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उम्मीद है कि वाड्रा मैडम जान गई होंगी कि ‘Who is Smriti Irani’

साल 2014 में जब यह बात सामने आई थी कि अमेठी सीट से राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ स्मृति ईरानी चुनावी मैदान में उतरेंगी तो एक सवाल के जवाब में प्रियंका गाँधी ने पूछा था, “स्मृति ईरानी…कौन हैं?” यह वाकया एक रोड शो के दौरान हुआ था जब वो अपने भाई राहुल गाँधी के लिए चुनाव प्रचार कर रही थीं।

आज लोकसभा निर्वाचन में स्मृति ईरानी की प्रचंड जीत के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो ट्रेंड कर रहा है। राहुल गाँधी के अमेठी में चुनाव के कड़े मुक़ाबले में हारने के बाद प्रियंका गाँधी की “स्मृति ईरानी…कौन हैं?” वाली टिप्पणी कॉन्ग्रेस पर काफ़ी भारी पड़ रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रियंका के मसखरे अंदाज़ का जवाब ईरानी ने अपनी जीत सुनिश्चित करके दिया है। मतलब साफ़ है कि ईरानी ने कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी को हराकर यह दिखा दिया कि देश में लोकतंत्र की व्यवस्था है न कि राजवंश की।

लोग स्मृति ईरानी की जीत की सराहना कर रहे हैं और साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी पर कटाक्ष भी कर रहे हैं। प्रियंका गाँधी अक्सर ईरानी पर यह आरोप लगाती थी कि वो एक बाहरी व्यक्ति हैं और उन्हें अमेठी के मतदाताओं की कोई परवाह नहीं है। उनके इन बेबुनियादी आरोपों का जवाब, राहुल को न चुनकर अमेठी की जनता ने ख़ुद ही दे दिया।

कॉन्ग्रेस ने अपने गढ़ अमेठी की सीट पर इतिहास भी रचे हैं। सोनिया गाँधी ने जब 1999 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था तब उन्होंने भाजपा के संजय सिंह को 48.07% के स्पष्ट अंतर से हराया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में, राहुल गाँधी ने स्मृति ईरानी को 1.07 लाख वोटों के अंतर से हराया था, लेकिन मार्जिन का प्रतिशत पहले से बेहद कम होकर 12.33% रह गया था। 2009 में राहुल गाँधी ने भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह को 3.70 लाख से अधिक मतों के अंतर से हराकर अमेठी में जीत हासिल की थी।

भारतीय राजनीति में इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज किया जाएगा, जब गाँधी परिवार को उसके गढ़ में शिकस्त का सामना करना पड़ा। इससे पहले सोशलिस्ट पार्टी के नेता राजनारायण ने स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से हराया था।

राहुल गाँधी तो अमेठी से हार गए, क्या सिद्धू लेंगे राजनीति से सन्यास?

पिछले महीने उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा छोड़कर कॉन्ग्रेस में आए नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने घोषणा की थी कि अगर लोकसभा 2019 में अमेठी से राहुल गाँधी हार जाएँगे तो सिद्धू राजनीति से सन्यास ले लेंगे। अब चूँकि तस्वीर पूरी तरह साफ़ हो चुकी है और स्मृति ईरानी को हर जगह से जीत की बधाइयाँ मिल रही हैं, और राहुल गाँधी खुद अपनी हार स्वीकार चुके हैं तो सोशल मीडिया यूजर्स सिद्धू से उनसे इस्तीफे की माँग कर रहे हैं।

सिद्धू के एक महीने पुराने बयान को प्रासंगिक बनाया जा रहा है। ट्विटर पर लोग इंतजार कर रहे हैं कि सिद्धू अपने बयान पर कायम रह पाएँगे या नहीं। कुछ का कहना है कि अब सिद्धू राजनीति छोड़कर क्रिकेट कमेंंट्री में वापस चले जाएँगे। तो, कुछ के मुताबिक अब कैप्टन अमरिंदर सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू से राहत मिलने वाली है। ट्विटर पर यूजर्स का कहना है कि सिद्धू को केवल कॉमेडी शो को जज करना चाहिए, राजनीति उनके बस की बात नहीं हैं।

गौरतलब है 23 मई को चुनाव परिणाम साफ़ होने के बाद स्मृति ईरानी को हर ओर से बधाइयाँ मिल रही है। राहुल गाँधी ने खुद स्मृति ईरानी को संदेश देते हुए कहा कि अमेठी से स्मृति ईरानी ने जीत हासिल की है। वो चाहते हैं कि स्मृति ईरानी प्यार से अमेठी की जनता का ख्याल रखेंं। बता दें राहुल गाँधी लगातार तीन बार से अमेठी में जीत रहे थे लेकिन इन लोकसभा चुनाव में स्मृति ने उन्हें बड़ी टक्कर दी और वहाँ से जीत दर्ज कराई।

गठबंधन की ‘लालटेन’ बुझ गई बिहार में, कॉन्ग्रेस सहित सभी अँधेरे में

चुनाव परिणाम आने के बाद लगभग सभी राजनैतिक दलों की स्थितियाँ साफ़ हो चुकी हैं। एक ओर जहाँ लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत दर्ज की है वहीं कुछ राजनैतिक पार्टियाँ ऐसी भी हैं जो खाता तक नहीं खोल पाईं। बिहार में तेजस्वी यादव की नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल का कुछ यही हाल हुआ है। 17वें लोकसभा चुनाव में आरजेडी के हिस्से में एक भी सीट नहीं आई।

बिहार में आरजेडी कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करके मैदान में उतरी थी। पार्टी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं दर्ज कर पाई जबकि कॉन्ग्रेस 9 सीटों पर मैदान में उतरी थी और पार्टी को बिहार में 1 सीट मिली।

आरजेडी का गठन 1997 में हुआ था। पार्टी ने पहला चुनाव 1998 में लड़ा था तब बिहार में उन्हें 17 सीट मिली थी। इसके बाद 2014 में पार्टी को बिहार में 27 सीटें मिलीं लेकिन 2019 में आरजेडी शून्य पर ही सिमटी रह गई। कॉन्ग्रेस और आरेजेडी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली राष्ट्रीय लोक समता दल और हिंदू आवाम मोर्चा भी अपना खाता नहीं खोल पाई।

वहीं दूसरी ओर भाजपा-जेडीयू-एलजीपी के गठबंधन ने बिहार में ऐतिहासिक जीत हासिल की। भाजपा को बिहार में 17 सीटें मिलीं, जेडीयू को 16 सीटें और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति दल को 6 सीटें मिली हैं। इस गठबंधन ने बिहार में 37 सीटें जीती हैं।

हार का ठीकरा किसके सर फूटेगा यह पार्टी और मेरे बीच की बात है: राहुल गाँधी

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे सामने आने शुरू हुए तो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की पुश्तैनी सीट अमेठी भी हाथ से निकल गई, जो हमेशा से कॉन्ग्रेस का गढ़ रही है। भाजपा की फायरब्रांड नेता और स्टार प्रचारक स्मृति ईरानी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को यहाँ से हरा दिया। राहुल गाँधी की इस अप्रत्याशित हार से कॉन्ग्रेस का विश्वास डगमगा गया है। खबर के अनुसार, हार के बाद राहुल गाँधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का भी प्रस्ताव रखा। हालाँकि पार्टी प्रवक्ता सुरजेवाला ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के इस्तीफे की बात को गलत बताया। वहीं जब राहुल गाँधी से हार की जिम्मेदारी को लेकर पूछा गया तो उन्होंने कहा ये उनके और कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी के बीच की बात है।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में शनिवार (मई 25, 2019) को कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक होगी। जिसमें पार्टी की हार की वजहों पर चर्चा करने करने के साथ ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर किसी बड़े फैसले की भी उम्मीद की जा रही है।

हालाँकि मतगणना अभी जारी है, लेकिन अभी तक की गिनती के अनुसार एनडीए को 303 सीटें मिलती दिख रही हैं। भाजपा ने 298 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। फिलहाल भाजपा 4 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। वहीं कॉन्ग्रेस 52 सीटों पर ही सिमट गई है। पार्टी की हार स्वीकार करते हुए राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पीएम मोदी को बधाई दी। इसके साथ ही उन्होंने अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत पर भी बधाई देते हुए अमेठी की जनता का भरोसा कायम रखने की बात कही।

21 राज्यों/UT में खाता भी नहीं खोल पाई कॉन्ग्रेस, मोदी सुनामी में हारे कई दिग्गज

कॉन्ग्रेस 21 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में खाता खोलने में भी विफल रही है। मोदी लहर में कॉन्ग्रेस के कई दिग्गज चारों खाने चित हो गए। भोपाल से साध्वी प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को पटखनी दी। दिग्गज अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को पटना साहिब से हार का सामना करना पड़ा। भाजपा कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में धमाकेदार प्रदर्शन करती दिख रही है। ताज़ा रुझानों के अनुसार, पूर्ण बहुमत से आगे निकल चुकी भाजपा ने 300 सीटों का आँकड़ा भी छू लिया है। राहुल गाँधी अमेठी हार चुके हैं। उन्हें स्मृति ईरानी ने पटखनी दी। जिन राज्यों/UT में कॉन्ग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई है, उनके नाम हैं:

गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, ओडिशा, असम, आंध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, दादर नगर हवेली, अंडमान निकोबार, दमन दीव, लक्षद्वीप, त्रिपुरा।

Breaking: बुरहान वानी का ‘उत्तराधिकारी’ ज़ाकिर मूसा कुत्ते की मौत मारा गया

जम्मू और कश्मीर के त्राल में सुरक्षा बलों ने अंसार गज़वातुल हिन्द के आतंकी सरगना और हिज्बुल ‘पोस्टर बॉय’ बुरहान वानी के ‘उत्तराधिकारी’ माने जाने वाले ज़ाकिर मूसा को मार गिराया है। यह अभी कुछ देर पहले की ही घटना है।

ददसारा गाँव में हुए एनकाउंटर में सेना की 42वीं राष्ट्रीय राइफल, एसओजी और सीआरपीएफ ने रिपोर्टों के मुताबिक गाँव को शाम से ही घेर लिया था। उन्हें आतंकी सरगना के वहाँ होने की गुप्त सूचना मिली थी। जॉइंट टीम ने पहले तो मूसा को आत्मसमर्पण के लिए मनाने की कोशिश की। लेकिन उसने सैनिकों पर ग्रेनेडों से हमला कर दिया

सॉल्ट न्यूज़ MEME चेकर ने किया खुलासा, ‘नहीं, देश में नहीं मोदी लहर’, लिबरल गिरोह ने ली राहत की साँस

देश में मोदी लहर के रुझान के बाद आदर्श लिबरल गिरोह और पत्रकारिता के समुदाय विशेष के बीच डर का माहौल देखने को मिला है। EVM हैक होने की ख़बरों से भी खुद को और अपने जैसे ही अन्य लगभग लिबरल्स को हौसला दिला पाने में नाकाम रहे मीडिया गिरोह प्रमुखों ने आखिरकार एक बड़ा फैसला लिया है।

मीडिया गिरोह प्रमुखों ने चुनाव नतीजों के इकतरफा होने के कारण देश में होती लोकतंत्र की हत्या को देखकर कमर कसने का फैसला लिया और तुरंत एक उच्चस्तरीय आपात बैठक बुलाई। इस बैठक में रुझान देखकर बदहवास हालात में यहाँ-वहाँ एक-दूसरे को चूंटियाँ काटकर यकीन दिलाते आदर्श लिबरल को ध्यान में रखते हुए बड़े फैसले लिए गए हैं।

बिकाऊ मीडिया और बिक चुकी संस्थाओं में यकीन ना करने वाले कॉन्ग्रेस के पार्टी प्रवक्ता कुणाल कामरा फैन क्लब ने चुनाव के नतीजों का फैक्ट चेक करने का फैसला लिया है और इस फैक्ट चेक का ठेका उन्होंने MEME और फेकिंग न्यूज़ की ख़बरों का फैक्ट चेक कर के जीवनयापन करने वाले विश्वस्तरीय फैक्ट चेकर्स को देने का निर्णय लिया है। फ्री-ड्रिंकर और चिड़ियाघर के भालू नाम के इन दो कुख्यात फैक्ट चेकर्स की जोड़ी का सोशल मीडिया पर बहुत क्रेज है। कई लोगों का तो यहाँ तक मानना है कि दंत कथाओं में जिन अतापि-वतापि भाइयों का जिक्र मिलता है ये दोनों उन्हीं का पुनर्जन्म है।

सोशल मीडिया पर लोगों की जासूसी करने वाले इस फैक्ट चेक गिरोह ने आदर्श लिबरल्स की भावनाओं को 2 कौड़ी का भाव देते हुए तत्परता से चुनाव के वास्तविक रुझान का फैक्ट चेक करने की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ली है। चूँकि इन चुनावी नतीजों के बाद ही आदर्श लिबरल्स अपने नेता को स्वीकारेंगे, इसलिए इस बड़ी जिम्मेदारी को निभाने के लिए सॉल्ट न्यूज़ ने हिटलर के अंग विशेष की नाप छाप करने वाले मीडिया के नाम पर संक्रामक रोग की भी मदद माँगी है। हालाँकि, एग्जिट पोल के दिन से ही नरेंद्र मोदी की यात्रा और गुफा वाली तस्वीरों को छोड़कर इस संक्रामक मीडिया गिरोह की एक टुटपुँजिया टुकड़ी को गोभी के पत्तों में कीड़े होने की जाँच करते हुए देखा गया है। नाम न बताने की शर्त पर कुछ सूत्रों ने बताया है कि आज चुनाव के नतीजों के बाद ‘छी खल्लनखोट’ नामक यह मीडिया गिरोह अपने नाम के आगे ‘चौकीदार दी खल्लनखोट’ लगाने पर भी विचार कर रहा है।

नहीं, फैक्ट चेक में नहीं नजर आई कोई मोदी लहर

सॉल्ट न्यूज़ ने फैक्ट चेक करने के बाद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। आदर्श लिबरल गिरोह और क्रांति के चितेरों में यह देख कर उत्साह का माहौल है। मीडिया गिरोह के कुलपति ने यह चौंकाने वाला फैक्ट चेक सुनते ही खुद को रोक नहीं पाए और अपने विशेष शो में तुरंत नागिन डाँस कर के दिखा दिया। उन्होंने इसके बाद स्पष्टीकरण दिया कि जिस प्रकार बनारस में किए गए सर्वे में नरेंद्र मोदी जी द्वारा किए गए कार्यों को वो नहीं मानते हैं, उसी प्रकार चुनाव आयोग और गोदी मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे चुनाव के नतीजों को वो नहीं मानते हैं।

आदर्श लिबरल्स ने भी तुरंत ट्रोलाचार्य निष्पक्ष पत्रकार द्वारा दिए गए ‘इनपुट’ को लोल सलाम करते हुए साथी-शपथ ली कि अब वो भी उसी चुनावी नतीजों को मानेंगे, जो सॉल्ट न्यूज़ द्वारा प्रमाणित है। इसी बीच आदर्श लिबरल्स को ख़ुशी से झूमता देख सॉल्ट न्यूज़ के अतापि-वतापि ब्रदर्स ने लगे हाथ चुपके से 2 और MEME के फैक्ट चेक कर के उन्हें पढ़वाकर शाम को अपनी दुकान बढ़ाई।

वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष ने इन नतीजों के बाद अपनी ख़ुशी प्रकट करने से खुद को नहीं रोक पाई और उन्होंने बेहद सुंदर शब्दों में दिल्ली के नागरिकों की हालत पर ट्वीट करते हुए बताया कि सॉल्ट न्यूज़ के नतीजों के बाद दिल्ली में बहुत ही सुंदर माहौल है, लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे हैं। और उम्मीद जताई है कि यह चलता रहे।

वो सब हार गए जिनके लिए स्वरा भास्कर ने लिए थे नए साड़ी-ब्लाउज़, ट्विटर पर लोगों ने कहा- ‘पनौती’

चुनावी नतीजे लगभग सामने आ चुके हैं अब सिर्फ़ औपचारिक घोषणा बाकी है। ऐसे में विपक्ष को समर्थन देने वाले लोग स्पष्ट रूप से कुछ भी कहने से बच रहे हैं। स्वरा भास्कर उन्हीं लोगों में शामिल हैं जिन्होंने भाजपा को सत्ता से हटाने से लिए विपक्षी नेताओ के लिए कैंपेनिंग की थी। लेकिन मोदी लहर के आगे उनका जलवा नहीं चल पाया। वो सभी कैंडिडेट्स रुझानों में भाजपा नेताओं से पिछड़ते नजर आए, जिनकी कैम्पेनिंग करने के लिए स्वरा ने नए साड़ी ब्लाउज़ लिए थे। रुझानों के आने के साथ स्वरा को सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल किया जा रहा है। सोशल मीडिया यूजर्स के मुताबिक स्वरा सभी के लिए ‘पनौती’ साबित हुई हैं।

दरअसल स्वरा भास्कर ने आप उम्मीदवार आतिशी मार्लेना, दिलीप सिंह, राघव चड्ढा को समर्थन दिया था लेकिन इनमें से कोई भी दिल्ली में अपनी जीत हासिल नहीं कर पाया। इसके अलावा उन्होंने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह, सीपीएम उम्मीदवार आमरा राम और सीपीआई प्रत्याशी कन्हैया कुमार का प्रचार करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए।

स्वरा, कन्हैया कुमार के चुनावी प्रचार के लिए बेगुसराय तक गई थीं। उन्होंने वहाँ अपने भाषण के दौरान ‘जय हिंद, जय भीम, लाल सलाम’ का नारा तक लगाया था, लेकिन अफसोस उन्हें बेगुसराय में इसका कोई फायदा नहीं दिखा। रुझानों के मुताबिक भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह उन्हें 2 लाख वोटों से मात दे रहे हैं।

स्वरा भास्कर ने कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के लिए जम कर प्रचार किया था लेकिन साध्वी प्रज्ञा के आगे उनका जादू नहीं चल पाया। 1 लाख से ज्यादा वोटों का अंतर से साध्वी प्रज्ञा रुझानों में लीड कर रही हैं और लगातार आगे बढ़ी हुई हैं। उन्होंने आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा के लिए भी चुनावी रैली की थी लेकिन राघव को भी जबरदस्त तरीके से शिकस्त खानी पड़ी है। इसके साथ ही आतिशी भी गौतम गंभीर से हारती नजर आई और दिलीप सिंह अपनी जीत दर्ज नहीं करवा पाए।

बता दें कि स्वरा के ट्विटर पर ट्रोल होने के बाद उन्होंने एक ट्वीट किया है। जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि अगर चुनाव सिर्फ़ इसी बात पर था कि स्वरा ने कितनों को समर्थन दिया तो वो बता दें कि उन्होंने 6 प्रत्याशियों को समर्थन दिया है।

क्या भाजपा को कॉन्ग्रेस की राजनैतिक निर्ममता अब दिखानी चाहिए?

क्या भाजपा को अपने विरोधियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उनपर लगे आरोपों की सही जाँच करनी चाहिए? क्या चूक हुई जिसे कॉन्ग्रेस अभी भी सुधारना नहीं चाहती? क्या EVM हैक की गई? EVM हैक हुई है, लेकिन उसे जनता ने हैक किया। आप जनता को विकास दिखा कर हैक कर लो, किसने रोका है?

जनता समझदार है, राहुल गाँधी जी! उनको अपने जैसा मत समझिए…

बुद्धिजीवी कुछ सकुचाए, भरमाए से एक बात कह रहे हैं कि 2019 का चुनाव मुद्दों का चुनाव नहीं रहा। यह चुनाव केवल एक मुद्दे पर लड़ा गया वह है मोदी। या तो आप मोदी के लिए वोट दे रहे थे या मोदी के विरुद्ध। भाजपा की तरफ से कोई दूसरा प्रत्याशी किसी चुनाव क्षेत्र में नहीं था और दूसरी तरफ विपक्ष की ओर से भी कोई स्थानीय प्रत्याशी किसी स्थानीय प्रत्याशी के विरुद्ध नहीं खड़ा हुआ था।

चुनाव को मुद्दों का चुनाव बनाने की जिम्मेदारी विपक्ष की होती है, सत्ता में जो दल रहेगा वह तो अपना गुणगान करेगा ही। लेकिन कॉन्ग्रेस ने कुछ मुद्दे गलत चुने जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा। जो कॉन्ग्रेस  दिसंबर 2018 तक सोशल मीडिया पर बहुत आगे दिख रही थी फ़रवरी आते आते पिछड़ गयी। कॉन्ग्रेस के सामने समस्या यह भी है कि भाजपा की सरकारों ने मानदंड ऐसे स्थापित किये हैं जिनपर खरा उतर पाना और तुलना से बचना बिना कठिन परिश्रम के संभव नहीं।

न्याय योजना एक अच्छा दांव था लेकिन राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरकार अपने वादे पूरे नहीं कर पाई जिससे यह पूर्व नियोजित दांव कमजोर पड़ गया। कई स्थानों पर फॉर्म बंटवा कर वोटरों को भ्रमित करने का भी कार्य हुआ। उसके आलावा कॉन्ग्रेस  के पास न कोई मुद्दा दिखा न कोई नीयत। कॉन्ग्रेस और अन्य सभी दलों ने किसी मुद्दे को उठाने के स्थान पर मोदी को हटाने की बात पर अधिक जोर दिया जिससे एक प्रकार से मोदीजी को ही बल मिला। असीमित अपशब्दों और घृणा के बाद भी मोदीजी की यह जीत अप्रत्याशित ही नहीं विपक्ष के लिए शोध का विषय भी है।

भ्रष्टाचार का आरोप मोदी पर लगाना पानी में तेल मिलाने जैसा मुद्दा था, लेकिन कॉन्ग्रेस अपने पूरे प्रचार में इसी पर अड़ी रही। यहाँ तक कि कोर्ट से फटकार मिलने के बाद भी राहुल गाँधी क्षमा तो माँगते दिखे लेकिन वही बात दोहराते रहे। उनका सलाहकार ठीक होता तो उन्हें इस बात को बहुत पहले ही छोड़ देने को कहता। बचने का तरीका यह था कि आप कह देते कि चलिए उच्चतम न्यायलय कह रहा है तो उनका सम्मान कहते हुए हम मान जाते हैं और अगर हमारी सरकार बनी तो इस मामले में जो दोष होंगे उन्हें दूर करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि राहुल गाँधी के पूर्वज भी चुनाव में घसीट लिए गए। राफेल की बात बोफोर्स पर जाकर कॉन्ग्रेस के गले में अटक गई। व्यक्तिगत टिप्पणियाँ आज की बात नहीं हैं, चुनावों में सदा से होती आई हैं, बस आजकल सोशल मीडिया की वजह से प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है, जो पहले संभव नहीं होती थी। किसी नेता ने कुछ कहा, जब तक वह बात फैलती थी तब तक दूसरा कुछ कह देता था और जनता के मन में छोटी मोटी बातें नहीं टिक पाती थीं, अब वैसा सम्भव नहीं है। जो भी सार्वजानिक जीवन में नेता करते और कहते हैं वह एक मुद्दा होता है।

कॉन्ग्रेस को अब राहुल गाँधी के आगे सोचना होगा, एक नेता और देश के नेतृत्त्व के लिए वे स्वयं को सर्वोत्तम प्रत्याशी साबित नहीं कर पाए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वयं भी प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहते हैं और उन्हें पार्टी जबरदस्ती नेता बना कर रखना चाहती है। कहना अलग बात है और करना अलग।

अगर उनकी मानसिकता को समझा जाए तो जिस प्रकार से उन्होंने एक खबर फैलाई कि प्रियंका गाँधी वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी और फिर वे पीछे हट गए, वह उनका कमजोर पक्ष दिखाता है। सन्देश यह गया कि वे मुकाबला करना ही नहीं चाहते। उसके बाद वे कहते दिखे कि ‘वे तो सबको सस्पेंस में रखना चाहते थे और उसमे में सफल हुए हैं’। अगर उनके मन में प्रधानमंत्री का पद सँभालने की इच्छा होती तो स्वयं को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके कम से कम 400 सीटों पर चुनाव लड़ते। लेकिन वे स्वयं जीतना नहीं चाहते। वो केवल मोदी को हराना चाहते थे। अब तक वे अपनी क्षमता पर लोगों को विश्वास दिलाने में असफल ही रहे हैं। प्रियंका गाँधी से कॉन्ग्रेस ने बहुत उम्मीद लगाई थी लेकिन वे भी एक प्रकार से स्वयं को उस स्तर पर स्थापित नहीं कर पाईं जिसकी उनसे आशा थी।

कॉन्ग्रेस  को अगर आगे अपना अस्तित्त्व बचाना है और बेहतर राजनैतिक दल के रूप में उभरना है तो गाँधी परिवार के आगे सोचना होगा। कॉन्ग्रेस को अपने भूत और वर्तमान के बोझ से एक बार में मुक्ति पानी होगी। अगर पुनर्निर्माण करना है तो पूरी तरह मिटना होगा।

कॉन्ग्रेस की समस्या शक्ति के केंद्र कुछ गिने चुने परिवारों और उनके मित्रों के बीच रहना है। हेमंत विश्व शर्मा उनके सामने एक ऐसा उदाहरण है। अकेले इन्होंने पूर्वोत्तर की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। मनमोहन सिंह से बेहतर प्रधानमंत्री प्रणव मुखर्जी साबित होते लेकिन प्राथमिकताएँ और थीं। ऐसे ही अनेक प्रतिभाशाली नेता कॉन्ग्रेस के पास निश्चित होंगे लेकिन उनके पास उचित अवसर नहीं हैं।

अन्य दलों ने भी कॉन्ग्रेस की ही नीति अपनाते हुए केवल मोदी के विरुद्ध वोट करने की माँग की अपने लिए वोट नहीं माँगे, जैसे इनके पास अपनी कोई योजना नहीं है। प्रतिद्वंद्वी की छवि को बिगाड़ने के प्रयास करने से स्वयं की छवि का निर्माण नहीं हो सकता।

प्रतिभा की कमी कॉन्ग्रेस के पास भी नहीं है बीजेपी के पास नहीं, नेताओं की छवि जनता के मन में एक-सी ही है। सच कहें तो जिन्हें लोग, पिद्दी, आपिया या भक्त कहते हैं उनमे से अगर कुछ आईटी सेल वाले और कुछ कट्टर समर्थक निकाल दिए जाएँ जो कि एजेंडा को बढ़ाते हैं तो बाकी के लोग आम जनता ही हैं। चुनाव समाप्त होंगे तो अधिकतर अपने अपने काम में लग जाएँगे। किसी भी दल का समर्थक हो, सभी को वही रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार चाहिए। सभी अपने देश से प्रेम करते हैं बस सबका दृष्टिकोण अलग अलग है। अपनी दृष्टि में जो ठीक लगता है उसके साथ वे खड़े हो जाते हैं चाहे वो किसी भी दल से क्यों न हो। कल जो कॉन्ग्रेस  के साथ थे आज जो बीजेपी के साथ हैं और कल वो कॉन्ग्रेस के साथ फिर जा सकते हैं, लेकिन परिपक्व नेतृत्त्व उनकी शर्त है।

वोटर के मन में क्या था अब यह स्पष्ट हो गया है। आशा है सभी विपक्षी दल इससे कुछ सीखेंगे और फिर से सत्ता में आई मोदी सरकार राष्ट्रनिर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ेगी क्योंकि इस बार उम्मीदें पिछली बार से अधिक होंगी। विपक्ष को सलाह है कि वे लोगों की उम्मीदों पर अधिक ध्यान दें, मोदी को गिराने की जगह स्वयं को राष्ट्रनिर्माण में सहयोगी की तरह प्रस्तुत करें अन्यथा अगला चुनाव भी स्वप्न ही होगा।