Home Blog Page 5893

भ्रष्टाचार के ‘मोहरे’ और नेहरू से राहुल तक गाँधी परिवार का शातिर खेल

अभी उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर के एक दूरदराज गाँव में जाना हुआ। गाँव की चौपाल में ग्रामीण चर्चा कर रहे थे कि कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार में राहुल गाँधी के बिज़नेस साझेदार को 20 हजार करोड़ के पनडुब्बी रक्षा सौदे में ऑफसेट ठेका मिलने का खुलासा बताता है कि गाँधीपरिवार की दलाली व भ्रष्टाचार का खेल कितना शातिराना है। बीस इक्कीस साल का एक नौजवान कह रहा था, “गाँधी परिवार ही अपने आप में घोटाला है, नेहरू से लेकर राहुल और प्रियंका तक खुद को निरंकुश राजा मानते हुए भ्रष्टाचार को जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं।”

इस चर्चा से याद आया कि महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे वी कल्याणम ने अक्टूबर 2011 में सार्वजनिक मंच से कहा था, “आज देश में भ्रष्टाचार चरम पर है और इसके लिये मैं जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार मानता हूँ। ब्रिटिश राज में इतना भ्रष्टाचार नहीं था। लेकिन आजादी के तुरंत बाद भ्रष्टाचार शुरू हो गया और आज यह करोड़ों में होता है।” कल्याणम 1943 से 1948 तक महात्मा गाँधीके निजी सचिव रहे थे। उनका कहना था, “नेहरू वैसे ही ईमानदार थे, जैसे कि मनमोहन सिंह। आज के भ्रष्टाचार के लिये मनमोहन सिंह भी जिम्मेदार हैं। मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से बहुत ईमानदार थे, लेकिन उन्होंने भ्रष्टाचार का संरक्षण किया। ऐसा ही नेहरू ने किया।”

1947 में आजादी मिलने के बाद जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बन गए तो इसके एक महीने के भीतर ही महात्मा गाँधीके पास 50 चिट्ठियाँ आई थीं, जिसमें से दस चिट्ठियाँ देश में चल रहे भ्रष्टाचार के शिकायत की थीं। कल्याणम बताते हैं कि नेहरू के लिये भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं था। एक व्यक्ति ने जब नेहरू से बढ़ रहे भ्रष्टाचार की शिकायत की तो उन्होंने जवाब दिया, “भद्र पुरुष, इन छोटे-मोटे भ्रष्टाचार की चिंता मत करो।” तब उस व्यक्ति ने नेहरू को करारा जवाब देते हुए कहा, “श्रीमान, छोटा भ्रष्टाचार छोटे भ्रूण की तरह है जो बढ़ता जाता है।”

कहा जाता है कि उस समय के तीन व्यक्ति अति भ्रष्ट थे और ये तीनों नेहरू के बेहद करीबी भी थे। इनमें से एक थे नेहरू के रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन, वित्त मंत्री टीटी कृष्णमचारी और पंजाब के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो। इनके भ्रष्टाचार के किस्से उजागर होने के बाद भी नेहरू ने इन्हें बर्खास्त करने के बजाय ईनाम दिया और कैबिनेट में रखे रहे। मेनन वही थे, जिनकी संलिप्तता देश के पहले रक्षा घोटाले यानी जीप घोटाले में सामने आई थी, लेकिन नेहरू ने उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया नहीं।

बाकी भ्रष्ट लोगों को भी नेहरू ने मंत्रिमंडल में रखकर संरक्षण दिया। इसीलिये इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मेनन, कृष्णामचारी आदि केवल चेहरा थे, भ्रष्टाचार के असली सरपरस्त तो नेहरू थे। कल्याणम द्वारा बताए गये इस सच को सुनकर भ्रष्टाचार के उन मामलों की मॉडस ऑपरेंडी पता चलती है, जिनमें गाँधीपरिवार का नाम आया। वह मॉडस ऑपरेंडी यह है कि भ्रष्टाचार के लिये चेहरा किसी और रखो ताकि सीधा लिंक न आए।

नेहरू के समय हुये मूंदड़ा घोटाले का तरीका याद कीजिये। कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा से जुड़े घोटाले को आज़ाद भारत के पहले ऐसे घोटाले के तौर पर याद किया जाता है जिसे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जोड़कर देखा गया। 1957 में मूंदड़ा ने सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी के ज़रिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया। यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया।

जब तक एलआईसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुक़सान हो चुका था। इस घोटाले का खुलासा नेहरू के दामाद फिरोज गाँधीने ही किया था। प्रश्न उठता है कि यह सरकारी दबाव क्या था? क्या यह दबाव प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू की तरफ से आया होगा? इस घोटाले को नेहरू ख़ामोशी से निपटाना चाहते थे क्योंकि इससे उनका नाम जुड़ रहा था और उन्होंने अपने वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी को बचाने की कोशिश भी की। इस घोटाले में भी हरिदास मूंदड़ा और कृष्णमचारी को मोहरा बनाकर गाँधी परिवार ने बच निकलने की कोशिश की।

फिर इंदिरा राज में हुये ऑयल घोटाला, मारुति घोटाला आदि। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय को यात्री कार मारुति बनाने का लाइसेंस मिला था। वर्ष 1973 में सोनिया गाँधी को मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का प्रबंध निदेशक (एमडी) बनाया गया, हालाँकि सोनिया के पास इसके लिए जरूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। बताया जा रहा है कि कंपनी को सरकार की ओर से टैक्स, फंड और कई छूट मिली थी।

स्विस मैगजीन स्विजर इलस्ट्रिअरटिन ने नवंबर 1991 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें कहा कि राजीव गाँधी का स्विस बैंक में खाता है जिसमें 13,200 करोड़ रुपये जमा हैं। इस रिपोर्ट को गाँधी परिवार ने आज तक न कभी नकारा है न ही रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए इस पत्रिका के खिलाफ कोई मुकदमा ही किया है। इसका अर्थ यह क्यों न माना जाए कि यह रिपोर्ट सच है। राजीव गाँधीके ऊपर लगा 1497 करोड़ रुपए के बोफोर्स दलाली कांड अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा है। मैगज़ीन ने छापा था कि स्वीडन की तोप बनाने वाली कंपनी बोफ़ोर्स ने भारतीय सेना को अपनी 155 एमएम हॉवित्जर तोपें बेचने के लिये कमीशन के रूप में 64 करोड़ रुपए राजीव गाँधी समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं को दिए थे। स्वीडन के पूर्व पुलिस चीफ स्टेन लिंडस्ट्राम ने बोफोर्स दलाली मामले के दस्तावेज लीक किए थे तो ये मामला बाहर आया।

बोफोर्स मामले में एक मोहरा इटली का बिचौलिया ओट्टावियो क्वात्रोची भी था। आरोप लगा था कि इसी बिचौलिये क्वात्रोची के जरिये बोफोर्स का कमीशन राजीव गाँधी तक पहुँचा था। क्वात्रोची वही व्यक्ति था जो राजीव गाँधीके प्रधानमंत्रित्व काल में गाँधी परिवार का बेहद करीबी था और राजीव की मौत के बाद 21 बार सोनिया गाँधीसे मिला था। इंडिया टुडे ने 8 जनवरी 2011 को एक विस्तृत रिपोर्ट में क्वात्रोची और राजीव गाँधी व सोनिया गाँधी के बीच संबंधों को उजागर किया था। क्वात्रोची राजीव गाँधी के समय प्रधानमंत्री आवास में बेरोकटोक जाता था और विदेशी दौरे के समय खुद राजीव गाँधी परिवार व बच्चों के साथ क्वात्रोची के घर जाते थे। सोनिया गाँधी क्वात्रोची के घर रुकती थीं।

लेकिन वी पी सिंह की सरकार जाने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार आई और राजीव गाँधी द्वारा बोफोर्स खरीद में दलाली खाने की जाँच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और फिर लीपापोती कर दी गयी। भारत सरकार ने क्वात्रोची के लंदन के दो बैंक खातों को वहाँ की सरकार से कहकर फ्रीज करा दिया था, लेकिन 2004 में अटल जी की सरकार जाने के बाद यूपीए सरकार आई तो दिसम्बर 2005 में केंद्र सरकार ने क्वात्रोची के इन फ्रीज खातों को फिर खुलवा दिया, ताकि वह अपना पैसा निकालकर ले जा सके। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस राज में क्वा​त्रोची व अन्य आरोपितों के नाम हटाने की साजिश भी रची गई। तब भी यह प्रश्न उठा था कि क्या दलाल क्वात्रोची पर केंद्र की कॉन्ग्रेस सरकार की इस मेहरबानी का राज सोनिया गाँधी से उसके संबंधों के कारण है?

अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में रिश्वत खाने के आरोपों से घिरी कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी का नाम इटली के मिलान शहर की अदालत में चले इस मामले के मुकदमे के फैसले के पृष्ठ संख्या 193 और 204 पर चार बार आया है। इसमें उनके नाम की स्पेलिंग Signora Gandhi लिखा गया था। इस अदालत ने कहा कि सोनिया गाँधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने बिचौलिये के जरिए 125 करोड़ रुपए कमीशन लिया। कुल 225 करोड़ रुपए रिश्वत की लेनदेन हुई, जिसमें से 52 प्रतिशत हिस्सा कॉन्ग्रेस के नेताओं को दिया गया। 28 प्रतिशत सरकारी अफसरों को और 20 प्रतिशत एयरफोर्स के अफसरों को मिला। इस केस में तब के एयरफोर्स चीफ एसपी त्यागी को भी आरोपी बनाया गया।

सोनिया व राहुल गाँधी के नेशनल हेराल्ड घोटाले, राहुल की बहन प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा का बीकानेर जमीन घोटाला, डीएलफ जमीन स्कैम की पड़ताल करने पर साफ होता है कि नेहरू काल के भ्रष्टाचार की इसी विरासत और इसी मॉडस ऑपरेंडी को आगे बढ़ाया। नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार पर अवैध रूप से नेशनल हेराल्ड की मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) की संपत्ति हड़पने का आरोप है।

वर्ष 1938 में कांग्रेस ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई थी। यह कंपनी नेशनल हेराल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज नाम से तीन अखबार प्रकाशित करती थी जो 1 अप्रैल, 2008 को बंद हो गए। मार्च 2011 में सोनिया और राहुल गाँधीने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ नाम की कंपनी खोली और एजेएल को 90 करोड़ का ब्याज-मुक्त लोन दिया। एजेएल यंग इंडिया कंपनी को लोन नहीं चुका पाई। इस सौदे की वजह से सोनिया और राहुल गाँधी की कंपनी यंग इंडिया को एजेएल की संपत्ति का मालिकाना हक मिल गया।

इस कंपनी में मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के 12-12 प्रतिशत शेयर हैं, जबकि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के 76 प्रतिशत शेयर हैं। यानी नेशनल हेराल्ड गबन मामले में भी गाँधी परिवार ने वही खेल किया कि पहले फ्राड के लिये मोहरों से एक कंपनी बनाई और उस कंपनी के जरिये नेशनल हेराल्ड की संपत्ति अपने पास मंगवाकर हड़प ली। वाड्रा के जमीन घोटालों में भी यही तरीका अपनाया कि दूसरों के नाम से हजारों एकड़ जमीन सरकार से ली और फिर इसे अपने नाम करवा कर ऊँचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमाया।

इसी प्रकार ताजा मामला कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार द्वारा 2011 में 20 हजार करोड़ के स्कॉर्पीन पनडुब्बी घोटाले में राहुल गाँधी के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को ऑफ़सेट ठेका दिलाने का है। इसमें कहानी यह है कि राहुल गाँधी ने ब्रिटेन में ‘Backop’ लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई और इस कंपनी का 65 प्रतिशत स्वामित्व स्वयं और 35 प्रतिशत मैकनाइट का रखा। ये दोनों इसके संस्थापक निदेशक थे। यह कंपनी 2003 से 2009 तक रही। फिर 2.5 लाख रुपए की दिखावे की नाममात्र की पूंजी से भारत में इसी नाम से कंपनी का गठन किया और उसमें अपनी बहन और कांग्रेस की वर्तमान महासचिव प्रियंका गाँधी को सह निदेशक बनाया।

इस कंपनी में राहुल गाँधी का स्वामित्व 83 प्रतिशत शेयर के साथ था। 2010 में इस भारतीय कंपनी को भी बंद करने का दिखावा किया गया। 2011 में स्कॉर्पीन पनडुब्बी की फ्रांसीसी निर्माता कंपनी नवल ग्रुप (पूर्व में डीसीएनएस) ने भारत की विशाखापत्तनम के फ्लैश फोर्ज प्राइवेट लिमिटेड को मुंबई के मझगांव डाक लिमिटेड (एमडीएल) में बनाए जा रहे स्कॉर्पीन पनडुब्बी के क्रिटिकल पुर्जों की आपूर्ति के लिए ऑफ़सेट ठेका दिया। 2011 में ही भारतीय कंपनी फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी ऑप्टिकल आर्मर का अधिग्रहण किया।

8 नवंबर, 2012 में जिस दिन दो व्यक्ति ऑप्टिकल आर्मर कंपनी में निदेशक बनाए गए, राहुल के बिजनेस पार्टनर उलरिक मैकनाइट को भी कंपनी ने निदेशक बनाया और उन्हें कंपनी का 4.9 प्रतिशत शेयर भी आवंटित किया। 2013 में फ्लैश फोर्ज ने ब्रिटेन की कंपनी कंपोजिट रेजिन ​डेवलपमेंट लिमिटेड का अधिग्रहण किया और इसी साल मैकनाइट ने फ्लैश फोर्ज के दो निदेशकों के साथ निदेशक का पद ग्रहण किया।

अब जरा भ्रष्टाचार के इस खेल में गाँधीपरिवार की भूमिका की पड़ताल करें तो तमाम प्रश्न खड़े होते हैं। 2011 में यूपीए सरकार के समय अपने बिजनेस पार्टनर को स्कॉर्पीन पनडुब्बी का ऑफसेट ठेका दिए जाने से पूर्व 2009 में शातिराना तरीके से बैकआप्स लिमिटेड ब्रिटेन को बंद घोषित किया गया। क्या इसलिये कि स्कॉर्पीन के ऑफ़सेट मिलने पर राहुल गांधी, प्रियंका गाँधी और गाँधी परिवार के सदस्यों से सीधा लिंक न मिले? इसके लिए इनका तरीका वही नेशनल हेराल्ड वाला रहा। पहले एक कंपनी बनाओ, फिर उस कंपनी में पूंजी डालकर ‘व्हाइट’ बनाओ, कंपनी बंद करो और दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके पूंजी स्थानांतरित करो और फिर धीरे से अपना नाम हटाने के बाद सरकारी ठेके दिलवाओ।

पहले एक व्यक्ति के साथ कंपनी खोलना और उसके बाद दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करके उसमें उस व्यक्ति को स्वामित्व दिलवाना और अपनी सरकार में उस व्यक्ति को सरकारी ठेका दिलाना। ये घटनाक्रम इस धारणा की ओर ले जाता है कि राहुल गाँधी द्वारा बैकऑप्स कंपनी बनाने का उद्देश्य यूपीए की कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान ठेका पाना था।

राफेल डील में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठा आरोप लगाने वाले राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस यूपीए सरकार द्वारा अपनी ही कंपनी के साझेदार को रक्षा सौदे में ऑफ़सेट दिलाने पर चुप आखिर क्यों है? यह सवाल तो उठेगा ही कि स्कॉर्पीन पनडुब्बी के ऑफसेट ठेके का लाभ राहुल गाँधी, प्रियंका और गाँधी परिवार तक पहुँचाने के लिये कंपनी बनाने, खत्म करने का दिखावा करने और फिर दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करने का नाटक किया गया, ठीक नेशनल हेराल्ड के एजेएल की तरह?

दरअसल, गाँधी परिवार के शासनकाल में सामने आए  सभी घोटालों का तरीका यही रहा कि उसमें सामने मोहरे रखे गए, जबकि पर्दे के पीछे गाँधी परिवार उन मोहरों का संरक्षण करता रहा। नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल, प्रियंका और राबर्ट वाड्रा से जुड़ी भ्रष्टाचार की हर कहानी में कोई न कोई ऐसा किरदार मिलेगा, जो गाँधी परिवार का बेहद करीबी होगा और उनकी सरपरस्ती में लाखों-करोड़ों के घोटाले करेगा, लेकिन जब घोटाले पकड़े जाएँगे तो गाँधी परिवार हाथ झाड़कर यह कह देगा कि उससे उसका क्या लेना-देना?

भारत में गाँधी परिवार दिखावे के लिए गरीब बना रहेगा और विदेशों में बड़ी-बड़ी कारोबारी कम्पनियाँ चलाएगा। सवाल तो यह है कि क्या गाँधी परिवार का ये कारोबार तकनीकी और शातिर चाल के जरिये भारत के सरकारी व रक्षा सौदों में दलाली का खेल जारी रखने का है? इन मामलों की निष्पक्ष जाँच हो जाए तो गाँधी परिवार का बच्चा-बच्चा जेल जा सकता है। हालाँकि अब तक गाँधी परिवार के सदस्यों के भ्रष्टाचार की दास्तानें सुनाई जाती रही हैं और उनके भ्रष्टाचार का सबूत देते दस्तावेज भी सामने आए हैं, लेकिन अब लगता है कि अपनी शातिर चालों से बचने वाले गाँधी परिवार के पाप का घड़ा भर चुका है और उनके कर्मों का हिसाब भारत का कानून करेगा।

मेजर गोगोई की वरिष्ठता में 6 महीने की कटौती, महिला के साथ दोस्ती का था मामला

कश्मीर में एक शख्स को मानव ढाल बनाकर सुर्खियों में आए मेजर लीतुल गोगोई की वरिष्ठता 6 महीने घटा दी गई है। साथ ही उनका तबादला भी जम्मू-कश्मीर से बाहर कर दिया गया। जानकारी के मुताबिक, गोगोई को कड़ी फटकार लगाते हुए सिर्फ पेंशन के लिए वरिष्ठता में छह महीने की कमी करने की सजा दी गई है। उनकी सामान्य तैनाती को लेकर उन पर लगे अनुशासनिक सतर्कता पाबंदी हटा ली गई है। मेजर गोगोई पर यह कार्रवाई महिला के साथ दोस्ती के मामले में हुई है।

बता दें कि, मेजर गोगोई और उनके ड्राइवर समीर मल्ला को दो चीजों के लिए कोर्ट मार्शल में दोषी ठहराया गया। पहला, स्थानीय महिला से दोस्ती करने और दूसरा, ड्यूटी के दौरान ऑपरेशनल एरिया से दूर रहने के लिए। मल्ला को क्या सजा मिलेगी, इसका फैसला उनके कंपनी कमांडर पर सौंपा गया था, जिसमें उन्हें कड़ी फटकार लगाई गई है। मल्ला पर अवैध तरीके से गायब रहने का आरोप था। साल 2017 में, मल्ला की प्रादेशिक सेना में नियुक्ति हुई थी। उनकी तैनाती राष्ट्रीय राइफल्स के 53 सेक्टर में थी। राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करता है।

गौरतलब है कि 23 मई 2018 को मेजर गोगोई और उनका ड्राइवर 18 साल की लड़की के साथ जबरन होटल में घुसने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान उनका होटल स्टाफ के साथ विवाद हो गया और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उनको हिरासत में ले लिया। गोगोई और मल्ला के खिलाफ ‘समरी ऑफ एविडेंस’ फरवरी में पूरी की गई थी, जिसके बाद कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू की गई। आर्मी कोर्ट ने आरोपी और गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए और फिर बाद में उन्हें सजा सुनाई गई। बता दें कि, उस लड़की ने गवाही देने से मना कर दिया था और कहा था कि उसके द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान को ही अंतिम बयान माना जाए। लड़की ने बताया था कि उसकी मेजर गोगोई के साथ दोस्ती फेक फेसबुक आईडी के जरिए हुई थी, जिसमें गोगोई ने अपना नाम उवैद अरमान बताया था।

मेजर गोगोई अप्रैल 2017 में चर्चा में आए थे। उस वक्त कश्मीर के बडगाम में उपचुनाव हो रहे थे। इसी दौरान कुछ पत्थरबाजों ने उनके काफिले पर हमला किया। जिससे बचने के लिए उन्होंने एक पत्थरबाज को अपनी गाड़ी पर बाँधकर उसे अपनी ढाल बनाया था।

ये है महिला सशक्तिकरण, ATS की 4 महिलाओं ने वॉन्टेड अपराधी अल्लारखा को धर दबोचा

गुजरात से एक सुखद ख़बर आई है। सौराष्ट्र क्षेत्र में बोटाद ज़िले के जंगलों में घुसकर आतंक रोधी दस्ते ने एक ऐसे खूँखार गैंगस्टर को धर दबोचा, जिसके ऊपर लूट, हत्या और सकरी अधिकारियों पर हमले सहित कई मामलों में वांछित था। एटीएस को काफ़ी दिनों से उसकी तलाश थी। लेकिन इससे भी अच्छी बात यह है कि एटीएस की जिस टीम ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, उसमें चार सदस्य थे। आपको यह जान कर ख़ुशी होगी कि ये चारों ही महिलाएँ हैं। एक फोटो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रही है जिसमें ये चारों ही महिला अधिकारी खड़ी हैं और पकड़ा गया वॉन्टेड अपराधी नीचे डरा-सहमा बैठा हुआ है। सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे महिला सशक्तिकरण की बानगी बताया और उन महिला अधिकारियों की प्रशंसा की।

गिरफ़्तार अपराधी का नाम जुसाब अल्लारखा है। उस पर कई लूट के मामले दर्ज हैं। सरकारी अधिकारियों पर वह कई बार हमले भी कर चुका है। अधिकारियों के अनुसार, जब जूनागढ़ के जंगलों में एटीएस की महिलाओं व इस अपराधी का आमना-सामना हुआ, तो वह थोड़ी देर भी टिक नहीं सका। अपनी जान बचाने के लिए उसने तुरंत ही घुटने टेक दिए। इसके बाद महिला अधिकारियों ने उसे गिरफ़्तार कर लिया। इसे एक बड़ी क़ामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। फिरौती के कई मामलों में शामिल यह अपराधी पुलिस के लिए कई दिनों से सिरदर्द बना हुआ था।

गुजरात एटीएस की जांबाज़ महिला अधिकारीगण और पकड़ा गया अपराधी अल्लारखा

पिछले वर्ष पैरोल पर छूटने के बाद अल्लारखा फरार हो गया था। इसके बाद वह फिर से कई आपराधिक घटनाओं में संलग्न रहा। वह अपराध करने के बाद जंगलों में छुप जाता था। इस कारण पुलिस को भी उसे पकड़ने में ख़ासी मुश्किलें आ रही थीं। इसके बाद यह मामला एटीएस को सौंपा गया, जिसे इन चार महिला अधिकारियों ने बख़ूबी पूरा किया। महिला पीएसआइ की एक टीम को हाल ही में एटीएस में शामिल किया गया है। इनके नाम हैं- संतोजबेन ओडेडरा, नितिमिका गोहिल, अरुणाबेन गामिती और शकुन्तला मल।

ऐसा नहीं था कि यह ऑपरेशन आसान रहा। महिला अधिकारियों को मुखबिरों द्वारा कुछ इनपुट्स मिले थे। मुखबिरों द्वारा बताए गए स्थान तक पहुँचने के लिए चारों महिला अधिकारियों को घने जंगल में लगभग डेढ़ घंटे तक पैदल चलना पड़ा। मुस्तैदी रखने और अपनी उपस्थिति छिपाने के लिए गाड़ी का इस्तेमाल नहीं किया गया। रात को ही जंगल में पहुँच कर इन अधिकारियों ने सुबह होने का इन्तजार किया और फिर अपराधी पर धावा बोला। अपराधी अल्लारखां अपने पास न तो मोबाइल रखता था और न ही कोई गाड़ी। वह घोड़े का इस्तेमाल करता था।

एक हफ्ते में AAP के तीन MLA का विकेट गिरा, अब देवेंद्र सेहरावत हुए BJP में शामिल

दिल्ली में बिजवासन से आप के विधायक देवेंद्र सेहरावत आज (मई 6, 2019) बीजेपी में शामिल हो गए हैं। सांध्य टाइम्स से हुई बातचीत में देवेंद्र ने पहले ही स्पष्ट किया था कि वो अब पाला बदल रहे हैं। उनके मुताबिक विधायक होकर जिल्लत झेलते हुए उन्हें काफी समय हो गया था।

देवेंद्र का कहना है कि ‘आप’ में काम की कदर नहीं है। ऐसे में पार्टी में रहकर क्या करना? आज सोमवार को केंद्रीय मंत्री विजय गोयल और भाजपा विधायक विजेन्द्र सिंह ने उन्हें BJP की सदस्यता दिलवाई। नवभारत टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार देवेंद्र सेहरावत ने कहा है कि केंद्र सरकार के सहयोग से उन्होंने 3 हजार करोड़ रुपए का काम कराया है जबकि उनकी सरकार ने एक पैसा तक नहीं दिया। उनका मानना है जब विपक्ष में होकर उन्होंने काफी काम करा लिए, तो बीजेपी में जाकर तो और आसानी होगी।

बता दें कि पिछले एक हफ्ते के भीतर देवेंद्र आम आदमी पार्टी के तीसरे विधायक हैं, जिन्होंने पार्टी का साथ छोड़ा है। इससे पहले 3 मई को गाँधी नगर से विधायक अनिल बाजपेयी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इसके बाद 4 मई को पंजाब में अमरजीत सिंह संदोहा कॉन्ग्रेस में शामिल हुए थे। अमरजीत संदोहा रूपनगर विधानसभा के विधायक हैं।

गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के दो विधायकों के भाजपा में शामिल होने से पहले ही भाजपा इस बात का दावा कर चुकी थी कि आप के 7 विधायक उनके संपर्क में हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी लगातार भाजपा पर खरीद फरोख्त के इल्ज़ाम लगा रही है। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने तो प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप भी मढ़ा है कि वे राफेल की दलाली का सारा पैसा विधायकों को खरीदने में लगा रहे हैं।

मोदी से प्रभावित मुस्लिम महिला ने BJP को दिया वोट, पति ने पड़ोसियों संग मिल कर की पिटाई

नरेंद्र मोदी की विकास वाली नीतियों से प्रभावित होकर राँची स्थित चान्हो की रहने वाली मुस्लिम महिला सहाना खातून ने भाजपा को वोट दे दिया। वोट देकर लौटने के बाद उन्होंने इस बात की चर्चा अन्य महिलाओं से की। जब ये ख़बर उसके ससुराल वालों तक पहुँची तो उसके घर के सभी सदस्य आग-बबूला हो गए। उसके पति कुदुस अंसारी ने सहाना की जम कर पिटाई कर दी। साथ ही उसने यह हिदायत भी दी कि आगे से वह उसी को वोट देगी, जिसे देने को कहा जाएगा। यह इलाका लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में पड़ता है। लोहरदगा से पिछले 10 वर्षों से सुदर्शन भगत सांसद हैं। 2009 और 2014 लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाले सुदर्शन भगत अभी मोदी सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री हैं। उन्हें जनजातीय कार्य मंत्रालय दिया गया है।

दैनिक जागरण के लोहरदगा संस्करण में छपी ख़बर

लोहरदगा संसदीय क्षेत्र में 29 अप्रैल को चौथे चरण के अंतर्गत मतदान हुआ था। उसी दौरान सहाना खातून ने भाजपा को वोट दे दिया। उसने ऐसा परिजनों की इच्छा के विरुद्ध किया था। दैनिक जागरण की ख़बर के अनुसार, जैसे ही उसके ससुराल वालों को इसकी जानकारी मिली, उन्होंने सहाना को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। पति व ससुराल वालों ने उसे ताने कसे। शाम को पति ने गाँव के एक अन्य युवक के साथ मिलकर सहाना की पिटाई कर दी। इसके बाद उसने चान्हो थाना पहुँच कर गुहार लगाई है। अपने बयान में सहाना ने बताया कि ओसामा नाम के व्यक्ति ने उसकी पिटाई की। ओसामा के पिता का नाम हसन है। ओसामा ने सहाना से कहा कि तुम मुस्लिम समुदाय में रहने लायक नहीं हो।

सहाना ने बताया कि उसका पति लगातार उसे तंग कर रहा था और मर्जी के ख़िलाफ़ वोट देने को लेकर सवाल पूछ रहा था। जब महिला ने कहा कि वोट अपनी मर्जी से दिया जाता है, तो वह बदतमीजी पर उतर आया। ओसामा और कुदुस ने पीड़िता की लाठी-डंडे से पिटाई की। उसके पति ने उससे घर छोड़ कर जाने को कहा। इसके बाद डरी-सहमी सहाना अपने बच्चों संग मायके चली गई। थाना प्रभारी ने कहा कि मामले की प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और दोषियों पर जल्द ही उचित कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि तीन तलाक़ जैसे कई मुद्दों पर भी मोदी सरकार को मुस्लिम महिलाओं का साथ मिल रहा है।

प्रभात ख़बर के राँची संस्करण में छपी ख़बर

रविवार (मई 5, 2019) को उत्तर प्रदेश के भदोही में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर की मुस्लिम महिलाओं को सन्देश देते हुए कहा था, “मुस्लिम बहनों से एक बात कहना चाहता हूँ। आज कई मुस्लिम देशों में तीन तलाक़ की परंपरा नहीं है। हम भी भारत की मुस्लिम बहनों को वही अधिकार देना चाहते हैं। हम किसी की धार्मिक भावनाओं का अनादर नहीं करते हैं। महिलाओं को समान अधिकार मिले, इसके लिए हम लगातार काम कर रहे हैं।“

‘भ्रष्टाचारी नंबर-1 ही नहीं बल्कि मॉब लिंचर नंबर-1 भी थे राजीव गाँधी’

शिरोमणि अकाली दल (SAD) के नेता मजिंदर एस सिरसा ने पीएम मोदी द्वारा राजीव गाँधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर-1’ कहे जाने समर्थन किया है। उन्होंने राजीव गाँधी को ‘मॉब लिंचर नंबर-1’ भी कहा। ऐसा कहते हुए उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों का ज़िक्र किया। उस समय राजीव गाँधी ही देश के प्रधानमंत्री थे।

इस वीडियो में आप सुन सकते हैं कि मजिंदर सिंह सिरसा ने पूर्व प्रधानमंत्री को न सिर्फ़ भ्रष्टाचारी कहा बल्कि उन्हें क़ातिल भी कहा क्योंकि उन्होंने हज़ारों बेगुनाह सिखों के घरों में क़हर ढाकर आग लगवाई, कितनी बहनों की इज़्ज़त लुटवाई, ऐसे क़ातिल के रूप में उनका अंत हुआ। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं है कि राजीव गाँधी न केवल एक भ्रष्ट नेता थे बल्कि एक मॉब लिंचर थे जिसने देश में सबसे बड़े क़त्लेआम को अंजाम देने का हुक़्म दिया।

दरअसल, कल यानी 5 मई 2019 को प्रधानमंत्री मोदी ने यूपी के प्रतापगढ़ में एक रैली को संबोधित करने के दौरान राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी नंबर-1 कहा था। उसी के समर्थन में सिरसा ने यह टिप्पणी राजीव गाँधी के ख़िलाफ़ की है। उन्होंने एक बयान में पीएम मोदी को समर्थन देते हुए कहा कि वो (पीएम मोदी) सही कह रहे हैं क्योंकि गाँधी दुनिया के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ मॉब लिंचिंग की योजना बनाई थी।

पीएम मोदी ने राहुल गाँधी के पिता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का नाम लिए बगैर कहा था, “आपके पिता को उनके राज दरबारियों ने गाजे-बाजे के साथ ‘मिस्टर क्लीन’ बना दिया था, लेकिन उनका जीवनकाल ‘भ्रष्टाचार नंबर-1’ के रूप में समाप्त हो गया।”

इसके अलावा पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष की आलोचना भी की और कहा, “नामदार को यह स्पष्ट रूप से सुनना चाहिए कि यह मोदी सोने की चम्मच के साथ पैदा नहीं हुआ था, न ही वह किसी शाही परिवार में पैदा हुआ था।”

पूर्व कॉन्ग्रेसी CM ने मंच से उतरकर युवक को मारा थप्पड़, बस इतना पूछा कि 25 सालों में क्या काम किया

पंजाब के संगरूर लोकसभा क्षेत्र में प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस नेत्री ने एक युवक को सिर्फ़ इसीलिए थप्पड़ मार दिया क्योंकि उसने क्षेत्र के विकास को लेकर सवाल पूछ दिए थे। इलाके में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी केवल सिंह ढिल्लों की चुनावी जनसभा चल रही थी। वहाँ मंच पर पूर्व मुख्यमंत्री बीबी राजिंदर कौर भट्ठल भी मौजूद थीं। इस दौरान एक युवक कुलदीप सिंह ने उनसे पूछ डाला कि 25 वर्ष विधायक रहने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया है? बस, फिर क्या था। सवाल सुनते ही बीबी भट्ठल गुस्से से आगबबूला हो गईं और मंच से नीचे उतरने लगीं। युवक ने जब अपना सवाल दोहराया तो भट्ठल ने उसे एक तमाचा जड़ दिया।

इसके बाद सुरक्षाकर्मियों व कॉन्ग्रेस समर्थकों द्वारा युवक को खींच कर वहाँ से दूसरी तरफ ले जाया गया। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा युवक के साथ धक्का-मुक्की भी की गई। युवक ने भट्ठल के ख़िलाफ़ नारे लगाने शुरू कर दिए, जिसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री वहाँ से चली गईं। युवक ने भट्ठल के इस कृत्य को धक्केशाही का नाम देते हुए कहा कि क्या एक आम आदमी अपने नेता ऐसे सवाल तक नहीं पूछ सकता? युवक ने बताया कि आक्रोशित बुशैहरा गाँव के लोग सोमवार (मई 6, 2019) को भट्ठल के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करेंगे। आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि इस तरह भागने से कुछ नहीं होगा। भगवंत ने कहा कि लोगों के सवालों के जवाब तो देने पड़ेंगे।

उधर संगरूर स्थित दिड़बा के चट्ठा ननहेड़ा गाँव में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी केवल सिंह ढिल्लों के पुत्र करण सिंह ढिल्लों प्रचार के लिए पहुँचे तो उन्हें ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। लोगों ने कॉन्ग्रेस पर गुटका साहिब की बेअदबी का आरोप लगाया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने विरोधी पार्टियों पर माहौल ख़राब करने का आरोप लगाया। केवल सिंह ढिल्लों की जनसभा में टीईटी पास अभ्यर्थियों ने भी हंगामा किया और पूछा कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह के सत्ता संभालने के बाद से कितने प्रशिक्षित युवकों की भर्तियाँ हुई हैं? एक युवक ने बताया कि ढिल्लों ने 6.5 लाख लोगों को रोज़गार देने का दावा किया लेकिन जब उनसे सवाल पूछा गया कि एक भी ऐसे गाँव का नाम बताएँ जहाँ रोज़गार मिला तो, तो वह खिसक लिए।

एक अन्य युवक रणदीप सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कहा कि क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था चौपट हो गई है। उन्होंने बताया कि भट्ठल इलाके में 12 कॉलेज खोलने का दावा करती हैं लेकिन सभी कॉलेज प्राइवेट हाथों में हैं। बेरा गाँव के बहल सिंह ने जब-जब कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ढिल्लों और पूर्व मुख्यमंत्री भट्ठल से सवाल पूछना चाहा तो वे जल्दी-जल्दी में भाग खड़े हुए। ढिल्लों ने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ युवकों को बहका कर उनकी जनसभाओं में हंगामा करवा रही हैं वरना वह रोज़गार और विकास पर बात करने के लिए तैयार हैं।

राजिंदर कौर भट्ठल नवंबर 1996 से फरवरी 1997 तक पंजाब की मुख्यमंत्री रही थीं। वह लहरा विधानसभा क्षेत्र से लगातार 25 वर्षों तक (1992-2017) विधायक रह चुकी हैं। लहरा संगरूर लोकसभा क्षेत्र में ही आता है, इसीलिए लोग उनसे नाराज़ हैं। ताज़ा लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी केवल सिंह ढिल्लों का मुक़ाबला शिरोमणि अकाली दल के परमिंदर सिंह ढींढसा और आम आदमी पार्टी के भगवंत मान से हो रहा है। ढींढसा प्रदेश के वित्त मंत्री रह चुके हैं।

एयरसेल मैक्सिस घोटाला: चिदंबरम पिता-पुत्र को अदालत ने 30 मई तक दी गिरफ़्तारी से राहत

एयरसेल-मैक्सिस घोटाला मामले में आरोपित पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को अदालत ने 30 मई तक गिरफ्तारी से राहत दी है। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस मामले की जाँच कर रही है। अदालत ने 30 मई तक दोनों कॉन्ग्रेस नेताओं को गिरफ़्तारी से अंतरिम प्रोटेक्शन दिया। स्पेशल जज ओपी सैनी ने चिदंबरम पिता-पुत्र के वकील और कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया। सरकारी एजेंसियों की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जाँच पूरी करने के लिए और समय की माँग की।

अदालत कई बार चिदंबरम को गिरफ़्तारी से राहत दे चुकी है। ऐसा पिछले वर्ष से ही चला आ रहा है। इस से पहले प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआइ ने अदालत से कहा था कि पी चिदंबरम जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। 2018 में 30 मई को गिरफ़्तारी से राहत के लिए कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद से उन्हें कई मौकों पर कोर्ट से राहत मिल चुकी है। इसी साल अगस्त महीने में सीबीआई के स्पेशल जज ओपी सैनी ने उन्हें अक्टूबर तक गिरफ्तारी से राहत प्रदान की थी।

उससे पहले शीर्ष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायलय के चिदंबरम पिता-पुत्र को जमानत देने सम्बन्धी फैसले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया था। बता दें कि उस समय कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने उनकी तरफ से अदालत में जिरह की थी। पिछले वर्ष दिसंबर में भी उन्हें अदालत द्वारा 11 जनवरी तक गिरफ़्तारी से राहत प्रदान की गई थी।

पी. चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री रहते हुए गलत तरीके से विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। उन्हें 600 करोड़ रुपए तक के निवेश की मंजूरी देने का अधिकार था, लेकिन यह सौदा करीब 3500 करोड़ रुपयों के निवेश का था। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपने अलग आरोप पत्र में कहा है कि कार्ति चिदंबरम के पास से मिले उपकरणों में से कई ई-मेल मिली हैं, जिनमें इस सौदे का जिक्र है। इसी मामले में पूर्व टेलिकॉम मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन भी आरोपित हैं।

₹1381 करोड़ की कुल मदद का ऐलान, PM मोदी ने ‘फोनी’ से हुई तबाही का लिया जायजा

शुक्रवार (मई 3, 2019) को ओडिशा में आए चक्रवाती तूफान फोनी से हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए आज (मई 6, 2019) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भुवनेश्वर पहुँचे। उन्होंने हवाई सर्वेक्षण के जरिए तूफान से हुए नुकसान का आकलन किया और उससे हुई तबाही से उबरने के लिए ₹1000 करोड़ की तत्काल मदद का ऐलान भी किया। बता दें कि केंद्र सरकार की तरफ से पहले ही ₹381 करोड़ के मदद की घोषणा की जा चुकी है।

इस दौरान पीएम मोदी ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की प्रशंसा की। उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि नवीन बाबू ने हर चीज की योजना बहुत अच्छी तरह से बनाई और केंद्र सरकार उन्हें इन सभी चीजों को आगे बढ़ाने में मदद करेगी। पीएम ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की टीमों और स्थानीय जिला प्रशासन की टीमों ने मिलकर बेहतर ढ़ंग से काम किया। साथ ही उन्होंने ओडिशा के नागरिकों और मछुआरों की भी तारीफ करते हुए कहा कि यहाँ के लोगों ने जिस तरह से सरकार के हर निर्देश का पालन किया, वो सराहनीय है और इसी वजह से जान की हानि कम हुई। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हर कदम पर ओडिशा के साथ है।

जानकारी के मुताबिक, पीएम मोदी ओडिशा की तरह पश्चिम बंगाल में भी चक्रवाती तूफान के बाद उत्पन्न स्थिति के लिए समीक्षा बैठक करना चाहते थे। इसके लिए वहाँ की सरकार को पत्र भी लिखा गया, लेकिन राज्य की ममता सरकार ने जवाब में कहा कि सरकारी अधिकारी चुनाव ड्यूटी में बिजी हैं, इसलिए समीक्षा बैठक नहीं हो सकती।

इस तूफान से ओडिशा के 11 जिले प्रभावित हुए हैं। पुरी व खुर्दा पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। अभी भी बिजली, पानी और खाने के सामान की आपूर्ति सुचारू ढंग से शुरू नहीं हो पाई है। राज्य सरकार ने कहा है कि हालात को सामान्य बनाने के लिए युद्धस्तर पर कार्य किए जा रहे हैं। तूफान से 10 हजार गाँव व 52 शहरी इलाके प्रभावित हुए हैं और करीब एक करोड़ की आबादी इसकी चपेट में आई है। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने उम्मीद जताई है कि बहुत जल्द पुरी व भुवनेश्वर में बिजली-पानी की आपूर्ति सुचारू रूप से होने लगेगी। इसके साथ ही उन्होंने रविवार (मई 5, 2019) को कहा कि प्रभावित इलाकों में अगले 15 दिनों तक सरकार लोगों को नि:शुल्क भोजन उपलब्ध कराएगी।

आखिर कॉन्ग्रेस पार्टी ने स्वयं ही राजीव गांधी को ‘नीच डकैत’ क्यों कहा?

कहते हैं राजनीति में कोई किसी का मित्र या शत्रु नहीं होता। यह भी कहा जाता है कि शब्द दोधारी तलवार होते हैं जिसे लिखने वाला अपने हिसाब की बातें लिखने के लिए मनचाहे तरीके से इस्तेमाल कर सकता है। कई बार आदमी सही बात लिखते हुए एक दो शब्द छुपा जाता है जिससे दो विपरीत अर्थ सामने आते हैं।

एक व्यक्ति हैं संजय झा। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता हैं। प्रवक्ता का मतलब होता है पार्टी की आधिकारिक बात को जनता के सामने रखना। कॉन्ग्रेस के क़रीबी माने जाते हैं, पार्टी के बड़े नेता भी माने जाते हैं। मैंने ‘माने जाते हैं’ लिखा है क्योंकि आज कल जिस तरह की बातें लिख रहे हैं, वो कॉन्ग्रेस के क़रीबी या नेता तो नहीं ही लिखेंगे। जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल संजय झा कर रहे हैं, उससे लगता है कि वो नाराज हैं, वो भी बहुत ज़्यादा।

हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने मंच से एक सत्य बोला। सत्य यह था कि राजीव गाँधी भ्रष्ट व्यक्ति थे। इससे किसी को क्या आपत्ति होगी! राजीव गाँधी न सिर्फ भ्रष्ट थे, जो कि बोफ़ोर्स घोटालों से एक्सपोज हुए बल्कि अपनी माताजी की हत्या का बदला लेने के लिए पार्टी काडरों को सिखों के नरसंहार के लिए उकसाने वाले हत्यारे भी कहे जा सकते हैं। इसके अलावा भोपाल गैस कांड की लाशों का ख़ून भी राजीव गाँधी के शरीर पर नहीं तो हाथ पर तो ज़रूर है क्योंकि एंडरसन को देश से बाहर भागने का सरकारी मौका उन्होंने ही उपलब्ध कराया। समुदाय विशेष की महिलाएँ अगर हाल के दिनों तक तीन तलाक के कुत्सित परम्परा का भार उठाती घूम रही थीं, तो उसमें भी राजीव गाँधी ही केन्द्र में आते हैं।

जिस पार्टी का नारा ही प्रधानमंत्री को चोर कहते हुए लोकसभा चुनाव में जाने का है, वो अपने इतिहास को भूल कर मर्यादा और पद की गरिमा, मृतक को सम्मान आदि की बात कैसे कर सकती है। प्रधानमंत्री मोदी पर अपराध साबित होना तो छोड़िए, आरोप पर केस तक दर्ज नहीं हुआ है, लेकिन कॉन्ग्रेस के मुखिया, राजीव गाँधी के लाड़ले और लाडली के लिए ‘चौकीदार चोर है’।

ये बड़े घरों में पलने वाले लोग हैं। इन्हें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले इनके पिता ने पलट दिए थे, तो इस माहौल की परवरिश पाकर बड़े हुए बच्चे तो अपने हर शब्द को कानून ही समझेंगे। भले ही राजीव के 410 को राहुल ने 44 पर पहुँचा दिया, पर ऐंठन तो वही रहेगी न! आखिर, ये बच्चे अपने हर शब्द को सत्य क्यों नहीं मानेंगे? ये तो इनका विशेषाधिकार है क्योंकि इन्होंने न सिर्फ भारत को तीन (+१) प्रधानमंत्री दिए हैं, बल्कि चोरों को भारत रत्न तक से नवाज़ा है और डकैती को जस्टिफाय कर दिया है।

बाद में भारत की इमोशनल जनता कहने लगती है, “लेकिन यार वो मर गया, अब उसको घेरने से क्या फायदा!” वाह! मतलब लाखों-करोड़ों की दलाली, लाखों करोड़ों के घोटाले, हजारों सिखों की हत्या, विदेशी अपराधियों को मामा-चाचा समझ कर देश से बाहर निकलने का मौका देना और सिर्फ राजीव गाँधी की मौत से वो हर अपराध से मुक्त हो जाएँगे!

हिटलर, स्टैलिन, माओ, चर्चिल, ओबामा, बुश आदि में से कोई भी नरसंहारों के ख़ून से अपने आप को मुक्त नहीं कर सकता। इन सब ने राजनैतिक या निजी कारणों से जर्मनी, रूस, चीन, बंगाल, सीरिया, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान आदि में नरसंहार किए हैं। इन्हें जो भी कारण देकर जस्टिफाय किया जाए, भले ही ओबामा को शांति का नोबेल दे दिया जाए, लेकिन तथ्य यही है कि किसी एक देश की जनता को खुश करने के लिए बंगाल के अकाल के दौरान बुद्धिमान माना जाने वाला चर्चिल लाखों बंगालियों की मौत का ज़िम्मेदार रहेगा।

ओबामा के हाथ में भी सीरयाई आबादी का रक्त है, बुश के हाथों पर भी लाखों निर्दोषों का ख़ून है। उसी तरह सत्ता का गलत इस्तेमाल करके 1984 के सिख हत्याकांड का, जिसे दंगा कह कर उसके दुष्प्रभाव को कम करने का नैरेटिव बनाया जाता है, रक्त राजीव गाँधी के हर लिबास पर रहेगा जो संग्रहालयों में टँगे हुए हैं। माता की हत्या का बदला पूरे समुदाय से लेना, एक राजनैतिक पार्टी द्वारा एक धर्म के लोगों को निशाना बनाना, और हत्यारों को मुख्यमंत्री, सांसद, कैबिनेट मंत्री बनाना, उन लाखों सिखों की सिसकती घावों में नमक छिड़कने जैसा है।

मोदी ने क्या गलत कहा? मोदी को भी तो हर न्यायालय से छूट मिलने के बावजूद चोर और हत्यारा कहने वाले वही लोग हैं जो अपने पिता का नाम उसके मुँह से सुन कर बिलख रहे हैं। राजीव गाँधी भले ही राहुल और प्रियंका के पिता हैं, तो एक पिता के तौर पर तो बच्चों को हमेशा परिवार के साथ खड़े रहना चाहिए, लेकिन वो पिता प्रधानमंत्री भी था, और दुर्भाग्य से चोर और हत्यारा भी। देश उनके पिता से बड़ा है और अगर ये दोनों देशभक्त हैं तो राहुल या प्रियंका को मोदी की बात सुन कर चुपचाप रोने के बाद, आँसू के घूँट पीकर, रैली में किसी और विषय पर भाषण देते रहना चाहिए था।

उन्होंने क्या किया? उन्होंने ट्वीट लिख कर समर्थन जुटाने की बात सोची, और सोशल मीडिया इन दोनों डिम्पलधारियों को उनके पिता का वह इतिहास भी बता रहा है, जो उन्हें याद भी नहीं होगा।

दूसरी बात यह है कि किसी की मृत्यु, चाहे जैसे भी हुई हो, उसके कारनामों को पब्लिक चर्चा में लाना तब तक सही है जब तक वो एक पब्लिक व्यक्ति था। अगर आप किसी के निजी संबंधों पर, उसकी पत्नी पर, उसकी माँ पर हमले करेंगे, जो किसी भी तरह से राजनीति से जुड़े नहीं; आप उन पर चोरी का आरोप लगाएँगे जो हर तरह से ईमानदार है, फिर तो वो भी आप के बाप, दादी और परनाना तक जाएगा ही। ये तो सीधा गणित है कि पोलिटिकल कैम्पेन में कीचड़ उछालने का हक़ सिर्फ एक पार्टी को नहीं है।

चूँकि राजीव गाँधी की हत्या राजनैतिक कारणों से हुई, तो इससे उनके पाप तो नहीं धुलते। हाँ, उनकी मृत्यु का मजाक नहीं बनाया जा सकता, लेकिन इतिहास में दर्ज ग़लतियाँ तो उन्हें हमेशा बुलाती रहेंगी। उन्हें तो उनके असामयिक मृत्यु ने कई फजीहतों से बचा लिया और कोर्ट के चक्कर काटने से वो बच गए, लेकिन उनके सर पर तमाम अपराध तो रहेंगे ही।

अब बात संजय झा जैसे नेताओं की जो अंग्रेज़ी में ट्वीट करते हुए ‘डेस्पिकेबल डेस्पराडो’ लिखते हैं। इसमें अनुप्रास अलंकार है। शायद इसीलिए भी संजय जी लिखते-लिखते नाम लिखना भूल गए कि आखिर वो घेर किसको रहे हैं। उनका ट्वीट कहता है, “जर्मनी में लोगों ने हिटलर को भुलाया नहीं है। लेकिन वो हिटलर और उसने जो मानवता के साथ किया, उस पर शर्मिंदा होते हैं। ऐसा ही प्रारब्ध इस नीच डकैत का भी इंतजार कर रहा है।”

संजय झा ने नाम तो नहीं लिखा, जबकि उस ट्वीट में अभी जगह और कैरेक्टर बचे हुए थे। संजय झा पढ़े-लिखे व्यक्ति की तरह नज़र आते हैं जिनकी शब्दावली में ‘डेस्पिकेबल’ और ‘डेस्पराडो’ जैसे शब्द हैं। फिर वो नाम लिखना क्यों भूल गए। पढ़े-लिखे लोग भूलते नहीं, जानबूझकर छोड़ देते हैं बातों को। जिस पार्टी ने मोदी को नाम लेकर दिन में दस बार कोसा हो, उसके संजय को नाम लिखने के लिए दिव्य दृष्टि की ज़रूरत नहीं।

फिर थोड़ा गणित का हिसाब लगाते हैं तो पता चलता है कि हिटलर से उनका मतलब राजीव गाँधी से है जिसने मनमानी भी की, और मानवता उसके कृत्यों से लज्जित भी है। कॉन्ग्रेस के अलावा पूरा देश इस बात से शर्मिंदा है कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है, और उस धरती के हिलने का मतलब होता है हजारों सिखों को काटना, मारना और ज़िंदा जलाना।

इसके बाद उन्होंने उस समय के आने की भविष्यवाणी की है जब इस ‘डेस्पिकेबल’ (जिसका मतलब होता है नीच, घटिया, निंदनीय, घृणित, तिरस्कार योग्य, नाली का कीड़ा, अधम, घिनौना, नफ़रत पैदा करने वाला आदि) ‘डेस्पराडो’ (जिसका मतलब होता है डकैत, लुटेरा, शोहदा, गुंडा, ठग, बदमाश, दुष्ट, शठ, गलाकाटू आदि) को भी वैसे ही याद किया जाएगा।

इन दोनों शब्दों के मैंने जितने भी मतलब लिखे हैं, उसके दायरे में कॉन्ग्रेस का लगभग हर बड़ा नेता आ जाएगा। इन दोनों शब्दों के अर्थों पर राजीव गाँधी बिलकुल सटीक उतरते हैं। उन्होंने समाज में घृणा भी फैलाई, निंदनीय कार्य भी किए, घिनौने नरसंहार को अपनी ‘अध्यक्षता’ में संचालित किया और डकैती तो इतनी की है कि अभी तक नई बातें सामने आ ही रही हैं।

संजय झा को ऐसी बातें नहीं लिखनी चाहिए थीं। वो अभी भी पार्टी में ही हैं, और उन्हीं राजीव गाँधी के परिवार की छत्रछाया में उनके जैसे लोग अपना भरण-पोषण कर रहे हैं। संजय झा के इस ट्वीट से पता चलता है कि वो जिस थाली में खाते हैं, उसी की क्वालिटी पर नकारात्मक ट्वीट लिखते हैं। उनकी यह चालाकी अभी तो किसी की पकड़ में नहीं आ रही क्योंकि मंदबुद्धि लोग कॉन्ग्रेस के शीर्ष पर आसीन हैं, लेकिन पता चलते ही इन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों को कारण निकाला जाएगा।

अब राजीव गाँधी को भ्रष्ट कहने पर दुःखी और नैतिकता का लबादा ओढ़े भारत की आम जनता को भी यह बताना ज़रूरी है कि हाल ही में अटल बिहारी बाजपेयी की मृत्यु पर इन्हीं कॉन्ग्रेसियों और उनके समर्थक पार्टियों के कार्यकर्ताओं से लेकर कई बड़े लोगों ने ज्ञान दिया था कि उनकी मौत से उनके पिछले कर्मों का हिसाब नहीं होता।

यही तर्क राजीव से लेकर नेहरू तक लगेगा। उनकी मृत्यु हो गई लेकिन उनकी हरकतों और नीतियों का परिणाम पूरा भारत आज भी भुगत रहा है। उनकी असमय हत्या उनकी गलत नीतियों, भ्रष्टाचार या नरसंहारों के पाप से उन्हें मुक्त नहीं करती। बल्कि ऐसी बातें तो नैतिक शिक्षा की किताबों में पढ़ाई जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने ही देश के साथ किए गए अपराधों के ज़िम्मेदारों को सरकारी गाड़ी में बिठाकर भगाना कितना गलत है।

अंत में संजय झा जी को नमन रहेगा कि उन्होंने सैम पित्रोदा की तरह चाटुकारिता नहीं दिखाई और राजीव गाँधी को ‘ग्रेट लीडर’ कह कर राहुल गाँधी के क़रीबी होने का दावा नहीं किया। सत्य बोलने वाले को डराया जा सकता है, लेकिन ज़्यादा समय तक चुप नहीं रखा जा सकता। संजय झा इस कार्य के लिए सराहना के पात्र हैं, देश को उन पर गर्व है और इसीलिए संजय झा जी को ‘नमन रहेगा’।