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मनमोहन सिंह जो अपने समुदाय के लिए नहीं कर सके वह नरेंद्र मोदी ने करने का वादा किया है

भारतीय जनता पार्टी ने कुछ दिन पहले जारी किए अपने चुनावी ‘संकल्प पत्र’ में अनुच्छेद 370 के अतिरिक्त अनुच्छेद 35-A को भी हटाने की बात कही है। चुनाव आने पर लोक लुभावनी घोषणाएँ करना, जनता को वचन देना और बाद में मुकर जाना यह हर पार्टी करती है इसमें कोई दो राय नहीं, और भाजपा कोई अपवाद नहीं। उदाहरण के लिए राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के मुद्दे को ही लिया जाए तो हर बार भाजपा अपना संकल्प दोहराती है कि सत्ता में आने पर 370 हटाएंगे और राम मंदिर बनाएंगे। लेकिन आज तक जम्मू कश्मीर राज्य के लिए संविधान में अनुच्छेद 370 यथावत है और भगवान राम अयोध्या में टेंट में विराजमान हैं।

बहरहाल, 2019 के लोकसभा निर्वाचन में कुछ अलग हुआ है। भारत के इतिहास में पहली बार किसी पार्टी के घोषणापत्र में अनुच्छेद 35-A को समाप्त करने की बात कही गई है। साथ में यह भी कहा गया कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो पश्चिमी पाकिस्तान, छम्ब और पाक-अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर से आए शरणार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। अनुच्छेद 35-A और उपरोक्त शरणार्थियों के बीच सीधा संबंध है जिस पर आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी।

वास्तव में अनुच्छेद 35-A के कारण ही जम्मू कश्मीर राज्य में शरणार्थियों की समस्याएँ उत्पन्न हुईं जिन्हें हल करने का प्रयास करना तो दूर उनकी बात तक कोई नहीं करता। ऐसे में भाजपा द्वारा इस मुद्दे को अपने संकल्प पत्र में स्थान देना अन्य राजनैतिक पार्टियों के लिए एक नई चुनौती खड़ा करने जैसा है। ध्यान से देखें तो भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में तीन प्रकार के शरणार्थियों का उल्लेख किया है।

इनमें एक वे हैं जो 1947 में विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से आए थे, दूसरे जो उसी समय पाक-अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर से आए थे और तीसरे वे हैं जो 1965 और 1971 युद्ध के पश्चात कारण छम्ब से विस्थापित हुए थे। इनमें सर्वाधिक संख्या पाक अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर या ‘PoJK’ से आए शरणार्थियों की है। वाधवा कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान से आए 5,764 परिवारों (कुल 47,215 लोग) ने जम्मू में शरण ली थी। उसी समय PoJK से विस्थापित हुए 31,619 परिवारों ने शरण ली थी। सन 1965 और 1971 के युद्ध के कारण छम्ब से लगभग 17000 परिवार विस्थापित हुए थे।

वैसे तो 35-A के कारण इन तीनों प्रकार के शरणार्थियों को जम्मू कश्मीर राज्य की सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता। लेकिन विडंबना यह भी है कि भारत द्वारा इन सभी शरणार्थियों को अपना नागरिक मानने के बावजूद जम्मू कश्मीर राज्य में बसने के बाद इन्हें समान रूप से राहत नहीं दी गई। छम्ब और PoJK से विस्थापित हुए लोगों को समय-समय पर मुआवजा और कई कनाल (जम्मू कश्मीर में भूमि क्षेत्रफल मापने की इकाई) कृषि और ग़ैर-कृषि भूमि दी गई। लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू कठुआ और राजौरी में बसे शरणार्थियों को कुछ नहीं मिला। उन्हें अस्थाई तौर पर रहने के लिए जो भूमि मिली थी उसी पर आज भी रह रहे हैं।

पश्चिमी पाकिस्तान से जम्मू कश्मीर में आए शरणार्थी (West Pakistani Refugees)

सन 1947 में जब देश को स्वतंत्रता की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। यह कीमत थी विभाजन से उपजी एक ऐसी त्रासदी जिसमें लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। वह भयानक दंगों, मारकाट और विप्लव का कालखंड था। पश्चिमी भारत में वस्तुतः पंजाब का विभाजन हुआ था। पंजाब के 16 ज़िले, जिनमें 55% जनसंख्या रहती थी और जो पूरे पंजाब का 62% क्षेत्रफल था, उसे पाकिस्तान को सौंप दिया गया था और भारत के हिस्से में पंजाब के 13 ज़िले आए थे जिनमें 45% जनसंख्या थी।

रैडक्लिफ रेखा का निर्णय होते ही अधिक से अधिक संख्या में हिन्दुओं और सिखों का पलायन नवनिर्मित पाकिस्तान से भारत की ओर होने लगा। जिसको जो साधन उपलब्ध हुआ उसी से चलकर वह भारत की तरफ भागा। लाल कृष्ण आडवाणी और भूतपूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भी अपने परिजनों समेत पश्चिमी पाकिस्तान से भाग कर भारत आए थे।

पलायन और अराजकता के उस दौर में किसी को कुछ समझ में नहीं आता था कि कहाँ जाएँ क्या करें। हमारे नेताओं को भी इतने बड़े स्तर पर पलायन की आशा नहीं थी। उन भयावह परिस्थितियों में पश्चिमी पाकिस्तान स्थित सियालकोट से भारत में प्रवेश करने वाले लोगों के लिए अमृतसर या गुरदासपुर से ज्यादा निकट जम्मू था। इसलिए उन्होंने जम्मू में शरण लेना उचित समझा। कुछ लोगों को यह भी लगा कि जम्मू कश्मीर राज्य के राजा हिन्दू हैं इसलिए वहाँ शरण लेना ठीक होगा। कुछ लोगों के सगे संबंधी जम्मू में रहते थे इसलिए वे वहाँ चले गए।

जम्मू कश्मीर में शरण लेने वालों में से कुछ तो आगे बढ़ गए और दिल्ली पंजाब आदि में चले गए लेकिन विस्थापितों की अधिकांश जनसंख्या को शेख अब्दुल्ला ने रोक लिया और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि उन्हें राज्य में सब कुछ दिया जाएगा। सब कुछ देने के नाम पर पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को 1954 में अनुच्छेद 35-A का संवैधानिक छल उपहार स्वरूप दिया गया।

अनुच्छेद 35-A जम्मू-कश्मीर राज्य को यह निर्णय लेने का अधिकार देता है कि राज्य के स्थाई निवासी कौन होंगे। अर्थात यह राज्य तय करेगा कि स्थाई निवास प्रमाण पत्र किसको देना है और किसे नहीं। जम्मू-कश्मीर राज्य को जब यह अधिकार दिया गया तब तक राज्य का संविधान भी नहीं बना था। बाद में राज्य का संविधान बनते ही उसमें यह लिख दिया गया कि जम्मू-कश्मीर के स्थाई निवासी का दर्ज़ा उन्हें ही दिया जाएगा जो 1944 या उसके पहले से राज्य में रह रहे हैं।  

लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थी तो 1947 में अपनी जान बचाकर आए थे इसलिए आजतक उन्हें जम्मू-कश्मीर का स्थाई निवासी नहीं माना गया और उन्हें स्थाई निवास प्रमाण पत्र- जिसे PRC कहा जाता है- नहीं दिया गया। स्थाई निवास प्रमाण पत्र न होने से वे शरणार्थी जम्मू कश्मीर राज्य में भूमि नहीं खरीद सकते, उनके बच्चे कक्षा 9 से आगे पढ़ाई नहीं कर सकते, वे लोकसभा के लिए तो वोट कर सकते हैं लेकिन विधानसभा के लिए मतदान नहीं कर सकते।

दूसरे शब्दों में वे भारत के नागरिक तो हैं लेकिन उन्हें जम्मू कश्मीर राज्य द्वारा प्रदान किए जाने वाली किसी भी सुविधा का लाभ नहीं मिलता। एक अनुमान के मुताबिक पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों की संख्या आज बढ़कर सवा से डेढ़ लाख के करीब हो गई है लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों में 80% अनुसूचित जाति, 10% अन्य पिछड़ा वर्ग और मात्र 10% सामान्य वर्ग के लोग हैं। यह राज्य सभा में प्रस्तुत की गई जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी की रिपोर्ट में दर्ज़ है। डॉ मनमोहन सिंह जो स्वयं पश्चिमी पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आये थे और दस वर्षों तक देश के प्रधानमंत्री रहे उन्होंने पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों की समस्याओं पर कभी कुछ नहीं बोला न उन्हें सुलझाने का कभी प्रयास किया।   

हिंदू लड़कियों का अपहरण और धर्मांतरण मामले में इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें पतियों के पास वापस भेजा

पाकिस्तान के सिंध में घोटकी से दो हिंदू लड़कियों, रीना और रवीना, जिनका कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया, फिर उन्हें जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया। इतना ही नहीं जबरन उनकी शादी उनकी उम्र से बड़े मुस्लिमों से करा दी गई। इस मामले में इस्लामाबाद हाईकोर्ट में दोनों बहनों को अपने मुस्लिम पतियों सफ़दर अली और बरक़त अली के साथ रहने का आदेश दिया है।

ख़बर के अनुसार, अपनी एक अर्जी में दोनों बहनों ने यह दावा किया था कि वे घोटकी (सिंध) के एक हिंदू परिवार से ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने इस्लामिक उपदेशों से प्रभावित होकर अपना धर्म बदला था।

इस्लामाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अथर मिनल्लाह की अगुवाई वाली एक उच्च न्यायालय की पीठ ने पाँच सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट पेश करने के बाद यह निर्णय लिया, जिसमें यह जाँच करने का काम सौंपा गया था कि क्या हिंदू बहनों का इस्लाम में धर्मांतरण मजबूर किया गया था। उच्च न्यायालय ने पहले भी आदेश दिया था कि सुनवाई पूरी होने तक दोनों बहनों को इस्लामाबाद के एक आश्रय गृह में स्थानांतरित कर दिया जाए।

आयोग ने अदालत को सूचित किया कि कथित चिकित्सा परीक्षणों से यह साबित हो गया था कि दोनों लड़कियाँ नाबालिग नहीं थी क्योंकि उनमें से एक 18 और दूसरी 19 वर्ष की थीं, इसलिए उन्हें नाबालिग नहीं कहा जा सकता।

दरअसल, 20 मार्च को, होली की पूर्व संध्या पर दो नाबालिग हिंदू लड़कियों, 13 वर्षीय रवीना और 15 वर्षीय रीना का अपहरण करके उन्हें पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अपने उम्र से बहुत बड़े मुस्लिम पुरुषों से जबरन शादी करने के लिए मजबूर किया गया। हिन्दू किशोरियों पर हुए इस अत्याचार ने पूरे विश्व में लोगों को पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

इस घटना के कुछ दिनों के भीतर ही मेघवार समुदाय की एक अन्य हिंदू नाबालिग लड़की को भी पाकिस्तान के सिंध प्रांत में बाडिन ज़िले के टांडो बाघो से कथित तौर पर अगवा कर लिया गया था।

इस घटना को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग से रिपोर्ट माँगी। पाकिस्तान के सिंध में होली की शाम हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को लेकर गंभीर सुषमा स्वराज ने ट्वीट करते हुए भारतीय उच्चायोग को टैग किया और इस सम्बन्ध में एक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। इसके बाद इस मामले में 7 लोगों की गिरफ़्तारी भी हुई।

इस मामले में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के हिन्दू सांसद रमेश कुमार वंकवानी ने कहा था कि जबरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ तैयार किए गए विधेयक को प्राथमिकता के आधार पर असेंबली में पेश एवं पारित कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “धर्म के नाम पर नफ़रत की शिक्षा देने वाले सभी लोगों से प्रतिबंधित धार्मिक संगठनों की तरह निपटा जाना चाहिए।

मजहब विशेष के वोटर्स को भड़काने के लिए कुरान के नाम पर फैलाई जा रही है अफवाह

“और तुम सब के सब (मिलकर) ख़ुदा की रस्सी मज़बूती से थामे रहो और आपस में (एक दूसरे) के फूट न डालो और अपने हाल (ज़ार) पर ख़ुदा के एहसान को तो याद करो जब तुम आपस में (एक दूसरे के) दुश्मन थे तो ख़ुदा ने तुम्हारे दिलों में (एक दूसरे की) उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसके फ़ज़ल से आपस में भाई भाई हो गए और तुम गोया सुलगती हुई आग की भट्टी (दोज़ख) के लब पर (खडे) थे गिरना ही चाहते थे कि ख़ुदा ने तुमको उससे बचा लिया तो ख़ुदा अपने एहकाम यूं वाजेए करके बयान करता है ताकि तुम राहे रास्त पर आ जाओ [कुरान३:१०३]

कुरान से ली गई ये पंक्तियाँ और लोकतंत्र का उपहास उड़ाती एक वेबसाइट अचानक लोकसभा चुनाव  से पहले चर्चा का विषय बन गई है। खुदा की अपील पढ़ने को मिल रही है इंडियन मुस्लिम वोटर (indianmuslimvoter) नाम की वेबसाइट पर। इस वेबसाइट पर जाने पर दिखता है कि बेहद ‘वैज्ञानिक’ तरीकों से ग्राफ और आँकड़े उठाकर मुस्लिम मतदाताओं के लिए वोटिंग गाइडलाइंस जारी की गई हैं। साथ ही, ‘बेहद आवश्यक’ दिशा निर्देश भी जारी किए गए हैं, इनमें से कुछ निर्देशों में किसी-किसी राज्य में किसी को भी वोट ना देने की अपील भी शामिल है।

ये हर दूसरे आम व्यक्ति, जिसे इंटरनेट इस्तेमाल करना आता है, की विशेषता होती है कि इंटरनेट पर आँकड़ों को देखकर वो इन पर विश्वास करने के लिए पहली ही नजर में तैयार हो जाता है। फिर इस वेबसाइट ने तो आँकड़ों को ‘रंगीन ग्राफ’ के माध्यम से प्रदर्शित करते हुए मुस्लिम और भाजपा के वोटर्स की संख्या को समझाया है, इसलिए इस वेबसाइट पर जाकर, दिए गए ग्राफ्स को ही ‘तथ्य’ न मान पाना किसी के लिए भी चुनौती पूर्ण हो सकता है।

अगर गौर से देखा जाए तो ये आँकड़े पेश करने वाली वेबसाइट भी उसी रोजाना TV पर आकर लोगों से TV ना देखने की अपील करने वाले जर्नलिस्ट की तरह ही लोगों के मनोविज्ञान से खेलने की कोशिश करती देखी जा सकती है, जो मोदी सरकार पर आरोप लगाने और अपने व्यक्तिगत प्रोपेगेंडा को दिशा देने के लिए अलग-अलग वेबसाइट के माध्यम से झूठे आँकड़ों को पेश कर उनके ब्रह्मसत्य होने का दावा करता है।

वेबसाइट का ‘मकसद’

इंडियन मुस्लिम वोटर वेबसाइट ने अपना मकसद स्पष्ट करते हुए लिखा है कि असली मक़सद आपको भारत में मुस्लिम मतदाताओं (वोटर) के बारे में सटीक आँकड़ो के बारे में बताना है। इस वेबसाइट के अनुसार भारत में मुस्लिम मतदाताओं के महत्व को कम करने के लिए भारत सरकार सटीक संख्या छिपाती है। वेबसाइट पर समुदाय विशेष को ‘BJP बनाम इस्लाम’ दिखाने की कोशिश की गई है और राज्यवार किस पार्टी को वोट देना है, ऐसा बताया गया है। इस वेबसाइट का एक और मक़सद है कि मुस्लिम मतदाताओं को एक साथ जोड़ सके।

तिरंगा और संसद की तस्वीरों से सजी है इस्लाम बनाम भाजपा वोटर्स वाली ये वेबसाइट

संसद और तिरंगे झंडे से सजी हुई इस वेबसाइट के होमपेज पर पहला सन्देश पढ़ने को मिलता है, “क्या आप जानते हैं कि मुस्लिम मतदाता 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भाजपा के मतदाताओं से अधिक हैं?” ये वेबसाइट किस तरह से लोगों को भ्रमित करने के लिए समर्पित है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पर विशेष टैब बनी है जिसका शीर्षक है, “मुस्लिम किसे वोट डालें।” इस वेबसाइट को मार्च 23, 2019 को ही रजिस्टर किया गया है, यानी आम चुनाव से ठीक पहले। इस बात से ही स्पष्ट होता है कि यह किसी प्रोपेगैंडा का ही हिस्सा हो सकता है।

सेंसस और मतदान के बारे में वेबसाइट के सभी आँकड़े गलत हैं

इसके बाद रंगीन ग्राफ के माध्यम से बताया गया है कि इस देश में ‘मुस्लिमों’ के कितने वोट हैं और ‘भाजपा’ के कितने वोट हैं। इस वर्गीकरण का आधार 2014 में हुए आम चुनाव के मतदान पैटर्न्स को बताया गया है, जिनकी प्रमाणिकता इसी बात से जानी जा सकती है कि इसके रंगीन ग्राफ में भाजपा वोट की सीधे-सीधे समुदाय विशेष के वोट के साथ तुलना करके क्रमशः 11% और 12% बताया गया है। साथ ही, 39% वोट वो बताए गए हैं, जो वेबसाइट के अनुसार 2019 चुनाव में वोट नहीं दे सकते।

ये पता नहीं चल पा रहा है कि कौन सी आसमानी गणित के द्वारा निकाले गए 39% लोग वोट नहीं दे सकते। इन सभी निष्कर्षों पर पहुँचने के लिए कौन सी रिसर्च मेथोडोलोजी अपनाई गई है, इस बात का कहीं भी कोई ज़िक्र नहीं है। क्या सभी आँकड़ों के अंत में [कुरान ३:१०३] लिख देना मात्र ही इन सभी आँकड़ों को ‘तथ्यों’ में बदल देने के लिए काफी माना जाना चाहिए ?

यदि सरकारी आँकड़ों को देखें तो 2014 में कुल मतदाताओं की संख्या से लेकर प्रत्येक राज्य की वोटर संख्या भी गलत दी गई है। भाजपा को 2014 में पड़ने वाले कुल मत इस वेबसाइट के अनुसार 16.69 करोड़ बताए गए हैं, जबकि वास्तव में 2014 में भाजपा को कुल 17 करोड़ 16 लाख वोट मिले थे। इसी तरह से मुस्लिम आबादी से लेकर भाजपा को मत देने वाले लोगों तक की संख्या के लिए इस वेबसाइट ने किस सेंसस को आधार माना है यह यक्ष-प्रश्न है।

इस वेबसाइट ने दावा किया है कि सेंसस डेटा हाल ही में जारी हुआ है, जबकि वर्ष 1872 में सेंसस (जनगणना) शुरू हुआ था और तब से आज तक यह हर 10 साल में ही होता है। इस प्रकार वर्तमान में 2011 के सेंसस डेटा के आधार पर ही मतदान हो रहे हैं और इसके बाद 2021 का ही डेटा इस्तेमाल किया जाएगा।

साथ ही यह भी चिंता का विषय है कि यह वेबसाइट बड़े स्तर पर यूट्यूब से लेकर हर छोटे-बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपने नफरत, झूठ और सांप्रदायिक विचारों के कर्क रोग को फैला रही है। यूट्यूब पर इस भ्रामक वीडियो को देखने वालों की संख्या बहुत ही कम समय में 2 लाख से ऊपर पहुँच चुकी है।

इस वेबसाइट ने अपने बारे में कोई भी जानकारी देने से मना किया है और लिखा है कि उद्देश्य सिर्फ सत्य को उजागर करना है और वो इसके लिए समर्पित हैं।

आम चुनाव के ठीक पहले कुरान के नाम पर भाजपा बनाम मुस्लिम वोट का दावा करने वाली इस तरह की वेबसाइट का तिरंगे और संसद की तस्वीरों में लिपटकर आना लोकतंत्र का भद्दा मजाक है। इन्हें चलाने वालों को यह जानना चाहिए कि वो ऐसा कर किसी का भी भला नहीं कर रहे हैं, बल्कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर उन्हीं लोगों के अंदर भय पैदा कर हैं, जिनका हितैषी होने का ये लोग दावा करते हैं।

सोनिया की इटली में है लाखों की संपत्ति, रिलायंस में शेयर्स, चुनावी हलफनामे से हुआ खुलासा

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी की इटली में लाखों की संपत्ति है। ऐसा किसी मीडिया रिपोर्ट या विपक्ष के आरोपों में नहीं कहा गया है, खुद सोनिया गाँधी ने ऐसा बताया है। जी हाँ, नामांकन के दौरान चुनावी हलफनामे में सोनिया गाँधी ने इटली की अपनी संपत्ति का जिक्र किया है। इसमें सोनिया ने बताया है की इटली में उनकी 23,20,110 रूपए की संपत्ति है। साथ ही, सोनिया गाँधी की उच्चतम शैक्षणिक योग्यता फॉरेन लैंग्वेज (अंग्रेजी एवं फ्रेंच) में तीन वर्षीय कोर्स है।

सोनिया गाँधी ने हलफनामे में इटली की संपत्ति के बारे में बताया

सोनिया गाँधी द्वारा नामांकन के दौरान प्रस्तुत किए गए हलफनामे में जानकारी दी गई है कि उनके पास 60,000 रुपए कैश में है और 2.4 करोड़ रुपए शेयर्स में हैं। सोनिया गाँधी ने इस हलफनामे में यह भी बताया है कि उनके रिलायंस हाइब्रिड बॉन्ड्स में भी शेयर्स हैं। उन्होंने पोस्टल सेविंग्स में 72 लाख इन्वेस्ट कर रखा है।

सोनिया गाँधी की उच्चतम शिक्षा

नई दिल्ली स्थित डेरामंडी गाँव में सोनिया गाँधी की ज़मीन भी है। इस ज़मीन की क़ीमत 7,29,61,793 है। सोनिया गाँधी ने अपने बेटे राहुल गाँधी को 5 लाख रुपए का लोन भी दे रखा है। 2014 में उन्होंने राहुल गाँधी को 9 लाख रुपए का लोन दे रखा था। इकनोमिक टाइम्स ने ग़लत जानकारी दी है कि सोनिया गाँधी की इटली में साढ़े सात करोड़ की इनहेरिटेड प्रॉपर्टी है। इकनोमिक टाइम्स ने यह भी ग़लत लिखा है कि सोनिया गाँधी ने राहुल से 5 लाख का लोन ले रखा है लेकिन असल में इसका ठीक उल्टा है।

सोनिया गाँधी के पास 4.29 करोड़ की मूवेबल प्रॉपर्टी है। 2014 में ये आँकड़ा 2.81 करोड़ था। उनके ख़िलाफ़ राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा फाइल किया गया एक केस भी है। सोनिया गाँधी के पास कोई कार नहीं है। बता दें कि राहुल गाँधी ने भी अपने चुनावी हलफनामे में बताया था कि उनके पास कोई कार नहीं है। सोनिया गाँधी के पास 1.2 किलो सोना है और 88 किलो चाँदी है। उनके पास कुल 59 लाख की सोना-चाँदी की चीजें हैं।

बता दें कि सोनिया गाँधी ने नामांकन से पहले कलेक्ट्रेट तक रोड शो भी किया। इस दौरान उनके साथ राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी भी उपस्थित रहे। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में राहुल गाँधी के नामांकन में हिस्सा लेने के बाद भुएमऊ स्थित गेस्ट हाउस पहुँची। सोनिया आज गुरुवार को सुबह साढ़े नौ बजे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पहुँची। वहाँ हवन के बाद रोड शो शुरू किया गया। सोनिया का क़ाफ़िला रोड शो के दौरान रास्ता ही भटक गया था, इससे जाम लग गया। ऐन वक्त पर अधिकारियों ने स्थिति को संभाला।

वाजपेयी को भी लगता था वो अजेय हैं, मोदी को भी हराएँगे: सोनिया गाँधी

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने रायबरेली से पाँचवी बार नामांकन दायर करने के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी लगता था कि वो अजेय हैं लेकिन 2004 में हमने उन्हें हरा दिया। सोनिया गाँधी ने कहा कि ठीक उसी तरह नरेंद्र मोदी को भी हरा दिया जाएगा। सोनिया ने दावा किया कि नरेंद्र मोदी अजेय नहीं हैं। उन्होंने पत्रकारों को 2004 आम चुनाव की याद दिलाते हुए कहा कि उस समय वाजपेयी की जीतने की ख़ूब चर्चाएँ थी लेकिन हुआ इसके ठीक उलटा। नामांकन पर निकलने से पहले पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने पार्टी मुख्यालय में हवन-पूजन भी किया।

सोनिया गाँधी ने इससे पहले 2004, 2006, 2009 और 2014 में रायबरेली से जीत दर्ज की थी। 2004 में उन्होंने सपा के उम्मीदवार को क़रीब ढाई लाख मतों से हराया था। 2006 उपचुनाव में उन्होंने सपा के उम्मीदवार को सवा चार लाख से भी अधिक मतों के अंतर से मात दी थी। 2009 में सोनिया गाँधी ने बसपा उम्मीदवार को 2,72,000 से भी अधिक मतों से हराया था। पिछ्ले आम चुनाव में मोदी लहर के बावजूद सोनिया अपना गढ़ बचाने में क़ामयाब रही थीं। सवा पाँच लाख से भी अधिक मत पाकर सोनिया ने 2014 में भाजपा उम्मीदवार को साढ़े तीन लाख मतों के अंतर से हराया था। इससे पहले फ़िरोज़ गाँधी और इंदिरा गाँधी भी रायबरेली से सांसद पहुँच चुके हैं।

सोनिया गाँधी ने नामांकन से पहले कलेक्ट्रेट तक रोड शो भी किया। इस दौरान उनके साथ राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी भी उपस्थित रहे। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को अमेठी में राहुल गाँधी के नामांकन में हिस्सा लेने के बाद भुएमऊ स्थित गेस्ट हाउस पहुँची। सोनिया आज गुरुवार को सुबह साढ़े नौ बजे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय पहुँची। वहाँ हवन के बाद रोड शो शुरू किया गया। इस दौरान राहुल ने भी कहा कि भारतीय इतिहास में ऐसे कई लोग हुए हैं जो ख़ुद को अपराजेय मानते थे लेकिन अंततः उनकी हार हुई।

सोनिया गाँधी अपना नामांकन दाखिल करने के बाद दिवंगत मौलाना अली मियाँ के घर गईं। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एक बैठक में भी हिस्सा लिया। रायबरेली में पाँचवे चरण के तहत 6 मई को मतदान होना है और सोनिया गाँधी का मुक़ाबला भाजपा प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह से है। सपा और बसपा महागठबंधन ने रायबरेली और अमेठी से उम्मीदवार नहीं उतारा है। दिनेश प्रताप भी कॉन्ग्रेस के नेता रहे हैं लेकिन पिछले वर्ष उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था।

अमर उजाला में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, सोनिया का क़ाफ़िला रोड शो के दौरान रास्ता ही भटक गया था, इससे जाम लग गया। ऐन वक्त पर अधिकारियों ने स्थिति को संभाला। राहुल गाँधी ने इस दौरान चौकीदार और चोर वाले नारे को फिर से दोहराया। उन्होंने कहा कि मोदी ने ग़रीबों का रुपया उद्योगपतियों को दे दिया। वहीं अगर रायबरेली सीट की बात करें तो अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों और तीन उपचुनावों में कॉन्ग्रेस ने यहाँ से 16 बार जीत दर्ज की है। 1977 में भारतीय लोकदल और 1996, 1998 में भाजपा ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी। रायबरेली के अंदर 5 विधानसभा सीटें आती है जिनमें कॉन्ग्रेस और भाजपा के पास दो-दो सीटें हैं।

बांग्ला फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाना ममता सरकार को पड़ा भारी, SC ने लगाया ₹20 लाख का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल सरकार पर अनिक दत्त द्वारा निर्देशित सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित फ़िल्म ‘भोबिश्योतिर भूत’ की सार्वजनिक स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने के संबंध में 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया।

ख़बरों के अनुसार, अनिक दत्त द्वारा निर्देशित एक सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित यह फ़िल्म 15 फरवरी को रिलीज़ हुई थी और उसके अगले ही दिन उसे कोलकाता के सभी सिनेमाघरों से हटा दिया गया। जानकारी के अनुसार यह फ़िल्म कथित तौर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर व्यंग्य थी और इसीलिए फ़िल्म को सिनेमाघरों से हटा दिया गया।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने फ़िल्म निर्माता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि उत्पादकों और सिनेमा हॉल के मालिकों को 20 लाख रुपए का जुर्माना दिया जाएगा, जो बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के मुआवज़े के रूप में दिया जाएगा।

भोबिश्योतिर भूत के निर्माता ने आरोप लगाया था कि फ़िल्म को राज्य के अधिकारियों के इशारे पर सिनेमाघरों से हटवाया गया।

शीर्ष अदालत ने 15 मार्च को ममता बनर्जी सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि फ़िल्म की स्क्रीनिंग पर किसी भी तरह का कोई प्रतिबंध न लगाया जाए। फिल्म के निर्देशक ने तब आरोप लगाया था कि सिंगल-स्क्रीन थिएटर मालिकों और मल्टीप्लेक्स को राज्य भर में 40 से अधिक स्क्रीन पर स्क्रीनिंग को रोकने के लिए मजबूर किया गया था।

पश्चिम बंगाल पुलिस की विशेष शाखा से फ़िल्म के निर्माता द्वारा संपर्क साधने पर पता चला कि इसके प्रदर्शन पर रोक लगाने के पीछे फ़िल्म के कंटेंट से किसी की भावना आहत न हो यह तर्क दिया गया था। साथ ही राजनीतिक और क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने का हवाला भी दिया गया था।

फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने के बाद 18 फरवरी को एक विरोध-प्रदर्शन किया गया था जिसमें कई फ़िल्म कलाकार और कार्यकर्ता शामिल हुए थे।

वयोवृद्ध कलाकार सौमित्र चटर्जी ने एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा कि फ़िल्म पर रोक लगाने का फ़ैसला अलोकतांत्रिक और फ़ासीवादी नीति से ताल्लुक़ रखता है। चटर्जी ने अपने पत्र में यह भी लिखा कि स्क्रीनिंग पर रोक का फ़ैसला प्रशासन का एक ‘प्रतिशोधात्मक कृत्य’ है।

फ़िल्म ‘भोबिश्योतिर भूत’ शुरुआत से ही गंभीर विवादों का सामना कर रही है। फ़िल्म के निर्देशक अनिक दत्त और सह-निर्माता इंदिरा उन्नीनार ने हाल ही में धमकी मिलने का दावा भी किया था।

इससे पहले अनिक दत्त ने फ़िल्म फेस्टिवल स्थलों और उसके आस-पास मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पोस्टरों के अत्यधिक उपयोग की आलोचना की थी और तर्क दिया था कि इस तरह के आयोजनों के दौरान फ़िल्मी हस्तियों को अधिक लाइमलाइट मिलनी चाहिए।

ममता बनर्जी आमतौर पर आलोचनाओं को संभाल नहीं पाती। ऐसी कई घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असंतोष फैलाने वाली आवाजें बुलंद करने की कोशिश की है।

पंजाब के राज्यपाल ने Queen Elizabeth के जन्मदिन पर मिले निमंत्रण को ठुकराया, बताई ये वजह

पंजाब के राज्यपाल विजयेंद्र पाल सिंह बडनोर ने ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के जन्मदिवस के मौके पर ब्रिटिश हाई कमीशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने से इनकार कर दिया। बुधवार (अप्रैल 10, 2019) को क्वीन एलिज़ाबेथ ने अपना 93वाँ जन्मदिन मनाया। पंजाब के राज्यपाल ने जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के भी इतिहास में उसी दिन होने के कारण इस कार्यक्रम में शिरकत करने से मना कर दिया। ब्रिटिश हाईकमीशन के डिप्टी हाई कमिश्नर एंड्रयू आयरे ने अपने निवास पर एक भव्य पार्टी का आयोजन किया था, इसमें बडनोर को मुख्य अतिथि के तौर पर निमंत्रित किया गया था। राज्यपाल ने कहा कि वो इस कार्यक्रम में नहीं जा सकते क्योंकि इसी दिन जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड की 100वीं बरसी भी है।

बडनोर चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक भी हैं। ब्रिटिश हाई कमीशन को भेजे पत्र में बडनोर ने लिखा:

“महारानी के जन्मदिवस के अवसर पर आपने-अपने निवास पर मुझे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं महारानी की लम्बी उम्र और अच्छी सेहत की कामना करता हूँ। हालाँकि, मेरे लिए इस कार्यक्रम में शिरकत करना गर्व की बात होती लेकिन चूँकि ये जलियाँवाला बाग़ में हुए निर्मम नरसंहार की 100वीं बरसी की पूर्व संध्या पर आयोजित किया जा रहा है, इसीलिए मैं इस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में असमर्थ हूँ।”

बता दें कि जलियाँवाला नरसंहार के दौरान महिलाओं, बच्चों व बुज़ुर्गों सहित सैंकड़ों निहत्थे और निर्दोष भारतीयों को मार डाला गया था। जनरल डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश जवानों ने 13 अप्रैल 1919 को अमृसतर में इस निंदनीय कृत्य को अंजाम दिया था। अभी हाल ही में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे काले अध्याय के रूप में जाने जाने वाले इस नरसंहार के बारे में बात करते हुए ब्रिटिश मंत्री मार्क फिल्ड ने हाउस ऑफ कॉमन्स में कहा था कि उन्हे इस पर गहरा पछतावा है और जल्द ही एक माफ़ीनामा जारी किया जाएगा।

महारानी एलिज़ाबेथ ने कहा कि ये नरसंहार भारतीय-ब्रिटिश इतिहास पर एक काला धब्बा है। इसी तरह पूर्व ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरून ने भी पंजाब दौरे के दौरान ब्रिटिश इतिहास का बहुत ही शर्मनाक वाकया बताया था। हाउस ऑफ कॉमन्स में बहस के दौरान लेबर पार्टी के प्रीत कौर गिल ने कहा कि ब्रिटिश शासन द्वारा जलियाँवाला बाग़ नरसंहार की ज़िम्मेदारी लेते हुए औपचारिक माफ़ी माँगी जानी चाहिए। लेबर पार्टी के ही वीरेंदर शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया है जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से इसके लिए माफ़ी माँगे।

पंजाब के राज्यपाल वीपी सिंह बडनोर 1999 और 2004 में लोकसभा सांसद बन चुके हैं। उससे पहले वो 4 बार विधायक भी रहे हैं। राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद संभाल चुके बडनोर कई वर्षों तक राजस्थान भाजपा के उपाध्यक्ष भी रहे हैं। 2010 से 2016 तक राज्यसभा सांसद रहे बडनोर को अगस्त 2016 में पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।

आंध्र प्रदेश: चंद्रबाबू और जगमोहन के समर्थकों में हुई हिंसक झड़प, TDP नेता की मौत

बुधवार (अप्रैल 11, 2019) को आंध्र प्रदेश में हो रहे लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच कई जगहों से आपसी झड़प की खबरें सामने आईं हैं। इसी बीच ANI के एक ट्वीट से पता चला कि अनंतपुर जिले के ताड़िपत्री शहर में वाईएसआरसीपी और टीडीपी के कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प में टीडीपी के एक नेता एस भास्कर रेड्डी की मौत हो गई।

ANI के ट्वीट में दोनों पार्टियों के बीच हुई झड़प का वीडियो भी सामने आया है। इस वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि दोनों दलों के समर्थक आपस मे किस बदसलूकी से लड़ रहे हैं। इस आपसी झड़प के विवाद ने इतना ज्यादा तूल पकड़ा कि पुलिस को दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर लाठी चार्ज करना पड़ा।

20 राज्यों में 91 सीटों पर मतदान के साथ आंध्र प्रदेश में आज लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा चुनावों पर भी मतदान हो रहे हैं। एक ओर जहाँ टीडीपी को इस बार महागठबंधन का समर्थन मिला हुआ है वहीं जगमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ रही है।

बता दें कि आंध्र प्रदेश से आज सुबह मतदान शुरू होने के बाद से ही अलग-अलग तरह की खबरें आ रहीं हैं। सुबह 9:40 पर ANI के ट्वीट से ही मालूम चला था कि जनसेवा के MLA उम्मीदवार मधुसूदन गुप्ता ने अनंतपुर जिले के गूटी में एक मतदान केंद्र पर EVM को तोड़ दिया। जिसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी किया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश में ईवीएम के खराब होने की खबरों पर सीएम चंद्रबाबू नायडू के चुनाव आयोग को पत्र लिखने संबंधी खबर भी सामने आई। अपने पत्र में उन्होंने उन केंद्रों पर दोबारा मतदान होने की बात की है जहाँ ईवीएम में खराबी की वजह से सुबह 9.30 बजे तक मतदान शुरू नहीं हो पाया था।

अरविन्द केजरीवाल ने कहा, जो काम 70 साल में नहीं हुआ, वो मोदी ने 5 साल में कर दिया #मोदी है तो मुमकिन है

लाख बार गठबंधन के लिए गिड़गिड़ाते रहने के बाद भी कॉन्ग्रेस द्वारा ठुकराए जाने के बाद आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अनाप-शनाप आरोप लगाकर आसानी से चर्चा में बने रहते हैं।

लोकसभा चुनाव का प्रथम चरण आज जारी है। इसी बीच अरविन्द केजरीवाल ने ट्विटर पर भाजपा के एक ट्वीट को रीट्वीट करते हुए कह दिया कि जो काम पाकिस्तान 70 साल में नहीं कर पाया, उसके दोस्त मोदी जी ने पाँच साल में कर दिया।

भाजपा ने अपने ट्विटर हैंडल से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के एक बयान को शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा है कि वो देशभर में NRC लागू करेंगे और बौद्ध, हिन्दू और सिखों को छोड़कर देश से एक-एक घुसपैठिए को बाहर निकाल देंगे।

अरविन्द केजरीवाल ने फ़ौरन इसे रीट्वीट करते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा, “पाकिस्तान और इमरान खान भी यही चाहते हैं कि हिंदुस्तान में दंगे फैलें। इसीलिए पाकिस्तान खुल कर मोदी जी को फिर PM बनाने के लिए हर तरह की मदद कर रहा है। जो काम पाकिस्तान 70 साल में नहीं कर पाया, उसके दोस्त मोदी जी ने पाँच साल में कर दिया – हिंदुस्तान का भाईचारा खराब कर दिया।”

बता दें कि कल ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने एक बयान दिया था कि यदि आम चुनावों में बीजेपी (BJP) की जीत होती है, तो फिर भारत के साथ शांति वार्ता का एक बेहतर मौका हो सकता है। इमरान खान ने विदेशी पत्रकारों के साथ इंटरव्यू में कहा कि अगर बीजेपी जीतती है, तो कश्मीर मुद्दे पर किसी तरह का समझौता हो सकता है। इमरान खान के इस चौंकाने वाले बयान के बाद से ही विपक्ष और मीडिया गिरोह में बेचैनी देखने को मिल रही है।  

कॉन्ग्रेस अपने रवैए के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं : बदरूद्दीन अजमल

लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र असम की राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिला है। कुछ समय पहले तक कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाली AIUDF (ऑल इंडिया यूनाईटिड डेमोक्रेटिक फंड) पार्टी के प्रमुख बदरूद्दीन अजमल ने कॉन्ग्रेस पार्टी को लेकर बड़ा बयान दिया है। दरअसल, AIUDF के प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने पर बदरूद्दिन ने कॉन्ग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया है।

याद दिला दें कि पिछले महीने AIUDF ने निर्णय लिया था कि असम की 14 लोकसभा सीटों पर वह केवल अपनी पार्टी से 3 प्रत्याशी ही उतारेगी और बाकी कि सीटें वो कॉन्ग्रेस के लिए छोड़ देगी। अजमल की मानें तो उन्होंने सेकुलर वोटों को बँटने से रोकने के लिए ऐसा किया था ताकि वो भाजपा को सत्ता से बाहर कर सकें।

लेकिन अब जब कॉन्ग्रेस ने करीमगंज, बरपेटा और डुभरी की लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं, तो अजमल इससे नाखुश नज़र आ रहे हैं। उनका मानना है कि कॉन्ग्रेस की इस हरकत से गैर-भाजपा वोट तीन संसदीय क्षेत्रों में बँट जाएँगे।

बदरूद्दीन ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी पर इल्जाम लगाया है कि वो AIUDF को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस का मकसद AIUDF को खत्म करना है, कॉन्ग्रेस के मुस्लिम नेता नहीं चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIUDF में गठबंधन हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका राजनैतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

इतना ही नहीं अजमल ने भाजपा को जहाँ अपना पहला दुश्मन बताया है तो वहीं कॉन्ग्रेस को अपना दूसरा दुश्मन करार दिया है। अजमल ने कहा, “अगर भाजपा हमारी पहली दुश्मन है तो कॉन्ग्रेस हमारी दूसरी नंबर की दुश्मन है। हमने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सीटों का त्याग किया। हमारी कॉन्ग्रेस को मदद करने की कोई मंशा नहीं थी। हमने यह निर्णय असम की भाषा, संस्कृति, पहचान और हर परिप्रेक्ष्य को देखकर लिया था। हम चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भी उन तीनों सीटों पर अपने न प्रत्याशी उतारकर हमारी तरह त्याग करे। इससे हम तीन सीटों पर जीतते, कॉन्ग्रेस 7 और बीजेपी को मुश्किल से 2 सीटें मिलती।”

कॉन्ग्रेस की कठोरता पर अजमल का कहना है कि कॉन्ग्रेस अपने रवैये के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं। उनकी मानें तो राज्य में कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम आधारित पार्टी है क्योंकि पार्टी में 25 में से 15 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं।

अजमल का आरोप है कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोटों के लिए मुस्लिम को बेवकूफ बनाकर ब्लैकमेल कर रही है। उनकी मानें तो दशकों से मुस्लिमों के वोट का इस्तेमाल करके, अब कॉन्ग्रेस को AIUDF जैसी पार्टी से डर लग रहा है कि कहीं उनके वोट न छिन जाएँ।

बदरूद्दिन अजमल ने पिछले साल एक पत्रकार के साथ मारपीट की थी और सवाल पूछने पर उसका सर फोड़ने तक की धमकी दी थी।