कमाल ‘अतातुर्क’ का ख़ूनी जुनून था जिन्ना के सर पर: अभिजित चावड़ा

जिन्ना जिस 'अतातुर्क' जैसा बनने के लालच में लाखों के खून और करोड़ों विस्थापितों की आहों से अपने हाथ सान बैठे, वे काबिलियत में उस अतातुर्क के सामने कहीं नहीं ठहरते थे।

थ्योरेटिकल फिजिसिस्ट, लेखक और इतिहास-भूराजनीति के जानकार अभिजित चावड़ा ने हाल ही में दिल्ली में भारत के बंटवारे, तुर्की के इस्लामिक इतिहास में इसकी जड़ों, और गाँधी जी की इसमें भूमिका पर संक्षिप्त वक्तव्य दिया। सृजन फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने जिन्ना के मुस्तफ़ा कमाल ‘अतातुर्क’ के प्रति जुनून का संबंध भारत के 1947 में विभाजन से सिद्ध किया, ‘महात्मा’ मोहनदास करमचंद गाँधी की इस पूरे कालखंड में भूमिका का संक्षिप्त अन्वेषण किया, और कमाल अतातुर्क व गाँधी के नेतृत्व में अंतर का विश्लेषण किया।

प्रथम विश्वयुद्ध में अतातुर्क का उदय, खलीफाई के अंत का प्रारंभ

प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की पर शासन कर रहे उस्मानी (Ottoman) खलीफ़ा ने जर्मनी और ‘केन्द्रीय राष्ट्रों’ (Central Powers) का साथ इसलिए दिया था क्योंकि ईसाई-बहुल यूरोप की बड़ी राजनीतिक ताकतों में इकलौता जर्मनी था जो उस्मानिया खलीफाई का समर्थक था। दरअसल अपनी स्थापना के समय से ही उस्मानी खलीफाओं ने तुर्की में गैर-इस्लामियों, जिनमें बहुतायत ईसाईयों की थी, के ऊपर भयावह अत्याचार किए थे। इसके अलावा यूनान की उस्मानी साम्राज्य से आज़ादी के संघर्ष के समय भी यूनानियों और ईसाईयों के कई सामूहिक हत्याकाण्ड हुए थे। चूँकि यूनान पाश्चात्य जगत में पाश्चात्य सभ्यता का जन्मस्थान माना जाता है, अतः अधिकांश पश्चिमी देशों के सम्बन्ध तुर्की के साथ तनावपूर्ण या खुली शत्रुता के थे- केवल जर्मनी इसका अपवाद था।

पर प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी और केन्द्रीय राष्ट्रों की पराजय हुई, और इंग्लैंड, फ़्रांस, और रूस के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों ने तुर्की के पर कतरते हुए उसे केवल उत्तरी और केन्द्रीय एनाटोलिया तक सीमित कर दिया। हालाँकि मित्र राष्ट्रों ने उस्मानिया खलीफाई को आधिकारिक तौर पर ख़त्म नहीं किया, पर खलीफाई का अंत यहीं से शुरू हुआ।

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इस युद्ध में तुर्की भले हार गया, पर उसे मुस्तफ़ा कमाल के रूप में नया नायक मिला। युद्ध में मुस्तफ़ा कमाल ने अपनी अपेक्षाकृत कमज़ोर टुकड़ी के साथ गलीपोली नामक मोर्चे पर अंग्रेज़ों और मित्र देशों की सेनाओं से लोहा लिया। लोहा ही नहीं लिया, बल्कि अपने युद्ध कौशल और नेतृत्व क्षमता का अद्भुत प्रदर्शन करते हुए जीत भी हासिल की। इससे तुर्की में उनकी ताकत जनता और शासक वर्ग दोनों में बढ़नी शुरू हुई। और अंततः एक स्टाफ़ कप्तान से शुरुआत करने वाले मुस्तफ़ा कमाल ने तुर्की में उस्मानिया खलीफाओं की खलीफाई का अंत कर तुर्की में एक पंथनिरपेक्ष गणराज्य की स्थापना की।

गाँधी के खाद-पानी पर बढ़ी हिंदुस्तानियत को दबाती इस्लामी पहचान

खलीफा अब्दुल हमीद (1876–1909) ने अपनी सत्ता बचाने के लिए और तुर्की में ‘पाश्चात्य विचार’ लोकतंत्र को कुचलने के लिए 19वीं शताब्दी के अंत में ही दुनिया के हर हिस्से में अपने ‘दूत’ भेजने शुरू कर दिए थे। उसी बीज की बिना पर मौलाना मुहम्मद अली जौहर और उनके भाई शौकत अली ने खिलाफ़त आन्दोलन की नींव रखी।

अभिजित चावड़ा के मुताबिक, इस आन्दोलन ने पहली बार इस विचारधारा की पुष्टि कर दी कि हिन्दुस्तानी मुसलमानों की पहली वफ़ादारी इस देश और इसके लोगों के प्रति नहीं, मज़हबी आधार पर इस देश के बाहर इस्लामी ‘उम्मा’ के प्रति है। इस आन्दोलन ने पहचानों के संघर्ष में ‘मुसलमान’ को ‘हिन्दुस्तानी’ के ऊपर रखने का सन्देश मुसलमानों में पुख्ता किया। यही नहीं, गाँधी समेत कॉन्ग्रेस नेताओं का समर्थन ही इस मज़हबी आन्दोलन का जनाधार बढ़ाने में निर्णायक हुआ।

एक गुमनाम-से ट्विटर अकाउंट को किसी लाखों-करोड़ों ‘फॉलोअर्स’ वाले ट्विटर अकाउंट द्वारा फॉलो और रीट्वीट किए जाने का उदाहरण देते हुए वह समझाते हैं कि कैसे गाँधी और कॉन्ग्रेस के नेताओं के चलते ही न केवल खिलाफ़त को गैर-मुसलमान वर्गों का समर्थन मिला, बल्कि मुसलमानों का भी अधिकतम वर्ग गाँधी और कॉन्ग्रेस के चलते ही खिलाफ़त से जुड़ा। और खिलाफ़त के दौर में भरा गया मज़हबी जहर ही आगे जाकर मुस्लिम लीग-रूपी विषबेल का फल विभाजन बना। इसी दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय भी 1920 में हिंदुस्तानियत से अलग इस्लामी पहचान को पोषित करने के लिए ही बना।

खिलाफ़त की शुरुआत करने वाले मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने ढाका में मुस्लिम लीग के ज़हरीले प्रस्तावों के आधिकारिक समर्थक बने।

जिन्ना: स्वनिर्वासन में ‘अतातुर्क’ बनने की सनक

हिंदुस्तान के बंटवारे के दूसरे सूत्रधार मुहम्मद अली जिन्ना के बारे में अभिजित खुलासा करते हैं कि जिन्ना तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफ़ा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ की जीवनी से बहुत प्रभावित थे। गाँधी-नेहरू गुट द्वारा भारतीय राजनीति में किनारे लगा दिए गए जिन्ना स्वनिर्वासन में चले गए थे- और वह कभी न लौटते अगर लंदन में उन्होंने अतातुर्क की जीवनी न पढ़ी होती।

अतातुर्क से प्रभावित होकर ही जिन्ना न केवल हिंदुस्तान लौटे और मुस्लिम लीग की कमान अपने हाथ में ले इस देश का खूनी बँटवारा करा कर ही दम लिया, बल्कि उनके ‘Direct Action Day’ जैसे हिंसक पैंतरे भी सीधे-सीधे अतातुर्क द्वारा तुर्की में यूनानियों और अन्य गैर-मुस्लिमों के कत्लेआम की नक़ल थी। उनके अतातुर्क-प्रेम की तस्दीक उनकी बेटी दीना भी करतीं हैं जब वह बतातीं हैं कि जिन्ना कई-कई दिनों तक घर पर केवल तुर्की के राष्ट्रपिता की ही बात करते रहते थे; यहाँ तक कि एक समय दीना ने उन्हें भी अतातुर्क के लिए प्रयुक्त किए जाने वाला उपनाम ‘Grey Wolf’ दे दिया था

पर यहीं से कमाल अतातुर्क और जिन्ना के बीच गंभीर विरोधाभास भी उभरने लगते हैं। अतातुर्क ने बेशक मुसलामानों के कट्टरपन  और इस्लाम के नाम पर सामूहिक हत्याकांडों का इस्तेमाल सत्ता हथियाने के लिए किया, पर सत्ता पार कर उन्होंने जो तुर्की बनाया वह पंथनिरपेक्ष, प्रगतिशील, आधुनिकता की ओर उन्मुख राष्ट्र था; वहाँ की जनता अपने नेता के सेक्युलर इरादों से इतनी नावाकिफ़ थी कि वह ‘पहले खलीफ़ा के दौर में वापिस चलने’ की ख़ुशी मना रही थी। इसके उलट जिन्ना का पाकिस्तान जन्म से ही कट्टरपंथ, मुल्ला-मौलवीवाद में डूब गया।

इसके अलावा जहाँ अतातुर्क ने एक स्पष्ट दृष्टिकोण के अंतर्गत सत्ता केन्द्रीयकृत कर सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ अपने हाथ में रखीं। वहीं दूसरी ओर जिन्ना पाकिस्तान बनते ही ‘राजा बाबू’ “कायदे-आज़म” बना किनारे लगा दी गए। उनके प्रधानमंत्री लियाक़त अली खान ने उन्हें “बाबा-ए-कौम” का उपनाम दे घर के बूढ़े बाबा की तरह खिसका दिया। और विदेश, रक्षा, सीमांत मामले जैसे कद्दावर मंत्रालयों पर केन्द्रीयकृत कब्ज़ा किए रहे।

इन विरोधाभासों से यह साफ़ होता है कि जिन्ना जिस ‘अतातुर्क’ जैसा बनने के लालच में लाखों के खून और करोड़ों विस्थापितों की आहों से अपने हाथ सन बैठे, वे काबिलियत में उस अतातुर्क के सामने कहीं नहीं ठहरते थे। बल्कि शायद नियति की यही विडंबना रही कि अतातुर्क जैसी जिस ताक़त के पीछे वह लाखों की लाशों को सीढ़ी बना भागे, वह उनकी बजाय लियाक़त अली खान की झोली में जा गिरी!!

गाँधी: नेतृत्व क्षमता में अतातुर्क से तुलना

अपने वक्तव्य के आखिर में चावड़ा हमारे सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न रखते हैं- क्या होता अगर हिंदुस्तान में मुस्तफ़ा कमाल पाशा ‘अतातुर्क’ जैसा कोई नेता होता, या फ़िर तुर्की में गाँधी जैसा कोई नेता?

और इस सवाल के जवाब में वे दोनों के नेतृत्व की तुलना करते हैं।

चावड़ा के अनुसार देश को एक नेता से पाँच प्रकार के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखना होता है:

⦁ समृद्धि

⦁ सुरक्षा

⦁ भूक्षेत्रीय अखंडता (यानि देश की ज़मीन देश के हाथों और नियंत्रण में ही रहे)

⦁ स्वनिर्धारण क्षमता (यानि देश के लोग ही अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करें)

⦁ सांस्कृतिक अखंडता

इन पाँचों में भी चावड़ा स्वनिर्धारण क्षमता को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए नेता और प्रबंधक में बहुत महत्वपूर्ण अंतर भेड़ों के गड़ेरिये का बताते हैं- गड़ेरिया भेड़ों के खाने से लेकर तबियत तक का ध्यान रखता है, उनकी हर सुख-सुविधा का ख्याल रखता है, उन्हें शिकारी पशुओं जैसे बाहरी खतरों  से भी बचाता है- पर क्यों? इसलिए नहीं कि वह भेड़ों की सेवा कर रहा होता है, बल्कि इसलिए कि उसकी असली निष्ठा भेड़ों के ‘ऊपर’ भेड़ों के ‘मालिक’ के प्रति होती है; उसके लिए भेड़ों की इच्छा का कोई महत्त्व नहीं होता।

उसी तरह जिस ‘नेता’ की असली निष्ठा उन लोगों के प्रति नहीं होती जिनके नेतृत्व और प्रतिनिधित्व का वह दावा करता है, वह नेता नहीं, महज़ एक प्रबंधक होता है। ज़रूरी नहीं वह जनता के साथ बुरा ही सुलूक करे, कभी-कभी वह गड़ेरिये की तरह वह दुलार-पुचकार भी सकता है, पर उसका मकसद और उसकी निष्ठा लोगों या उनके हित से नहीं जुड़ी होती।

इस उदाहरण को वह गाँधी जी के बँटवारे के दौरान के व्यवहार के समक्ष रख कई प्रश्न पूछते हैं, ऐसे प्रश्न जो शायद गाँधीवादियों को बहुत ज्यादा चुभ सकते हैं:

  • गाँधी जी ने कहा था कि यदि कॉन्ग्रेस विभाजन स्वीकार करती है तो वह ऐसा उनकी लाश के ऊपर से करेगी। विभाजन फिर गाँधी के जीवित रहते कैसे हो गया?

  • गाँधी विभाजन का जुबानी विरोध तो आखिरी समय तक करते रहे, पर उन्होंने विभाजन को असल में रोकने के लिए क्या किया? उनके जैसे प्रभाव-क्षेत्र वाला व्यक्ति अगर एक बार विभाजन के खिलाफ आन्दोलन की पुकार भी दे देता तो सभी न सही, एक बड़ा वर्ग सड़कों पर विभाजन करने और स्वीकार करने वालों के खिलाफ उतर आता। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?

  • विभाजन-विरोधी मुसलमानों के नेता खान अब्दुल गफ्फार खान के गाँधी से आखिरी शब्द थे, ‘आपने हमें भेड़ियों के बीच झोंक दिया है।’ (उनका प्रान्त पख्तूनवा उस समय विभाजन-विरोधी था। पर उसका जबरन विलय पाकिस्तान के साथ हुआ)
    उन्होंने यह जिन्ना या विभाजन कर रहे किसी अन्य नेता की बजाय गाँधी जी को इंगित कर क्यों कहा?

अभिजित इन सवालों का उत्तर ‘क्योंकि गाँधी जी गृह-युद्ध टालना चाहते थे’ मानने से इंकार कर देते हैं। वह अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति लिंकन का उदाहरण देते हैं। ‘एक और नेता के सामने गृहयुद्ध या फिर गलत को सहते हुए बनी हुई एकता में से चुनाव था…’ और उसने क्या और क्यों चुना, और फिर क्या हुआ यह बताने की आवश्यकता नहीं…

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