पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी सीबीआई से अनुमति के बिना राज्या में रेड करने का अधिकार ले लिया गया है। इस बात की जानकारी अधिकारियों ने गुरूवार (जनवरी 10, 2019) को दी।
राज्य के मुख्यमंत्री ने यह निर्णय दिल्ली विशेष पुलिस प्रतिष्ठान अधिनियम 1946 की धारा 6 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लिया गया है।
छत्तीसगढ़ से पहले आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ये नियम पहले से ही लागू है। न्यूज़ 18 के अनुसार उन्हें ये जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बाघेल के सेक्रेट्री गौरव द्विवेदी से प्राप्त हुई है।
एक अधिकारिक बयान का हवाला देते हुए अधिकारियों ने बताया है कि सीएम भूपेश बाघेल की नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और कार्मिक मंत्रालय (Ministry of Personnel) से सीबीआई को राज्य में कोई भी नया मामला दाखिल नहीं करने का निर्देश देने की माँग करते हुए पत्र लिखा है।
इसके साथ ही अधिकारियों का ये भी कहना है कि वर्ष 2001 में छत्तीसगढ़ सरकार ने सीबीआई को जांच करने की सामान्य सहमति दी थी। छत्तीसगढ़ के अलावा आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने अपने राज्य में जाँच करने और रेड मारने को दी गई सहमति पिछले साल ही वापस ले ली थी।
दिल्ली में कार्मिक मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि इस तरह सहमति वापस लेने से सीबीआई के पास पहले से चल रही जाँच के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
जानकारी के लिए बता दें कि इतना बड़ा कदम तभी उठाया गया है जब प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले एक पैनल ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को पद से हटाकर नागरिक रक्षा, अग्निशमन सेवा, और होमगार्ड्स महानिदेशक के पद पर नियुक्त किया है। बता दें कि केंद्रीय सतर्कता आयोग की एक रिपोर्ट में आलोक पर भ्रष्टाचार के मामले पर आरोप लगा था।
यह कहानी फ़िल्मी नहीं है। धनबाद के वासेपुर की तो बिल्कुल भी नहीं। यह कहानी है बर्फ के वादियों से। वहीं से, जहाँ हिरोइनें शिफ़ॉन की साड़ियों में होती हैं लेकिन हीरो स्वेटर और लेदर जैकेट में! यह कहानी है एक बच्चे की। कहानी में एक माँ भी है। माँ जो हम सबकी होती है… अफ़सोस हम माँ के उतने नहीं हो पाते हैं 🙁
तो पेशे-ख़िदमत है माँ और उसके ‘शेरदिल’ बेटे की कहानी
मई का महीना था। मौसम ख़ुशगवार था। तभी तेज़ आवाज़ आई – बेटा हुआ है। माँ के आँसू छलक गए, खुशी के आँसू। बेटे के हर लात, हर मुक्के, हर ज़िद और बदमाशी को माँ झेलती रही। क्योंकि यह माँ का फ़र्ज़ था। दिन-ब-दिन बेटा बड़ा होता गया। और बड़ी होती गईं उसकी शैतानियाँ। जहाँ-तहाँ सूसू-पॉटी से लेकर पेड़-पौधों तक को उसने नेस्तानाबूद किया, माँ ने सब झेला… सिर्फ इसलिए क्योंकि वह माँ थी।
अब वो किशोरावस्था में पहुँच गया। सूसू-पॉटी जैसी शैतानियाँ अब वो बंद कमरे में करने लगा। गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, कबड्डी अब उसके अड्डे थे – शैतानियों के अड्डे। इनके आगे वो अपनी माँ को माँ नहीं समझता था। कभी माँ से नहीं पूछता कि उसकी इच्छा क्या है… शायद ज़रूरत भी महसूस नहीं की उसने। लेकिन माँ ने कभी भी उसे अपनी छाँव से दूर नहीं किया। उसके नैसर्गिक गुणों से उसे वंचित नहीं किया। चाहती तो कर सकती थी लेकिन माँ भला ऐसा क्यों सोचे!
खैर, लड़का जवान हुआ। अपने नैसर्गिक गुणों के दम पर लड़के ने मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पा लिया। माँ बहुत खुश थी। आज फिर उसके आँसू छलके थे, खुशी के आँसू। यहाँ उसकी बदमाशियों का पोस्टमॉर्टम हो गया। एक से बढ़कर एक सीनियरों ने उसकी कह के ली। न जाने कितनों को उसे तोहफ़ा क़ुबूल करवाना पड़ा। अब उसे माँ की याद आने लगी। माँ तो ठहरी माँ! उसका कलेज़ा पसीज़ गया। हिम्मत दी, हौसलाफ़ज़ाई की। लौंडे ने मेडिकल का किला फ़तेह कर लिया।
मेडिकल कॉलेज के पिंजरे से निकल बदमाशियों का स्केलटन फिर से तन कर खड़ा हो गया। लेकिन अब उसे बड़ा मैदान चाहिए था। बदमाशियों का कैनवास बड़ा था, तो दिलासा भी बड़ा होना था। माँ से बड़ा कौन! माँ फिर उसके साथ खड़ी थी। बड़े जतन से बेटे के नैसर्गिक गुणों पर माँ ने फिर से धार चढ़ाई। और चाहिए ही क्या… IAS में जीत इतनी बड़ी हुई कि इलाका धुआँ-धुआँ हो गया। हर तरफ़ हज़रात-हज़रात-हज़रात का शोर! शोर में माँ को फिर से भूल गया बेटा… अफ़सोस!
A Wednesday को इस्तीफ़ा दिया, Friday को फुटुरे (Future) बताने को
10-11 बरस बीत गए। बेटे को फिर से माँ की ‘याद’ आई। क्योंकि उसकी बदमाशियाँ अब किसी सरहद की मोहताज़ नहीं रहना चाहती थीं। उसने IAS से इस्तीफ़ा दे दिया। क्योंकि A Wednesday (जनवरी 9, 2019) को उसे माँ की ‘सेवा’ करनी है। लेकिन नहीं… मौसम थम के बरसने को तैयार ही नहीं, आख़िर Friday को अपनी ‘महबूबा’ ‘उमर’ के पास जाएँ कैसे फैजल साहब! माँ और मौसम के बीच मौसम ने बाज़ी मार ली।
Friday को ‘महबूबा’ से ‘उमर’ का नहीं हुआ मिलन, क्योंकि मौसम बन गया विलन!
तेज़ आवाज़ आई। माँ की तेज़ आवाज़। धरती माँ की धिक्कार भरी आवाज़ -फैजल! सेना और कश्मीर पुलिस के जवानों की मौत के वक्त तू गांज़ा मार के कहां पड़ा था रे फैजल? कब बनाएगा इनके लिए तू पॉलिसी फैजलवा? बर्फ-पानी-पत्थर से सेना का खून नहीं जमता, अल्लाह के सबसे पाक दिन Friday को तेरा खून कैसे जम गया रे फैजलवा? कब खून खौलेगा रे तेरा?
अबुल फ़ज़्ल ने ‘आइन-ए-अक़बरी’ में लिखा है कि कश्मीर के सबसे इज़्ज़तदार लोग वे ऋषि हैं जो रिवाज़ों से बँधे नहीं हैं फिर भी ईश्वर के सच्चे पुजारी हैं। ये ऋषि किसी अन्य मत या पंथ को गाली नहीं देते और न ही किसी से कुछ माँगते हैं बल्कि वे तो राहगीरों के लिए मार्ग पर फल देने वाले वृक्ष लगाते हैं।
प्राचीनकाल में ऐसे ऋषि केवल कश्मीर में ही नहीं बल्कि समूचे भारत में थे। जैसा कि भाषा विज्ञान के ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर कपिल कपूर कहते हैं, “ऋषिगण अपने जमाने के ‘इंटेलेक्चुअल’ हुआ करते थे। इसमें संशय नहीं कि समाज को दिशा दिखाने के साथ ही ये ऋषि सामाजिक बुराइयों की सफाई भी करते रहते थे।”
ऋषि परंपरा में सर्वाधिक प्रसिद्ध आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यह विडंबना ही है कि वाल्मीकि को अपना मानने वाला और खुद को उनके नाम से संबोधित करने वाला ‘वाल्मीकि समुदाय’ आज भी मैला ढोने का घृणित काम करने को विवश है। दलित वर्ग के वाल्मीकि समुदाय के लोग भारत में हर जगह रहते हैं और चूहड़ा, भंगी, मेहतर आदि नामों से भी जाने जाते हैं। हमारे आसपास प्रायः वाल्मीकि समुदाय के लोग सीवर में गहरे उतरकर सफ़ाई करते दिख जाएँगे जिन्हें नगरपालिका अस्थाई रूप से सफ़ाई कर्मचारी के तौर पर वेतन देती है
वाल्मीकि समुदाय तथा अन्य दलित वर्गों को संविधान और समय-समय पर लागू किए गए क़ानूनों द्वारा अनेक प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं। सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 में छुआछूत करने वालों को दंड के प्रावधान हैं। सन 1993 और 2013 में आये अन्य कानूनों में यह प्रावधान किया गया कि स्थानीय प्रशासन सर्वे कर यह सुनिश्चित करेगा कि सूखे पाखाने न बनें जहाँ हाथों से मानव मल-मूत्र की सफ़ाई करनी पड़े।
जो व्यक्ति इस प्रकार के कार्यों में लिप्त हैं उनके पुनर्वास और मैला ढोने का काम छुड़ा कर दूसरे सम्मानित रोजगार देने का प्रावधान भी किया गया है। दलितों के उत्थान के लिए देश में न जाने कितने आंदोलन हुए, कमीशन और क़ानून बने जिनकी कोई गिनती नहीं है। लेकिन जम्मू कश्मीर राज्य में 1957 से रह रहे वाल्मीकि समुदाय की पीड़ा ऐसी है जिससे देश आज भी अनभिज्ञ है। इसका एक कारण यह भी है कि शेष भारत में दलितों के लिए जो कानून बने हैं वे जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते।
यह कहानी आरंभ होती है सन 1957 में जब जम्मू-कश्मीर के सफ़ाई कर्मचारी कई महीनों के लिए हड़ताल पर चले गए थे। तब जम्मू कश्मीर राज्य सरकार के हाथ पाँव फूल गए थे क्योंकि पूरे राज्य में विशेषकर जम्मू और श्रीनगर में कूड़े-कचरे और मानव मल-मूत्र का अंबार लग गया था। तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बक्शी ग़ुलाम मुहम्मद ने कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और तय किया कि दूसरे राज्यों से सफ़ाई कर्मचारी बुलाकर उन्हें जम्मू कश्मीर में नौकरी दी जाएगी।
चूँकि निकटतम राज्य पंजाब था इसलिए वहाँ के गुरदासपुर और अमृतसर ज़िले से लगभग 272 सफ़ाई कर्मचारी बुलाए गए और उन्हें जम्मू डिवीज़न में बसाया गया। जम्मू कश्मीर राज्य में उन सभी वाल्मीकि समुदाय के लोगों को बसाने के साथ ही उनके साथ संवैधानिक छल किया गया।
दरसअल जम्मू-कश्मीर राज्य भारत की स्वतंत्रता के समय से ही कुछ मुट्ठी भर नेताओं के स्वार्थ का शिकार हुआ जिसका परिणाम आज वहाँ रह रहा प्रत्येक व्यक्ति भुगत रहा है। इसकी शुरुआत तब हुई जब शेख अब्दुल्ला से मित्रता रखने वाले जवाहरलाल नेहरू ने संविधान बनने के अंतिम दिनों में गोपालस्वामी आयंगर के ज़रिये अनुच्छेद 370 को संविधान में जुड़वा दिया।
अनुच्छेद 370 यह कहता है कि भारतीय संविधान एक बार में पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं होगा। भारतीय संविधान के सभी अनुच्छेद और अन्य कानूनी प्रावधान एक-एक कर के राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक आदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाए गए। अनुच्छेद 370 में यह प्रावधान है कि भारत के राष्ट्रपति जम्मू-कश्मीर राज्य से सलाह लेकर समय-समय पर संविधान के अनुच्छेद राज्य में लागू करवाते रहेंगे।
इसी क्रम में 14 मई 1954 को एक ऐसा संवैधानिक आदेश भारत के राष्ट्रपति द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करवाया गया जिसने भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ दिया। इस अनुच्छेद को 35-A के नाम से जाना जाता है। इसी अनुच्छेद के कारण आज जम्मू-कश्मीर में वाल्मीकि समुदाय समेत कई समुदाय के लोग पीड़ित हैं।
अनुच्छेद 35-A जम्मू-कश्मीर राज्य को यह निर्णय लेने का अधिकार देता है कि राज्य के स्थाई निवासी कौन होंगे। अर्थात यह राज्य तय करेगा कि स्थाई निवास प्रमाण पत्र किसको देना है और किसे नहीं। जम्मू-कश्मीर राज्य को जब यह अधिकार दिया गया तब तक राज्य का संविधान भी नहीं बना था। बाद में राज्य का संविधान बनते ही उसमें यह लिख दिया गया कि जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासी का दर्ज़ा उन्हें ही दिया जाएगा जो 1944 या उसके पहले से राज्य में रह रहे हैं।
लेकिन वाल्मीकि समाज के लोग तो 1957 में पंजाब से लाकर बसाए गए थे इसलिए आजतक उन्हें जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं माना गया और उन्हें स्थाई निवास प्रमाण पत्र- जिसे PRC कहा जाता है- नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को अपने यहाँ रोजगार देने के लिए नियमों में परिवर्तन कर यह लिख दिया कि इन्हें केवल ‘सफ़ाई कर्मचारी’ के रूप में ही अस्थाई रूप से रहने का अधिकार और नौकरी दी जाएगी। इस प्रकार जब इस समुदाय का कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके माथे पर वैधानिक रूप से ‘दलित’ लिखा होता है। वह बड़ा होकर चाहे कितनी भी पढ़ाई कर ले उसे जम्मू-कश्मीर राज्य में सफ़ाई कर्मचारी की नौकरी ही मिल सकती है।
वाल्मीकि समुदाय के लोगों के पास स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वे राज्य में स्थाई रूप से न तो बस सकते हैं न ही संपत्ति खरीद सकते हैं। उनके बच्चों को राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति भी नहीं मिल सकती। यही नहीं PRC के अभाव में वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को राज्य सरकार के इंजीनियरिंग, मेडिकल या किसी अन्य टेक्निकल कोर्स के कॉलेजों में दाख़िला नहीं मिल सकता।
जम्मू-कश्मीर राज्य में 1957 में आए वाल्मीकि समुदाय के 272 लोगों के वंशजों की संख्या आज बढ़कर हज़ारों में हो गई है लेकिन वे उसी अस्थाई रूप से एक के ऊपर एक बने कई तलों में बने बसेरों में रहते हैं जो आज से 60 वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर राज्य ने उन्हें रहने के लिए दिए थे क्योंकि राज्य सरकार उन्हें मकान बनवाकर रहने की अनुमति नहीं देती। स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वाल्मीकि समुदाय के लोग लोकसभा चुनाव में तो मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं किंतु विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डाल सकते।
हालत ये हो चुकी है कि आज जब पूरे देश में दलित उत्थान की बातें होती हैं तब जम्मू-कश्मीर में रह रहे वाल्मीकि समुदाय के लड़के-लड़कियाँ स्कूली शिक्षा के आगे पढ़ाई ही नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि जब पढ़-लिख कर सफ़ाई कर्मचारी ही बनना है तब पढ़ने से क्या फ़ायदा? इस समुदाय की लड़कियाँ जम्मू-कश्मीर राज्य के बाहर जाकर विवाह कर रही हैं क्योंकि वे अपनी जाति के कम पढ़े लिखे सफाई कर्मचारी की नौकरी करने वाले युवाओं से विवाह नहीं करना चाहतीं। ऐसे में वाल्मीकि समुदाय के लड़कों को विवाह के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रहीं।
आज जब शेष भारत में ऐसा माहौल है कि एक जाति सूचक शब्द बोलने पर सजा हो जाती है तब जम्मू-कश्मीर राज्य वाल्मीकि समुदाय को जाति प्रमाण पत्र तक जारी नहीं करता जिससे इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों के लिए बनाए गए विशेष प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ता है। यही नहीं 2015 में एकलव्य नामक एक लड़के के प्रमाण पत्र पर जम्मू-कश्मीर राज्य के सरकारी कर्मचारी ने जाति सूचक शब्द लिखा और उस कर्मचारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। जाति प्रमाण पत्र न होने से एक प्रकार से अनुसूचित जातियों में जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की गिनती ही नहीं होती।
मीडिया में भी जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय की कवरेज नहीं के बराबर है। मैला ढोने की कुप्रथा पर भाषा सिंह ने एक बहुचर्चित पुस्तक लिखी ‘Unseen: The Truth About Indian Manual Scavengers’ जिसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर की उन जातियों के बारे में लिखा जो यह घृणित कार्य आज भी करने को विवश हैं किन्तु भाषा सिंह ने अपनी पुस्तक में वाल्मीकि समुदाय के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा।
इस तरह जम्मू-कश्मीर में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुल्लमखुल्ला मखौल उड़ाया जा रहा है और इसकी जड़ में है अनुच्छेद 35-A जिसे गलत तरीके से संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ने की प्रक्रिया ही अपने आप में असंवैधानिक थी। संविधान संशोधन की प्रक्रिया अनुच्छेद 368 में दी गई है जिसके अनुसार संविधान में कोई भी अनुच्छेद जोड़ने के लिए संसद में संविधान संशोधन बिल लाया जाता है। परन्तु अनुच्छेद 35-A कभी संसद से पास नहीं हुआ।
जब इसे हस्ताक्षर के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के पास भेजा गया था तब उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से पूछा था कि क्या मैं यह असंवैधानिक कार्य कर सकता हूँ। इस पर नेहरू ने उनसे कहा था कि हम इस मामले पर अनौपचारिक रूप से चर्चा करेंगे। ख़ास बात यह है कि यह संवाद भी औपचारिक रूप से किया गया था। आज उच्चतम न्यायालय में 35-A पर एक दो नहीं बल्कि पाँच याचिकाएँ लंबित हैं किंतु न्यायाधीशों को इन पर निर्णय देने का समय नहीं मिल रहा।
मामला मध्य प्रदेश का है और मज़ेदार है। राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ को डाकू कहने वाले सरकारी स्कूल के एक हेडमास्टर को निलंबित कर दिया गया है। पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान सरकारी स्कूल के हेडमास्टर मुकेश तिवारी ने मुख्यमंत्री को डाकू कह दिया था।
कार्यक्रम के बाद उनके इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। जिसके बाद जबलपुर के जिलाधिकारी ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकारी कर्मचारी को निलंबित कर दिया। मध्य प्रदेश सरकार के इस फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ़ जमकर बवाल काटा जा रहा है। आइए जानते हैं इस घटना पर ट्वीटर यूजर की क्या प्रतिक्रिया रही।
किरण बालियाण नाम की एक यूजर ने ट्वीट करके कॉन्ग्रेस पार्टी के फ़ैसले का विरोध किया। किरण ने अपने ट्वीट में लिखा “यदि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में डाकू (चोर) कहने पर एक शिक्षक को निलंबित किया जा सकता है, तो देश के प्रधानमंत्री को चोर कहने वाले राहुल गाँधी को तो जेल में होना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी के लिए है न कि किसी एक के लिए है।“
If a Teacher Calling MP Chiefe Minister Kamalnath as Daku (Chor) can be suspended, why not Mr Rahul Gandhi put behind bars for calling OM of country “Chor”. Freedom of expression is for some people only! Teacher ousted for calling MP CM ‘Daku’ https://t.co/jGIKGo1WME
एक अन्य ट्वीटर यूजर पावी ने कटाक्ष करते
हुए लिखा कि कमलनाथ के इस फ़ैसले के बाद आपका फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन अभी कहाँ चला गया
मिस्टर राहुल गाँधी।
@KamalNath_@Scind Shame. This DAKU slave suspended a teacher for DAKU jibe on Kamalnath… Where is your freedom of expression me @RahulGandhi.. How can u guys be so fake and Hypocrats
धर्मों से परे और जाति से परे हर लड़की की कहानी अपने आप में ही इतिहास का समकालीन ज़िंदगी के साथ समावेश है। हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ कार की स्टेयरिंग हाथ में लिए हर लड़की आज के समाज का आईना नहीं है। स्कूल जाती लड़की को देखकर कभी भी इस बात का अंदाज़ा नहीं लगाना चाहिए कि उसके भीतर पढ़ने का बहुत जोश है या फिर उसके घर के लोगों में उसे पढ़ाने की मंशा है। हो सकता है ‘लाडली योजना’ के तहत मिलने वाली 1 लाख की राशि की चमक ने उसे स्कूल के क्लासरूम तक लाकर खड़ा दिया हो… या फिर ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ के बैनर तले उसका नाम दर्ज़ करने के लिए घर की बेटी को स्कूल तो भेजा जा रहा हो, लेकिन घर में उसे शिक्षा उन्हीं लोगों द्वारा दिलाई जा रही हो, जो आज भी औरत का सबसे बड़ा कर्म रोटी को गोल बनाना बताते हैं। हो सकता उसकी डिग्रियों की आड़ में सिर्फ शादी के लिए एक परफ़ेक्ट ‘रेज़्युमे’ तैयार किया जा रहा हो।
ये ऊपर लिखी बातें निराधार नहीं हैं, और न ही मैं महिलाओं की शिक्षा का विरोध कर रही हूँ। मैं बस उस व्यथा को ज़ाहिर करना चाहती हूँ, जो अपने माहौल में देखते सब हैं लेकिन महसूस कोई-कोई ही करता है। ऊपर की बातें लिखते समय मैं कुछ वैसी लड़कियों का चेहरा याद कर रही हूँ, जिनके जीवन को और रहन-सहन को हमेशा से मुझे जानने की इच्छा हुई। लेकिन जब जाना तब सहम गई। इन लड़कियों में एक नाम अन्नू (बदला हुआ नाम) भी है। नीचे की कहानी (सच्ची घटना) है तो अन्नू की लेकिन इस कहानी के पात्र आपको अपने आस-पास देखने को अक्सर मिलेंगे।
बात 2009 की है। 8वीं पास करके मैंने नए स्कूल में 9वीं में एडमिशन लिया था। वो स्कूल मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव था। मैं पहली बार इतनी सारी लड़कियों को एक साथ पढ़ते हुए देख रही थी। इनमें कुछ बहुत पढ़ाकू थीं और कुछ बहुत ही बिंदास… मैं एवरेज वाली सूची में थी। घर में हमेशा से पढ़ाई के लिए दबाव रहता था, इसलिए मुझे पढ़ाकू लड़कियों को न देखने का मन करता था और न ही मैं उनसे प्रभावित होती थी।
क्लास में कुछ ऐसी भी लड़कियों का ग्रुप था, जो बहुत बिंदास था। नम्बर चाहे कम आएँ, लेकिन हेयरस्टाइल हर रोज़ नया रहता था। हम कुर्ता घुटने से नीचे तक का पहनते थे और वो घुटने से ऊपर पहन कर भी कुर्ते की लंबाई को ज़्यादा बताती थीं। उन्हें देखकर मुझे लगता था कि इनके घर का माहौल कितना गज़ब होगा कि ये लोग टीचर की डाँट खाने के बाद भी मस्तमौला होकर घूमती हैं। उन्हें न होमवर्क की चिंता होती थी और न ही यूनिट टेस्ट की। इस ग्रुप की हर लड़की के पास अपनी एक फ़ाइल थी, जिसमें पसंदीदा हिरोइनों की अखबार से काटी हुई तस्वीरें थी। बैक बेंच पर वो भी बैठती थीं और मैं भी। फ़र्क़ बस ये था वो खुलकर हँसती थीं और अपनी तरह से क्लास रूम को जीती थीं और मैं पढ़ाई के साथ उनके लाइफ़स्टाइल को देखने में ही उलझी रहती थीं। इस ग्रुप ने मुझे बहुत प्रभावित किया था।
इस स्कूल में मेरे दिन बीतते जा रहे थे और मैं अपनी एवरेज परफॉर्मेंस के साथ दूर से ही इनमें घुलती जा रही थी। घर आकर भी मैं इसी ग्रुप के बारे में सोचती रहती थी। इनमें एक लड़की अन्नू भी थी। बेहद सुंदर और मस्तमौला… लेकिन उसका पढ़ाई में डब्बा गोल था। इसलिए टीचर ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। हालाँकि, इस बात से उसे भी कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उसके लिए तो उपलब्धि ये थी कि स्कूल के बाहर खड़े लड़के उसके ग्रुप की किसी लड़की को न देखकर सिर्फ़ उसे देखते हैं। मुझे लगता था जैसे उसने न पढ़ने की ही ठान रखी है। लेकिन फिर भी मुझे वो पसंद थी।
उसके जन्मदिन वाले दिन उस ग्रुप में बहुत हल्ला था। सबको पता था अन्नू का जन्मदिन है, बस इंतज़ार हो रहा था उसके आने का। प्रार्थना से लेकर पहला पीरियड खत्म हो गया, लेकिन वो नहीं आई। उसकी सहेलियाँ बेहद नाराज़ थीं। मानो अब से अन्नू से दोस्ती बिल्कुल ख़त्म कर लेंगी। स्कूल की घंटी बजी और मैं भी अपने घर आकर यह सोचती रही कि आज आखिर अन्नू क्यों नहीं आई?
अगले दिन वो आई तो हाथ में पट्टी बंधी थी। तब पता चला कि जन्मदिन पर ही कार से उसका एक्सीडेंट हो गया था, जिससे उसके हाथ में गहरी चोट आई थी। क्योंकि चोट गहरी थी, तो सबको लगा टाँके लगे होंगे। लेकिन उसने इस बात को झट से नकारते हुए कहा, “मैंने कोई टाँके नहीं लगवाए।” सहेलियों के ज़्यादा पूछने पर उसने बड़े चिंता-भाव में कहा, “टाँके लग जाते हैं तो निशान पड़ जाता है न यार! फिर शादी में दिक्कत आती है। इसलिए मम्मी ने टाँके नहीं लगवाए। भले ही टेम (समय) लगेगा लेकिन घाव ऐसे ही सही हो जाएगा।”
इस बात को सुनकर अभी मैं हैरान हुई ही थी कि तब तक उस ग्रुप से ही किसी लड़की की आवाज़ आई, “हाँ, ये तो आंटी ने सही किया, शादी में इन सबसे बहुत दिक्कतें आती हैं।” आश्चर्य कि उस ग्रुप में सबने इस बात पर हामी भरी!
इस बात को सुनने से पहले मेरे भीतर कभी भी लड़की होने पर सवाल नहीं उठे थे, लेकिन इस घटना के बाद मानो मैं सहम गई। मैं कई दिनों तक सवालों से जूझती रही कि क्या एक लड़की का शरीर शादी का मटेरियल मात्र है! जो जितना साफ़ रहेगा, उसकी माँग उतने बढ़िया लोग करेंगे?
फिर एक ख़्याल यह भी आया कि क्या अन्नू के जन्मदिन पर हुए एक्सीडेंट में जो चोट उसे लगी, उसे देखकर उसकी मम्मी का मन नहीं पसीजा होगा, जो उन्होंने चोट में बहता ख़ून नकार कर उसके न मिटने वाले निशान को ज़रूरी समझा?
अपनी मम्मी की इस बात को मानकर अन्नू खुले घाव के साथ स्कूल आ गई। मतलब वो भी इस उम्र से ही खुद को शादी के लिए ही तैयार कर रही है?
क्या सच में चोट लगने से ज्यादा शरीर पर निशान का दिखना खतरनाक है?
निशान को लेकर परेशान हो जाने वाली अन्नू की मम्मी कभी भी उसके पढ़ाई में कम नम्बर देखकर परेशान नहीं हुई होंगी?
अन्नू की मम्मी वाली बात पर सहमति भरने वाली उसकी सहेलियों को भी क्या यही सिखाया जा रहा होगा उनके घरों में?
ये वो सवाल थे जो आज भी मुझे कुरेदते हैं। इस घटना के बाद मैं खुद को बेहद ख़ुशनसीब मानती हूँ कि मैंने बतौर लड़की एक ऐसे घर में जन्म लिया, जहाँ मुझे पहला थप्पड़ पढ़ाई न करने पर पड़ा था। मेरे शरीर पर एलर्जी से हुए कई निशानों के बावजूद भी मेरे घर में किसी ने कभी मुझे उसे छुपाने को नहीं कहा, न ही उसे देखकर कभी चिंता जताई। अन्नू को देखकर मेरे मन में इस तरह के सवाल आना शायद मेरी परवरिश का नतीजा है और शायद उसका अपनी मम्मी की बात को मान जाना उसकी परवरिश का… ऐसे में अगर हम ये कहें कि स्कूल जाती हर लड़की शिक्षित होगी तो शायद यह गलत होगा क्योंकि लड़की से ज़्यादा हमारे परिवेश में पनप रही कुंठित मानसिकता का बदलना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि हर लड़की स्कूल जाते वक्त शिक्षा को अपना लक्ष्य रखे न कि समाज की थोपी बातों पर।
उम्मीद यही है कि देश में आने वाली हर सरकार बेटी बचाने के साथ समाज को शिक्षित करने का भी काम करे। सिर्फ एक निश्चित समाज या तबके की लड़कियाँ ही कार की स्टेयरिंग पर हाथ न घुमाएँ। बल्कि अन्नू जैसी लड़कियों को भी पता चल सके कि वो साइड में बैठने के अलावा गाड़ी खुद भी चला सकती हैं और मंजिल तक पहुँचा भी सकती हैं।
शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को सीबीआई निदेशक पद से हटाए गए आलोक वर्मा ने शनिवार को नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया है। ज्ञात हो कि शुक्रवार को प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले हाई पावर्ड समिति ने आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक पद से हटा कर उनका तबादला फायर सर्विसेज में कर दिया था। इसके बाद वर्मा ने फायर विभाग में चार्ज लेने से इनकार कर दिया और सर्विस से इस्तीफ़ा दे दिया। फरवरी 1, 2017 को सीबीआई डायरेक्टर बनाए गए वर्मा इसी महीने की अंतिम तारिख को रिटायर होने वाले थे। अपने इस्तीफ़े में उन्होंने कहा;
“मैं अपनी सर्विस 31 जुलाई 2017 को ही पूरी कर चुका था और सिर्फ सीबीआई डायरेक्टर के पद पर कार्यरत था। सिविल डिफेंस, फायर सर्विसेज़ और होमगार्ड का महानिदेशक बनने के लिए तय आयु सीमा को मैं पार कर चुका हूं।”
आलोक वर्मा का इस्तीफ़ा पत्र
बता दें कि सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और उनके डिप्टी राकेश अस्थाना के बीच हुए विवाद के बाद दोनों को ही पद से हटा दिया गया था। 23 अक्टूबर की आधी रात को केंद्र सरकार ने सीबीआई के भीतर बढ़ते विवाद को लेकर आलोक वर्मा को उनके पद से मुक्त कर लम्बी छुट्टी पर भेज दिया था। इसके करीब ढ़ाई महीने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को पलटते हुए वर्मा को फिर से बहाल कर दिया था। अदालत ने अपने इस निर्णय में कहा था कि इस मामले में आगे का फैसला चयन समिति करेगी। चयन समिति में प्रधानमंत्री के अलावे नेता प्रतिपक्ष और मुख़्य न्यायाधीश का शामिल होना था। शुक्रवार को हुई समिति की बैठक में मुख़्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि के रूप में न्यायमूर्ति एके सीकरी ने भाग लिया था।
1979 बैच के IPS अधिकारी आलोक वर्मा सीबीआई के 27वें निदेशक थे। सीबीआई निदेशक के रूप में उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा और राकेश अस्थाना से उनके झगड़े के कारण सीबीआई भी कई दिनों तक सुर्ख़ियों में रही। वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग में भ्रष्टाचार संबंधी जाँच भी चल रहा है। वर्मा ने कहा कि उन्होंने सीबीआई की अखंडता बनाए रखने की पूरी कोशिश की लेकिन कुछ लोगों द्वारा इस संस्था को बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है।
उधर सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव ने वर्मा द्वारा लिए गए स्थानांतरण वाले सारे निर्णयों को रोक दिया है।
सामान्य वर्ग के कमज़ोर तबके को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने वाला बिल पास होने के बाद से ही लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। सामान्य वर्ग के ग़रीबों को आरक्षण देने संबंधी बिल के तहत सरकार अब ₹8 लाख और 5 एकड़ ज़मीन के दायरे को कम कर सकती है।
वित्त मंत्रालय के मुताबिक अगले महीने इस तरह के बदलाव को अमल में लाया जा सकता है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने भी बदलाव करने की संभावना व्यक्त की है। उनके मुताबिक़ वर्तमान में जो आय और संपत्ति का दायरा है, वो अधिक है।
सामान्य वर्ग आरक्षण बिल पर जानकारी देते हुए गहलोत ने बताया कि फ़िलहाल जो बिल लोकसभा में पास हुआ है, उसमें आय और संपत्ति का ज़िक्र नहीं किया गया है।
इसका सीधा सा मतलब यह है कि सरकार अगले महीने बिल में इस प्रकार बदलाव करेगी, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि 10 फ़ीसदी आरक्षण का लाभ सामान्य वर्ग के केवल ज़रुरतमंद तबके को ही मिले। वित्त मंत्रालय के मुताबिक, केंद्र इस बात पर भी विचार कर रहा है, कि राज्यों को अपने हिसाब से सवर्ण आरक्षण के दायरे को निर्धारित करने की छूट दी जाए।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के बीच क्रीमी लेयर के लिए मौजूदा मापदंडों से वार्षिक घरेलू आय और भूमि की होल्डिंग का संदर्भ तब लिया गया था, जब आरक्षण हेतु आर्थिक अभाव को शामिल करने के लिए संविधान संशोधन पर विचार किया जा रहा था।
संविधान के अनुच्छेद 15 में क्लॉज़ 4 और 5 में कम समृद्ध दलित, आदिवासी और ओबीसी को कोटा के अंतर्गत कवर नहीं किया गया था। इन क्लॉज़ों के कारण ही आरक्षण की बाधा उत्पन्न हो रही थी। गहलोत ने कहा, “क्लॉज 6 अब इस तरह का आरक्षण देना संभव बनाता है।” इसके अलावा उन्होंने जानकारी दी कि मंत्रालय अब जिन उपायों पर विचार करेगा, उसके अंतर्गत आय और ग़रीबी के मौजूदा संकेतकों को ध्यान में रखा जाएगा।
“एक सिंह रैंदो बण, एक सिंह गाय का एक सिंह माधो सिंह, और सिंह काय का” उत्तराखंड में प्रसिद्ध इस लोकोक्ति का अर्थ है- एक सिंह वन में रहता है, एक सींग गाय का होता है। एक सिंह माधो सिंह है, इसके अलावा बाकी सिंह बेकार हैं।
उत्तराखंड की लोक गाथाओं में कई ‘वीर भड़ों’ (वीर योद्धा) का ज़िक्र है। और इन्ही में से एक वीर भड़ हैं माधो सिंह भण्डारी। माधो सिंह भण्डारी का जन्म मलेथा गाँव में हुआ था जो उत्तराखंड के बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर देवप्रयाग और श्रीनगर के बीच में बसा हुआ है।
पहाड़ की लोक गाथाओं में वीर गढ़वाली योद्धा माधो सिंह भण्डारी का अपना अलग विशेष स्थान है। लगभग 400 साल पहले पहाड़ का सीना चीरकर नदी का पानी ‘कूल’ (सुरंग) बनाकर अपने गाँव मलेथा तक लेकर आने का काम महान योद्धा माधो सिंह भण्डारी ने किया था। माधो सिंह द्वारा बनाई गई ‘कूल’ के जरिए जो पानी आता है, उससे मलेथा गाँव के खेतों में आज भी हरियाली है।
‘माधो सिंह मलेथा’
माधो सिंह भण्डारी का जन्म सन 1595 के लगभग उत्तराखंड के टिहरी जिले के मलेथा गाँव में हुआ था। जिस कारण उन्हें ‘माधो सिंह मलेथा’ भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम ‘सोणबाण’ कालो भण्डारी था, जो अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी बुद्धिमता और वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन गढ़वाल नरेश ने ‘सोणबाण’ कालो भंडारी को एक बड़ी जागीर भेंट की थी। माधो सिंह भी अपने पिता की तरह ही वीर और स्वाभिमानी थे।
मलेथा गांव के दाईं ओर चंद्रभागा नदी बहती है। बीच में बड़ी चट्टानों और पहाड़ों के कारण चंद्रभागा नदी का पानी गाँव तक लाना मुश्किल था। माधो सिंह भण्डारी ने इसी पहाड़ को खोदकर लम्बी सुरंग बनाई और सुरंग के रास्ते पानी गाँव तक लाने की ठानी। लगभग पाँच सालों की कड़ी मेहनत के बाद माधो सिंह की मेहनत रंग लाई और सुरंग बनकर तैयार हो गई। यह सुरंग अपने आप में इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है।
सोलहवीं सदी में नहर और सुरंग के ज़रिए सिंचाई के लिए पानी खेतों तक पहुँचाना एक दिवास्वप्न जैसी बात थी। गाँव में सुरंग और नहर लाने के उनके प्रयास की यह कहानी काफ़ी हद तक बिहार राज्य के दशरथ माँझी से मिलती-जुलती है, जिन पर बॉलीवुड में फ़िल्म भी बनाई जा चुकी है। माधो सिंह भण्डारी गढ़वाल के महान योद्धा, सेनापति और कुशल इंजीनियर थे और वो गढ़वाल की लोककथाओं का अहम हिस्सा रहे हैं। समय-समय पर उनकी वीरता, त्याग और शौर्य की कहानी पर नाट्य-मंचन भी होते रहते हैं।
राजा महिपती शाह की सेना में सेनाध्यक्ष थे माधो सिंह भण्डारी
माधो सिंह भण्डारी कम उम्र में ही श्रीनगर के शाही दरबार की सेना में भर्ती हो गए और अपनी वीरता और युद्ध कौशल के कारण तत्कालीन राजा महीपति शाह (1631-35) जो कि पँवार वंश के 46वें राजा थे, की सेना के सेनाध्यक्ष के पद पर पहुँच गए। सेनाध्यक्ष के रूप में माधो सिंह दुश्मनों के लिए साक्षात यम के दूत बन गए। माधो सिंह भण्डारी के नेतृत्व में महीपति शाह ने तिब्बत के दावा क्षेत्र से होने वाले लगातार हमलों से राज्य को सुरक्षित करने के साथ ही दावा क्षेत्र और अपने राज्य के बीच सीमा का निर्धारण किया था। इस कारण महीपति शाह ‘गर्भ-भंजक’ नाम से भी जाने जाते थे।
क्या है किस्सा वीर माधो सिंह भण्डारी का?
लगातार अपने हमलों से राज्य की नींद उड़ाने वाले तिब्बत के दावा क्षेत्र के दुश्मनों से लड़ाई में विजय हासिल करने के बाद माधो सिंह भंडारी का विवाह उदीना के साथ हुआ। सेना से छुट्टियों के दौरान अपने गाँव जाने पर वहाँ खेती-बाड़ी और उसर भूमि के हालात देखकर माधो सिंह का मन बहुत दुखी हुआ। उन्होंने देखा कि मलेथा गाँव के अलकनंदा और चंद्रभागा नदियों से घिरे होने के बावज़ूद वहाँ सिंचाई की व्यवस्था नहीं थी। जिस कारण गाँव की खेती सिर्फ़ वर्षा पर निर्भर थी। कभी-कभी नौबत अकाल पड़ने तक की भी आ जाती थी और पानी की कमी के कारण स्थानीय लोगों का खेती करके फ़सल और सब्ज़ी उगाना मुश्किल था। माधो सिंह भण्डारी ने इस समस्या पर विचार किया कि किस प्रकार से गाँव में पानी और सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो सकती है। उन्होंने निश्चय किया कि वो किसी भी तरह से मलेथा गाँव में पानी लेकर आएंगे।
मलेथा गाँव के सबसे नजदीक चंद्रभागा नदी बहती है, लेकिन नदी और गाँव के बीच बहुत बड़े पहाड़ और चट्टानों के कारण यहाँ नदी का पानी पहुँचाना बहुत ही मुश्किल कार्य था। माधो सिंह ने विचार किया की यदि पहाड़ों के बीच से किसी तरह सुरंग बनाई जा सके, तभी पानी को गाँव तक पहुँचाना संभव हो सकेगा। दुरूह कार्य यह था कि कठोर चट्टानों के बीच से लगभग 2 किलोमीटर लम्बी सुरंग किस प्रकार मलेथा तक पहुँचाई जाए। माधो सिंह ने तुरंत ही एक विशेषज्ञों का दल बुलाकर और गाँव के लोगों को साथ लेकर सुरंग बनाने का काम शुरू कर दिया। लगभग पाँच साल तक चले इस हिमालयी परिश्रम के बाद ‘कूल’/’गूल’ (सुरंग) बनकर तैयार हो गई। इसके ऊपर के हिस्से को मजबूत लोहे और कीलों का आवरण दिया गया, जिससे कि भविष्य में आने वाली किसी आपदा और भूस्खलन से इसे सुरक्षित रखा जा सके।
सुरंग के बदले अपने पुत्र का दिया बलिदान
स्थानीय कहानियों के अनुसार माधो सिंह भण्डारी ने अपने पुत्र गजे सिंह का इस सुरंग के लिए बलिदान किया था। लोक कथाओं के अनुसार, जब सुरंग बनकर तैयार हो गई तब नदी के पानी को ‘कूल’ (सुरंग) से गुज़ारने के बहुत प्रयास करने के बावज़ूद भी नदी का पानी ‘कूल’ में नहीं पहुँचाया जा सका। जिससे माधो सिंह के साथ ही सारा गाँव बहुत परेशान हो गया। एक रात माधोसिंह को स्वप्न आया कि स्वप्न में देवी उनसे अपने एकमात्र पुत्र का बलिदान करने को कह रही है। उन्होंने यह बात अपने गाँव के लोगों से बताई कि उन्हें ‘कूल’ से पानी लाने के लिए अपने एकमात्र बेटे गजे सिंह की बलि देनी होगी। पहले तो माधो सिंह इस विचार के लिए तैयार नहीं हुए, लेकिन बाद में गजे सिंह लोकहित के लिए इस बलिदान के लिए खुद राज़ी हो गए और अपने पिता माधो सिंह से कहा कि अगर ऐसा करने से मलेथा गाँव के लोगों को पानी मिल सकता है और यहाँ की बंज़र भूमि उपजाऊ हो सकती है तो उन्हें यह बलिदान कर लेना चाहिए। इसके बाद गजे सिंह की बलि दी गई और उनके सिर को ‘कूल’ (सुरंग) के मुँह पर रखा दिया गया। इसके बाद जब नदी के पानी को सुरंग की ओर मोड़कर गुज़ारा गया तो पानी सुरंग से होते हुए गजे सिंह के सिर को अपने साथ बहा कर ले गया और खेतों में स्थापित कर दिया। हालाँकि, एक दूसरी प्रचलित कथा के अनुसार ये भी माना जाता है कि माधो सिंह भण्डारी नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र गजे सिंह सुरंग निर्माण के कार्यस्थल पर आए। एक दिन जिद करके गजे सिंह वहाँ पहुंच गया और पहाड़ से बड़ा सा पत्थर लुढ़ककर उसके सिर पर लगा जिससे उसकी मौत हो गयी। बाद में जब सुरंग में पानी आया तो वह उस जगह तक पहुँच गया था जहाँ पर गजे सिंह की मौत हुई थी। पुत्र के बलिदान से आहत गजे सिंह की माता उदीना ने श्राप दिया था कि इस परिवार अब कोई ‘भड़’ पैदा नहीं होगा।
इस सुरंग से सफलतापूर्वक नदी का पानी मलेथा गाँव तक पहुँचाने के बाद माधो सिंह वापस श्रीनगर राजा महीपति शाह के पास चले गए और फ़िर कभी गाँव लौटकर न आने का फ़ैसला किया। वर्तमान में मलेथा गाँव का सम्पूर्ण इलाका हरा-भरा और कृषि सम्पदा से पूर्ण है। और माधो सिंह ‘मलेथा’ के त्याग, परिश्रम और दृढ इच्छाशक्ति द्वारा बनाई गई यह नहर आज तक भी गाँव में पानी पहुँचा रही है।
उत्तराखंड के मलेथा गाँव में माधो सिंह भण्डारी द्वारा बनाई गई सुरंग
सेनाध्यक्ष माधो सिंह का था ऐसा भोकाल कि तिब्बत के सैनिक उनके नाम से भी डरते थे
मलेथा गाँव में ‘कूल’ बनाने की घटना के बाद जब माधो सिंह सेना में वापस लौटे तो उन्हें तिब्बत की सेना से लड़ने के लिए भेजा गया, जो उस वक़्त दावा क्षेत्र में लगातार हमला कर रही थी। इसी दौरान ‘छोटा चीनी’ नामक जगह पर युद्ध के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। राजा महीपति शाह ने माधो सिंह की मदद से गढ़वाल और तिब्बत के बीच सीमा तय करने का काम किया था। उनकी मौत को लेकर गढ़वाल के लेखक पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल का इतिहास’ में लिखते हैं कि तिब्बत के सैनिक माधो सिंह के नाम से भी घबराते थे।
अपने विजय रथ को जब वे आगे बढ़ा रहे थे तो इसी बीच रोगग्रस्त होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। पुस्तक के अनुसार, मृत्यु से पहले माधो सिंह ने अपने सेना से कहा था कि तिब्बतियों को ये पता नहीं चलने देना कि माधो सिंह मर चुका है, वरना वो फ़िर से हमला करेंगे। पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी जी के अनुसार, माधो सिंह ने कहा था, “लड़ते हुए पीछे होते जाना और मेरे शव को भूनकर और कपड़े में लपेटकर, बक्शे में रखकर, हरिद्वार ले जाना और वहाँ दाह-संस्कार कर देना।”
शिवप्रसाद डबराल (उत्तराखंड का इतिहास) ने भी अपनी अपनी किताबों में यह माना है कि माधो सिंह भण्डारी की मौत ‘छोटा चीनी’ में हुई थी। उनके अनुसार उनकी मौत 1635 में हुई, लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध 1640 के बाद लड़ा गया था और माधोसिंह की मौत इसी के बाद हुई थी।
माधो सिंह भण्डारी के पिता ‘सौण बाण’ कालो सिंह भण्डारी भी थे एक जांबाज़ वीर सैनिक
यह कहा जा सकता है कि वीरता माधो सिंह भण्डारी के खून में ही थी। यह लगभग उस समय की बात है जब दिल्ली में मुग़ल शासक अकबर का दौर था। उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में राजा गरुड़ ज्ञानचंद और सिरमौर के राजा मौलिचंद ने तपोवन स्थित उपजाऊ भूमि के लिए तत्कालीन गढ़वाल राजा मानसिंह (1591 से 1610) के साथ टकराव शुरू किया। ये तीनों ही इस उपजाऊ भूमि पर अपना अधिकार चाहते थे। राजा मानसिंह ने उनकी इस माँग को ठुकरा दिया।
दिल्ली और चम्पावत के शासकों को यह बात पसंद नहीं आई और दोनों जगह के शासकों ने अपने 2-2 बलवान और युद्धकला में पारंगत सिपाहियों को गढ़वाल भेज दिया। राजा मानसिंह ने माधो सिंह भंडारी के पिता कालो सिंह भंडारी से मदद मांगी और कालो सिंह भंडारी ने अकेले ही इन चारों को परास्त कर दिया। तब राजा मानसिंह ने कालो भण्डारी को ‘सौण बाण’ (स्वर्णिम विजेता) की उपाधि दी। और उसी समय से वो ‘सौण बाण कालो भण्डारी’ कहलाए जाने लगे।
मलेथा गाँव के खेतों की तस्वीर। तस्वीर साभार – euttaranchal.com मलेथा गाँव की सुरंग। तस्वीर साभार – euttaranchal.com
विगत वर्ष ही मलेथा निवासी वीर माधो सिंह भंडारी को श्रद्धांजलि देते हुए उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उनके नाम पर उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (UTU) का नाम वीर माधो सिंह तकनीकी विश्वविद्यालय करने की घोषणा की है।
धार्मिक दृष्टिकोण से देश के बेहद अहम चारधाम महामार्ग परियोजना को सर्वोच्च न्यायालय ने हरी झंडी दिखा दी है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले के बाद अब चारधाम सड़क परियोजना को आसानी से पूरा किया जा सकेगा। इससे पहले एनजीटी (NGT: National Green Tribunal) के फ़ैसले के बाद कोर्ट ने चार धामों को जोड़ने वाली महामार्ग परियोजना पर रोक लगा दी थी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तब उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार से भी जवाब तलब किया था। सरकार के इस ड्रीम प्रोज़ेक्ट को रोकने के लिए “सीटिजन फॉर ग्रीन दून” नाम की एक एनजीओ ने कोर्ट में याचिका दायर किया था। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया था। शुक्रवार (जनवरी 11, 2019) को इस मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार के महामार्ग परियोजना प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा दी है।
Supreme Court gives go-ahead to govt’s Char Dham road widening projects. The project aims to provide all-weather connectivity to the four shrines of Gangotri, Yamunotri, Kedarnath and Badrinath in Uttarakhand. pic.twitter.com/YoLMXeD4GB
जानकारी के लिए बता दें कि चारधाम को जोड़ने वाली यह महामार्ग परियोजना देश के पहाड़ी राज्यों के दुर्गम हिस्सों से होकर गुजरती है। पर्यावरण के हितों की अनदेखी को रोकने के लिए एनजीटी ने सरकार को कुछ सुझाव देने के बाद योजना को हरी झंडी दिखा दी थी। एनजीटी ने इसके साथ ही उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व जज यूसी ध्यानी के नेतृत्व में इस परियोजना की देख-रेख के लिए एक कमिटी का गठन भी कर दिया था। इसके आलावा एनजीटी ने इस महामार्ग पर पेट्रोल की 10 साल से ज्यादा पुरानी व डीज़ल की 15 साल से ज्यादा पुरानी गाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगाने का भी निर्देश दिया था।
एनजीटी के इस फ़ैसले के बाद “सीटिजन फॉर ग्रीन दून” नाम के एनजीओ ने परियोजना के ख़िलाफ़ कोर्ट में काम को रोकने के लिए याचिका दायर की थी।
यह सड़क परियोजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है। इस परियोजना के लिए सरकार की तरफ़ से करीब 12 हजार करोड़ रुपए की बजट आवंटित की गई है। चार राज्यों को जोड़ने वाली इस परियोजना में लगभग 880 किलोमीटर से ज्यादा सड़क का चौड़ीकरण होना है।
सामरिक, पर्यटन और धार्मिक दृष्टिकोण से चारधाम महामार्ग परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है। इस परियोजना के पूरा होते ही किसी भी मौसम में बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री की यात्रा आसान हो जाएगी।
बभनगामा गाँव का मुन्ना झा एक ब्राह्मण है। वो जनेऊ धारण करता है, कंठ में तुलसी के जड़ से बनी कंठी पहनता है, दिन में कई बार पूजा भी करता है। गाँव में घूम-घूमकर, कब एकादशी है, कब पूर्णिमा है, कब प्रदोष और कब कलश स्थापन का बेहतर मुहूर्त, मुन्ना झा सबको बताता है। रामनवमी में ध्वजा स्थापित करना हो, दुर्गा पूजा में दस दिन पाठ करना हो, या रक्षबंधन में ‘येन बद्धो बली राजा’ कहकर यजमानों के हाथ रक्षासूत्र बाँधना हो, मुन्ना झा हर काम करता है।
इसके बदले मुन्ना झा को हर फ़सल पर अपने यजमानों से दो बोझा गेहूँ, मकई या उनके खेतों की कुछ सब्ज़ियाँ मिलती हैं। अगर कोई विशेष पूजा कराई तो उसके लिए गाँव के हिसाब की दक्षिणा जो कि पेट भर भोजन और इक्यावन रुपए से आगे शायद ही जाती है। घर ईंट का है, छत छप्पर की, किवाड़ वही है जो पचास साल पहले उसके पिता ने लगवाई थी और पेंट न मिलने पर कोलतार से उसे रंग दिया था। घर में पत्नी है, पिता हैं, बच्चे हैं, माँ है, और कमाई का साधन पूजा-पाठ।
ये है बिहार के कई गाँवों का स्टीरियोटिपिकल ब्राह्मण जिसके नाम, दिल्ली के स्टूडियो में बैठे लोग, पाँच हज़ार साल पहले ‘घोड़े में बाँधकर घसीटने’ की बात कह जाते हैं, जबकि इस्लामी आक्रांताओं ने जो भी किताबें जलाने के बाद छोड़ दीं उनमें से किसी में भी ऐसा ज़िक्र नहीं है। विश्वास न हो तो ऐसे किसी गाँव में जाकर, ब्राह्मणों के घर का पता लीजिए और जाकर देखिए कि उनकी स्थिति घोड़ा तो छोड़िए अपना पेट पालने लायक भी है कि नहीं।
सामान्य वर्ग के लोगों के लिए 10% आरक्षण
ऐसे में एक विधेयक आता है कि आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाए और इनमें उन्हें भी शामिल किया जाए जो कि हैं तो सामान्य वर्ग के, जिनमें ऊँची जातियाँ आती हैं, लेकिन आर्थिक रूप से विपन्नता में जी रहे हैं। चूँकि इस देश में हर साल पाँच-सात चुनाव होते ही हैं, तो हर योजना को चुनावी जुमला कहकर नकार दिया जाता है। ऐसे लोग वही लोग हैं जो नोटबंदी के समय भी मुँह बाए रह गए थे, और इतनी देर तक खुला रखा कि जबड़ों में ऐंठन आ गई।
आरक्षण की बात करने से पहले इन माओवंशी कामपंथी लम्पटों की बात करना भी ज़रूरी है जो स्टूडियो से प्राइम टाइम में चुनावी रैली करते रहते हैं। ये वो लोग हैं जिनको हर योजना में नुक़्स निकालना है। मोदी सरकार की जितनी बड़ी योजनाएँ हैं, सबको इन्होंने ये कहकर नकारा कि ‘ये तो कॉन्ग्रेस की ही योजना थी, मोदी ने बस नाम बदल दिया है’।
मोदी ने बस नाम नहीं बदला, मोदी ने देश की सूरत बदल दी। जो योजना काग़ज़ पर नेहरू बाबू दिस योजना से चलते हुए इंदिरा देवी दैट योजना होते हुए राजीव बाबू एवरी योजना तक पहुँचती थी, उसका प्लेन बनाकर राहुल बेबी संसद में उड़ाते पाए जाते हैं। क्योंकि योजनाओं पर अमल हो या न हो, नाम का रजिस्ट्रेशन तो पहले ही हो जाता था कि योजना तो परिवार से बाहर जानी ही नहीं है। न तो कोई उससे बाहर पैदा हुआ, न किसी को पैदा होकर साँस लेने दिया गया।
मोदी ने आधारभूत संरचनाओं को ख़ुमारी से बाहर निकाला, ढाँचागत विकास किया और ऐतिहासिक क़दम लेकर समाज के सोचने की दिशा बदल दी। चाहे वो जीएसटी जैसा एक टैक्स हो, डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम हो, जन-धन का बैंक अकाउंट हो, या अभूतपूर्व गति से इन्फ़्रास्ट्रक्चर के लगातार बनते रहने की बात हो, सामान्य मानव के जीवन को हर योजना ने प्रभावित किया है।
इसी क्रम में पिछले दिनों सामान्य वर्ग के वंचितों और पिछड़े लोगों के लिए लोकसभा और राज्यसभा में दस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाला विधेयक पास हुआ। चूँकि बात आरक्षण की थी, और ये मुद्दा इतना संवेदनशील है कि न चाहते हुए भी लगभग सारी पार्टियों को इसके समर्थन में आना पड़ा। ये बात और है कि हाशिए तक पहुँचा दिए गए कई नेताओं की नींद में सर पर हथौड़ा बनकर गिरने वाले इस विधेयक ने उन्हें उलूल-जुलूल बयान देने को बाध्य कर दिया।
कुछ ने कहा कि पास ही नहीं हो पाएगा, एक ही दिन में लोकसभा में पास हो गया। फिर कहा गया कि राज्यसभा में पास नहीं होगा, दूसरे दिन वहाँ भी पास हो गया। अब कहा जा रहा है सुप्रीम कोर्ट में नहीं टिकेगा क्योंकि संविधान में 50% तक के ही आरक्षण का प्रावधान है। लेकिन, वो प्रावधान जातिगत आरक्षण के लिए है, और ये आर्थिक आधार पर दिया जाने वाला है। अतः, अगर 124वाँ संविधान संशोधन हो जाता है, तो इस क़ानून का लाभ लाखों वंचित लोग उठा पाएँगे जो कि सिर्फ़ अपनी जाति के कारण इसके दायरे से बाहर थे।
झूठ फैलाने की संगठित साज़िश
अब, जबकि यह लग रहा है कि ये क़ानून हक़ीक़त बन जाएगा, कुछ चिरकुट लोग इसके बारे में तमाम भ्रांतियाँ फैला रहे हैं जिनमें से प्रमुख ये सब हैं: ऊँची जाति के लिए है यह आरक्षण; इस विधेयक का आधार बनाकर मोदी ख़त्म कर देगा आरक्षण; इस आरक्षण ने 50% की लिमिट ख़त्म कर दी है; ₹8 लाख से कम कमाने वाले ‘व्यक्ति’ इसका लाभ ले सकेंगे।
इन चारों झूठ के आधार पर सिवाय अफ़वाहजनित हिंसा करवाने के और कुछ उद्देश्य नहीं दिखता। ये नुस्ख़ा आज़माया हुआ है। अफ़वाह फैलाओ, लोगों को सड़कों पर इकट्ठा करो और बाज़ारों में आग लगाओ, घरों में घुसकर निजी दुश्मनी निकालो, और लोगों की जान तक ले लो। अप्रैल 2018 का वो ख़ौफ़नाक मंज़र अभी भी ताजा है हमारी स्मृतियों में। दलितों को यह कहकर इकट्ठा कराया गया कि आरक्षण समाप्त किया जा रहा है, जबकि बात इतनी-सी थी कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान और नैसर्गिक न्याय के आदर्शों के हवाले से यह निर्णय दिया था कि SC/ST क़ानून के तहत सीधे गिरफ़्तारी के बजाय, जाँच होना चाहिए। बिहार और उत्तर प्रदेश चुनावों के समय भी वोट को पलटने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल हुआ था।
इन चारों झूठों की परिणति उसी अफ़वाह को हवा देने से होगी, और इसके जवाब में दंगे होंगे क्योंकि व्हाट्सएप्प पर कुछ भी मिले, उसे सत्य मानने वालों की बाइकों में पेट्रोल डालकर, हाथ में डंडे और मशाल देकर सड़कों पर उतारना बहुत आसान है। ये हुआ है, और उसका सीधा प्रभाव सरकार को हिला देने तक पहुँचता है। चूँकि संख्याबल बहुत ज़्यादा है, तो इनके आंदोलन को झेलना किसी भी सरकार या कोर्ट के लिए नामुमकिन है। यही कारण है कि संविधान के मूलभूत अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन के बावजूद उस निर्णय को सरकार ने पलट दिया।
सामाजिक न्याय की अवधारणा और जातिगत व्यवस्था की जड़ में अर्थ
सामाजिक न्याय का हक़दार सिर्फ निचली जाति के लोग नहीं है, उस पर हर नागरिक का हक़ है। साथ ही, हर उस नागरिक का हक़ है जो वास्तव में दलित और शोषित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, और सामाजिक भेदभाव कई जगह अपने सबसे विकृत रूप में व्याप्त है। लेकिन इस तथ्य से दूसरा तथ्य नहीं बदलता कि तथाकथित ऊँची जातियों के लोगों में, जो सामान्य वर्ग में आते हैं, बहुत ऐसे हैं जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बदतर है।
इसी विषय पर मेजर जनरल (रिटायर्ड) एस आर सिन्हो कमिटी का गठन हुआ था, जिस पर यूपीए सरकार बैठी रही क्योंकि जो आँकड़े सामने आए थे वो एक ऐसा सच बताते थे, जो नॉर्थ और साउथ ब्लॉक में बैठे लोगों समेत न्यूज़ स्टूडियो से रैली करने वाले एंकरों के लिए अविश्वसनीय हो सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया कि साक्षरता और प्राथमिक शिक्षा, भूमि जोत, आवास आदि पर दोनों सामाजिक समूहों के निचले स्तर पर कमज़ोर वर्ग की स्थिति बहुत अलग नहीं है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि सामान्य वर्ग की कुल आबादी का 31.2 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग है। साथ ही, यह जानना भी ज़रूरी है कि इसी रिपोर्ट से पता चला कि सामान्य वर्ग के एक तिहाई से ज़्यादा लोगों के पास कोई भूमि नहीं है और 18.2 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा से नीचे अपना जीवनयापन करते हैं।
तो क्या सामाजिक न्याय की व्यवस्था और हमारी सरकारों के लिए लगभग पाँच करोड़ से ज़्यादा ग़रीबों की संख्या का कोई औचित्य नहीं? क्या वो लोग सरकार की उन योजनाओं का हिस्सा लाभ न लें जो कि जाति के आधार पर है लेकिन उसके मूल में आर्थिक विपन्नता है? क्या उन्हें आर्थिक पैमाने पर सरकारी मदद न की जाए ताकि वो बेहतर शिक्षा पाने के लिए थोड़ी मदद पाएँ?
अगर जातिगत आरक्षण से आपको समस्या नहीं है, तो फिर आर्थिक आरक्षण से तो बिलकुल ही नहीं होनी चाहिए क्योंकि जातिगत आरक्षण की जड़ में यही अवधारणा है कि इन जातियों के लोग ग़रीब और वंचित हैं। तो अंततः क्रायटेरिया ग़रीबी ही है, जो कि कुछ जातियों में शुरु से ही ज़्यादा है। जब आरक्षण का हक़ ग़रीबों और वंचितों के लिए है, तो फिर सत्तर साल बाद भी जो ग़रीबी का दंश झेल रहे हैं, उन्हें समान अवसर क्यों न दिए जाएँ?
आरक्षण का आधार आर्थिक ही होना चाहिए
निजी तौर पर मैं आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था के ख़िलाफ़ हूँ। उसका कारण यह है कि इसका उद्देश्य समान अवसर देकर लोगों को एक समान स्थिति में लाने की बजाय वोटबैंक की राजनीति और इसके दायरे को घटाने की जगह बढ़ाने का होता जा रहा है। एक ही परिवार के लोग बेहतर स्थिति में आने के बाद भी इसका लाभ ले रहे हैं, जो कि कहीं न कहीं किसी सक्षम, कुशल या बेहतर व्यक्ति को हानि पहुँचाता है।
मेरी समझ इतनी है कि आरक्षण का लाभ सिर्फ़ शिक्षा के क्षेत्र में मिलना चाहिए और वो भी बिलकुल मुफ़्त। हर ज़रूरतमंद को शिक्षित बनाना, उसे समान शिक्षा देकर, इस स्तर पर लाना कि वो बारहवीं कक्षा के बाद स्वयं को हीन बताकर नौकरी लेने की बजाय, अपनी क्षमता बताकर नौकरी ले और स्वाभिमानी जीवन जिएँ। बारहवीं के बाद भी अगर किसी को पढ़ाई करनी है तो वहाँ भी उसे मुफ़्त शिक्षा उपलब्ध कराई जानी चाहिए क्योंकि ऐसी जगहों की फ़ीस बहुत ज़्यादा होती है।
कोई अगर शिक्षा या कौशल पाने के लिए आरक्षण चाहता है तो सरकार को हर संभव कोशिश करनी चाहिए कि आर्थिक अक्षमता उसके आड़े न आए। जब एक सामान्य नागरिक समान अवसर पाकर, अपनी क्षमता के बल पर नौकरी पाएगा तो उसे कहीं भी, किसी भी स्तर पर अपने आप को हीनभावना से देखने की ज़रूरत नहीं होगी। इसके साथ ही स्कूलों-कॉलेजों से लेकर ऑफ़िसों में होने वाले भेदभाव में कमी आएगी क्योंकि भेदभाव करने वालों की सीधी समस्या इस बात से होती है कि कोई कम नंबर पाकर भी उससे बेहतर स्थिति में पहुँच जा रहा है।
आरक्षण को कल्पवृक्ष न बनाएँ नेता
लगातार अपना पोलिटिकल कैपिटल गँवाते नेता इस दस प्रतिशत आरक्षण विधेयक के बारे में सही बात कर ही नहीं सकते क्योंकि उनके विरोधी विचारधारा के लोग इसके लिए संविधान संशोधन लेकर आए हैं। इसीलिए जिग्नेश मेवानी, अरविन्द केजरीवाल और लालू की पार्टी के लोग ट्वीट कर रहे हैं कि भाजपा की साज़िश है आरक्षण ख़त्म करने की। इनके तर्क का आधार ‘कुछ लोगों से मैंने बात की’ है।
हुकुमदेव नारायण यादव ने लोकसभा में इस विधेयक पर अपने भाषण में (विडियो नीचे संलग्न) एक पुरानी बातचीत का ज़िक्र किया जब वो लोहिया आंदोलन से जुड़े थे। तब उनके साथ कई ब्राह्मण और सवर्ण जाति के नेता भी थे। उनमें से एक नेता का नाम लेकर उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने कहा था कि जब एक दिन दलितों की सत्ता आएगी तब उन्हें ये बात याद करनी होगी कि सवर्णों में भी शोषित और वंचित हैं। तो ऐसा नहीं है कि नेताओं को यह बात मालूम नहीं थी कि ग़रीबी जाति देखकर नहीं आती, लेकिन हाँ, उस तरह के आरक्षण का समय तब नहीं आया था।
आर्थिक आधार पर आरक्षण, जिसकी शर्तें अभी भी निश्चित नहीं हैं, ऐसी व्यवस्था है जो कि सत्तर साल के दौरान जातिगत आधार पर दिए गए आरक्षण के मूल में निहित है। भविष्य ऐसा होना चाहिए कि किसी को इसकी ज़रूरत न पड़े, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत से शायद ये कभी नहीं जाएगा।
हुकुमदेव नारायण यादव लोकसभा में आरक्षण पर बोलते हुए