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BJP की 250 सीटें आती तो आंध्र को विशेष दर्जे की शर्त पर ही देते समर्थन: जगन रेड्डी

आंध्रा प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने भाजपा को बहुमत मिलने पर अफ़सोस जताया है। हालाँकि, उन्होंने पीएम मोदी से मिल कर उन्हें शुभकामनाएँ दी और अपने शपथ ग्रहण समारोह में आने का निमंत्रण भी दिया। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू को हरा कर मुख्यमंत्री बनने के लिए तैयार जगन मोहन रेड्डी वाईएसआर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष हैं। उन्होंने अपनी पार्टी का नामकरण अपने पिता के नाम पर किया था। प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के बाद रेड्डी ने कहा कि अगर भाजपा को 250 सीटें मिली होती तो वह आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने सम्बन्धी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए बिना समर्थन नहीं देते।

जगन रेड्डी ने कहा कि अगर भाजपा को 205 से कम सीटें आती तो उन्हें केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहना होता। जगन ने कहा कि अब भाजपा को अन्य दलों की ज़रूरत नहीं है, इसीलिए उनसे जो हो सकता था वह कर रहे हैं और उन्होंने पीएम से मिल कर आंध्र की स्थिति से उन्हें अवगत कराया।

जगन मोहन रेड्डी ने कहा कि वह प्रधानमन्त्री से पहली बार मिल रहे हैं लेकिन अगले पाँच वर्षों में वह पीएम से 30, 40 या 50 बार भी मिल सकते हैं, ताकि वह आंध्र को विशेष दर्जा दिए जाने की माँग से उन्हें लगातार अवगत कराते रहें। रेड्डी ने कहा कि वह पूरे कार्यकाल के दौरान पीएम को ये बात याद दिलाते रहेंगे। बता दें कि 175 सदस्यीय विधानसभा में 151 सीटें लाकर वाईएसआर कॉन्ग्रेस ने चंद्रबाबू नायडू की पार्टी का लगभग सूपड़ा साफ़ कर दिया है।

चंद्रबाबू नायडू विपक्षी दलों की गोलबंदी के लिए लगातार दौरे कर रहे थे और अहम विपक्षी नेताओं से मुकलाकत कर रहे थे। अब उनकी सीएम की कुर्सी भी नहीं बची है। जगन मोहन रेड्डी जब आज रविवार (मई 26, 2019) को पीएम से मिलने पहुँचे, तब दोनों नेताओं के बीच काफ़ी गर्मजोशी देखने को मिली। पीएम ने उन्हें गले लगा कर शुभकामना दी। वाईएसआर कॉन्ग्रेस के अन्य नेताओं के साथ दिल्ली पहुँचे जगन ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से भी मुलाक़ात की।

विजयवाड़ा में हुई बैठक में सर्वसम्मति से पार्टी के विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद जगन मोहन ने राज्यपाल से मिल कर सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया। नवंबर 2010 में कॉन्ग्रेस से नाराज़गी के कारण गठित पार्टी को मुख्य विपक्षी दल से लेकर सत्तारूढ़ दल तक के सफर में जगन ने आंध्र का गहन दौरा किया और कई जनसभाएँ सम्बोधित की।

लिबरल गिरोह, जले पर स्नेहलेप लगाओ, मोदी के भाषण पर पूर्वग्रहों का ज़हर मत डालो

कल मोदी ने स्पीच दी। ऐसा भाषण जिसमें आप विरोधी होकर भी ख़ामियाँ नहीं निकाल सकते। ज्ञानी आदमी तो ज्ञानी होता है। ज्ञानी आदमी चुप रहता है। उसे पता है कि किस स्पीच की क्या अहमियत है। उसे पता होता है कि संदर्भ, काल और परिस्थिति क्या है। उसे पता होता है कि सत्य क्या है, असत्य क्या है। इसलिए वो सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों ही स्थिति में शांत रहना पसंद करता है। ज्ञानी व्यक्ति को पता होता है कि दोनों ही विपरीत परिस्थितियों में, एक सी स्थिति बना कर रहना ही सर्वोपयुक्त अवस्था है। वो जब बोलता है तब भी उसकी बातों में तार्किकता होती है, सिर्फ भावनाएँ नहीं जो कि परिस्थितिजन्य होती हैं, और कई बार तथ्यों से परे।

इसके विपरीत, जो स्वयं को ज्ञानी समझते हैं, वो लोग, जो सामने है, उसके परे जाकर, अपने पूर्वग्रहों के साथ, अपने तथ्य और अपने आँकड़ों के साथ संवाद करते हैं, जबकि उनकी शुरुआत किसी दूसरे व्यक्ति को विषय बना कर होती है। वो शुरु करेंगे कि ‘मोदी ने स्पीच तो बहुत अच्छी दी’ और एक ही पैराग्राफ़ तक उतरते हुए वो अपना प्रोपेगेंडा, फ़रेब और प्रेज्यूडिस (पूर्वग्रह) का वमन कर देंगे।

वो तुरंत ही उसी भविष्य में चले जाएँगे जिसे उन्होंने 2014 की मई में देख कर कहा था कि अब तो सड़कों पर हिन्दू नंगी तलवारें लिए दौड़ेंगे, समुदाय विशेष को तो काट दिया जाएगा, गली-गली में दंगे होंगे, मस्जिदों का तोड़ दिया जाएगा, समुदाय विशेष की बस्तियों पर बम गिराए जाएँगे…

याद कीजिए, क्या ऐसी बातें लिबरलों के गिरोह और इस देश के पढ़े लिखे लोगों ने नहीं उठाई थीं? याद कीजिए कि पाँच साल क्या इस गिरोह के लोगों और फेसबुकिया समर्थकों ने प्रपंच के सच होने के इंतजार में जीभों नहीं लपलपाई? क्या इन रक्तपिपासु बुद्धिजीवियों की आँखों में बिल्लौरी चमक नहीं आई जब कोई समुदाय विशेष का इंसान किसी भीड़ का शिकार बना?

क्या ये लोग उस हत्या या सामाजिक अपराध पर संवेदना दिखा रहे थे? जी नहीं! ये अपने भीतर की कुंठा को सेलिब्रेट कर रहे थे। ये चाहते थे, और आज भी चाहते हैं कि कोई मजहब विशेष का व्यक्ति मरे और ये सरकार को घेरें। ये चाहते हैं कि नजीब अहमद कहीं से कटे सर के साथ, किसी जंगल में किसी को मिले और उसकी जेब में एक पत्र हो कि उसे भाजपा वालों ने मार दिया। फिर नजीब का गायब होना, मुद्दा नहीं रह जाएगा। मुद्दा वो पत्र हो जाएगा जिसकी ऑथेन्टिसिटी संदिग्ध होगी लेकिन माहौल बना कर कोई चुनाव प्रभावित कर दिया जाएगा।

आपको लगता है कि इन लिबरलों को, इन वामपंथियों को, कॉन्ग्रेसियों को, पत्रकारों के समुदाय विशेष को, इन सारे तरह के दोगलों को कोई फ़र्क़ पड़ता है कि अखलाक़ जैसे व्यक्ति की हत्या कर दी गई या कोई जुनैद सीट के झगड़े में मारा गया, या किसी वेमुला ने आत्महत्या कर ली? आप ग़लतफ़हमी में है। ये सारी मौतें, आपको इसलिए याद नहीं कि आप संवेदनशील हैं, ये सारी मौतें आपको सिर्फ इसलिए याद हैं कि इन्हें जलाने-दफ़नाने के बाद भी लेखों, भाषणों, एंकरों के शुरुआती एकालापों में इन्हें कुत्सित विचारों के फॉर्मेलिन लेप में, ठंढी उदासीन संवेदना के बर्फ़ की सिल्लियों पर इन्हें ज़िंदा रखा गया।

आप इन चेहरों को पहचान लीजिए। ये शब्दों की समुराय तलवार भाँजते हुए छद्म-बुद्धिजीवी चाहते हैं कि रक्त बहे और उसे रंगा जाए। ये चाहते हैं कि समाज में कोई हिन्दू भीड़ किसी समुदाय विशेष के व्यक्ति की हत्या करे। उन्हें बस हेडलाइन ही चाहिए, भीतर में ज़मीन का झगड़ा हो, या बेटी को छेड़ने की बात, उससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। उसे शब्दों से ये ऐसे रच देंगे कि वहाँ लाशों का रंग निखर जाएगा और भीड़ के सर पर एक विचारधारा की बात पटक दी जाएगी।

ये हुआ है, और ये आगे भी होगा। जब वेटिकन और मक्का आज तक भारत को ईसाई और इस्लामी बनाने के लिए आक्रमण से लेकर उपनिवेश बनाने तक, और वैचारिक से लेकर राजनैतिक तक, हर तरह के तंत्र का प्रयोग कर रहा है, तो ऐसे लोग गायब कैसे हो जाएँगे। इसलिए, ये तो भूल कर भी मत सोचिए कि इन वैचारिक दोगलों की जमात साँस लेने के लिए भी रुकेगी। इनका ज़हर और तेज होगा।

मोदी के भाषण के बाद जिस तरह की लाइन इन लोगों ने ली है, उससे एक दुर्गंध आप सूँघ सकते हैं। इनकी बदबू आप तक न चाहते हुए भी पहुँच जाएगी। ये इतने नीच लोग हैं, ये इतने गिरे हुए इन्सान हैं, कि पाँच सालों के कार्यकाल के बाद, पहले से भी अधिक बहुमत, अधिक वोट शेयर पाने वाली सरकार को, अपनी अभिजात्यता के घमंड से आँकने में कसर नहीं छोड़ रहे।

इन्हें लगता है कि देश के कुछ लोगों के वोट का मूल्य बाक़ियों के वोट को मूल्य से करोड़ गुणा ज्यादा होना चाहिए। ये चाहते हैं कि इनके जैसे लोगों के पास सत्ता को चुनने की शक्ति होनी चाहिए। इसीलिए ये सड़ाँध मारते छद्मबुद्धिजीवी यह शेयर करते पाए जाते हैं कि लोकतंत्र को जनता के हाथों में छोड़ देना गलत है क्योंकि ये बहुत ज़्यादा मूल्यवान है। इस पंक्ति में घमंड है। इस पंक्ति में असफल लोगों के लिए, हारी हुई विचारधाराओं के लिए, और सामान्य मानव को लेकर एक घृणा है कि वो ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, अतः उनके विचारों की अहमियत, उन 25 करोड़ मतदाताओं से ज्यादा है जिसने मोदी को वोट दिया है।

जबकि वो लोग यह बात भूल जाते हैं कि उन 25 करोड़ में, 25 लाख लोग ऐसे होंगे जिनकी मानसिक अवस्था और अकादमिक क्वालिफ़िकेशन इन गिरोह के सरगनाओं से बेहतर होगी। यही कारण है कि ये अपनी विचारधारा, या जिसका भी ये समर्थन करते हैं, उसकी बुरी हार के बाद भी, किसी प्रधानमंत्री के आशावादी भाषण को अपनी घृणा के चश्मे से देखने में संकोच नहीं करते।

इन्होंने मोदी के भाषण के बाद, बिना किसी तथ्य के, सिर्फ अपनी फैंटसी और फेटिश को आधार बना कर यह लिख दिया कि भाषण तो ठीक है लेकिन अल्पसंख्यकों के मन में भय है उस पर मोदी को काम करना होगा। जबकि, यह भय पूरी तरह से, मीडिया का बनाया हुआ एक वाहियात-सा ग़ुब्बारा है जहाँ समुदाय विशेष को हर रात, स्टूडियो से, डराने की कोशिश की गई है। आपसी रंजिश की घटनाओं को धर्म से जोड़ा गया, मजहब विशेष द्वारा किए गए अपराधों पर चुप्पी साध ली गई, बंगाल के दंगों की मीडिया कवरेज यह कह कर नहीं हुई कि मीडिया को हवा नहीं देनी चाहिए वरना दूसरे इलाकों में भी भय फैल जाएगा…

लेकिन क्या बात इतनी सीधी है? क्या देश में अल्पसंख्यक सच में डरा हुआ है? किस आधार पर? क्योंकि कहीं किसी गौतस्कर को दस लोगों ने घेर कर पीटा? फिर हिंदुओं को भी तो यह कहने का अधिकार है कि वो समुदाय विशेष से डर कर जीते हैं कि कैराना से, कश्मीर से, बंगाल के कई गाँवों से उन्हें घेर कर निकाल रहे हैं। उन्हें भी तो हर ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के साथ बम धमाके करने वाले मज़हब के लोगों से डरना चाहिए। उन्हें भी तो यह हक़ मिले कि वो यह कह सके कि तुम तथाकथित गौरक्षकों द्वारा की गई भीड़ हत्याओं के सही आँकड़े रखो, और हम हर आतंकी घटना के आँकड़े रखते हैं, फिर तय करेंगे कि डर कौन फैला रहा है।

वहाँ आप भटके हुए नौजवान और पता नहीं कौन-कौन से मासूम तर्क ले आएँगे। आपसे आज़म खान जैसे बेहूदा लोगों की निंदा तक नहीं हो पाती। आपसे हाजी अली के ट्रस्टी की निंदा तो हो नहीं पाती। आप तो मौन रहकर मौलवी द्वारा किए जा रहे मजहबी बलात्कारों को समर्थन देते हैं। आप तो उस समय बैलेंस बनाने लगते हैं कि हिन्दुओं में भी कुरीतियाँ हैं! क्या हिन्दुओं की कुरीतियाँ ख़त्म होने से मौलवी निकाह हलाला के नाम पर करने वाले बलात्कार बंद कर देगा? क्या उसके ये मजहबी कानून हिन्दुओं के कारण हैं या कारण कुछ और है?

आपकी संवेदना आपके अल्पज्ञान से उपजती है। आपकी संवेदना आपकी विचारधारा के सापेक्ष चलती है। आप बहुत ही घटिया क़िस्म के धूर्त और आवारा लोग हैं जिन्हें किसी की मृत्यु से नहीं, उसके ख़ास मजहब से होने और मरने से मजा आता है। आपको लेख के लिए एक विषय मिल जाता है। इसलिए आपको मोदी की स्पीच में सकारात्मक बातों से ज्यादा इस बात पर नकली चिंता हो जाती है कि क्या मायनोरिटी सुरक्षित महसूस करेगी?

जबकि आप ये सारी बातें महज़ कल्पनाशीलता से कहते हैं। आपके पास कोई तथ्य नहीं है जो साबित कर सके कि पिछले पाँच साल में कितने देंगे हुए जो भाजपा शासित प्रदेशों में हुए, और उनकी संख्या ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेशों से ज्यादा है। आप यह साबित नहीं कर पाएँगे कि मोदी की सरकार बनने के बाद मनमोहन की सरकार या कॉन्ग्रेस की किसी भी सरकार से ज़्यादा बड़े पैमाने के दंगे हुए हैं। छोटे दंगों की गिनती में भी आप हार जाएँगे। इसीलिए, आप घूम फिर कर गौरक्षकों पर आ जाते हैं, जैसे आप कुछ साबित नहीं कर पाए तो राफेल पर आ गए थे।

गौरक्षकों की घटनाओं की संख्या पता कीजिए, कितने मामलों में केस दर्ज नहीं हुआ, यह पता कीजिए और यह भी पता कीजिए कि कितनी बार गौतस्करों ने पुलिस पर गाड़ी चढ़ा दी। यह भी पता कीजिए कि गायों को चोरी से क्यों काटा जा रहा है। आपको बहुत बातें पता करने की ज़रूरत है, लेकिन आप नहीं करेंगे क्योंकि आपको लगता है कि आप लिख देंगे, और लोग मान लेंगे।

यही दंभ आपकी विचारधारा और टट्टी लेखों को अप्रासंगिक बन चुका है। आपको नहीं लगता कि आपने पाँच साल जो विषवमन किया है, जो ज़हर समाज में घोला है, जिस आग को हवा देते रहे, उसे लोगों ने नकार दिया? आपको लगता है कि दूसरे मजहब की महिलाओं ने मोदी को वोट नहीं दिया होगा? आपको लगता है कि बनारस में मोदी की जीत का जश्न मनाते दूसरे समुदाय के लोग टिकटॉक का विडियो बना रहे थे?

आपकी क़िस्मत बहुत अच्छी है कि इस देश का प्रधानमंत्री मोदी है जिसके कार्यकाल में किसी अख़बार पर प्रतिबंध नहीं लगा, किसी फिल्म का प्रदर्शन नहीं रुका, किसी दुर्गा के कार्टूनों के कारण उसे सजा नहीं हुई। आप स्वतंत्र हैं लिखने को और आप पर कोई हमले नहीं कर रहा। जिस सहजता से आपके तारणहार पत्रकार यह लिख देते हैं कि सरकार आवाज़ों को दबा रही है, वो किसी और कार्यकाल में नहीं दिखा। आप अगर यह लिख और बोल पा रहे हैं कि अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं, इसका यही मतलब है कि इतनी आज़ादी है कि सरकार के खिलाफ आप पाँच साल पत्रकारिता के नाम पर कैम्पेनिंग कर सकते हैं।

इसलिए, घृणा फैलाना बंद कीजिए। अगर ज्योतिषी नहीं हैं तो फिर चुप रहना सीखिए क्योंकि मुँह खोलने पर आप विष्ठा ही कर रहे हैं। कुछ ढंग का नहीं हो पा रहा तो मोदी ने जो कहा है उसी को शब्दशः लिखिए। विश्लेषण की कोशिश मत कीजिए क्योंकि उसमें आपका ज़हर घुलना तय है। अगर आप भीतर से जानते हैं कि आप ज्ञानी बनने की कोशिश कर रहे हैं, तो ठहर जाइए। ज्ञानी व्यक्ति स्थिर होता है, वो ज़हर की खुली पुड़िया हवा में खोले नहीं चलता।

राजीव कुमार के खिलाफ CBI ने जारी किया लुकआउट नोटिस, नहीं छोड़ सकते देश

सीबीआई ने शारदा चिट फंड घोटाले में राजीव कुमार पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। एजेंसी ने उनके खिलाफ एक साल की वैधता वाला लुकआउट नोटिस जारी किया है, जिसके बाद राजीव कुमार हवाई मार्ग से देश छोड़कर नहीं जा सकते, और हर एयरपोर्ट पर उनके देखे जाने की सूचना देनी होगी।

1989 बैच के पुलिस अधिकारी कुमार ₹2,500 करोड़ के घोटाले की जाँच की पहली टीम, पश्चिम बंगाल पुलिस की एसआईटी के अध्यक्ष थे। बाद में सीबीआई ने मामले की जाँच अपने हाथ में ले ली थी और पाया था कि राजीव कुमार ने अहम सबूतों वाले और मामले के संदिग्धों से जब्त कई लैपटॉप और फ़ोन अपनी हिरासत से रिलीज़ कर दिए थे। कुमार से पूछताछ करने गई सीबीआई टीम के कई लोगों को भी इस साल की शुरूआत में पश्चिम बंगाल की पुलिस ने हिरासत में ले लिया था (उस समय राजीव कुमार कमिश्नर के पद पर कायम थे)। इसको लेकर लोकसभा निर्वाचन के ठीक पहले केंद्र और राज्य सरकार के बीच गंभीर टकराव के आसार बन गए थे।

सहयोग नहीं कर रहे कुमार, सॉलिसिटर जनरल का आरोप

सीबीआई की तरफ से सर्वोच्च न्यायालय में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि राजीव कुमार सरकार के साथ सहयोग नहीं कर रहे हैं। वह न केवल रौब झाड़ रहे हैं बल्कि सवालों को भी टालने और बात को घुमाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें 24 मई यानि (बीते हुए) कल तक गिरफ़्तारी से छूट मिली हुई थी। उन्होंने जब सुप्रीम कोर्ट से छूट की मियाद आगे बढ़ाने की गुज़ारिश की थी तो उन्हें अदालत ने इसके लिए कोलकाता उच्च न्यायालय जाने के लिए कह दिया था। पिछले महीने ही शीर्ष अदालत ने सीबीआई से भी अपने आरोपों के पक्ष में सबूत पेश करने के लिए कहा था ताकि सुप्रीम कोर्ट को यह तसल्ली हो सके कि राजीव कुमार की गिरफ्तारी राजनीतिक कारणों से नहीं हो रही।

क्या है मामला  

सारधा घोटाले में सीबीआई के अनुसार सारधा समूह की कंपनियों ने ऊँचे रिटर्न का लालच देकर लाखों निवेशकों के पैसे ऐंठ लिए थे। मामले की सीबीआई जाँच का आदेश सुप्रीम कोर्ट से मिलने के बाद जब एजेंसी ने पड़ताल शुरू की तो पाया कि घोटाले को अंजाम देने के लिए स्कीम ऑपरेटरों की कथित तौर पर नेताओं और पुलिस विभाग में भी साथ-गाँठ थी। सारधा के संस्थापक सुदीप्तो सेन ने भी सीबीआई को 2013 में लिखे गए इकबालिया खत में पत्रकारों, नेताओं, पुलिस वालों आदि को रिश्वत देने के बात कबूली थी

राजीव कुमार घोटाले की जाँच राज्य पुलिस के हाथ रहते एसआईटी के मुखिया थे। बाद में उन्हें 2016 में कोलकाता पुलिस का प्रमुख बना दिया गया था। उन पर आरोप है कि सीबीआई को बरामद कॉल रिकॉर्डिंग सौंपने से पहले उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण अंश मिटा दिए थे। इसके अलावा उन पर सुदीप्तो सेन का फोन उसे लौटा देने का भी आरोप है

चार्ज लेने दिल्ली भी नहीं पहुँचे राजीव कुमार   

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल सीआईडी के एडीजी पद से हटाए गए राजीव कुमार को दिल्ली में गृह मंत्रालय में तैनाती मिली थी। वहाँ भी वह चार्ज लेने नहीं पहुँचे थे और यह मामला चर्चा में आ गया था। बाद में सफाई आई कि कुछ निजी कारणों के चलते वह चार्ज नहीं ले पाए

एशिया की सबसे बड़ी ईसाई कैथोलिक बिशप समिति ने मोदी की जीत को गले लगाया

जहाँ एक तरफ उत्तर-पूर्व और केरल के चर्चों के पादरी लगातार भाजपा व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट न देने की बात कर रहे थे वहीं एशिया की सबसे बड़ी कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ने पीएम मोदी को उनकी ऐतिहासिक जीत के लिए बधाई दी है। कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) ने प्रधानमंत्री को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि वे समावेशी और शांतिमय भारत के लिए नई सरकार के साथ मिल कर काम करने को तैयार हैं। कॉन्फ्रेंस ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी बधाई दी है। कॉन्फ्रेंस ने ऐसे नए भारत के निर्माण की बात कही, जहाँ शांति और समृद्धि लगातार बढ़ती रहे।

कॉन्फ्रेंस ने कहा कि वह ऐसे नए भारत के लिए आशावान है और इसके लिए प्रार्थना भी करता है। बिशप कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष ओसवाल्ड कार्डिनल ग्रेसियस ने कहा, “आपको जिन महान जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जनता ने चुना है, उसे पूरा करने के लिए भगवान आपको आवश्यक शक्ति, बुद्धिमत्ता और स्वास्थ्य प्रदान करें। इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ।” मोदी को बधाई देते हुए कैथोलिक चर्च ने एक पत्र भी लिखा है। इस पत्र में लिखा गया है कि नए भारत के नज़रिए पर काम करने के लिए चर्च इच्छुक है। ये संस्था 19 करोड़ 90 लाख कैथोलिक ईसाईयों का प्रतिनिधित्व करती है।

चर्च ने लिखा कि नए भारत में युवाओं को आशा और ऊर्जा मिलेगी, महिलाओं का (ख़ासकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली) सशक्तिकरण होगा और किसानों के लिए लम्बे समय तक के लिए प्रभावकारी अवसर पैदा किए जाएँगे। चर्च ने कहा कि बिना किसी को पीछे छोड़े हुए भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी। चर्च ने कहा कि जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्थिर एवं प्रभवशाली सरकार चलाने के लिए स्पष्ट बहुमत दिया है और समावेशी भारत की दिशा में उनके द्वारा किए जाने वाले प्रयासों की सफलता के लिए प्रार्थनाएँ की जाएँगी।

बता दें कि इसी बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने मार्च 2019 में प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में मोदी सरकार की आलोचना करते हुए लिखा था कि धार्मिक मामलों में मीडिया की लापरवाही, भोजन की चॉइस को लेकर हुए कई विवाद और सांस्कृतिक भिन्नता ने सरकार की विश्वसनीयता को काफी प्रभावित किया है और अल्पसंख्यकों को असुरक्षित महसूस कराया है। संस्था ने उस समय पीएम को भेजे पत्र में अल्पसंख्यकों को लेकर चिंता जताते हुए उन्हें देश में सुरक्षित महसूस कराने की सलाह दी थी।

इस पत्र में सरकार को सभी धर्मों के त्योहारों का सम्मान करते हुए उनमें भाग लेने की सलाह दी गई थी। मार्च में पीएम को भेजे पत्र में आगे लिखा गया था कि यूजीसी, सीबीएसई, एनसीईआरटी, आईआईटी, आईआईएम, सीबीआई, ईडी और न्यायपालिका जैसे राष्ट्रीय संस्थानों और स्वायत्त निकायों को अवरोध के बिना कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए और उन्हें दबाया या प्रतिस्थापित नहीं किया जाना चाहिए। बता दें कि विपक्ष द्वारा भी कमोबेश चुनाव में इन्हीं मामलों को मुद्दा बनाया गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज करते हुए पिछली बार से भी अच्छा प्रदर्शन किया है। पिछले 40 वर्षों में ऐसा पहली बार हुई है जब कोई सरकार लगातार दूसरी बार बहुमत के साथ चुन कर सत्ता में आए। ताज़ा लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की बुरी हार हुई है और पार्टी में घमासान मचा हुआ है।

कॉन्ग्रेस नेताओं के पुत्रमोह ने डुबाई पार्टी की लुटिया: राहुल गाँधी जमकर बरसे

लोकसभा चुनाव में देश भर में कॉन्ग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में घमासान मचा हुआ है। चुनाव परिणामों को लेकर शनिवार को दिल्ली में हुई कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश की। हालाँकि उनके इस्तीफे को नामंजूर कर दिया गया।

बैठक में राहुल काफी गुस्से में नजर आए। उन्होंने कई वरिष्ठ नेताओं पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी हित से ऊपर अपने बेटों का हित रखा। उन्होंने उन पर अपने बेटों को टिकट दिलाने के लिए जोर डालने का आरोप लगाया। राहुल गाँधी ने कहा कि जिन राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार है वहाँ भी पार्टी का खराब प्रदर्शन रहा। वहाँ के पार्टी नेता भी कॉन्ग्रेस प्रत्याशी को जीत नहीं दिला सके।

जानकारी के मुताबिक,चुनाव में हार की समीक्षा करने के लिए बुलाई गई बैठक में राहुल गाँधी नेताओं के पुत्रमोह को लेकर जमकर भड़के। इस दौरान राहुल के निशाने पर मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे। राहुल ने कहा कि इन वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने अपने बेटों को पार्टी हित से ऊपर रखकर उन्हें टिकट देने का जोर लगाया, जबकि वो इस पक्ष में नहीं थे।

दरअसल, इस बैठक में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी बात रखते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस को स्थानीय नेताओं को मजबूत बनाना चाहिए। जिसके बाद राहुल गाँधी ने इन नेताओं को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बहुत ही खराब प्रदर्शन किया है, जबकि कुछ महीने पहले ही वहाँ पर पार्टी की जीत हुई है और कॉन्ग्रेस की सरकार बनी है। राहुल ने कहा कि इन राज्यों के नेता राफेल और चौकीदार चोर है जेसे अहम मुद्दों को लोगों के बीच ले जाने में नाकाम रहे, जिसकी वजह से कॉन्ग्रेस का प्लान फेल हो गया।

J&K में BJP को मिला अब तक का सर्वाधिक वोट शेयर: राज्य भाजपा ने कहा 370 हटाओ

लोकसभा चुनाव में भाजपा की जबर्दस्त जीत के बाद जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की माँग तेज़ी से जोर पकड़ने लगी है। राज्य के भाजपा संगठन का कहना है कि यहाँ की जनता ने राज्य से अनुच्छेद 370 को खत्म करने के लिए ही पीएम मोदी के पक्ष में वोट किया है तो अब समय आ गया है कि इस दिशा में कदम उठाते हुए अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेष दर्जे को समाप्त करने की प्रक्रिया पर अंतिम निर्णय लिया जाए। दरअसल, भाजपा ने अपनी चुनावी घोषणापत्र में वादा किया था केंद्र में वापस सरकार आने पर वो जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म कर देगी।

गौरतलब है कि, राज्य में भाजपा की जीत के बाद पूर्व सीएम और श्रीनगर के सांसद फारूक अब्दुल्ला ने शुक्रवार (मई 24, 2019) को पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि 2019 के चुनाव में भले ही भाजपा को बड़ी जीत है, मगर वो राज्य से विशेष दर्जे को खत्म नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि वो चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों ना हो जाएँ, लेकिन राज्य से इसे नहीं हटाया जा सकता। अब्दुल्ला के इस बयान के बाद राज्य के भाजपा संगठन ने इसे हटाने की माँग तेज कर दी है।

बता दें कि जम्मू कश्मीर में भाजपा ने अपना सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। भाजपा ने न केवल 46.39% मत प्राप्त किया बल्कि 27 विधानसभा सीटों पर भी उसका मत प्रतिशत सर्वाधिक रहा है। यह 2014 के निर्वाचन में पाए 32% मतों से 12% अधिक है।

राज्यमंत्री रहे डॉ. जितेंद्र सिंह ऊधमपुर में विजयी हुए हैं और उन्होंने राज्य के भूतपूर्व शाही परिवार के राजकुमार विक्रमादित्य सिंह को हराया है। साढ़े तीन लाख वोटों से अधिक की उनकी जीत राज्य में किसी भी प्रत्याशी की जीत से बड़ी है। पार्टी के जुगल किशोर ने जम्मू में 58.02% मतों के साथ जीत दर्ज की है, और लद्दाख से जामयांग त्सेरिंग नामग्याल लगभग 34% मतों के साथ विजयी हुए हैं।

फारूख अब्दुल्ला के बयान पर भाजपा की राज्य इकाई के प्रवक्ता ब्रिगेडियर (सेवानिवृत) अनिल गुप्ता ने पलटवार करते हुए कहा कि अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व के पास अनुच्छेद 35ए और 370 को लेकर बड़े-बड़े दावे करने के लिए जम्मू और लद्दाख का जनादेश नहीं है क्योंकि उन्हें जम्मू और लद्दाख की जनता का वोट नहीं मिला है। उनके पास सिर्फ घाटी की सीटें हैं। इसके साथ ही अनिल गुप्ता ने अब्दुल्ला को निशाने पर लेते हुए कहा कि ये घाटी में शांति की माँग तो करते हैं, मगर साथ ही इनकी पार्टी आफस्पा हटाने और जमात-ए-इस्लामी पर बैन हटाने की भी माँग रखती है। अब आतंक के अंत और उसके नेटवर्क को समाप्त किए बिना राज्य में शांति की स्थापना कैसे हो सकती है, ये तो अब्दुल्ला ही बता सकते हैं। 

AAP की लड़ाई WhatsApp से Twitter पर आई, अलका ने माँगा केजरीवाल का इस्तीफा

आम आदमी पार्टी के व्हाट्सएप ग्रुप से निकाले जाने के बाद से अलका लांबा ट्विटर पर पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी हैं। चाँदनी चौक से आप विधायक ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर पार्टी और अरविंद केजरीवाल पर हमला बोला। अलका लांबा ने एक ट्वीट करते हुए लिखा कि वो भले ही पार्टी के भीतर नहीं हैं, लेकिन एक शुभचिंतक के तौर पर वो बाहर से पार्टी की भलाई के लिए सुझाव देती रहेंगी। उसे मानना या ना मानना उनकी मर्जी होगी। उन्होंने कहा कि अगर दिल्ली में चुनाव जीतना है, तो अरविंद जी को दिल्ली पर फोकस करना चाहिए और संविधान के मुताबिक पार्टी के संयोजक का पद संजय सिंह जी को सौंप देना चाहिए, क्योंकि उनके पास संगठन का अनुभव भी है। इसके साथ ही अलका ने सवाल भी उठाया कि क्या चुनाव में पार्टी की हार के लिए केजरीवाल को इस्तीफा नहीं देना चाहिए?

अलका लांबा ने कहा कि शनिवार (मई 25, 2019) को अरविंद केजरीवाल ने विधायकों के व्हाट्सएप ग्रुप पर एक मैसेज किया कि हार के बाद अब सभी विधायकों को दिल्लीवालों के बीच जाकर माफी माँगनी चाहिए। लोगों से एक मौका देने की अपील करनी चाहिए। अलका का कहना कि इस दौरान उन्होंने पूछा कि इस चुनाव में उनसे गलती क्या हुई है, इस पर भी चर्चा हो जानी चाहिए, जिससे दोबारा से ऐसी कोई गलती न हो। जिसके बाद उन्हें ग्रुप से हटा दिया गया।

अलका यहीं पर नहीं रुकी, उन्होंने तो व्हाट्सएप ग्रुप कहा कि बात समस्याओं की नहीं, बल्कि सभाओं की हो रही है और साथ ही उन्होंने आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता और ग्रेटर कैलाश से विधायक सौरभ भारद्वाज को मोहरा और चमचा तक कह दिया।

इसके साथ ही अलका ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, “2013 में आप के साथ शुरू हुआ मेरा सफ़र 2020 में समाप्त हो जायेगा। मेरी शुभकामनाएंँ पार्टी के समर्पित क्रांतिकारी जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ हमेशा रहेंगी, आशा करती हूँ आप दिल्ली में एक मजबूत विकल्प बने रहेगें। आप के साथ पिछले 6 साल यादगार रहगें।आप से बहुत कुछ सीखने को मिला।”

गौरतलब है कि अलका लांबा को शनिवार (मई 25, 2019) को आम आदमी पार्टी के व्हाट्सऐप ग्रुप से निकाल दिया गया। इस ग्रुप में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के अलावा सीएम अरविंद केजरीवाल भी हैं। विधायक अलका लांबा ने आरोप लगाया है कि ओडिशा के सीएम को जीत की बधाई देने की वजह से उन्हें व्हाट्सऐप ग्रुप से हटा दिया गया। जिसके बाद से अलका लगातार ट्वीट करके आप को निशाने पर ले रही हैं और साथ ही नसीहतें भी दे रही है और अब तो उन्होंने सीएम केजरीवाल का इस्तीफा ही माँग लिया।

चुनाव हारने में राहुल गाँधी की कोई गलती नहीं, मैं दूँगा इस्तीफा: अशोक चव्हाण

लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी में इस्तीफा का दौर जारी है। शनिवार (मई 25, 2019) को खुद पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश की थी। हालाँकि उनके इस्तीफे को कार्यकारिणी समिति द्वारा नामंजूर कर दिया गया। इसके साथ ही कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं ने इस्तीफे की पेशकश की है और अब महाराष्ट्र के प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने राहुल गाँधी को अपना इस्तीफा भेज दिया है।

चव्हाण का कहना है कि उन्होंने राहुल गाँधी को इस्तीफा भेज दिया है। अब इसे स्वीकार करना या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि राहुल चाहें तो प्रदेश संगठन में बदलाव कर सकते हैं। वो इसके लिए उन्हें (राहुल) पूरी तरह से अधिकृत करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने जल्द ही राहुल गाँधी से मिलने की भी बात कही। इससे पहले उन्होंने शनिवार (मई 25, 2019) को ट्वीट करते हुए कहा था कि चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार एक सामूहिक जिम्मेदारी है, अकेले पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की नहीं। अशोक चव्हाण के नेतृत्व में राज्य का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में कॉन्ग्रेस में सिर्फ 2 सीटें मिली थी, तो वहीं, इस बार के चुनाव में महज 1 सीट से ही संतोष करना पड़ा। अशोक चव्हाण खुद अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।

गौरतलब है कि, इससे पहले यूपी, कर्नाटक और ओडिशा के पार्टी प्रभारी भी अपने इस्तीफों की पेशकश कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर को पार्टी ने फतेहपुर सिकरी से लोकसभा चुनाव का टिकट दिया था। राज बब्बर अपनी सीट तो हारे ही पूरे यूपी में कॉन्ग्रेस को भी कोई सीट नहीं दिला सके, सिवाय पार्टी की रायबरेली वाली परंपरागत सीट के। इस सीट पर सोनिया गाँधी ने जीत दर्ज की है। वहीं अमेठी से राहुल गाँधी तक हार गए। इतने बुरे प्रदर्शन के बाद राज बब्बर ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को इस्तीफा भेज दिया है।

इसी तरह कर्नाटक में कॉन्ग्रेस कैंपेन कमेटी के अध्यक्ष एच के पाटिल ने भी इस्तीफे की पेशकश की है। कर्नाटक में भी कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। वहाँ पार्टी केवल 1 सीट ही जीत पाई। इस हार के बाद पाटिल ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को खत लिखकर कहा कि यह सभी के लिए आत्ममंथन का समय है और वो अपनी जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे रहे हैं। ओडिशा कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पटनायक ने भी ओडिशा में पार्टी की हार की जिम्मेदारी ली है और कहा है कि पार्टी ने उनको भी टिकट दिया था मगर वो अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके और उन्होंने ये बात अपने पार्टी अध्यक्ष को बता दी है। वहीं, अमेठी जिला कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष योगेंद्र मिश्रा ने भी अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है।

मोदी सरकार में हुआ राफेल मुनाफे का सौदा, CAG ने लगाई मुहर

शनिवार (25 मई) को सरकार ने उच्चतम न्यायालय में सीधे-सीधे कहा कि राफेल सौदा देश के लिए मुनाफे का सौदा साबित हुआ है, और इस बात पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी मुहर लगा दी है। केंद्र ने यह भी कहा कि संप्रग सरकार के मुकाबले राजग सरकार द्वारा ख़रीदे गए लड़ाकू विमानों का ₹1000 करोड़ महंगा होना महज याचिकाकर्ताओं प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के दिमाग का फितूर है।

मीडिया रिपोर्टों के आधार पर याचिका, CAG के आकलन से लैस सरकार

याचिकाकर्ताओं ने याचिका का आधार मीडिया में चली कुछ ख़बरों को बनाया था जिनमें दावा किया गया था कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय तय की गई 126 राफेल की कीमत से 36 राफेल विमानों का सौदा (जो राजग सरकार ने किया था) ₹1000 करोड़ ज्यादा महंगा है। केंद्र ने इसके खिलाफ कैग की रिपोर्ट को रखते हुए याचिका के आधार और औचित्य को ही सवालिया घेरे में ला दिया है। सरकार ने न्यायालय को बताया कि उसने कैग को सभी मूल्य संबंधित जानकारियाँ, दस्तावेज और रिकॉर्ड मुहैया करा दिए थे। उनके आधार पर कैग ने विमानों की कीमत का एक स्वतंत्र आकलन किया, और मोदी सरकार के 36 विमानों के सौदे और मनमोहन सरकार के 126 विमानों के सौदे का अध्ययन किया

केंद्र ने अपने 39 पन्नों के जवाब में कहा, “कैग का आकलन याचिकाकर्ताओं के उस मूल तर्क का समर्थन नहीं करता कि कि हर विमान को पहले तय की गई कीमत के मुकाबले ₹1000 करोड़ ज्यादा दाम देकर खरीदा गया। बल्कि कैग के कहे अनुसार तो 36 राफेल विमानों का सौदा तो अनुमानित मूल्य से 2.86% कम है। इसके अतिरिक्त नॉन-फर्म और फिक्स्ड कीमत का भी लाभ मिलेगा। इससे याचिकाकर्ताओं का केस ही खत्म हो जाता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रख लिया फैसला

इसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है। याचिका 14 दिसंबर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए पड़ी थी। उस फैसले में अदालत ने केंद्र सरकार को राफेल विमानों की खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से क्लीन चिट दे दी थी

अमेठी में स्मृति ईरानी के करीबी BJP कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या

उत्तर प्रदेश के अमेठी से नवनिर्वाचित सांसद स्मृति ईरानी के करीबी माने जाने वाले भाजपा कार्यकर्ता और बरौलिया गाँव के पूर्व प्रधान सुरेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। जानकारी के मुताबिक, शनिवार (मई 25, 2019) की रात सोते हुए सुरेंद्र सिंह पर अज्ञात बदमाशों ने ताबड़तोड़ गोली बरसा कर हत्या कर दी। गोली लगने से घायल सुरेंद्र सिंह को लखनऊ ट्रामा सेंटर ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।

घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पुलिस पहुँची पुलिस ने मामला दर्ज कर इसकी पड़ताल शुरू कर दी है। पुलिस ने इसे लेकर कई लोगों से पूछताछ कर हत्या के पीछे की वजह पता लगाने की कोशिश कर रही है। मगर फिलहाल इसके पीछे की वजह चुनावी रंजिश को बताया जा रहा है, क्योंकि सुरेंद्र सिंह अमेठी से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को शिकस्त देने वाली भाजपा नेता स्मृति इरानी के बेहद खास थे और स्मृति ईरानी के प्रचार में वो काफी सक्रियता से जुटे थे। वारदात से कुछ समय पहले ही वो स्मृति ईरानी की जीत का जश्न मनाकर लौटे थे।

घटना के बाद बरौलिया का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। इसे देखते हुए आसपास के इलाके में भारी संख्या में पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गई है। इस मामले पर अमेठी के एसपी का बयान आया है। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र सिंह को शनिवार रात करीब 3 बजे गोली मारी गई। कुछ संदिग्धों को हिरासत में ले लिया गया है और जाँच जारी है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि हत्या का कारण कोई पुराना विवाद या फिर चुनावी रंजिश से जुड़ा मामला हो सकता है।