्ती करने की अनुमति नहीं दी, जबकि उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी।

जानिए 2021 के चुनाव के बाद हिंसा पर ममता बनर्जी ने क्या दिया था बयान

जहाँ ममता बनर्जी अपने भ्रष्ट भतीजे के खिलाफ जनता के गुस्से के इस मामले को एक ‘बड़ी घटना’ के रूप में पेश करने में व्यस्त हैं, वहीं TMC सुप्रीमो ने 2021 में बंगाल में हुई चुनाव बाद हिंसा को ‘छोटो छोटो घटना’ यानी छोटी-मोटी घटनाएँ बताकर खारिज कर दिया था।

जो लोग इस मामले से परिचित नहीं हैं, उन्हें बता दें कि 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद एक दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी, महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएँ हुई थीं और हजारों लोगों को TMC के गुंडों के डर से पलायन करना पड़ा था, लेकिन प्रतिद्वंद्वी दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई ये हिंसा और अत्याचार ममता बनर्जी को मामूली लगे थे।

उन्होंने सुझाव दिया था कि ये केवल छोटी-मोटी घटनाएँ थीं, जो चुनाव के बाद हर जगह होती रहती हैं। अप्रैल 2023 में उन्होंने कहा था, “कोयेकटा छोटो छोटो घटना घोटे छिलो इलेक्शनर पर, सामान्यो घोटे थाके सोब जाइगाइ (चुनाव के बाद कुछ छोटी-मोटी घटनाएँ हुई थीं। ऐसी घटनाएँ हर जगह होती रहती हैं)।”

उन्होंने यह भी दुख जताया था कि केंद्र सरकार ने राज्य में कई तथ्य-जाँच समितियाँ भेजीं, जिसके कारण कथित तौर पर TMC के कई कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में गिरफ्तार किया गया। ममता बनर्जी ने जवाबदेही स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा था, “अगर बंगाल में कुछ होता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार जिम्मेदार है।”

उन्होंने आगे कहा था, “चुनाव के बाद कुछ छोटी-छोटी घटनाएँ हुई थीं, लेकिन केंद्र ने दिल्ली से सारी टीमें भेज दीं। उन्होंने CBI, ED और आयोगों जैसी एजेंसियों के जरिए हमारे लड़के-लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया।”

2021 में ममता बनर्जी ने चुनाव बाद TMC समर्थकों द्वारा की गई हिंसा को भाजपा और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) द्वारा कथित अत्याचार का बदला बताते हुए उसका बचाव करने की कोशिश की थी।

उन्होंने कहा था, “बंगाल एक शांतिप्रिय जगह है। चुनाव के दौरान थोड़ी गर्मी, धूल और तनाव रहा। भाजपा ने बहुत अत्याचार किया, CAPF ने भी।” यह बयान उन्होंने राज्य में शांति बनाए रखने की औपचारिक अपील करते हुए दिया था।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बुंदेलखंड का सूर्य मंदिर बनेगा UP का नया पर्यटन केंद्र, चंदेल राजाओं ने कोणार्क से भी पहले कराया था निर्माण: अब UNESCO विश्व धरोहर में शामिल करा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका हमेशा से अपने शौर्य, जल प्रबंधन, किलों और मंदिरों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब इसी क्षेत्र की एक ऐतिहासिक धरोहर फिर से चर्चा में है। महोबा का प्राचीन सूर्य मंदिर जिसे राहिलिया सूर्य मंदिर भी कहा जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है।

इसकी वजह सिर्फ इसका इतिहास नहीं, बल्कि वह नई पहल भी है जिसके जरिए उत्तर प्रदेश सरकार इस मंदिर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने की तैयारी कर रही है। करीब 1100 साल पुराने इस मंदिर को लेकर दावा किया जाता है कि यह ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से भी कई शताब्दियों पुराना है।

यही कारण है कि इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और स्थानीय सामाजिक संगठनों की नजरें अब इस धरोहर पर टिकी हुई हैं। सरकार भी इसे पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

पर्यटन के नए नक्शे पर उभर रहा है महोबा का सूर्य मंदिर

पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन और पर्यटन विभाग ने इस ऐतिहासिक मंदिर को नई पहचान देने की दिशा में कई कदम उठाए हैं। मंदिर परिसर में आकर्षक लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए बेहतर सड़क संपर्क विकसित किया गया है।

रात के समय मंदिर की भव्यता को दिखाने के लिए लाइट एंड साउंड शो की तैयारी की गई है, जबकि आधुनिक सुविधाओं के तहत स्मार्ट सोलर बेंच जैसी व्यवस्थाएँ भी विकसित की जा रही हैं। राहिल सागर के घाटों की सफाई, मंदिर परिसर के चारों ओर बाउंड्री वॉल का निर्माण और पर्यटकों के लिए सुविधाओं का विस्तार भी इसी योजना का हिस्सा है।

प्रशासन का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक धरोहर का व्यवस्थित संरक्षण और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह बुंदेलखंड के पर्यटन उद्योग को नई दिशा दे सकता है।

स्थानीय संगठनों और बुंदेली समाज की ओर से लगातार यह माँग भी उठ रही है कि मंदिर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्रस्ताव भेजा जाए। यदि ऐसा होता है तो महोबा न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक और पर्यटन के लिहाज से भी नई पहचान हासिल कर सकता है।

आखिर क्यों कहा जाता है कि यह कोणार्क से भी पुराना है?

जब भी भारत में सूर्य मंदिरों की चर्चा होती है तो सबसे पहले ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर का नाम सामने आता है। लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर इतिहास की दृष्टि से उससे कहीं अधिक पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, महोबा का यह मंदिर चंदेल शासक राहिल देव वर्मन ने नौवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बनवाया था।

कई ऐतिहासिक अभिलेख इसके निर्माण काल को लगभग 890 से 910 ईस्वी के बीच बताते हैं। दूसरी ओर कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने 13वीं शताब्दी में करवाया था, जिसे लगभग 1250 ईस्वी का माना जाता है। इसका अर्थ है कि महोबा का सूर्य मंदिर कोणार्क से लगभग 300 से 350 वर्ष पहले अस्तित्व में आ चुका था।

हालाँकि दोनों मंदिरों की वास्तुकला और संरचना अलग-अलग है, लेकिन सूर्य उपासना की परंपरा के संदर्भ में महोबा का मंदिर भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

चंदेल राजाओं की विरासत और सूर्य उपासना का केंद्र

महोबा कभी चंदेल राजाओं की राजधानी हुआ करता था। यही वह राजवंश था जिसने खजुराहो जैसे विश्वविख्यात मंदिर समूहों का निर्माण कराया। चंदेल शासकों की पहचान केवल युद्ध कौशल से नहीं बल्कि स्थापत्य कला, जल संरक्षण और धार्मिक संरचनाओं के निर्माण से भी जुड़ी रही है।

महोबा सूर्य मंदिर (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

राहिल देव वर्मन को चंदेल वंश के प्रमुख शासकों में गिना जाता है। माना जाता है कि उन्होंने सूर्य देव को शक्ति, ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक मानते हुए इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर का निर्माण राहिल सागर के किनारे कराया गया, जिससे यह धार्मिक स्थल होने के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी केंद्र बन गया।

उस दौर में सूर्य पूजा का विशेष महत्व था। कृषि आधारित समाज में सूर्य को जीवनदाता माना जाता था और यही कारण था कि सूर्य देव को समर्पित भव्य मंदिरों का निर्माण कराया जाता था। महोबा का सूर्य मंदिर उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

बिना सीमेंट के बना स्थापत्य का अद्भुत नमूना

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण शैली है। यह विशाल संरचना ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और माना जाता है कि इसके निर्माण में सीमेंट या गारे का उपयोग नहीं किया गया। बड़े-बड़े पत्थरों को इस तरह जोड़ा गया कि एक हजार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मंदिर की मूल संरचना आज खड़ी दिखाई देती है।

यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। ऊँचे शिखर, अलंकृत आधार, पत्थरों पर उकेरी गई सुंदर आकृतियाँ और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती हैं। मंदिर की एक और विशेषता इसकी दिशा और संरचना को लेकर कही जाती है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सूर्योदय की पहली किरण सीधे गर्भगृह तक पहुँचती थी और सूर्य देव की प्रतिमा को प्रकाशित करती थी। यद्यपि इस दावे पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है, लेकिन यह तथ्य मंदिर की लोकप्रियता और रहस्य को और बढ़ा देता है।

आक्रमणों की मार झेलकर भी बची रही पहचान

इतिहास के लंबे सफर में इस मंदिर ने कई उतार-चढ़ाव देखे। माना जाता है कि 1203 ईस्वी के आसपास कुतुबुद्दीन ऐबक की फौज ने धन और बहुमूल्य मूर्तियों की लालसा में इस मंदिर पर हमला किया। मंदिर को क्षति पहुँचाई गई और इसके कई हिस्सों को तोड़ने का प्रयास किया गया।

इसके बावजूद यह संरचना पूरी तरह नष्ट नहीं हो सकी। आज भी मंदिर परिसर और राहिल सागर के आसपास बिखरे हुए पत्थर तथा अवशेष उस दौर की कहानी सुनाते हैं। कई शिलाखंडों पर की गई नक्काशी अब भी स्पष्ट दिखाई देती है और यह बताती है कि अपने मूल स्वरूप में यह मंदिर कितना भव्य रहा होगा।

ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है मंदिर की विशाल संरचना (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

समय के साथ उपेक्षा और प्राकृतिक क्षरण ने भी मंदिर को नुकसान पहुँचाया, लेकिन इसकी मूल पहचान आज भी बरकरार है। यही वजह है कि पुरातत्वविद इसे बुंदेलखंड की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करते हैं।

सूर्य कुंड, रहस्य और धार्मिक आस्था

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। लगभग तीस फीट गहरे इस कुंड के बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका पानी कभी पूरी तरह नहीं सूखता। श्रद्धालु यहाँ स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

सूर्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित सूर्य कुंड (फोटो साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया)

कुंड तक पहुँचने के लिए नीचे उतरती सीढ़ियाँ बनाई गई हैं, जो प्राचीन जल प्रबंधन प्रणाली की झलक भी दिखाती हैं। मंदिर परिसर में काली माता का एक प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिससे यह क्षेत्र केवल सूर्य उपासना तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि एक विस्तृत धार्मिक परिसर का रूप ले लेता है।

बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण की जो परंपरा चंदेल राजाओं ने विकसित की थी, सूर्य कुंड और राहिल सागर उसके महत्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं।

विश्व धरोहर बनने का सपना और भविष्य की संभावनाएँ

आज महोबा का सूर्य मंदिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसका गौरवशाली अतीत और संभावनाओं से भरा भविष्य एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं। स्थानीय समाज, इतिहास प्रेमी और प्रशासन सभी चाहते हैं कि इस धरोहर को वह पहचान मिले जिसकी यह हकदार है।

यदि यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में इसे स्थान मिलता है तो यह न केवल महोबा बल्कि पूरे बुंदेलखंड के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी। इससे पर्यटन बढ़ेगा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और दुनिया को भारतीय स्थापत्य कला के एक ऐसे अध्याय से परिचित होने का अवसर मिलेगा जो अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा है।

कोणार्क सूर्य मंदिर विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है, लेकिन महोबा का सूर्य मंदिर यह याद दिलाता है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित नहीं है। बुंदेलखंड की धरती पर खड़ा यह 1100 साल पुराना सूर्य मंदिर आज भी इतिहास, आस्था और अद्भुत वास्तुकला का जीवंत प्रतीक बनकर समय की गवाही दे रहा है।

संदर्भ के तौर पर कोणार्क सूर्य मंदिर के निर्माण काल (13वीं शताब्दी) और महोबा सूर्य मंदिर के 9वीं-10वीं शताब्दी के होने संबंधी ऐतिहासिक जानकारी विभिन्न स्रोतों में दर्ज है।

‘बेटा बीमार है तो मर जाए, पहले ₹500 दे’: अलीगढ़ में अकबर और उसके बेटों ने दलित परिवार पर बोला हमला, फाड़े महिला के कपड़े; पढ़ें- ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में क्या बोला पीड़ित परिवार

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में खड़ंजा बनाने के लिए ₹500 न देने को लेकर दलित युवक को पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार ने बेरहमी से पीटा। दलित युवक ने बताया कि उनकी पत्नी को घर में घुसकर लाठी-डंडों और लात-घूँसों से मारा गया, जिसमें उनके कपड़े तक फट गए। बचाव में उतरे युवक ने को भी आरोपितों ने बेरहमी से पीटा।

पूरा विवाद हरदुआगंज थाना क्षेत्र के जदौला गाँव का है। पीड़ित दलित युवक आपबीती लेकर थाने पहुँचा। लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने में देरी की, जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) के हस्तक्षेप के बाद SC/ST एक्ट, दंगा, महिला से छेड़छाड़ समेत विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज कराई गई। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद और उसकी बीवी परवीन के अलावा कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

पूरा विवाद हरदुआगंज थाना क्षेत्र के जदौला गाँव का है। पीड़ित दलित युवक आपबीती लेकर थाने पहुँचा। लेकिन पुलिस ने FIR दर्ज करने में देरी की, जिसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) के हस्तक्षेप के बाद SC/ST एक्ट, दंगा, महिला से छेड़छाड़ समेत विभिन्न धाराओं में FIR दर्ज कराई गई। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद और उसकी बीवी परवीन के अलावा कुल 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

इसके तुरंत बाद दूसरे पक्ष ने भी दलित युवक लवकुश, उनकी पत्नी प्रभा, उनके भाई दीपक समेत 11 नामजद और 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई। FIR में उन्होंने मारपीट और धमकी समेत तमाम आरोप लगाए।

ऑपइंडिया के पास दोनों पक्ष की FIR की कॉपी मौजूद हैं। इसके अलावा ऑपइंडिया ने पीड़ित दलित युवक लवकुश से बात भी की।

दलित युवक लवकुश ने क्या कहा?

जदौली गाँव में रहने वाले लवकुश मजदूरी कर अपना घर चलाते हैं। वे दिन का ₹700 कमाते हैं। उनके दो बेटे हैं। इनमें एक 4 साल का है और दूसरा अभी सिर्फ 5-6 महीने का ही है। उनकी पत्नी प्रभा घर पर रहकर अपने बच्चों की देखभाल करती हैं। लवकुश ने बताया कि उनके 4 साल के बेटे को पिछले दिनों टाइफाइड (Typhoid) हो गया था, जिसके चलते वह पिछले 10 दिन से काम पर नहीं गए थे। उनके काम पर न जाने के चलते घर की आर्थिक स्थिति भी खराब चल रही है।

गाँव में खरन्जे को उखाड़ डाला, फिर बनाने को माँगे पैसे

लवकुश ने बताया कि गाँव के प्रधान ने सड़क बनवाई थी। इसके चलते खड़ंजा नीचे चला गया है। यहाँ नाले का पानी भर जाता है, जिसके चलते समस्या होती है। इसके बाद पड़ोस के मुस्लिम परिवार ने पूरे खरन्जे को उखाड़ दिया, जिससे समस्या बढ़ गई।

अब आसपास के लोगों ने पैसा इकट्ठा कर खड़ंजा बनवाने का प्लानिंग की। सबके हिस्से में ₹500-₹500 आए। लवकुश से भी ₹500 माँगे गए। लेकिन उनके बेटे को टाइफाइड होने के चलते उन्होंने कहा कि वह ये पैसे कुछ दिन बाद में दे देंगे। इससे पड़ोस में रहने वाले अकबर की बीवी परवीन और लवकुश की पत्नी प्रभा में कहासुनी हो गई।

₹500 न देने पर लवकुश की पत्नी को घर में घुसकर पीटा

लवकुश ने बताया कि 27 मई 2026 की सुबह 8 बजे परवीन उनके घर में घुस गई और पैसे माँगने लगी। लवकुश की पत्नी प्रभा ने घर की आर्थिक स्थिति और बेटे की बीमारी के बारे में बताया तो परवीन ने कहा- मरा तो नहीं है न तेरा बेटा, मर क्यों नहीं जाता? बेटे के बारे में ऐसा सुन प्रभा को भी गुस्सा आ गया और दोनों की बहस शुरू हो गई। इस बीच परवीन ने अपने बेटों को बुला लिया।

परवीन के बेटों और उनकी बहुओं ने मिलकर प्रभा की बेरहमी से पिटाई की। प्रभा को लाठी-डंडों से पीटा गया, लात-घूँसों से पीटकर जमीन पर पटका गया। प्रभा के कपड़े तक फाड़े गए। बचाव में उतरे लवकुश पर भी डंडों से हमला किया गया। चीख-पुकार सुन आसपास के लोगों ने आकर उन्हें बचाया। इसके बाद आरोपित पक्ष ने धमकी देते हुए कहा- साले चम्हारों आज तो बच गए, दोबारा पकड़ में आए तो जाने से मार देंगे या गाँव से भगा देंगे।

मुस्लिम पक्ष ने छत से ईंट-पत्थर फेंके

इसके बाद भी मुस्लिम पक्ष ने दलित युवक पर प्रताड़ना जारी रखी। 30 मई 2026 को अपनी छत से ईंट-पत्थर फेंके गए। परवीन, उसके बेटे औऱ बहुओं ने मिलकर लवकुश के घर की ओर ईंट-पत्थर से हमला किया। इस घटना का वीडियो भी ऑपइंडिया के पास है, जिसमें दिख रहा है कि छत पर महिलाएँ ईंट इकट्ठा कर रही हैं और पत्थर बरसा रही हैं।

वहीं लवकुश और उसके भाई दीपक को इस हमले में चोटें आई हैं। उनके हाथ-सिर छिल गए हैं। वीडियो में दिख रहा है कि लवकुश बुरी हालत में खुद को बचाने का प्रयास कर रहा है। वहीं मुस्लिम पक्ष के लोगों ने अपने घर को भीतर से बंद कर लिया है। दूसरे ओर आसपास के खड़े गाँववाले तमाशा देख रहे हैं। सूचना पर मौके पर पुलिस भी पहुँची लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।

लवकुश ने मुस्लिम पक्ष के 10 लोगों के खिलाफ कराई FIR

इसके बाद लवकुश ने खुद हरदुआगंज थाने जाकर पुलिस से शिकायत की, लेकिन पुलिस FIR दर्ज करने को तैयार नहीं हुई। लवकुश ने हिंदू संगठन VHP से संपर्क साधा, जिन्होंने पुलिस थाने में उसकी मदद की और FIR दर्ज करवाई। VHP ने बताया कि पीड़ित लवकुश जाटव समाज का है, जिस पर मुस्लिमों ने हमला किया है।

(फोटो साभार: FIR कॉपी)

पुलिस ने लवकुश की शिकायत के अनुसार संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है। FIR में अकबर खान के 4 बेटे मोहम्मद कासिम, नासिर, सलमान, आस मोहम्मद, परवीन, अकबर की बीवी परवीन, अकबर का साला अनीस, आस मोहम्मद की बीवी गुलफसा, असलम पुत्र इकबाल, शेरू पुत्र बादशाह, यामीन पुत्र लालखान के नाम शामिल हैं।

(फोटो साभार: FIR कॉपी)

इन पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम (SC/ST एक्ट) की धारा 3(2)(va), भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 191(2), धारा 333, 76, 351(3), 115(2) के तहत जाति के कारण अपराध, घर में घुसकर मारपीट, महिला के कपड़े उतारने की नीयत से हमला, आपराधिक धमकी, जानबूझकर चोट पहुँचाना जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

मुस्लिम पक्ष ने भी तुरंत कराई FIR

लवकुश के FIR करवाते ही तुरंत मुस्लिम पक्ष ने भी हरदुआगंज थाने पहुँचकर अपनी शिकायत दर्ज करवा दी। पुलिस ने भी मामले में तुरंत FIR दर्ज कर ली। मुस्लिम पक्ष ने शिकायत में बताया कि पड़ोस में रहने वाले लवकुश और उसके भाई दीपक ने लाठी-डंडों से मारपीट की है और घर पर ईंट-पत्थर भी फेंके हैं।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने लवकुश, उसके भाई दीपक, लवकुश की पत्नी प्रभा, दीपक की पत्नी क्रांति, शेरपाल, गुड्डू, सोनू, पिर्मुखी, देवेन्द्र, राजकुमार समेत 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की। इनके खिलाफ BNS की धारा 115(2), 125, 190, 191(2), 191(3), 324(4), 333, 351(2) के तहत जानबूझकर चोट पहुँचाना, दंगा, संपत्ति को नुकसान पहुँचा, घर में घुसकर मारपीट के आरोप लगाए हैं।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर 600KM का इलाका सिक्योरिटी के लिहाज से डार्क जोन, अब मोदी सरकार बना रही फुल-प्रूफ व्यवस्था: जानें पश्चिम बंगाल सरकार दे रही कैसा सहयोग

भारत-बांग्लादेश सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में पश्चिम बंगाल सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने सीमा पर कंटीली तार की बाड़ लगाने और BSF के बुनियादी ढाँचे के विस्तार के लिए जमीन सौंपने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

राज्य सचिवालय नबान्न में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने BSF अधिकारियों की मौजूदगी में इसकी औपचारिक शुरुआत की। फिलहाल 27 किलोमीटर क्षेत्र के लिए जमीन ट्रांसफर की गई है, जिसमें 18 किलोमीटर हिस्से में बाड़ लगाई जाएगी और 9 किलोमीटर क्षेत्र में BSF चौकियाँ तथा अन्य जरूरी ढाँचे विकसित किए जाएँगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय से लंबित सीमा सुरक्षा परियोजनाओं को अब तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत-बांग्लादेश सीमा का करीब 600 किलोमीटर हिस्सा अब भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता और सुरक्षा एजेंसियाँ इसे ‘डार्क जोन’ के रूप में देखती हैं।

1947 की रेडक्लिफ लाइन से शुरू हुई आज की चुनौती

भारत और बांग्लादेश के बीच मौजूद 4096 किलोमीटर लंबी सीमा का इतिहास 1947 के विभाजन से जुड़ा हुआ है। अंग्रेज न्यायविद सर सिरिल रेडक्लिफ ने महज कुछ हफ्तों में भारत और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बीच सीमा तय की थी।

17 अगस्त 1947 को घोषित की गई रेडक्लिफ लाइन ने बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। उस समय सीमांकन के लिए पुराने नक्शों और 1931 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया, जबकि जमीन पर हालात काफी बदल चुके थे।

इस जल्दबाजी में खींची गई सीमा ने गाँवों, खेतों, बाजारों और यहाँ तक कि परिवारों को भी दो देशों में बाँट दिया। नदियों, दलदली क्षेत्रों और बदलती जियोग्राफिकल परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

यही वजह है कि आज भी कई इलाकों में सीमा का प्रबंधन बेहद मुश्किल बना हुआ है। वर्तमान डार्क जोन और सीमा संबंधी कई विवादों की ऐतिहासिक जड़ें इसी रेडक्लिफ लाइन में मौजूद हैं।

क्या है 600 किलोमीटर का डार्क जोन?

भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 4096 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे जटिल अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में से एक मानी जाती है। यह सीमा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिजोरम से होकर गुजरती है। इनमें सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल में है, जिसकी लंबाई करीब 2217 किलोमीटर है।

पश्चिम बंगाल में लगभग 1600 किलोमीटर हिस्से में किसी न किसी रूप में बाड़बंदी हो चुकी है, लेकिन करीब 550 से 600 किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है जहाँ अब भी पूरी तरह बाड़ नहीं लग पाई है। यही हिस्सा सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी जैसे सीमावर्ती जिले इस संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा हैं।

आखिर इसे डार्क जोन क्यों कहा जाता है?

डार्क जोन का मतलब सिर्फ अंधेरा इलाका नहीं बल्कि ऐसे क्षेत्रों को कहा जाता है जहाँ निगरानी करना बेहद कठिन है। कई हिस्सों में नदियाँ, दलदली जमीन, घने जंगल और दूर-दराज के गाँव मौजूद हैं। कुछ स्थानों पर मोबाइल नेटवर्क बहुत कमजोर है, जबकि कई जगह फ्लडलाइट्स और स्थायी सुरक्षा ढाँचे बनाना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो पाया है।

मुर्शिदाबाद और मालदा में गंगा और पद्मा जैसी नदियाँ लगातार अपना रास्ता बदलती रहती हैं। ऐसे में स्थायी बाड़ लगाना मुश्किल हो जाता है। वहीं सुंदरबन के दलदली और मैंग्रोव क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मानसून के दौरान स्थिति और भी जटिल हो जाती है क्योंकि तेज बहाव कई बार पहले से बने ढांचों को नुकसान पहुँचा देता है।

घुसपैठ और तस्करी के लिए क्यों संवेदनशील है यह इलाका?

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा का यह खुला हिस्सा लंबे समय से घुसपैठ और तस्करी की गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होता रहा है। रात के अंधेरे, कमजोर निगरानी और मुश्किल जियोग्राफिकल परिस्थितियों का फायदा उठाकर अवैध तरीके से सीमा पार करने की कोशिशें होती रही हैं।

इन इलाकों से मवेशी तस्करी, नकली भारतीय मुद्रा, नशीले पदार्थों, सोने और अन्य प्रतिबंधित सामानों की तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। नदी वाले क्षेत्रों में नावों के जरिए होने वाली तस्करी को रोकना सुरक्षा बलों के लिए विशेष चुनौती माना जाता है।

इसके अलावा मानव तस्करी भी एक गंभीर समस्या है। कई मामलों में महिलाओं और बच्चों को झाँसा देकर या अवैध नेटवर्क के जरिए सीमा पार ले जाने की कोशिश की जाती है। सुरक्षा एजेंसियाँ यह भी मानती हैं कि ऐसे खुले इलाकों का इस्तेमाल अपराधी और अन्य संदिग्ध तत्व भी कर सकते हैं।

BSF कैसे कर रही है निगरानी?

सीमा सुरक्षा बल ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया है। जहाँ कंटीली तार की बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहाँ स्मार्ट फेंसिंग और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी पर जोर दिया जा रहा है।

सीमा के कई संवेदनशील हिस्सों में थर्मल कैमरे, इंफ्रारेड कैमरे, लेजर तकनीक और अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं। ये उपकरण रात के अंधेरे, घने कोहरे और खराब मौसम में भी संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने में मदद करते हैं।

इसके अलावा ड्रोन के जरिए निगरानी बढ़ाई गई है। सीमा पार से आने वाले संदिग्ध ड्रोनों पर नजर रखने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम भी तैनात किए जा रहे हैं। नदी वाले क्षेत्रों में BSF की विशेष वाटर विंग स्पीड बोट और फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट्स के जरिए गश्त करती है।

भारत की ओर से BSF और बांग्लादेश की ओर से बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं। दोनों देशों के बीच समन्वित सीमा प्रबंधन योजना के तहत नियमित फ्लैग मीटिंग, संयुक्त गश्त और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी किया जाता है।

दशकों बाद भी क्यों नहीं सुलझी समस्या?

आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी सीमा का यह हिस्सा पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सका है। इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण भूमि अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में बाड़ लगाने के लिए किसानों और स्थानीय लोगों की जमीन की जरूरत पड़ती है, जिससे कई बार विवाद पैदा होते हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती जियोग्राफिकल परिस्थितियाँ हैं। सुंदरबन के जंगल, दलदली इलाके और लगातार बदलने वाली नदी धाराएँ स्थायी बाड़बंदी को मुश्किल बना देती हैं। कई बार करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई संरचनाएँ बाढ़ और कटाव की वजह से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

इसके अलावा सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कुछ लोगों की आजीविका अनौपचारिक सीमा पार व्यापार पर भी निर्भर रही है। ऐसे में कई बार स्थानीय स्तर पर भी बाड़बंदी को लेकर विरोध देखने को मिलता है।

सीमा सुरक्षा को नई मजबूती

जानकारों की मानें तो कंटीली तार की बाड़ इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। जिन इलाकों में बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहाँ डिजिटल फेंसिंग को मजबूत करना होगा। AI आधारित कैमरे, ग्राउंड सेंसर, सैटेलाइट निगरानी और स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम भविष्य में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, तेजी से भूमि हस्तांतरण और सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास भी जरूरी माना जा रहा है। स्थानीय लोगों को रोजगार और विकास के अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें तस्करी और अवैध गतिविधियों से दूर रखना भी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।

भारत-बांग्लादेश सीमा का यह 600 किलोमीटर लंबा डार्क जोन लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा की कमजोर कड़ी माना जाता रहा है। अब पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा BSF को जमीन सौंपने की शुरुआत को इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

आने वाले समय में यदि बाड़बंदी, आधुनिक तकनीक और प्रशासनिक सहयोग साथ-साथ आगे बढ़ते हैं तो इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा को काफी हद तक मजबूत किया जा सकता है।