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क्या इस बार ‘शशि’ थरूर को लगेगा ग्रहण?

दो बार तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सदस्य और प्रख्यात लेखक डॉ शशि थरूर के लिए इस बार लोकसभा की राह आसान नहीं लग रही है। इकॉनॉमिक टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक भाजपा के कुम्मानम राजशेखरन ने उनकी ताकत में बहुत हद तक सेंध लगा दी है। पिछली बार आखिरी दौर की गिनती में किसी तरह जीत दर्ज करने वाले थरूर अगर इस बार किसी तरह जीत भी जाते हैं तो यह जीत पिछली बार से भी कम अंतर से होगी।

एलडीएफ-यूडीएफ, दोनों की ज़मीन खींच रहे राजशेखरन

कुम्मानम राजशेखरन कुछ समय पहले तक मिज़ोरम के राज्यपाल थे। भाजपा ने उन्हें वहाँ से विशेष तौर पर शशि थरूर को चुनौती देने के लिए वापिस बुलाया है और राजशेखरन कॉन्ग्रेस के यूडीएफ और वाम दलों के गठबंधन एलडीएफ दोनों के ही वोट बैंक को खींच रहे हैं। वाम के खिलाफ उनकी ताकत सबरीमाला पर भाजपा और संघ की लंबी चल रही लड़ाई है, जिसमें भाजपा के घोषणापत्र में सबरीमाला की आस्था के सम्मान की बात शामिल है; वाम दलों वाली सरकार ने न केवल परंपरा भाग करने की अदालत में पैरवी की, बल्कि हिन्दुओं में अपनी आस्था के अपमान के तौर पर देखे जा रहे निर्णय को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं शशि थरूर एक लोकसभा सदस्य के तौर पर क्षेत्र को नज़रंदाज़ करने के आरोप के अलावा कॉन्ग्रेस की कमजोर राष्ट्रीय छवि के चलते भी बैकफुट पर हैं।

पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजनयिक थरूर, जो एक समय संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बनते-बनते रह गए थे, अपने 2009 के पहले चुनाव के बाद से ही तिरुवनंतपुरम की ‘शान’ माने जाते हैं। अपनी विक्टोरियन अंग्रेजी के लिए सोशल मीडिया पर जाने जाने वाले थरूर अपने पहले चुनाव में सीपीआइ के पी. रामचंद्रन नायर को एक लाख के करीब मतों से पराजित कर लोकसभा पहुँचे थे। उनके व्यक्तिगत मतदाताओं में एक बड़ा वर्ग महिलाओं और युवाओं का मन जाता है, जिसमें वह बहुत लोकप्रिय रहे हैं

पिछली बार भी बहुत कम था जीत का अंतर, वाम के खराब प्रदर्शन का ‘भरोसा’

शशि थरूर की व्यक्तिगत लोकप्रियता के बावजूद 2014 के गत लोकसभा चुनावों में उनकी जीत का अंतर महज 15,000 वोटों का था, और दूसरे स्थान पर रहे थे नेमोम विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक ओ राजगोपाल। राजगोपाल राज्य भाजपा के कद्दावर नेता हैं।

शशि थरूर के वर्तमान भाजपाई प्रतिद्वंद्वी राजशेखरन भी कमोबेश उसी कद के नेता हैं, और अब उनके पास नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी है। ऐसे में शशि थरूर की जीत का पूरा गणित तीसरे प्रतिद्वंद्वी, एलडीएफ के सी दिवाकरण, के खराब प्रदर्शन पर टिका है।

ऐसा इसलिए कि दोनों ही दल/गठबंधन ‘भाजपा आएगी तो दंगे हो जाएंगे’ का भय दिखाकर गैर-हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद में हैं, और इसीलिए वे राजशेखरन को भी ‘खतरनाक संघी’ के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। ऐसे में यदि यह वोट बँटते हैं, तो राजशेखरन फायदे में रहेंगे और शशि थरूर हारेंगे। उनकी जीत तभी सम्भव है अगर या तो ध्रुवीकरण हो ही नहीं, और अगर हो तो गैर हिन्दू वोट बँटने की बजाय एकमुश्त उनकी झोली में आ गिरे।

राहुल की ‘न्याय योजना’ कहीं अन्याय का प्रतीक तो नहीं…

जैसे ही चुनाव का समय नजदीक आता है, राजनीतिक पार्टियों द्वारा जनता को लुभाने की भरपूर कोशिश की जाती है। इसी के मद्देनजर कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ‘न्याय योजना’ को प्रमुखता से जगह दी और इसका बढ़-चढ़ कर प्रचार भी किया। आपको बता दें कि न्याय योजना के अंतर्गत कॉन्ग्रेस पार्टी ने चुनावी घोषणापत्र में 25 फीसदी गरीबों के खाते में ₹6 हजार प्रतिमाह के हिसाब से ₹72 हजार सालाना भेजने का वादा किया है। इस योजना को लेकर कॉन्ग्रेस लगातार कह रही है कि इसके तहत गरीबों के साथ न्याय होगा। मगर अब इस न्याय योजना को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी खुद न्यायालय के चक्कर काट रही है।

दरअसल, इलाहाबाद कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि इस तरह की घोषणा वोटरों को रिश्वत देने की कैटगरी में क्यों नहीं आती और क्यों न पार्टी के खिलाफ पाबंदी या दूसरी कोई कार्रवाई की जाए? कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से भी जवाब माँगा है। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की घोषणा रिश्वतखोरी व वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश है। इसलिए अदालत ने कॉन्ग्रेस पार्टी और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का वक्त दिया है। हाईकोर्ट के वकील मोहित कुमार द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका में कहा गया कि कॉन्ग्रेस ने घोषणा पत्र में गरीबों को ₹72 हजार सालाना देने का वादा कर मतदाताओं को प्रलोभन दिया है। यह आचार संहिता का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मतदाता को प्रलोभन देना निष्पक्ष मतदान के खिलाफ है। इससे मतदान की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

कोर्ट के द्वारा भेजे गए नोटिस से कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लग सकता है, क्योंकि कॉन्ग्रेस घोषणापत्र के जारी होने के साथ ही इस वादे का जोर-शोर से प्रचार कर रही है और इस वादे के दम पर चुनाव जीतने का भी ख्वाब देख रही है, लेकिन अब कॉन्ग्रेस की ‘न्याय योजना’ ही न्यायालय पहुँच गई है। तो अब देखना होगा कि कॉन्ग्रेस पार्टी कैसे अपनी न्याय योजना का बचाव करते हुए न्यायालय को अपना जवाब सौंपती है, और क्या न्यायालय कॉन्ग्रेस के जवाब से संतुष्ट हो पाएगी?

वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस जब से इस योजना को लेकर आई है, तब से सवालों के घेरे में है। कभी इस योजना के लागू करने को लेकर, तो कभी न्याय की बात करने को लेकर। और इस तरह के सवालों का उठना लाजिमी भी है, क्योंकि आजादी के 70 सालों में कॉन्ग्रेस ने 60 साल तक देश पर शासन किया। इस दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, मनमोहन सिंह ‘गरीबी हटाओ’ का नारा देती रही, लेकिन कभी इस पर काम नहीं किया और अब राहुल गाँधी ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ एक बार फिर जनता को मूर्ख बनाने आए हैं।

दरअसल पार्टी का गरीबी हटाने का कोई मकसद ही नहीं है। कॉन्ग्रेस के द्वारा ये स्लोगन सिर्फ जनता का वोट हासिल करने का एक पैंतरा मात्र है। ऐसा लगता है कि 60 साल तक देश पर राज करने वाली पार्टी को सत्ता से दूरी खटक रही है, बेचैनी बढ़ रही है। वो बस किसी तरह से सत्ता में आना चाहती है और देश पर राज करना चाहती है।

अब यहाँ एक और सवाल ये भी उठता है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनाव के मुख्य चुनावी वादे के रूप में न्यूनतम आय गारंटी योजना की घोषणा तो कर दी, लेकिन ये नहीं बताया कि इस भारी भरकम योजना को लागू कैसे किया जाएगा? इसके लिए फंड कहाँ से आएगा? जीडीपी और राजकोषीय घाटे पर इसका क्या असर होगा? अगर यह योजना लागू होती है, तो 2019-20 में करीब ₹3,60,000 करोड़ की जरूरत होगी। वो पैसे कहाँ से आएँगे?

कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में इसके बारे में कोई जिक्र नहीं है कि इस योजना के लिए पैसों का इंतजाम किस तरह से और कहाँ से किया जाएगा? क्या कॉन्ग्रेस पार्टी के पास कोई ऐसा पेड़ है, जिसको हिलाने पर पैसे गिरेंगे या फिर उन्होंने कोई खजाना छुपा रखा है, जिसका वो चुनाव जीतने के बाद खुलासा करेंगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा किए गए घोटालों- अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला, बोफोर्स घोटाले, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला, नेशनल हेराल्ड घोटाला और वाड्रा के द्वारा किए गए मनी लॉन्ड्रिंग, आदि घोटाले के जरिए अर्जित किए गए अवैध संपत्ति से गरीब जनता का भला करने का सोच रहे हैं।

खैर, ये तो अलग बात है, लेकिन अगर भविष्य में ये स्कीम लागू होती है तो ये जाहिर सी बात है कि पैसे मिडिल क्लास फैमिली की जेबों से ही निकाली जाएगी। यानी कि इस योजना का भार मिडिल क्लास फैमिली पर ही पड़ने वाला है, क्योंकि राहुल गाँधी योजना तो बढ़ा देंगे, लेकिन आय का स्त्रोत तो नहीं बढ़ेगा, वो तो वही रहेगा। ऐसे में किसी न किसी टैक्स में वृद्धि की जाएगी, जिसका असर मध्यम वर्ग के लोगों पर ही पड़ेगा। इस तरह से मध्यम वर्ग के परिवारों से पैसे टैक्स के रूप में वसूल कर गरीबों को देकर वाह-वाही लूटी जाएगी। तो ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि ये न्याय योजना मिडिल क्लास फैमिली के लिए अन्याय ही साबित होगी।

चुनाव के तारीख की घोषणा होने से पहले से ही राहुल गाँधी ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगाते हुए पीएम मोदी को सत्ता से हटाना चाह रही है। क्योंकि चोर को ही चौकीदार से डर लगता है और इस चौकीदार की चौकीदारी की वजह से ही उनके (कॉन्ग्रेस) के काले कारनामों की लंबी फेहरिस्त सामने आई है, जिससे बौखला गए हैं राहुल जी।

असल में राहुल को पता है कि चौकीदार जाग रहा है और उन्हें डर है कि जिस तरह से इस चौकीदार ने उनके सारे घोटालों का बखिया उधेड़ दिया है, वो आगे भी उन्हें जनता और देश का पैसा नहीं खाने देगा। इसलिए वो किसी भी हालत में उन्हें हटाना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई तो यही है कि देश को ऐसे ही चौकीदार की जरूरत है, जो जनता और देश के पैसों की सही रखवाली कर सके और गलत हाथों में न जाने दे।

दरअसल, कॉन्ग्रेस के पास गरीबी हटाने का कोई विजन नहीं है। वो न्याय योजना की घोषणा करके जनता को बरगलाने की कोशिश कर रही है। राहुल गाँधी ने पैसा बाँटने की योजना की बात कहकर केवल देश की जनता को ठगने का काम किया है, क्योंकि अगर कॉन्ग्रेस वाकई में गरीबी मिटाना चाहती तो स्किल इंडिया की तरह कोई योजना लेकर आती, या फिर शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए किसी तरह की योजना की बात करती।

इससे जनता के शिक्षा का स्तर बढ़ता और वो रोजगार के माध्यम से गरीबी को पीछे छोड़ आगे बढ़ते, तो ऐसा लगता कि कॉन्ग्रेस गरीबी मिटाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। और राहुल गाँधी को गरीबों और किसानों की इतनी ही चिंता है, तो वो कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में किसान सम्मान निधि योजना लागू क्यों नहीं कर रही है? क्यों वो आयुष्मान योजना के लाभ से गरीबों को वंचित रख रही है?

खुद को BJP की आइटम गर्ल बताने वाले आजम खान फूट-फूटकर रोए, कहा BJP मुझे फाँसी देना चाहती है

लोकसभा चुनाव 2019 में BJP कैंडिडेट जयाप्रदा के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने पर चुनाव आयोग का बैन खत्म होने के बाद समाजवादी नेता आजम खान एक रैली के दौरान भावुक हो गए और फूट-फूटकर रोते हुए नजर आए। नम आँखों से उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन उनके समर्थकों और परिचितों को परेशान कर रहा है। रामपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए आजम खान ने रोते हुए कहा, “मेरे साथ ऐसा सलूक हो रहा है, जैसे मैं दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी हूँ, देशद्रोही हूँ। सरकार का वश चले तो मुझे गोलियों से छलनी करवा दे।

आजम ने कहा, “यूपी की राजनीति में बगावत हो गई है, भाजपा नफरत फैलाने का काम कर रही है, लेकिन नफरत से कोई जिंदा नहीं रह सकता। देश में सरकार नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। सुप्रीम कोर्ट के जज जनता से इंसाफ माँग रहे हैं। जिला प्रशासन सरकार के इशारों पर काम कर रहा है। इसीलिए चुनाव आयोग से हमारी माँग है कि अर्द्धसैनिक बलों की निगरानी में रामपुर का चुनाव हो।”

उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन भी उन्हें हराने की साजिश कर रहा है। जज्बातों में बहकर आजम खान ने कहा, “भाजपा ने जितना मुझे सताया है उतना किसी को नहीं सताया है। BJP भले मुझे बदनाम करे, लेकिन मैं धरती का सबसे अच्छा इन्सान हूँ।” आजम खान ने DM पर भी गंभीर आरोप लगाए, उन्होंने कहा कि DM रामपुर ने कल अधिकारियों के साथ मीटिंग की है, और कहा है कि किसी भी तरह आजम खान को चुनाव हरवाना है।

आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में चुनाव आयोग ने बड़ा कदम उठाते हुए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के चुनाव प्रचार करने पर 72 घंटे के लिए प्रतिबंध लगा दिया था। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी जयाप्रदा के लिए आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, जिसके बाद चुनाव आयोग ने कड़ा एक्शन लिया। साथ ही, महिला आयोग ने भी इस बात का संज्ञान लिया है।

प्रतीकों का रसूलीकरण: अगर इशरत जहां की जाँच हुई, तो साध्वी प्रज्ञा के आरोपों की जांच में दिक्कत क्या है?

रसूलीकरण वो प्रक्रिया है जिसके ज़रिये ‘परगति-शील’ गिरोह किसी एक व्यक्ति को सवालों से परे बना देते हैं। मनुष्यों में मानवीय भूलों और कमियों की संभावनाएँ हमेशा होंगी, लेकिन रसूलीकरण की प्रक्रिया, उनकी भूलों, गलतियों, कमियों पर बात करने से रोक देती है। अंग्रेजी में अक्सर इस्तेमाल होने वाली कहावत ‘सीजर्स वाइफ’ का ये अच्छा उदाहरण है। आमतौर पर जहाँ हिन्दुओं में सवाल पूछने और प्रश्न उठाने की छूट हर व्यक्ति को होती है, वहीं आयातित विचारधाराओं में ये खो जाती है। आम हिन्दुओं के लिए जनसाधारण में से किसी धोबी का मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम पर सवाल उठाना आश्चर्य का विषय नहीं होता। दूसरे लोग गुस्ताख के लिए ‘सर-तन जुदा! सर-तन जुदा!’ के नारे लगाते सड़कों पर उतर आते हैं।

याद दिला देने पर शायद इस बात पर भी ध्यान जाएगा कि Blasphemy (ब्लासफेमी) या फिर कुफ्र जैसे शब्द जहाँ दूसरी भाषाओं में होते हैं, वहीं इनके लिए हिंदी या संस्कृत में कोई समानार्थक शब्द ढूंढना नामुमकिन हो जाएगा। ऐसे किसी भाव को एक कम पढ़े-लिखे ग्रामीण हिन्दू को समझा पाना भी मुश्किल होगा। वो सामने तो आपकी बात सभ्यतावश सुन ले, लेकिन मन ही मन उसे फिर से राम और धोबी की कहानी बचपन से याद है। तथाकथित प्रगतिशील गिरोहों के लिए एक तेजपाल वाली घटना आसानी से याद आ जाती है। उनमें से कुछ मानते हैं कि तेजपाल से ‘गलती’ हो गयी। ऐसा तब है जब उन्हें खुद एक ‘गलती’ और ‘अपराध’ शब्द में अंतर साफ़-साफ पता है।

यही वजह है कि उनका पोस्टर बॉय तेजपाल एक अपराध करता है लेकिन उसका गिरोह अड़ा रहता है कि उसके पत्रकारिता में योगदान को देखते हुए उसके ‘अपराध’ क्षमा कर दिए जाएँ! यहाँ तक कि वो इसके लिए कैमरे पर आये दृश्यों को अनदेखा करने से भी नहीं चूकते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि भारतीय कानूनों का ‘अपराध सिद्ध होने तक निर्दोष’ का सिद्धांत बलात्कार के मुकदमों में नहीं चलता। ऐसे मुकदमों में खुद को निर्दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी आरोपी पर होती है। पुलिस उसका अपराध सिद्ध करने के लिए बाध्य नहीं है मतलब आरोपी ‘कुछ और सिद्ध होने तक अपराधी’ है। वो भारतीय कानूनों कि ओर से आँख बंद करके, बलात्कार के आरोपी को अपराधी भी नहीं मानते।

ऐसे में दास्तानगोई से मशहूर हुए महमूद फारूकी का नाम भी याद आता है जिसे हाल ही में एक विदेशी युवती से बलात्कार का दोषी पाया गया था। उनके इंटरव्यू प्राइम टाइम पर दिखाते समय या किन्हीं आयोजनों में जनता को संबोधित करते समय ऐसे लोगों को बुलाने में कब ये गिरोह शर्माए हैं? इन्हें याद कर लेने के बाद मेजर गोगोई को भी याद कीजिये। अपनी टीम को कश्मीरियत यानी पत्थरबाजी से बचाने के लिए एक अनूठे उपाय का इस्तेमाल करते वो हाल ही में दिखे थे। उनके एक नए तरीके के इस्तेमाल के लिए जहाँ तारीफें मिली, वहीं थोड़े दिन बाद एक दूसरे मामले में अनुशासन तोड़ने के लिए उन्हें सजा भी हुई। उन्हें जबरदस्ती सजा से बचाने की कोई कोशिश नहीं हुई।

इस रसूलीकरण से मनुष्यों को सवालों से परे कर देने से किसी व्यक्ति को राष्ट्र के कानून से ऊपर उठा देने की सुविधा मिल जाती है। एक बार फिर इसका नमूना देखना हो तो हाल के #मी_टू अभियानों के बारे में सोचिये। कई मीडिया मुगलों के नाम ऐसी शर्मनाक हरकतों के लिए बरसों बाद कैसे सामने आए? तथाकथित खोजी पत्रकारिता तो भारत में भी होती ही है न? फिर ऐसा कैसे हो पाया कि दर्जन भर खोजी पत्रकार जिस दफ्तर में बैठे हों, वहीं कोई ऐसा अपराध करे और किसी को दस-बीस साल तक ऐसा होता दिखे भी नहीं? सम्पादकीय पदों पर बैठे व्यक्ति का रसूलिकरण करके इन लोगों ने मान लिया था कि ये कोई अपराध कर ही नहीं सकता। तभी ऐसा हुआ होगा कि उनका अपराध, कुकृत्य लगा ही नहीं?

बाटला हाउस एनकाउंटर में सीने पर गोली खाकर वीरगति को प्राप्त हुए एक पुलिसकर्मी पर सवाल उठाने में पिद्दी दिग्गी को कब शर्म आई थी? कौन सी माफ़ी मांगी है उसने अपनी नीचता की? पीठ पर गोली लगने की वजह से जेहादियों के हाथ मारे गए करकरे को सवालों से परे क्यों होना चाहिए? अगर इशरत जहां के आतंकियों के साथ मारे जाने पर भी जाँच आयोग बिठाए जाते हैं, तो साध्वी प्रज्ञा के आरोपों की जांच में दिक्कत क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आम हिन्दुओं के लिए मानवाधिकार होते ही नहीं? मी टू की शिकायत कोई और करे, कोई हिन्दू सन्यासिन नहीं, तभी वो शिकायत है क्या?

PM मोदी के परिजनों की तुलना आवारा पशुओं से करना कॉन्ग्रेस की जर्जर मानसिकता का प्रमाण

लोकसभा चुनाव 2019 किसी जंग के मैदान से कम नहीं। इस जंग में आए दिन ज़ुबान का बेलगाम होना मानो जैसे आम बात बन गई है। क्या बोलना है, कितना बोलना है, किसको बोलना है- इन सबका गिरता स्तर अब गर्त में जा चुका है। अपनी भड़ास निकालने के लिए प्रधानमंत्री और उस पद की गरिमा की धज्जियाँ उड़ाने में कॉन्ग्रेस ने अब कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी।

कभी मोदी की माँ और पत्नी पर भद्दी टीका-टिप्पणियाँ की जाती हैं तो कभी ‘चौकीदार चोर है’ के जुमले से उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाया जाता है। कोई उनके ‘चमकते चेहरे’ का राज़ बताता फिरता है, तो कोई उन्हें ‘सांप, बिच्छू और नीच’ तक कह डालता है। कोई उनके ‘काले से गोरे रंग’ के बारे में उल-जलूल बातें बनाता है तो कोई उन पर ‘निजी हमलों की बौछार’ करते नहीं थकता।

बड़ा ही गंभीर प्रश्न है कि आख़िर यह कैसा लोकतंत्र है, जहाँ आए दिन हमलों का शिकार केवल देश का प्रधानमंत्री ही होता रहता है?

ताज़ा मामला कॉन्ग्रेस नेता विनय कुमार का है, जिन्होंने पीएम मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत हमला किया है। इस हमले में विनय कुमार ने उनके (पीएम मोदी और सीएम योगी) परिवार के सदस्यों की तुलना आवारा घूमते जानवरों से कर डाली। यह घटना उनके संसदीय क्षेत्र कैसरगंज का है जहाँ से वो चुनाव लड़ेंगे।

मीडियाकर्मियों से बातचीत के दौरान कॉन्ग्रेसी नेता विनय कुमार ने कहा कि जब लोग कार में बैठकर बाहर इन आवारा जानवरों को देखते होंगे तो कहते होंगे, ‘देखो, मोदी और योगी की चाची वहाँ बैठी हैं, कुछ कहते होंगे कि उनकी बहन बैठी है, कुछ कहते होंगे कि उनके पिता बैठे हैं और कुछ कहते होंगे कि उनकी माँ वहाँ लेटी हैं’।

अभी कुछ महीने पहले की ही बात है, कॉन्ग्रेसी नेता विलासराव मुत्तेमवार ने पीएम मोदी के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा था कि ‘उनके पिता कौन हैं, ये कोई नहीं जानता’। इससे पहले अभिनेता से नेता बने राज बब्बर ने रुपए के गिरते स्तर की तुलना पीएम मोदी की माँ की उम्र से की थी। और तो और शशि थरूर ने तो पीएम मोदी को यहाँ तक कह डाला था कि, ‘उन्हें चप्पल नहीं मारी जा सकती क्योंकि वो शिवलिंग पर लिपटे बिच्छू की तरह हैं’।

इस तरह के घटिया निजी हमले आज से पहले कभी किसी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ नहीं किए गए, फिर आज मोदी के लिए इतनी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करना कितना जायज़ है और क्यों?

ऐसी ही घटिया टिप्पणी कर्नाटक के कॉन्ग्रेसी नेता बी नारायण राव ने पीएम मोदी को ‘नामर्द’ कहकर की थी। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेरा ने कहा था कि पीएम मोदी का मतलब मसूद, ओसामा, दाऊद, ISI है, जबकि यह पूरी दुनिया जानती है कि आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब देने में पीएम मोदी कितने सक्षम और ताक़तवर हैं। इसका अंदाज़ा तो बीते दिनों हुई एयर स्ट्राइक से ही लगाया जा सकता है।

वैश्विक स्तर पर आज भारत जो वाहवाही बटोर रहा है और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पुरस्कृत किया जा रहा है, उसका श्रेय देश के प्रधानमंत्री को न दिया जाए तो क्या ओछी और अभद्र भाषणबाज़ी करने वाले इन चाटुकारों को दिया जाए?

ऐसा प्रतीत होता है कॉन्ग्रेस और मोदी-विरोधी दल अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाने में पूरी तरह से असफल होते जा रहे हैं। ऐसे में उन्हें ख़ुद ही नहीं मालूम होता कि वो कब क्या कह दें। अपने बिगड़ते और कुंठित मानसिक संतुलन के चलते वो बयानबाज़ी करते समय असल मुद्दों की बात करना तो पूरी तरह से भूल ही जाते हैं लेकिन अपनी वास्तविक पहचान का खुला प्रदर्शन कर जाते हैं। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन विरोधियों की निराशा और हताशा अपनी सीमाओं को लाँघ चुकी है और अपनी किंकर्तव्यविमूढ़ परिस्थित से उबरने के लिए ग़लत बयानबाज़ियों और अमर्यादित टीका-टिप्पणियों के दलदल में लगातार धँसती ही जा रही है।

अब देखना होगा कि कॉन्ग्रेस और मोदी-विरोधी दल देश की जनता को भरमाने और मोदी ख़िलाफ़ उनकी बयानबाज़ी आख़िर क्या रंग लाती है। मेरा मानना है कि जनता मोदी-विरोधियों को इनकी टीका-टिप्पणियों के लिए सज़ा ज़रूर देगी, जिसके बाद ही शायद इनके बिगड़े मानसिक संतुलन का इलाज संभव हो पाएगा।

400 साहित्यकार नरेंद्र मोदी के समर्थन में, कहा अपना बहुमूल्य वोट भाजपा को दें

लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र बीते दिनों 200 से अधिक लेखकों ने मोदी सरकार के ख़िलाफ़ वोट करने की अपील जनता से की थी। अब इसके उलट करीब 400 से अधिक साहित्यकारों ने आगे आकर देशवासियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में वोट करने की गुहार लगाई है।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर के अनुसार भारतीय साहित्यकार संगठन ने जनता से की अपील में कहा है कि मतदाता अपना वोट को देश की अखंडता, सुरक्षा, स्वाभिमान और विकास को बनाए रखने के लिए दें।

साहित्यकारों का कहना है, “भारतीय लोकतंत्र में संविधान का महत्व सर्वोपरि है। अतः हम साहित्यकार देशवासियों से अपील करते हैं कि आप अपना बहुमूल्य वोट देश की अखंडता, सुरक्षा, स्वाभिमान, संप्रभुता, सांप्रदायिक सद्भाव, सर्वांगीण विकास आदि को बनाए रखने के लिए दें।”

गौरतलब है इससे पहले इंडियन राइटर्स फोरम की ओर से करीब 200 लेखक घृणा की राजनीति के नाम पर जनता से मोदी सरकार को वोट न देने की अपील कर चुके हैं। इस अपील को अंग्रेजी, हिंदी, मराठी, गुजराती, उर्दू, बंग्ला, मलयालम, तमिल, कन्नड़, और तेलगु भाषाओं में निकाला गया था।

इस अपील में कहा गया था कि ‘हेट पॉलिटिक्स’ को वोट आउट कर दिया जाए और राष्ट्रीय एकता के लिए वोट किया जाए। हालाँकि इसमें ये कहीं भी स्पष्ट नहीं किया गया कि ‘राष्ट्रीय एकता’ को वोट करने से उनका अभिप्राय किस पार्टी को वोट देने से है लेकिन हेट पॉलिटिक्स पर इस अपील में खुलकर बात हुई थी।

वहीं हाल ही में 400 साहित्यकारों की ओर से की गई अपील में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया में देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध और अंतिम जन तक विकास की नई धारा प्रवाहित करने वाला नेता बताया गया है।

कॉन्ग्रेस के 90 में से 40 उम्मीदवारों ने की अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा, 27 पर हैं गंभीर आरोप

राजनीति में बुरा विकल्प और बुरे में अच्छा विकल्प जैसी चर्चा नई बात नहीं हैं। हर दिन हमें देखने को मिलता है की राजनीतिक दलों के नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते नजर आते हैं। अगर नामांकन से प्राप्त इन आंकड़ों को देखें तो छवि को बनाने और धूमिल करने के इस खेल में देश की सबसे पुरानी पार्टी, कॉन्ग्रेस सबसे आगे चल रही है। हालाँकि, भाजपा जैसे दल भी इस मामले में पीछे नहीं हैं।

इस लोकसभा चुनाव में कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट नहीं दिया है। कॉन्ग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल बड़ी संख्या में आपराधिक छवि वाले लोगों को अपना उम्मीदवार बना रहे हैं। यह मजबूरी ही हो सकती है कि राजनीतिक दलों को ऐसे उम्मीदवारों को भी अपना चेहरा बनाकर संसद भेजना होता है। हालाँकि, संविधान किसी ना किसी तरह से इन्हें ऐसा करने की मान्यता देता है। आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट देने में सियासी रूप से मजबूत पकड़ रखने वाले प्रमुख क्षेत्रीय दल भी पीछे नहीं हैं।

संख्या के हिसाब से लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में कॉन्ग्रेस के कुल 90 उम्मीदवारों में से 40 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है। यह कुल उम्मीदवारों का 44% है।

इसी क्रम में, भाजपा के कुल 97 उम्मीदवारों में 38 ने चुनाव आयोग को दिए अपने हलफनामों में अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। तीसरे चरण में इन दोनों प्रमुख दलों के साथ ही बहुजन समाज पार्टी के भी 11 उम्मीदवार ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं CPIM के 7 उम्मीदवारों पर भी आपराधिक मामले दर्ज हैं।

SP ने 5 और ममता दीदी की तृणमूल कॉन्ग्रेस ने 4 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपना उम्मीदवार बनाया है। बता दें कि इनमें कुछ ऐसे भी उम्मीदवार हैं जिन पर हत्या, रेप और हत्या के प्रयास और ऐसे ही अन्य मामले हैं। इन मामलों में पाँच साल या इससे अधिक की सजा हो सकती है।

कॉन्ग्रेस में सर्वाधिक हैं गंभीर आपराधिक मामले वाले प्रत्याशी

कॉन्ग्रेस पार्टी में गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद टिकट पाने वाले उम्मीदवारों की संख्या भाजपा से एक अधिक होकर 27 है। भाजपा ने तीसरे चरण के लोकसभा चुनाव के लिए कुल 97 में ऐसे 26 उम्मीदवारों को टिकट दिया है जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं BSP के 92 में से 2 उम्मीदवारों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

शिवसेना की तरफ से घोषित 22 उम्मीदवारों में 2 दो उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। CPM ने 6, NCP ने 5, SP ने 4 और TMC ने 4 ऐसे लोगों को टिकट दिया है, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

केजरीवाल के अपमान में ट्विंकल का लड़का मैदान में, ट्विटर पर उड़ा मजाक

जनाब केजरीवाल कॉन्ग्रेस से साँठगाँठ करने के जुगाड़ में लगे हैं, पर मामला जम नहीं रहा है। जिसे लेकर सोशल मीडिया पर पहले भी उनका मखौल उड़ाया जा चुका है। काफी दिनों तक मीडिया में छाया रहा कि ‘उन्होंने तो लगभग मना कर दिया है जी।’ माहौल थोड़ा शांत हुआ ही था कि अब फिर से ट्विटर पर माहौल खुशनुमा हो चुका है।

सुपरस्टार राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की बेटी और बॉलीवुड के ‘खिलाड़ी’ अक्षय कुमार की पत्नी एक्ट्रेस ट्विंकल खन्ना का एक ट्वीट सुर्खियों में है।

शुक्रवार को ट्विंकल खन्ना द्वारा किया गया एक ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। दरअसल, ट्विंकल ने अपने इस ट्वीट के जरिए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का मजाक उड़ाया है। उन्होंने एक तस्वीर शेयर की, जिसमें एक बच्चे ने अपने सिर पर अंडरवियर पहना हुआ है। इस फोटो को शेयर करते हुए ट्विंकल ने लिखा, ‘जब आप अरविंद केजरीवाल के सपोर्टर हैं, लेकिन आपके पास मंकी कैप नहीं है, मैं कसम खाती हूँ मैंने इसे ऐसा करने के लिए नहीं कहा।’

ट्विंकल के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर बच्चे की तस्वीर वायरल होने लगी है। वायरल होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि जहाँ जनता अभी केजरीवाल के अपनी कही हर बात से पलटाउ नज़ारे देख रही है, वहीं केजरी और ट्विंकल खन्ना दोनों की फैंस फॉलोइंग सोशल मीडिया पर जबरदस्त है।

एक तरफ हाल ही में #MeToo अभियान में तनुश्री दत्ता के पक्ष में बोलने वालों में सबसे आगे रहने पर ट्विंकल ने तारीफें बटोरी थीं, तो वहीं अपनी तीन किताबों से वह एक एक्टेस के साथ अब राइटर के तौर पर भी पहचानी जाती हैं। उनका जिंदगी जीने का अंदाज ही कुछ ऐसा है जो लोगों को उनकी हर बात जानने के लिए उकसाता है। वहीं जनाब केजरीवाल के क्या कहने अगर कुमार विश्वास उनके मजे न ले रहे हो तो वे ऐसा कुछ ज़रूर करते हैं जिससे जनता उनके मजे लेने लगती है।

हिन्दुओं की सबसे बड़ी समस्या: वामपंथियों, कॉन्ग्रेसियों के गुनाहों की माफ़ी माँगते रहना

चाहे साध्वी प्रज्ञा का हालिया बयान और उनका पीछे हटना हो, या फिर भाजपा को कम्यूनल कहना, हिन्दुओं को असहिष्णु कह कर देश और दुनिया में छवि खराब हुई, और इन सबको डिफ़ेंड करने में ही भाजपा की सारी ऊर्जा चली गई।

भाजपा के सर पर सम्प्रदायवाद मढ़ दिया जाता है, लेकिन याद कीजिए कि कॉन्ग्रेस के दंगाई इतिहास और वामपंथियों के आतंक के शिकार लोगों के लिए, उनके और तृणमूल के पोलिटिकल किलिंग्स पर कितनी बार माफ़ी माँगी गई? किसी ने कह दिया कि भाजपा कम्यूनल है, तो वो हो गई क्या? सिद्धू ने अपने बयान के लिए माफ़ी माँगी? मणिशंकर अय्यर ने? आज़म खान ने? राहुल गाँधी ने?

रद्द हो सकता है राहुल गाँधी का अमेठी से नामांकन-पत्र, ग़लत दस्तावेज़ जमा करने का लगा आरोप

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का विवादों से पुराना नाता है। फ़िलहाल, राजनीतिक गलियारे से एक ऐसी ख़बर सामने आई है, जिससे उनके अमेठी से नामांकन रद्द होने तक की नौबत आ सकती है। राहुल गाँधी के वकील राहुल कौशिक ने रिटर्निंग अधिकारी से समय माँगा है। इस मामले पर अब 22 अप्रैल को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पक्ष रखेंगे।

दरअसल, अमेठी में राहुल गाँधी द्वारा दाखिल किए गए नामांकन पत्र को लेकर आपत्ति दर्ज की गई है। दस्तावेज़ों में राहुल की नागरिकता और डिग्री पर सवाल खड़े किए गए हैं। इन दस्तावेज़ों में राहुल गाँधी का नाम राउल विंची लिखा पाया गया है। इसके अलावा उनके पास ब्रिटिश नागरिकता है।

आपत्ति दर्ज कराने वाले में निर्दलीय प्रत्याशी ध्रुव कौशल ने राहुल के नामांकन को रद्द करने की माँग की थी। इसमें दावा किया गया था कि राहुल ने ग़लत दस्तावेज़ जमा करके निर्वाचन अधिकारी को गुमराह करने का काम किया है।

इसके अलावा राहुल गाँधी पर यह आरोप भी है कि दस्तावेज़ों में उन्होंने अपनी इंग्लैंड की कंपनी का उल्लेख नहीं किया। साथ ही उन्होंने एफिडेविट्स में जिन कॉलेजों से पढ़ाई करने का दावा किया, उसकी वास्तविकता यह है कि उन्होंने वहाँ से पढ़ाई की ही नहीं। इस सभी दस्तावेज़ों को ग़लत साबित करने वाले वकील ने निर्वाचन अधिकारी को सभी असली दस्तावेज़ उपलब्ध कराए।

इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने राहुल गाँधी की जमकर खिल्ली उड़ाई। ग़लत दस्तावेज़ों पर चुटकी लेते हुए एक यूज़र ने लिखा कि फँस गया पप्पू…अब होगा असली दंगल।

एक अन्य यूज़र ने लिखा कि जानबूझकर ग़लत फ़ार्म भरा होगा जिससे हार टाल सके और Victim Play करने को मिल जाए।

ट्विटर पर एक यूज़र ने सलाह देते हुए लिखा कि राहुल गाँधीजी, आपके लिए अमेठी से हटना बेहतर है, आपकी हार सुनिश्चित है!