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BSE ने कहा: ‘शट अप या कुणाल!’ हमारी बिल्डिंग का दुरुपयोग मत करो वर्ना कानूनी कार्रवाई करेंगे

कुणाल कामरा बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के BSE भवन के चित्र के साथ छेड़खानी करते पकड़े गए हैं। कॉमेडियन कुणाल कामरा को उनके कृत्य के लिए BSE ने कड़ी फटकार लगाई है। साथ ही सोशल मीडिया कुणाल द्वारा शेयर की गई फ़र्ज़ी तस्वीरों के लिए उनकी कड़ी निंदा भी की।

BSE ने एक ऐसी इमेज का ज़िक्र किया जिसे कामरा ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर की थी। उस इमेज में BSE की इमारत और उसके नीचे एक और चित्र था जिसमें ‘मोदी को वोट न देने’ की बात लिखी थी।

कामरा के सेंस ऑफ़ ह्यूमर से स्टॉक एक्सचेंज (Bourse) के लोग बहुत नाराज़ हुए और उन्होंने इस पर अपनी निराशा व्यक्त की। BSE ने यहाँ तक ​​ट्वीट किया कि उनके पास कामरा के ख़िलाफ़ उचित क़ानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है। कामरा, अपने प्रचार में, एक अभियान चलाकर अपने साथियों से मोदी को वोट न देने की अपील कर रहे हैं। मोदी विरोधी प्रचार चलाने के लिए अपनी बोली में, कामरा ने शेयर बाज़ार की बिल्डिंग की तस्वीर का इस्तेमाल किया, जिससे शेयर बाज़ार में खलबली का माहौल बन सकता है।

अपनी ग़लती मानने के बजाय कि कुणाल ने हद पार कर दी। फेक इमेज का इस्तेमाल कर अपने मंतव्यों को हँसी-ठिठोली का नाम दिया। कामरा के लिए स्टॉक एक्सचेंज का मजाक उड़ाना किसी मनोरंजन से कम नहीं है।

आख़िर कौन है ये कुणाल कामरा

कुणाल कामरा एक भारतीय स्टैंड-अप कॉमेडियन हैं जो सोशल मीडिया में अपनी कॉमेडी के लिए जाने जाते हैं। वह आज भारत में देशभक्ति और सरकार पर अपने व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के लिए चर्चा में बने रहते हैं। इसके अलावा कामरा यूट्यूब पर ‘Shut Up Ya Kunal’ पॉडकास्ट होस्ट करते हैं।

इससे पहले भी वह कॉन्ग्रेस नेता नगमा मोरारजी को मोदी-विरोधी एजेंडे को पूरा करने के लिए फोटोशॉप्ड इमेज से भ्रम फैलाते पकड़े गए थे। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता ने हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी की मौत की फेक न्यूज़ फैलाई थी। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से व्यंग्यात्मक ख़बरों को वास्तविक ख़बर बनाकर उसका प्रचार-प्रसार किया गया था। पत्रकार प्रीतीश नंदी को भी फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाते पकड़ा जा चुका है।

गला दबने से हुई रोहित शेखर की मौत: पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पुलिस ने दर्ज किया हत्या का मामला

यूपी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत में कल (अप्रैल 19, 2019) एक नया खुलासा हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मालूम चला कि उनकी मौत हॉर्ट अटैक से नहीं, बल्कि गला, मुँह और नाक दबने के कारण हुई है। जिसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि रोहित को पहले नशीला पदार्थ दिया गया, उनके बेसुध होने पर उनकी हत्या कर दी गई।

गुरुवार (अप्रैल 18, 2019) को पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। क्राइम ब्राँच ने आईपीसी धारा 302 के तहत इस मामले को हत्या का केस दर्ज किया। इसके बाद पुलिस रोहित के घर मामले की जाँच करने पहुँची। यहाँ क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने रोहित के सौतेले भाई और नौकरों से पूछताछ की।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि रोहित की मौत 16 अप्रैल की देर रात 2 (अस्पताल लाने से 14 घंटे पहले) बजे हुई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रोहित की गर्दन की दो हड्डियाँ टूटी हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एम्स के फॉरेंसिक विभाग के हेड सुधीर गुप्ता ने बताया कि रोहित की मौत प्राकृतिक नहीं है। इस जाँच में मेडिकल इंस्टीट्यूट के 5 वरिष्ठ डॉक्टर शामिल थे जिन्होंने इस पूरी जाँच का वीडियो भी बनाया है। जाँच के बाद पाँचों डॉक्टरों का यही कहना है कि रोहित की मौत गला दबाने से हुई है।

गौरतलब है कि शेखर को दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में मृत घोषित किया गया, लेकिन अस्पताल ने अपने कागज़ों में उनकी मौत के कारण का खुलासा नहीं किया था। बता दें कि दिल्ली पुलिस के संयुक्त कमिश्नर देवेश श्रीवास्तव के मुताबिक मंगलवार को दिन में रोहित की नाक से अचानक खून बहने लगा था। उनकी माँ उज्ज्वला पहले ही अपनी मेडिकल जाँच के लिए किसी अस्पताल में भर्ती थीं और रोहित घर पर अकेले थे। उन्हें एम्बुलेंस से आनन-फानन में मैक्स अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

12 डिब्बे पलटे, कई घायल: हावड़ा से दिल्ली आ रही पूर्वा एक्सप्रेस का कानुपर में Accident, हेल्पलाइन नंबर जारी

शुक्रवार (अप्रैल 20, 2019) की देर रात हावड़ा से नई दिल्ली आते हुए पूर्वा एक्सप्रेस (ट्रेन संख्या: 12303) एक दुर्घटना की शिकार हो गई। खबरों की मानें तो ट्रेन दो हिस्सों में बँटने के कारण देर रात बेपटरी हो गई थी। जिसके कारण ट्रेन के 12 डिब्बे पलट गए। इस घटना में कुछ यात्रियों के घायल होने की भी खबर है।

रेलवे की मानें तो इस घटना में एक आदमी को छोड़कर किसी यात्री को गंभीर चोट नहीं आई है। रेलवे ने पूछताछ और सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर (033) 26402241, 26402242, 26402243, 26413660 जारी किए हैं।

गौरतलब है कि यह ट्रेन कानपुर से 15 किलोमीटर दूर रूमा कस्बे के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई। रात के 2:30 बजे जिलाधिकारी, 30 एंबुलेंस, एसएसपी, फायर ब्रिगेड और पुलिस मौके पर पहुँची और राहत बचाव कार्य शुरू हुआ।

घायलों को वहाँ के करीबी काँशीराम ट्रॉमा सेंटर और हैलट अस्पताल में इलाज के लिए भेजा गया। इस हादसे के कारण 11 अन्य ट्रेनों को रद्द किया गया है और कई ट्रेनों को डायवर्ट किया गया है। घटना में 14 लोगों के घायल होने की खबर सामने आ रही है।

बताया जा रहा है कि रात के 1:00 बजे ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दिल्ली की ओर आ रही थे, तभी कानपुर से करीब 15 किलोमीटर पहले ही ट्रेन रूमा इंडस्ट्रियल एस्टेट के पास अचानक से दो हिस्सों में बँट गई। जिसके कारण जोरदार आवाज आई और ट्रेन के यात्रियों में हड़कंप मच गया।

रेलवे का कहना है कि जाँच के बाद हादसे की वजह पता चलेगी। फिलहाल कानपुर सेंट्रल से एक स्पेशल ट्रेन के जरिए करीब 900 यात्रियों को नई दिल्ली के लिए भेजा गया है।

सेना से सबूत माँगने वाले जब हेमंत करकरे के लिए बिलबिलाते हैं तो क्यूट लगते हैं

कई बार हमने हॉलीवुड और बॉलीवुड की फ़िल्मों में देखा है कि पूरे डिपार्टमेंट की इज़्ज़त बचाने के लिए एक गंदे अफसर को डिपार्टमेंट स्वयं ही मार देती है, और उसे शहीद का दर्जा दे दिया जाता है। इससे दोनों समस्याएँ सुलझ जाती हैं कि पब्लिक में पुलिस या सेना जैसी संस्था पर विश्वास बना रहता है, और डिपार्टमेंट से एक भ्रष्ट या सड़ा सेव बाहर कर दिया जाता है।

साध्वी प्रज्ञा की बहन और कर्नल पुरोहित की पत्नी का इंटरव्यू पढ़िएगा या देखिएगा कहीं से खोज कर। सेना के एक डेकोरेटेड अफसर पर हिन्दू टेरर का टर्म पोलिटिकल मास्टर्स को खुश करने के लिए ही गढ़ा गया था। उसका और कोई औचित्य नहीं था। इसके लिए सबूत चाहिए थे, धाराओं को संतुष्ट करने के लिए घटनाएँ चाहिए थीं, और उसके लिए लोग चाहिए थे।

आरवीएस मणि जो उस समय सरकारी अफसर थे, उन्होंने बताया है कि हेमंत करकरे की इसमें कितनी इन्वॉल्वमेंट थी और वो दिग्विजय सिंह के साथ गृहमंत्री पाटिल के साथ क्या करते थे। करकरे को सरकार और डिपार्टमेंट ने सम्मान दिया क्योंकि करकरे की असामयिक मृत्यु हो गई। अगर करकरे ज़िंदा होते तो शायद उन पर हिन्दू टेरर गढ़ने और झूठे केस बनाने के आरोप पर मामले चल रहे होते। या, करकरे कॉन्ग्रेस की योजना को सफल करके इस्लामी आतंक में मज़हब के न होने और चार लोगों के ब्लास्ट में संलिप्त होने की कहानी के आधार पर पूरा हिन्दू समाज भगवा आतंक का धब्बा लिए जी रहा होता।

मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा कि समुदाय विशेष को भी गलत आरोप और अपराध के नाम फँसाया गया है लेकिन न्याय का एक सीधा दर्शन है कि हजार गुनहगार छूट जाएँ लेकिन किसी भी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। आप जब उन यातनाओं के बारे में सुनिएगा तो शायद समझ में आएगा कि आज अगर साध्वी प्रज्ञा ने हेमंत करकरे को शाप देने की बात कही, तो वो किसी भी रूप में ज़्यादती नहीं।

ज़्यादती इसलिए नहीं कि इसी देश के वही बुद्धिजीवी सेना द्वारा मारे आतंकियों के भाई द्वारा हथियार उठा लेने को जस्टिफाय करते हैं, सेना के अफसर द्वारा डाँटे जाने के बाद पुलवामा जैसी घटना करने वाले को जस्टिफाय करते हैं, आतंकी के बाप का हेडमास्टर होना और आतंकी के बेटे का दसवीं एग्ज़ाम पास करना ऐसे शेयर करते हैं जैसे उनका आतंकी होना मामूली बात थी, और आतंकी भाई या आतंकी बाप के मारे जाने के बाद, बदले की भावना में कोई बेटा या भाई आतंकी बन जाए तो उसके पास पर्याप्त कारण हैं, ऐसा मानते हैं, उनके लिए यह सोचना दुखप्रद है कि एक आम नागरिक को लगभग दस सालों तक यातनाएँ दी गईं, और वो उन लोगों के खिलाफ कुछ कहे!

साध्वी प्रज्ञा पर जो बीती है, वो हम या आप महसूस भी नहीं कर सकते। हेमंत करकरे एक भ्रष्ट अफसर थे या नहीं, यह तो बाद की बात है, लेकिन क्या किसी की रीढ़ की हड्डी तोड़ देना, उसे अश्लील फ़िल्में दिखाना, लगातार पीटना, गोमांस खिलाना, यह जान कर कि वो एक धार्मिक महिला है, उस यातना को झेलने वाली स्त्री को वैसे अफसर के खिलाफ बोलने का भी हक़ नहीं?

क्यों? क्योंकि वो चुनाव लड़ रही है? उसके तो चुनाव लड़ने पर भी आपको आपत्ति है कि चूँकि उस पर आरोप है, तो वो आतंकी हो गई। इस हिसाब से तो आधे नेता चोर, बलात्कारी, या हत्यारे हैं क्योंकि सब पर केस तो हैं ही। फिर आप किस पार्टी या नेता को समर्थन दे रहे हैं? आपको कोई हक़ ही नहीं है साध्वी प्रज्ञा के निजी अनुभवों के आधार पर यातना देने वाले अधिकारी को शापित करने पर उन्हें कोसने का।

आपकी समस्या है कि आपको आपके विरोधी में आदर्शवाद देखना है। आपको सेना के जवानों से सबूत माँगते वक्त लज्जा नहीं आई, आपको एयर स्ट्राइक पर यह कहते शर्म नहीं आई कि वहाँ हमारी वायु सेना ने पेड़ के पत्ते और टहनियाँ तोड़ीं, आपको बटला हाउस एनकाउंटर वाले अफसर पर कीचड़ उछालते हुए हया नहीं आई, लेकिन किसी पीड़िता के निजी अनुभव सुनकर आपको मिर्ची लगी कि ये जो बोल रही है, वो तो पूरी पुलिस की वर्दी पर सवाल कर रही है।

इस देश का संविधान और कानून साध्वी प्रज्ञा को चुनाव लड़ने की भी आज़ादी देता है, और उसे अपनी अभिव्यक्ति का भी मौलिक अधिकार है। बात यह नहीं है कि कल को वो अपराधी साबित हो गई तो? बात यह है कि अभी वो अपराधी नहीं है, और हेमंत करकरे भले ही अपना पक्ष रखने के लिए ज़िंदा न हों, पर इतने सालों की यातना झेलने के बाद, एनआईए द्वारा चार्ज हटा लिए जाने और राहत पाकर बाहर आई इस महिला को कड़वे वचन कहने का हक़ है।

डिपार्टमेंट हेमंत करकरे को सम्मानित मानता रहे, देश भी माने लेकिन खोजी प्रवृत्ति के पत्रकार इस विषय पर शोध करना मुनासिब नहीं समझते क्योंकि ये उनकी विचारधारा को सूट नहीं करता। मेरा तो बस यही कहना है, जैसे कि बड़े पत्रकार अकसर हर बात पर कह देते हैं, कि जाँच करवाने में क्या है। करवा लीजिए जाँच करकरे की भी और साध्वी प्रज्ञा की भी। करवाते रहिए जाँच कि किसने आरडीएक्स रखवाए थे और क्यों।

मृतक का सम्मान करना ठीक है, समझदारी भी इसी में है कि अगर पुलिस नामक संस्था की इज़्ज़त बचाने के लिए किसी घटिया पुलिसकर्मी को मेडल भी देना पड़े तो दे दिया जाना चाहिए, लेकिन किसी के जीवन के दस-दस साल बर्बाद करने, उन्हें लगातार टॉर्चर करने वालों के खिलाफ पीड़िता अपना दुःख भी न बाँटे?

और हाँ, जैसा कि ऊपर लिखा, राजनीति है यह। राजनीति में शब्दों से सत्ता पलटी जा सकती है। हिन्दू टेरर भी शब्द ही थे। यहाँ आदर्शवाद को बाहर रखिए। यहाँ हर शब्द तौल कर बोले जाएँगे और हर तरफ से बोले जाएँगे। आपको किसी पीड़िता के द्वारा किसी आततायी को शाप देने पर आपत्ति है कि वो लोकसभा चुनाव लड़ रही है, फिर ‘ज़हर की खेती’, ‘मौत का सौदागर’, ‘भड़वा’, ‘दल्ला’, ‘दरिंदा’, ‘आतंकवादी’ पर आपको आपत्ति क्यों नहीं होती?

या तो आपने हर सच को परख लिया है, आपने हर बयान का सच जान लिया है, या फिर आप अपनी विचारधारा से संबंध रखने वालों के लिए सहानुभूति रखते हैं, और विरोधी विचारों के लिए आप असहिष्णुता दिखाते हैं। साध्वी प्रज्ञा ने भले ही अपने बयान पर खेद व्यक्त किया हो, लेकिन वो एक राजनैतिक निर्णय है, निजी नहीं। इतने समझदार तो आप भी हैं।

कॉन्ग्रेस शासन के अधिकारी RVS मणि ने बयान किया हेमंत करकरे और ‘भगवा आतंक’ के झूठ का सच

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को ‘भगवा आतंक’ के एक भयावह सिद्धांत को मूर्त रूप देने के लिए कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा मकोका के तहत जेल में बंद, प्रताड़ित और भयंकर रूप से तोड़ देने के लिए निर्ममता की सारी हदें पार करते हुए टॉर्चर किया गया था। उनके ऊपर की गई बर्बरता की कहानी वह कई बार सुना चुकी हैं। फिलहाल, वह औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ मध्य प्रदेश के भोपाल से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। दिग्विजय सिंह, वह शख़्स हैं जो ‘भगवा आतंक’ सिद्धांत के प्रमुख प्रस्तावक हैं। जबकि ऐसा उन्होंने बिना किसी अधिकृत पोस्ट पर रहते हुए किया था। इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस का हाथ विनाश और देश की मूल आत्मा को खोखला करने की हर लीला के पीछे कितनी गहराई से शामिल रहा है। इतिहास को जितना कुरेदा जाएगा कॉन्ग्रेस का उतना ही वीभत्स चेहरा सामने आएगा।

अब जबकि साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी और राजनीति में उनके कदमों ने कॉन्ग्रेस ही नहीं बल्कि दिग्विजय सिंह की भी नीदें उड़ा चुकी है। इस बात को और बल तब मिला जब भोपाल में बीजेपी प्रवक्ता ने कहा, “हम भोपाल से यह चुनाव हिन्दू धर्म को आतंकवाद से जोड़कर उसे अपमानित करने की कॉन्ग्रेसी साजिश के खिलाफ लड़ रहे हैं और दिग्विजय सिंह इस साजिश का चेहरा हैं।”

साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी की घोषणा के साथ ही कुछ मीडिया गिरोह के ‘तटस्थ’ टिप्पणीकार उन पर नफरत की बारिश करने के लिए लकड़बग्घे के रूप में बाहर आ चुके हैं, जिन्हे सिर्फ आतंकियों, समुदाय विशेष के मानवाधिकार दिखते हैं, हिन्दुओं के नहीं। इन्हें बर्बर आतंकियों में स्कूल मास्टर का मासूम बेटा नज़र आ जाएगा लेकिन एक साध्वी महिला में इस गिरोह को बिना एक भी सबूत के दुर्दांत आतंकी दिखने लगता है और उसके नाम की आड़ में ये पूरे हिन्दू और सन्यासी समाज को ही ‘भगवा आतंक’ का नाम दे देंगे लेकिन आज तक ये ‘मुस्लिम आतंक/आतंकी’ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। वहाँ इन्हें भटके हुए नौजवान दिखते हैं जिनका कोई मज़हब नहीं है।

साध्वी प्रज्ञा ने अपने एक बयान में उस पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे को दोषी ठहराया, जो ‘भगवा आतंकी’ कथा को गढ़ने और आगे बढ़ाने और उन पर झूठे आरोप मढ़कर अवैध रूप से कैद में रखने की साजिश का सूत्रधार था। जो 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के दौरान मारा गया था। उन्होंने कहा कि जब करकरे को जाँच एजेंसी में किसी ने कहा था कि साध्वी को बिना सबूत के नहीं रखा जाना चाहिए और इस प्रकार उनको टॉर्चर करना और उनकी नजरबंदी गैरकानूनी है, तो करकरे ने कहा कि उसे कहीं से भी सबूत जुगाड़ना पड़े या भले ही उसे गढ़ना पड़े, साध्वी प्रज्ञा को जेल में रखने के लिए, वो किसी भी हद तक जाएगा। अपने इसी बयान में साध्वी प्रज्ञा ने यह भी कहा कि करकरे को मार दिया गया क्योंकि उन्होंने उसे शाप दिया था।

शाप देने की बात पर मीडिया के तमाम गिरोहों ने साध्वी प्रज्ञा के बयान पर नाराजगी जाहिर की है। क्योंकि अब उन्हें हेमंत में सिर्फ एक कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी नज़र आ रहा है। उसकी तमाम कारस्तानियाँ भुला दी गई हैं।

हालाँकि, बीजेपी ने भी प्रज्ञा ठाकुर के हेमंत करकरे की मृत्यु वाले बयान से दूरी बना ली है। बीजेपी ने उसे उनकी निजी राय कहा है। बीजेपी ने कहा है कि वह हेमंत करकरे को हुतात्मा मानती है। दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने भी अपना बयान वापस ले लिया है और इसके लिए माफी माँगते हुए कहा है कि यह उनका व्यक्तिगत दर्द है।

अब जब इतना कुछ सामने है तो इन मीडिया गिरोहों के छद्म आक्रोश से परे, किसी को यह मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि करकरे के खिलाफ जो आरोप लगाया गया है। उसमें कितनी सच्चाई है। उसके लिए, हम एक अंदरूनी सूत्र पर भरोसा कर सकते हैं। आरवीएस मणि एक पूर्व नौकरशाह हैं जिन्होंने कॉन्ग्रेस के दौर में गृह मंत्रालय में एक अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किया था। अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में, मणि ने संपूर्ण मिलीभगत का वर्णन किया है और बताया है कि किन-किन खिलाड़ियों ने ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने के लिए मिलीभगत की और कैसे, कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता से लेकर कई अन्य लोग इस साजिश में शामिल थे।

हेमंत करकरे के संदर्भ में भी, आरवीएस मणि ने अपनी पुस्तक में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। आरवीएस मणि ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेरर’ में हेमंत करकरे के साथ अपनी पहली मुठभेड़ का भी वर्णन किया है।

आरवीएस मणि नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में 2006 बम विस्फोट के बाद हेमंत करकरे के साथ अपनी बैठक के बारे में बात करते हैं। उन्होंने कहा कि वह उस समय आंतरिक सुरक्षा में काम कर रहे थे और उन्हें गृह मंत्री शिवराज पाटिल ने बुलाया था। जब उन्हें अंदर ले जाया गया, तो उन्होंने शिवराज पाटिल के कक्ष में दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे को देखा। वह लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह उनसे पूछताछ कर रहे थे, जबकि शिवराज पाटिल थोड़े असंबद्ध दिख रहे थे। उन्होंने उनसे विस्फोट के बारे में कई सवाल पूछे। आरवीएस मणि लिखते हैं कि हेमंत करकरे और दिग्विजय सिंह आरवीएस मणि की जानकारी से बहुत खुश नहीं थे कि एक विशेष मज़हबी समूह अधिकांश आतंकवादी हमलों में शामिल था।

वह लिखते हैं कि कमरे में बातचीत से, वे खुश नहीं थे कि खुफिया सूचनाओं के अनुसार, कट्टरपंथी आतंकवादियों का समर्थन कर रहे थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे।

वह नांदेड़ विस्फोट के बारे में आगे बात करते हैं और कहते हैं कि यह पहला मामला था जिसमें ’हिंदू आतंक’ शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया गया था।

आरवीएस मणि कई सवाल उठाते हैं कि दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे इतने करीब क्यों थे? जैसा कि दिग्विजय सिंह ने खुद भी दावा किया था। इनकी करीबी खुद ही कई सवाल खड़े करती है।

आरवीएस मणि लिखते हैं, “यह याद रखना दिलचस्प हो सकता है कि दिग्विजय सिंह ने एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया था कि वह उस समय के एक पुलिस अधिकारी के साथ व्यक्तिगत संपर्क में थे, जो उनके साथ केंद्रीय गृह मंत्री के कमरे में थे और जिन्हे नांदेड़ हमले की जानकारी थी। जिससे दिग्विजय सिंह ने कुछ विशेष सूचनाएँ हासिल करने का दावा भी किया था। सिंह ने मीडिया में इस पुलिस अधिकारी का निजी मोबाइल नंबर भी जारी कर दिया था। यह उस समय के मीडिया रिपोर्टों से सत्यापित किया जा सकता है।”

वे आगे लिखते हैं, “जो पेचीदा था, जिसे मीडिया में से किसी ने भी उस समय या फिर बाद में नहीं पूछा था कि एक राजनीतिक नेता और पड़ोसी राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारी के बीच क्या संबंध था? दरअसल, एक राज्य का मुख्यमंत्री रहने के बाद, सिंह को अपने राज्य के कई पुलिस अधिकारी जानते होंगे। लेकिन पड़ोसी राज्य के एक सेवारत IPS अधिकारी के साथ इतना दोस्ताना व्यवहार?, एक ऐसी बात है जिसका जवाब दिया जाना चाहिए। बिना किसी विशेष मकसद के एक आईपीएस अधिकारी एक पड़ोसी राज्य के राजनेता के साथ क्या कर रहा था?

ऑल इंडिया सर्विसेज (एआईएस) आचरण नियम स्पष्ट रूप से अधिकारियों के कार्यों के निर्वहन को छोड़कर अन्य किसी साजिश या विशेष मक़सद के तहत राजनीतिक नेताओं के साथ अखिल भारतीय सेवा कर्मियों का इस तरह का व्यवहार नियमों का उल्लंघन हैं।

आरवीएस मणि अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि इसके तुरंत बाद का घटनाक्रम यह था कि “हिंदू आतंक” रिकॉर्ड में आ गया था, जहाँ यह दावा किया गया था कि नांदेड़ के समीर कुलकर्णी कथित रूप से अपनी कार्यशाला में विस्फोटक का भंडारण कर रहे थे, जिसमें 20.4.2006 को विस्फोट हो गया।

पुस्तक के एक अन्य भाग में, आरवीएस मणि कहते हैं कि जब हेमंत करकरे एटीएस प्रमुख थे, तो अहले-ए-हदीथ/हदीस जो मालेगाँव विस्फोट में शामिल थे, इसका सबूत होने के बाद भी उसे एक साइड कर दिया गया था और इस नैरेटिव को पूरी तरह से बदल दिया गया था। मणि कहते हैं कि यह पहली बार था कि हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।

आपको बता दें, हालाँकि बाद में मीडिया द्वारा यह रिपोर्ट भी किया गया था कि एनआईए इस नतीजे पर पहुँची थी कि कर्नल पुरोहित को फँसाने के लिए महाराष्ट्र एटीएस द्वारा आरडीएक्स लगाया गया था।

यह वास्तव में एक तथ्य है कि हेमंत करकरे मुंबई हमलों के दौरान अनुकरणीय साहस दिखाते हुए बलिदान हो गए। यह भी उतना ही सच है कि कई सवाल न केवल अंदरूनी सूत्र आरवीएस मणि और पीड़िता साध्वी प्रज्ञा द्वारा उठाए गए, बल्कि कई अन्य लोगों ने भी आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे के आचरण और उनकी कॉन्ग्रेसी नेताओं से मिलीभगत के बारे में और खासतौर से ‘भगवा आतंक’ का झूठ गढ़ने के लिए उठाए हैं।

सच्चाई शायद बीच में कहीं है। जो भी हो एक दिन ज़रूर सामने आएगा। साध्वी प्रज्ञा को मकोका के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया है। कुछ और आरोपों में भी बरी हो चुकीं हैं। फ़र्ज़ी सबूतों के आधार पर आखिर किसी को कब तक फँसाया जा सकता है। एक न एक दिन न्याय की विजय होगी। लेकिन आज भी अधिकांश मामलों में बरी होने के बाद भी मीडिया गिरोहों के स्वघोषित जज उन्हें आरोपित और अपराधी साबित करने में दिन-रात एक किए हुए हैं आखिर इन्हे नमक का क़र्ज़ जो अदा करना है। खैर, साध्वी प्रज्ञा की आवाज़ को चुप कराने की कोशिश करने वाले, इन तमाम मीडिया गिरोहों से कोई भी उम्मीद करना भी बेमानी है। ये खुद ही वकील हैं और जज भी, फैसला अगर इनके अजेंडे के हिसाब का न हो तो ये स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं को भी बदनाम करने से पीछे नहीं हटते।

पश्चिम बंगाल में निर्वाचन अधिकारी लापता, चुनाव आयोग ने की रिपोर्ट तलब

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के राणाघाट संसदीय क्षेत्र के कृष्णानगर में तैनात ईवीएम-वीवीपैट प्रभारी नोडल अधिकारी पिछले 24 घंटे से लापता हैं। एक अधिकारी ने शुक्रवार (अप्रैल 19, 2019) को इसकी जानकारी दी। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2010 बैच के अधिकारी राय राणाघाट लोकसभा क्षेत्र के कृष्णानगर में बतौर नोडल अधिकारी के रूप में ईवीएम एवं वीवीपैट प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

ख़बर के अनुसार, नदिया के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि 30 वर्षीय अर्णब रॉय नामक अधिकारी चुनाव ड्यूटी के लिए अपने सरकारी आवास से बृहस्पतिवार (18 अप्रैल) की सुबह बिप्रदास चौधरी पॉलिटेक्निक कॉलेज के लिए निकले लेकिन दोपहर बाद से उन्हें नहीं देखा गया। अधिकारी ने बताया कि अर्णब का वाहन कॉलेज के बाहर पार्क किया हुआ पाया गया।

जिला पुलिस के सूत्रों ने बताया कि उनके दोनों मोबाइल फोन बंद हैं और उनकी अंतिम लोकेशन नदिया जिले में शांतिपुर के पास की बताई जा रही है। एक अन्य पुलिस अधिकारी ने कहा कि शांतिपुर के बाद उनकी लोकेशन का पता नहीं चल पाया है क्योंकि वहाँ से उनका फोन बंद आ रहा है।

जिला मजिस्ट्रेट के साथ भी हुआ था कुछ दिन पहले झगड़ा

प्रारंभिक जाँच में यह पता चला है कि रॉय का नदिया के जिला मजिस्ट्रेट सुमित गुप्ता के साथ कुछ दिनों पहले कथित रूप से झगड़ा हुआ था। गुप्ता और रॉय का झगड़ा निर्वाचन के सिलसिले में ड्यूटी को लेकर हुआ था। इस बीच आयोग ने रॉय की जगह नए अधिकारी को तैनात कर दिया है। उल्लेखनीय है कि राणाघाट संसदीय क्षेत्र को तृणमूल कॉन्ग्रेस का गढ़ माना जाता है और वहाँ चौथे चरण में 29 अप्रैल को मतदान होगा।

गुप्ता ने झगड़े की बात से किया मना

गुप्ता से जब इस संबंध में संपर्क किया गया तो उन्होंने रॉय के साथ किसी प्रकार का झगड़ा होने से इनकार किया। गुप्ता ने पीटीआई को बताया, “जिस किसी ने आपको यह सूचना दी है उसने झूठी जानकारी दी है। हमारे बीच कुछ नहीं हुआ था। हमने उनकी तलाश के लिए पहल की है।” विफल खोज अभियान के बाद जिला प्रशासन ने कृष्णानगर कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई है। रॉय की पत्नी ने भी शिकायत दर्ज कराई है।

साध्वी प्रज्ञा को गोमाँस खिलाने वाले, ब्लू फिल्म दिखाने वाले लोग कौन थे?

साध्वी प्रज्ञा को भाजपा द्वारा टिकट दिए जाने के बाद लोकसभा चुनावों की दिशा बदलती हुई नजर आ रही है। भोपाल सीट से साध्वी प्रज्ञा का नाम हर किसी के लिए चौंकाने वाला साबित हुआ है। साध्वी प्रज्ञा मालेगाँव धमाकों में शामिल होने के आरोपों में अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मात्र शक के आधार पर जेल, साजिश और सियासत की यातनाओं में गँवा चुकी हैं। इस बीच अगर कोई चीज लिबरल्स बुद्धिजीवीयों के बीच नदारद मिली है तो वो है साध्वी प्रज्ञा के मानवाधिकार! क्या हिन्दुओं के मानवाधिकार इस सेक्युलर देश में चर्चा का विषय नहीं हैं?

मोदी सरकार के दौरान वॉशरूम के नल में पानी ना होने पर भी नेहरुवियन सभ्यता के दौरान मिले हुए अवार्ड वापस कर देने वाले लोग तब क्यों सोते रहे जब मात्र शक (संभवतया साजिश) के आधार पर एक महिला की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई, उसे लगातार 14 दिन तक पीटा जाता रहा, उसकी ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी गई और उसे अपने मृतक पिता तक से नहीं मिलने दिया गया?

सोशल मीडिया पर इसके बाद से लगातार साध्वी प्रज्ञा से जुड़े कुछ ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जिन पर बात करना और ‘प्राइम टाइम’ करना मेनस्ट्रीम मीडिया ने कभी शायद अपनी जिम्मेदारी नहीं समझा। प्रश्न उठता है कि पत्रकारिता के स्वघोषित ऐसे बड़े नाम भी इस इकतरफी यातना के मुद्दे पर चुप किन कारणों से रहे? क्या यही उन पत्रकारों की निष्पक्षता की परिभाषा है, जो उन्हें अपने प्रोपेगेंडा के नाम पर सुबह शाम प्राइम टाइम करवाती है, लेकिन जिन विषयों पर उन्हें ‘बड़ा नाम’ बनाने वाले राज परिवारों पर प्रश्नचिन्ह लगता हो, उन पर वो एकदम खामोश रहने का फैसला लेते हैं?

2014-2015 के दौरान सुदर्शन टीवी द्वारा एक ऑडियो-वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में बताया गया है कि पुलिस ने किस प्रकार बिना किसी सबूत प्रज्ञा को हिरासत में लेकर उन पर अमानवीय जुर्म किए। उनके सामने ‘भागवत गीता’ के पन्ने फाड़कर उड़ाए जाते, हिन्दुओं के इस पवित्र ग्रन्थ को पैरों तले कुचला जाता था और साध्वी प्रज्ञा से पूछा जाता था, “क्या तुम्हारे राम तुम्हे बचाने आएँगे?”

साध्वी प्रज्ञा के पिता एक RSS कार्यकर्ता थे, उनकी मृत्यु पर साध्वी प्रज्ञा को उनसे मिलने और आखिरी बार देखने तक की इजाजत नहीं दी गई। पुलिस दल, जिसमें कि हेमंत करकरे भी थे, प्रज्ञा को टॉर्चर करते थे। उन्हें फुटबॉल की गेंद की तरह पीटा जाता था, जिससे उनके फेफड़ों में घाव हो गए।

वीडियो में बताया गया है कि साध्वी प्रज्ञा को इसी हालात में अस्पताल में 3-4 फ्लोर तक चढ़ाया जाता था। उन्हें तरह-तरह के इंजेक्शन दिए जाते रहे, ऑक्सीजन सप्लाई बंद कर दी जाती थी और उन्हें तड़पने के लिए छोड़ दिया जाता था। लगातार 14 दिन की प्रताड़नाओं के बीच साध्वी प्रज्ञा की रीढ़ की हड्डी भी टूट गई थी, इसी बीच उन पर एक और केस फाइल कर दिया गया। ये सब इतनी आसानी से होता रहा, मीडिया की गैरमौजूदगी और सियासत की साजिशों के बीच कोई इस मामले में बात करने वाला नहीं था।  

“पहले मेरा इलाज करो, मैं उसके बाद जेल जाऊँगी”, सुदर्शन टीवी द्वारा जारी वीडियो में टूटी हुई रीढ़ की हड्डी के कारण भोपाल एयरपोर्ट पर साध्वी प्रज्ञा यह कहते हुए सुनी जा सकती हैं। इस वीडियो क्लिप में साध्वी प्रज्ञा की बहन प्रतिभा और उनके पति भगवान झा को इस प्रकरण पर बात करते देखा जा सकता है।

यातनाओं के दौरान पुलिस घेरा बनाकर साध्वी प्रज्ञा को मारती थी, एक के थक जाने पर दूसरा उन्हें मारता था। इतना ही नहीं, हिन्दू होने के कारण उनकी आस्थाओं को आहत करने के लिए पवित्र ग्रंथ गीता को उनके सामने लाकर फाड़ा और पैरों से कुचला जाता था। जब इतने से भी टॉर्चर करने वालों को तसल्ली नहीं हुई तब उन्होंने गाय का माँस साध्वी प्रज्ञा को खिलाया और उन्हें अश्लील फिल्में दिखाईं।

ये सोचने की बात है कि गाय का माँस खिलाकर आस्थाओं को आहत करने की बात 2014-2015 से पहले की हैं, मीडिया द्वारा तब कभी इस तरह का प्रकरण ‘मेनस्ट्रीम’ नहीं किया गया था। आप सोचिए कि 2019 में एक पाकिस्तानी जिहादी 40 भारतीय सैनिकों को मारने से पहले सन्देश देता है कि उसे गाय का पेशाब पीने वाले हिन्दुओं से नफरत है। इसी विचारधारा की झलक हमें साध्वी प्रज्ञा की यातनाओं में भी देखने को मिलती है, क्या ये मात्र एक संयोग ही हो सकता है?

खास बात ये भी है कि इस दौरान समाचार पत्र और मीडिया चैनल्स में कोई अन्य डाटा उपलब्ध नहीं है। ये भी हो सकता है कि आज के समय पर अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देने वाले पत्रकारों को इस पर लिखने और बोलने की उनके ‘अन्नदाताओं’ द्वारा इजाजत नहीं दी गई थी, या फिर किसी ने भी इस मामले पर बात करना आवश्यक नहीं समझा होगा। जाहिर सी बात है कि यह प्रकरण ‘हिन्दू/भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्द रचने वाले दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की विचारधारा के अनुरूप चल रहा था और भविष्य में उनके राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप उनके काम आ सकता था।

साध्वी प्रज्ञा पर की गई हर यातना एक प्रपंच का हिस्सा नजर आता है। इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि जो लोग पुलवामा आतंकी हमले को इस्लामिक जिहाद से जोड़ने में हिचकिचाते रहे वही लोग आज साध्वी प्रज्ञा को एक घोषित आतंकवादी बना देने की हर कोशिश कर रहे हैं। ये संस्थाओं का उपहास उड़ाते हैं। अदालत और न्यायिक प्रक्रियाओं में अपने एजेंडा के अनुसार विश्वास करते हैं और नहीं करते हैं और ऐसा करते वक्त वो ये भी भूल जाना पसंद करते हैं कि इन संस्थाओं में उनके नेहरू जी भी विश्वास करते थे, खुलेआम संविधान से छेड़छाड़ करने वाली इंदिरा गाँधी भी।

न्याय समय के गर्भ में है। साध्वी प्रज्ञा के प्रकरण को इकतरफा होकर नहीं देखा जा सकता है, लेकिन अफजल गुरु, बुरहान वानी, यहाँ तक की मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों और कश्मीरी पत्थरबाजों से संवेदना दिखाने वाले नेता, पत्रकार और सामाजिक विचारकों को साध्वी प्रज्ञा से भी सहानुभूति होनी चाहिए। मानवाधिकारों और व्यक्तिगत मामलों का सम्मान होता नहीं दिख रहा है। सेक्युलर राष्ट्र होने की वजह से हम सब नकारना चाहते हैं, लेकिन इन सबके पीछे का कारण साध्वी प्रज्ञा का हिन्दू होना ही है।

बाबर की औलाद को देश सौंपना चाहते हैं क्या: योगी आदित्यनाथ

पिछले दिनों आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में चुनाव आयोग ने योगी आदित्यनाथ पर 72 घंटे का प्रतिबन्ध लगा दिया था। यह अवधि समाप्त होते ही योगी फिर से चुनाव प्रचार में सक्रीय हो गए हैं। हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार, वह संभल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए फिर कुछ ऐसा बोल गए जिस पर नया विवाद खड़ा हो सकता है। जनसभा में योगी ने कहा, “एक तरफ देश को राम कृष्ण की परम्परा को आगे बढ़ने वाले लोग हैं दूसरी तरफ वो हैं जो खुद को बाबर की औलाद कहते हैं। आप ‘बाबर की औलाद को देश सौंपना चाहते हैं क्या?’ कानून की उन्नति की वजह से आज कोई प्रदेश में दंगा करने का प्रयास नहीं कर सकता। अखिलेश राज में मंदिरों का बुरा हाल था।”

योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उनके लिए राजनीति अपनी जगह है और आस्था अपनी जगह। यही वजह है कि 72 घंटे के बैन के बीच भी उन्होंने आस्था के लिए जगह निकाल ली। इस दौरान वो लखनऊ, अयोध्या और वाराणसी के मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए गए।

बता दें कि इससे पहले उनके बयान, “उनके साथ अली हैं तो हमारे साथ बजरंग बली हैं” चुनाव आयोग ने इस बयान को आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए उन पर 72 घंटों का प्रतिबन्ध लगा चुका है।

अब जब योगी आदित्यनाथ प्रतिबन्ध के बाद पहली जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो इस दौरान उन्होंने अपने भाषण में कहा, सपा-बसपा परिवारवाद को बढ़ावा देने वाली पार्टियाँ हैं। योगी ने यह भी कहा कि जनता बजरंग बली के विरोधियों को हराएगी।  

बता दें कि संभल से बीजेपी ने परमेश्वर लाल सैनी को टिकट दिया है। वहीं सपा-बसपा-रालोद गठबंधन से शफिकुर रहमान बर्क को चुनाव मैदान में उतरा गया है, कॉन्ग्रेस की तरफ से जेपी सिंह चुनाव मैदान में हैं।

टुकड़े-टुकड़े गैंग को समर्थन देकर कॉन्ग्रेस अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई: जावड़ेकर

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर हमला करते हुए कहा कि वह मुख्यधारा की पार्टी से हाशिए पर यानी कि अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई है, जिसे अब टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने के बावजूद अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है। जावड़ेकर ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस बयान को ख़ारिज कर दिया कि मोदी के शासन में लोकतंत्र और संविधान ख़तरे में हैं और मोदी के सत्ता में आने पर कोई चुनाव नहीं होगा, क्योंकि यह ग़लत और आधारहीन है।

गहलोत की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि मोदी ने 2014 का चुनाव जीता था और अब 2019 के लोकसभा चुनाव हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि 2024, 2029 में भी चुनाव होंगे लेकिन कॉन्ग्रेस के पास इन चुनावों में कोई मौक़ा नहीं रहेगा।

जावड़ेकर ने कहा, “कॉन्ग्रेस मुख्यधारा की पार्टी थी और अब वह ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का समर्थन करके एक हाशिए पर जाने वाली पार्टी बन गई है। कॉन्ग्रेस इस बात का प्रमाण ख़ुद दे रही है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और वो इस तरह से इनका (टुकड़े-टुकड़े गैंग) बचाव करती है।”

बता दें कि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर राजस्थान के चुनाव प्रभारी हैं। उन्होंने दावा किया कि 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 2014 के मुक़ाबले शानदार जीत मिलेगी और चुनाव में NDA को दो-तिहाई बहुमत मिलेगा।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दो चरणों के चुनावों के बाद, भाजपा अपनी प्रचंड जीत को लेकर आश्वस्त है। हम 2014 के अपने टैली में सुधार करेंगे, अपने दम पर 300 का आंकड़ा पार करेंगे और NDA के पास दो तिहाई बहुमत होगा। हम देश भर में सभी राज्यों में लोगों का समर्थन प्राप्त कर रहे हैं और इससे विपक्ष पूरी तरह से घबराया हुआ है। कॉन्ग्रेस हार का सामना कर रही है और इसलिए वो इस तरह की प्रतिक्रिया दे रही है।

विपक्षी पाटीदारों की निंदा करते हुए जावड़ेकर ने कहा कि वे जानते हैं कि वे हारने वाले हैं और इसलिए वे EVM के इस्तेमाल के बहाने भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस जानती है कि वो हारने वाले हैं और इसलिए वो अपनी हार का कोई न कोई बहाना ढूँढने में व्यस्त है। जावड़ेकर ने कहा कि हम अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि लोग मोदी के नेतृत्व का जवाब दे रहे हैं और वे चाहते हैं कि मोदी ही फिर से प्रधानमंत्री बनें।

रोहित शेखर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौकाने वाले खुलासे, मौत को अप्राकृतिक बताया गया

बीते दिनों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एनडी तिवारी के बेटे रोहित शेखर की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत में एक सनसनीखेज़ खुलासा हुआ है। मीडिया रिपोर्टों की मानें तो रोहित की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस अधिकारी अंदाजा लगा रहे हैं कि उनकी मौत छाती और गले पर दवाब पड़ने से हुई है।

रोहित की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी मौत को आप्राकृतिक बताया गया है। जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने इस मामले की जाँच क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। आईपीसी की धारा 302 के तहत इस मामले को अज्ञात के ख़िलाफ़ दर्ज किया गया है।

खबरों की मानें तो आज (अप्रैल 19, 2019) दिन में क्राइम ब्रांच की टीम और वरिष्ठ अधिकारी डिफेंस कॉलोनी स्थित रोहित के निवास स्थान पर पहुँचे थे। क्राइम ब्रांच की टीम रोहित के घर से उनकी मौत की वज़ह पता लगाने की कोशिशों में जुटी हुई है।

बता दें कि रोहित शेखर तिवारी की संदिग्ध परिस्थितियों में मंगलवार (अप्रैल 16, 2019) को मौत हुई थी। तबीयत खराब होने पर शाम करीब 4 बजकर 41 मिनट पर साकेत स्थित मैक्स अस्पताल ले जाया गया था। जाँच के बाद डॉक्टरों ने रोहित को मृत घोषित कर दिया।

गौरतलब है कि रोहित की मौत पर उनके घर में मौजूद नौकरों ने बताया था कि रोहित की नाक से खून बह रहा था जबकि रोहित की माँ का दावा था कि उनके बेटे की मौत नैचुरल है। लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने के बाद अब देखना है कि क्राइम ब्रांच के पास पहुँच चुका ये मामला कैसे अनसुलझी गुत्थी को सुलझाता है।