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मोदी विरोधियों की गज भर लंबी ज़ुबान, घटिया राजनीति का प्रमाण

आज से 17वीं लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पहले चरण में कुल 545 सीटों में से 91 सीटों पर आज वोटिंग होगी। सियासी घमासान के बीच जहाँ एक तरफ मतदाता अपने प्रतिनिधि को जिताने की कोशिश में जुट गए हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों के नेता अपनी ज़ुबान को क़ाबू में नहीं रख पा रहे हैं।

अपनी विविधताओं और विशालतम छवि के लिए प्रसिद्ध भारत में लोकसभा चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होता, इस पर दुनिया की नज़र भी बनी रहती है। चुनावी मौसम में आरोप-प्रत्यारोप का दौर कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस चुनावी हार-जीत में जब जनता को बरगलाने का काम किया जाता है, तो वो किसी अपराध से कम नहीं होता। इसी कड़ी में अपनी भद्दी राजनीति को चमकाने के लिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने पीएम मोदी को हिटलर तक कह दिया।

चोर की दाढ़ी में तिनका

बता दें कि कुमारस्वामी का यह तीखा हमला इसलिए था क्योंकि वो आयकर विभाग की छापेमारियों से नाराज़ थे। दरअसल हाल ही में जनता दल सेक्यूलर (JDS) के लोगों पर आयकर विभाग ने छापेमारी की थी। इससे कर्नाटक के मुख्यमंत्री इतने आहत हुए कि उन्होंने अपना सारा गुस्सा पीएम मोदी पर उतारते हुए कह दिया कि वो तो हिटलर से भी ख़राब हैं!

कुमारस्वामी ने आरोप लगाते हुए पीएम मोदी को कहा कि वो देश के सबसे ख़राब प्रधानमंत्री हैं, जो लोगों की निजी संपत्तियों को ज़ब्त करने का विधेयक लाए हैं। अब ज़रा इनसे ये पूछा जाए कि आयकर विभाग क्या अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है, जो वो लोगों की निजी संपत्तियों का ज़ब्त करने का काम करेगा? यह बात तो हर कोई जानता है कि आयकर विभाग, आय से अधिक उन संपत्तियों को ज़ब्त करने का काम करता है, जिसका हिसाब सरकार को नहीं दिया जाता। ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत यहाँ सटीक बैठती है क्योंकि आयकर विभाग की छापेमारी का डर उन्हीं चोरों को होगा, जिनके पास चोरी का माल होगा। कुमारस्वामी अगर आयकर विभाग की छापेमारी से डरते हैं, तो मतलब साफ़ है कि उनका दामन भी दूध का धुला नहीं है।

अपने इसी डर को भगाने का एकमात्र साधन वो पीएम मोदी को मानते हैं और इसी लिए वो कभी पीएम के चमकते चेहरे के बारे में बात करते हैं, तो कभी उन्हें तानाशाह बताते हैं। असल में अपने दु:ख को छिपाने का कोई दूसरा उपाय न सूझता देख वो उन्हें कुछ भी कहने से नहीं चूकते, फिर चाहे देश के सबसे ख़राब प्रधानमंत्री का तमगा देना हो या दुनिया का ही सबसे ख़राब प्रधानमंत्री बोल देना हो।

IT विभाग और चिदंबरम में 36 का आँकड़ा

कुछ इसी तरह का डर यूपीए काल में वित्तमंत्री रहे पी चिदंबरम पर भी दिखा। उनका यह डर उस समय दिखा जब हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के क़रीबियों के ख़िलाफ़ आयकर विभाग द्वारा क़रीब 50 ठिकानों पर छापेमारी की गई। इस छापेमारी में करोड़ों रुपए कैश के अलावा कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बरामद किए गए। पी चिदंबरम ने ट्वीट कर यह ज़ाहिर करने की कोशिश की कि उन्हें आयकर विभाग की छापेमारी से कोई डर नहीं लगता, लेकिन इसकी सच्चाई कुछ और ही थी। इसका संबंध उनकी पत्नी नलिनी चिदंबरम और पुत्र कार्ति चिदंबरम की अवैध संपत्तियों का डर से था।

सांप, बिच्छू और नीच तक कह डाला

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी ने पीएम मोदी पर हमलावर और अभद्र टीका-टिप्पणी की हो। कॉन्ग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को ‘नीच’ कहा था जिस पर सफ़ाई दी कि वो हिंदी नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने ‘Low Person’ का अनुवाद किया और उन्हें नीच बोल दिया। हालाँकि, अपने इस बयान पर अय्यर ने कम से कम 6 बार माफ़ी माँगने का ज़िक्र किया। उनके विवादित बयानों की फेहरिस्त में और भी विवादित बयान शामिल हैं जिसमें उन्होंने साल 2013 में नरेंद्र मोदी को सांप-बिच्छू तक कह डाला था। अपनी इस बेक़ाबू होती ज़ुबान ऐसे नेताओं के गिरते स्तर का पता चल जाता है।

पीएम मोदी के ‘काले से गोरे’ का राज बताने से भी नहीं चूके

देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ बिगड़े बोल में एक नाम कॉन्ग्रेसी नेता अल्पेश ठाकोर का भी शामिल है। पीएम मोदी के गोरे रंग पर तंज कसते हुए अल्पेश ने कहा था कि वो 80,000 रुपए का मशरूम खाते हैं, जिससे वो काले से गोरे हो गए हैं। ये बयान गुजरात विधानसभा चुनाव के दोरान 2017 में दिया गया था। ऐसे ओछे और भद्दे बयानों के सरताज़ों से मैं कहना चाहूँगी कि पीएम मोदी के चेहरे पर ध्यान देने की बजाए अगर उनके विकास कार्यों पर ध्यान दिया होता तो शायद देश की दिशा और दशा में आए सुधारों को वो देख पाते

चुनावी दंगल के इस माहौल में आए दिन कोई न कोई ऐसा विवादित बयान दे डालता है, जिससे किरकिरी होना स्वाभाविक ही है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन विरोधी सुरों के तीर हमेशा पीएम मोदी पर ही छोड़े जाते हैं। बीजेपी की धुर विरोधी पार्टी कॉन्ग्रेस तो हमेशा से ही हमलावार रही है, लेकिन कुछ ऐसे नेता भी उनका साथ बख़ूबी देते हैं जिन्होंने कभी ख़ुद NDA के साथ मिलकर राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ीं थी। यहाँ बात ममता बनर्जी की हो रही है जो 1999 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा बन गई थी। जिस गठबंधन का वो कभी हिस्सा थीं, जिसकी बदौलत वो देश की पहली रेलमंत्री बनीं, आज वही पार्टी ममता को एक आँख नहीं भाती। जिनके ख़िलाफ़ वो अभद्र भाषा का प्रयोग तो करती ही हैं साथ में उन पर निजी हमले भी करती हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो एक बात तो तय है कि पीएम मोदी के ख़िलाफ़ बुलंद सुर देश की जनता का ध्यान भटकाने का ज़रिया मात्र है। ऐसा करने से वो बीते पाँच वर्षों में आए सकारात्मक बदलावों पर से जनता का ध्यान हटाना चाहती है। फ़िलहाल, यह देखना बाकी है कि विरोधियों के ये बिगड़े बोल जनता पर कितना असर डालते हैं।

प्रिय चुनाव आयोग, ये हो क्या रहा है?

चुनाव आयोग का अधिकतर समय मजाक ही उड़ाया गया है। हर पार्टी के लोगों ने समय-समय पर चुनाव आयोग को उपहास का पात्र बनाया है। कभी बिना दाँत का शेर तो कभी काग़ज़ी बाघ आदि उपनामों से इसे नवाज़ा जाता रहा है। इसके पीछे हमेशा यह दलील होती थी कि चुनाव आयोग सिर्फ बोलता है, उसकी बातों को कोई मानता नहीं।

इस बार चुनाव आयोग ने अपने आप को गम्भीरता से लिया है और कई कालजयी आदेश पारित कर दिए हैं। इनमें से प्रमुख है मोदी की बायोपिक को बैन कर देना यह कहते हुए कि यह फिल्म ‘लेवल प्लेइंग फ़ील्ड’ को डिस्टर्ब करती है। इस तर्क से तो कई लोग और मीडिया वालों को प्रतिबंधित करना होगा क्योंकि वो भी मोदी की रैलियों को टेलिकास्ट करते हैं, स्टूडियो से पक्ष लेकर बात करते हैं, इंटरव्यू चलाते हैं।

आखिर लेवल प्लेइंग फ़ील्ड है क्या? जब हर नेता रैली कर रहा है, लोकल कार्यकर्ता पैम्फलेट बाँट रहे हैं, व्यक्ति फेसबुक पर लिख रहा है, तो फिर फिल्म, वेब सीरिज़ या टीवी सीरियल्स पर रोक लगाना अपने आप में हास्यास्पद है। मीडिया में हर दिन, चौबीस घंटे पोलिटिकल स्टोरी ही चलती है जिससे वोटर प्रभावित होता है, और सबसे ज़्यादा होता है। फिर इन्हें चलने दिया जा रहा है, और फिल्म को रोक रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि मुझे विवेक ओबरॉय की फिल्म में बहुत स्कोप दिख रहा है। मेरे हिसाब से बेकार फिल्म होगी, ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ टाइप की पैरोडी। लेकिन, अभिव्यक्ति और व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार तो सबको है, उस पर चुनाव आयोग किस तर्क से उलझ रहा है? कोई भी व्यवसायी अपने व्यवसाय को अपने फायदे के हिसाब से समय और जगह चुनकर चलाता है, फिर मोदी की फिल्म भी उस समय पर आने वाली थी, जब उसकी बात सबसे ज़्यादा हो रही हो। और तब चुनाव आयोग को याद आया कि फिल्म को रोक देना चाहिए।

फिर तो कुणाल कमरा जैसे चुटकुलेबाजों पर भी रोक लगनी चाहिए, जो अपने स्तर पर ही सही, मोदी के खिलाफ प्रचार करता दिखता है। फिर तो ज़ी न्यूज़ और एनडीटीवी पर भी रोक लगनी चाहिए क्योंकि दोनों ने अलग पाले पकड़ रखे हैं। फिर तो, तमाम यूट्यूब और फेसबुक के लोगों पर भी रोक लगनी चाहिए जो जागरुकता के नाम पर पार्टी के पक्ष या विपक्ष में लिख और बोल रहे हैं।

चुनाव आयोग का तर्क बेकार है। उसे बेहतर तर्क लाकर इस फिल्म को बैन करना चाहिए था। ये भी कह देते की मानवता को इस फिल्म से ख़तरा है, तो भी मैं ज़्यादा कन्विन्स होता बजाय इसके कि इससे लेवल प्लेइंग फ़ील्ड डिस्टर्ब हो रहा है।

ये तर्क इतना वाहियात है कि कल इसे आधार बनाकर विरोधी पार्टियाँ यह माँग कर सकती हैं कि मोदी दिन में तीन रैलियाँ कर रहा है, उनके नेता एक ही कर रहे हैं, अतः रैलियों की संख्या उनके हिसाब से तय होनी चाहिए। क्योंकि, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड तो यहाँ भी डिस्टर्ब हो रहा है! मैं मजाक नहीं कर रहा, ये ऐसा ही कुतर्क है चुनाव आयोग का क्योंकि आज के दौर मैं हर व्यक्ति अपने मतलब की सूचनाएँ कहीं से भी पा रहा है, वैसे में चुनाव आयोग इन क्षुद्र कार्यों में अपने आप को फँसा कर संस्था की गरिमा को ही गिरा रहा है।

जिस तरह से विपक्ष में व्याकुलता है, और जिस लेवल का फ़्रस्ट्रेशन विरोधी विचारधारा के लोगों में दिखता है, इनका गिरोह चुनाव आयोग के साथ और भी क्रिएटिव माँग लेकर पहुँच सकता है। ये गिरोह यह भी कह सकता है कि मोदी सरकार ने जो भी विकास कार्य किए, वो तो भारत सरकार ने किए, अतः किसी पार्टी को उसका नाम गिनाकर वोट माँगने का हक़ नहीं होना चाहिए। चूँकि बाकी पार्टियाँ सत्ता से दूर थीं, तो वो विकास कार्य नहीं कर पाए, अतः मोदी और भाजपा को कैम्पेनिंग में भारत सरकार की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बताने पर मनाही होनी चाहिए।

चुनाव आयोग तो इस लाइन पर सोचने भी लगेगा कि बात तो सही है, लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का मतलब तो यही होता है कि दोनों पक्ष के लोग एक ही मैदान में, एक ही तरह की गेंद से, उन्हीं नियमों के साथ, उन्हीं उपकरणों के साथ खेलें जो दोनों के पास हों। यहाँ तो एक पार्टी सत्ता में है, फ़ंड को ख़र्च किया है, सड़कें बनवाई हैं, जबकि दूसरी को तो मौका ही नहीं मिला। विपक्ष के गिरोह का तो यह भी दावा हो सकता है कि उन्हें बैटिंग का मौका ही नहीं मिला, तो वो रन बना ही नहीं पाए, अब तो बॉलिंग करेंगे तो हारना तय है। अतः, टॉस करके फ़ैसला करना उचित होगा। इसीलिए, खेल के संदर्भों को चुनावों में लाना कुतर्क कहा जाएगा, समझदारी नहीं।

चुनावों के समय मॉडल कोड ऑफ कन्डक्ट लगता है जिसमें पार्टियों के लिए कुछ मानक तय होते हैं कि आप क्या कर सकते है, क्या नहीं कर सकते। कोई नया विकास कार्य शुरु नहीं किया जा सकता, बोलते हुए सीधे तौर पर किसी जाति या समुदाय के लोगों से वोट की अपील नहीं की जा सकती, प्रचार के दौरान किसी को उकसाने वाली, हिंसा भड़काने वाली बातें नहीं की जा सकती आदि।

कुल मिलाकर यहाँ नैतिकता का एक दायरा बनाना होता है ताकि किसी को भी ग़ैरज़रूरी फायदा न मिले। सत्तारूढ़ पार्टी चुनावों के समय कहीं सड़कें आदि न बनवाए क्योंकि वोट देते समय व्यक्ति उससे प्रभावित हो सकता है। किसी भी समुदाय को उकसाने पर मनाही है, लेकिन कोई उकसा रहा है तो चेतावनी ही दी जा सकती है। ऐसा पहले भी खूब हुआ है, आज भी हो रहा है।

नैतिकता के तय मानक नहीं होते, संदर्भ में लोग इसे मोड़ देते हैं। चुनाव आयोग या तो हीरो बनने के चक्कर में अपनी फ़ज़ीहत करवाने पर उतारू है, या फिर उसे कई मामलों को समझने के लिए उचित समय नहीं मिल पा रहा। हाल ही में गुजरात के एक व्यक्ति ने अपने निकाह के कार्ड पर लोगों से गिफ्ट की जगह भाजपा प्रत्याशी को वोट देने की अपील की थी। चुनाव आयोग ने इसका संज्ञान लिया और उसे चेतावनी दी।

ये किस तरह की बात है? किसी ने कार्ड पर वोट देने की अपील की तो वो वोटरों को प्रभावित कर रहा है? फिर मैं अपने खाली समय में क्या कर रहा हूँ? मैं भी तो फेसबुक पर एक पार्टी और नेता को जितवाने की अपील कर रहा हूँ। फिर वो सौ, दो सौ और नौ सौ कलाकारों के साझा बयान क्या हैं? क्या उससे आम आदमी प्रभावित नहीं होता? बिलकुल होता है, क्योंकि नई सूचना आने से आप नए सिरे से सारी बातों की गणना करते हैं।

एक फिल्म से क्या प्रभाव पड़ता है? उस फिल्म को व्यक्ति एक बार देखेगा, जबकि रवीश कुमार, सुधीर चौधरी, अर्णब गोस्वामी समेत तमाम टीवी चैनलों के एंकर टीवी पर ही नहीं, टीवी के बाहर भी लगातार सीधे तौर पर वोटरों को प्रभावित करते दिखते हैं। और यह सही है। हमारी विचारधारा अलग हो सकती है लेकिन समाज में ओपिनियन लीडर्स, या वैचारिक रूप से बेहतर लोगों की ज़िम्मेदारी होती है कि वो तथ्यों के साथ अपनी बात कहें, ताकि आम जनता एक सही फ़ैसला ले सके।

क्या चुनाव आयोग को नहीं लगता कि एक विचारधारा के लोग ज़्यादा हैं इस देश में और वो टीवी, फेसबुक, यूट्यूब से लेकर हर मीडिया संस्थान और विश्वविद्यालय तक फैले हुए हैं? तो क्या चुनाव आयोग अब यह बताता चले कि जितनी पार्टियाँ हैं, उसी अनुपात में चैनल हों, उनके कार्यक्रम हों, उनके विचार हों?

किसी फिल्म को रोक देना या किसी व्यक्ति का कार्ड पकड़ लेना एक छोटी-सी बात है। इससे चुनावी प्रक्रिया पर सांकेतिक प्रभाव भी नहीं पड़ता। इससे चुनाव आयोग खबरों में भले ही बना रहेगा लेकिन वो अपना ही नाम खराब कर रहा है। अगर किसी बात पर प्रतिबंध लगाना है, तो सही तर्क होने चाहिए। यहाँ तर्क के मामले में चुनाव आयोग फिसड्डी साबित हुई है।

आम आदमी हर वक्त चुनावों की चर्चा करता फिर रहा है। पान की दुकान से लेकर चाय के नुक्कड़ तक लोग इसी चर्चा में उलझे हुए हैं। लोगों को पढ़ कर और सुन कर लोग प्रभावित होते हैं, वोट देने की इच्छा बनाते हैं। फिर तो रॉलेट एक्ट टाइप का कोई कानून ले आए चुनाव आयोग या फिर माइनोरिटी रिपोर्ट टाइप इंटेलीजेंट सिस्टम की व्यवस्था करे जहाँ आदमी के किसी कार्य को करने से पहले ही उसे रोका जा सके!

लोकतंत्र में मीडिया का एक बहुत बड़ा रोल होता है। उसकी भूमिका हर नई तकनीक के साथ व्यापक होती जाती है। अगर विवेक ओबरॉय वाली फिल्म के निर्माता किसी वेब प्लेटफ़ॉर्म से सौदा करते हुए उसे सीधे मोबाइल फोन पर उतार दें, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा? अगर पायरेटेड कॉपी लीक कर दी जाए, तो चुनाव आयोग क्या कर लेगा?

अगर ऐसी फ़िल्में प्रोपेगेंडा ही हैं, तो टीवी चैनलों के एंकर जो कर रहे हैं, क्या वो प्रोपेगेंडा नहीं है। हर रात चालीस मिनट तक सरकार की हर योजना को बेकार बताना भी प्रोपेगेंडा ही है। आखिर चुनाव आयोग इसके लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का निर्धारण करेगा कैसे? क्या मीडिया संस्थानों के लिए कोई तय क़ायदा है जहाँ चुनाव आयोग सुनिश्चित कर सके कि इतने मिनट इस पार्टी की रैली, और इतने मिनट इस पार्टी की रैली कवर की जाएगी?

चुनाव आयोग ने मधुमक्खी के छाते में हाथ डाला है। प्रश्न बहुत सारे हैं, और उनके पास उत्तर होंगे नहीं। उत्तर इसलिए नहीं होंगे क्योंकि चुनाव आयोग में बैठा जो व्यक्ति इस तरह के आदेश देता है, या तर्क गढ़ता है, वो कहीं अकेला बैठा हुआ प्रतीत होता है। चुनाव आयोग जबरदस्ती का अपने आप को निष्पक्ष दिखाने के चक्कर में कुछ भी करता दिख रहा है। जबकि, उसे ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चुनाव आयोग का कार्य सही तरीके से चुनाव कराना है, न कि इस तरह के तर्क गढ़ना जो कि तार्किकता के पैमाने पर दो सेकेंड नहीं ठहर पाते।

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सांसद राहुल को बनाया लेकिन अमेठी को स्मृति ने अपनाया: वो 12 काम जिससे गरीब नहीं, गरीबी हटी

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने मोदी सरकार के पिछले पाँच वर्षों में कई अहम मंत्रालय संभाले। हालाँकि, वो अमेठी से पिछले लोकसभा चुनाव हार गई थीं लेकिन उन्होंने तीन लाख से भी अधिक वोट पाकर गाँधी परिवार के गढ़ में दस्तक दे दी थी। हारने के बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी के साथ ऐसा ही व्यवहार किया, जैसे वहाँ की सांसद वही हों। उन्होंने हर एक विकास कार्य पर पैनी नज़र बनाए रखकर न सिर्फ़ वहाँ के लोगों के जीवन स्तर को सुधारा बल्कि समय-समय पर क्षेत्र का दौरा कर विकास कार्यों का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण भी किया। वहीं अगर राहुल गाँधी की बात करें तो अमेठी में वो बस पोस्टरों की वजह से ही ख़बरों में रहे और किसी ग़रीब के घर खाना खाने से अधिक उनके बारे में कोई ख़ास ख़बर नहीं आई। आज स्मृति ईरानी ने लोकसभा 2019 के लिए अमेठी से नामांकन किया है। आइए देखते हैं उन्होंने पिछले 5 वर्षों में अमेठी के लिए क्या-क्या किया।

स्मृति ईरानी न सिर्फ़ स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठकें कर परिजोयनाओं की निगरानी करती हैं बल्कि अमेठी के गाँवों के प्रधानों से भी मिलती रहती हैं।

कैशलेस भुगतान: डिजिटल हुई अमेठी

स्मृति ईरानी ने अमेठी में डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए व्यक्तिगत पहल की। उन्होंने दिसंबर 2016 मंडल अमेठी और मंडल गौरीगंज में प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर कैशलेस भुगतान के प्रति लोगों को सिर्फ़ जागरूक ही नहीं बल्कि उन्हें प्रशिक्षित करने का भी बीड़ा उठाया। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा 9 महीने बाद दिखा। सितंबर 2018 में अमेठी के पिंडारा ठाकुर गाँव को डिजिटल गाँव घोषित किया गया। यह शायद देश का पहला ऐसा गाँव था, जो आत्मनिर्भर हुआ। स्मृति ईरानी के प्रयासों के परिणामस्वरूप इसे सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा सामान्य सेवा केंद्र के रूप में चयनित किया गया।

डिजिटल इंडिया के अंतर्गत डिजिटल गाँव घोषित किए गए इस गाँव में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा चालित 206 कार्यक्रमों की ऑनलाइन उपलब्धता सुनिश्चित की गई। इसमें वाई-फाई चौपाल, एलईडी बल्बों के विनिर्माण, सैनिटरी पैड बनाने की एक इकाई और पीएम डिजिटल लिटरेसी पहल सहित कई योजनाएँ शामिल हैं। इतना ही नहीं, इन प्रयासों के बाद ग्रामीणों व यहाँ ये युवाओं को गाँव में ही रोज़गार मिलने शुरू हो गए।

चिकित्सा के क्षेत्र में भी अमेठी का रखा ध्यान

इसके अलावा अमेठी के लोगों के स्वास्थ्य को लेकर भी स्मृति ईरानी ने प्रयास किया। उनके प्रयासों के मद्देनज़र राघव राम सेवा संस्थान, भाऊराव देवरस सेवा संस्थान और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी द्वारा समय-समय पर आँखों की जाँच के लिए कैम्प लगाए गए। इन शिविरों के कारण कई नागरिकों को न सिर्फ़ धन की बचत हुई बल्कि आँखों को समय पर उपचार उपलब्ध हो सका। पहले ऐसी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता था। सितम्बर 2016 में ईरानी ने ख़ुद अमेठी के हलियापुर में भाऊराव सेवा न्यास और केजीएम यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित स्वास्थ्य शिविरों का दौरा किया।

स्मृति ईरानी ने उस दौरान बताया कि 26 मई के बाद से तबतक वहाँ 10,000 लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराइ जा चुकी हैं। इसमें सर्जरी, दवाएँ और मोतियाबिंद ऑपरेशन सहित कई सुविधाएँ शामिल हैं। स्मृति ईरानी ने आगे कहा कि भाऊराव देवरस सेवा संस्थान एवं भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड द्वारा अनवरत अमेठी मे 20 वर्षों तक नि:शुल्क चिकित्सा शिविर चलता रहेगा। उन्होंने अप्रैल 2018 में गौरीगंज में अंत्योदय स्वास्थ्य शिविर का उदघाटन किया। इतना ही नहीं, अमेठी में ज़िला अस्पताल के निर्माण के लिए केंद्र सरकार द्वारा 36 लाख रुपए दिए गए।

अमेठी: निःशुल्क अंत्योदय स्वास्थ्य शिविर में स्मृति ईरानी

दिसंबर 2016 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी के जन्मदिन (सुशासन दिवस) के मौके पर अमेठी में एक शिविर लगा जिसमें 474 ऐसे लोगों को ग्लासेज वितरित किए गए, जिनका मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था। तिलोई में स्पेशल वीमेन हॉस्पिटल का निर्माण किया गया। 200 बीएड वाले इस अस्पताल का उद्घाटन अप्रैल 2017 में किया गया।

अमेठी में बढे रोज़गार के अवसर, स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने शायद ही अमेठी में किसी उद्योग की स्थापना के लिए प्रयास किया हो या आमजनों को स्किल डेवलपमेंट के लिए साधन मुहैया कराए हों लेकिन स्मृति ईरानी ने इस क्षेत्र में वो कर दिखाया जो राहुल देश भर में बोलते हुए घुमते रहते हैं। उन्होंने ‘मेड इन अमेठी’ का सपना साकार किया। अप्रैल 2017 में उन्होंने स्किल इंडिया के तहत अमेठी में पहला प्रधानमंत्री कौशल केंद्र का उद्घाटन किया। ये कौशल केंद्र अमेठी स्थित गौरीगंज के जामो में खुला। उनके निवेदन पर ‘मेड इन अमेठी’ पैकेजिंग प्रॉस्पेक्ट्स की सुविधा हासिल हुई।

कौशल केंद्र का कमाल, मेड इन अमेठी का सपना हुआ साकार

आपको बता दें कि अमेठी में नीम के पेड़ों की संख्या बहुत है। केंद्रीय मंत्री ईरानी ने इसे भी लोगों द्वारा धन कमाने के अवसर के रूप में परिवर्तित कर दिया। उनके प्रयासों के परिणाम स्वरूप गुजरात की नर्मदा वैली फर्टीलिज़ेर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड (GNFC) ने यहाँ सोशियो-इकोनॉमिक नीम प्रोजेक्ट की शुरुआत की। इसका उद्घाटन अप्रैल 2018 में अमेठी स्थित जगदीशपुर के कठौरा में ख़ुद ईरानी ने किया। इससे न सिर्फ़ अमेठी बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश को फ़ायदा हुआ। राज्य के 2500 गाँवों में एक लाख से भी अधिक ग्रामीण औरतों को इसका फ़ायदा मिला। स्मृति ईरानी के पीआरओ विजय गुप्ता ने ख़ुद इस कार्य की प्रगति पर नज़र रखी थी और स्थानीय प्रशासन के साथ बैठकों में सम्मिलित होकर कार्य की निगरानी की।

अमेठी के महिलाओं द्वारा तैयार किए गए अचार की ब्रांडिंग भी स्मृति ने सुनिश्चित कराई। उन्होंने ऐसी छोटी-मोटी चीजों को पकड़ा, जिस पर आम तौर पर किसी का ध्यान नहीं जाता। उन्होंने ‘अमेठी पिकल्स’ को अमेठी की महिलाओं के प्रदर्शन की क्षमता और उद्यमशीलता कौशल का प्रदर्शन बताया।

शिक्षा के क्षेत्र में भी स्मृति के प्रयासों का दिखा फल

स्मृति ईरानी ने अमेठी के सभी प्रखंडों में इंदिरा गाँधी ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) को अपने केंद्र स्थापित करने का निवेदन किया और यूनिवर्सिटी इसके लिए मान भी गई। उन्होंने इग्नू के रूरल स्टडी सेंटर का उद्घाटन करते वक़्त कहा कि इससे अलग-अलग विभागों में 30 स्नातक, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट के कोर्स उपलब्ध कराए जाएँगे। अक्टूबर 2016 में स्मृति ईरानी और केन्द्रीयता मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने अमेठी में राजीव गाँधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान का उदघाटन किया। हालाँकि, इस समारोह में राहुल गाँधी को भी आना था, लेकिन उन्होंने इसमें आने से इनकार कर दिया

राहुल गाँधी अमेठी के सांसद होते हुए भी अपने पिता के नाम पर ही स्थापित यूनिवर्सिटी के उद्घाटन में नहीं आए। इस युनिवर्सिटी को अमेठी स्थित जायस के बहादुरपुर में 519 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया गया। गौरीगंज में सेंट्रल स्कुल के निर्माण को मंज़ूरी दी गई। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) की शाखा को मंज़ूरी दी गई।

रेलवे के क्षेत्र में अमेठी का विकास, बढ़ी कनेक्टिविटी

केंद्रीय रेल मंत्री से समय-समय पर निवेदन करके स्मृति ईरानी ने अमेठी में कई प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई और साथ ही मंज़ूरी भी दिलाई। रेलवे क्रॉसिंग को दुरुस्त किया गया। रायबरेली-अमेठी के बीच रेल लाइन को डबल करने का कार्य शुरू किया गया। बानी, गौरीगंज और जायस के रेलवे स्टेशनों को आदर्श स्टेशन के रूप में विकसित करने का निर्णय भी 2016 में ही लिया गया।

अमेठी के रेलवे लाइन्स के विद्युतीकरण का कार्य शुरू हुआ। स्मृति ईरानी के प्रयासों के बाद अमेठी के रेलवे स्टेशनों पर शौचायल बनने शुरू हुए। लोगों का मानना है कि 2015 तक अमेठी के रेलवे स्टेशन पर एक शौचालय तक नहीं था। अमेठी में रेल नीर प्लांट की स्थापना की गई। इससे कई लोगों को रोज़गार मिला। ख़ुद केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने स्मृति ईरानी की प्रशंसा की। स्मृति ईरानी ने पीयूष गोयल के साथ मिलकर बैठक की और उन्हें रेलवे परियोजनाओं की माँगों से समय-समय पर अवगत कराया।

अमेठी में स्मृति ईरानी के प्रयासों द्वारा फलीभूत हुए अन्य कार्य

  • 2018 में 19 से 21 नवम्बर तक अमेठी में रोज़गार मेला का आयोजन हुआ। इसमें 10 विभिन्न सेक्टर से 40 कंपनियों ने भाग लिया।
  • 2016-17 में उज्ज्वला योजना के अंतर्गत अमेठी गैस वितरण का जो टारगेट सेट किया गया था, उस टारगेट से 20,000 से भी ज्यादा सिलिंडर वितरित किए गए। इसकी निगरानी स्मृति ईरानी ख़ुद कर रही थीं।
  • अमेठी के 181 गाँवों को ‘Open Defecation Free’ घोषित किया गया। अमेठी को स्वच्छ भारत मिशन के तहत 55 करोड़ रुपए प्राप्त हुए। अतः, वहाँ 55,000 से भी अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ।
  • संग्रामपुर में फ्री वाई-फाई सर्विस लॉन्च की गई।
  • जगदीशपुर स्टील प्लांट जो कि 30 वर्षों से बंद पड़ा था, उसका जीर्णोद्धार किया गया।
  • अमेठी में लघु उद्योग को बढ़ावा देने हेतु 50 मधुमक्खी पालकों को ‘बी बॉक्स’ वितरित किए गए। इसके साथ ही ‘लिज़्ज़त पापड़’ जैसे व्यवसाय के माध्यम से अमेठी की महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए किए जा रहे हैं प्रयास।
  • ज़िला संयुक्त चिकित्सालय, अमेठी में स्थापित पहले CT Scan मशीन का लोकार्पण किया। बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए अमेठी के लोगों को लखनऊ-दिल्ली जैसे शहरों की तरफ जाने से राहत मिली।

इन सबके अलावा समय-समय पर स्मृति ईरानी अमेठी का दौरा करती रहीं और उन्होंने आम जनों से मिलना-जुलना जारी रखा। इससे फ़ायदा यह हुआ कि उन्हें क्षेत्र की समस्याओं की अच्छी समझ हुई और राजनीतिक रूप से भी उनका प्रभाव यहाँ बढ़ा। सबसे बड़ी बात कि स्मृति ईरानी ने हवा-हवाई वादे न कर के छोटी-मोटी समस्याओं पर ध्यान दिया, जिसके दूरगामी परिणाम हुए।

नमो फूड्स की फ़र्ज़ी ख़बर पर SSP ने ‘कॉन्ग्रेसी’ जर्नलिस्ट्स से कहा, बात करने की तमीज सीखो

लोकसभा चुनाव का पहला चरण प्रगति पर है। इसी बीच भाजपा पर आचार संहिता का उल्लंघन करने के हर संभव प्रयास करने वाले आखिरी वक़्त तक भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं।

टाइम्स नाउ समूह से जुड़े एक जर्नलिस्ट द्वारा एक ऐसी तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की गई है, जिसमें ‘नमो फूड’ पैकेट्स से भरी एक कार को पुलिस पोलिंग बूथ में स्टाफ को बाँटने के लिए ले जा रही थी।

‘जर्नलिस्ट’ ने यह तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है, “NaMo फ़ूड पैकेट्स नोएडा में अपना काम कर रहा है।”
जर्नलिस्ट प्रशांत कुमार ने चालाकी से नमो और NaMo के अंतर को हटाकर यह साबित करने की कोशिश की है कि ये फूड पैकेट्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सम्बंधित हैं, जिन्हें अक्सर ‘NaMo’ नाम से सम्बोधित किया जाता है।

प्रशांत ने तुरंत सफाई देते हुए लिखा है कि किसी दोस्त ने उन्हें यह फोटो फॉर्वर्ड किया है, उन्होंने खुद क्लिक नहीं की है। जर्नलिस्ट के दावे की विश्वसनीयता इसी बात से समझी जा सकती है।

सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही वीडियो भी शेयर किया जा रहा है, जिसमें नमो फूड को कार में ले जाया जा रहा है और इसमें पुलिस वाले भी साथ में बैठे हुए हैं।

इस वीडियो के बाद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निशाना बनाना शुरू कर दिया और लिखा कि ये फूड पैकेट्स क्यों बाँटे जा रहे हैं?

ये वही प्रियंका चतुर्वेदी हैं, जिन्होंने रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी की रैली में भारी जनसैलाब दिखाने के लिए फोटोशॉप्ड तस्वीरों का सहारा लिया था और चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर सरदार भगत सिंह को नमन किया था।

हर वक़्त धरना देने का बहाना तलाशने वाली आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी इस चटपटी ‘वायरल तस्वीर’ को शेयर करते हुए चर्चा के मैदान में उतरने का मौक़ा तलाश ही लिया। अमित मिश्रा ने ‘नमो फूड’ को  ‘NaMo फूड’ बताकर सीधा DM और पुलिस के साथ ही चुनाव आयोग पर ही आरोप लगाते हुए लिखा, “चुनाव आयोग देश में चुनाव करवा रहा है या मजाक?”

एक दूसरे ‘जर्नलिस्ट’ ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए लिखा, “पुलिस ने ये बाँटे? वाह रे वाह UP।”

AFP जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जुड़े ‘फैक्ट चेकर्स’ ने भी बिना फैक्ट चेक किए ही इस तस्वीर को शेयर करते हुए सीधा उत्तर प्रदेश पुलिस पर आरोप लगाते हुए लिखा, “उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी नोएडा में NaMo फूड पैकेट्स बाँट रहे हैं, जहाँ इस समय मतदान हो रहा है।”

सच्चाई पता चलने पर हसन रिजवी के डिलीट किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

आम आदमी पार्टी का हितैषी ‘जनता का रिपोर्टर’ ब्लॉग ने एक कदम आगे बढ़ते हुए इसमें एक काल्पनिक प्रकरण जोड़कर ये भी लिख दिया कि ‘जर्नलिस्ट’ को देखकर पुलिस वहाँ से भाग गई।  

जबकि वीडियो में ये स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि पुलिस की गाड़ी वहाँ से ट्रैफिक खुलने के बाद आगे बढ़ रही ना कि वो भागने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा कि इन ‘जर्नलिस्ट’ ने दावा किया है।

क्या है सच्चाई

इन सबसे परे सच्चाई यह है कि नमो फूड का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई लेनादेना नहीं है। वास्तव में, नोएडा में इस नाम का एक रेस्टोरेंट है। जैसा कि फूड सर्च वेबसाइट जोमेटो में भी देखा जा सकता है, नमो फूड के नोएडा में सिर्फ 1 नहीं बल्कि 4 आउटलेट्स हैं।

SSP गौतम बुद्ध नगर ने ट्विटर पर स्पष्टीकरण देते हुए बताया है कि फूड पैकेट्स चुनाव ड्यूटी के दौरान लोकल स्तर पर पुलिस अधिकारियों के लिए रखे गए हैं।  

SSP ने बताया कि इस प्रकार की भ्रामक बातें राजनीतिक उद्देश्यों के कारण फैलाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि ये पैकेट्स ना ही किसी राजनीतिक दल और ना ही किसी विशेष रेस्टोरेंट से मँगवाए गए हैं।  

SSP ने बताया कि ये चुनाव ड्यूटी के दौरान तैनात पुलिस अधिकारियों के लिए मँगवाए जा रहे थे और रेस्टोरेंट का नाम नमो फूड्स होना सिर्फ एक संयोग है।

इसी के साथ पुलिस विभाग को बदनाम करने के लिए ट्विटर पर पूरी ताकत से उमड़ी ‘जर्नलिस्ट’ की भीड़ को लताड़ते हुए SSP ने करारा जवाब देते हुए कहा कि अपनी जुबान पर लगाम लगाओ और जागरूक बनो। बस यह जान लें कि जिस पत्रकार को यह जवाब दिया गया है, वो पहले भी अमित शाह पर झूठे आरोप लगा कर बदनाम हो चुकीं हैं।

हालाँकि, जब तक पुलिस स्पष्टीकरण देती, यह अफवाह ऐसे कॉन्ग्रेसी-वामी ‘जर्नलिस्टों’ द्वारा बड़े स्तर पर फैलाई जा चुकी थी। रिपोर्ट्स के अनुसार इलेक्शन अफसर ने नॉएडा DM से नमो फूड्स मामले पर जवाब माँगा है।

‘अमेठी में राहुल गाँधी की जान को खतरा, 7 बार सिर पर दिखी बंदूक वाली हरी लेजर लाइट’

कॉन्ग्रेस ने बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में नामांकन कराने पहुँचे पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी की सुरक्षा सेंध के आरोप में गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में कॉन्ग्रेस के तीन वरिष्ठ नेताओं ने केंद्र से जाँच और निगरानी की माँग की है। साथ ही पत्र में सुनिश्चित करने को कहा गया है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के सुरक्षा विवरण से संबंधित प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया जाए।

पत्र में दावा किया गया है कि जिस समय राहुल गाँधी अपना नामांकन भरने के बाद मीडिया से बात कर रहे थे उस दौरान उनके सिर पर 7 बार किसी ने हरी लेजर से निशाना साधा। कॉन्ग्रेस ने संभावना जताई कि यह लेजर लाइट किसी स्नाइपर की बंदूक से हो सकती है।

कॉन्ग्रेस का कहना है कि थोड़े-थोड़े समय में ऐसा कम से कम 7 अलग-अलग मौक़ों पर हुआ कि उनके सिर के पास हरी लेजर दिखी। इसमें दो बार ये लेजर उनके सिर के दाई ओर से लेजर देखने को मिली।

इस पत्र में कॉन्ग्रेस नेताओं ने सुरक्षा सेंध के कारण राहुल के पिता राजीव गाँधी और दादी इंदिरा गाँधी की मौत का भी हवाला दिया है। अहमद पटेल, जयराम रमेश और रणदीप सुरजेवाला द्वारा हस्ताक्षर किए गए इस पत्र में लिखा है कि राजनैतिक मतभेदों के अलावा सरकार और मंत्रालय की पहली जिम्मेदारी राहुल गाँधी की सुरक्षा होनी चाहिए, क्योंकि 2019 चुनाव के चलते उन पर जोखिम का ख़तरा है।

पाकिस्तान से बचकर आई ‘भारत की बेटी’ कर रही है नई शुरुआत, चुनाव के बाद बनेगी फिल्म

‘25 मई 2017 को पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त जे पी सिंह के प्रयासों से उज़्मा अहमद को भारत वापस लाया गया था। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तब उज़्मा को भारत की बेटी कहा था। उज़्मा की दर्दभरी कहानी भी बड़ी अजीब है। 14 साल पहले पढ़ाई के लिए अपने परिवार को छोड़कर मलेशिया जाने का फैसला कितना गलत साबित होने वाला था इसका अंदाज़ा शायद उज़्मा को नहीं था।

मलेशिया में उज़्मा को एक टैक्सी ड्राइवर ताहिर अली से प्रेम हुआ जो मूलतः पाकिस्तानी था। वह उसे बहला फुसला कर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह के किसी गाँव में ले गया और जबरन बंदूक की नोक पर उससे निकाह किया। ताहिर उज़्मा को नींद की दवाइयाँ देता था, मारता पीटता था और जबरन यौन संबंध भी बनाता था। निकाह से पहले ताहिर के 4 बच्चे और थे। खैबर पख्तूनख्वाह के अनजान से गाँव बुनेर में उज़्मा का दम घुटता था। वहशी दरिंदे ताहिर के ज़ुल्मों से ऊबकर एक दिन उज़्मा ने उस जहन्नुम से भागने की ठानी। लेकिन उसे पकड़ लिया गया और अंतहीन यातनाएँ दी गईं।

उज़्मा ने फिर भी हार नहीं मानी और एक दिन भारतीय उच्चायोग पहुँचने में कामयाब हो गई। वहाँ जे पी सिंह ने उसकी की मदद करने की ठानी और भारत में विदेश मंत्रालय से संपर्क किया गया। तब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान के अधिकारियों से बातचीत कर उज़्मा अहमद को भारत लाने का रास्ता साफ किया।

अब उज़्मा अपनी बेटी संग दिल्ली के सीलमपुर इलाके में रहती है। वहाँ बेटी के नाम पर ही एक पार्लर चलाकर अपना गुजारा कर रही है और अपने माँ बाप परिवार सबकी यादों के सहारे जी रही है। उसके बाप NRI हैं और 14 सालों से उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है। वह 27 साल की थी जब मलेशिया से ताहिर के साथ पाकिस्तान गई थी। अब इस दुनिया में उज़्मा का उसकी बेटी फलक के सिवा और कोई नहीं है जो उसके पहले शौहर की औलाद है। फलक को थैलेसेमिया नामक बीमारी है जिसके इलाज के लिए उज़्मा को काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

उज़्मा अहमद और जे पी सिंह के ऊपर एक बायोपिक बनने की भी खबर हैं जिसे फ़िलहाल चुनाव तक के लिए टाल दिया गया है।     

कॉन्ग्रेस को ‘चमार रेजीमेंट’ का समर्थन: दलितों को ‘दलित’ बनाए रखने की नई राजनीति

बीते दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण के बीच काफ़ी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली थी। परिणाम स्वरूप भीम आर्मी प्रमुख ने समुदाय के सदस्यों से सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मसूद को वोट देने की बात कही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि ‘रावण’ के इस ऐलान से बसपा-सपा-रालोद के गठबंधन को झटका लग सकता है।

खबरों की मानें तो चंद्रशेखर ने यह ऐलान सोमवार (अप्रैल 8, 2019) की देर रात किया है। मायावती के समानांतर राजनीति करने वाले चंद्रशेखर हाल ही में चमार रेजीमेंट की माँग को लेकर चर्चा में आए थे। इस दौरान उन्होंने अखिलेश पर जमकर निशाना भी साधा था। दूसरी ओर खुद को मायावती का बेटा बताने वाले चंद्रशेखर ने उन्हें कुछ समय पहले मनुवादी भी करार दिया था। जिससे साफ़ जाहिर हो गया था कि वह सपा-बसपा के गठबंधन से नाखुश हैं। इन आरोपों के चलते मायावती ने उन्हें भाजपा का एजेंट बताते हुए कहा था कि वो दलितों के वोटों को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

ऐसी राजनीतिक छींटाकशी के बीच रावण का ऐलान दर्शाता है कि कभी खुद को चुनावों से दूर रखने की बात करने वाले के लिए आज सिर्फ़ राजनीति ही महत्वपूर्ण रह गई है। याद दिला दें कि कुछ समय पहले रावण ने अपने ही पूर्व बयान को झूठा साबित करते हुए ऐलान किया था कि ‘वो वहीं से चुनाव लड़ेगा, जहाँ से मोदी चुनाव लड़ेंगे।’ मोदी को लेकर नफरत और सपा-बसपा से चलती लगातार नाराज़गी का नतीजा यह निकला है कि चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के उस मसूद को वोट देने की माँग की है, जिसने 2014 में पीएम के खिलाफ़ ‘बोटी-बोटी’ वाला बयान देकर सुर्खियों में जगह पाई थी।

याद दिला दें कि कुछ समय पहले भीम आर्मी के एक नेता ने बसपा-सपा कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया था कि उन्होंने रैली में चंद्रशेखर की तस्वीर लेकर आए कुछ दलितों के साथ मारपीट की और उनके पोस्टर फाड़ दिए थे। उन्होंने कहा था कि जब कोई भीम आर्मी के समर्थन में नहीं आया, तब मसूद ने उसकी मदद की थी।

अब ऐसे में सोचने वाली बात है कि हमेशा से दलित उत्थान पर बड़ी-बड़ी बात करने वाले चंद्रशेखर क्या वाकई में दलितों की स्थिति को लेकर गंभीर हैं? अगर हैं, तो फिर उन्होंने कॉन्ग्रेस को समर्थन देने का फैसला क्यों किया? क्योंकि भले ही मसूद ने उस समय आकर उनका समर्थन किया हो जब उनके साथ कोई नहीं था लेकिन यह भी तो सच है कि देश की सत्ता सबसे अधिक वर्षों तक कॉन्ग्रेस (जिससे मसूद जुड़े हैं) पार्टी के पास ही थी। लेकिन इस दौरान कभी भी पार्टी ने दलितों के उत्थान के लिए कोई कदम नहीं उठाया। कॉन्ग्रेस ने हमेशा देश में जाति/धर्म को आधार बनाकर लोगों में फूट डालने का प्रयास किया ताकि वो घृणा की भड़की आग में अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकती रहे।

मसूद को समर्थन देना भावनात्मक तौर पर और निजी स्तर पर सही हो सकता है, लेकिन जब आप दलित संगठन के प्रमुख हों, और दलितों के अधिकारों की लड़ाई की बात करते हों, तब ऐसा कदम उठाना कहाँ तक उचित है… चंद्रशेखर का कॉन्ग्रेस को समर्थन देना दिखाता है कि वह केवल खुद को दलितों का हितैषी बताकर समाज में एक जाना-माना चेहरा बनकर उभरना चाहते थे। और अब जब वो उस मुकाम पर पहुँच गए हैं कि अस्पताल में भर्ती होने पर राज बब्बर और प्रियंका गाँधी जैसे बड़े लोग उनका हाल लेने पहुँच रहे हैं तो वो दलितों के मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ़ अपनी राजनीति साध रहे हैं।

वोटर ID कार्ड नहीं है तो भी कोई बात नहीं… बिना इसके भी कर सकते हैं मतदान, जानिए Process

साल 2019 में जिस लोकसभा चुनाव का इंतजार लंबे समय से सबको था, उसकी शुरुआत आज से हो चुकी है। मतदान के लिए चुनाव आयोग सभी मतदाताओं को मतदाता पहचान यानी वोटर आईडी जारी करता है। लेकिन अगर किसी कारण से वोटर के पास से उसका वोटर आईडी खो गया है, या उपलब्ध नहीं हैं तो ऐसे में उसको चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप बिना वोटर आईडी कार्ड के भी मतदान केंद्र पर जाकर अपना वोट देकर आ सकते हैं।

इसके लिए आपको सिर्फ़ करना यह है कि पहले ऑनलाइन पता करें कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं। अगर लिस्ट में नाम नहीं हैं तो आप वोट नहीं डाल सकते हैं। लेकिन अगर लिस्ट में नाम है तो आप लिस्ट की हार्ड कॉपी लेकर और दूसरे किसी आईडी प्रूफ के साथ बूथ पर जाकर वोट डाल सकते हैं।

बिना वोटर आईडी के मतदान के तरीके

निर्वाचन आयोग लगातार इस बात की कोशिशों में जुटा हुआ है कि पिछले चुनाव की तुलना में इस बार मतदान में ज्यादा से ज्यादा नागरिकों का योगदान हो। अगर आपने अपने निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में नाम दर्ज करवा लिया है, तो इसका मतलब है कि आपने अपना रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया है। ऐसी स्थिति में आप बिना वोटर कार्ड के मतदान भी कर सकते हैं।

कैसे पता लगाएँ कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं…

जैसा कि हमने ऊपर आपको बताया है कि अगर आपका वोटर आईडी कार्ड बना हुआ है और आप वोटर लिस्ट में अपना नाम चेक करके मतदान करना चाहते हैं तो आप सबसे पहले https://www.nvsp.in लिंक को खोलें। इसके बाद बाईं तरफ (Search Your Name in Electoral Roll) पर क्लिक करें।

यहाँ क्लिक करने के बाद आप दो तरीकों से अपना नाम लिस्ट में चेक कर सकते हैं। पहला, अपनी जानकारी को दिए गए कॉलम में भरकर और दूसरा निर्वाचन कार्ड नंबर (EPIC) को डालकर, जोकि आपके वोटर आईडी कार्ड पर लिखा होता है।

पहला: EPIC नम्बर नहीं मालूम है तो…

NSVP के लिंक पर जाएँ फिर सर्च और डिटेल कॉलम पर क्लिक करें। अपनी जानकारी भरने के बाद आप कैपचा कोड को भरें और सर्च पर क्लिक कर दें। ऐसा करने के बाद अगर आपका नाम वोटर लिस्ट में दिखता है तो मतलब आप वोट देने जा सकते हैं।

दूसरा: अगर EPIC नम्बर पता है तो…

NSVP की वेबसाइट पर जाकर इलेक्टोरल सर्च पर जाएँ। इसके बाद यहाँ Search by EPIC No पर क्लिक करें और फिर अपना राज्य चुनें। इसके बाद कैपचा कोड को खाली स्थान में भरें और फिर सर्च पर क्लिक करें। अगर इतना करने के बाद आपको आपका नाम वोटर लिस्ट में दिखता है तो लिस्ट की हार्ड कॉपी लेकर अपना कीमती वोट देकर आएँ।

पोलिंग बूथ की जानकारी हेतु

इसके लिए आपको पहले NSVP की वेबसाइट पर जाकर इलेक्टोरल सर्च पर क्लिक करना होगा। फिर नागरिक सूचना के विकल्प पर जाकर बूथ पर क्लिक करें। यहाँ आपको पिता/पति में से किसी का नाम भरना होगा। इसके बाद कैपचा कोड भरें। आपको अपने पोलिंग सेंटर से जुड़ी अन्य सभी जानकारियाँ मिल जाएँगी।

वोटर आईडी कार्ड के अलावा इन दस्तावेजों के सहारे होगा मतदान

अगर ऊपर बताए तरीकों के जरिए आपने ‘ऑनलाइन मतदाता सूचना पर्ची’ का प्रिंट ले लिया है तो फिर इन 11 आईडी प्रूफ को साथ ले जाकर आप वोट देकर आ सकते हैं। इन 11 आईडी प्रूफ में आप – पैन कार्ड, आधार कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, केंद्र सरकार/राज्य सरकार/पब्लिक लिमिटेड कंपनी द्वारा जारी किया जाने वाला ड्यूटी आईकार्ड, बैंक या पोस्ट ऑफिस द्वारा जारी पासबुक/मनरेगा का जॉब कार्ड/ फोटो समेत पेंशन के कागज/श्रम मंत्रालय की स्कीम में जारी स्मार्ट कार्ड /श्रम मंत्रालय की स्कीम में जारी स्वास्थ्य बीमा स्मार्ट कार्ड/विधायक या सांसदों को जारी किए जाने वाले आधिकारिक कार्ड शामिल हैं।

₹8,58,650: रेगुलर काम-धंधा नहीं करने वाले ‘बेरोजगार’ कन्हैया कुमार की कमाई

कन्हैया कुमार जेएनयू के पूर्व छात्र हैं। फिलहाल बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार भी। कन्हैया कुमार ने कुछ दिन पहले बेगूसराय के जिला निर्वाचन कार्यालय जाकर अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है। उनके द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे [pdf] में, उनकी आय, संपत्ति और रोजगार संबंधी विवरण दिया गया है। और यही खुलासे का कारण है।

‘बेरोजगार’ कन्हैया का सबूत

खुलासा शब्द इसलिए क्योंकि कन्हैया कुमार ‘बेरोजगार’ हैं। मतलब वो कोई भी रेगुलर काम-धंधा नहीं करते हैं। खाने-पीने-पहनने भर की कमाई वो स्वतंत्र लेखन से करते हैं। एक किताब लिखी है उन्होंने – ‘बिहार से तिहाड़’ – इसकी रॉयल्टी और कुछ व्याख्यानों से मिले पैसों से ही उनका खर्चा चलता है।

‘बुरा बेटा’ कन्हैया कुमार

‘बेरोजगार’ कन्हैया की कमाई

‘बेरोजगार’ कन्हैया कुमार अब तक 8,58,650 रुपए की कमाई कर चुके हैं। 2017-18 में कन्हैया कुमार की आय 6,30,360 रुपए जबकि 2018-19 में उनकी आय 2,28,290 रुपए की रही। पिछले दो साल में बेरोजगारी के बावजूद 8 लाख रुपए से ज्यादा कमाने वाले कन्हैया अपने घर में एक गैस सिलिंडर तक नहीं खरीद कर दे पाते हैं अफसोस! श्रवण कुमार की धरती पर शायद ऐसे ही बेटों को ‘कपूत’ की संज्ञा दी जाती होगी। हालाँकि कन्हैया यह तर्क फिर से दे सकते हैं कि 3-4 दिन में खत्म हो जाने वाले सिलिंडर को वह साल भर में 100 से ज्यादा खरीदें तो कैसे खरीदें!

कन्हैया कुमार के हलफनामे पर गौर करें तो उनके पास नकद 24,000 रुपए, दो बैंक खातों में नकद 1,63, 648 रुपए और 50 रुपए के अलावा 1,70,150 रुपए की एक बीमा पॉलिसी भी है। उन्होंने बेगूसराय के अपने घर का बाजार मूल्य 2 लाख रुपए बताया है।

राष्ट्र विरोधी मामले में जमानत पर कन्हैया कुमार

बस जानकारी के लिए यह याद रखें कि कन्हैया कुमार फिलहाल बेल मतलब जमानत पर स्वतंत्र घूम पा रहे हैं। ‘टुकड़े टुकडे गैंग’ के कुख्यात लीडर कन्हैया पर 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोधी नारे लगाने का आरोप है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस मामले में 1200 पन्नों का आरोप-पत्र भी दाखिल कर चुकी है।

चुनावी माहौल में यह भी याद रखें कि कन्हैया कुमार बेगूसराय से महागठबंधन के उम्मीदवार बनने वाले थे। लेकिन अपराधी लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कॉन्ग्रेस के गठबंधन ने सीपीआई और सीपीआई-एम को एक भी सीट नहीं दी। बेगूसराय की संसदीय सीट पर अब कन्हैया कुमार का मुकाबला केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और आरजेडी के तनवीर हसन के साथ है। और इस लड़ाई में आँकड़ों की बात करे तो ‘बेचारे’ कन्हैया नंबर तीन पर फिसल गए हैं। खुद गाँव वाले कन्हैया कुमार की जगह मोदी-मोदी का जयकारा लगाए घूम रहे हैं।

वाराणसी में मोदी के ख़िलाफ़ कौन? 6 महीने जेल की सजा काट ‘काला इतिहास’ रचने वाला HC जज कर्णन

वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन ने नामांकन दाखिल करने का निर्णय लिया है। मद्रास और कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश रह चुके कर्णन पहले ऐसे जज थे, जिन्हें पद पर रहते हुए अदालत की अवमानना का दोषी पाया गया था। जस्टिस कर्णन पहले ही मध्य चेन्नई लोकसभा सीट के लिए नामांकन दाखिल कर चुके हैं और वाराणसी दूसरा ऐसा क्षेत्र होगा जहाँ से वह चुनाव लड़ेंगे। कर्णन ने 2018 में एंटी-करप्शन डाइनेमिक पार्टी का गठन किया था। वो इसी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे। जून 2017 में रिटायर हुए कर्णन को 6 महीने जेल में गुज़ारने पड़े थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछली बार वाराणसी से रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी। 2014 के आम चुनाव में पीएम मोदी सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत दर्ज करने वाले उम्मीदवार थे। कुल मतों का 56% से भी अधिक प्राप्त करने वाले मोदी को उस चुनाव में वाराणसी से 5,81,122 मत मिले थे जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी अरविन्द केजरीवाल 2,09,238 मतों दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें कुल मतों का 20.3% हिस्सा प्राप्त हुआ था। इस तरह नरेंद्र मोदी ने रिकॉर्ड 3,71,884 मतों से जीत दर्ज की। मोदी ने केजरीवाल को 36% मतों से हराया था।

अगर जस्टिस कर्णन की बात करें तो उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने इस सिलसिले में जस्टिस कर्णन की लिखी चिट्ठियों का स्वत: संज्ञान लेते हुए उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना का मुक़दमा शुरू किया था। जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए कहा था:

“8 फरवरी 2018 से ही ये सात जज (जिसके ख़िलाफ़ उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे) मुझे कोई भी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य नहीं करने दे रहे हैं। इन लोगों ने मुझे परेशान कर दिया है और मेरा सामान्य जीवन खराब कर दिया है। इसलिए, मैं सभी सात न्यायाधीशों से मुआवजे के रूप में 14 करोड़ रुपये लेना चाहता हूँ।

तेज बहादुर यादव भी मोदी के ख़िलाफ़ मैदान में

वाराणसी में चुनाव प्रचार करते तेज बहादुर यादव

उधर बीएसएफ से बरख़ास्त तेज बहादुर यादव भी वाराणसी से मोदी के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे हैं। जिन्होंने बीएसएफ में रहते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से वीडियो बनाकर जवानों को दिए जाने वाली भोजन की गुणवत्ता को ख़राब बताया था। कुछ दिनों पहले उनके बेटे की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। तेज बहादुर ने कहा कि क़रीब दस हज़ार पूर्व सैनिक वाराणसी आकर ‘नकली चौकीदार के ख़िलाफ़ घर-घर में प्रचार करेंगे। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। तेज बहादुर को अनुशासनहीनता का दोषी पाते हुए बीएसएफ से बरख़ास्त कर दिया गया था।