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क्या भाजपा को कॉन्ग्रेस की राजनैतिक निर्ममता अब दिखानी चाहिए?

क्या भाजपा को अपने विरोधियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उनपर लगे आरोपों की सही जाँच करनी चाहिए? क्या चूक हुई जिसे कॉन्ग्रेस अभी भी सुधारना नहीं चाहती? क्या EVM हैक की गई? EVM हैक हुई है, लेकिन उसे जनता ने हैक किया। आप जनता को विकास दिखा कर हैक कर लो, किसने रोका है?

जनता समझदार है, राहुल गाँधी जी! उनको अपने जैसा मत समझिए…

बुद्धिजीवी कुछ सकुचाए, भरमाए से एक बात कह रहे हैं कि 2019 का चुनाव मुद्दों का चुनाव नहीं रहा। यह चुनाव केवल एक मुद्दे पर लड़ा गया वह है मोदी। या तो आप मोदी के लिए वोट दे रहे थे या मोदी के विरुद्ध। भाजपा की तरफ से कोई दूसरा प्रत्याशी किसी चुनाव क्षेत्र में नहीं था और दूसरी तरफ विपक्ष की ओर से भी कोई स्थानीय प्रत्याशी किसी स्थानीय प्रत्याशी के विरुद्ध नहीं खड़ा हुआ था।

चुनाव को मुद्दों का चुनाव बनाने की जिम्मेदारी विपक्ष की होती है, सत्ता में जो दल रहेगा वह तो अपना गुणगान करेगा ही। लेकिन कॉन्ग्रेस ने कुछ मुद्दे गलत चुने जिसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा। जो कॉन्ग्रेस  दिसंबर 2018 तक सोशल मीडिया पर बहुत आगे दिख रही थी फ़रवरी आते आते पिछड़ गयी। कॉन्ग्रेस के सामने समस्या यह भी है कि भाजपा की सरकारों ने मानदंड ऐसे स्थापित किये हैं जिनपर खरा उतर पाना और तुलना से बचना बिना कठिन परिश्रम के संभव नहीं।

न्याय योजना एक अच्छा दांव था लेकिन राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरकार अपने वादे पूरे नहीं कर पाई जिससे यह पूर्व नियोजित दांव कमजोर पड़ गया। कई स्थानों पर फॉर्म बंटवा कर वोटरों को भ्रमित करने का भी कार्य हुआ। उसके आलावा कॉन्ग्रेस  के पास न कोई मुद्दा दिखा न कोई नीयत। कॉन्ग्रेस और अन्य सभी दलों ने किसी मुद्दे को उठाने के स्थान पर मोदी को हटाने की बात पर अधिक जोर दिया जिससे एक प्रकार से मोदीजी को ही बल मिला। असीमित अपशब्दों और घृणा के बाद भी मोदीजी की यह जीत अप्रत्याशित ही नहीं विपक्ष के लिए शोध का विषय भी है।

भ्रष्टाचार का आरोप मोदी पर लगाना पानी में तेल मिलाने जैसा मुद्दा था, लेकिन कॉन्ग्रेस अपने पूरे प्रचार में इसी पर अड़ी रही। यहाँ तक कि कोर्ट से फटकार मिलने के बाद भी राहुल गाँधी क्षमा तो माँगते दिखे लेकिन वही बात दोहराते रहे। उनका सलाहकार ठीक होता तो उन्हें इस बात को बहुत पहले ही छोड़ देने को कहता। बचने का तरीका यह था कि आप कह देते कि चलिए उच्चतम न्यायलय कह रहा है तो उनका सम्मान कहते हुए हम मान जाते हैं और अगर हमारी सरकार बनी तो इस मामले में जो दोष होंगे उन्हें दूर करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि राहुल गाँधी के पूर्वज भी चुनाव में घसीट लिए गए। राफेल की बात बोफोर्स पर जाकर कॉन्ग्रेस के गले में अटक गई। व्यक्तिगत टिप्पणियाँ आज की बात नहीं हैं, चुनावों में सदा से होती आई हैं, बस आजकल सोशल मीडिया की वजह से प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है, जो पहले संभव नहीं होती थी। किसी नेता ने कुछ कहा, जब तक वह बात फैलती थी तब तक दूसरा कुछ कह देता था और जनता के मन में छोटी मोटी बातें नहीं टिक पाती थीं, अब वैसा सम्भव नहीं है। जो भी सार्वजानिक जीवन में नेता करते और कहते हैं वह एक मुद्दा होता है।

कॉन्ग्रेस को अब राहुल गाँधी के आगे सोचना होगा, एक नेता और देश के नेतृत्त्व के लिए वे स्वयं को सर्वोत्तम प्रत्याशी साबित नहीं कर पाए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वयं भी प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहते हैं और उन्हें पार्टी जबरदस्ती नेता बना कर रखना चाहती है। कहना अलग बात है और करना अलग।

अगर उनकी मानसिकता को समझा जाए तो जिस प्रकार से उन्होंने एक खबर फैलाई कि प्रियंका गाँधी वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी और फिर वे पीछे हट गए, वह उनका कमजोर पक्ष दिखाता है। सन्देश यह गया कि वे मुकाबला करना ही नहीं चाहते। उसके बाद वे कहते दिखे कि ‘वे तो सबको सस्पेंस में रखना चाहते थे और उसमे में सफल हुए हैं’। अगर उनके मन में प्रधानमंत्री का पद सँभालने की इच्छा होती तो स्वयं को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके कम से कम 400 सीटों पर चुनाव लड़ते। लेकिन वे स्वयं जीतना नहीं चाहते। वो केवल मोदी को हराना चाहते थे। अब तक वे अपनी क्षमता पर लोगों को विश्वास दिलाने में असफल ही रहे हैं। प्रियंका गाँधी से कॉन्ग्रेस ने बहुत उम्मीद लगाई थी लेकिन वे भी एक प्रकार से स्वयं को उस स्तर पर स्थापित नहीं कर पाईं जिसकी उनसे आशा थी।

कॉन्ग्रेस  को अगर आगे अपना अस्तित्त्व बचाना है और बेहतर राजनैतिक दल के रूप में उभरना है तो गाँधी परिवार के आगे सोचना होगा। कॉन्ग्रेस को अपने भूत और वर्तमान के बोझ से एक बार में मुक्ति पानी होगी। अगर पुनर्निर्माण करना है तो पूरी तरह मिटना होगा।

कॉन्ग्रेस की समस्या शक्ति के केंद्र कुछ गिने चुने परिवारों और उनके मित्रों के बीच रहना है। हेमंत विश्व शर्मा उनके सामने एक ऐसा उदाहरण है। अकेले इन्होंने पूर्वोत्तर की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। मनमोहन सिंह से बेहतर प्रधानमंत्री प्रणव मुखर्जी साबित होते लेकिन प्राथमिकताएँ और थीं। ऐसे ही अनेक प्रतिभाशाली नेता कॉन्ग्रेस के पास निश्चित होंगे लेकिन उनके पास उचित अवसर नहीं हैं।

अन्य दलों ने भी कॉन्ग्रेस की ही नीति अपनाते हुए केवल मोदी के विरुद्ध वोट करने की माँग की अपने लिए वोट नहीं माँगे, जैसे इनके पास अपनी कोई योजना नहीं है। प्रतिद्वंद्वी की छवि को बिगाड़ने के प्रयास करने से स्वयं की छवि का निर्माण नहीं हो सकता।

प्रतिभा की कमी कॉन्ग्रेस के पास भी नहीं है बीजेपी के पास नहीं, नेताओं की छवि जनता के मन में एक-सी ही है। सच कहें तो जिन्हें लोग, पिद्दी, आपिया या भक्त कहते हैं उनमे से अगर कुछ आईटी सेल वाले और कुछ कट्टर समर्थक निकाल दिए जाएँ जो कि एजेंडा को बढ़ाते हैं तो बाकी के लोग आम जनता ही हैं। चुनाव समाप्त होंगे तो अधिकतर अपने अपने काम में लग जाएँगे। किसी भी दल का समर्थक हो, सभी को वही रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार चाहिए। सभी अपने देश से प्रेम करते हैं बस सबका दृष्टिकोण अलग अलग है। अपनी दृष्टि में जो ठीक लगता है उसके साथ वे खड़े हो जाते हैं चाहे वो किसी भी दल से क्यों न हो। कल जो कॉन्ग्रेस  के साथ थे आज जो बीजेपी के साथ हैं और कल वो कॉन्ग्रेस के साथ फिर जा सकते हैं, लेकिन परिपक्व नेतृत्त्व उनकी शर्त है।

वोटर के मन में क्या था अब यह स्पष्ट हो गया है। आशा है सभी विपक्षी दल इससे कुछ सीखेंगे और फिर से सत्ता में आई मोदी सरकार राष्ट्रनिर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ेगी क्योंकि इस बार उम्मीदें पिछली बार से अधिक होंगी। विपक्ष को सलाह है कि वे लोगों की उम्मीदों पर अधिक ध्यान दें, मोदी को गिराने की जगह स्वयं को राष्ट्रनिर्माण में सहयोगी की तरह प्रस्तुत करें अन्यथा अगला चुनाव भी स्वप्न ही होगा।

ये जनादेश श्रद्धांजलि है बंगाल के दर्जनों भाजपा कार्यकर्ताओं के बलिदान पर

अमित शाह ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि भाजपा के 80 कार्यकर्ताओं की हत्या बंगाल की चुनावी हिंसा में हुई। हम तक कुछ ही नाम पहुँचे जो मीडिया ने पहुँचाए, और बाकी नाम गुमनाम रहे। कोई पोल पर टँगा मिला, किसी की लाश पेड़ पर लटकी मिली, कोई खेत में पाया गया।

लोकतंत्र ने आज मौका दिया कि उनकी बलिदान व्यर्थ न हो। आज जब बंगाल में भाजपा ने अपनी बढ़त बनाई है और लगभग बीस सीटों पर आगे है, तब उन लोगों को भारतीय लोकतंत्र एक श्रद्धांजलि-सा देता प्रतीत होता है जिन्हें इस हिंसा और एक तानाशाह की नकारात्मकता ने लील लिया।

कुछ दुखद घटनाओं का स्मरण करें तो कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के इस्लामपुर में भाजपा कार्यकर्ता अपूर्बा चक्रवर्ती को तृणमूल के गुंडों ने बेरहमी से पीटा था। जिसके बाद से चक्रवर्ती की हालत गंभीर हो गई थी और वह उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गए थे।

इतना ही नहीं मालदा में, भाजपा ग्राम पंचायत के सदस्य उत्पाल मंडल के भाई पटानू मंडल को भी टीएमसी के गुंडों ने उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके अलावा टीएमसी के एक अन्य विधायक सोवन चटर्जी और उनके मित्र बैशाखी चटर्जी को भी कथित तौर पर एक बंगले में सिर्फ़ इसलिए कैद रखा गया था क्योंकि उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलें थीं। इतना ही नहीं पिछले साल पंचायत के चुनावों में बीजेपी उम्मीदवार की एक गर्भवती रिश्तेदार का टीएमसी के कार्यकर्ताओं द्वारा रेप तक कर दिया गया था।

यह तो कुछ नाम हैं जिनकी खबर आई। दर्जनों ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते। जिस लोकतंत्र को बचाने की बात मीडिया AC रूम में बैठकर करती है। जिस लोकतंत्र को बचाने वाले जोशीले भाषण नेता AC की हवा खाते हुए मंचों से देते हैं या फिर हम और आप जिस लोकतंत्र को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर आपस में लड़-मरते हैं, गाली-गलौज करते हैं।

दरअसल उस लोकतंत्र को अपने खून से सींचा है पश्चिम बंगाल के उन कार्यकर्ताओं ने, जिन्होंने अपनी जान न्यौछावर की। उन्होंने अपनी जान इसलिए न्यौछावर की क्योंकि उन्हें सही मायने में लोकतंत्र में विश्वास था। उनको नमन कीजिए क्योंकि आपके एक वोट की सही कीमत उन्होंने ही समझी।

मेरे मुँह पर करारा तमाचा पड़ा है, आगे और भी ज्यादा… : प्रकाश राज

लोकसभा चुनाव की मतगणना जारी है। अभी तक के रुझान को देखें तो भाजपा ने निर्णायक बढ़त हासिल कर ली है। रुझानों का परिणाम सामने आते ही प्रकाश राज की हार लगभग तय मानी जा रही है और इसके बाद से ही ट्विटर यूजर्स ने भी एक्टर को ट्रोल करना शुरू कर दिया है। ट्रोलिंग के बीच एनडीए के प्रचंड बहुमत को देखते हुए प्रकाश राज ने खुद ट्वीट करते हुए अपनी हार को स्वीकार कर लिया है।

मतगणना शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद अपनी हार को स्वीकार करते हुए एक ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “ मेरे मुँह पर करारा तमाचा पड़ा है। आगे और भी ज्यादा गालियाँ, ट्रोलिंग और अपमान का सामना करना पड़ेगा। लेकिन मैं अपनी ज़मीन नहीं छोड़ूँगा। धर्म निरपेक्ष भारत के लिए मेरी लड़ाई जारी रहेगी। एक मुश्किल सफ़र अभी शुरू हुआ है। इस यात्रा में मेरा साथ देने वालों के लिए शुक्रिया। जय हिंद।”

प्रकाश राज के इस ट्वीट पर लोगों के खूब रिएक्शन्स आ रहे हैं। काफी लोग उन्हें ट्रोल भी कर रहे हैं। लोग उन्हें सांत्वना देते हुए लिख रहे हैं कि ये तो बस शुरुआत है। वहीं कुछ ट्रोल करने वाले लिख रहे हैं कि उनके (प्रकाश राज) पास अभी भी टाइम है, मोदी से नफरत करना छोड़ दें। कुछ ने तो उन्हें डूबकर मर जाने की भी सलाह दे डाली।

प्रकाश राज बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे थे। इस सीट पर कॉन्ग्रेस के रिजवान अरशद सबसे आगे हैं, वहीं बीजेपी के पीसी मोहन दूसरे नंबर पर हैं। प्रकाश राज को अभी तक की मतगणना के अनुसार 12,000 से भी कम मत प्राप्त हुए हैं। उन्होंने पहले राउंड के आँकड़े जारी होने के तुरंत बाद मैदान छोड़ दिया था।

PM नरेंद्र मोदी को विश्वभर के नेताओं से मिलीं बधाईयाँ, जानिए किसने क्या कहा

विश्व भर के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाइयाँ और शुभकामनाएँ देनी शुरू कर दी हैं। पड़ोसी देश श्री लंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने कहा कि जनता ने मोदी के नेतृत्व पर फिर से भरोसा जताया है और वे आगे भी भारत के साथ काम करने के लिए और रिश्तों को प्रगाढ़ करने के लिए तैयार हैं।

इस्राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्यहू ने पीएम मोदी को लिखा:

भूटान के प्रधानमंत्री ने भी पूरे भूटान की तरफ से बधाई देते हुए कहा कि वे उनके नेतृत्व में भारत के आगे बढ़ने की कामना करते हैं।

मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद सोलीह ने इस जीत को ऐतिहासिक बताते हुए पीएम मोदी को बधाई दी।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी पीएम मोदी के साथ मिलकर भारत-चीन संबंधों को आगे ले जाने की बात कही।

पुर्तगाल के प्रधानमंत्री अंटोनिओ कोस्टो ने प्रधानमंत्री को बधाई देते हुए कहा कि वो भारत-पुर्तगाल संबंधों को नए सिरे पर ले जाने का हरसंभव प्रयास करेंगे।

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अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति गनी ने कहा कि उनके देश के लोग भारत से संबंधों को आगे बढ़ने के लिए भारत के साथ मिल कर काम करते रहेंगे और दोनों लोकतंत्र के रिश्ते सही होंगे।

नेपाल के नेता के पी शर्मा ओली ने भी प्रधानमंत्री को बधाई दी।

कर्नाटक में JD(S) के 17, बंगाल में TMC के 47 और MP में कॉन्ग्रेस के 6 MLA बदल सकते हैं पाला

लोकसभा निर्वाचन 2019 के नतीजे आने के साथ ही राज्यों में भी उठापटक की खबरें आनी शुरू हो गई हैं। रिपब्लिक टीवी के सूत्रों के अनुसार कर्नाटक में सत्ताधारी दल के 17 विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं।

बंगाल में भी तृणमूल के 47 विधायक पार्टी छोड़ने का मूड बना रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश में 6 विधायक कमलनाथ सरकार का साथ छोड़ सकते हैं।

ताजा अपडेट मिलने तक ममता बनर्जी ने अपने सभी विधायकों को तृणमूल कार्यालय पर बैठक के लिए बुलाया है। वहीं जनता दल (सेक्युलर) के नेताओं की बैठक भी देवगौड़ा के घर पर हो रही है। रिपब्लिक के अनुसार मुख्यमंत्री कुमारस्वामी अपने पद से त्यागपत्र दे सकते हैं।  

‘सबका साथ + सबका विकास + सबका विश्वास = विजयी भारत’

सुबह से दर्शाए जा रहे रुझानों से स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि एक बार फिर से मोदी सरकार देश की सत्ता संभालने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके अपनी खुशी को जाहिर किया है। उन्होंने लिखा है, “सबका साथ + सबका विकास + सबका विश्वास = विजयी भारत।” प्रधानमंत्री ने ट्वीट के जरिए देश को संदेश दिया कि हम साथ में बढ़ते हैं। हम साथ में समृद्ध होते हैं। हम मिलकर एक मजबूत और समावेशी भारत का निर्माण करेंगे। भारत फिर से जीता।

भारत में आज जैसा माहौल पाँच साल पहले भी हुआ था। जब भाजपा ने 16वें लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था। उस समय भी देश की जनता भाजपा की जीत को लेकर सुनिश्चित थी और परिणाम घोषणा के बाद तो इस जीत को पर्व की तरह मनाया गया था। उस वक्त भी नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया था, जिसे ऐतिहासिक पलों में शामिल होने वाला एक सबूत माना गया था। आज के दिन उस ट्वीट को याद दिलाना बहुत जरूरी है। 16 मई 2014 को प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया था, “India has won! भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।”

सोशल मीडिया पर Burnol के उपयोग को लेकर Creative हुए लोग, देखें तस्वीरें

सोशल मीडिया पर एक से बढ़कर एक पोस्ट शेयर किए जा रहे हैं। बरनौल को लेकर तरह-तरह के क्रिएटिव पोस्ट्स और ट्वीट्स शेयर किए जा रहे हैं। जिन लोगों ने मोदी लहर को मानने से अभी भी इनकार कर दिया है, उन्हें आम लोगों द्वारा बरनौल के चित्र भेजे जा रहे हैं। इन चित्रों में बरनौल को ट्रक में भर कर भेजा जा रहा है, तो किसी चित्र में विमान से बरनौल बरसाए जा रहे हैं। आए इस गैलरी में उनमें से चुनिन्दा चित्रों को देखते हैं:

ट्रक में भर-भर कर सोशल मीडिया के माध्यम से बरनौल भेजे जा रहे हैं
लड़ाकू विमानों से बम की जगह गिराए जा रहे हैं बरनौल
बरनौल क्रीम कि जगह स्प्रे का प्रयोग करने के सलाह भी दिए जा रहे है
अब तो शेयर मार्किट में भी बरनौल बनाने वाली कम्पनी के शेयर बढ़ने लगे
बरनौल पर सब्सिडी कि माँग भी की जा रही है

इसी तरह बरनौल एक बार फिर से चर्चा में है। बता दें कि बरनौल का प्रयोग शरीर के जले भागों पर किया जाता है। एक तरफ जहाँ बरनौल के शेयर में उछाल की ख़बरें हैं, ऐसे में भाजपा समर्थकों व आम लोगों के पास मोदी के ख़िलाफ़ ट्वीट करने वालों के लिए एक नया यन्त्र मिल गया है या यूँ कहें कि पुराने यन्त्र का ही नए रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

पार्टी की हार बर्दाश्त नहीं कर पाए कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष, मतगणना केंद्र पर ही हार्ट अटैक से हुई मौत

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में एक मतगणना केंद्र पर सीहोर जिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रतन सिंह ठाकुर की हार्ट अटैक से मौत हो गई। जानकारी के मुताबिक, रतन सिंह ठाकुर मतगणना केंद्र पर वोटों की गिनती देखने पहुँचे थे, लेकिन अचानक वो बेहोश होकर गिर पड़े। वहाँ पर मौजूद लोगों ने बताया कि अपने दोस्तों के साथ मतगणना केंद्र पर पहुँचे रतन सिंह नतीजे देखते हुए गश खाकर कुर्सियों पर गिर पड़े। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। ऐसा कहा जा रहा है कि वो कॉन्ग्रेस की हार का गम सहन नहीं कर पाए और उनको दिल का दौरा पड़ गया।

देशभर में लोकसभा चुनाव की काउंटिंग चल रही है। रुझानों में बीजेपी 300 से अधिक के का आँकड़ा पार करती हुई नजर आ रही है। कॉन्ग्रेस के कई दिग्गज नेता हारते हुए दिखाई दे रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी भाजपा बड़ी जीत की ओर अग्रसर है। यहाँ की 29 लोकसभा सीटों में से भाजपा 28 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि कॉन्ग्रेस को एक पर बढ़त मिलती हुई दिखाई दे रही है। भोपाल से भाजपा की साध्वी प्रज्ञा सिंह कॉन्ग्रेस के दिग्विजय सिंह से 69 हजार से अधिक मतों से बढ़त बनाई हुई हैं, जबकि गुना लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के केपी यादव से 50 हजार से अधिक वोटों से पीछे चल रहे हैं।

गौरतलब है कि, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में भाजपा ने बड़ी बाजी मारी थी। यहाँ की 29 लोकसभा सीटों में से 27 सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था, जबकि कॉन्ग्रेस केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी। लेकिन इस बार कॉन्ग्रेस की बची हुई सीटें भी भाजपा की झोली में जाती हुए दिखाई दे रही है।

सिन्हा की हार का मुंबई कनेक्शन, समझिए कैसे अपने ही पैर पर कुल्हारी मार ख़ामोश हुए शत्रुघ्न

कहते हैं, घमंड ले डूबता है। घमंड जब हद से पार हो जाए, तो न सिर्फ़ ले डूबता है बल्कि 10 बार डुबो-डुबो कर निकालता है और फिर गर्दन पकड़ के एक जोर का झटका लगाता है। घमंड की बात शुरू करने के लिए पहले चलते हैं 2009 की तरफ। उस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में पटना साहिब से भाजपा से चुनाव लड़ रहे अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को 57% से भी अधिक वोट मिले थे। अर्थात यह, कि उन्हें आधे से भी अधिक लोगों द्वारा पसंद किया गया था, वो बहुमत के साथ जीते थे। 3 लाख से भी अधिक वोट पाने वाले शत्रुघ्न के प्रतिद्वंद्वी राजद के विजय कुमार के लिए 1.5 लाख वोट जुटाना भी आफत हो गया था। सिन्हा ने इसे ‘फॉर ग्रांटेड’ ले लिया। रिकॉर्ड जीत की बात करते-करते वह पागल हो उठे।

असल में देखा जाए तो शत्रुघ्न सिन्हा की यह जीत पटना साहिब के जातीय समीकरण के अनुरूप भी थी। उन्हें टक्कर देने के लिए उम्मीदवार तो ठीक-ठाक आए लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा को भाजपा के कोर वोट के अलावा कायस्थ समाज का वोट बड़े स्तर पर मिला करता था। उन्होंने इसे भी ‘फॉर ग्रांटेड’ लिया। बिहार में कायस्थ समाज एक साथ थोक में वोट करने के लिए जाना जाता है। शत्रुघ्न सिन्हा को 2014 में मोदी लहर का अच्छा साथ मिला और उन्होंने इस बार फिर से 55% मत पाने में सफलता हासिल की। इससे उनके घमंड में और इजाफा हुआ। शत्रुघ्न सिन्हा ने ख़ुद को पार्टी से ऊपर माना और उन्होंने इस जीत को पार्टी से इतर देखा। यह शत्रुघ्न सिन्हा से ज्यादा भाजपा की जीत थी, इसे समझने में वह विफल रहे।

2014 में सिन्हा को पौने 5 लाख वोट मिले और उनके प्रतिद्वंदी कुणाल सिंह को सवा 2 लाख वोट भी नहीं आए। शत्रुघ्न सिन्हा के मन में हमेशा से यह बात चलती थी कि ये वोट उनके हैं और किसी भी हालत में उन्हें ही मिलेंगे। तभी तो उन्होंने कई मीडिया इंटरव्यू में ‘मैंने रिकॉर्ड बनाया’, ‘मैं इतने मतों से जीता’ जैसी बातें बोल कर ये जताने कि कोशिश की कि वह पार्टी से ऊपर हैं। खैर, उनकी हार के और भी कई कारण हैं, जिन्हें गिनाना ज़रूरी है। शत्रुघ्न सिन्हा अपने कायस्थ मतों को लेकर आश्वस्त थे और अभी भी अपने आप को सुपरस्टार समझते थे। जबकि, पंजाब में उनकी रैली में एक बार भीड़ नहीं जुटी, तभी उन्हें अंदाज़ा हो जाना चाहिए था कि जनता का रुख क्या है।

जीतने के बाद पटना की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखा

शत्रुघ्न सिन्हा कि सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उन्होंने दो बार जीतने के बाद भी अपने संसदीय क्षेत्र की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। इससे जनता में यह संदेश गया कि वह अपने आप को किसी भी बड़े नेता से भी ऊपर समझते हैं। वो भाजपा की बैठकों में शामिल नहीं होते थे, कार्यकर्ताओं से मिलते-जुलते नहीं थे और सिर्फ़ पार्टी की बड़ी रैलियों में ही हिस्सा लेते थे। सिन्हा द्वारा इस तरह के सौतेले व्यवहार से भाजपा के कार्यकर्ताओं के भीतर ही उन्हें लेकर असंतोष फ़ैल गया। जीत कर मुंबई और दिल्ली चले जाना और फिर संसद में 70% से भी कम उपस्थिति होना, उनके लिए नेगेटिव पॉइंट्स साबित हुए।

शत्रुघ्न सिन्हा ने अपना अधिकतर समय मुंबई स्थित आवास पर गुजारा। 2014 में ही उनकी हार के चर्चे थे लेकिन मोदी लहर और पटना में नरेन्द्र मोदी की बहुप्रतीक्षित विशाल रैली ने सारे गणित को पलट कर रख दिया। इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद उनके सामने थे, जिनका कार्यक्षेत्र पटना ही रहा है। भले ही प्रसाद राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा रहे लेकिन बिहार में जब भी ज़रूरत पड़ी, उन्होंने सक्रियता दिखाई। प्रसाद भी सिन्हा की तरह कायस्थ समाज से ही आते हैं लेकिन, प्रसाद की राह में भी एक रोड़ा था, और उसका नाम था आर के सिन्हा। आर के सिन्हा भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं और विश्व के अरबपतियों की लिस्ट (डॉलर में अरबपति) में आते हैं। आर के सिन्हा का क़द बिहार में बड़ा है, ख़ासकर कायस्थ समाज के अन्दर।

जब रविशंकर प्रसाद पटना पहुँचे तब कुछ आर के सिन्हा समर्थकों ने एअरपोर्ट पर हंगामा किया। नौबत मारपीट तक पहुँची और लोगों को ऐसा लगा कि इस आतंरिक कलह और असंतोष के कारण प्रसाद की हार हो जाएगी और सिन्हा यह सीट निकाल ले जाएँगे। लेकिन, बाद में आर के सिन्हा ने इस बात का खंडन किया कि वह नाराज़ हैं और उन्होंने अपने समर्थकों को किसी भी प्रकार की अफवाह से बचने का सन्देश दिया। शत्रुघ्न आर के खेमे के वोट को अपना मान कर चल रहे थे लेकिन अब यह साबित हो गया है कि अपने बेटे के लिए पटना साहिब सीट चाह रहे आरके सिन्हा इतने भी नाराज़ नहीं थे कि भाजपा के ख़िलाफ़ चले जाएँ।

स्वयं को अभी भी सुपरस्टार समझना

शत्रुघ्न सिन्हा अभी भी ख़ुद को सुपरस्टार मान कर चल रहे थे। विलेन से सपोर्टिंग एक्टर और फिर नायक की भूमिका में दिखे सिन्हा ने भाजपा के ख़िलाफ़ देश भर में प्रचार किया, जैसे हर जगह उनका जनाधार और उनके लाखों फैन्स हों लेकिन उनको देखने के लिए अब भीड़ नहीं आती। बिहार में अभी भी वह भीड़ जुटाने की क्षमता रखते हैं लेकिन राज्य से बाहर उनकी राजनीतिक स्थिति दयनीय हो चली है। इसका असर ये हुए कि वो अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा कि तरह ही अप्रासंगिक हो गए। कैसे हुए, यह आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

बड़ी चीज यह भी है कि भाजपा ने बड़ी चालाकी से शत्रुघ्न सिन्हा को तीन साल खुल कर पार्टी व मोदी की आलोचना करने का मौका देकर उनके क़द को एकदम से घटा दिया। भाजपा को इस बात का एहसास था कि अगर वो सिन्हा पर निलंबन की अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है तो उन्हें ख़ुद को विक्टिम के रूप में पेश करने का एक मौक़ा मिल जाएगा और इसी कारण वो जनता के एक हिस्से में सहानुभूति का पात्र बनने की कोशिश करेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा विपक्षी रैलियों का हिस्सा बनने पर भी उन्हें निलंबित नहीं किया गया।

वो पार्टी से निलंबन चाहते भी थे ताकि ये मीडिया में चर्चा का विषय बने और वो दूसरी पार्टी में पूरे धूम-धड़ाके से शामिल हों लेकिन उनका ये स्वप्न धरा का धरा रह गया। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ सिन्हा अप्रासंगिक होते चले गए। उनकी बातों की गंभीरता ख़त्म हो गई और उन्हें मीडिया कवरेज भी अपेक्षाकृत कम मिलने लगा। इसके उलट अगर भाजपा उन्हें निलंबित करती तो ये बात मीडिया में छा जाती और उन्हें फिर से उनकी खोई हुई लोकप्रियता का कुछ हिस्सा वापस मिल जाता। भाजपा ने जिस रणनीति से काम लिया, उस कारण उन्हें मजबूरन कॉन्ग्रेसी होना पड़ा, बिना किसी ख़ास मीडिया कवरेज के।

लखनऊ में सपा प्रत्याशी की पत्नी का प्रचार

शत्रुघ्न सिन्हा इतने आत्मविश्वासी हो गए कि उन्होंने कॉन्ग्रेस में रहते हुए लखनऊ जाकर अपनी पत्नी के पक्ष में प्रचार किया। वह डिंपल यादव के साथ प्रचार करते दिखे और अपनी पत्नी पूनम सिन्हा के लिए कई दिनों तक वहाँ कैम्प किया। अति आत्मविश्वासी सिन्हा ने अपने आप को एक बार फिर पार्टी से ऊपर समझा और लखनऊ से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी प्रमोद कृष्णन उनसे नाराज़ नज़र आए। कुल मिलाकर देखा जाए तो अब शायद उन्हें अगले पाँच सालों के लिए कोई मीडिया कवरेज ही ना मिले। उन्हें जो भी मीडिया कवरेज मिल रही थी, इस हार के बाद उसके भी ख़त्म हो जाने के आसार हैं।

शत्रुघ्न सिन्हा की पटना में बुरी हार हुई और लखनऊ में उनकी पत्नी पूनम सिन्हा की और भी बुरी हार हुई। सिन्हा दम्पति के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी बेटी अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने भी प्रचार किया था। तमाम विपक्षी दलों का लाडला होने के बावजूद सिन्हा की हार के पीछे उनकी व्यक्तिगत विफलता छिपी है। भले ही पूरे देश में यह कॉन्ग्रेस की हार हो लेकिन पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा को यह बहुत बड़ा व्यक्तिगत झटका है। ऊपर से रविशंकर प्रसाद की स्पष्ट और अविवादित छवि ने भी सिन्हा के विरोध में काम किया। अब वह वोटरों द्वारा नकारे जा चुके हैं।