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छात्रा से छेड़-छाड़ के आरोप में NSUI जिलाध्यक्ष इरफ़ान गिरफ़्तार

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में कॉन्ग्रेस पार्टी के छात्र नेता इरफ़ान हुसैन को छेड़-छाड़ के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। इरफ़ान शाहजहाँपुर के एनएसयूआई जिलाध्यक्ष भी थे। पिछले दिनों इरफ़ान ने अपने साथी शाहरोज, नदीम और कामरान के साथ मिलकर कॉलेज कैंपस में एक छात्रा के साथ छेड़-छाड़ की थी।

यही नहीं जब छात्रा ने इस घटना पर विरोध किया तो इरफ़ान व उसके साथियों ने छात्रा को अगवा करने की धमकी भी दी। इस मौके पर कुछ लोगों ने इरफ़ान और उसके साथियों का वीडियो बना लिया, जिसके बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। पुलिस ने चारों आरोपी के खिलाफ़ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर भी यौन-शोषण का आरोप

जानकारी के लिए बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी के छात्र नेता पर पहले भी इस तरह का आरोप लग चुका है। कॉन्ग्रेस पार्टी के छात्र विंग एनएसयूआई के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरोज़ ख़ान पर उन्हीं के पार्टी की एक महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया था।

इस आरोप के बाद जाँच के लिए एनएसयूआई की तरफ़ से तीन सदस्यों की टीम गठित की गई थी। महिला ने फ़िरोज पर यह आरोप लगाया था कि वो बार-बार होटल में आने और वहीं ठहरने के लिए दवाब बना रहे थे।     

संघ के दिनों में साथियों के लिए चाय और खाना बनाता था, बर्तन भी धोता था: प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरूआती जीवन के कई पन्ने अभी भी अनछुए है। हाल ही में लोकप्रिय फ़ेसबुक पेज ‘ह्यूमंस ऑफ बॉम्बे’ (Humans of Bombay) के साथ साझा किए एक इंटरव्‍यू में उन्होंने अपने जीवन यात्रा के विभिन्‍न पड़ावों और अनुभवों को साझा किया है। इस कड़ी में उन्‍होंने हिमालय से लौटने के बाद के अनुभवों को साझा किया है। पढ़िए पीएम मोदी की वो कहानी, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

हिमालय से वापस आने के बाद

उन्होंने साझा किया कि कैसे हिमालय के अनुभवों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी, ”हिमालय से वापस आने के बाद मुझे अपने बारे में यह यक़ीन हो गया था कि मैं अपना जीवन दूसरों की सेवा में लगाना चाहता हूँ। लिहाज़ा लौटने के कुछ समय के भीतर ही मैं अहमदाबाद के लिए रवाना हो गया। इस तरह पहली बार मैं एक बड़े शहर में रहने के लिए गया, जहाँ की जीवन की गति बिल्‍कुल अलग थी। वहाँ पर मैंने यदा-कदा अपने अंकल की कैंटीन में उनकी मदद करने से शुरुआत की।”

कैसे सीखी हिंदी

प्रधानमंत्री मोदी के हिंदी सीखने की कहानी भी रोचक है, उन्होंने अन्यत्र कहा था कि ‘जब वह छोटे थे तब उन्‍हें हिंदी आती ही नहीं थी। वह रोज पिता के साथ सुबह चाय की दुकान खोला करते थे। दुकान की साफ़-सफ़ाई की जिम्‍मेदारी उनके ऊपर थी। कुछ देर में ही लोगों का आना शुरू हो जाता था। पिता जब उन्‍हें चाय देने को बोलते तो वह लोगों की बात ध्यान से सुना करते थे। ऐसे ही धीरे-धीरे उन्‍हें हिंदी बोलना आ गया।’

मैं पूर्णकालिक प्रचारक बन गया

सेवा की शुरुआत संघ की पाठशाला से हुई, “अहमदाबाद में ही अंततः मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूर्णकालिक प्रचारक बन गया। वहाँ मुझे जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों से मिलने और बातचीत करने का अवसर मिला और इसके साथ विविध क्षेत्रों में काम करने का मौका मिला। वहाँ हम सब बारी-बारी से आरएसएस कार्यालय को साफ़ रखते थे। साथियों के लिए चाय और खाना बनाते थे और बर्तन भी धुलते थे।”

व्यस्त लेकिन स्पष्ट

इसके साथ ही पीएम मोदी ने कहा, “वह उस पड़ाव पर जीवन की कठोरताओं के बीच व्‍यस्‍त थे लेकिन इस बात के लिए भी स्‍पष्‍ट थे कि हिमालय से जो शांति का अनुभव लेकर लौटे हैं, उसको किसी भी सूरत में नहीं जाने देंगे। इस कारण जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए हर साल पाँच दिन एकांतवास में जाने का निश्‍चय किया।”

एकांतवास

ख़ुद की ख़ोज में एकांतवास के अनुभव का भी ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया, ”कई लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि मैं दीवाली के मौके पर 5 दिनों के लिए एकांतवास पर चला जाता हूँ। ऐसे किसी जंगल में जहाँ केवल स्‍वच्‍छ जल के अतिरिक्‍त कोई आदमी नहीं होता था। मैं उन 5 दिनों के लिए खाने की पर्याप्‍त सामग्री पैक करके ले जाता था। वहाँ कोई रेडियो या अखबार नहीं होता था और उस दौरान कोई टीवी या इंटरनेट नहीं था।” इसके साथ ही पीएम मोदी ने कहा कि वह एकांतवास उनको जीवन को हैंडल करने की ताकत देता था। उन्‍होंने कहा, “लोग कहते थे कि आप किससे मिलने जाते हो? तो मैं कहता था कि मैं अपने आप से मिलने जाता हूँ।”

अभाव लेकिन संतोष

इससे पहले की कड़ी में प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था, “मेरे परिवार के आठ लोग 40X12 के कमरे में रहते थे। यह छोटा सा घर था, पर हमारे परिवार के लिए पर्याप्‍त था। हमारे दिन की शुरुआत सुबह पाँच बजे हो जाती थी। मेरी माँ पढ़ी-लिखी नहीं थी पर भगवान की कृपा से उनके पास एक ख़ास तरह का ज्ञान था। वह नवजात शिशुओं की हर तकलीफ़ तुरंत समझ जाती थीं। माँ के उठने से पहले ही महिलाएँ अपने शिशुओं को लेकर घर के बाहर लाइन लगाए रहती थीं।”

युवाओं को सलाह

इसी कड़ी में पीएम मोदी ने ‘युवा दोस्‍तों’ को सलाह भी दी। उन्‍होंने कहा, ”अपने जीवन की तेज गति और व्‍यस्‍त कार्यक्रम के बीच कुछ समय अपने लिए निकालें। खुद के बारे में सोंचें और आत्‍ममंथन करें। इससे आपका दृष्टिकोण बदलेगा। आप अपनी अंतरात्‍मा को बेहतर तरीक़े से समझ पाएँगे।”

गौरक्षकों द्वारा जिस उमर की मॉब लिंचिंग हुई थी, उसका बेटा गो-तस्करी में गिरफ़्तार

10 नवंबर 2018 को अलवर जिले के रहने वाले उमर खान गो-तस्करी के शक़ में मॉब लिचिंग का शिकार हो गए थे। गोविंदगढ़ थाने में दर्ज़ मुक़दमे के मुताबिक उमर पिकअप वैन में 6 गाय व बछड़े लेकर अपने दो अन्य साथियों के साथ पकड़े गए थे। इसके बाद भीड़ ने गो-तस्करी के शक में उमर को लिंच कर दिया था।

भीड़ द्वारा उमर को मारे जाने के बाद देश भर में राजस्थान व केंद्र की भाजपा सरकार पर सवाल खड़ा किया जाने लगा था। लेकिन, उमर की मॉब लिंचिंग के ठीक तीन महीने बाद उसके बेटे मकसूद खान को राजस्थान की पुलिस ने गो-तस्करी के जुर्म में गिरफ़्तार किया है। हालाँकि अब कॉन्ग्रेस इस मुद्दे को राजनैतिक रंग नहीं दे पाएगी क्योंकि वर्तमान समय में राजस्थान में कॉन्ग्रेस की ही सरकार है।

गो-तस्करी के आरोप में मकसूद के अलावा 6 अन्य लोगों की भी गिरफ़्तारी हुई है। पुलिस ने मकसूद खान पर यह आरोप लगाया है कि वह ट्रक के पीछे टैंकर में भरकर गायों की तस्करी करता था।

अलवर जिले की खड़ली पुलिस ने राजस्थान-हरियाणा बार्डर पर गो-तस्करी, पुलिस पर फ़ायरिंग, वाहनों की लूट, पुलिस पर हमला करने के जुर्म में सभी 6 पर मुकदमा दर्ज़ कर लिया है। पुलिस ने बताया कि आरोपितों के पास से 315 बोर का कट्टा, 9 जिंदा कारतूस, स्विफ्ट डिजायर कार व अंग्रजी शराब के 40 बोतल (175 ml) मौके पर से जब्त किया है।    

पीएम मोदी ने लालकिले में किया सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय का उद्घाटन

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के लालकिले में सुभाष चन्द्र बोस संग्रहालय को आज (जनवरी 23, 2019) राष्ट्र को समर्पित किया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 122वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लालकिले पर सुभाष चंद्र बोस संग्रहालय का उद्घाटन किया। इस संग्रहालय में सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिंद फौज से जुड़ी चीजों को प्रदर्शित किया जाएगा। आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सुभाष चन्द्र बोस के पोते चन्द्र बोस भी मौजूद थे।

संग्रहालय का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “मैं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को उनकी जयंती पर नमन करता हूँ। वह एक ऐसे शूरवीर थे, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र बनाने की दिशा में खुद को प्रतिबद्ध किया और सम्मान का जीवन जिया। हम उनके आदर्शों को पूरा करने और एक मजबूत भारत बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

नेताजी के इस संग्रहालय में नेताजी द्वारा इस्तेमाल की गई लकड़ी की कुर्सी और तलवार के अलावा आईएनए से सम्बंधित पदक, बैज, वर्दी और अन्य वस्तुएँ शामिल हैं। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान आइएनए के ख़िलाफ़ जो मुक़दमा दर्ज़ किया गया था, उसकी सुनवाई लालकिले में ही हुई थी, यही कारण है कि यह संग्रहालय यहाँ पर बनाया गया है।

संग्रहालय में आने वाले लोगों को बेहतरीन अनुभव प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें फ़ोटो, पेंटिंग, अख़बार की कटिंग, प्राचीन रिकॉर्ड, ऑडियो-वीडियो क्लिप, एनिमेशन व मल्टीमीडिया की सुविधा होगी।

कुछ समय पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज़ाद हिंद फौज के द्वारा अंडमान निकोबार में फहराए गए तिरंगे के 75 साल पूरे होने पर वहाँ का दौरा किया था।

पीएम मोदी उसी जगह पर स्थित याद-ए-जलियाँ संग्रहालय (जलियाँवाला बाग घटना जो अप्रैल 13, 1919 को घटित हुई थी), प्रथम विश्वयुद्ध पर आधारित संग्रहालय, 1857 (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) पर संग्रहालय और भारतीय कला पर दृश्यकला संग्रहालय भी गए। नरेंद्र मोदी ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की शहादत को समर्पित ये सभी संग्रहालय ‘क्रान्ति मंदिर’ के नाम से जाने जाएँगे।

सार्वजनिक जीवन में नेताजी को कुल 11 बार कारावास की सज़ा दी गई थी। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 को छः महीने का कारावास दिया गया था। 1941 में एक मुक़दमे के सिलसिले में उन्हें कोलकाता (कलकत्ता) की अदालत में पेश होना था तभी वे अपना घर छोड़कर चले गए और जर्मनी पहुँच गए। जर्मनी में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ का नारा भी दिया।

प्रशासनिक सेवा छोड़कर स्वतंत्रता आन्दोलन में कूदे थे नेताजी

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा को छोड़कर देश को आज़ाद कराने की मुहिम का हिस्सा बन गए थे। इस दौरान ब्रिटिश सरकार ने उनके विरुद्द कई मुकदमे भी दर्ज़ किए।

ज्ञात हो कि जून 1944 को सुभाषचंद्र बोस ने ही प्रथम बार सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए महात्मा गाँधी को देश का पिता (राष्ट्रपिता) कहकर संबोधित किया था। सन 1927 में सुभाष चन्द्र बोस ने ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा दिया। यह पहला मौका था जब महात्मा गाँधी जी और उनके बीच संबंधों में खटास आई थी।

इसके बाद सन 1939 में बोस कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के लिए खड़े हुए और बड़े अंतराल से जीत भी गए। जबकि गाँधी जी ने उन्हें चुनाव से हटने को कहा था क्योंकि वे पट्टाभिसीतारमैया को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। इसके बाद जब गाँधी जी ने सीतारमैया की हार पर बुझे मन से भावनात्मक टिप्पणी करते हुए कहा था, “पट्टाभिसीतारमय्या की हार मेरी हार है”, तो आहत बोस ने कॉन्ग्रेस पार्टी से ही इस्तीफा दे दिया और ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इसके बाद बोस ने आज़ाद हिंद फौज बनाई, गाँधी जी इसके ख़िलाफ़ ही रहे।

कॉन्ग्रेस का प्रियंकास्त्र: ‘इंदिरा क्लोन’ की राजनैतिक एंट्री के 6 कारण

कॉन्ग्रेस पार्टी ने प्रियंका गाँधी को नई ज़िम्मेदारियाँ देते हुए उनकी राजनीतिक एंट्री का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रभारी बनाया गया है और साथ ही महासचिव भी बनाया गया है।ऐसा माना जाता रहा है कि प्रियंका पहले भी परदे के पीछे से कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख फ़ैसलों में हस्तक्षेप करती रहीं हैं, लेकिन यह पहला मौका है जब आधिकारिक तौर पर उन्होंने राजनीति का रुख़ किया है। उत्तर प्रदेश में प्रियंका पूर्वांचल की कमान सँभालेंगी।

प्रियंका की राजनीतिक एंट्री के साथ ही ये क़यास लगने शुरू हो गए हैं कि आख़िरकार ऐसा क्या हुआ कि अचानक से उन्हें पार्टी में प्रमुख भूमिका दे दी गई। सालों से ऐसी चर्चा चल रही है कि प्रियंका गाँधी राजनीति में कूद सकती हैं लेकिन किसी को ये नहीं पता था कि ऐसा कब होगा? अब जब पार्टी ने ऐलान कर दिया है, हमें उन कारणों पर ग़ौर करना चाहिए जो प्रियंका की राजनीतिक एंट्री की वजह हो सकती है।

1. पूर्वांचल साधे, सब सधे

प्रियंका को यूपी में पूर्वांचल की कमान दी गई है। पूर्वांचल के बारे में कहा जाता है कि अगर यूपी साधना हो तो पहले पूर्वांचल से शुरू करना चाहिए। गाँधी परिवार और योगी आदित्यनाथ के प्रभाव वाला क्षेत्र होने के कारण राजनीतिक रूप से पूर्वांचल काफ़ी महत्वपूर्ण है।

2009 के आम चुनावों में कॉन्ग्रेस को इस क्षेत्र में 21 में से सिर्फ 6 सीटें मिली थी। 2014 में पार्टी एक तरह से पूरी यूपी से ही साफ़ हो गई थी। प्रियंका के कमान सँभालने से पार्टी को अपने खोए वोटर्स फिर से वापस लाने की उम्मीद है।

यूपी के साथ-साथ पूर्वांचल के क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस की ढीली होती पकड़, गाँधी परिवारके हाथों से फिसलते गढ़ और नरेंद्र मोदी की वाराणसी में एंट्री ने पार्टी की परेशानियों को बढ़ाने का काम किया है। ऐसे में एक नए चेहरे की एंट्री से कॉन्ग्रेस को यहाँ के समीकरण में बदलाव की उम्मीद है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मभूमि गोरखपुर और प्रधानमंत्री मोदी का नया गढ़ काशी- ये सब पूर्वांचल में ही आते हैं। राजनीतिक रूप से संवेदनशील अयोध्या भी इसी क्षेत्र का हिस्सा है। ऐसे में कॉन्ग्रेस ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है।

2. जाति और जेंडर का भी है अहम रोल

उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि ब्राह्मणों के समर्थन के बिना यहाँ कोई पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी है। मायावती जैसे बड़े नेता को भी सतीश मिश्रा जैसे ब्राह्मण चेहरे की जरूरत पड़ी थी जिसका उपयोग कर उन्होंने ब्राह्मणों को साधा था। बसपा अक्सर ‘हाथी चलता जाएगा, ब्राह्मण शंख बजाएगा’ जैसे नारे देती रही है और ‘पैर छुओ अभियान’ चलाती रही है। ब्राह्मणों के इसी दबदबे को देखते हुए प्रियंका गाँधी को लाया गया है।

अमेठी में पिछले चार सालों में स्मृति को ईरानी के बढ़ते प्रभाव ने भी कॉन्ग्रेस को ये कदम उठाने के लिए मज़बूर कर दिया। गाँधी के गढ़ में स्मृति और गठबंधन के बाद और शक्तिशाली बन कर उभरी मायावती के मुक़ाबले पार्टी ने एक महिला चेहरे को कमान दे कर एक अलग छवि बनाने की कोशिश की है।

3. कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार

प्रियंका गाँधी को फ़ोरफ़्रंट पर लाकर कॉन्ग्रेस ने मुरझाए कार्यकर्ताओं में जान फूँकने की एक नई कोशिश की है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव- राज्य में पार्टी तीसरे-चौथे स्थान के लिए भी संघर्ष करती दिख रही है। ऐसे में कॉन्ग्रेस कार्यकर्तागण में ऊर्जा के संचार के लिए पार्टी ने ये अंतिम ब्रह्मास्त्र चलाया है।

उत्तर प्रदेश इंदिरा गाँधी की भी कर्मभूमि रही है और प्रियंका पहले भी रायबरेली और अमेठी में चुनाव प्रचार की कमान सँभालती रही हैं। कार्यकर्ताओं में यह धारणा है कि 2014 आम चुनावों में पूरे प्रदेश में कॉन्ग्रेस की करारी हार के बावजूद अमेठी-रायबरेली में पार्टी को जीत मिली थी, इसका कारण प्रियंका गाँधी ही हैं।

4. कॉन्ग्रेस नेताओं को एक रखने के लिए

कॉन्ग्रेस पार्टी का यह पुराना इतिहास रहा है कि जब-जब नेहरू-गाँधी परिवार के अलावे किसी अन्य नेता का उदय हुआ है- तब-तब पार्टी के बिखरने का संकट बढ़ा है। नरसिम्हा राव के पराभव के बाद अगर सोनिया गाँधी पार्टी की कमान नहीं सँभालती तो शायद पार्टी के कई फाड़ हो चुके होते। परिवार हमेशा से कॉन्ग्रेस नेताओं को एक सूत्र में पिरोने का जरिया रहा है। गठबंधन साथी भी कॉन्ग्रेस के अन्य बड़े नेताओं के ज़्यादा गाँधी परिवार पर भरोसा करते हैं। ऐसे में, पार्टी के प्रथम परिवार के एक और व्यक्ति का राजनीति में आना इस ट्रेंड को और मज़बूत करता है।

राहुल गाँधी की छवि बहुत हद तक नकारात्मक या मज़ाकिया किस्म की हो गई है। उन्हें उनके विरोधी या अपने लोग भी सीरियसली नहीं लेते। सोनिया गाँधी अब राजनीतिक रूप से पहले जितनी सक्रिय नहीं हैं। कॉन्ग्रेस के हाईकमान में नेतृत्व के अभाव को देखते हुए ये दाव खेला गया है। प्रियंका गाँधी पहले भी पार्टी से जुड़े निर्णय लेने वाली मण्डली का अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सा रही हैं। परिवार के वफ़ादारों और कॉन्ग्रेस के संकटमोचकों को एक रखने के लिए पार्टी ने प्रियंका को आगे कर दिया है। पार्टी इस से यह सन्देश देने की कोशिश कर रही है कि उसके पास नेतृत्व का अभाव नहीं है।

5. योगी-मोदी के मुक़ाबले नया चेहरा

उत्तर प्रदेश हमेशा से चेहरों के खेल से चला है। वाजपेई, कल्याण सिंह से लेकर मुलायम-माया तक- जनता ने बड़े चेहरों पर भरोसा जताया है और उनके नाम पर वोट करती रही है। ताज़ा उदाहरण नरेंद्र मोदी का है। मोदी को पूर्वांचल में एंट्री देकर भाजपा ने लगभग पूरे यूपी को क्लीन स्वीप कर लिया था। कार्यकर्ताओं के पास जनता को बताने के लिए कोई चेहरा नहीं था। अब नेता प्रियंका के नाम पर वोट माँग सकते हैं।

कार्यकर्ताओं की लम्बे समय से माँग थी कि उन्हें प्रियंका के रूप में एक ऐसे चेहरे की ज़रूरत है जिसके नाम पर जनता से वोट बटोरा जा सके। लम्बे समय से चल रही इस बहस को देखते हुए पार्टी ने आख़िरकार इस बारे में निर्णय लिया और प्रियंका के रूप में जनता के सामने एक ऐसा चेहरा पेश किया है जो माया-अखिलेश और मोदी-योगी जैसे शक्तिशाली चेहरों से मुक़ाबला कर सके।

अब देखना यह है कि पार्टी को इस से क्या फ़ायदा मिलता है। 2019 के आम चुनाव आने वाले हैं। माहौल गरम है और राजनीतिक रूप से यह काफ़ी संवेदनशील समय है। अब समय ही बताएगा कि इस बदलाव का क्या असर होता है।

6. इंदिरा गाँधी की छवि

2014 आम चुनावों से पहले कॉन्ग्रेस के शिकायत प्रकोष्ठ की अध्यक्ष अर्चना डालमिया ने इंडिया टुडे में एक लेख लिख कर बताया था कि कैसे प्रियंका गाँधी में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की छवि दिखती है। ये कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की प्रियंका के प्रति राय को दिखता है।

उस लेख में उन्होंने बताया था कि कैसे अगर शक्लो-सूरत की बात करें तो प्रियंका गाँधी का हेयरस्टाइल भी इंदिरा गाँधी से मिलता-जुलता है। इतना ही नहीं, उनके अनुसार प्रियंका की नाक की बनावट भी अनायास इंदिरा की याद दिलाती है। वो इंदिरा की तरह ही लम्बी है और लम्बे-लम्बे डग भर कर चलती है। इंदिरा गाँधी की तरह वह भी गाँधी परिवार के संसदीय क्षेत्रों में आम लोगों से मिलती-जुलती रहीं हैं।

कॉन्ग्रेस के अधिकतर पदाधिकारियों की प्रियंका के बारे में यही राय है जो अर्चना की है। ऐसे में समझा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस के लोग उनमें इंदिरा को देखते हैं। ये एक बड़ा कारण है कि कार्यकर्ताओं में उन्हें कॉन्ग्रेस के सुनहरे काल की याद दिखती है।

नरोदा पाटिया नरसंहार: सुप्रीम कोर्ट ने चार आरोपितों को जमानत दी, कहा कन्विक्शन है डिबेटेबल

सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के नरोदा पाटिया मामले में चार आरोपितों को जमानत दी है।कोर्ट ने कहा की गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फ़ैसला बहस का मुद्दा है। गुजरात में 2002 में दंगों के दौरान हुए इस नरसंहार में 97 लोगों की मौत हो गई थी।

न्यायमूर्ति ए एम खानविल्कर की अध्यक्षता वाली बेंच ने चार आरोपितों उमेशभाई सुराभाई भारवाड़, राजकुमार, पद्मेंद्रसिंह जसवंतसिंह राजपूत और हर्षद उर्फ मुंगडा जिला गोविंद छाड़ा परमार की जमानत मंगलवार (जनवरी 22, 2019) को मंजूर कर ली।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट की सजा का फ़ैसला “डिबेटेबल” है, जिसमें लम्बा समय लगेगा और उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई होने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए। एक को अपनी बेटी की शादी के लिए अस्थायी जमानत दी गई है।

नरोदा पाटिया नरसंहार की यह घटना गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में हुये अग्निकांड के एक दिन बाद की है। इस घटना में अहमदाबाद के नरोदा पाटिया क्षेत्र में 28 फ़रवरी 2002 को भीड़ ने 97 लोगों की हत्या कर दी थी। जिनमें ज़्यादातर कर्नाटक और महाराष्ट्र के प्रवासी थे, भीड़ द्वारा दंगों में मारे गए थे। भीड़ ने आक्रोश में लगभग 800 घरों वाले इलाके में आग लगा दी थी।

गुजरात उच्च न्यायालय ने पिछले साल 20 अप्रैल को इस मामले के 29 आरोपितों में से में से 12 को दोषी ठहराया था और भाजपा की पूर्व मंत्री माया कोडनानी सहित 17 अन्य को आरोप सिद्ध न होने पर बरी कर दिया था। इससे पहले निचली अदालत ने सभी 29 आरोपितों को दोषी ठहराया था।

प्रियंका गाँधी वाड्रा की राजनीति में एंट्री, कॉन्ग्रेस का मास्टर स्ट्रोक?

लोकसभा चुनाव 2019 को ध्यान में रखते हुए कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पार्टी के संगठन में फ़ेरबदल किया है। कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष ने प्रेस रिलीज़ जारी करके संगठन में होने वाले बदलाव की जानकारी मीडिया को दी है।

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राहुल गाँधी द्वारा जारी प्रेस रिलीज में प्रियंका गाँधी को पूर्वी यूपी के लिए कॉन्ग्रेस जनरल सेक्रेटरी की ज़िम्मेदारी दी गई है। अब तक सिर्फ चुनाव प्रचार का ज़िम्मा संभालने वाली प्रियंका गाँधी की राजनीति में औपचारिक एंट्री हो गई है। इसी प्रेस रिलीज़ में कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता वेणु गोपाल को ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया है। इसके साथ ही वेणु गोपाल को कर्नाटक की ज़िम्मेदारी भी दी गई है।

प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस पार्टी में यह ज़िम्मेदारी फ़रवरी के पहले सप्ताह से संभालेंगी। इसके अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी नई ज़िम्मेदारी दी गई है। मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव के बाद यह संभावना थी कि सिंधिया को पार्टी ने भले ही मुख्यमंत्री की गद्दी न दी हो, परंतु संगठन में बड़ी ज़िम्मेदारी देने की संभावना है। हालाँकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए जनरल सेक्रेटरी बनाकर एक तरह से पार्टी ने सिंधिया को लॉलीपॉप थमा दिया है।

प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा ने उनको कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से नई ज़िम्मेदारी मिलते ही फेसबुक पर बधाई दी।

कॉन्ग्रेस ने गुलाम नबी आजाद को हरियाणा का जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया है। इससे पहले
गुलाम नबी आजाद उत्तर प्रदेश जनरल सेक्रेटरी की भूमिका निभा रहे थे।

कॉन्ग्रेस पार्टी के संगठन में हुए इस बदलाव पर टिप्पणी करते हुए भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “बीजेपी में पार्टी ही परिवार है, जबकि कॉन्ग्रेस में परिवार ही पार्टी है। यूपी में तो गठबंधन से नकारे ही गए, बिहार में भी मनमुटाव चल रहा है।”


सबरीमाला से लौटी कनकदुर्गा को ससुराल और मायके वालों ने घर से निकाला

800 वर्षों की परंपरा को तोड़ कर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली कनकदुर्गा को लेकर चल रहा ड्रामा थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब मीडिया में ख़बर आई है कि कनकदुर्गा को उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया है। इतना ही नहीं, उसके मायके वालों ने भी उसे घर में घुसने की इजाज़त नहीं दी है। पुलिस के अनुसार जब वो कनकदुर्गा को लेकर उसके ससुराल पहुँची तो पाया कि कनकदुर्गा के पति घर में ताला लगा कर बच्चों संग कहीं और चले गए हैं।

कनकदुर्गा के परिवार ने कहा है कि उसके ‘कृत्य’ से पूरे समुदाय को शर्मसार होना पड़ा है और लाखों श्रद्धालुओं की भावना को ठेस पहुँची है। उसके सरकारी कर्मी पति ने कहा कि वे उसे तब तक नहीं स्वीकार करेंगे, जब तक कि वह अपने पाप का प्रायश्चित नहीं कर लेती है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2018 में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी जिसके बाद श्रद्धालुओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय के बाद कनकदुर्गा सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला थी। 39 वर्षीय कनकदुर्गा ने एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को धता बताते हुए मंदिर में प्रवेश किया था।

ताजा ख़बरों के अनुसार कनकदुर्गा के भाई ने उस से साफ़-साफ़ कह दिया है कि उसे उसके पैतृक आवास में घुसने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। फ़िलहाल कनकदुर्गा को पुलिस की निगरानी में सरकारी आश्रय गृह में रखा गया है। उसके भाई ने पहले ही कहा था कि जब तक कनकदुर्गा हिन्दुओं और सबरीमाला मंदिर के श्रद्धालुओं से माफ़ी नहीं माँग लेती, तब तक उसे घर में नहीं घुसने दिया जाएगा।

अभी कुछ दिनों पहले ही कनकदुर्गा ने अपनी सास पर उसकी पिटाई करने का आरोप लगाया था। उसने कहा था कि जैसे ही वो घर पहुँची, उसकी सास ने लकड़ी के तख़्ते से उस पर हमला कर दिया और उसके सिर पर वार किया। बाद में ख़बर आई कि कनकदुर्गा की उसकी सास ने पिटाई नहीं की थी, बल्कि उसने ही अपनी सास के साथ मारपीट की थी। पुलिस ने दोनों के ख़िलाफ़ एक-दूसरे से मारपीट करने का केस दर्ज़ किया था।

कनकदुर्गा का परिवार उस से तभी से नाराज़ चल रहा था जब से उसके सबरीमाला में प्रवेश करने की ख़बर आई थी। उसके भाई ने इसे CPM और केरल पुलिस की साज़िश बताया था। ज्ञात हो कि केरल के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन ने सबरीमाला में प्रवेश करने वाली इन महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद इन्हे पुलिस प्रोटेक्शन के साथ उसे आधी रात को मंदिर की सीढ़ियों पर ले जाया गया।

भतीजी मीसा भारती के हाथ काटने वाले बयान पर भावुक हुए रामकृपाल

केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री रामकृपाल यादव ने मीसा भारती के विवादित बयान पर अपनी टिप्पणी दी है। बता दें कि राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी मीसा भारती ने हाल ही में विवादित बयान देते हुए कहा था- “जब रामकृपाल बीजेपी में शामिल हो रहे थे, तब मेरा मन उनका हाथ गँड़ासे से काटने का हुआ था।” इस पर प्रतिक्रया देते हुए रामकृपाल ने कहा कि मीसा उनकी बेटी की तरह है और उनका कटा हुआ हाथ भी उसे आशीर्वाद देने के लिए ही उठेगा।

16 जनवरी को दिए बयान में मीसा भारती ने कहा था कि राम कृपाल यादव उनके घर में चारा काटते थे। उन्होंने कहा था कि रामकृपाल के लिए उनके मन में सम्मान तभी ख़त्म हो गया था जब उन्होंने सुशील मोदी से हाथ मिला लिया। मीसा ने रामकृपाल के बारे में आगे कहा था कि वे जिस दिन सुशील मोदी के साथ हाथ पकड़कर खड़े थे, उन्हें उस दिन इतनी ईर्ष्या हुई कि मन किया कि उसी कुट्टी काटने वाले गँड़ासे से हाथ काट दें।

बिहार के पाटलिपुत्र क्षेत्र से सांसद रामकृपाल यादव ने मीसा के विवादित बयान पर आगे कहा;

“मीसा भारती ने जैसा बयान दिया, वह लोकतंत्र में दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा बयान लोकतंत्र में विश्‍वास करने वाला नहीं दे सकता। ऐसा बयान कोई सेवक नहीं, शासक ही दे सकता है। मैं एक किसान ग़रीब परिवार का बेटा हूँ। पिताजी दूध बेचते थे, कुट्टी काटते थे। जब तक राजनीतिक-समाजिक जीवन में रहूँ गा, तब तक मेरा हाथ गरीबों की सेवा के लिए उठेगा।”

रामकृपाल यादव ने अपनी ग़रीब पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए मीसा के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि मीसा उनकी भतीजी है, बेटी के समान है और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ रहेगा।

ज्ञात हो कि राम कृपाल यादव को कभी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव का ‘हनुमान’ कहा जाता था। मार्च 2014 में जब लालू ने पाटलिपुत्र सीट से रामकृपाल की जगह अपनी बेटी मीसा को टिकट देने का फ़ैसला लिया, तभी से दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। इसके बाद रामकृपाल भाजपा में शामिल हो गए और पाटलिपुत्र सीट से ही चुनाव लड़ते हुए मीसा भारती को 40,000 से भी अधिक मतों से हराया।

हाल ही में तेज प्रताप यादव ने ये ऐलान कर दिया कि मीसा फिर से पाटलिपुत्र से ही चुनाव लड़ेगी और वो इसके लिए प्रचार शुरु करने जा रहे हैं। पाटलिपुत्र सीट पर आगामी चुनावों में फिर से चाचा-भतीजी की लड़ाई देखने को मिल सकती है। ऐसे में उम्मीद कम है कि बयानबाज़ी का ये दौर थमेगा।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला: मिशेल ने रिश्वत में मिली रक़म को लंदन में ठिकाने लगाया

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में नित नए ख़ुलासे हो रहे हैं। अब CBI ने नया ख़ुलासा करते हुए कहा है कि मिशेल ने अगस्ता वेस्टलैंड में इस्तेमाल न होने वाले फ़ंड्स को लंदन स्थित बैंक एकाउंट्स में ट्रांसफ़र किए। ये उसने तब किया, जब भारत उसके प्रत्यर्पण के लिए प्रयास कर रहा था। सीबीआई के अनुसार बिचौलिया मिशेल ने प्रत्यर्पण से पहले रिश्वत में मिली रक़म को ठिकाने लगा दिया।

जाँच एजेंसी ने इस सम्बन्ध में ब्रिटिश अधिकारीयों से संपर्क किया है और उन्हें इन ट्रांसफ़र्स की जानकारी दे दी है। सीबीआई ने ब्रिटिश अधिकारीयों से इन ट्रांसफ़र्स के विवरण भी माँगे हैं और इसके लिए उन्हें जुडिशल रिक्वेस्ट (Judicial Request) भेज दिया गया है। जाँच एजेंसी के मुताबिक़ ₹3,700 करोड़ के अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में मिशेल को ₹300 करोड़ रिश्वत के रूप में दिए गए थे। इन में से कई करोड़ रुपयों का अभी तक कोई हिसाब-किताब नहीं पता चल पाया है।

सीबीआई ने दावा किया कि मिशेल को ट्रांसफ़र किए गए रुपयों को उसे भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और नेताओं तक पहुँचाना था ताकि डील पूरी की जा सके। टाइम्स ऑफ इंडिया के सूत्रों के अनुसार मिशेल ने कैश के रूप में काफ़ी रुपए भारत में पहुँचाए थे। बावजूद इसके, उसके बैंक खातों काफ़ी रुपए बचे हुए थे जिन्हे उसने ठिकाने लगा दिया। ये रुपए उसके दो कंपनियों के बैंक खातों में थे। उन कंपनियों के नाम हैं- ग्लोबल सर्विसेज FZE (दुबई) और गोबल ट्रेड एंड कॉमर्स सर्विसेज (लंदन)।

2017-18 के दौरान सीबीआई मिशेल के प्रत्यर्पण के लिए लगातार दुबई सरकार के संपर्क में थी। तब मिशेल दुबई में ही ज़मानत पर बाहर था। अधिकारियों का मानना है कि मिशेल को इस बात की भनक लग गई थी कि भारतीय जाँच एजेंसियाँ उसके नजदीक है और इसी कारण उसने रुपयों को ठिकाने लगाना बेहतर समझा।

मिशेल ने पिछले दो सालों में कई बार दुबई छोड़ने की कोशिश की लेकिन वो सफल नहीं हो पाया। भारतीय एजेंसियों से बचने के लिए वो दुबई में अपना व्यापार समेटना चाहता था लेकिन सीबीआई ने उसे पहले ही अपने गिरफ़्त में ले लिया। जनवरी 10, 2019 को प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा था कि अगस्ता वेस्टलैंड के मामले में आरोपित बिचौलिया मिशेल को रक्षा मामले में कैबिनेट की मीटिंग और रक्षा से जुड़ी सरकार की गुप्त फ़ाइलों के बारे में कैसे पता चल जाता था।