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वकील महमूद प्राचा पर हाई कोर्ट ने लगाया ₹1 लाख जुर्माना, पूछा- समस्या हल हो गई फिर क्यों डाली याचिका: दिल्ली दंगों की सुनवाई के दौरान भी लग चुकी है फटकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वकील महमूद प्राचा पर ₹1 लाख का जुर्माना ठोंका है। हाई कोर्ट ने प्राचा के व्यवहार को देखते हुए यह जुर्माना लगाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राचा ने उसका बहुमूल्य समय बर्बाद किया है। महमूद प्राचा की याचिका भी कोर्ट ने रद्द कर दी।

लाइवलॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार (10 सितम्बर, 2024) को इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच प्राचा की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। प्राचा की यह याचिका चुनावी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी के सत्यापन और सुरक्षा सम्बन्धित मुद्दों पर थी।

हाई कोर्ट ने कहा कि इसी मामले प्राचा पहले दो याचिकाएँ दिल्ली हाई कोर्ट में डाल चुके हैं और वहाँ उनकी इच्छा के अनुसार निर्देश भी कोर्ट दे चुका है। प्राचा ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्णयों से संतुष्टि भी जताई थी। इसके बावजूद प्राचा ने फिर इसी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका ठोंक दी।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब उनकी समस्या दिल्ली हाई कोर्ट से हल हो चुकी है तो आखिर वह इलाहाबाद में वैसी ही याचिका लेकर क्यों आए। कोर्ट ने कहा कि वह इसके पीछे का कारण समझ नहीं पा रहा कि एक ही विषय पर दो अलग अलग हाई कोर्ट में याचिका क्यों डाली गई।

कोर्ट ने कहा, “यह अदालत याचिकाकर्ता द्वारा किए जा रहे इस बदलाव को समझ नहीं पा रही, जब याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिकॉर्ड में कहा था कि उसकी चिंता का समाधान हो चुका है। याचिकाकर्ता बीच रास्ते में कूद नहीं सकता नहीं ही अपना मन बदल सकता है, वह अपने मन से अपनी पसंद का मंच नहीं चुन सकता। अगर उन्हें समस्या थी तो वह एक बार फिर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते थे क्योंकि मामला तो वही है।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समय खराब करने के अलावा प्राचा के व्यवहार पर भी सवाल उठाए। हाई कोर्ट ने कहा कि उसे फैसला सुनाने के बाद पता चला कि प्राचा खुद ही इस मामले में पेश हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अपने एक वकील के माध्यम से यह याचिका दायर की थी, ऐसे में वह खुद इस मामले में बहस नहीं कर सकते थे। इसके लिए उन्हें अपने वकील का नाम हटाना पड़ता। लेकिन उन्होंने ऐसा किए बिना ही बहस करना चालू कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा कि प्राचा ने अपना कोट पर पहने जाने वाला बैंड बिना हटाए बहस की जो सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उन्हें डेकोरम बना कर रखना था। हाई कोर्ट ने प्राचा की याचिका इस सुनवाई के बाद खारिज कर दी और उन पर ₹1 लाख का जुर्माना भी लगा दिया। प्राचा को आगे उनके व्यवहार के लिए चेतावनी भी दी गई है।

कौन है महमूद प्राचा?

महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है। दिल्ली दंगों में ये आरोपित मुस्लिम दंगाइयों का वकील है।

NDA के सत्ता में आने से पहले महमूद प्राचा की ऐसी तूती बोलती थी कि वो राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, दिल्ली सफाई कर्मचारी कमीशन और भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक (FSSAI) जैसी सरकारी संस्थाओं के लिए कोर्ट में पेश को चुका है। वो सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का एडिशनल अधिवक्ता रहा है। साथ ही AIIMS दिल्ली का स्टैंडिंग काउंसल और दिल्ली लॉ स्कूल के छात्र संघ का अध्यक्ष रहा है।

जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

उसने 2004 में जम्मू कश्मीर के मसले में अमेरिका की मध्यस्तथा की माँग की थी, जबकि ये भारत का आंतरिक मामला है। महमूद प्राचा ‘भीम आर्मी’ से तो जुड़ा ही हुआ है, साथ ही ‘रावण’ को दरियागंज में हुई हिंसा के मामले में कोर्ट में डिफेंड भी कर चुका है। उसने मेवात के मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर भड़काऊ भाषण दिया था और CAA विरोधी आंदोलन को हवा दी थी। उसने तब खुलासा किया था कि पूरे बिहार में 1500 शाहीन बाग़ चल रहे हैं और इसमें मुस्लिम महिलाओं का सबसे ज्यादा योगदान है।

दिल्ली हाईकोर्ट में कपिल मिश्रा सहित अन्य भाजपा व संघ नेताओं के खिलाफ केस करने में उसका सबसे बड़ा हाथ था। साथ ही उसे NPR के खिलाफ भी मुस्लिमों को भड़काया था। उसने दावा किया कि असम में ‘बाहरी’ मारवाड़ियों ने पूरे व्यापार पर कब्जा कर रखा था, इसीलिए NRC लाई गई। उसने बड़े उद्योगपतियों पर RSS को लोन देने का आरोप लगाया और यहाँ तक दावा कर बैठा कि जिनका नाम NRC में नहीं आएगा, उनके बैंक एकाउंट्स के रुपए सरकार खा जाएगी।

उसने मुस्लिम बहुल इलाकों में घूम-घूम कर लाइसेंसी हथियारों की खरीद-बिक्री करने की सलाह दी थी और उन्हें ‘आत्मरक्षा’ के लिए हथियार रखने को कहा था। उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। उसने मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।

प्राचा पर अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए उस पर ₹1 लाख का जुर्माना ठोंका है और इसकी अदायगी ना होने पर दूसरे रास्ते अपनाने को कहा है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट भी दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में उसे फटकार चुका है।

दोस्तों के साथ मिलकर नर्स से रेप की कोशिश कर रहा था डॉक्टर, सर्जिकल ब्लेड से काट दी प्राइवेट पार्ट: बिहार की घटना, अस्पताल से भागकर खुद को बचाया

बिहार के समस्तीपुर जिले में एक शर्मनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक डॉक्टर और उसके दो दोस्तों द्वारा नर्स के साथ बलात्कार करने की कोशिश की गई। इस घटना में नर्स ने बहादुरी दिखाते हुए ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले ब्लेड से डॉक्टर का प्राइवेट पार्ट काट दिया। घटना के बाद नर्स किसी तरह से अस्पताल से भागी और पुलिस को सूचित किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वारदात बुधवार (11 सितंबर 2024) की रात को समस्तीपुर के आरबीएस हेल्थ केयर सेंटर (निर्माणाधीन अस्पताल) में घटी। पीड़ित नर्स बीते 10-15 महीने से इस अस्पताल में काम कर रही थी। बुधवार की रात, अस्पताल में कोई मरीज नहीं था और डॉक्टर संजय कुमार अपने दो दोस्तों के साथ शराब पी रहा था। उन्होंने नर्स को बुलाया और शराब के नशे में तीनों ने नर्स के साथ बलात्कार करने की कोशिश की। अपनी जान बचाने के लिए नर्स ने ऑपरेशन थिएटर में मौजूद ब्लेड से डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट पर हमला किया, जिससे डॉक्टर गंभीर रूप से घायल हो गया। इस हमले के बाद, तीनों आरोपियों ने उसे छोड़ दिया और नर्स अस्पताल से भागने में सफल रही।

एसडीपीओ संजय कुमार पांडेय ने बताया कि आरोपी डॉक्टर की पहचान बेगूसराय जिले के तेघरा थाना क्षेत्र के निवासी डॉक्टर संजय कुमार, पुत्र- स्वर्गीय रामभजन सिंह के रूप में हुई है। वहीं, डॉक्टर के दो अन्य साथी सुनील कुमार गुप्ता (वैशाली जिले के बलिगाँव थाना क्षेत्र निवासी) और अवधेश कुमार (समस्तीपुर के बंगरा थाना क्षेत्र निवासी) हैं। उन्होंने बताया कि बुधवार की रात मुसरीघरारी थाना के थानाध्यक्ष फैजुल अंसारी को डायल 112 के माध्यम से इस घटना की जानकारी मिली। पुलिस अधीक्षक विनय तिवारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष टीम का गठन किया, जिसमें मुसरीघरारी थानाध्यक्ष के नेतृत्व में जाँच की गई। पुलिस की टीम जब मौके पर पहुँची, तो पीड़ित नर्स पास के खेत में छिपी हुई मिली।

नर्स ने खेत में छिपते हुए पुलिस को घटना की सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और नर्स द्वारा बताई गई जानकारी के आधार पर आरबीएस हेल्थ केयर सेंटर पहुंचकर जांच शुरू की। पुलिस ने मौके से आधी बोतल शराब, एक कार, खून से सना हुआ ब्लेड, लुंगी, बेडशीट, और तीनों आरोपियों के मोबाइल फोन जब्त किए। पुलिस ने यह भी बताया कि शराब पीने के संबंध में अलग से मामला दर्ज किया जा रहा है।

घायल डॉक्टर संजय कुमार और उसके दोनों साथियों सुनील कुमार गुप्ता और अवधेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। डॉक्टर को तुरंत इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। आरोपितों ने पुलिस की पूछताछ में अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। एसडीपीओ पांडेय के अनुसार, डॉक्टर और उसके साथी नशे की हालत में थे और उन्होंने नर्स के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी।

नर्स ने पुलिस को बताया कि उसने खुद को बचाने के लिए डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट पर ब्लेड से वार किया। इस कार्रवाई के बाद तीनों आरोपितों ने उसे छोड़ दिया और वह किसी तरह से अपनी जान बचाकर वहाँ से भागने में सफल रही। नर्स ने खेत में छुपकर पुलिस को फोन कर घटना की सूचना दी। इसके बाद पुलिस टीम ने घटनास्थल पर पहुँचकर जरूरी साक्ष्य एकत्र किए। घटना स्थल से मिले सबूतों के आधार पर पुलिस ने बलात्कार के प्रयास और अवैध शराब सेवन के संबंध में मामला दर्ज किया है। पुलिस इस मामले की जाँच को तेजी से आगे बढ़ा रही है और सभी कानूनी प्रक्रियाएँ पूरी की जा रही हैं। एसडीपीओ संजय कुमार पांडेय ने बताया कि आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी और उन्हें जल्द से जल्द न्यायिक प्रक्रिया के तहत सजा दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।

समस्तीपुर की यह घटना एक दर्दनाक और चिंताजनक घटना है, जिसमें एक नर्स ने अपनी इज्जत बचाने के लिए एक खतरनाक कदम उठाया। डॉक्टर और उसके दोस्तों की इस शर्मनाक हरकत ने फिर से यह साबित कर दिया है कि समाज में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सुधार की आवश्यकता है। पुलिस की त्वरित कार्रवाई और आरोपियों की गिरफ्तारी सराहनीय है, लेकिन इस घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को कैसे रोका जाए और उन्हें सुरक्षित माहौल कैसे प्रदान किया जाए।

पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को भी लगी बांग्लादेश की नजर, शेख हसीना की ‘हिल्सा कूटनीति’ पर लगाया विराम: बंगाली हिंदू पारंपरिक भोज के रूप में करते हैं इस्तेमाल

बांग्लादेश से शेख हसीना सरकार के जाने के बाद वहाँ कुछ न कुछ हिंदूविरोधी फैसले लिए जा रहे हैं। पहले खबर आई कि अजान से पहले दुर्गा पूजा में पूजा पाठ बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। अब पता चला है कि बांग्लादेश ने दुर्गा पूजा से ठीक पहले बंगालियों के पारंपरिक भोजन हिल्सा मछली का एक्पोर्ट भारत में करने से मना कर दिया है। पहले हर दुर्गा पूजा से पूर्व 1000 टन के करीब हिल्सा भारत में निर्यात की जाती थीं।

बता दें कि साल 2019 से बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने यह नीति अपनाई थी कि हर साल पूजा से एक महीने पहले पद्मा नदी से 1,000 टन से अधिक हिल्सा भारत को निर्यात की जाएगी। 5 साल तक ऐसा किया भी गया। हालाँकि सरकार बदलने के बाद अब अंतरिम सरकार ने उस निर्णय को वापस ले लिया।

बांग्लादेश के पशु संसाधन मंत्रालय की सलाहकार फरीदा अख्तर ने हिल्सा की बढ़ती घरेलू माँग का हवाला देते हुए भारत में किए जाने वाले निर्यात को खारिज कर दिया। साथ ही वाणिज्य मंत्रालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि इस बार हिल्सा पकड़ने पर रोक हो।

मालूम हो कि कुछ दिन पहले बांग्लादेशी मछली निर्यातकों के साथ समन्वय करने वाले एसोसिएशन ने बांग्लादेश सरकार के सलाहकार तौहीद हुसैन को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि पिछले वर्षों की तरह इस बार भी हिल्सा के सीमित व्यापार की अनुमति दी जाए, मगर बांग्लादेश की ओर से नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।

एसोसिएशन के सचिव सैयद अनवर मकसूद ने हालात देखते हुए बताया कि इस बार पद्मार इलिश (पद्मा नदी की हिल्सा) मिलना मुश्किल है। हिलसा मछली पकड़ने तक पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है ताकि मछली को अंडे देने का मौका न मिले।

इससे पहले साल 2012 में बांग्लादेश सरकार ने ऐसा बैन लगाया था लेकिन फिर 2019 में सद्भावना के तौर पर इस व्यापार को अनुमति दे दी गई। पिछले साल हिल्सा डिप्लोमेसी के तहत भारत को 1300 टन से ज्यादा हिल्सा मिली थीं वहीं 2021 में ये संख्या 1200 थी।

उल्लेखनीय है कि 5 अगस्त को शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने का काम लगातार बांग्लादेश कर रहा है। 10 सितंबर को एक वीडियो सामने आई थी जिसमें एक व्यक्ति जिसे बांग्लादेश के गृहमंत्री का सलाहकार कहा जा रहा था वो हिन्दुओं को चेतावनी देते दिख रहा था कि वो मुस्लिमों की अजान से 5 मिनट पहले अपने पूजापाठ बंद कर दें वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।

शराब घोटाले में जमानत तो मिल गई पर CM ऑफिस नहीं जा सकते हैं अरविंद केजरीवाल, फाइल पर साइन करने की इजाजत भी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई कई शर्तें

दिल्ली शराब घोटाला केस में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से महत्वपूर्ण राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को जमानत देने का फैसला लिया है, जिसके बाद अब वो आज (13 सितंबर 2024) ही तिहाड़ जेल से बाहर आ जाएँगे। केजरीवाल को गिरफ्तारी के 177 दिनों बाद बेल मिली है। इसमें से 21 दिन उन्हें चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिली थी, इस तरह वो कुल 156 दिन जेल में बिताने के बाद वो तिहाड़ से बाहर आ रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयाँ की बेंच ने यह फैसला सुनाया। केजरीवाल ने जमानत की याचिका दायर करते हुए अपनी गिरफ्तारी को भी चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई और केजरीवाल की ओर से प्रमुख वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें पेश की थीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अरविंद केजरीवाल को दी गई जमानत की शर्तें इस तरह से हैं-

  • मुचलका: अरविंद केजरीवाल को 10-10 लाख रुपये के दो मुचलके भरने होंगे।
  • पब्लिक कमेंट: अरविंद केजरीवाल दिल्ली एक्साइज पॉलिसी केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि केजरीवाल इस केस को लेकर कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करेंगे।
  • ऑफिस में नो-एंट्री: केजरीवाल को मुख्यमंत्री कार्यालय और दिल्ली सचिवालय में जाने की अनुमति नहीं होगी और न ही वह सरकारी फाइलों पर दस्तखत कर सकेंगे।
  • मुकदमे में सहयोग: अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट के सामने हर सुनवाई पर मौजूद होना होगा, जबतक कि उन्हें पेशी से छूट न मिले।
  • गवाहों से कोई संपर्क नहीं: जमानत पर बाहर रहने के दौरान वह केस से जुड़े गवाहों से संपर्क नहीं करेंगे, संपर्क की कोशिश भी नहीं कर सकते।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि केजरीवाल की गिरफ्तारी कानूनी थी और इसमें कोई प्रक्रियागत अनियमितता नहीं थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीबीआई ने गिरफ्तारी के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 के निर्देशों का पालन किया। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस भुइयाँ दोनों ने एकमत होते हुए केजरीवाल को जमानत देने का फैसला किया, इस आधार पर कि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और मुकदमे की सुनवाई में अभी समय लगेगा।

वहीं, जस्टिस भुइयाँ ने गिरफ्तारी की आवश्यकता और अनिवार्यता के बारे में अलग राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने 22 महीने तक केजरीवाल को गिरफ्तार नहीं किया और ईडी मामले में उनकी रिहाई के ठीक पहले उन्हें गिरफ्तार किया। जस्टिस भुइयाँ ने इस गिरफ्तारी को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पहले से दी गई जमानत को विफल करने के प्रयास के रूप में देखा।

सुप्रीम कोर्ट ने 12 जुलाई को ईडी मामले में केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी थी, और अब उन्होंने सीबीआई के मामले में भी जमानत हासिल की है। इस दौरान, कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि केजरीवाल को मुकदमे में सहयोग देना होगा और किसी भी प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणी से बचना होगा।

बता दें कि दिल्ली शराब नीति घोटाले से जुड़ा यह मामला दिल्ली सरकार की आबकारी नीति 2021-22 के निर्माण और क्रियान्वयन में कथित भ्रष्टाचार से संबंधित है। यह नीति बाद में रद्द कर दी गई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का एक अलग मामला दर्ज किया था। सीबीआई और ईडी का आरोप है कि शराब नीति में संशोधन करके अनियमितताएं की गईं और लाइसेंसधारकों को अनुचित लाभ पहुँचाया गया।

कौन थी लेडी मैकबेथ, जिससे हुई ममता बनर्जी की तुलना: बंगाल के गवर्नर अब CM के साथ साझा नहीं करेंगे मंच, सोशल बायकॉट का किया ऐलान

कोलकाता के आर जी कर अस्पताल में रेप-हत्या की घटना के बाद सवालों के घेरे में आई ममता बनर्जी पर अब प्रदेश के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने निशाना साधा है। उन्होंने एक वीडियो जारी करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सार्वजनिक मंचों से बहिष्कार करने की बात कही है। साथ ही उनकी तुलना लेडी मैकबेथ से की है।

सीवी आनंद बोस ने कहा कि वो मुख्यमंत्री का सामाजिक बहिष्कार करेंगे। सामाजिक बहिष्कार का मतलब है कि वह मुख्यमंत्री के साथ कभी कोई मंच साझा नहीं करेंगे। साथ ही ऐसी किसी बैठक में शामिल नहीं होंगे, जिसमें मुख्यमंत्री मौजूद हों।

सामने आई वीडियो में बोस कहते दिखे, “मुख्यमंत्री सुरक्षा देने की जगह विरोध कर रही हैं। बंगाल की लेडी मैकबेथ हुगली का सारा पानी इस गंदे हाथ को साफ नहीं कर सकता। सड़क पर हिंसा है। घर में हिंसा हुई कैंपस में हिंसा है, अस्पताल में हिंसा है, गाँव में हिंसा है, शहर में हिंसा है। हर जगह हिंसा है। लोगों को चुप करा दिया गया है…याद रखें, चुप्पी हिंसा है। लोग पूछ रहे हैं कौन रक्षा करेगा। ये जटिल और भ्रमित करने वाली स्त्री है। जब तक बंगाल के लोगों को न्याय नहीं मिलता मैं मुख्यमंत्री का सामाजिक बहिष्कार करूँगा।”

कौन है लेडी मैकबथ जिसकी तुलना बंगाल CM से की।

बता दें कि लेडी मैकबेथ जिनकी तुलना बंगाल सीएम से की गई है, वह मशहूर उपन्यासकार विलियम शेक्सपियर के प्ले ‘द ट्रेजेडी ऑफ मैकबेथ’ की मुख्य किरदार है। इस प्ले में मैकबेथ को राजा का सिंहासन हासिल करने के लिए अपने पति को उकसाते और राजा की मौत की साजिश रचते देखा जाता है। इसके अलावा ये भी देखने को मिलता है कि कैसे ताकत बढ़ने के साथ मैकबेथ के अत्याचार भी बढ़ते हैं। मैकबेथ का मकसद स्कॉटलैंड पर रानी बनकर राज करना था, लेकिन उसकी इन महत्वकांक्षाओं के कारण उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी और धीरे-धीरे वह अपराध बोध से भरने लगी।

इन्हीं मैकबेथ के चरित्र की तुलना बंगाल सीएम से की गई। सिर्फ गवर्नर ही नहीं उनकी आलोचना कई जगह हो रही है। इस बीच उन्होंने आरजी कर अस्पताल में डॉक्टर की रेप-हत्या मामले में हड़ताल पर चल रहे डॉक्टरों से बात करने का प्रयास किया। हालाँकि डॉक्टरों ने उनसे बातचीत करने से इनकार कर दिया। इसके बाद वो कैमरे पर सामने आई। उन्होंने कहा– “कुछ लोग मेरी कुर्सी चाहते हैं। मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूँ मुझे सत्ता की भूख नहीं है।” उन्होंने हाथ जोड़कर जनता से माफी भी माँगी कि वो डॉक्टरों का समाधान लाने में विफल रहीं।

पाकिस्तान के खालिद को UK कोर्ट ने भारतीय की हत्या का दोषी पाया, वैलेंटाइन डे के दिन कार से रौंद दिया था: साकिब इस्माइल ने दी थी सुपारी

ब्रिटेन में भारतीय नागरिक विग्नेश पट्टाभिरामन की हत्या के मामले में 25 वर्षीय पाकिस्तानी नागरिक शाजेब खालिद को दोषी ठहराया गया है। विग्नेश पट्टाभिरामन, जो तमिलनाडु के निवासी थे और लंदन में एक रेस्टोरेंट मैनेजर के तौर पर काम कर रहे थे, की हत्या वैलेंटाइन डे (14 फरवरी 2024) के दिन हुई थी। शाजेब और उसके साथी को 10 अक्टूबर को सजा सुनाई जाएगी।

पुलिस के मुताबिक, रीडिंग क्राउन कोर्ट की ज्यूरी ने शाजेब खालिद को विग्नेश की हत्या का दोषी पाया है। आरोप है कि खालिद ने विग्नेश को जानबूझकर अपनी कार से टक्कर मारकर मौत के घाट उतारा। खालिद को इस जघन्य अपराध के लिए 2000 पाउंड की सुपारी दी गई थी। विग्नेश की मौत 15 फरवरी को रॉयल बर्कशायर अस्पताल में हुई, और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उनकी मौत सिर में गंभीर चोट लगने के कारण हुई थी।

विग्नेश पट्टाभिरामन, जो कोयंबटूर के मदुरामलाई के आईओबी कॉलोनी का निवासी था, दिसंबर 2022 में अपनी पत्नी राम्या के साथ लंदन आया था। उन्होंने वेल के एक दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में काम शुरू किया था और चर्चिल स्थित हयात रीजेंसी लंदन में नई नौकरी की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच, उनकी हत्या हो गई।

हत्याकांड की जाँच में यह खुलासा हुआ कि विग्नेश की हत्या की सुपारी मोहम्मद साकिब इस्माइल ने दी थी, जो वेल के रेस्टोरेंट में ऑपरेशन मैनेजर के रूप में काम करता था। इस्माइल को संदेह था कि विग्नेश उसके रेस्टोरेंट में लोगों को गैरकानूनी तरीके से नौकरी दिला रहा है। इस्माइल ने अपने दोस्त सोहित हुसैन से विग्नेश को डराने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढने को कहा जो उसे डराकर सजा दे सके। सोहित हुसैन ने यह काम शाजेब खालिद को सौंपा, जिसने विग्नेश को अपनी कार से टक्कर मार दी।

घटना के बाद एक प्रत्यक्षदर्शी ने देखा कि खालिद ने कार से बाहर निकलकर विग्नेश पर तीन बार किसी वस्तु से हमला किया। प्रॉसीक्यूशन का आरोप है कि खालिद ने विग्नेश के पैसे भी चुराए। खालिद ने अपने बचाव में कहा कि उसने केवल डराने के लिए कार दौड़ाई थी और उसका इरादा विग्नेश को मारने का नहीं था। उसने पैसे चुराने के आरोपों को भी नकारा किया है।

खालिद 2007 में पाकिस्तान से ब्रिटेन आया था और वहाँ लंबे समय से रह रहा था। इस मामले में खालिद को काम पर रखने वाले सोहित हुसैन को भी अपराध में सहयोग करने के लिए दोषी पाया गया है। दोनों आरोपितों को 10 अक्टूबर को सजा सुनाई जाएगी।

इस हत्याकांड ने न केवल स्थानीय भारतीय समुदाय को झकझोर दिया, बल्कि ब्रिटेन में भारतीयों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर सवाल भी खड़ा किया है। इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि समाज में अपराध और बुराई को रोकने के लिए सख्त निगरानी और सही कार्रवाई की आवश्यकता है।

झारखंड के संथाल परगना में 16% घटे ST, ईसाई 6000 गुणा बढ़े: बांग्लादेशी घुसपैठियों ने भी बनाया ठिकाना, डेमोग्राफी चेंज पर केंद्र ने हाई कोर्ट को सब कुछ बताया

झारखंड में हो रहे डेमोग्राफिक बदलावों पर कुछ हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। ये खुलासे केंद्र सरकार द्वारा झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका पर दिए गए जवाबों से हुए हैं। अपने जवाब में केंद्र सरकार ने बताया कि झारखंड के संथाल परगना में जनजातीय आबादी में 16 फीसदी की कमी आई है। ये आबादी परगना में पहले 44 फीसदी थी लेकिन अब ये मात्र 28 रह गई है।

केंद्र ने अपने जवाब में बताया कि जनजातीय आबादी के कम होने के पीछे दो कारण हैं-पहला पलायन और दूसरा धर्मांतरण। केंद्र सरकार के जवाब में ये भी बताया गया कि एक तरफ जहाँ जनजातीय आबादी घटी है तो वहीं दूसरी ओर संथाल परगना के छह अलग-अलग जगहों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 फीसदी तक बढ़ी है। वहीं ईसाइयों की संख्या भी इन इलाकों में 6000 गुणा तक बढ़ी है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों झारखंड में हो रही बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दानियल दाश की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया गया था कि संथाल के छह जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठिए आ रहे हैं जिसकी वजह से संथाल की जनसंख्या बदल रही हैं। इलाकों में मदरसे बनाए जा रहे हैं। स्थानीय जनजातीय महिलाओं को फाँस कर वैवाहिक संबंध बनाया जा रहा है।

याचिका के कोर्ट पहुँचने के बाद उस समय संथाल के छह जिलों (पाकुड़, साहिबगंज, दुमका, गोड्डा, देवघर और जामताड़ा) के डिप्टी कमीशनरों ने कहा था कि उनके जिले में कोई बांग्लादेशी घुसपैठ नहीं हुई है। इस तरह साफ नकारे जाने की बात पर कोर्ट ने उन्हें चेताया भी था कि अगर इलाके में एक भी घुसपैठ का मामला मिला तो उनके ऊपर कोर्ट की अवमानना का मामला चलेगा।

इस मामले में इससे पहले 5 सितंबर को हाईकोर्ट में एक्टिंग चीफ जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई थी। इस दौरान सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता ने बताया था कि झारखंड में बांग्लादेशी घुसपैठियों के प्रवेश काफी संवेदनशील मामला है। घुसपैठिया झारखंड के रास्ते देश के अन्य राज्यों में भी प्रवेश कर वहाँ की आबादी को प्रभावित करेंगे। इसे हर हाल में रोकना होगा।

उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी थी कि जनजातीय समुदाय की कम होती संख्या केंद्र सरकार के लिए भी चिंता का विषय है। ऐसे में केंद्र सरकार बीएसएफ-आईबी सब से विचार विमर्श करके इस मामले में जवाब तैयार करेगी और कोर्ट को पेश करेगी। 5 सितंबर को हुई इस सुनवाई के बाग मामले के संबंध में 12 सितंबर को जवाब दाखिल किया गया। केंद्र सरकार ने बताया कि घुसपैठ साहिबगंज और पाकुड़ जिलों से हुई है। ये इलाके पश्चिम बंगाल से सटे हुए हैं। घुसपैठिए इन इलाकों में इसलिए आए क्योंकि यहाँ की बोली एक जैसी थी, जिससे उन्हें घुलने-मिलने में मदद मिली। अब इस मामले में अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी।

मालूम हो कि केंद्र के अनुसार, 1951 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 23,22,092 थी, जिसमें हिंदू 90.37 प्रतिशत, मुस्लिम 9.43 प्रतिशत और ईसाई 0.18 प्रतिशत थे। वहीं 2011 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 69,69,097 हो गई, जिसमें हिंदू 67.95 प्रतिशत रह गए, मुस्लिमों की संख्या 22.73 प्रतिशत हो गई और ईसाई 4.21 प्रतिशत हो गए।

13 सितंबर का वह फैसला जिसकी काट नहीं खोज पाया कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम, जिसके कारण आज भी बेचैन है लिबरल-वामपंथी गैंग

चंद महीने पहले ही भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए ने लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में वापसी की है। हालाँकि पिछले दो चुनावों के मुकाबले इस बार बीजेपी की सीटें कुछ घटी है, बावजूद इसके उसके मुकाबले कोई दूसरा दल नहीं दिखता। लोकप्रियता के मामले में कोई भी नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगे टिकता तक नहीं है।

आज जो वैश्विक मंचों पर भारत का प्रभाव दिख रहा है, देश की राजनीतिक दशा और दिशा में जो बदलाव दिख रहा, आम आदमी के चेहरों पर जो उम्मीदों का भाव दिखता है, इन सबकी पटकथा 2013 में आज यानी 13 सितंबर को ही लिखी गई थी।

दरअसल, 2014 लोकसभा चुनाव से पहले 13 सितंबर, 2013 को ही तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनके साथ गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे।

इसी प्रेस वार्ता में यह घोषणा की गई कि नरेंद्र मोदी आगामी चुनावों में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा होंगे। उससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि फिर से लालकृष्ण आडवाणी पीएम का चेहरा हो सकते हैं। बहुतों ने यह भी सोचा था कि सुषमा स्वराज या अरुण जेटली भी पीएम का चेहरा हो सकते है, क्योंकि मोदी को मीडिया ने 2002 के गुजरात दंगों की अगुवाई करने वाले व्यक्ति के तौर पर पेश किया था, जबकि इस तथ्य पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल के 12 वर्षों में गुजरात काफी हद तक शांतिपूर्ण रहा था।

उस वक्त के कई ट्वीट्स हैं जिसमें राणा अय्यूब और राजदीप सरदेसाई ने भाजपा की तरफ से नरेंद्र मोदी को पीएम चेहरे के लिए चुनने पर जमकर हमला किया था। उस दौरान वे नरेंद्र मोदी को काफी हल्के में ले रहे थे।

उन लोगों ने उनके US वीजा स्टेटस का मजाक भी उड़ाया।

आप देखें, किसी ने वास्तव में नहीं सोचा था कि साबरमती के किनारे से यह आदमी भाजपा का यह सपना पूरा करेगा। मीडिया की धारणा उनके खिलाफ थी। विपक्षी नेताओं द्वारा उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा जाता था। उनके अपने सहयोगी इस बात से बहुत खुश नहीं थे और उन्होंने इसे बहुतायत स्पष्ट भी कर दिया था। जून 2013 में जब मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने की चर्चाएँ तेज हो रही थीं, तब जदयू के नीतीश कुमार ने 17 साल पुराने एनडीए गठबंधन को तोड़ दिया था।

उन्होंने पीएम मोदी के लिए अपनी ‘नापसंदगी’ को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया था। नीतीश कुमार ने 2010 में मोदी सहित कई भाजपा नेताओं के लिए एक पूर्व निर्धारित रात के भोजन के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया था। वहीं दो साल पहले 2008 में, उन्होंने नरेंद्र मोदी की अगुवाई में गुजरात सरकार द्वारा दिए गए 5 करोड़ रुपए को भी लौटा दिया था जो बिहार को बाढ़ राहत के लिए मिला था। उन्होंने इसे ब्याज के साथ वापस किया था।

गौरतलब है कि भाजपा पूरे पाँच साल के लिए सिर्फ एक बार ही सत्ता में आई थी। वहीं मोदी को पीएम उम्मीदवार के रूप में प्रचारित कर भाजपा एक बहुत ही बड़ा जोखिम मोल ले रही थी, जब उनकी खुद की पार्टी के सहयोगी इस बात से नाराज चल रहे थे। इसके अलावा वे कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को भी चुनौती दे रहे थे जिसके पास तीसरी बार सत्ता में आने के लिए पूरा इकोसिस्टम साथ खड़ा था।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, नरेंद्र मोदी ने वाइब्रेंट गुजरात नामक द्विवार्षिक शिखर सम्मेलन शुरू किया था। एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार मुझसे कहा था कि 2002 के दंगों के ठीक बाद मोदी ने गुजरात में परिवर्तन लाने का फैसला किया था। उन्होंने मन बना लिया था कि जब लोग गुजरात के बारे में सोचेंगे तो वे प्रगति के बारे में सोचेंगे। पहला वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन नवरात्रि के दौरान 2003 में आयोजित किया गया था, जो नौ-रात्रि लंबा नृत्य महोत्सव था।

उससे पहले मोदी ने विभिन्न मीडिया हाउस के संपादकों और पत्रकारों को बुलाया और उन्हें अपने विजन पर एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन दिया। एक पत्रकार ने मुझे बताया 2002 के दंगों के दौरान भड़काऊ खबरों को प्रसारित करने वाले गुजरात समाचार संपादक श्रेयांश शाह भी उसमें मौजूद थे। उन्होंने मुझे बताया कि शाह प्रस्तुति के बीच में ही बाहर चले गए थे। जाहिर तौर पर उन्हें वो सब पसंद नहीं आया होगा। इसके बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें खुद रोका और वापस आने के लिए कहा। लेकिन शाह फिर भी नहीं माने।

यह तब था जब मोदी ने यह परवाह करना छोड़ दिया था कि मीडिया उनके बारे में क्या कहती है। उन्होंने इस बात का फैसला किया था कि उनके द्वारा किए गए काम को बोलने दो।

अगला शिखर सम्मेलन जनवरी 2015 के लिए निर्धारित किया गया था। नरेंद्र मोदी ने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने हरित ऊर्जा, स्वच्छ तकनीक, शिक्षा, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विभिन्न विषयों पर ‘वाइब्रेंट गुजरात प्री-इवेंट समिट्स’ की एक श्रृंखला की।

जिन लोगों ने 2003 में शिखर सम्मेलन को खारिज कर दिया था। वहीं लोग उसके शुरुआत से पहले ही उसको फ्रंट पेज पर प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने न केवल देश को यह बताया कि एक सीएम होते हुए उन्होंने सबसे उद्यमी राज्य में क्या-क्या किया। बल्कि यह भी कि जो वादा उन्होंने किया उसे पूरा भी किया। वह जानते थे कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था नीतिगत पक्षाघात के कारण फँस गई है। उन्होंने सुनिश्चित किया कि हर कोई इसके बारे में जाने।

लेकिन इस बात की उम्मीद कम थी कि बीजेपी के पास वास्तव में एक मौका हो सकता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चरम पर था। लोग कॉन्ग्रेस से नाराज थे। लेकिन क्या उनकी नाराजगी भाजपा को बहुमत देने देने के लिए पर्याप्त थे? क्या लोग 2002 के दंगों के बाद मोदी को वोट देने के लिए घटनाओं और मनगढ़ंत कहानियों को नजरअंदाज करने के इच्छुक थे? क्या भाजपा के लिए तर्कसंगत नेता को पीएम चेहरे के रूप में चुनना बुद्धिमानी होगी? क्या ‘त्रिशंकु संसद’ होगी और भाजपा को 5 साल की स्थिर सरकार के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा? सच कहूँ, तो मुझे यकीन नहीं था।

यह तस्वीर मतगणना से 2 दिन पहले की है। भारत ने तय किया था। मोदी की बॉडी लैंग्वेज से यह लगता था कि उन्हें यकीन था कि वह दिल्ली आ रहे हैं।

भाजपा ने रिस्क लिया। मोदी जीते और कैसे। सिर्फ एक बार नहीं। 2019 में मजबूत जनादेश के साथ वापसी करते हुए सत्ता में अपनी पकड़ को स्थापित किया।

राजनाथ सिंह की उस घोषणा ने पार्टी के इतिहास को बदल दिया। पार्टी को मजबूती के साथ हर वर्ष एक नई उम्मीद और पहचान बनाने का मौका दिया। अब 2024 के आम चुनावों के बाद वह लगातार तीसरी बार सत्ता में आने में सफल रही है।

(यह लेख मूल रूप से 2020 के 13 सितंबर को ऑपइंडिया अंग्रेजी की तत्कालीन संपादक निरवा मेहता ने लिखा था। कुछ आवश्यक बदलावों के साथ हम इसे फिर से प्रकाशित किया गया है)

अब अडानी के खिलाफ स्विस बैंक का शिगूफा लेकर आया हिंडनबर्ग, कहा- ₹2600 करोड़ फ्रीज: भारतीय कंपनी ने बताया मार्केट वैल्यू गिराने का सुनियोजित प्रयास

हिंडनबर्ग रिसर्च ने हाल ही में अडानी ग्रुप के खिलाफ फिर से गंभीर लगाकर सनसनी फैलाने की कोशिश की। स्विस मीडिया आउटलेट गॉथम सिटी की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, हिंडनबर्ग ने दावा किया है कि स्विस अधिकारियों ने अडानी ग्रुप के स्विस बैंकों में रखे गए 310 मिलियन डॉलर (लगभग 2600 करोड़ रुपये) की धनराशि को फ्रीज कर दिया है।

हिंडनबर्ग के दावे के अनुसार, स्विस अधिकारियों ने अडानी ग्रुप की वित्तीय गतिविधियों की गहरी जाँच की है और पाया है कि समूह ने विदेशी फंड्स में निवेश किया है जो कि अपारदर्शी हैं। इन फंड्स में अधिकांश अडानी के स्टॉक्स शामिल हैं। रिपोर्ट का कहना है कि अडानी ग्रुप के प्रतिनिधि ने इन फंड्स को स्विस बैंकों में रखा था और यह धनराशि अब फ्रीज कर दी गई है। इस धधनराशि की टोटल वैल्यू करीब 2600 करोड़ रुपये हैं।

इस आरोप को 12 सितंबर 2024 को X (पूर्व में ट्विटर) पर हिंडनबर्ग द्वारा पोस्ट किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, स्विस अधिकारी 2021 से अडानी ग्रुप के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और सिक्योरिटी फ्रॉड की जाँच कर रहे हैं।

अडानी ग्रुप ने दावों को किया खारिज

अडानी ग्रुप ने हिंडनबर्ग के दावों को “आधारहीन, अव्यवहारिक और हास्यास्पद” करार दिया है। ग्रुप की तरफ से कहा गया है कि अडानी ग्रुप का स्विस कोर्ट की किसी भी कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है और उनकी किसी भी कंपनी का खाता किसी भी प्राधिकरण द्वारा फ्रीज नहीं किया गया है। साथ ही यह भी कहा कि न तो स्विस कोर्ट ने कथित आदेश में अडानी की कंपनियों का उल्लेख किया है और न ही किसी प्राधिकरण या नियामक संस्था ने उनसे कोई स्पष्टीकरण या जानकारी माँगी है।

अडानी ग्रुप ने अपने बयान में यह आरोप लगाया है कि यह पूरी घटना उनके ग्रुप की प्रतिष्ठा और बाजार मूल्य को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए एक सुनियोजित और गंभीर प्रयास है। कंपनी ने यह भी कहा कि उनका विदेशी होल्डिंग ढाँचा पूरी तरह से पारदर्शी है और सभी प्रासंगिक कानूनों के अनुरूप है।

पहले भी अडानी ग्रुप को निशाने पर ले चुका है हिंडनबर्ग

हिंडनबर्ग की यह नई रिपोर्ट एक लंबे विवाद की कड़ी में आती है। पहले भी हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी ग्रुप पर रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट में अडानी ग्रुप पर कर्ज, शेयरों की कीमत में हेर-फेर, और अन्य वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए गए थे। रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप की वित्तीय स्थिति और उनके बाजार मूल्य पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद, अडानी की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी, जो कि शेयर बाजार में एक तरह का भूचाल लेकर आया था।

इस रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप का मार्केट कैप गिर गया था और गौतम अडानी की नेटवर्थ में भी बड़ी कमी आई थी। हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट ने अडानी ग्रुप की वित्तीय स्थिति और उसकी संपत्तियों पर गंभीर सवाल उठाए थे, जिसके परिणामस्वरूप अडानी ग्रुप को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।

अडानी ग्रुप ने हिंडनबर्ग की पहली रिपोर्ट के बाद अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और आरोपों को खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सभी वित्तीय गतिविधियाँ पारदर्शी और कानूनी ढांचे के अनुसार हैं। इसके बावजूद, रिपोर्ट के प्रभाव ने अडानी ग्रुप की मार्केट वैल्यू को नुकसान पहुँचाया और इसके परिणामस्वरूप उनके शेयरों की कीमत में भारी गिरावट आई। हालाँकि बाद में अडानी ग्रुप ने जोरदार वापसी की। अडानी ग्रुप के शेयरों ने रिकवरी की और उन्होंने अपनी वित्तीय स्थिति को स्थिर करने में सफलता प्राप्त की है। यह रिकवरी दर्शाती है कि अडानी ग्रुप ने अपनी स्थिति को सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं और बाजार में फिर से अपनी जगह बनाई है।

अडानी ग्रुप के खिलाफ हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों ने एक बार फिर से वित्तीय जगत में हलचल मचा दी है। स्विस बैंकों में रखी गई राशि के फ्रीज होने के आरोप और अडानी ग्रुप का खंडन, दोनों ही इस विवाद की जटिलता को बढ़ा रहे हैं। अडानी ग्रुप ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है और सभी आरोपों को खारिज किया है, जबकि हिंडनबर्ग ने अपने दावों को मजबूत करने के लिए नई रिपोर्ट प्रकाशित की है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि इस विवाद के क्या परिणाम होते हैं और अडानी ग्रुप अपने कारोबारी संचालन और निवेशकों के विश्वास को कैसे बनाए रखता है।

इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद की शान में गुस्ताखी के आरोप में 70 वर्षीय बुजुर्ग को थाने लाई पुलिस, फिर गोली मार कर दी हत्या: पाकिस्तान में कट्टरपंथियों ने किया सम्मानित

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पुलिस थाने के भीतर एक पुलिसकर्मी ने कथित ईशनिंदा के आरोपित की गोली मार कर हत्या कर दी। ईशनिंदा के आरोपित को भीड़ के गुस्से से बचाने के लिए थाने में रखा गया था। यहाँ भी उसकी जान नहीं बची और एक कट्टरपंथी पुलिसकर्मी का वह निशाना बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह वाकया बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा का है। यहाँ 70 वर्षीय सैयद खान नाम के एक बुजुर्ग व्यक्ति पर फोन पर इस्लाम के पैगम्बर के विषय में अपमानजनक बातें करने का आरोप लगाया था। सैयद खान की एक फोन रिकॉर्डिंग वायरल हो गई थी। इसके बाद उसे पुलिस पकड़ लाई थी।

सैयद खान को एक जगह सुरक्षित तौर पर रखा गया था ताकि कहीं भीड़ उसे मार ना दे। हालाँकि, यहाँ भी वह नहीं बच सका। यहाँ एक पुलिसकर्मी सैयद खान का रिश्तेदार बन कर आया और उससे मिलने के बहाने उसको गोली मार दी। सैयद की इससे मौत हो गई।

क्वेटा के पुलिस अधिकारीयों ने बताया है कि सैयद खान को मारने वाले पुलिसकर्मी को गिरफ्तार कर लिया गया है और उसके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। पुलिसकर्मी की पहचान अभी साफ़ नहीं हुई है। वह पुलिस के किस विभाग में काम करता था यह भी साफ़ नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि जिस सैयद खान को पुलिसकर्मी ने मारा है, उसे सबसे पहले खैरोताबाद पुलिस थाने में रखा गया था। यहाँ उसके विरुद्ध ईशनिंदा का एक मामला दर्ज किया गया था। इस थाने पर इस दौरान एक भीड़ ने हमला बोल दिया था और ग्रेनेड भी फेंक दिया था। भीड़ कह रही थी की ईशनिंदा का आरोपित उनके हवाले कर दिया जाए।

भीड़ इस ईशनिंदा के आरोपित को मारना चाहती थी। इस भीड़ में पाकिस्तान की इस्लामी कट्टरपंथी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के लोग भी शामिल थे। इस घटना का एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें कट्टरपंथी भीड़ थाने का दरवाजा तोड़ने की कोशिश करते हुए देखी जा सकती है।

TLP के लोगों ने अब मार दिए गए ईशनिंदा के आरोपित को मौत की सजा देने की माँग करते हुए क्वेटा की सड़कें जाम कर दी थीं। हालाँकि, तब क्वेटा प्रशासन ने उन्हें किसी तरह समझा लिया था। लेकिन इसके बाद इस कट्टरपंथी पुलिसकर्मी ने आरोपित को थाने में ही मार दिया।

सोशल मीडिया पर यह भी दावा किया गया है कि इस पुलिसकर्मी के परिजनों को इस्लामी कट्टरपंथियों ने सम्मानित भी किया है। एक वीडियो वायरल है जिसमें कुछ लोग एक शख्स को माला पहना रहे हैं, उसके हाथ चूम रहे हैं। बताया जा रहा है कि वह पुलिसकर्मी का पिता है।

हालाँकि, यह कोई पहली घटना नहीं है जब पुलिसकर्मियों ने ईशनिंदा के आरोपितों की हत्या की हो। इससे पहले भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह के पति और पाकिस्तान के बड़े नेता सलमान तासीर की उनके ही बॉडीगार्ड ने हत्या कर दी थी। उन पर भी ईशनिंदा का आरोप था।