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कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के 2 MLA भिड़े, सिर पर मारी बोतल

कॉन्ग्रेस के अंदरुनी खेमें से खटपट की ख़बरें आए दिन उजागर होती रहती हैं। इससे पार्टी की बिगड़ती छवि तो दिखती ही है, साथ में पार्टी के अंदर फैला गहरा असंतोष भी जगज़ाहिर होता है। कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के दो विधायक किसी बात को लेकर आपस में न सिर्फ़ भिड़ गए बल्कि बात हाथापाई की नौबत तक आ गई।

बेंगलुरू के जिस होटल में कॉन्ग्रेसी विधायक आनंद सिंह और जेएन गणेश ठहरे हुए थे, वहीं यह झड़प हुई। किसी बात को लेकर दोनों में आपसी विवाद इतना बढ़ गया कि जेएन गणेश ने आनंद सिंह के सिर पर बोतल से वार कर दिया। घायल स्थिति में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

कर्नाटक के डिप्टी सीएम जी परमेश्वर ने कहा कि दोनों विधायकों के बीच हुई लड़ाई की जानकारी उन्हें मीडिया के ज़रिए मिली है। आपसी विवाद के बारे में उन्हें पार्टी से अब तक कोई जानकारी नहीं मिली है। जैसे ही कोई जानकारी मिलेगी, वो साझा करेंगे।

बीजेपी ने इस हाथापाई पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस के भीतरी खेमे में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। इसके लिए किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। रिजॉर्ट में हुई आपसी भिड़ंत के चलते एक कॉन्ग्रेसी विधायक अस्पताल में भर्ती है। इसके अलावा बीजेपी ने घायल विधायक आनंद सिंह के जल्दी ठीक होने की कामना भी की।

बीजेपी ने कहा कि यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (KPCC) के प्रमुख भी इस लड़ाई को रोकने में असमर्थ थे। दिनेश गुंडू राव (Dinesh Gundu Rao) अब बीजेपी पर दोष नहीं मढ़ सकते, क्योंकि रिजॉर्ट में जो हुआ वो किसी की नज़र से दूर नहीं है।

माखनलाल यूनिवर्सिटी की जाँच समिति के गठन पर ख़ुद घिरी कॉन्ग्रेस

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को सत्ता पर आसीन हुए अभी जुम्मा-जुम्मा कुछ ही दिन हुए हैं और पार्टी ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। अभी-अभी सत्ता पर विराजमान हुई कमलनाथ सरकार ने आईएएस अधिकारी पी नरहरी को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्त किया।

कुलपति बनाए गए पी नरहरी कॉन्ग्रेस द्वारा संचालित राजीव गाँधी फाउंडेशन का प्रचार अपने सोशल मीडिया से कर चुके हैं। राजीव गाँधी फाउंडेशन जैसे गैर-सरकारी तंत्र का प्रचार करने वाले को एकाएक कुलपति नियुक्त करना किस हद तक न्यायोचित है? क्या उनकी सबसे बड़ी क़ाबिलियत फाउंडेशन का प्रचार करना है या फिर इसके पीछे कॉन्ग्रेस की राज्य सरकार की कुछ और ही मंशा छिपी हुई है?

अभी हाल ही में माखनलाल विश्वविद्यालय को लेकर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा एक जाँच समिति का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष के रूप में एक आईएएस अधिकारी एम गोपाल रेड्डी को नियुक्त किया गया है। एम गोपाल रेड्डी की छवि भी बेदाग नहीं है। यह वही रेड्डी हैं, जिनके ख़िलाफ़ सेवा के दौरान भ्रष्टाचार समेत तमाम आरोप लगे थे। इनके ख़िलाफ़ जालसाज़ी जैसे गंभीर मामले भी दर्ज़ हुए थे। भ्रष्टाचार मामलों में आरोपित रेड्डी को अध्यक्ष बनाना कितना न्यायसंगत है, इसे समझना किसी के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है। साथ ही यह कॉन्ग्रेस की मंशा को भी स्पष्ट करता है।

आपको बता दें कि माखनलाल विश्वविद्यालय की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित अधिनियम से हुई थी। भारत के उपराष्ट्रपति इसके विजिटर हैं। ऐसे में ताज्जुब की बात है कि इस जाँच समिति का गठन उपराष्ट्रपति को जानकारी दिए बिना ही हो गया। कॉन्ग्रेस का यह एक-तरफा निर्णय उसके तानाशाही स्वभाव को व्यक्त करता है।

इस पूरे मामले की तह तक जाने पर कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट सोच सामने आती है। क्योंकि सवाल अब यह है कि कॉन्ग्रेस 2003 के बाद की ही नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक साज़िश या खेल है, जिसे कॉन्ग्रेस किसी प्रायोजित तरीक़े से अंजाम देने की कोशिश कर रही है? और यह मान भी लिया जाए कि कॉन्ग्रेस जाँच करा ही रही है, तो फिर उसके लिए साल 2003 ही क्यों निर्धारित किया गया?

विश्वविद्यालय की नींव 1991 में रखी गई थी। उसके बाद तो कॉन्ग्रेस ने ही वहाँ वर्षों तक एकछत्र राज किया था। तब क्या कॉन्ग्रेस गहरी नींद में सोई हुई थी या इतनी आश्वस्त थी कि उसके शासनकाल में कोई गड़बड़ी ही नहीं हुई! उस समय दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। सवाल यह है कि जाँच करने पर अमादा कॉन्ग्रेस, विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से ही जाँच क्यों नहीं कर रही है। क्या कॉन्ग्रेस इस बात से डरी हुई है कि अगर जाँच शुरुआत से हुई तो कहीं उनके काले-चिट्ठे सामने ना आ जाएँ?

Subtitle – मध्य प्रदेश की सरकार 2003 के बाद की नियुक्तियों की जाँच अपने दागी अधिकारियों से क्यों करवाने पर तुली है? इसके पीछे कोई साज़िश या खेल है जिसे कॉन्ग्रेस प्रयोजित तरीक़े से अंजाम तक ले जाने की कोशिश में है
Excerpt – एक भगोड़े और मनी लॉन्ड्रिंग के दोषी ज़ाकिर नइक से कॉन्ग्रेस की इतनी गहरी दोस्ती की आख़िर क्या वजह हो सकती है

बजट को समझना-बूझना है तो इन 32 शब्दों को ठीक से जान लें

संसद का बजट सत्र 31 जनवरी से 13 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। हालाँकि संसद के कामकाज को देखते हुए इसे बढ़ाया भी जा सकता है। 31 जनवरी को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के लोकसभा और राज्यसभा के संयुक्त बैठक संबोधन के साथ बजट सत्र शुरू किया जाएगा।

वित्त मंत्री बजट दिवस पर खर्च, राजस्व, घाटा ऋण आदि सहित सरकार के वित्त का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन बजट के दस्तावेजों को समझने के लिए उसमें प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को समझना बेहद ज़रूरी है। आइए आपको दस्तावेजों और शब्दावली के बारे में बताते हैं।

सकल आर्थिक डेटा (Aggregate Economic Data): यह देश में हुए कुल व्यय और संपूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित वस्तुओं और सेवाओं के कुल उत्पादन की व्याख्या करता है।

वार्षिक वित्तीय विवरण (Annual Financial Statement): यह वित्तीय विवरण अनुच्छेद 112 पर आधारित होता है। इसमें आने वाले साल और पिछले वर्ष हुए खर्चे के बारे में बताया जाता है।

विनियोग विधेयक (Appropriation Bill): अनुच्छेद 114(3) के अंतर्गत संसद की ओर से कोई भी कानून बनाए बिना संचित निधि से पैसे नहीं निकाले जा सकते। यह एक दस्तावेज है, जो सरकार को अपने वार्षिक खर्चों को पूरा करने के लिए संचित निधि से धन निकालने का अधिकार देता है।

संतुलित बजट (Balanced Budget): ऐसा बजट जिसमें सार्वजनिक व्यय और कुल राजस्‍व प्राप्तियाँ बराबर हों। इसका मतलब न तो कोई घाटा है और न ही कोई अधिशेष।

बजट एक नज़र में (Budget at a Glance): यह एक दस्तावेज है, जो कर राजस्व, खर्च और अन्य प्राप्तियों व विवरणों का संक्षिप्त ब्यौरा दिखाता है।

बजट चक्र (Budget Cycle ): इसमें बजट के बारे में निर्णय लेने और उन निर्णयों को लागू करने की बात होती है। यह आमतौर पर चार चरण का होता है – बजट तैयार करना, अधिनियमित करना, निष्पादन लेखा परीक्षण और मूल्यांकन।

बजटीय कमी (Budgetary Deficit): यह सरकार के राजस्व और पूंजी खाते दोनों में सभी प्राप्तियों और खर्चों के बीच का अंतर है।

भुगतान संतुलन (Balance of Payments): इस शब्द का उपयोग किसी अवधि में देश के बाहर और देश के भीतर भुगतान के बीच कुल अंतर को दर्शाने के लिए किया जाता है।

केंद्रीय योजना परिव्यय (Central Plan Outlay): यह अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों और सरकार के मंत्रालयों के बीच मौद्रिक संसाधनों का विभाजन है।

समेकित बजट (Consolidated Budget): इसमें सभी स्रोतों से प्राप्त राजस्व और सभी गतिविधियों के लिए खर्च का विवरण शामिल होता है।

ऋण (Debt): सरकारी ऋण वह बकाया राशि है, जो निजी कर्जदाताओं को तय समय पर सरकार देने के लिए बाध्य होती है।

विनिवेश (Disinvestment): विनिवेश प्रकिया में निवेश का उल्टा होता है। निवेश यानी किसी कारोबार में, किसी संस्था में, किसी परियोजना में रकम लगाना और विनिवेश यानी किसी चीज या संस्था को बेचकर उस रकम को वापस निकालना।

व्यय बजट (Expenditure Budget): यह विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के राजस्व और पूँजी के खर्च को दर्शाता है और ‘योजना’ तथा ‘गैर-योजना’ के तहत प्रत्येक के संबंध में अनुमान प्रस्तुत करता है।

अतिरिक्त-बजटीय (Extra-governmental): ये बजट में शामिल न होने वाले सरकारी लेनदेन को संदर्भित करता है।

वित्त विधेयक (Finance Bill): बजट में प्रस्तावित नए कर लगाने, कर प्रस्तावों में परिवर्तन या मौजूदा कर ढाँचे को जारी रखने के लिए संसद में प्रस्तुत विधेयक को वित्त विधेयक कहते हैं।

राजकोषीय नीति रणनीति विवरण (Fiscal Policy Strategy Statement): यह कराधान, खर्च, उधार, निवेश, प्रशासित मूल्य निर्धारण और गारंटी से संबंधित सरकार की रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है।

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): यह सरकार के कुल खर्च और उसकी प्राप्तियों तथा गैर-ऋण पूँजी प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है। आय और खर्च के अंतर को दूर करने के लिए हर साल सरकार की ओर से लिया जाने वाला अतिरिक्त कर्ज राजकोषीय घाटा कहलाता है।

राजकोषीय नीति (Fiscal Policy): राजकोषीय नीति वह नीति है, जिसमें सरकार अपने व्यय तथा आय के कार्यक्रम को राष्ट्रीय आय, उत्पादन तथा रोजगार पर वांछित प्रभाव डालने और अवांछित प्रभावों को रोकने के लिए प्रयुक्त करती है।

वित्तीय वर्ष (Fiscal Year): वित्तीय वर्ष सरकार द्वारा लेखाँकन और बजट उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाने वाली अवधि है।

सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product): एक वर्ष के दौरान देश में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य है। इसमें बदलाव के आधार पर देश के आर्थिक विकास को मापा जाता है।

आयकर (Income Tax): यह प्रत्येक व्यक्ति की आय पर भारत सरकार द्वारा लगाया जाने वाला एक कर है। आयकर सरकारों के क्षेत्राधिकार के भीतर स्थित सभी संस्थाओं/व्यक्ति द्वारा उत्पन्न वित्तीय आय पर लागू होता है।

मुद्रास्फीति (Inflation): मुद्रास्फीति वस्तुओं और सेवाओं की सामान्य कीमत में वृद्धि है। मुद्रास्फीति को मुद्रा की क्रय शक्ति में गिरावट के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है।

संयुक्त खाता (Joint Account): एक ऐसा खाता, जो दो से अधिक विभाग/संस्था/लोग से संबंधित हो।

मैक्रो-इकोनॉमिक (Macro-Economic): इसमें अर्थशास्त्र में समस्त आर्थिक क्रियाओं का संपूर्ण रूप से अध्ययन किया जाता है। जैसे राष्ट्रीय आय, उत्पादन, रोजगार/बेरोजगारी, व्यापार चक्र, मुद्रा संकुचन, आर्थिक विकास, अंर्तराष्ट्रीय व्यापार, जैसी आर्थिक क्रियाएँ।

माइक्रो-इकोनॉमिक (Micro-Economic): यह शब्द अर्थशास्त्र के उस भाग से संबंधित है, जो व्यक्तिगत बाजारों, कीमतों, उद्योगों, मांग और आपूर्ति जैसे विषयों का अध्ययन करता है।

गैर-योजना व्यय (Non-plan expenditure): सरकार की कर्ज़ अदायगी, पेंशन भुगतान, राज्यों को किया जाने वाला वैधानिक अन्तरण, सुरक्षा, विदेशी मामलों, नोट-सिक्के बनाने, पूर्व निर्मित परिसम्पत्तियों का रख-रखाव, सामाजिक सुविधाओं को पूर्ववत रखने आदि पर किया जाने वाला व्यय ही गैर योजनागत व्यय है।

आउटकम बजट (Outcome Budget): इसका उद्देश्य जिम्मेदारी तय करना है। यानी किसी विभाग या मंत्रालय को आवंटित बजट और उससे निर्धारित व प्राप्त लक्ष्यों का लेखा-जोखा। इससे पता चलता है कि सरकार या कौन विभाग बजटीय अपेक्षाओं पर कितना खरा उतर रहा है।

योजना व्यय (Plan Expenditure): केंद्र सरकार कुल व्यय का एक महत्वपूर्ण अनुपात बनाती है। योजनागत व्यय विभिन्न मंत्रालयों और योजना आयोग द्वारा मिल कर बनाया जाता है। इसमें मोटे तौर पर वे सभी व्यय आते हैं, जो विभिन्न विभागों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर किया जाता है।

राजस्व (Revenue): सरकार द्वारा अपनी संप्रभु शक्तियों के तहत एकत्रित की गई वार्षिक आय ही राजस्व है।

कर राजस्व (Tax revenue): कोई सरकार टैक्स लगा कर जो रेवेन्यू हासिल करती है, उसे टैक्स रेवेन्यू कहा जाता है। सरकार विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाती है। यह सरकार की आय का प्राथमिक और प्रमुख स्रोत है।

मूल्य वर्धित कर (Value-Added Tax): कोई भी उत्पाद विभिन्न चरणों से होकर अंतिम उत्पाद के तौर पर मार्केट में पहुँचता है। ऐसे में उत्पाद के प्रथम चरण की लागत और अंतिम चरण की कीमत पर ही टैक्स लगाया जाता है। VAT से कमोडिटी टैक्स में पारदर्शिता आती है।

शून्य-आधारित बजट (Zero-based budgeting): इसके तहत किसी विभाग या संगठन द्वारा प्रस्तावित खर्च की हर मद को बिलकुल नई मद मानकार या उसका आधार शून्य मानते हुए फिर से मूल्याँकन किया जाता है।

पिया वही जो दुल्हन मन भाए

एक ऐसी बारात की कल्पना कीजिए जिसमें दूल्हा ना हो, दूल्हे के स्थान पर एक आश्वासन हो कि आप बस हाँ कीजिए, हम बढ़िया वाला ला कर देंगे। क्या दूल्हा पढ़ा लिखा, ईमानदार, नौकरीपेशा, पाँच अंकों में, सुंदर, सुशील, कॉन्वेंट एजुकेटेड और गृह कार्य में दक्ष है? उत्तर यह प्राप्त होता कि आप ब्याह तो कराएँ, दूल्हे के विषय में पता चलते ही सूचित किया जाएगा।

बिहार में नब्बे के दशक में पकड़ौआ विवाह की चर्चा हुई थी, आज हम बुझौआ विवाह की बात कर रहे हैं, जिसमें सुगढ़ वधू की भाँति मँडप में स्वप्न लिए बैठी कन्या को तो हम जानते हैं किंतु वर “बूझो तो जानें” “फास्टेस्ट एंड वाइलडेस्ट फ़िंगर फर्स्ट” तथा “बिग बॉस” विधि के द्वारा तय किया जाएगा। मुद्दा सिर्फ़ यह है कि सर्वप्रथम विजातीय विधर्मी प्रेम में पड़ी कन्या को प्रेमपाश से मुक्त किया जाए, फिर किसी के भी गले में डाल दिया जाए।

अब इस पारिवारिक सी भान होने वाली समस्या को राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर प्रक्षेपित करें और कल बंगाल में हुए विपक्षी सम्मेलन के परिपेक्ष्य में देखें। इस महासम्मेलन का मूलभाव संदेश जनता को यह था कि गोलमाल के भवानीशंकर के शब्दों में कहें तो- तुम्हारा विवाह उससे नहीं होगा जिससे तुम प्रेम करती हो, तुम्हारा विवाह उससे होगा जिससे मैं, यानी विपक्ष, प्रेम करता है। और ये भवानीशंकर से भी अधिक चंठ है कि जहाँ भवानीशंकर रामप्रसाद की ओर इंगित करते थे, यह रामसे के चलचित्र की भाँति दर्शक को सोच में छोड़ देते हैं कि क्या दस जनपथ की पुरानी हवेली का बूढ़ा चौकीदार ही प्रेत है जिससे कालांतर में अबोध कन्या के विवाह की प्रस्ताव है?

23 दलों के श्राद्धभोजन समान दिखने वाली सभा के सस्पेंस के मूल में निर्दोष दिशाहीनता नहीं है, बल्कि एक कुटिल गणित है। इसके मूल में संविधान-संगत सर्वोच्च प्रधानमंत्री पद के प्रति और मतदाता के विवेक के प्रति ठेठ निरादर का भाव है। इनका ध्येय वही सोनिया गाँधी और एनजीओ मंडल (यही वह अंडा था जिससे चुनाव दर चुनाव अंडे देने वाली मुर्गी का जन्म हुआ था) वाला मॉडल है, जिसमें प्रधानमंत्री का महत्व फ़ाइलों पर पार्टी अध्यक्ष द्वारा क्लीयर की गई फ़ाइलों पर तितली बिठाने से अधिक नहीं है। इस मॉडल में प्रधानमंत्री की जवाबदेही जनता के प्रति नहीं पार्टी अध्यक्ष के प्रति होती है, क्योंकि वह निर्वाचित ना होकर चयनित प्रधानमंत्री होता है।

मज़े की बात यह है कि जो लोग संविधान को लेकर सबसे अधिक चिंतित होते है, उन्हें इस पर चिंता नहीं होती है कि संविधान में क्या परिभाषित है, पर वह इस पर त्योहार मना रहे हैं कि विपक्ष उस के आधार पर राजनीति बना रहा है जो परिभाषित नही है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री के रूप में सरकारी भाषा में कहे तो लोअर डिविज़न क्लर्क बिठाने के बाद विपक्ष अब केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में अपर डिविज़न क्लर्क नियुक्त करना चाहता है। इसका कारण सिर्फ़ यह नहीं है कि विपक्ष अपने इतिहास और वर्तमान के प्रकाश में नरेंद्र मोदी के समक्ष खड़ा करने के लिए समकक्ष नेता नही ढूँढ पा रहा है जो कि सर्वमान्य हो क्योंकि यह संगठन महात्वकांक्षा प्रचुर है। इसका कारण यह है कि यह ऐसे दलो का गठबंधन है जो राष्ट्रीय आकांक्षाओं से इतर छोटे समूहों के छोटे स्वार्थों के ऊपर खड़ा है।

इस स्वार्थ पर आधारित समूह के अपने सिद्धांत एक दूसरे को काटते हैं। जैसे तृणमूल कॉन्ग्रेस का बंगालीवाद राष्ट्रीय भाव के विरूद्ध है मानो सारा भारत (जिसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक भी है) उसे लीलने आ रहा है; वहीं तमिलनाडु का डीएमके शेष भारत को शत्रु बता कर स्वार्थ सिद्ध करता है।

मायावती अपने उस वोट बैंक पर निर्भर है जो तिलक तराजू और तलवार को जूते चार मारने की इच्छा रखती है विकास और शिक्षा की नहीं, तेजस्वी यादव का दल भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ़ करना चाहता है। इनके छोटे-छोटे गिरोहों का स्वार्थ दूसरे गिरोहों के विनाश पर अधिक और अपने विकास पर कम आधारित होता है। सो इनके लिए अपने सीमित वोटबैंक के पास जा कर गठबंधन के लिए मत माँगना कठिन है क्योंकि जहाँ उसमें भारत विरोधी नेशनल कॉन्फ्रेंस है, यादव विरोधी मायावती हैं, मायावती विरोधी अखिलेश हैं, उत्तर विरोधी दक्षिण में सीमित डीएमके है, उत्तर भारत तक सीमित दल राजद- बसपा -सपा हैं, आरक्षण विरोधी हार्दिक है, आरक्षण समर्थक जिग्नेश मेवानी हैं, कॉन्ग्रेस विरोधी केजरीवाल है, और स्वयं कॉन्ग्रेस है। कुल मिला कर यह गठबंधन ऐसे विरोधाभासों से भरा है कि इसे चुनाव पूर्व स्थापित कर के वोट बैंक के पास जाने से स्वार्थ-सम्मत वोट बैंक छितर जाने का भय इन घाघ राजनेताओं को भी है।

अत: नेतृत्वविहीन और नीतिविहीन हो कर मतदाता के पास जाना इनकी अपरिहार्य नियति है। एक भ्रामक संरचना और संवाद इस गठबंधन की सोची-समझी साज़िश है कि कोई कल को चेन्नई में स्तालिन से ना पूछे कि क्या हिंदीभाषी अखिलेश हमें निगल जाएगा, कोलकाता के हिंदू ममता से यह ना पूछें कि क्या फ़ारूख अब्दुल्ला कश्मीरी पंडित मॉडल बंगाल में लागू कर के आज़ादी दिलाएँगे, दिल्ली में केजरीवाल से यह प्रश्न ना पूछा जाए कि कॉन्ग्रेसियों के भ्रष्टाचार की बहुप्रचारित 370 पन्ने की किताब में क्या अगला नाम स्वयं उनके हैं। यह कुटिल राजनीति है। प्रत्येक दल की अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा अलग समस्या है।

कुल मिला कर यह गठबंधन मतदाताओं को मोदी के विरोध में मत डालने को कहता है किंतु यह नहीं बताता कि मत किसके पक्ष में डालना है। यह वो बारात है जिसका हर बाराती स्वयं को दूल्हा मान कर आया है ताकि वधू प्रेमी को प्रेमपाश से मुक्त किया जा सके और वधू दूल्हों की भीड़ में जयमाल थामें किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी है।

कौन बनेगा PM और कैबिनेट में होगा कौन… चुनने का आख़िरी मौक़ा सिर्फ़ यहाँ!

तारीख़ – 27 मई
साल – 2019
दिन – सोमवार

पंचांग देखेंगे तो तो इस दिन में अशुभ काल शुभ समय पर भारी है। लेकिन सोमवार तो भोलेनाथ का दिन है। और बंदा ठहरा महाकाल का भक्त – एकदम औघड़। कसौल वाली हाई क्वॉलिटी माल का अखण्ड धुआँ छोड़ते हुए चिल्लाया – ‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का, काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।’

औघड़ कौन? वही, जिसने महागठबंधन को बाँध कर रखने वाली बूटी दी। जो अलीगढ़ के वशीकरण और #@$करणी वाले बाबाओं का बाबा है। हाँ, हाँ… भगंदर-फिशर शाही दवाखाना वाला! अब इनकी बूटी तो काम आनी ही थी। सो आ गई।

चारों ओर जीत का शंखनाद फूँका जा रहा है। देश को ‘संघी-सांप्रदायिक’ ताक़तों से छुटकारा मिल गया है। समाजवाद-लालवाद-बेटावाद-दाढ़ीवाद से लेकर दीदी-बुआवाद सब मिलकर अब माल-वाद की मलाई खाएँगे।

लेकिन कौन कितना खाएगा? इस समस्या के समाधान के लिए 48 साल के चिर-युवा नेता राहुल गाँधी जी ने ऑपइंडिया को अपना पार्टनर चुना है। वो क्या है कि उनका शक्ति ऐप छोटा भीम लेकर भाग गया है। ख़ैर! हम उनको देंगे समाधान, लेकिन माध्यम होंगे आप। क्योंकि राहुल जी को ‘लोकतंत्र’ में है विश्वास! और कैबिनेट भी वो ‘लोकतांत्रिक’ तरीके से ही चुनेंगे। तो शुरू करते हैं पहले सवाल से…


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अब ज़रा इनके प्रोफ़ाइल को भी देख लें। देश वाली बात है, ग़लती की कोई गुंजाइश नहीं।

राहुल गाँधी – ‘गिनीज़ बुक’ में दर्ज़ महाकाल के सबसे असली वाले भक्त। कैलाश पर्वत को 2 दिन में नाप देने वाला ‘पैर’बली। पिछत्तीस से एक ज़्यादा राज्य के अकेले राजकुमार। PM जैसा देखने में लगने वाला अखण्ड भारत का अकेला चेहरा।

ममता बनर्जी – माँ, माटी, मानुष को लाल सलाम से ‘मुक्ति’ दिलाने वाली क्रांति की मसीहा। यह अगर राजनीति में नहीं आतीं तो वेस्ट बंगाल में कुछ भी ‘बेस्ट’ नहीं होता। दुर्गा पूजा पंडालों पर इनके काम को देखकर यूनाइटेड नेशन्स ने इन्हें ‘धरोहर’ की संज्ञा दी है।

मायावती – हाथियों का कष्ट इनसे देखा नहीं जाता। जंगल में उन्हें ठंड न लगे, इस कारण से उनके लिए पार्क बनवा दिया। अब सब हाथी बड़े मज़े में वहाँ खड़े रहते हैं। अपने जन्मदिन पर खुद केक न खाकर भूखे-नंगों को खिलाने की वज़ह से यह कलियुग की ‘लेडी कर्ण’ हैं।

अखिलेश – युवा हैं। लोग इन्हें प्यार से भैया कहते हैं। और डिंपल जी को ‘भाभी’। डिंपल जी इनकी धर्मपत्नी हैं। अपने पिताजी की ‘असाध्य सेवा’ करने के कारण राजनीति के गलियारों में इन्हें श्रवण कुमार कहा जाने लगा है।


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एमके स्टालिन – नाम से ही भारी-भरकम लगते हैं। दुश्मन देश पहले से ही डर जाएगा। भ्रष्टाचार इनके परिवार को ‘छू’ तक नहीं पाया है।

फ़ारुक़ अब्दुल्ला – सीमांत प्रदेश से आते हैं। मतलब भारत की रक्षा करना इनके ख़ून में है। जम्मू-कश्मीर अगर आज ‘स्वर्ग’ है, तो इनके परिवार की ही बदौलत।

शत्रुघ्न सिन्हा – ख़ैर… इनका तो नाम ही शॉटगन है। अपने-आप में रक्षा-सुरक्षा कवच। इनका ‘ख़ामोश’ बोलना और बॉर्डर का सिक्यॉर होना – आधुनिक हिन्दी व्याकरण में पर्यायवाची के तौर पर संकलित कर लिया गया है।


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जयंत चौधरी – लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनमिक्स से पढ़े हैं। लेकिन ‘बात’ खेती-किसानी की करते हैं। इनके पापा अजित सिंह भी खुद को ‘किसानों’ का ही नेता मानते हैं।

शरद पवार – बाप रे! हम-आप जो चीनी खाते-पीते हैं, वो इनकी ही देन है। जैसे हम माँ का कर्ज़, दूध का कर्ज़ नहीं चुका सकते, ठीक उसी तरह पवार साब की ‘चीनी का कर्ज़’ शायद ही कभी चुकाया जा सके।

एचडी देवगौड़ा – अब ये तो पीएम भी रह चुके हैं – 325 दिन तक। किसान-पुत्र हैं। फ़िलहाल बेटे के ग़म में डूबे रहते हैं। सुना है इनका बेटा ‘क्लर्क’ है।


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तेजस्वी यादव – अखण्ड भारत के इतिहास में सबसे ‘ऊँची 9वीं कक्षा’ तक शिक्षा ग्रहण की। मतलब ये जहाँ खड़े होते हैं, शिक्षा वहीं से शुरू होती है। इनके पप्पा का नाम लालू यादव है। विपक्ष की ‘साज़िश’ के कारण जेल में हैं। वैसे शोले वाली मौसी बता के गईं हैं कि सीधे आदमी हैं।

हार्दिक पटेल – युवा दिलों की धड़कन हैं। शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों से इतना लगाव कि दो बार में ग्रैजुएशन पास किया। नंबर 50 फ़ीसदी से कम ही आए, लेकिन वो विपक्ष की ‘साज़िश’ थी।

हेमंत सोरेन – भारत के सबसे यंग मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड रखते हैं… और क्या चाहिए भाई! वैसे इंटरमीडिएट तक पढ़े हैं। उसके बाद पूरी जवानी ‘राज्य-हित’ में झोंक दी।


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शशि थरूर – इनके बाल बहुत सिल्की हैं। फांय-फांय अंग्रेज़ी बोलते हैं। मतलब महिलाओं को अच्छे लगते हैं। और हाँ… महिलाओं का कल्याण तो छोड़िए, उन्हें मोक्ष दिलाने को ये किसी भी ‘हद’ तक चले जाते हैं।

ममता बनर्जी और मायावती के प्रोफ़ाइल को दोबारा पढ़ने की हिम्मत रखने वाले ‘वीर’ कृपया ऊपर जाकर पढ़ें।


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(Error-404… के कारण सभी विकल्प राहुल गाँधी को ही दिखा रहा है। वित्त का प्रभार सिर्फ़ गाँधी फैमिली के पास हो, कम्प्यूटर जी ऐसी मंशा नहीं है।)

PS: सभी प्रश्नों में राहुल गाँधी जी को विकल्प के तौर पर रखने का मक़सद उस पद की गरिमा को कम आँकना नहीं है बल्कि यह दर्शाता है कि गाँधी की जेनेटिक्स के कारण उनमें वो सभी गुण हैं, जो किसी भी पद के लिए फिट है। मतलब गाँधी से पद है, पद से गाँधी नहीं।

आख़िर क्या कारण है कि ‘लेफ़्ट’ इतना बलवान और ‘राइट’ इतना कमज़ोर?

एक राइट विंग मीडिया में काम करते समय मैं नियमित रूप से ‘ऑप इंडिया’ की पाठक हुआ करती थी और आज भी हूँ। “राइट” के संपर्क में आने के बाद मुझे धीरे-धीरे लेफ़्ट और राइट विंग मीडिया के बीच अंतर का आभास भी हुआ। पत्रकारिता में डिग्री पाते समय हमें इतना ज्ञान नहीं था कि देश की पत्रकारिता इस हद तक गिर चुकी होगी। हमें लगता था कि पत्रकारिता से हम समाज को बदल सकते हैं। हमारे कलम में तलवार से भी ज़्यादा ताक़त है और हम बिना रक्त बहाए बदलाव लाएँगे।

संविधान के चार अंगों में से एक अंग है पत्रकारिता। हम इस अंग पर आँख मूंद कर विश्वास किया करते थे। हमें यह पता ही नहीं चला कि जिस तरह वामपंथियों ने देश की शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को ही खोखला कर दिया है, उसी प्रकार पत्रकारिता को भी खोखला कर दिया होगा। पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों? क्यों मीडिया में सत्य से परे एक तरफ़ा समाचार दिखाया जा रहा था? क्यों देश विरोधी अजेंडा चलाया जा रहा था?

पिछले एक वर्ष में मुझे मेरे सारे सवालों का जवाब मिल गया है। केवल भारत में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में लेफ़्ट और राइट के बीच में संघर्ष चल रहा है। अपने झूठ के जंजाल और उसके माध्यम से वामपंथी विचारधारा लोगों के मस्तिष्क में घर कर चुकी है। चार साल पहले भारत में राइट विंग का अस्तित्व ना के बराबर था। आज ऐसा नहीं है। राइट विंग मीडिया देश में अपना अस्तित्व क़ायम कर चुका है। पत्रकारिता को बेचने वाले वामपंथियों के झूठ से त्रस्त होकर लोग अब राइट की ओर रुख़ कर रहे हैं। यह और बात है कि सत्य के साथ खड़े होने के कारण राइट विंग को बड़ी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ रहा है। लेकिन बिना संघर्ष के सफलता प्राप्त भी कहाँ होती!

पिछले एक साल में राइट विंग के लिए काम करते समय एक बात मैंने जाना कि लेफ़्ट बहुत बलवान है और राइट बहुत कमज़ोर। लेफ़्ट इसलिए बलवान नहीं है कि उसके पास पैसा है। लेफ़्ट इसलिए भी बलवान नहीं है कि उसके पीछे विदेशी ताकते हैं। बल्कि लेफ़्ट इसलिए बलवान है क्योंकि उनमें एकता है। जैसे मुहल्ले के सारे कुत्ते एक साथ, एक सुर में भौंक कर अपने विरोधी को भगाते हैं, उसी प्रकार ये सारे वामपंथी विचारधारा वाले एक साथ, एक ही सुर में गाते हैं। आपसी मतभेद को वो जगज़ाहिर नहीं करते। बल्कि एक साथ वे अपने विरोधियों पर टूट पड़ते हैं और विरोधियों को कमज़ोर करते हैं।

हम हज़ारों वर्ष पूर्व जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। राइट वाले आपस में ही लड़ते हैं। हमें यह आभास ही नहीं है कि जब मुट्ठी बंद होती है, तभी शत्रु के मुँह पर मुक्का मारा जा सकता है। राइट विंग मीडिया भी कुछ ऐसे ही बिखरा हुआ है। लेफ़्ट की तरह ‘कोरस’ में गाना हमें नहीं आता, इसलिए हमारी आवाज़ लोगों के कानों के परदे फाड़ने में असमर्थ रहती है। जब तक राइट विंग मीडिया एक ‘सुर में गाने’ का अभ्यास नहीं करेगी, तब तक राइट की आवाज़ लोगों तक नहीं पहुँचेगी। हम सभी जानते हैं कि ‘एकता में बल है’… पर अफ़सोस, कभी एकता दिखाते नहीं हैं! अब शायद वक़्त आ गया है!

मुंबई से मेडिकल साइंस की एक ख़बर और महर्षि दधीचि के बलिदान की महान गाथा

युगद्रष्टा वाजपेयी की कविता

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लिखित ये पंक्तियाँ सिर्फ़ एक कपोल-कल्पना नहीं है। ये देश के युवाओं से एक निवेदन भर नहीं है। और न ही ये आजकल की इंटरनेट पर वायरल होती साधारण कविताओं की पंक्तियाँ हैं। वाजपेयी की ये पंक्तियाँ आजकल के युवाओं को भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना से प्रेरणा लेने को कहती है, जिसका आज कोई साक्ष्य भले ही उपलब्ध न हो, लेकिन जिसकी कहनियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी होते-होते हम तक यूँ पहुँची है, जैसे रामायण और महाभारत।

वाजपेयी यहाँ जिस कहानी को प्रेरणा के रूप में पेश कर रहे हैं, वो बलिदान की वो महान गाथा है, जिसका न कभी कोई सानी था और न होगा। आज संस्थाओं द्वारा ‘नेत्रदान’ के लिए अभियान चलाया जाता है। अमिताभ बच्चन तक इसके लिए अपील करते हैं। अंगदान का अपना एक विशेष महत्व है। जो अंगदान करते हैं, उन्हें महादानी की श्रेणी में रखा जाता है। कई विभूतियों ने अपने शरीर तक का दान किया है। मृत्योपरांत उनके शरीर का मेडिकल शोध जैसे कार्यों में उपयोग किया जाता है। ऐसे में यह जान कर आश्चर्य होता है कि अंगदान की परिकल्पना भारतीय धरती पर तभी अस्तित्व में आ गई थी, जब भारत ऋषि-मुनियों की भूमि हुआ करती थी। जब जम्बूद्वीप मनीषियों की तपस्या का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता था, जब इंसान देवी-देवताओं तक को इस धरती पर आने को विवश कर देता था।

बांद्रा के शिक्षक, जिन्होंने मरने के बाद बचाई कई ज़िंदगियाँ

अभी एक ऐसी घटना हुई, जिस ने हमारे उस इतिहास को पुनर्जीवित कर दिया, उसे फिर से स्मरण करने और कराने को विवश कर दिया। दरअसल, ये घटना बांद्रा के BMC विद्यालय में पढ़ाने वाले एक शिक्षक से जुड़ी है, जो मरते-मरते भी कइयों को जीवनदान दे गए। 44 वर्षीय राजेश गांघव गुरुवार (जनवरी 17, 2019) को अचेत होकर गिर पड़े। इस कारण उनके सर में गहरी चोट लगी। उनके परिवार वाले उन्हें लेकर नवीं मुंबई स्थित अपोलो हॉस्पिटल में गए, जहाँ पता चला कि वो इंटरकॉर्निअल हेमरेज से जूझ रहे हैं।

लाख इलाज़ के बावज़ूद उन्हें ठीक नहीं किया जा सका और क्लिनिकल प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। वो अपने पीछे अपनी पत्नी और पाँच वर्षीय बेटी को छोड़ गए, जिन्होंने उनके अंग दान करने का निर्णय लिया। उनके परिवार ने स्वर्गीय राजेश की हड्डियों के अलावे अन्य अंगों का भी दान करने का निर्णय लिया। बहुत कम लोग इस प्रकार का निर्णय ले पाते हैं और राजेश की पत्नी ने यह दिखा दिया कि एक महिला के दिल में जितनी ममता होती है, उतना ही साहस और सामर्थ्य भी होता है।

राजेश की हड्डियों को टाटा मेमोरियल हॉस्टिपल में भेज दिया गया, जहाँ उनका उपयोग बोन कैंसर से पीड़ित मरीजों को नई ज़िंदगी देने के लिए किया जाएगा। राजेश के दिल और लिवर को भी दान कर दिया गया, जिस से दो लोगों को नई ज़िंदगी मिली। उनका दिल अब एक ऐसे व्यक्ति के अंदर धड़क रहा है, जो कभी फोर्टिस हॉस्पिटल में मौत से जूझ रहा था। वहीं उनके लिवर को अपोलो हॉस्पिटल में ही एक 46 वर्षीय मरीज को ट्रांसप्लांट किया गया। उनकी स्किन को मसिना हॉस्पिटल भेजा गया है, जहाँ ये किसी अन्य मरीज के काम आएंगे। उनके परिवार ने उनका नेत्रदान का भी फ़ैसला लिया और उनके कॉर्निया को लक्ष्मी आई बैंक (Lakshmi Eye Bank) भेज दिया गया।

राजेश तो दुनिया में नहीं रहे लेकिन मरते-मरते जितने लोगों को ज़िंदगी दे गए, उसके लिए पूरी मानवता उनकी और उनके परिवार की ऋणी रहेगी। उनकी पत्नी ने एक ऐसी मिशाल कायम की, जो हमें महर्षि दधीचि की याद दिलाती है। जो यह दिखाती है कि मानव जाति के उद्धार के लिए जब-जब बलिदान की आवश्यकता पड़ी है, भारत की धरती पर ऐसे वीरों ने जन्म लिया है- जिन्होंने बिना किसी हथियार के उपयोग के मानवता को बचाने के लिए महादान दिया है। ऋषि दधीचि ने भी एक समय ऐसे ही अपनी हड्डियाँ दान कर दी थीं ताकि एक ऐसे राक्षस का वध किया जा सके, जो मानव ही नहीं बल्कि देवी-देवताओं के अस्तित्व के लिए भी संकट बन खड़ा हुआ था।

कौन थे महर्षि दधीचि?

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में दाधीच ब्राह्मण रहते हैं, जो ब्राह्मण समाज का ही एक अंग है। कई सामाजिक आयोजनों और दधीचि जयंती पर सामाजिक कार्यों के लिए कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रसिद्ध दाधीच समाज के लोग अपने-आप को महर्षि दधीचि का वंशज मानते हैं। आज जब भारत में हर साल 5 लाख लोग सिर्फ इसीलिए मर जाते हैं क्योंकि उन्हें समय पर ऑर्गन नहीं मिल पाता, महर्षि दधीचि की प्रेरणादायी कहानी का स्मरण करने का यह बिलकुल सही समय है। वार्षिक आंकड़ों की बात करें तो अंगदान के मामले में भारत दुनिया के कई देशों से काफ़ी पीछे है। 2013 के आंकड़ों के अनुसार 20 लाख लोगों में सिर्फ एक भारतीय ने अंगदान किया। इस मामले में क्रोएशिया और स्पेन जैसे देश भारत से काफ़ी आगे हैं।

ब्रह्मविद्या सारे विद्याओं में सबसे दुर्लभ है और इसका अभ्यास करने वाले बहुत कम लोग हुए हैं। हिंदुत्व के अलावे बाकी के पंथ और धर्म की पवित्र पुस्तकों में भी इस विद्या का किसी न किसी रूप में जिक्र है और इसके अभ्यास करने के तरीके बतलाए गए हैं। दधीचि इस विद्या के प्रमुख उपासकों में से एक थे और ये इतनी दुर्लभ विद्या है कि देवराज इंद्र तक इसे सीखने को व्याकुल थे। उन्होंने दधीचि से इसके लिए निवेदन भी किया लेकिन महर्षि ये मानते थे कि देवराज इसके योग्य नहीं हैं और उन्होंने उन्हें ये विद्या सिखाने से इनकार कर दिया। गुस्साए देवराज ने यह प्रण किया कि अगर ये विद्या उन्हें नहीं मिली तो वह किसी और को भी नहीं सीखने देंगे।

इंद्र ने शपथ ली कि अगर दधीचि ने ब्रह्मविद्या, जिसे मधुविद्या भी कहा जाता था, किसी और को सिखाई तो वो उनका सर धड़ से अलग कर देंगे। अश्विनीकुमार ने दधीचि से यह विद्या सीखी और उन्हें इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए एक योजना तैयार की। उन्होंने महर्षि के सर को धड़ से अलग कर दिया और उसकी जगह घोड़े का सर लगा दिया। इसी कारण उन्हें अश्वसिर के नाम से भी जाना गया। मेडिकल और आयुर्वेद की कई पुस्तकों में अश्विनीकुमार का जिक्र मिलता है। उन्होंने दधीचि के कटे हुए सर को आयुर्वेद का उपयोग कर कहीं संभाल कर रख दिया। हालाँकि इस बात से गुस्साए इंद्र ने दधीचि के घोड़े वाले सर को काट डाला, जिसके बाद अश्विनीकुमार ने फिर से उनके असली सर को उनके धड़ पर स्थापित कर दिया।

वृत्रासुर वध और दधीचि का महा बलिदान

वृत्रासुर एक ऐसा राक्षस हुआ, जिसने पूरे विश्व से जीवन का अंत करने के लिए एक ऐसी योजना तैयार की, जिस से मानव तो मानव, देवताओं तक में खलबली मच गई। उसने समस्त ब्रह्माण्ड के जलस्रोतों को अपने आधीन करना शुरू कर दिया ताकि जीव-जंतु पानी के बिना तड़प-तड़प कर मर जाएँ। देवेश इंद्र को स्वर्गलोक से बचाने के पश्चात उसने सम्पूर्ण मानवता का अस्तित्व ख़त्म करने की ठान ली। ऐसे में इंद्र भगवान विष्णु के पास गए लेकिन उन्होंने कहा कि इस समस्या का हल ऋषि दधीचि ही निकाल सकते हैं क्योंकि यह राक्षस उन्हीं की हड्डियों द्वारा निर्मित अस्त्र से मरेगा। अब देवराज के पास कोई अन्य उपाय न बचा था।

इंद्र यह सोच रहे थे कि जिस दधीचि को उन्होंने डराया-धमकाया था, अपमानित किया था और यहाँ तक की सर भी काट डाला था- क्या वही ऋषि उन्हें बचाने के लिए अपने शरीर का बलिदान देंगे? ग्लानि से भरे इंद्र ने दधीचि से इसके लिए निवेदन किया। कभी इंद्र को ब्रह्मविद्या सिखाने से मना करने वाले दधीचि उन्हें अपनी हड्डियाँ देने को सहर्ष तैयार हो गए। इसके बाद महर्षि ने जो किया, वो भारतीय मनीषियों के स्नेह और करुणा भरे कृत्य की अमर निशानी बन गई। उन्होंने अपने प्राण त्यागने से पहले विश्व के समस्त तीर्थों की यात्रा करने की शर्त रखी, जिसे इंद्र ने पूरा किया।

ये कहानी अब हमें सीतापुर से कुछ दूर स्थित नरसिम्हारण्य ले जाती है। वहाँ स्थित मंदिर इस बात की गवाही देता है कि देवराज इंद्र ने तीनों लोकों के तीर्थ का जल यहाँ पर सिर्फ़ इसीलिए मंगाया ताकि शरीर त्यागने से पहले महर्षि दधीचि इन सबका दर्शन कर सकें। दर्शनोपरांत महर्षि ध्यानमग्न हो गए और उन्होंने गहन समाधि लगा कर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद कामधेनु गाय ने एक अन्य विद्या का प्रयोग कर उनके शरीर से उनकी हड्डियों को अलग किया, जिसके प्रयोग से देवताओं ने कई अस्त्र तैयार किए। उन्हीं हड्डियों से इंद्र का वज्र भी बना, जिस से अंततः वृत्रासुर का वध किया गया।

हमारे योगदान का श्रेय कभी तो मिलेगा हमें

ये कहानी काफ़ी-कुछ कहती है। हजारों-लाखों साल पहले इंसान की मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों को अलग करने की प्रक्रिया की परिकल्पना यह बतलाती है कि आधुनिक सोच और मानवता की रक्षा के लिए बलिदान के मामले में भारत की धरती सर्वोपरि रही है। भले ही इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आज मौज़ूद नहीं हो, भले ही कई लोगों के लिए ये सिर्फ़ एक कपोल-कल्पना हो, भले ही रामायण और महभारत तक को फिक्शन वाले उपन्यास की श्रेणी में रखने वालों के लिए ये सिर्फ़ बच्चों के मनोरंजन की कथाएँ हों- लेकिन इस कहानी से जो प्रेरणा मिलती है, इसके पीछे के महातम्य का जो उद्देश्य मिलता है, हजारों साल पुरानी पुस्तकों में जो इसका वर्णन मिलता है- वो यह बताने के लिए काफ़ी है कि अगंदान की परिकल्पना यहाँ हजारों साल पहले की गई थी।

तभी अटल बिहारी वाजपेयी युवाओं को प्रेरणा देने के लिए दधीचि का नाम लेते हैं। तभी बांद्रा के राजेश की कहानी हमें दधीचि की याद दिलाती है, तभी जब हम ऑर्गन की कमी से एक साल में 5 लाख लोगों के मरने की ख़बरें पढ़ते हैं तो हमें दधीचि की प्राचीन, पुरातन और वैदिक कहानी अनायास ही याद आ जाती है। अभी हाल ही में कोलोम्बिया यूनिवर्सिटी ने माना है कि सर्जरी के जनक शुश्रुत थे और हजारों साल पहले भारत में इसकी प्रक्रिया का वर्णन किया गया और इसका इस्तेमाल दुनिया भर के डॉक्टर और अस्पताल कर रहे हैं।

एक ऐसा समय आएगा, जब परत दर परत पुरातन भारतीय तकनीक की खोज होगी, हमारी धरती को इसका श्रेया मिलेगा और इसके लिए प्रयास किए जाएँगे। इसी इन्तजार में स्वर्गीय राजेश और उनके जैसे लोगों और उनके परिवारों को धन्यवाद करते हुए, उनके कभी न चुका पाने वाले ऋण के लिए, हम सम्पूर्ण मानवता की तरफ से उन्हें धन्यवाद करते हैं और कामना करते हैं कि दधीचि की कहानी ऐसे ही प्रेरणा देती रहे।

MP में एक और BJP नेता की हत्या, प्लानिंग और साज़िश की बू

मध्य प्रदेश में एक और बीजेपी नेता की हत्या की कर दी गई है। मध्य प्रदेश के बरवानी ज़िले के बलवाड़ी-सेंधवा रोड पर बीजेपी नेता मनोज ठाकरे का शव मिला। सूचना मिलने पर पुलिस द्वारा घटना स्थल को सील कर दिया गया और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस के अनुसार ठाकरे के सिर को पत्थर से कुचला गया है।

बीजेपी मंडल अध्यक्ष मनोज ठाकरे की हत्या को उस समय अंजाम दिया गया, जब वो मॉर्निंग वॉक पर निकले थे। पुलिय द्वारा यह कयास लगाया जा रहा है कि हत्यारे पहले से ही उनके लिए घात लगाए बैठे थे।

भाजपा मंडल अध्यक्ष की इस बर्बर तरह से की गई हत्या के बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोष का माहौल है। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने मनोज ठाकरे की हत्या के बाद वहाँ जमकर नारेबाजी की। फ़िलहाल पुलिस मामले की जाँच में जुटी हुई है, जिससे हत्या के कारणों का पता लगाया जा सके।

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में इससे पहले भी हत्या की ऐसी ही घटना हो चुकी है। कुछ दिनों पहले बीजेपी नेता प्रहलाद बंधवार की भी अज्ञात मोटरसाइकिल सवारों ने सिर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। प्रहलाद मंदसौर नगर पालिका के अध्यक्ष थे। पुलिस के अनुसार उनकी हत्या करने के पीछे ज़मीनी विवाद की बात सामने आई थी।

सबरीमाला साइड इफ़ेक्ट: ‘अन्य मंदिरों पर भी थोपा जा सकता है संवैधानिक नैतिकता का तर्क’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने कहा है कि जैसा सबरीमाला में किया गया, वैसा देश के अन्य मंदिरों में भी किया जा सकता है। संघ ने इस बात का डर जताया कि सबरीमाला की तरह ही देश के अन्य मंदिरों की अद्वितीय पूजा पद्धतियों को निशाना बनाने के लिए उन पर भी संवैधानिक नैतिकता के तर्क थोपे जा सकते हैं। ‘Citizens Meet to Save Sabarimala Traditions’ कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता जे नंदकुमार ने ये बातें कहीं।

प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक नंदकुमार ने कहा कि अगर इस साजिश को सीमा से परे ले जाया गया तो देश के अन्य मंदिर और उनकी पूजा प्रणाली भी इस से अछूते नहीं रहेंगे। उन्होंने दावा किया कि सबरीमाला मंदिर को लगातार निशाना बनाए जाने के पीछे बहुत बड़ी साज़िश है। इस बारे में आगे बात करते हुए उन्होंने कहा:

“सबरीमाला मंदिर के मार्ग पर एक हवाई अड्डा बनाने की योजना है (सरकार की) और ये तभी लाभप्रद होगी जब मंदिर को साल के सभी 365 दिन खुला रखा जाए। इसीलिए मंदिर को एक तीर्थस्थल के बजाय बस एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के प्रयास चल रहे हैं। इस साज़िश के पीछे जो भी लोग शामिल हैं, धीरे-धीरे उन सबका खुलासा होगा।”

बता दें कि सबरीमाला मंदिर को साल में कभी-कभार ही खोला जाता है और इसके लिए अवधि निर्धारित रहती है। मंदिर को वार्षिक तीर्थयात्रा, मलयाली नववर्ष और कुछ उत्सवों के दौरान ही खोला जाता है। नंदकुमार ने आरोप लगाया कि सरकार इसे सालों भर खोले रखने के लिए श्रद्धालुओं पर अत्याचार कर रही है।

ज्ञात हो कि प्रज्ञा प्रवाह RSS की एक संस्था है। इसकी शुरुआत सुदर्शन, दत्तोपंत ठेंगड़ी, पी. परमेश्वरन ने मिलकर की थी। यह बुद्धिजीवियों का एक संगठन है, जो बुद्धिजीवी वर्ग में संघ की पैठ मज़बूत करने का काम करता है। बुद्धिजीवी वर्ग में लेफ्ट की पकड़ को देखते हुए संघ ने अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख रहे जे नंदकुमार को मार्च 2017 में प्रज्ञा प्रवाह का अखिल भारतीय संयोजक बनाया था। नंदकुमार केरल के हैं। लेफ्ट को काउंटर करने की उनकी रणनीति को देखते हुए संघ ने उन्हें दिल्ली बुला कर यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी थी।

सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले नंदकुमार ने सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस इंदु मल्होत्रा द्वारा उठाए गए सवालों की महत्ता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट 4-1 के बहुमत से दिए गए अपने इस निर्णय की समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, तब जरूर इस पर कोई सकारात्मक फैसला लिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जब सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 उम्र तक की महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त दी थी, तब पाँच जजों की पीठ में जस्टिस इंदु मल्होत्रा एकमात्र ऐसी जज थीं, जिनकी राय बाकी चारों जजों से अलग थी। जस्टिस मल्होत्रा ने कहा था कि धार्मिक परंपराओं में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर किसी को किसी धार्मिक प्रथा में भरोसा है, तो उसका सम्मान होना चाहिए, क्योंकि ये प्रथाएं संविधान से संरक्षित हैं। जस्टिस मल्होत्रा ने कहा था की कोर्ट का काम प्रथाओं को रद्द करना नहीं है

जे नंदकुमार ने जस्टिस मल्होत्रा की इसी राय को लेकर आशा जताया कि कोर्ट इस मामले में आगे श्रद्धालुओं की भावनाओं के अनुकूल निर्णय लेगा। इसके अलावा उन्होंने अपनी प्रथा की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरे श्रद्धालुओं पर क्रूरता दिखाने के लिए केरल पुलिस की निंदा की। उन्होंने दावा किया कि 10,000 से भी अधिक आम लोगों को केरल पुलिस ने गलत केस दर्ज कर फँसाया है।

ज़ाकिर नाइक पर कसा ED का शिकंजा, ₹16 करोड़ की संपत्ति जब्त

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ज़ाकिर नाइक पर अपना शिकंजा और मजबूत कर लिया है। मनी लॉन्डरिंग एक्ट के तहत एजेंसी ने इस्लामिक उपदेशक की ₹16 करोड़ की संपत्ति ज़ब्त कर ली। शनिवार (जनवरी 19, 2019) को इस बात की जानकारी देते हुए एजेंसी ने कहा कि पुणे और मुंबई में ज़ाकिर नाइक के परिवार के नाम पर रजिस्टर्ड सम्पत्तियों को ज़ब्त करने के लिए प्रॉवीजनल ऑर्डर जारी किया गया है। ज़ाकिर नाइक पर 2016 में युवाओं को बरगला कर आतंकी गतिविधियों की तरफ़ ले जाने के आरोप भी लग चुके हैं।

बता दें कि अभी विवादित इस्लामिक उपदेशक मलेशिया में रह रहा है और भारत ने उसके प्रत्यर्पण की अपील भी की है। ED ने नाइक की जिन अचल सम्पत्तियों को अपने शिकंजे में लिया है, उनमे मुंबई में फातिमा हाइट्स और आफियाह हाइट्स, मुंबई के ही भांडूप में स्थित एक अनाम संपत्ति और पुणे में अंग्रेशिया नामक संपत्ति शामिल है। ED ने ज़ाकिर नाइक पर ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों के रोकथाम अधिनियम के तहत मामला दर्ज़ कर आगे की करवाई भी शुरू कर दी है। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए ED ने बताया:

“धन की उत्पत्ति और संपत्तियों के वास्तविक स्वामित्व को छिपाने के लिए, नाइक के बैंक खाते से किए गए प्रारंभिक भुगतानों को उसकी पत्नी, बेटे और भतीजी के खातों में वापस कर दिया गया और लेन-देन करने के उद्देश्य से फिर से दोबारा ट्रांसफर किया गया। ऐसा इसीलिए किया गया ताकि नाइक के बजाय उसके परिवार के सदस्यों के नाम पर बुकिंग की जा सके।”

अक्टूबर 2017 में NIA ने ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ मुंबई की एक अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया था। उस पर 2016 में एंटी-टेरर क़ानून के तहत मामला दर्ज किया गया था। भारत ने इंटरपोल से भी ज़ाकिर नाइक के ख़िलाफ़ नोटिस जारी करने की अपील की थी। भारतीय अधिकारियों ने इसके लिए इंटरपोल के समक्ष सबूत के रूप में कई दस्तावेज़ भी पेश किए थे।

ख़बरों के मुताबिक़ नाइक की जितनी संपत्ति ज़ब्त की गई है, उसके पास उस से कहीं ज्यादा संपत्ति अभी भी मौजूद है। उसकी संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के पास ₹100 करोड़ से भी ज्यादा की अचल संपत्ति है। इस से पहले भी ED उसकी संपत्ति को ज़ब्त कर चुका है। 2017 में ED ने उसकी और उस से जुड़ी संस्था की ₹18 करोड़ से भी अधिक की सम्पत्तियों को ज़ब्त किया था।

सरकार ने ज़ाकिर नाइक की संस्था को ग़ैरक़ानूनी करार देकर प्रतिबंधित किया हुआ है। कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकारी एजेंसियाँ अब तक नाइक की ₹50 करोड़ से भी अधिक की संपत्ति ज़ब्त कर चुकी है। वित्त मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली एजेंसी ED के मुताबिक़ ये कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।