भाजपा ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के खिलाफ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा नेता अनूप सिंह चंदन ने ये शिकायत भाजपा नेताओं और कार्यकर्ता के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने के लिए हसरतगंज कोतवाली पुलिस स्टेशन में दर्ज करवाई है। ओमप्रकाश राजभर ने कल (मई 17, 2019) प्रचार के दौरान गाजीपुर में मंच से भाजपा के नेताओं को गाली देने के साथ ही उनको दस-दस जूता मारने को कहा। राजभर का ये वीडियो वायरल हो रहा है। ओमप्रकाश राजभर का आरोप है कि बीजेपी नेता यह कहकर प्रचार कर रहे हैं कि एसबीएसपी और बीजेपी का गठबंधन है और राजभर की पार्टी का प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ रहा है।
BJP worker Anoop Singh Chandan has registered a complaint with the police against Suheldev Bhartiya Samaj Party Chief OP Rajbhar (in file pic) for allegedly abusing BJP workers at a public meeting yesterday, in Ghazipur. pic.twitter.com/xsA7YhIr7Z
गौरतलब है कि, हाल ही में राजभर ने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसे अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। उनकी पार्टी ने भी प्रदेश में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ लिया है। ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि भाजपा अपने वायदे पर खरी नहीं उतर सकी। उन्होंने कहा कि भाजपा ने हमें अलग से चुनाव लड़ने के लिए मजबूर किया। सत्ता में रहकर उन्होंने गरीबों के लिए जमकर लड़ाई लड़ी, उपेक्षित जातियों के लिए आरक्षण की माँग की, लेकिन कोई हल नहीं निकला।
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इसके साथ ही राजभर ने लोकसभा चुनाव में सीट बँटवारे की बात करते हुए कहा कि भाजपा ने अपने चुनाव चिह्न पर एक सीट से चुनाव लड़ने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने सुभासपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने की शर्त रखी। जिसके लिए सीएम योगी तैयार नहीं हुए। जिसके बाद ओमप्रकाश ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया।
कमल हासन ने अपने हालिया बयान में कहा है कि हिन्दू शब्द मुगलों की देन है, और यह ‘बेवकूफ़ी’ होगी कि विदेशियों की दी हुई इस पहचान से हम ‘चिपके’ रहें। उन्होंने अलवर और नयनर परम्परा के संतों को क्रमशः (केवल) वैष्णव और शैव बताते हुए दावा किया कि इन संतों ने हिन्दू शब्द का प्रयोग अपनी पहचान में नहीं किया (अतः ‘हिन्दू’ पहचान अवैध है)।
“जब हमारी अलग-अलग पहचानें हैं तो यह विदेशियों द्वारा दी गई मज़हबी पहचान ओढ़े रहना बेवकूफ़ी होगी।” ऊपरी तौर पर राष्ट्रवादी या सांस्कृतिक रूप से स्वदेशीवादी लगने वाला यह बयान असल में हिन्दुओं में आई हालिया राजनीतिक एकता को तोड़ कर दोबारा अलग-अलग जातियों, सम्प्रदायों, क्षेत्रवाद आदि में बाँट देने का कुत्सित प्रयास भर है।
मुगलों से सैकड़ों साल पुराना है ‘हिन्दू’ शब्द का उद्गम
सबसे पहले तो पहचान, धर्म, संस्कृति आदि को भूल कर केवल शब्द की उत्पत्ति की बात करते हैं। हिन्दू शब्द ‘सिंधु’ के फ़ारसी अपभ्रंश से बना है। इसका सबसे पहले इस्तेमाल मुगलों ही नहीं, इस्लाम से भी एक सहस्राब्दी (1000 वर्ष) से भी पहले का है। फारसी साम्राज्य के राजा डैरियस-प्रथम के अभिलेखों में हिन्दू शब्द का ज़िक्र ईसा से 6 शताब्दी पूर्व का है, जबकि इस्लाम ईसा से 600 साल बाद का। और मुगलों का हिंदुस्तान में आगमन तो 16वीं शताब्दी, यानि इस्लाम के अविष्कार के भी 1000 साल बाद हुआ। यानि विशुद्ध तकनीकी रूप से भी कमल हासन 22 शताब्दियों की ‘मामूली’ सी चूक कर गए हैं।
अलवर और नयनर हिन्दू ही थे, विष्णु और शिव हिन्दुओं के ही देवता हैं
यह सच है कि हमारे प्राचीनतम धार्मिक शास्त्रों में हिन्दू शब्द नहीं है, और अलवर-नयनर संत खुद को वैष्णव-शैव ही कहते थे। पर इससे किसी भी तरह से हिन्दू शब्द या पहचान की वैधता कम नहीं हो जाती, जो कि कमल हासन जताना चाहते हैं। यह उसी सनातन धर्म के विभिन्न पंथ हैं जिसे आज हिंदुत्व (या अंग्रेजों का दिया, राजनीतिक प्रत्यय वाला, ‘हिन्दूइज़्म’) कहा जाता है। इसके किसी भी पंथ के अनुयायी को उस पंथ को मानने वाला हिन्दू (जैसे शैव हिन्दू, शाक्त हिन्दू, और यहाँ तक कि नास्तिक/अनीश्वरवादी हिन्दू) ही कहा जाएगा।
अलवर-नयनर संतों ने हिन्दू शब्द का इस्तेमाल इसलिए नहीं किया क्योंकि उनके समय में (अलवर 500 से 1000 ईस्वी के थे, नयनर 6ठी से 8वीं शताब्दी ईस्वी के) इस्लामी आक्रांता हिन्दुओं के लिए गंभीर खतरा नहीं बने थे, उनसे उस समय हमारे धर्म-संस्कृति को इतना बड़ा खतरा महसूस नहीं हुआ था, अतः उनकी आस्था और अपनी आस्था में अंतरों को स्पष्टतः रेखांकित करने के लिए एक अलग छत्र-शब्द (umbrella-term) की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी, जो इस देश में पैदा हुई उपासना पद्धतियों को एकत्रित करते हुए बाहर से आ रही और हमसे बेमेल मूल्यों पर आधारित आस्थाओं के अंतर को एक शब्द-भर में रेखांकित कर सके।
कमल हासन का यह कथन हिंदुत्व को अब्राहमी (इस्लामी-ईसाई) लेंस से देखने, उनके मापदण्डों पर मापने का परिणाम है। इस्लाम और ईसाईयत की आपसी और बाकी सबसे लड़ाई ही इस बात की है कि ‘मेरा ईश्वर को लेकर विचार, मेरी पवित्र किताब ही सही हैं, मेरा पैगंबर ही अंतिम और अकाट्य है, बाकी सब गलत ही नहीं, बुरा भी है’। ज़ाहिर बात है कि इस चश्मे से देखने पर पर अलवर-नयनर क्या, हर गाँव अपना अलग ग्राम देवता, ग्राम देवी होने के नाते एक अलग पंथ, एक अलग मज़हब दिखेगा। और अंदर देखें तो पितृ-पक्ष में अलग-अलग पूर्वजों के हेतु खाना खिलाने से हर घर एक अलग अल्पसंख्यक पंथ लगेगा।
इसी अब्राहमी चश्मे से देखने पर आस्था-आधारित पहचान संकुचन लगती है कमल हासन को जब वह कहते हैं, “वाणिज्यिक राजनीति और आध्यात्म ने हमारी महान संस्कृति को महज़ एक मज़हब तकसंकुचित कर दिया है।” यह फिर से इस्लाम और ईसाईयत की चारित्रिक विशेषताएँ हिन्दू आस्था पर थोपने का प्रयास है। संकुचित विश्वदृष्टि ईसाई और इस्लामी पंथ की है (जो ‘मेरा पैगंबर/ईसा सही, बाकी गलत’ पर आधारित और संचालित हैं), हिन्दुओं की नहीं। हिन्दू दर्शन सबको अपने हिसाब से चलने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है, और यह स्वतंत्रता हमारी आस्था से ही आती है।
पहचान की राजनीति है यह वक्तव्य
यह वक्तव्य, जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है, राष्ट्रवादी/स्वदेशीवादी लगता हुआ विभाजनकारी बयान है। यह बिना कुछ बोले उत्तर-बनाम-दक्षिण, पेरियारवादी और फर्जी आर्य बनाम द्रविड़, हिंदी बनाम अहिंदी विभाजन को बढ़ावा देने के लिए है। यह केवल इस नीयत से दिया गया बयान है कि हिन्दू जब खुद को एक हिन्दू समुदाय का न मानकर इष्ट देवता, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर अलग-अलग मानेंगे तो उनके वोटों की फ़सल काटना आसान होगा। न केवल वोटों की राजनीति बल्कि चर्चों का आस्था-परिवर्तन का धंधा भी इसी कथानक (narrative) पर चलता है।
ईसाई और पेरियारवादी है कमल हासन की पृष्ठभूमि
कमल हासन की पृष्ठभूमि को देखें तो यह और भी साफ़ हो जाता है कि उनकी इस बयान के पीछे नीयत क्या है। करण थापर को दिए एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने साफ़-साफ़ बोलै है कि बचपन में वह क्रिश्चियन आर्ट्स एन्ड कम्यूनिकेशन सेंटर में काम करते थे (देखें 9:22 से 9:30 तक)।
देखें 9:22 से 9:30 तक
उनकी राजनीति को देखते हुए यह साफ हो जाता है कि उन्होंने वहाँ महज पैसों के लिए नौकरी नहीं की थी, शायद वहीं से उनकी हिन्दुओं की आस्था के लिए घृणा नींव भी रखी गई थी। इसके अलावा वह घोषित तौर पर पेरियार के प्रशंसक खुद को बता चुके हैं। उन्होंने पिछले ही साल घोषित किया था कि उनकी अपनी पहचान (भारतीय की नहीं) द्रविड़ की है।
अतः ऐतिहासिक से लेकर संदर्भित रूप से, किसी भी दृष्टि से ढूँढ़कर कमल हासन के इस वाहियात बयान में कुछ भी सकारात्मक नहीं निकाला जा सकता।
आज बुद्ध पूर्णिमा है, आज ही के दिन गौतम को बोधि वृक्ष के नीचे ‘ज्ञान’ अर्थात ‘परम बोध’ की प्राप्ति हुई थी। गौतम बुद्ध के जन्म, परम बोध और निर्वाण की तिथि एक ही थी, ऐसी मान्यता है। देखा जाए तो यह एक दुर्लभ संयोग भी है, पर जिसके साथ घटित हुआ वह कहाँ साधारण था। वह इंसान जो अध्यात्म के मार्ग पर है उसके लिए बुद्ध पूर्णिमा एक बड़ा अवसर है। सूर्य का चक्कर लगाती पृथ्वी जब सूर्य के उत्तरी भाग में चली जाती है तो उसके बाद की यह तीसरी पूर्णिमा होती है। चूँकि, आज ही के दिन उनके साथ दिव्यता घटित हुई थी, इसलिए ऐसे महान व्यक्तित्व गौतम बुद्ध की याद में इस तिथि का नाम उनके नाम पर ‘बुद्ध पूर्णिमा’ रखा गया है।
गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व में शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी, नेपाल में हुआ था। लगभग आज से ढाई हजार साल से भी पहले की बात है, आधी रात में गौतम ने घर छोड़ दिया। राजमहल के राग-रंग, आमोद-प्रमोद, मनोरंजन से वे ऊब गए, रूपवती पत्नी का प्रेम और नवजात शिशु का मोह भी उन्हें महल और भोग-विलास की सीमाओं में नहीं बाँध पाया। कहते हैं, पहले एक रोगी को देखा, जिससे उन्हें पीड़ा का अनुभव हुआ, उसके बाद एक वृद्ध को, जिससे सुन्दर शरीर के जीर्ण हो जाने का एहसास हुआ, पहली बार जरा का अनुभव हुआ और फिर एक मृत शरीर को, देखते ही जीवन की नश्वरता ने उन्हें विचलित कर दिया। मन में प्रश्नों का सैलाब उमड़ पड़ा।
कहते हैं, जैसे-जैसे ये प्रश्न गहराते गए, उनके अंतर की पीड़ा बढ़ती गई। मौजूदा भोग-विलास वाली परिस्थिति में बने रहना अब उनके लिए असंभव हो गया। एक तरफ, उन्हें जीवन बेहद मोहक, खूबसूरत और भव्य दिख रहा था, तो दूसरी तरफ सब कुछ कितना क्षणिक है, यह बोध उन्हें बेचैन कर रही थी। उनके मानस में यह कौंधा, अभी इस क्षण में जो भरापूरा है, श्रेष्ठ है, जीवंत लग रहा है, अगले ही क्षण में वह जर्जर, निर्बल और मृत हो सकता है। जीवन में जिसे हम सुख समझ कर जी रहे थे, कहीं कोई ठहराव नहीं, न ही इसका कोई ठौर-ठिकाना। गौतम का अब ऐसे जीवन में बने रहना अति दुष्कर हो गया। कहा तो यह भी जाता है कि जीवन के तीक्ष्ण सवालों से बेचैन, गौतम ने घर छोड़ा नहीं, बल्कि उनसे घर छूट गया।
घर छूटते ही गौतम की सघन खोज शुरू हो गई, उन्हें अपने मन को विचलित कर देने वाले सवालों के जवाब चाहिए थे। कहाँ जाना है, क्या करना है? कुछ भी नहीं पता था। महल छूट चुका था। अज्ञान की पीड़ा इतनी गहन थी कि वह हर ज्ञात-अज्ञात विधि और साधना पद्धति अपनाने को तैयार थे। कहा जाता है, करीब आठ साल की घनघोर साधना के बाद सिद्धार्थ गौतम बेहद कमजोर हो चुके थे।
इन आठ सालों में चार साल तक वह समाना (श्रमण) की स्थिति में रहें। समाना के लिए मुख्य साधना बस घूमना और उपवास रखना था, इसमें वे कभी भोजन की तलाश नहीं करते थे। इससे गौतम का शरीर इतना कमजोर हो गया कि वह मृत्यु के काफी करीब पहुँच गए। बाकी समय तक वह तमाम ज्ञात-अज्ञात साधना पद्धतियों से गुजरे अंततः जब वह निरंजना नदी के पास पहुँचे, जो प्राचीन भारत की कई अन्य नदियों की तरह सूख चुकी है और अब लगभग विलुप्त हो चुकी है। कहते हैं, उस वक्त यह नदी एक बड़ी जलधारा थी, जिसमें घुटनों तक पानी तेज गति से बह रहा था। सिद्धार्थ ने नदी पार करने की कोशिश की, लेकिन आधे रास्ते में ही उन्हें इतनी कमजोरी महसूस हुई कि उन्हें लगा कि अब एक कदम भी आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है। लेकिन उन्होंने हार नहीं माना। उन्होंने वहाँ पड़ी पेड़ की एक शाखा को पकड़ लिया और बस ऐसे ही खड़े रहे।
कहा जाता है, इसी अवस्था में वो घंटों खड़े रहे, कब तक खड़े रहे इस पर मतभेद है। हो सकता है कि कुछ पल ही हों, कमजोरी की हालत में एक पल भी बहुत भारी होता है। अचानक से उन पलों में ही उन्हें एहसास हुआ कि जिस बोध की उन्हें तलाश है, वह तो उनके भीतर ही है। फिर इतना संघर्ष क्यों? ऐसी जागृति के लिए जो आवश्यक है वह है अपने भीतर पूर्ण रूप से राजी हो जाना, हर तरह के विरोध का मिट जाना, और ऐसा तो अभी और यहीं हो सकता है, फिर ये भटकाव क्यों, मैं बाहर क्या खोजता फिर रहा हूँ।
जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ तो उन्हें थोड़ा सम्बल मिला, थोड़ी ताकत मिली और उन्होंने कदम-कदम बढ़ाते हुए नदी पार कर ली। इसके बाद वह पास के ही एक वृक्ष के नीचे बैठ गए जो अब बोधि वृक्ष के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि वहाँ वह इस चेतना के साथ बैठे कि जब तक मैं उस परम ज्ञान को, उस परम बोध को प्राप्त नहीं कर लूँगा, यहाँ से उठूँगा नहीं। या तो अब मैं यहाँ से एक प्रबुद्ध बन कर उठूँगा या फिर इस जर्जर शरीर को इसी अवस्था में त्याग दूँगा। उनका यह संकल्प इतना सघन था कि अगले ही पल उन्हें परम ज्ञान की प्राप्ति हो गई। शायद इसके लिए उस अवस्था में उन्हें इसी चीज की ज़रूरत थी।
तो वह दिव्य घटना बस एक पल में घटित हुई, जीवन की हर बड़ी घटना किसी न किसी क्षण में ही घटित होती है। जिस वक्त पूर्ण चन्द्रमा का उदय हो रहा था। उसी वक्त गौतम को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई। कहा जाता है वह उसी स्थान पर आनंद मुद्रा में कुछ घंटों के लिए बैठे रहें फिर उठें और इस बोध से उपजे ज्ञान का प्रथम सन्देश देने के लिए अपने उन्ही साथियों की तलाश में निकल पड़े जो समाना (श्रमण) के रूप में उनकी साधना पद्धति से प्रभावित होकर उनके साथ थे। यह भी कहा जाता है, परम बोध घटित होने के बाद जो बात सबसे पहले उन्होंने कही वह थी ‘चलो भोजन करें’ यह सुनकर वह उनके पाँचों साथी जो कालांतर में उनके प्रथम पाँच शिष्य हुए, निराश हो गए, उन्हें लगा गौतम का पतन हो चुका है। इस पर बुद्ध ने कहा, “आप गलत समझ रहे हैं, उपवास रखना महत्वपूर्ण नहीं है, जीवन में महत्वपूर्ण है जानना और आत्मसाक्षात्कार, मेरे भीतर पूर्ण चन्द्रमा उदित है, मुझे देखो, मेरे अंदर आए रूपांतरण को देखो, बस यहीं रहो।” लेकिन वे रुके नहीं उन्हें भ्रष्ट मान चले गए, कालांतर में बुद्ध ने कई सालों बाद उन्हें एक-एक करके ढूँढ निकाला और वाराणसी के सारनाथ में उन्हें ज्ञान प्राप्ति का मार्ग बताया। यही उनके पहले शिष्य हुए जिनकी प्रतीक प्रतिमा आज भी सारनाथ में मौजूद है।
इस प्रकार गौतम परम बोध के घटित होते ही बन गए बुद्ध और जिस दिन यह घटना घटी वह कहलाया ‘बुद्ध पूर्णिमा’। यहाँ एक महत्वपूर्ण सन्देश छिपा है। जो भी चीज जीवन में आप चाहते हैं, वह आपकी पूरी सघनता के साथ प्राथमिकता बन जानी चाहिए। फिर उसे मूर्त रूप लेने से कोई भी नहीं रोक सकता। प्राचीन काल से लेकर आज तक आध्यात्मिक दुनियाँ में पूरी की पूरी साधना पद्धति बस इसी बोध तक पहुँचने की तैयारी होती है। चूँकि, लोग अपने ही बनाए जंजालों में इतने उलझे हैं कि खुद को समेट कर उस एकाग्रचित बिंदु तक पहुँचने में ही उन्हें काल-कालांतर का समय लग जाता है। इस बिखराव की सबसे बड़ी वजह है हमारा हर छोटी-बड़ी चीज से खुद को जोड़ लेना। इस लिए ऐसे अवसर हैं इस जागरण को जीवन का हिस्सा बना लेने की खुद के अनावश्यक बिखराव को रोकना है। हर जगह इन्वॉल्व होने से बचना है। खुद को समेट कर परम बोध की तरफ मोड़ देना है। तभी ऐसी परम सम्भावना घटित हो सकती है।
प्राचीन काल से ही तमाम महापुरुषों ने जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया उनके लिए बुद्ध सदैव मार्गदर्शक रहे। एक प्रश्न के जबाब में सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने भी कहा, “गौतम मात्र खोज रहे थे, यह जाने बगैर कि क्या खोज रहे हैं, लेकिन खोज रहे थे। अपना राज्य, अपनी पत्नी और एक नवजात शिशु को छोडक़र एक चोर की भाँति रात में महल से भाग गए। शायद उनके परिवार ने उन्हें सबसे निष्ठुर आदमी के रूप में देखा होगा, लेकिन हम कितने खुश हैं कि अगर उन्होंने एक ऐसा कदम नहीं उठाया होता, तो यह संसार और भी गरीब होता और वे लोग जो उनके साथ रहते थे, कुछ ज्यादा बेहतर नहीं हो जाते। यह भी हो सकता था कि कुछ समय के बाद उन लोगों को कोई और दुख मिल जाता। कई भीषण परिस्थितियों से गुजरती और भयानक मोड़ लेती उनकी यह खोज एक दिन समाधान की दहलीज पर पहुँच गई।”
वैशाख पूर्णिमा की मध्य रात्रि में सिद्धार्थ गौतम, बुद्ध में रूपांतरित हो गए। वह अपनी परम चेतना में खिल उठे। अपने परम स्रोत से जुडक़र निहाल हो उठे। उनको एक ठौर मिला और वे अपने अंदर ठहर गए। उनके जीवन के सभी प्रश्न विलीन हो गए, समाधान दिन के सूरज की तरह दिखने लगा। कहते हैं, एक इंसान का अपनी परम चेतना में खिलना, उस इंसान के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के लिए बेहद मूल्यवान है। आज से ढाई हजार साल पहले जो रोशनी बुद्ध के अंदर फूटी, वो आज भी इस संसार को सही राह दिखाने के लिए पर्याप्त है।
यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते शायद आपको भी लग सकता है कि आपके ज़ेहन में भी अक्सर जीवन से जुड़े ऐसे ही सवाल आते हैं, हम भी तो जिंदगी, सुख-दुख के साथ जी रहे हैं और रोज ऐसे और इससे भी कहीं ज़्यादा भयानक दृश्यों को देखते हैं, फिर हमारे साथ ऐसा कुछ क्यों नहीं घटता। यहाँ एक चीज तो हमें माननी ही होगी कि सिद्धार्थ कोई साधारण इंसान नहीं रहे होंगे। वे चेतना, जागरूकता, बोध और बुद्धि के एक खास स्तर तक विकसित हो चुके होंगे। एक ऐसा इंसान जीवन के हर पहलू को बहुत गहराई से परखता है, उसका निरीक्षण करता है, उस पर चिंतन-मनन करता है; परिणामस्वरूप कई गहन और गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं, लेकिन वह सवालों पर ही नहीं रुक जाता। फिर उसके लिए समाधान की खोज पूरी निष्ठा और लगन के साथ करना स्वाभाविक हो उठता है।
गौतम बुद्ध के साथ जो घटित हुआ, वो इस संसार के हर इंसान के साथ घट सकता है। बस इसके लिए हमें अपने जीवन में गहराई लानी होगी। आज बुद्ध पूर्णिमा पर बुद्ध के मानवता को दिए गए महत्वपूर्ण योगदान के न सिर्फ स्मरण बल्कि उसे आत्मसात कर खुद भी उसी जागरण की दिशा में अग्रसर करने की चेतना जागृत करने का दिन है। बुद्ध ने मानवीय चेष्टा और खुद के खोज को एक नई दिशा जरूर दी। अगर जीवन में सच्ची चेष्टा और खोज हो तो हम सब अपनी साधारण जिंदगी को भव्य और विराट बना सकते हैं, यह है उनका बेबाक संदेश।
भारत की इसी पावन धरा से बुद्ध का शांति और उन्नति का सन्देश उनके अनुयायियों द्वारा पूरी दुनिया में प्रसारित किया गया। बुद्ध को एशिया का प्रकाश पुंज भी कहा जाता है। ज्ञान का यह प्रकाश भारत ही नहीं बल्कि चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल और भूटान जैसे कई देशों में फैला। जो चिर काल तक मानवता को आलोकित करता रहेगा।
बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के आवास की सुरक्षा में तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक जवान (कॉन्स्टेबल) ने शुक्रवार (मई 17, 2019) को खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। यह जवान कर्नाटक का रहने वाला था और कुछ ही दिनों पहले वो घर से छुट्टियाँ बिताकर लौटा था।
जानकारी के अनुसार, सीआरपीएफ के 224 बटालियन में तैनात गिरियप्पा किरासुर पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के पटना के सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास की सुरक्षा में तैनात था। रात में उसने अपनी सरकारी राइफल से खुद को गोली मार ली, जिससे घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई। हालाँकि, आत्महत्या का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन शुरुआती जाँच में पुलिस का मानना है कि, पारिवारिक विवाद की वजह से जवान ने आत्महत्या की है। सचिवालय के डीएसपी ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
खबर के मुताबिक, सीआरपीएफ जवान गिरियप्पा का पत्नी के साथ फोन पर विवाद हुआ था। जिसके बाद जवान ने ये कदम उठाया। फिलहाल, पुलिस की जाँच जारी है। जल्द की आत्महत्या की वजह सामने आने की उम्मीद है। गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव को लेकर राबड़ी देवी लगातार पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार कर रही है। बिहार में इस बार आरजेडी, कॉन्ग्रेस और आरएलएसपी समेत कई छोटे दल मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं।
देश में लोकसभा चुनाव 2019 का अंतिम चरण अभी बाकी है और EVM में गड़बड़ी को लेकर सवाल अभी से खड़े हो गए हैं। आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा और संजय सिंह EVM से छेड़छाड़ की शिकायत लेकर चुनाव आयोग की चौखट तक जा पहुँचे। उन्होंने मीडिया से मुख़ातिब होते हुए बताया कि उन्हें EVM से छेड़छाड़ किए जाने के अलावा चुनाव से संबंधित दस्तावेज़ों से भी छेड़छाड़ किए जाने का डर है।
दरअसल, आप नेताओं की यह चिंता चुनाव अधिकारी की एक डायरी को लेकर है जिसमें उन्होंने 12 मई को EVM का नंबर और वोट की संख्या दर्ज की थी। ख़बर के अनुसार, 4 दिन बाद ही कुछ अफ़सरों को दोबारा डायरी बनाने के लिए कहा गया। यही वो वजह है जिसकी शिकायत करने राघव चड्ढा और संजय सिंह चुनाव आयोग के दफ़्तर पहुँच गए। इतना ही नहीं राघव चड्ढा ने EVM से छेड़छाड़ के अलावा उस जगह की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई जहाँ यह EVM और पोस्टल बैलेट रखे जाते हैं।
राघव के अनुसार, EVM का फॉर्म भरने के बाद कोई बदलाव नहीं होता, लेकिन 3 विधानसभाओं में EVM के फॉर्म फिर से भरवाए गए। इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि स्ट्रॉन्ग रूम में EVM बंद होने के बाद अगर किसी तरह की कोई कार्यवाही की जाती है तो उसकी सूचना सबसे पहले प्रत्याशियों को दी जाती है। एक के बाद एक कई सवाल करते हुए राघव चड्ढा ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
इस पर यदि उनसे पूछे जाए कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उन्होंने तब सवाल क्यों नहीं खड़े किए थे, जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सर्वाधिक सीटें जीत कर दिल्ली में सरकार बनाई थी? अगर तब EVM में कोई गड़बड़ी नहीं थी और न ही उसकी सुरक्षा को लेकर मन में कोई सवाल था, तो अब क्यों?
राघव चड्ढा ने पूछा कि दक्षिणी दिल्ली लोकसभा की रिटर्निंग ऑफिसर और अन्य अधिकारी उस कमरे को क्यों खोलते हैं जहाँ पोस्टल बैलेट रखा रहता है? 13 तारीख़ को स्टॉन्ग रूम सुबह 11 बजे बंद किया गया, आख़िर 6-7 घंटे EVM कहाँ रही। वहीं, आप नेता संजय सिंह ने भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया और पूछा कि EVM के साथ जो हो रहा है इस पर आयोग क्या कर रहा है? उन्होंने भी राघव चड्ढा की बातों का समर्थन करते हुए चुनाव आयोग को ही कटघरे में रखा।
इससे पहले केजरीवाल का बयान आया था कि चुनाव के 48 घंटे पहले तक उन्हें ऐसा लग रहा था कि सातों सीटें आम आदमी पार्टी को जाएँगी, मगर आखिरी वक्त पर पूरे मजहबी वोट कॉन्ग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए।
आत्ममुग्ध बौने के नाम से विख्यात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण से ठीक एक दिन पहले बेहद भावुक होकर दावा किया है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तरह ही एक दिन उनकी भी हत्या करवा दी जाएगी। अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी उनकी जान के पीछे पड़ी है और उनका मर्डर किया जा सकता है।
दिल्ली के बाद अब अरविन्द केजरीवाल की पैनी निगाहें पंजाब में लोकसभा चुनाव पर हैं और वहाँ के लिए प्रचार कर रहे है। इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने एक मीडिया संस्थान से बात करते हुए बेहद मार्मिक बातें सामने रखी हैं। आम आदमी पार्टी ने अरविन्द केजरीवाल की इस पूरी भावुक बातचीत का पूरा वीडियो अपने ट्विटर एकाउंट पर जारी किया है।
अरविंद केजरीवाल ने कहा कि बतौर मुख्यमंत्री, उनके ऊपर 5 बार हमले हो चुके हैं और ऐसा 70 साल में नहीं हुआ है कि किसी राज्य के मुख्यमंत्री पर 5-5 बार हमले हुए हों।
‘मेरा कसूर क्या है’
अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाया कि आखिर ये हमले क्यों हो रहे हैं? इस सवाल का जवाब भी उन्होंने खुद दिया, “ये हमले क्यों हो रहे हैं, मेरा कसूर क्या है…मैंने क्या गलत कर दिया है, मेरे को कोई क्यों मारेगा?”
अरविन्द केजरीवाल ने बीजेपी का नाम लेते हुए कहा कि राजनीतिक दल उन पर हमला करवा रहे हैं। उन्होंने बेहद मार्मिक तरीके से कहा, “मैं तो लोगों के बच्चे को पढ़ा रहा हूँ, स्कूल भेज रहा हूँ, इलाज करवा रहा हूँ, मैं धर्म और पुण्य के काम कर रहा हूँ, निश्चित रूप से ये पार्टियाँ हमले करवा रही हैं। पहले तो उन्होंने पैटर्न बनवा दिया है, एक के बाद एक छोटे-छोटे हमले करवा रहे हैं, मुझे पूरा यकीन है ये बीजेपी वाले एक दिन खत्म करवा देंगे… मेरा मर्डर करवा देंगे।”
बता दें कि हाल ही में दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल को एक शख्स ने थप्पड़ रसीद कर दिया था। सीएम ने कहा कि ऐसा करके बीजेपी वाले कहेंगे कि आम आदमी पार्टी का ही कार्यकर्ता था और केजरीवाल से नाराज था। अरविन्द केजरीवाल ने कुछ सवाल उठाये और पूछा कि क्या इस तर्क के आधार पर AAP का कोई कार्यकर्ता केजरीवाल से नाराज है, तो उसे मार सकता है? कॉन्ग्रेस का कोई कार्यकर्ता कैप्टन साहब से नाराज है तो मार सकता है? बीजेपी का कोई कार्यकर्ता मोदी जी से नाराज है तो मार सकता है?
‘ये जितने आगे पीछे घूम रहे हैं, सारे बीजेपी की सरकारों को रिपोर्ट करते हैं’
इसके आगे केजरीवाल ने आगे कहा, “एक दिन मर्डर कर देंगे, कहेंगे केजरीवाल का कोई कार्यकर्ता था, नाराज था मर्डर कर दिया। आज अकेला मुख्यमंत्री हूँ, मेरी सिक्युरिटी मेरे कब्जे में नहीं है। ये जितने आगे पीछे घूम रहे हैं, सारे बीजेपी की सरकारों को रिपोर्ट करते हैं। मेरा पीएसओ भाजपा को रिपोर्ट करता है। कहीं इंदिरा गाँधी की तरह भाजपा वाले मेरे पीएसओ से खत्म करवा देंगे मेरे को…मेरी लाइफ दो मिनट के अंदर खत्म हो सकती है।”
केजरीवाल लोगों को गुमराह करते हैं- कॉन्ग्रेस
केजरीवाल के इस बयान पर कॉन्ग्रेस ने प्रतिक्रिया दी है। दिल्ली कॉन्ग्रेस के नेता जितेंद्र कोचर ने कहा कि केजरीवाल को पता है कि दिल्ली में उनका धरातल खत्म हो गया है, जमीन खिसक गई है और पंजाब में वोट बैंक की सहानुभूति पाने के लिए वह ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने कहा कि दिल्ली और पंजाब के लोग केजरीवाल की बातों में आने वाले नहीं हैं, केजरीवाल लोगों की भावनाओं से खेलते हैं, उन्हें गुमराह करते हैं, उनकी पार्टी खत्म होने की कगार पर है और वेंटिलेटर पर चली गई है।
अमेरिका से छपने वाली टाइम मैगजीन की कवर स्टोरी में आतिश तासीर द्वारा पीएम मोदी को ‘डिवाइडर इन चीफ’ लिखे जाने पर पीएम मोदी ने खुद शुक्रवार (मई 17, 2019) को इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “टाइम मैगजीन विदेशी है, लेखक खुद कह चुका है कि वह पाकिस्तान के एक राजनीतिक परिवार से आता है। यह उसकी विश्वसनीयता बताने के लिए काफी है।”
PM Modi Responds To TIME Magazine Cover Calling Him “Divider-In-Chief” https://t.co/4Qilbwb0s9
गौरतलब है कि, टाइम मैगजीन के 20 मई के संस्करण में कवर स्टोरी छपी थी जो आतिश तासीर ने लिखी थी। पीएम मोदी की तस्वीर पर डिवाइडर इन चीफ के शीर्षक के साथ ही एक विवादास्पद सवाल करते हुए लिखा था- क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र फिर से मोदी को 5 साल का मौका देने को तैयार है? आतिश तासीर द्वारा लिखे गए इस लेख पर काफी विवाद हुआ और विपक्ष को तो पीएम मोदी पर हमला बोलने का मौका मिल गया था।
इस लेख में कहा गया था कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र पहले से काफी बँट गया है। इसमें आतिश ने मॉब लिंचिंग, योगी आदित्यनाथ को यूपी का सीएम बनाना और मालेगाँव ब्लास्ट केस में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की भूमिका का जिक्र किया था। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी पर वादे पूरे न करने का आरोप लगाया और अविश्वास जताते हुए लिखा कि अब ये विश्वास करना मुश्किल लगता है कि वह उम्मीदों का चुनाव था। आतिश ने पीएम मोदी पर धार्मिक राष्ट्रवाद का जहर भरने जैसे तमाम आरोप लगाए थे।
भाजपा ने इस कवर स्टोरी को पीएम मोदी की छवि खराब करने की कोशिश बताया और इसके लिए आतिश तासीर पर पाकिस्तानी एजेंडा बढ़ाने का आरोप लगाया। वहीं, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि लेखक पाकिस्तानी हैं, और पाकिस्तान से कुछ भी बेहतर की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
पिछले कुछ दिनों से गुजरात के कुछ गाँवों में दलित जातियों के द्वारा घोड़े पर बारात निकालने पर उच्च जातियों द्वारा विरोध करने और मारपीट की खबरें आ रही थी। इसी बीच, 15 मई को भावनगर जिले के गारियाधार तहसील के वेलावदर गाँव के राजपूतों ने अनूठा उदाहरण पेश किया। यहाँ के राजपूतों ने अपनी दरियादिली दिखाते हुए न सिर्फ दलित युवक के लिए घोड़ी दी, बल्कि सुरक्षा भी मुहैया कराई और साथ ही उसकी बारात में ठुमके लगाते हुए शादी के मंडप तक पहुँचे।
भावनगर के वेलावदर में 150 घर राजपूतो के ,200 घर पटेल के,10 घर दलित के ,इसके बावजूद #दलित_दूल्हा को अपनी घोड़ी उपलब्ध करवा, बारात डीजे के साथ निकलवा कर राजपूत समाज ने मिशाल पेश की pic.twitter.com/P3Ws3Vc0nh
— BHANWER SINGH RETA (@bhanwarsareta) May 17, 2019
जानकारी के मुताबिक, वेलावदार गाँव में राजपूतों के 150, पटेलों के 200 तो वहीं दलित के सिर्फ 10 घर हैं। इसके बावजूद यहाँ कभी किसी जाति के लिए घोड़े देने से इंकार नहीं किया गया है। हाल ही में गारियाधार से जिग्नेश वणझरा नामक दलित दूल्हे की बारात वेलावदार गाँव आई थी और दूल्हे ने घोड़ी चढ़ने की इच्छा जताई जिसकी जानकारी दूल्हे के पिता ने दिगराज सिंह गोहिल को दी। गाँव में ये बात पता चलने के बाद राजपूत फौरन इसके लिए तैयार हो गए और खुद आगे बढ़कर दूल्हे को घोड़ी उपलब्ध करवाई। साथ ही वो उसके विवाह कार्यक्रम में भी शरीक हुए। इससे दूल्हे के परिजन काफी खुश हो गए।
वहीं, दिगराज सिंह ने फेसबुक पर अपने पोस्ट के जरिए लोगों से अपील करते हुए कहा कि किसी की बारात रोक कर उनको परेशान ना किया जाए। उन्होंने कहा, “एक ब्राह्मण होने के नाते मैं समाज के सभी वर्गो से कहना चाहता हूँ कि हम सब हिंदू हैं और जितना हक हमें घोड़ी पर चढ़ने का है, उतना ही हक हमारे दलित समाज के लोगों का भी है तो कृपया उनके साथ ऐसा ना करें। अगर कोई ऐसा करे तो उसे रोके। दलित समाज के साथ हम सब कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं।”
छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में दो किसानों तुलाराम मौर्य और सुखदास को कर्ज न चुकाने के आरोप में जेल भेजे जाने पर सियासत गरमा गई है। दरअसल छत्तीसगढ़ में नई बनी कॉन्ग्रेस सरकार ने किसानों का कर्ज माफ़ करने की घोषणा की थी जिसके बाद किसानों ने कर्ज नहीं चुकाया था जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।
इस प्रकरण की जाँच के लिए भाजपा किसान मोर्चा ने शनिवार (18 मई) को एक जाँच समिति बस्तर के लिए रवाना कर दी है। ख़बर के अनुसार, भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष पूनम चंद्राकर ने कर्ज़ माफ़ी की सच्चाई जानने के लिए समिति का गठन किया है। इस जाँच समिति में मोर्चा के प्रदेश महामंत्री भारत सिंह सिसोदिया, चंदन साहू, गौरीशंकर श्रीवास और दिलीप पाणिग्रही शामिल हैं।
जाँच दल की टीम पाँच अलग-अलग जगहों पर जाकर वहाँ के किसानों से बात करने के बाद प्रदेश अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। जाँच समिति के सदस्य बस्तर में गिरफ़्तार किए गए दोनों किसानों से बातचीत करेगी और पूरे मामले की जानकारी जुटाएगी। बस्तर जाने वाली टीम का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों की कर्ज़ माफ़ी के नाम पर लोगों को ठगने का काम किया है। कहने को तो कॉन्ग्रेस ने किसानों के कर्ज़ को माफ़ करने की घोषणा और दावे दोनों किए, लेकिन इसकी हक़ीक़त कुछ और ही है।
जिन किसानों द्वारा कर्ज़ का भुगतान नहीं किया गया उन्हें जेल भेजा जा रहा है। ताज़ा मामला बस्तर के दो किसानों का है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए बीजेपी ने जाँच समिति का गठन किया। दरअसल, बस्तर ज़िले के कई किसानों ने केसीसी के तहत बैंक से लोन लिया था। इन्हीं किसानों में तुलाराम और सुखदास का भी नाम शामिल है जिन्होंने बैंक से क्रमश: 10 लाख रुपए और 4 लाख रुपए का लोन लिया था, जिसके वापस न किए जाने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया।
गौरक्षक और गौहत्या जैसे शब्दों को लेकर देशभर में किस प्रकार से मेनस्ट्रीम मीडिया ने माहौल बनाने का प्रयास किया है इसका ताजा उदाहरण जम्मू कश्मीर में देखने को मिला है। जम्मू कश्मीर में मीडिया, मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने एक बार फिर अफवाह के आधार पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की पुरज़ोर कोशिश की है। लेकिन जम्मू कश्मीर पुलिस ने उनके इस प्रयास पर पानी फेर दिया है।
दरअसल, बृहस्पतिवार (मई 16, 2019) को भदरवाह में एक शख्स नईम अहमद शाह की उस वक्त गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वो अपने 2 साथियों के साथ जानवरों को लेकर अपने गाँव जा रहा था। पुलिस ने संदेह के आधार पर कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया था। मीडिया गिरोहों ने इसे ‘फ़ौरन गौ तस्करी की अफवाह के बाद दो समूहों में विवाद हुआ शांति बनाए रखने के लिए क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया’ जैसी हैडलाइन के साथ कवर किया।
जानने लायक बात यह है कि जिस क्षेत्र में यह घटना हुई, वह मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है और वहाँ केवल 7-8 ही घर हिंदू समाज के अनुसूचित वर्ग के हैं।
इस बीच गत बृहस्पतिवार दोपहर तक ये अफवाह फैलाई गई कि नईम की हत्या गौरक्षा के नाम पर की गई है। हालाँकि, पुलिस ने हत्या के कारण की कोई पुष्टि नहीं की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना के बाद सुबह भदरवाह में स्थानीय मस्जिद में सैंकड़ों लोग इकठ्ठा हुए, जिसके बाद सेरी बाजार, ताकिया चौक और पारसी बस स्टैंड में खड़े वाहनों को जलाया गया, पुलिस पर पथराव किया गया, पुलिस को भी भागकर लक्ष्मी नारायण मंदिर में शरण लेनी पड़ी।
मीडिया गिरोह इस हत्याकांड में गौरक्षकों का हाथ साबित करने पर तुले हैं
इस खबर को ‘गौहत्या’ का रूप देकर दोपहर बाद इस अफवाह को खबर बनाकर तमाम मीडिया संस्थानों द्वारा जमकर चलाया गया और नैरेटिव बनाते हुए बताया जाने लगा कि भदरवाह में एक मुस्लिम शख्स की हत्या गौरक्षकों द्वारा की गई। आजतक, एनडीटीवी, ग्रेटर कश्मीर, कश्मीर रीडर समेत कश्मीर और देश के कई निष्पक्ष मीडिया संस्थानों ने बिना पुलिस की पुष्टि के ही इस खबर को एजेंडे के तहत प्रसारित करना जारी रखा।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने किया गौहत्या वाली खबर का खंडन
इसके बाद पूरे जम्मू कश्मीर में माहौल तनावपूर्ण हो गया। कई जगहों पर हिंदू परिवारों को निशाना बनाने की कोशिश की गयी। लेकिन, पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से मामले को संभाल लिया। जम्मू कश्मीर पुलिस ने एक बयान जारी कर मुस्लिम संगठनों और मीडिया के प्रौपगैंडा का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने साफ कहा कि मीडिया गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग कर रही है, अभी तक जांच में हत्या के कारण का पता नहीं चल पाया है।
‘निष्पक्ष’ समाचार चैनल्स द्वारा साम्प्रदायिक तनाव भड़काकर ‘गौरक्षकों द्वारा गौहत्या’ जैसे मुहावरे स्थापित करने का यह प्रयास जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा विफल कर दिया गया। जम्मू कश्मीर पुलिस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से स्पष्ट करते हुए बताया कि जैसा कि कुछ मीडिया चैनल्स द्वारा दुष्प्रचार किया जा रहा है, अभी तक की छानबीन में यह पता चला है कि यह हत्या गौरक्षकों से जुड़ा मामला नहीं है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक इस हत्या के कारण से सम्बंधित कोई भी तथ्य मालूम नहीं है और समाचार चैनल्स इसे पहले ही गौरक्षकों द्वारा की गई हत्या साबित कर रहे हैं, जो कि मात्र एक अफवाह है।
Some media channels r wrongly reporting murder of a person in Bhaderwah as incident of alleged killing by Cow Vigilantes.Such irresponsible reporting is strongly rebutted as no such info has been confirmed during investigation so far.@ZPHQJammu@ndtv@radionews_jammu
मीडिया गिरोहों के साथ उमर अब्दुल्ला ने भी फैलाई गौहत्या की अफवाह
This on a day alleged cow vigilantes have killed a man in Badarwah area of Jammu – India’s Muslims fear for their future under Narendra Modi https://t.co/OWSqxehubP
उमर अब्दुल्ला के साथ ही CNN news 18 के पत्रकार भी इसे गौरक्षकों द्वारा हत्या साबित करने पर तुले हुए हैं।
No end to Kashmir killings. In two unconnected encounters, 5 militants, 2 civilians, 2 soldiers killed in South Kashmir. Man is shot by suspected cow vigilantes in Baderwah, a civilian shot at by SF and a PDP activist by militants succumb to their wounds.12 killed in last 48 hrs.
पुलवामा आतंकवादी घटना के बाद इसी तरह का नजरिया JNU की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद से लेकर मीडिया गिरोहों द्वारा फैलाया गया। देहरादून पुलिस लगातार स्पष्टीकरण देती रही कि वहाँ के विद्यार्थियों के साथ कोई हिंसा नहीं हुई है, इसके बावजूद भी ये सभी क्रांतिकारी अपनी बात पर अड़े रहे और जमकर खुद को पीड़ित बताते देखे गए। इन सभी घटनाओं की कड़ी को जोड़कर देखा जाना चाहिए कि देशभर में किस प्रकार से मीडिया गिरोहों द्वारा एक विशेष नैरेटिव तैयार करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। जाहिर सी बात है, बिना पुलिस की पुष्टि के कश्मीर में नेता, मीडिया और मुस्लिम संगठन घाटी में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा रहे हैं जिसपर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।