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बलात्कार का आरोपी ‘अतानासियो मोंसेरेट’ कॉन्ग्रेस में शामिल, उत्पल पर्रिकर के ख़िलाफ़ लड़ने की संभावना

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, गुरुवार को नाबालिग के साथ बलात्कार के आरोपी पूर्व शिक्षा मंत्री अतानासियो मोंसेरेट को कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल कर लिया गया। ऐसा अनुमान है कि पणजी निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा उपचुनाव के लिए उसे उम्मीदवार बनाया जाएगा। राज्य में उपचुनाव 19 मई को निर्धारित किया गया है।

कथित तौर पर, बलात्कार के आरोपी अतानासियो मोंसेरेट को कॉन्ग्रेस द्वारा पणजी से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भावी उम्मीदवार उत्पल पर्रिकर (दिवंगत मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के बेटे) के ख़िलाफ़ मैदान में उतारने की तैयारी है।

बता दें कि मोंसेरेट को राजनीतिक दल बदलने की आदत है। उसने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत यूनाइटेड गोअन डेमोक्रेटिक पार्टी (UGDP) के सदस्य के रूप में की, फिर 2004 में भाजपा में शामिल हुआ और 2007 में UGDP में वापस आ गया।

इसके बाद वो कॉन्ग्रेस का सदस्य बन गया, लेकिन बाद में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए 2015 में उसे पार्टी से निकाल दिया गया। तब से वह गोवा फॉरवर्ड (GF) में था।

माना जाता है कि 2018 में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार और मानव तस्करी के आरोप में मोंसेरेट के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद वो राज्य की राजधानी में एक प्रमुख नेता है। अधिकारियों ने पहले भी उसके ख़िलाफ़ जबरन वसूली का एक मामला दर्ज किया था।

कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद मोंसेरेट ने मीडियाकर्मियों से कहा, “आप इसे विलक्षण पुत्र की वापसी कह सकते हैं, बेटे ने हर जगह घूमते हुए सबक सीखा है। यह घर वापसी जैसा है। मैं यहाँ भाजपा को हराने के लिए हूँ।”

यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मोंसेरेट की राजनीतिक पकड़ और उनके प्रभाव के साथ, कॉन्ग्रेस अब पणजी विधानसभा सीट जीतने की उम्मीद कर सकती है और राज्य की दो लोकसभा सीटों पर भी लाभ प्राप्त कर सकती है।

रवीश जी, साध्वी प्रज्ञा पर प्राइम टाइम में आपकी नग्नता चमकती हुई बाहर आ गई (भाग 4)

कुछ समय पहले की बात है एक नवयुवक को 1994 में पुलिस ने पकड़ा था और 2016 में उसे कोर्ट ने रिहा किया क्योंकि वो बेगुनाह था, और सबूत नहीं मिले। नाम जानना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि रवीश कुमार के प्राइम टाइम का यह इंट्रो आप आँख मूँद कर सुनेंगे तो भी आपको नाम और मज़हब का अंदाज़ा हो जाएगा। रवीश ने सालों को 365 से गुणा करके दिन निकाले और बताया कि वो संख्या कितनी बड़ी है।

सामान्य आदमी इसे देख कर दुःखी हो जाएगा कि कई बार निर्दोष लोग जेल पहुँच जाते हैं, और उन्हें न्याय के लिए कितना इंतजार करना पड़ जाता है। ये जानना ज़रूरी नहीं है कि किस सरकार के कार्यकाल में वो व्यक्ति पकड़ा गया था, और किस सरकार के कार्यकाल में रिहा हुआ। वो बताने पर दोनों का क्रेडिट गलत सरकारों को चला जाएगा। हें, हें, हें…

अब नया प्राइम टाइम आया साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर। असीमानंद और कर्नल पुरोहित को कोर्ट से राहत मिल चुकी है, और हिन्दू टेरर, या भगवा आतंकवाद की लॉबी और कोरस का सच बाहर आ चुका है। चिदम्बरम और कॉन्ग्रेस ने कथित अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था, और मकोका जैसी धाराएँ लगा कर, भाजपा, संघ और यहाँ तक सेना से जुड़े डेकोरेटेड अफसर को इसमें लपेटा था, उसे कोर्ट और एजेंसियों ने बारी-बारी से या तो रिहा किया या चार्ज हटा लिए।

रवीश कुमार एक ज्ञानी व्यक्ति हैं। ज्ञानी व्यक्ति के साथ एक समस्या होती है। चूँकि, उसके पास शब्द होते हैं, तो वो प्रोपेगेंडा करने में महारत हासिल कर लेता है। वो समुदाय विशेष के व्यक्ति पर केस साबित न होने पर आपको इस तरह के शब्द सुनाएगा कि आप रो देंगे। वो बताएगा कि जब वो जेल गया था, तब उसकी उम्र क्या थी, और बाहर आने पर कितने हजार दिन बीत गए।

मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा कहना गलत है। लेकिन प्रपंच तब बाहर आता है, और क्लीन, स्मूथ तरीके से चमकता हुआ बाहर आता है जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को, जिस पर हिन्दू आतंक की मुहर लगाकर, पुलिस ने कॉन्ग्रेस के आकाओं को संतुष्ट करने के लिए मकोका लगाया था, और उसे आतंकवादी बनाने की सारी क़वायद पूरी की, भाजपा उसे चुनाव लड़ने के लिए टिकट देती है।

यहीं पर ज्ञानी आदमी धूर्त हो जाता है। यहाँ पर वो यह भूल जाता है कि जो संवेदना उसने विशेष समुदाय के आरोपित पर दिखाई थी, जैसे 365 को सालों से गुणा करके दिनों की संख्या निकाली थी, वही संवेदना उसे उस लड़की के लिए भी दिखानी थी जिसे युवावस्था में आतंक के आरोप में जेल में जाला गया। सबूत के नाम पर एक स्कूटर जो उसने सालों पहले बेच दिया था, और उसके काग़ज़ात पुलिस को दे दिए। फिर टॉर्चर का एक निर्मम दौर जिसमें मार-पीट से लेकर अश्लील ऑडियो और विडियो दिखाने और पुरुषों के साथ जेल में रखना तक शामिल है।

यहाँ पर रवीश ने गम्भीर चेहरा बना यह नहीं कहा कि यहाँ दो तस्वीरें हैं, एक युवती की जो अपने जीवन को सही तरीके से जी रही थी, जो साधना और ईश्वर को समर्पित थी, और एक दिन पुलिस उसे उठा कर ले जाती है, उस पर भगवा आतंक का ठप्पा लग जाता है। दूसरी तस्वीर सालों बाद की है जब वो बाहर आती है, और उस पर लगे इल्जाम हटा लिए जाते हैं क्योंकि पुलिस के सबूत बेकार और कोर्ट में नकारे जाने योग्य साबित हुए।

रवीश और भी गम्भीर होकर कहते कि सोचिए उसने अपने परिवार के साथ बिताए कितने लाख सेकेंड खोए, सोचिए कि एक युवती जिसके सामने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और रचनात्मक साल थे, उसे पुलिस ने सिर्फ इसलिए नोंच लिया क्योंकि उसका कपड़ा भगवा था, और वो ईश्वर की साधना करती थी, और सबसे बड़ी बात कि वो सनातन थी, वो हिन्दू थी।

लेकिन रवीश ने ऐसा कहना नहीं चुना। रवीश भूल गए कि संविधान, कानून और चुनाव आयोग हर उस व्यक्ति को चुनाव लड़ने की आज़ादी देता है जिस पर अपराध साबित न हुए हों। रवीश का दोहरापन तब सामने आ जाता है जब वो बेगूसराय जाकर कन्हैया को लगभग माउथ-टू-माउथ फ़्रेंच किस विद टंग एक्शन दे देते हैं, लेकिन चूँकि साध्वी प्रज्ञा पर कभी आतंक के इल्जाम लगे थे तो इल्ज़ाम लगने मात्रा से आतंकी हो जाती है।

जब-जब मैं सोचता हूँ कि ये व्यक्ति और कितना गिरेगा, तब-तब यह मुझे आश्चर्य में डाल देते हैं कि अजीत भाई, ये तो इब्तिदा है, रोता है क्या, आगे-आगे देख, होता है क्या!

रवीश इतने घटिया स्तर के पत्रकार हो चुके हैं कि लालू तक के फ़ेवर में बोल लेते हैं, और ममता के बंगाल की तस्वीर बताने में उन्हें शर्म आती है, लेकिन किसी पर महज़ आरोप लगने को, अगर वो उनकी विचारधारा से अलग हो, उसे अपराधी मान लेते हैं। ये जो भी हो, पत्रकारिता तो नहीं है। रवीश को अपने दर्शकों में यह ज़हर भरने का कोई अधिकार नहीं है।

रवीश एक घोर साम्प्रदायिक और घृणा में डूबे व्यक्ति हैं जो आज भी स्टूडियो में बैठकर मजहबी उन्माद बेचते रहते हैं। साम्प्रदायिक हैं इसलिए उन्हें मजहबी व्यक्ति की रिहाई पर रुलाई आती है, और हिन्दू साध्वी के कानूनी दायरे में रह कर चुनाव लड़ने पर यह याद आता है कि भाजपा नफ़रत का संदेश बाँट रही है।

अवसादग्रस्त रवीश के लिए उनका स्टूडियो ही लोकतंत्र के तीनों पिलर पर ब्रासो मारने वाली अकेली जगह है जहाँ वो हर सुबह इन तीनों पिलर की जड़ों में पानी डालते हैं, फिर उसके आस-पास झाड़ू लगाते हैं, और फिर ध्यान में बैठकर कहते हैं कि हे पिलरो! मैंने सालों से तुम्हारा ख़्याल रखा है, अब मैं चाहता हूँ कि मैं ही लोकतंत्र बन जाऊँ, मैं ही न्यायाधीश, मैं ही संविधान, मैं ही विधायिका, मैं ही सब कुछ हो जाऊँ। अतः, आप मेरे अंदर समाहित हो कर मुझे ऊर्जा प्रदान करें।

फिर रवीश स्वयं ही संविधान को अपने हिसाब से देखते हैं, न्यायपालिका जब उनके हिसाब की जजमेंट देती है, तो लोकतंत्र की जीत बताते हैं, वायर पर मानहानि का दावा करती है तो उसे डाँटते हैं कि आखिर जज नेताओं को कैसे एंटरटेन कर लेते हैं। वो बताते हैं कि चुनाव आयोग, या रीप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट तब ही सही होगा जब उनके द्वारा सत्यापित लोग चुनाव लड़ें। अन्यथा, बाकी किसी पर आरोप भी लगे हैं, तो भी वो चुनाव नहीं लड़ सकता।

रवीश कुमार पत्रकार हैं, और फेसबुकिया बुद्धिजीवी भी। वो जो कर रहे हैं, उसे अभिव्यक्ति कहते हैं। लेकिन वो जो कर बैठते हैं, और स्वयं को सर्वेसर्वा मान कर ज्ञान बाँच देते हैं, कि दाग़ी और ऐसे आरोप वाले लोगों को चुनाव लड़ाना गलत है, तो फिर रवीश कुमार के बौद्धिक आतंकवाद का क्या इलाज है?

स्वयं पूरी दुनिया को टीवी देखना छोड़ने से लेकर मोबाइल बंद कर लीजिए, और टीवी फोड़ लीजिए बताने वाले, स्वयं टीवी पर क्या घास छीलने आते हैं? ज़ाहिर है कि इनका प्रपंच और प्रोपेगेंडा उसी दुकान से चलेगा जहाँ हर दिन इनके चेहरे की चमक, मोदी सरकार द्वारा तमाम एलईडी बाँटने के बाद भी, मंद पड़ती जाती है।

आखिर रवीश कुमार अपने ही टाइमलाइन पर पड़ने वाली गालियों का संज्ञान लेकर, स्वयं ही इसे अपनी घटिया पत्रकारिता पर जनता की वृहद् राय मानते हुए, इसे ऑनररी (अर्थात मानद) आरोप मान कर, पत्रकारिता की दुनिया से निकल कर कहीं किसी पार्टी में क्यों नहीं चले जाते? क्योंकि इनका मालिक तो पैसों की हेराफेरी में भीतर जाएगा ही, नौकरी भी बहुत दिन नहीं कर पाएँगे।

लेकिन रवीश ऐसा नहीं करेगा। रवीश एक घाघ व्यक्ति हैं। रवीश कोर्ट पहनते हैं, और अब टाई नहीं लगाते। रवीश अब मज़े नहीं ले पाते। रवीश पूरे पाँच साल से स्टूडियो से कैम्पेनिंग कर रहे हैं। रवीश को राहुल गाँधी द्वारा ‘हम बीस लाख सरकारी नौकरियाँ देंगे’ विजनरी बात लगती है, लेकिन वो पूछ नहीं पाते कि कैसे दोगे? लेकिन रवीश मोदी जी से रात के चार बजे भी फेसबुक पर कुछ भी पूछ लेते हैं।

फ़िलहाल, रवीश की धूर्तता आती रहनी ज़रूरी है ताकि ऐसे नकली पत्रकारों पर से लोगों का विश्वास उठे जो कि समाज में घृणा और भय के अलावा कुछ नहीं पहुँचा रहा। ये वो व्यक्ति है जो शांत समुदायों को यह कह कर भड़काता रहता है कि मोदी और उसके नेता उन्हें सताते हैं, डराते हैं, उनके खिलाफ माहौल बनाते हैं। इस व्यक्ति को लोकतंत्र में कोई विश्वास नहीं क्योंकि इस लोकतंत्र ने मोदी को चुना है, और वो उस मोदी को जिसे बहुमत प्राप्त है, सुप्रीम लीडर, यानी तानाशाह कहता रहता है।

खैर जो भी हो, रवीश जैसों के अजेंडे को बाहर लाने के लिए उसकी हर बात पर लेख लिखना ज़रूरी है। उनकी हर धूर्तता पर यह कहना ज़रूरी है कि सर आपने दो बार में, एक ही तरह की बात पर दो अलग बात कही थी क्योंकि एक हिन्दू था, एक दूसरे समुदाय का। रवीश जैसे लोग पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं, और इस बात का अच्छा उदाहरण हैं कि पक्षपाती पत्रकारिता आपको किस गर्त में ले जा सकती है।

साध्वी प्रज्ञा चुनाव लड़ेगी क्योंकि आज ही चुनाव आयोग ने उन पर उठाए जा रहे प्रश्नों को निरस्त करते हुए कहा है कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, कोई भी व्यक्ति चुनाव लड़ने को स्वतंत्र हैं। ये बात और है कि रवीश कुमार स्वयं को हर बात का सबसे बड़ा विशेषज्ञ मान कर चलते हैं, और गाँव की कहावत की तरह विष्ठा को देखने के बाद, छू कर पहचानने की कोशिश करते हैं, तब भी मन नहीं भरता तो नाक तक लाकर सूँघते हैं, और कहते हैं, ‘अरे! ये तो टट्टी है!’

हें… हें… हें…

यह रविश शृंखला पर चौथा लेख है, बाकी के तीन लेख यहाँ, यहाँ, और यहाँ पढ़ें।

इलाहाबाद HC ने कॉन्ग्रेस के ‘न्याय योजना’ पर पार्टी से माँगा जवाब, योजना को बताया रिश्वतखोरी

लोकसभा के मद्देनजर कॉन्ग्रेस पार्टी ने जनता से वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आती है, तो देश के 25 फीसदी गरीब परिवारों को हर साल ₹72,000 दिए जाएँगे। कॉन्ग्रेस पार्टी इस वादे का जोर-शोर से प्रचार कर रही है और इस वादे के दम पर चुनाव जीतने का भी ख्वाब देख रही है, लेकिन अब कॉन्ग्रेस पार्टी ‘न्याय योजना’ को लेकर परेशानियों में घिरती नजर आ रही है। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस वादे को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ मानते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी को नोटिस जारी किया है।

बता दें कि, कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि इस तरह की घोषणा वोटरों को रिश्वत देने की कैटगरी में क्यों नहीं आती और क्यों न पार्टी के खिलाफ पाबंदी या दूसरी कोई कार्रवाई की जाए? कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से भी जवाब माँगा है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की घोषणा रिश्वतखोरी व वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश है। इसलिए अदालत ने कॉन्ग्रेस पार्टी और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का वक्त दिया है।

यह आदेश चीफ जस्टिस गोविन्द माथुर और एसएम शमशेरी की डिवीजन बेंच ने वकील मोहित कुमार और अमित पाण्डेय द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका पर दिया है। इस याचिका में कहा गया है कि कॉन्ग्रेस ने चुनावी घोषणापत्र में ₹6 हजार प्रतिमाह के हिसाब से ₹72 हजार सालाना 25 फीसदी गरीबों के खाते में भेजने का वादा किया है। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए कहा है कि इस घोषणा को घोषणापत्र से हटाया जाए।

वहीं, कॉन्ग्रेस के न्याय योजना को लेकर चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी को आचार संहिता उल्लंघन का नोटिस जारी किया है। आयोग ने उनसे अमेठी में एक मकान की दीवार पर ‘न्याय’ योजना के दावे के प्रचार संबंधी बैनर लगाने को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग का कहना है कि यह बैनर बिना मकान मालिक के आदेश के लगाया गया था। इसको लेकर आयोग ने 24 घंटे के अंदर उनसे जवाब माँगा है।

गेस्ट हाउस कांड भुला मैनपुरी में 24 साल बाद मुलायम से मिलने पर मायावती ने कहा: ‘जनहित में लेने पड़ते हैं कठिन फैसले’

मैनपुरी में आज (अप्रैल 19, 2019) सपा, बसपा और रालोद की संयुक्त रैली हुई। इस रैली के दौरान बसपा प्रमुख मायावती ने सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की जमकर तारीफ़ की। साथ ही उन्होंने मंच से भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर भी जमकर निशाना साधा।

गेस्टहाउस कांड के कारण एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे मायावती और मुलायम सिंह यादव 24 साल बाद एक मंच पर दिखाई दिए। इस दौरान उनके समर्थकों ने जमकर ‘बसपा-सपा आई है’ के नारे लगाए। मुलायम सिंह यादव ने भी मायावती का स्वागत किया और जनता से अपील की कि वे हमेशा मायावती का सम्मान करें, क्योंकि उन्होंने हमेशा उनका साथ दिया है।

इस मंच के जरिए मायावती ने जनता से गुहार लगाई कि वे इस बार मैनपुरी लोकसभा सीट में एसपी प्रत्याशी मुलायम सिंह यादव को रिकॉर्ड तोड़ वोटों से जीत दिलाएँ। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव पर विश्वास जताते हुए कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुलायम ने सपा के बैनर तले सभी समाज के लोगों को जोड़ा है और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को भी बड़े पैमाने पर जोड़ा।

मुलायम की तारीफ़ों का पुल बाँधते हुए बीएसपी अध्यक्ष ने पीएम मोदी पर हमला बोला और कहा कि मुलायम सिंह यादव पीएम नरेंद्र मोदी की तरह नकली और पिछड़े वर्ग के नहीं हैं।

मायावती की मानें तो मुलायम सिंह यादव असली, वास्तविक और जन्मजात पिछड़े वर्ग के हैं। जबकि नरेंद्र मोदी के लिए वो कहती हैं कि उन्होनें (मोदी) ने गुजरात में अपनी सरकार के समय में सत्ता का दुरुपयोग करके अपनी अगणी-उच्च जति को पिछड़े वर्ग का घोषित कर लिया। उन्होंने पिछले आम चुनावों में इसका लाभ उठाया और प्रधानमंत्री बन गए।

इस मंच के जरिए मायावती ने सपा के साथ गठबंधन करने के फैसले पर अपनी सफाई पेश करते हुए कहा कि “देश-आमहित में और पार्टी के मूवमेंट के हित में कभी-कभी हमें ऐसे कठिन फैसले लेने पड़ते हैं जिसको आगे रखकर ही हमने देश के वर्तमान हालातों के चलते हुए यूपी में एसपी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने का फैसला किया है।”

बता दें कि गेस्ट हाउस कांड के 24 साल बाद मुलायम सिंह और मायावती एक साथ किसी मंच पर दिखाई दिए हैं। गौरतलब है साल 1993 में सपा और बसपा ने भाजपा की सरकार को सत्ता में आने से रोकने के लिए गठबंधन किया था। जिसके बाद मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार बनी थी, लेकिन बाद में 2 जून 1995 को एक रैली में मायावती ने सपा से गठबंधन वापसी की घोषणा कर दी।

इसके बाद पार्टी विधायकों के साथ लखनऊ के मीराबाई गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 1 में थीं। जहाँ अचानक समाजवादी पार्टी समर्थक गेस्ट हाउस में घुस आए और मायावती के साथ अभद्रता की और साथ ही अपशब्द भी कहे। खुद को बचाने के लिए मायावती इस दौरान एक कमरे में बंद हो गईं थी और बाद में सुरक्षाकर्मियों ने उनकी जान बचाई थी। मायावती पर लिखी किताब बहनजी में इस घटना का जिक्र किया गया है।

रजनी ने डाला वोट, चुनाव आयोग ने माँगी रिपोर्ट

गुरुवार को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान के दौरान, तमिल सुपरस्टार रजनीकांत की बाईं की जगह दाईं उँगली पर स्याही लगाने की भूल के लिए चुनाव अधिकारी को क़ानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। मामला स्टेला मैरिस कॉलेज के मतदान केंद्र का है, जहाँ यह ग़लती हुई।

दरअसल, वोट देने के दौरान, अधिकारी को अभिनेता रजनीकांत की बाईं उँगली पर स्याही लगानी थी, लेकिन ग़लती से उनकी दाईं उँगली पर लगा दी। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) सत्यव्रत साहू ने कहा, “नियम के अनुसार, यदि बाईं उँगली में कोई दिक्कत हो, तो बाएँ हाथ की ही दूसरी उँगलियों पर स्याही लगाई जा सकती है।”

ख़बर के अनुसार, साहू ने यह बताने से इनकार कर दिया कि यह किससे हुई थी। इस मामले पर CEO ने जिला निर्वाचन अधिकारी से रिपोर्ट माँगी है।

रजनीकांत ने कई बार वोट देने के अपने अधिकार के बारे में बोला है और साथ ही राजनीति में आने के अपने फैसले की भी वो घोषणा कर चुके हैं। फ़िलहाल इन संकेतों से अब तक कुछ स्पष्ट नहीं हो सका है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि अभिनेता रजनीकांत का नाम किसी विवाद से जुड़ा हो। 2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान, वीडियो में उन्हें किसी विशेष पार्टी के उम्मीदवार के लिए समर्थन करते दिखाया गया था।

अभिनेता शिवकार्तिकेयन और श्रीकांत के ख़िलाफ़ शिक़ायतें मिली हैं जिन्होंने गुरुवार को मतदान तो किया था, लेकिन उनका नाम मतदाता सूची में नहीं था।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता ने शिवसेना में शामिल होकर दिखा दिया कि ‘रिश्तों के भी रूप बदलते हैं’

एक सप्ताह पहले की ही बात है। तब तत्कालीन कॉन्ग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने स्मृति ईरानी के लोकप्रिय शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के एक गाने को तोड़-फोड़ कर पैरोडी जैसा कुछ बनाते हुए गाया था, ‘रिश्तों के रूप बदलते हैं…’

कहते हैं कि राजनीति में, न कोई स्थायी दुश्मन है और न कोई स्थायी दोस्त। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पर कटाक्ष करने के कुछ ही दिन बाद आज प्रियंका चतुर्वेदी ने शिव सेना के साथ हाथ मिलाने के लिए कॉन्ग्रेस के डूबते जहाज को छोड़ दिया है। शिवसेना, भाजपा की ही सहयोगी पार्टी है और प्रियंका की पूर्व पार्टी कॉन्ग्रेस के विरोधी भी।

चतुर्वेदी ने आज शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात की और एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन किया, जहाँ उन्होंने पार्टी में उनका स्वागत किया।

मीडिया को संबोधित करते हुए चतुर्वेदी ने कहा कि उन्हें पता है कि वह अपने विचारों के लिए जवाबदेह होंगी। जब वह कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता थीं, तब उन्होंने भाजपा के साथ-साथ शिवसेना के खिलाफ अपमानजनक बातें की थीं, लेकिन यह शिवसेना में शामिल होने से पहले बहुत पहले की बात है।

प्रियंका चतुर्वेदी ने ठाकरे को ‘परिवार’ में उनका स्वागत करने के लिए धन्यवाद दिया।

कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल को लप्पड़ पड़ने के बाद जिग्नेश मेवाणी की हुई हालत खराब, बोले मुझे चाहिए सुरक्षा

CD प्रकरण से चर्चा में आए कॉन्ग्रेस के युवा नेता हार्दिक पटेल के साथ स्टेज पर हुई निंदनीय घटना के तुरंत बाद उन्हीं के जैसी दूसरे युवा नेताओं में हलचल का माहौल देखने को मिल रहा है। गुजरात में एक रैली में आज सुबह ही तरुण गज्जर नाम के एक मनचले युवक ने ऐसे समय पर स्टेज पर चढ़कर हार्दिक पटेल को तमाचा जड़ दिया, जब वो एक रैली को सम्बोधित कर रहे थे।

इस प्रकरण से घबराए हुए गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी ट्विटर पर सक्रीय होकर अपने लिए राज्य सुरक्षा की माँग करने लगे। विवादित कम्युनिस्ट छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ बेगूसराय में लोगों से वोट की अपील करने वाले जिग्नेश मेवाणी ने ट्वीट करते हुए बताया है कि उनके साथ भी इस तरह के हादसे हो चुके हैं और उन्हें राज्य सरकार ने कोई सुरक्षा नहीं दी है।

किसी भी तरह से अमित शाह और नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने का मौका तलाशने वाले जिग्नेश मेवाणी ने ट्वीट में लिखा है कि जिस दिन उनमें से कोई मारा जाएगा उस दिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी खुशियाँ मनाएँगे।

आज सुबह ही पाटीदार नेता हार्दिक पटेल पर एक व्यक्ति ने ऐसे समय तमाचा रसीद दिया था, जब वो गुजरात के सुरेंद्रनगर में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इसके बाद हार्दिक पटेल के समर्थकों ने उसकी स्टेज पर ही पिटाई कर दी और उसे अस्पताल भर्ती करना पड़ा।

तरुण गज्जर नाम के शख्स ने अस्पताल में सफाई देते हुए बताया कहा, “जब पाटीदार आंदोलन हुआ उस समय मेरी पत्नी गर्भवती थी। उसका अस्पताल में इलाज चल रहा था। उस समय मुझे काफी दिक्कतों का सामन करना पड़ा। मैंने उसी समय फैसला कर लिया था कि मैं इस आदमी को मारूँगा। मुझे इसे किसी भी तरह से सबक सिखाना था।”

तरुण गज्जर ने आगे कहा, “इसके बाद अहमदाबाद में उनकी रैली के दौरान जब मैं अपने बच्चे के लिए दवाई लेने गया था तो सब कुछ बंद हो गया। उन्होंने सड़के बंद करवा दी थीं। वह जो चाहते थे गुजरात में उसे बंद करवा देते थे। वह कौन हैं? गुजरात का हिटलर?”

उर्मिला ‘भटकी’ मातोंडकर का राजनीति में आना देश के लिए घातक, न कि PM मोदी पर फिल्म बनना

राजनीति एक ऐसा आइना है, जो किसी भी व्यक्ति के स्वभाव और उसकी विचारधारा को जनता के समक्ष जस का तस लाकर सामने रख देता है। राजनैतिक पार्टी को दिए समर्थन से लेकर मंच पर दिए गए भाषणों के जरिए जनता किसी भी राजनेता को आँकती है और फिर तय करती है कि उसे अपना वोट किसे देना है।

बीते दिनों राजनीति में चुनावों के चलते बहुत उठा-पटक देखने को मिली। इस बीच कई बॉलीवुड कलाकारों ने राजनीति में दिलचस्पी दिखाते हुए अपनी पसंद की पार्टियों की सदस्यता भी ली। इसमें एक नाम उर्मिला मातोंडकर का भी है। उर्मिला ने कुछ दिन पहले कॉन्ग्रेस को ज्वाइन किया है। और अब वह सक्रिय राजनीति का हिस्सा बन चुकी हैं।

उर्मिला ने कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद एबीपी न्यूज़ पर एक इंटरव्यू दिया था। इस इंटरव्यू में उन्होंने राजनीति में कदम रखने के साथ ही भाजपा पर जमकर निशाना साधते हुए बताया था कि उन्होंने कॉन्ग्रेस को क्यों चुना है।
हमेशा से बॉलीवुड फिल्मों में अपनी अदाकारी से जलवा बिखेरने वाली उर्मिला मातोंडकर एक दम से देश के लिए इतनी जागरूक हो गईं कि उन्होंने इस साक्षात्कार में अपना दम लगाकर ये साबित करने का भरसक प्रयास किया कि पिछले 5 सालों में देश में कोई विकास नहीं हुआ है। उनकी मानें तो आजादी से पहले देश को सुई तक नहीं मिली थी, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने सत्ता में रहते हुए देश को वो सब दिया जिसकी जरूरत थी।

हेट्रेड पॉलिटिक्स जैसे संवेदनशील मुद्दे को अपना अजेंडा बनाकर राजनीति से जुड़ने वाली उर्मिला मातोंडकर इन दिनों कॉन्ग्रेस के प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। वो आए दिन चुनावी रैली का हिस्सा बनी दिखाई देती हैं। हालाँकि, इस बीच वो कॉन्ग्रेस को वोट देने की अपील करने से ज्यादा भाजपा की कमियाँ जनता को गिनवाते हुए ज्यादा दिखाई पड़ती हैं।

कॉन्ग्रेस से जुड़ने के बाद उर्मिला ने अपना पक्ष एकदम स्पष्ट कर लिया है। वो जान चुकी हैं कि इन चुनावों में जनता को मोदी सरकार के ख़िलाफ़ भड़काए बिना, किसी भी कीमत पर जीत हासिल नहीं होने वाली है। इसलिए वो पार्टी के दिग्गज नेताओं के पदचिह्नों पर चलते हुए, जनता के बीच पहुँचकर मोदी विरोधी नैरेटिव तैयार करती हैं।

बीते दिनों बोरिवली में चुनावी जनसभा करने पहुँची उर्मिला मातोंडकर के समर्थकों ने इसी के चलते में मोदी-मोदी नारे लगाने वालों को गुस्से में पीटा था, लेकिन इस पर भी उनकी प्रतिक्रिया शून्य थी। पार्टी के समर्थकों के व्यवहार पर आपत्ति जताने की बजाए वो इस दौरान भी भाजपा पर ही उंगली उठाती नज़र आईं थी। और अब तो वे प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी पर तंज भी कसने लगी हैं।

उर्मिला मातोंडकर ने नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक को आधार बनाकर कहा है कि उन पर तो कॉमेडी फिल्म बननी चाहिए। उनकी मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फिल्म केवल एक मजाक है, क्योंकि उन्होंने अपना कोई वादा पूरा नहीं किया है।

सोचिए 10 साल की उम्र से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाली उर्मिला मातोंडकर को राजनीति में आने के बाद भी तंज कसने का मौका सिर्फ़ मोदी की बायोपिक पर ही मिला। जिस महिला को किसी व्यक्ति के जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म कॉमेडी टाइप लगती है, तो संदेह होता है कि उन्होंने अभिनय की दुनिया में इतने वर्ष बिताने के बाद भी क्या सीखा? और जो व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र से ही अनुभव न हासिल कर पाया हो उससे क्या उम्मीद की जा सकती है कि वो राजनीति में कदम रखने के बाद कैसे देश बदल देगा? ये राजनीति का ही एक चेहरा है कि कलाकार फिल्म में निहित भावनाओं को समझने से ज्यादा उसे कॉमेडी करार दे रहा है।

देश के स्वतंत्रता समय का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस का साथ देने वाली मातोंडकर को इस बात से कोई सरोकार नहीं हैं कि बीते दशकों तक कॉन्ग्रेस ने देश के साथ ऐसा क्या किया, कि आखिर नरेंद्र मोदी पिछले 5 सालों में उसे सुधार नहीं पाए, आखिर क्यों कॉन्ग्रेस को सत्ता में आने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है? अगर वाकई कॉन्ग्रेस ने देश के हित में काम किया होता तो क्या जनता भाजपा को 2014 में भारी मतों के साथ विजयी बनाती।

खैर, धीरे-धीरे मातोंडकर के सफ़र को देखते हुए लग रहा है कि गलती उनकी नहीं है। ये सालों की प्रैक्टिस है, उन्हें बॉलीवुड में हर डायलॉग और सीन के लिए पहले से स्क्रिप्ट मिली। लेकिन राजनीति में वह कैसे खुद को बूस्ट करतीं? ये बड़ा सवाल था।

राजनीति में आते ही उन्होंने विपक्ष के एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया। नतीजन आज वो राजनीति के दलदल में सराबोर होकर इस हद तक डूब चुकी है कि उन्होंने अपने भीतर सभी नैतिक मूल्यों को समतल कर दिया है। वे अब सिर्फ़ इन दिनों विपक्ष के समान मौक़े का फायदा उठाकर अपनी चुनावी रोटियाँ सेंकने में जुटी हुईं हैं। अब ऐसा करने के लिए चाहे उन्हें देश की बहुसंख्यक जनता पर ही निशाना साधना पड़े और हिंदू धर्म को हिंसक करार देना पड़े।

कहना गलत नहीं होगा उर्मिला मातोंडकर जैसे भटके बॉलीवुड कलाकारों का राजनीति में आना देश के लिए बेहद घातक है। जो मोदी सरकार के संकल्प सबका साथ और सबका विकास में भी धर्म और जाति की बातों की ही छटनी करते हैं। जिनके पास देश के विकास के लिए कोई एजेंडा नही, लेकिन हाँ विपक्ष द्वारा भुनाए ‘हेट्रेड पॉलिटिक्स’ पर राजनीति करने के कॉन्सेप्ट को वे अच्छे से जानती हैं।

हनुमान जी में है अटूट आस्था, हमारे बीच कोई नहीं आ सकता: ‘वनवास’ से लौटे योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ‘वनवास’ समाप्त हो चुका है। चुनाव आयोग की तरफ से लगाए गए 72 घंटे का बैन समाप्त होने के बाद UP के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जयंती के अवसर पर कई ट्वीट किए हैं। CM योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि हिंदू उनकी धार्मिक पहचान है और लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत उन्होंने चुनाव आयोग के आदेश का सम्मान किया। इसके साथ ही योगी ने ट्वीट में कहा कि उनके मंदिर दर्शन को सियासत से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। हाल ही में चुनावी सभा में बजरंग बली और अली वाले बयान को लेकर आयोग ने योगी के प्रचार करने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

सीएम योगी ने कहा, “हनुमान जी में मेरी अटूट आस्था है और संकटमोचन में इस आस्था के बीच कोई नहीं आ सकता। उनका दृढ़ संकल्पित, समर्पित जीवन मेरे लिए एक प्रेरणास्रोत है। नासै रोग हरै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।” सीएम योगी ने हनुमान जी की जयंती पर सभी को शुभकामनाएँ दी।

चुनाव आयोग के निर्णय पर योगी ने ट्वीट करते हुए लिखा कि विगत 72 घण्टों में उन्होंने चुनाव आयोग के आदेश का सम्मान किया और उसे समुचित आदर दिया।

योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि उन्हें आस्था का अधिकार संविधान से प्राप्त है और इसे राजनीतिक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

सीएम योगी ने कहा कि दलित भाई महावीर और उनके परिवार से मिलकर पता चला कि प्रधानमंत्री जी की जनकल्याणकारी योजनाओं से जन-जन कितने प्रसन्न हैं। उनकी पत्नी सावित्री द्वारा बनाया गया सादा सुस्वादु भोजन ग्रहण कर प्रसन्नता हुई। समाज के आखिरी पायदान पर बैठे वंचितों के जीवन में ऐसी खुशियाँ हों, यही भाजपा का लक्ष्य है।

चुनाव ड्यूटी के बीच से ही चुनाव अधिकारी गायब, पश्चिम बंगाल में हालात बद से बदतर

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में गड़बड़ी की ख़बरें लगातार सामने आ रही हैं। ANI की ख़बर के अनुसार, नादिया क्षेत्र में चुनाव अधिकारी अपनी ड्यूटी के दौरान लापता हो गए।

ख़बर के अनुसार, नादिया ज़िले के नोडल चुनाव अधिकारी अर्नब रॉय चुनाव ड्यूटी के दौरान लापता हो गए। लोकसभा चुनाव 2019 के दूसरे चरण के दौरान गुरुवार (18 अप्रैल) को अर्नब रॉय की ड्यूटी बिप्रदास चौधरी पॉलिटेक्निक कॉलेज में थी।

अर्नब रॉय कल दोपहर के भोजन के बाद चुनाव ड्यूटी से गायब हो गए। वह ईवीएम और वीवीपैट के प्रभारी थे। पश्चिम बंगाल पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जाँच शुरू कर दी है।

गुरुवार को लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के शुरू होते ही, पश्चिम बंगाल से बड़े पैमाने पर लगातार राजनीतिक हिंसा और चुनावी हिंसा की ख़बरें सामने आ रही हैं। इस बीच, एक ख़बर सामने आई थी कि राज्य के रायगंज निर्वाचन क्षेत्र में एक मुस्लिम बहुल गाँव के हिन्दू निवासियों को मतदान करने से रोक दिया गया।

एक अन्य मामले में, दार्जिलिंग निर्वाचन क्षेत्र के चोपरा में व्यापक हिंसा देखी गई, जहाँ उपद्रवियों ने मतदाताओं को वोट डालने से रोकने की कोशिश की। स्थानीय लोगों ने इसके विरोध में बाहर आकर राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया, और लोगों को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षा बलों को आँसू गैस के गोले दागने पड़े और लाठीचार्ज भी करना पड़ा।

एक अन्य घटना में, 22 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता शिशुपाल शाहिश की हत्या कर दी गई और उनके शव को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक पेड़ पर लटका दिया गया था।