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बंगाल चुनाव में दंगाइयों पर चला सुरक्षाकर्मियों का हंटर, TMC के गुंडों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा: पढ़ें- कैसे दोनों चरणों में केद्रीय बलों ने काबू की चुनावी हिंसा

पश्चिम बंगाल में चुनाव और हिंसा जैसे एक ही कहानी के दो हिस्से माने जाते थे। 2021 के विधानसभा चुनावों में हिंसा की तस्वीर आज भी लोगों के जहन में ताजा है, जब TMC ने खुलेआम सड़कों पर उतरकर हिंसा फैलाई थी। लेकिन 2026 का ये चुनाव इस बार उसी पुराने डर को तोड़ता हुआ नजर आ रहा है। चुनाव आयोग ने पहले से ही एहतियात बरतते हुए देशभर से केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की, ताकि मतदान प्रक्रिया को हर हाल में शांतिपूर्ण रखा जा सके।

इसका असर जमीन पर साफ दिख भी रहा है। दो चरणों के मतदान में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जहाँ TMC के गुंडों और दबंगों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन केंद्रीय बलों खासतौर पर CRPF ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। कहीं बूथ कैप्चरिंग की कोशिश नाकाम की गई, तो कहीं वोटरों को डराने-धमकाने वालों को मौके पर ही घसीटा गया।

इसके बावजूद बंगाल की मुख्यमंत्री और भवानीपुर सीट से उम्मीदवार ममता बनर्जी CRPF को ‘अत्याचारी‘ कह रही हैं। उनका आरोप है कि मतदान केंद्रों पर राज्य पुलिस नजर नहीं आ रही और केंद्रीय बलों ने पूरे चुनाव पर कब्जा कर लिया है, यहाँ तक कि वे एक खास राजनीतिक दल के पक्ष में काम कर रहे हैं।

जबकि जमीनी हकीकत है कि हिंसा को काबू में किया जा रहा है। कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें सुरक्षाबल सख्ती से हालात को काबू में करते दिख रहे हैं और यही वजह है कि इस बार बंगाल के चुनाव में हिंसा पर नियंत्रण की एक नई तस्वीर सामने आ रही है।

बंगाल चुनाव में मोर्चा संभालते केंद्रीय बल के वायरल वीडियो

मतदान के दूसरे चरण में सबसे बड़ी घटना दक्षिण 24 परगना जिले के फाल्टा विधानसभा सीट से सामने आई, जहाँ से TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान चुनाव लड़ रहा है। इस विधानसभा के बूथ संख्या 144 पर EVM पर BJP के बटन पर टेप लगाया गया। इसका वीडियो सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान करवाया। इस स्थिति का जायजा खुद चुनाव में पुलिस पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए उत्तर प्रदेश के IPS अफसर अजय पाल शर्मा ने लिया।

बता दें कि IPS अफसर अजय पाल पहले भी जहाँगीर खान के समर्थकों को मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए हड़का चुके हैं, जिसके बाद TMC उनके विरोध में उतर गई थी।

एक वीडियो सामने आया, जिसमें CRPF के जवान एक व्यक्ति को लटकाकर ले जा रहे हैं, दावा किया जा रहा है कि यह व्यक्ति मतदान में बाधा डाल रहा था और मतदाताओं को परेशान कर रहा था। वीडियो में दिख रहा यह व्यक्ति TMC समर्थक बताया गया। सुरक्षाबल और पुलिस इस व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।

अन्य वीडियो में CRPF के जवान मतदान में भंग पैदा करने की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।

ऐसे ही बंगाल के भंगर में मतदान केंद्र पर ISF उम्मीदवार नौशाद सिद्दीकी के सामने उनके समर्थकों और TMC समर्थकों के बीच झड़प हो गई। इस झड़प में CRPF ने दखल दिया औऱ दोनों तरफ के गुंडों पर लाठीचार्ज कर खदेड़ दिया।

एक औऱ वीडियो में हिंसा कर रही भीड़ को CRPF के सुरक्षाबल संभालते नजर आ रहे हैं। मौजूदा भीड़ को सुरक्षाबलों ने खदेड़ दिया।

CRPF इस तरीके से चुनाव संभाल रही है कि लोगों को ममता बनर्जी की बंगाल पुलिस से ज्यादा सुरक्षाबलों पर भरोसा हो रहा है। BJP नेता सुवेंदु अधिकारी तक भवानीपुर में मतदान केंद्र पर स्थिति बिगड़ने की शिकायत CRPF से करते हैं, उनका कहना है कि पुलिस पर भरोसा नहीं है।

ये वीडियो पहले चरण के मतदान के दौरान का है। जब दार्जीलिंग के एक बूथ के पास कुछ गुंडे मतदान में बाधा डालने के लिए इकट्ठा हुए, तब CRPF के जवानों ने भीड़ को तुरंत खदेड़ दिया और शांतिपूर्ण मतदान कराया।

यह वीडियो बीरभूम का है, जहाँ पहले चरण में EVM में खऱाबी को लेकर इस्लामी भीड़ ने पुलिस और CRPF पर हमला किया। इस हमले में केंद्रीय बलों के कई जवान घायल हुए, कुछ लोग भी घायल हुए, जिन्हें CRPF के जवान कंधे पर उठाकर सहायता देते नजर आ रहे हैं।

दूसरे चरण में हिंसा की कोशिशें, लेकिन CRPF की सख्ती से हालात काबू में

इन वीडियो के अलावा भी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण के मतदान के दौरान 7 जिलों की 142 विधानसभा सीटों पर मतदान के बीच कई जगहों से तनाव और हिंसा की खबरें सामने आईं। नदिया जिले में BJP के एक पोलिंग एजेंट पर TMC के गुंडों ने हमला किया। वहीं आरजी कर रेप और मर्डर केस की पीड़िता की माँ, जो इस चुनाव में BJP उम्मीदवार हैं, उन्होंने भी आरोप लगाया कि TMC समर्थकों ने उनके साथ दुर्व्यवहार और हमला करने की कोशिश की। कई जगहों पर BJP के वाहनों को निशाना बनाने और वोटरों को डराने-धमकाने की घटनाएँ भी सामने आईं।

केंद्रीय सुरक्षाबलों ने बंगाल चुनाव की बदली तस्वीर

आखिर में तस्वीर साफ नजर आती है कि एक तरफ TMC लगातार केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती पर सवाल उठा रही है, उन्हें पक्षपाती बताने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ जमीन पर वही सुरक्षाबल चुनाव को हिंसा से बचाने में जुटे हुए हैं। बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन जिन इलाकों में पहले चुनाव के नाम पर डर और दबाव का माहौल बनता था, वहाँ इस बार सुरक्षाबलों की मौजूदगी ने हालात को काफी हद तक बदल दिया है।

सच्चाई यही है कि पूरे चुनाव के दौरान TMC के गुंडों की हिंसा को जिस तरह से कंट्रोल किया गया, उसने एक अलग ही तस्वीर पेश की है। हर कोशिश को समय रहते रोका गया, वोटरों को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश हुई और चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतरने नहीं दिया गया। ऐसे में विरोध और आरोपों के बीच यह सवाल और गहरा हो जाता है कि अगर सख्ती न होती, तो क्या बंगाल एक बार फिर उसी पुराने हिंसक दौर में लौट जाता?

NSA अजित डोभाल से मीटिंग के 2 दिन बाद UAE ने छोड़ा OPEC, मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे PM मोदी: जानिए- फैसले की वजह और इससे भारत को होने वाले फायदे

मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।

इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।

ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।

ओपेक क्या है और क्यों बना था?

ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।

उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।

कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?

UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।

ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?

UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।

सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।

UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।

ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।

इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।

UAE क्या हासिल करना चाहता है?

UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।

इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।

ओपेक पर इसका क्या असर पड़ेगा?

UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।

दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।

इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?

इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।

क्या भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।

UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।

इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।

कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।

UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।

इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।

साहित्य अकादमी या वामपंथियों का वैचारिक अखाड़ा? ममता कालिया को ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए मिले पुरस्कार से छिड़ी बहस

साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 की घोषणा पिछले दिनों हुई, जिसमें हिंदी में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रयागराज (पूर्व इलाहाबाद) के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश को याद करते हुए आया लेकिन इससे जुड़े विमर्श ने फिर से साहित्य अकादमी में वैचारिक प्रभाव और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी सरकार के 11 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई लोग मानते हैं कि अकादमी में वामपंथी-प्रगतिशील प्रभाव का दबदबा अब भी कायम है।

वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय ने इस पुरस्कार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने वामपंथियों के यशोगान से पूर्ण एक पुस्तक अभी छापी है जबकि मोदी धरोहर की रक्षा और उनके योगदान पर केंद्रित पुस्तक को सांस्कृतिक सचिव को लौटा दिया गया। यह घटना अकादमी के भीतर वैचारिक असंतुलन को उजागर करती है।

स्वायत्तता या पुरानी लॉबी का चक्रव्यूह?

साहित्य अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था है लेकिन इसका संविधान 1952 के सरकारी प्रस्ताव पर आधारित है, न कि संसदीय कानून पर। सर्वोच्च जनरल काउंसिल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सरकार के पाँच नामित सदस्य, राज्य प्रतिनिधि और भाषा विशेषज्ञ शामिल होते हैं। पुरस्कार चयन बहु-स्तरीय है-भाषा-विशेष जूरी, एक्जीक्यूटिव बोर्ड की मंजूरी और अंतिम घोषणा।

आउटगोइंग काउंसिल ही इनकमिंग सदस्यों का चयन करती है, जिससे निरंतरता तो बनी रहती है लेकिन गुटबंदी और लॉबिंग की गुंजाइश भी बढ़ जाती है।

प्रधानमंत्री या संस्कृति मंत्रालय सीधे जूरी में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हाल ही में पुरस्कार घोषणा में तीन महीने का विलंब हुआ क्योंकि संस्कृति मंत्रालय ने ‘रिवार्ड स्ट्रक्चरिंग’ के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी थी। वामपंथी लॉबी ने इसे स्वायत्तता पर हमला बताया लेकिन विलंब के बाद घोषणा हुई और ममता कालिया जैसे नाम सामने आए।

यह घटनाक्रम साबित करता है कि सरकार एक झटके में पूरी प्रक्रिया नहीं बदल सकती। संविधान संशोधन के लिए व्यापक विमर्श, कानूनी प्रक्रिया और संसदीय सहमति जरूरी है। बिना इसके नई निर्वाचन प्रक्रिया-जैसे रोटेशन सिस्टम, अधिक पारदर्शी नामांकन और युवा/महिला प्रतिनिधित्व-नहीं लाई जा सकती।

ममता कालिया का मामला: पुरस्कार और वैचारिक असहजता

‘जीते जी इलाहाबाद’ संस्मरण में विभाजन काल के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों पर टिप्पणियाँ, ईद की कुर्बानी और ताजा गोश्त का भावुक वर्णन, कुंभ मेले में स्वच्छता अभियान पर आक्षेप जैसी बातें हैं। उनके परिवार का इलाहाबाद के मुस्लिम बहुल मुहल्ले रानी मंडी से 6 दिसंबर 1992 को भागना भी दर्ज है। 

अपने संस्मरण के 159वें पृष्ठ पर कालिया एक प्रसंग दर्ज करती हैं। जिसमें बताती हैं कि जैदी साहब के घर पाँच किस्म का गोश्त बना था। जैदी, इंदिरा और नेहरू के प्रशंसक थे। उनका ही कोई किस्सा छेड़ बैठे थे। 

अब आती है सेकुलर किस्म की पंक्ति:- अचानक मेरे जेहन में घंटी बजी। आज कौन वार है? मंगलवार। हे भगवान यह कैसी इम्तहान की घड़ी आ गई। 

मैं सोम मंगल का कोई उपवास व्रत नहीं रखती थी। पर न जाने कब से एक रूढ़ि मन में बैठी थी कि आज मंगलवार को मांसाहार नहीं करते। मैने धीरे से रवि से कहा: मेरी प्लेट तुम ले लो। आज मंगल है। 

रवि इसमें कहते हैं, बुधवार को खा ले और मंगल को बचे। उसे जबरदस्ती खिलाना चाहिए।

ममता कालिया की पी​ढ़ी के ‘साहित्यकारों’ के लिए मंगलवार जैसे प्रसंग अपनी कहानी, नाटक, संस्मरण में डालना अनिवार्य होता है। ‘हिन्दू’ साहित्यकार ऐसा लिखकर ही प्रगतिशील हो सकता है। मुसलमानों को पाँच वक्त के नमाज पर सवाल नहीं उठाना पड़ता। प्रगतिशील खेमे में सारी परीक्षा हिन्दुओं को देनी है। 

भारत में प्रगतिशील मुसलमान लेखकों ने नासिख-मंसूख (Abrogation) के सिद्धांत पर चुप्पी साधी। पत्नी को पीटने की अनुमति, महिलाओं की गवाही आधी, बाल विवाह या आयशा की उम्र से जुड़े प्रश्नों पर प्रगतिशील ‘स्त्रीवादियों’ ने कुछ कहा ही नहीं। क्या मजबूरी थी? 

इस्लाम के अंदर मौजूद दंड व्यवस्था, वहाँ मौजूद जिहाद और काफिरों से संबंधित आयतों पर प्रगतिशीलों का कुछ ना लिखना, क्या साबित नहीं करता कि वे कथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों के संरक्षण में कट्टरपंथी मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रहे थे। खलीफा उस्मान बिन अफ्फान ने कुरान के पाठ में भिन्नता के कारण पैदा हुए विवादों को रोकने और पाठ की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए कुरैश की बोली में एक मानक प्रति (उस्मानी मुस्हफ) तैयार करवाई। इसके बाद, उन्होंने अन्य सभी व्यक्तिगत या कथित गैर-मानक प्रतियों को नष्ट कर दिया, जिससे एकता बनी रहे और पाठ में कोई हेरफेर न हो। 

क्या कभी किसी प्रगतिशील लेखक ने यह कहने का साहस जुटाया कि एके रामानुजन, थ्री हंडरेड रामायणा (1987) इसलिए लिख पाए क्योंकि इस देश में संवाद और विमर्श की परंपरा रही है। यहाँ वाल्मिकी रामायण के बाद श्रीराम के नाम पर काल्पनिक और षडयंत्र के हद तक लिखी गई झूठी कथाओं को भी जलाया नहीं गया। वह सब भी संरक्षित रहा। भारतीय परंपरा के इस शुक्ल पक्ष का उल्लेख जलेस और प्रलेस की किसी बैठक की मिनट्स में मिलता है क्या? नहीं मिलेगा? 

जलाई गई तो उन लोगों के हाथों ‘मनु स्मृति’ जो चौक चौराहों पर ऊँची आवाज में गा रहे थे, बोल की लब आजाद हैं तेरे। बोल जबाँ अब तक तेरी है। तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा। बोल कि जाँ अब तक तेरी है।

प्रगतिशील लेखक समझते हैं कि उनकी ये टिप्पणियां देश की बहुसंख्यक आबादी को असहज करती हैं, फिर भी ऐसी रचनाओं को चुन चुन कर पुरस्कार दिया जाता है। ममता कालिया के नाम का चयन करने वाली जूरी में अरुण कमल, अनामिका और डॉ. अरविंदाक्षन जैसे सदस्य थे। 

अकादमियों में अशोक वाजपेयी के ‘गुरुकुल’ से जुड़े नाम बार-बार दिखते हैं। ये दर्शाते हैं कि निर्णायक मंडल में पुरानी कांग्रेस-वाम मानसिकता का वर्चस्व बरकरार है। आज भी भारत सरकार के तमाम सांस्कृतिक केन्द्रो पर अशोक वाजपेयी एक महत्वपूर्ण नियामक बने हुए हैं। उनकी टीम के लोग सिस्टम में अपना काम करा लेने का हुनर जानते हैं।

राष्ट्रीय विचार को मजबूत बनाने के रास्ते

राष्ट्रीय विचार परिवार को अब विलाप नहीं, ठोस रणनीति चाहिए:

  1. व्यापक विमर्श – अकादमी संविधान की खामियां (आउटगोइंग काउंसिल का स्व-चयन) सार्वजनिक बहस का विषय बनें। लेख, गोष्ठियाँ, सोशल मीडिया से दबाव बने।
  2. अपने लोगों की उपस्थिति – निष्ठावान विद्वानों को राज्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संगठनों में स्थापित करना। वे नामांकन प्रभावित करेंगे।
  3. नई पीढ़ी का निर्माण – युवा लेखकों को प्रोत्साहन, प्रकाशन और मंच। आत्ममुग्धता छोड़नी होगी।
  4. वैकल्पिक संस्थाएँ – राष्ट्रीय विचार आधारित नई पुरस्कार योजनाएँ, साहित्यिक मंच शुरू करें। पुरानी व्यवस्था पर निर्भरता कम करें।
  5. तत्व-निष्ठा – ‘सर्टिफिकेशन’ की लालसा छोड़कर विचार से समझौता न करने वाले नेतृत्व को आगे लाएं।

नैतिक दबाव का हथियार

जहाँ वामपंथियों का ही वर्चस्व है और अकादमी में गैर-वामपंथी विचार के 8-10 सदस्य ही हैं और वे रहकर कुछ नहीं कर पा रहे। यदि वे अकादमी की इस गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से इंकार कर दें, तो फर्क पड़ेगा।

वामपंथियों ने दशकों में नैरेटिव बनाया है कि श्रेष्ठ लेखक वही, जो बीजेपी और आरएसएस से घृणा करे। उनके समूह में अल्पसंख्यक बनकर गलत होते देखते रहें, या सामूहिक त्यागपत्र देकर मनमानी उजागर करें। यदि आप पुरस्कार देने वालों से खुद को अलग नहीं करेंगे, तो शामिल माने जाएंगे। ऐसे में 100 में 8 लोगों का त्यागपत्र भी दबाव का औजार बन सकता है। ‘मूंदहों आँखी कतहूँ कुछ नाहीं’ वाली मानसिकता छोड़नी होगी।

भारत में 2015 का पुरस्कार वापसी अभियान ने दबाव बनाया था, भले एक भी सम्मान न लौटा हो। 

अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के पूर्व निदेशक जोसेफ कैंट ने ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति पर इस्तीफा देकर वैश्विक बहस खड़ी की। उन्होंने लिखा- “मैं आर्मी वेटरन हूं, मेरी पत्नी इजरायल की जंग में शहीद हुई, लेकिन यह युद्ध अमेरिका के हित में नहीं।” जोसेफ कैंट भी सोच सकते थे कि एक इस्तीफे से क्या होगा?

विलाप से संघर्ष की ओर

ममता कालिया का पुरस्कार उदाहरण भर है। पूरे 24 भाषाओं में देखें तो स्थिति स्पष्ट है। साहित्य अकादमी में राष्ट्रीय विचार को शिखर पर पहुँचाने के लिए अब ‘काम खत्म’ वाला फरमान नहीं, निरंतर संघर्ष चाहिए। सरकार एक झटके में प्रक्रिया नहीं बदल सकती, लेकिन विमर्श और दबाव से नई निर्वाचन प्रक्रिया ला सकती है।

राष्ट्रीय विचार के साधकों को एकजुट होकर हर जगह उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। त्यागपत्र, विमर्श, नई संस्थाएँ-ये हथियार हैं। यदि हम ‘बाकी सब ठीक, बस चल रहा है’ वाली लाइन रटते रहे, तो विमर्श की लड़ाई में हार तय है।

समय है कि हम विलाप, प्रलाप और अपलाप से ऊपर उठें। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ राष्ट्र की आत्मा हैं। इन्हें वामपंथी कब्जे से मुक्त कर राष्ट्रीय विचार का सच्चा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना हमारा दायित्व है। ‘सबते भले हैं मूढ जिन्हि न व्यापत जगत गति’– यह मानसिकता अब छोड़नी होगी।

सिर्फ सड़क नहीं, ₹36000 करोड़ की वो आर्थिक रीढ़ जो UP के विकास को देगी नई दिशा: पढ़ें- ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ की सारी जानकारी, जिसका PM मोदी 29 अप्रैल को करेंगे उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से राज्य के सबसे बड़े एक्सप्रेस-वे ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ का उद्घाटन करेंगे। ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ सिर्फ दूरी कम करने का काम नहीं करेगा बल्कि पूरे राज्य की आर्थिक और तकनीकी तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह विशाल कॉरिडोर एक साथ सड़क, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा सप्लाई, सुरक्षा सिस्टम और औद्योगिक विकास का आधार बनने जा रहा है। यही वजह है कि इसे एक ‘नेक्स्ट जेनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के विकास की रफ्तार को भी तय करेगा।

परियोजना का आकार, लागत और डिजाइन

गंगा एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है। इसे छह लेन के एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे के रूप में तैयार किया गया है जिसे भविष्य में आठ लेन तक बढ़ाया जा सकता है। इस पूरी परियोजना पर करीब 36,230 करोड़ रुपए की लागत आई है। इसकी डिजाइन स्पीड 120 किमी प्रति घंटा रखी गई है और अधिकांश संरचनाओं को पहले से ही आठ लेन के हिसाब से बनाया गया है ताकि भविष्य में विस्तार आसान हो।

किन जिलों को जोड़ता है यह एक्सप्रेसवे

यह एक्सप्रेस-वे मेरठ के बिजौली गाँव से शुरू होकर प्रयागराज बाईपास तक जाता है। इसके रास्ते में मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूँ, शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज कुल मिलाकर 12 जिले आते हैं। यह कॉरिडोर पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को एक ही हाई-स्पीड मार्ग से जोड़ता है जिससे क्षेत्रीय संतुलन और कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

यात्रा समय और कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव

इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद मेरठ से प्रयागराज तक का सफर जो पहले 10 से 12 घंटे का होता था वो अब घटकर लगभग 6 से 7 घंटे रह जाएगा। इससे न केवल आम यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल ढुलाई और औद्योगिक परिवहन भी तेज होगा। यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे और अन्य प्रमुख सड़कों से कई इंटरचेंज के जरिए जुड़ा है जिससे अलग-अलग शहरों तक सीधी पहुँच आसान होगी।

निर्माण मॉडल और इंजीनियरिंग की खासियत

गंगा एक्सप्रेसवे को 12 पैकेज में बाँटकर बनाया गया है जिनमें से बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र, खासकर अदाणी ग्रुप द्वारा तैयार किया गया है। करीब 464 किलोमीटर हिस्से का निर्माण DBFOT (Design, Build, Finance, Operate and Transfer) मॉडल पर किया गया है, जिसमें निर्माण, फाइनेंस और संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनी के पास रहती है। निर्माण के दौरान बड़े पुल, अंडरपास, फ्लाईओवर, रेल ओवरब्रिज और कई इंटरचेंज बनाए गए हैं। गंगा और रामगंगा जैसी नदियों को पार करने के लिए लंबे पुल भी तैयार किए गए हैं।

पर्यावरण और संसाधनों का संतुलन

इस परियोजना के निर्माण में लाखों टन कचरे का उपयोग किया गया है। इससे निर्माण में रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिला है। इसके साथ ही करीब 18 लाख पेड़ लगाए गए हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह दिखाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर बनाए जा सकते हैं।

डिजिटल हाईवे और यूटिलिटी कॉरिडोर

गंगा एक्सप्रेसवे के साथ 2 मीटर चौड़ा यूटिलिटी कॉरिडोर बनाया गया है, जो इसे डिजिटल हाईवे बनाता है। इसके भीतर ऑप्टिकल फाइबर, बिजली की लाइनें और गैस पाइपलाइन बिछाई जा सकती हैं। इस व्यवस्था के कारण सड़क को खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही नेटवर्क 519 गाँवों तक ब्रॉडबैंड और 5G कनेक्टिविटी पहुँचाने में मदद करेगा और भविष्य में डेटा सेंटर जैसी सुविधाओं के लिए आधार बनेगा।

ऊर्जा कॉरिडोर और गैस सप्लाई

इस एक्सप्रेसवे के साथ ऊर्जा गंगा परियोजना के तहत गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना भी है। इससे रास्ते में आने वाले गाँवों और उद्योगों को PNG और CNG जैसी सस्ती ईंधन सुविधाएँ मिल सकेंगी। इससे न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।

स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और सुरक्षा तकनीक

एक्सप्रेसवे पर स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है जो AI और सेंसर तकनीक पर काम करता है। हर 2-3 किलोमीटर पर लगे कैमरे और सेंसर कंट्रोल रूम से जुड़े हैं। अगर कोई वाहन रुकता है, गलत दिशा में चलता है या कोई हादसा होता है, तो तुरंत अलर्ट भेजा जाता है। इससे एंबुलेंस और पेट्रोलिंग टीम तेजी से मौके पर पहुँच सकती है और हादसों में जान बचाने की संभावना बढ़ती है।

इसके अलावा गंगा एक्सप्रेसवे में रिकॉर्ड 24 घंटे के भीतर 10.3 किलोमीटर लंबा कंक्रीट क्रैश बैरियर बिछाया गया है। इसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। ये हादसे के वक्त वाहनों की टक्कर को रोकने में सक्षम होते हैं।

3.5 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप

शाहजहाँपुर जिले में गंगा एक्सप्रेसवे पर 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन लैंडिंग सुविधा (एयरस्ट्रिप) का निर्माण किया गया है। इसे खास तौर पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर यहाँ वायुसेना के विमान लैंडिंग और टेक-ऑफ कर सकें। इस एयरस्ट्रिप की उपयोगिता को परखने के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा यहां ट्रायल लैंडिंग भी की जा चुकी है।

परियोजना से जुड़े विवरण के अनुसार, इस एयरस्ट्रिप का निर्माण एक्सप्रेसवे के उसी ढाँचे के भीतर किया गया है, लेकिन इसकी सतह को सामान्य सड़क की तुलना में ज्यादा मजबूत बनाया गया है। इसके साथ ही इस एयरस्ट्रिप पर करीब 250 कैमरे लगाए गए हैं, जिससे इसकी निगरानी लगातार की जा सके और इसे एक्सप्रेसवे के समग्र सुरक्षा सिस्टम से जोड़ा जा सके।

टोल सिस्टम और आर्थिक असर

गंगा एक्सप्रेसवे की एक बड़ी खासियत इसकी टोलिंग और ट्रैफिक फ्लो सिस्टम में छिपी है। इसमें ‘क्लोज्ड टोलिंग सिस्टम’ लागू किया गया है यानी वाहन चालक को सिर्फ एंट्री और एग्जिट पर ही रुकना होगा और दूरी के हिसाब से भुगतान करना होगा।

इससे बार-बार ब्रेक लगाने और गति बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे ईंधन की बचत होगी और सफर ज्यादा स्मूथ बनेगा। इस पूरे कॉरिडोर में 2 मुख्य टोल प्लाजा मेरठ और प्रयागराज में बनाए गए हैं जबकि 19 रैम्प टोल प्लाजा अलग-अलग एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स पर होंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार के लिए संभावित टोल दर लगभग 2.55 रुपए प्रति किलोमीटर हो सकती है जिससे पूरे एक्सप्रेसवे का सफर करीब 1500 रुपए में पूरा हो सकता है। हालाँकि, अंतिम दर सरकार तय करेगी। इसके अलावा 18 एक्सेस नोड्स बनाए गए हैं, जहाँ यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और प्रमुख जिला सड़कों से जुड़ता है जिससे कनेक्टिविटी का जाल और मजबूत होता है।

इसके अलावा रास्ते में कई लॉजिस्टिक और औद्योगिक कॉरिडोर विकसित किए जाएँगे जिससे रोजगार, निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। किसानों को भी सीधे बाजार तक पहुँच मिलने से बेहतर कीमत मिल सकेगी।

धर्म पूछकर चाकू मारना था ISIS से जुड़ने का पहला टेस्ट, ATS ने खोली जुबैर के कट्टरपंथी मंसूबों की पोल: जानें- क्या है ‘लोन वुल्फ’ अटैक, जिसे जिहादी ने मुंबई में दिया अंजाम

मुंबई के मीरा रोड इलाके में धर्म पूछकर जैब जुबैर अंसारी ने दो सिक्योरिटी गार्डों सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा पर चाकू से हमला कर दिया। जुबैर ने दोनों गार्डों को ‘कलमा’ सुनाने को भी कहा और ऐसा न करने पर उसने जान से मारने की कोशिश की। आरोपित जुबैर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जाँच एजेंसियाँ इसे ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के तौर पर देख रही हैं।

पूरा मामला 27 अप्रैल 2026 को मीरा रोड के नया नगर इलाके स्थित निर्माणाधीन इमारत ‘अस्मिता ग्रांड मैन्सन’ का है, जहाँ सुरक्षा में दो सिक्योरिटी गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा तैनात थे। पुलिस के मुताबिक, तड़के सुबह 3 बजे आरोपित जुबैर अंसारी ने पहले गार्ड सुब्रतो सेन से मस्जिद का रास्ता पूछा। एक घंटे बाद वापस आया और धर्म पूछने लगा। पुलिस का कहना है कि आरोपित जुबैर ने दूसरे गार्ड राजकुमार मिश्रा से कलमा भी पड़वाया और जब वह कलमा नहीं पढ़ पाए तो चाकू से हमला कर दिया।

हमले में दोनो गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा गंभीर रूप से घायल हुए है, जिनका इलाज जारी है। डॉक्टर्स के अनुसार, सुब्रतो सेन खतरे से बाहर हैं जबकि राजकुमार मिश्रा की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं पुलिस ने 31 साल के आरोपित जैब जुबैर अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है।

पीड़ित गार्ड का बयान

इलाज के बाद खतरे से बाहर गार्ड सुब्रतो सेन ने पुलिस को बयान दिया है। सेन ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि घटना लगभग सुबह 3 बजे की है, जब वह ड्यूटी पर थे। जुबैर अंसारी उनके पास आया और पूछा कि यहाँ कोई मस्जिद है क्या? इस पर सेन ने जवाब दिया कि दाएँ हाथ पर एक मस्जिद है, लेकिन उन्हें नाम नहीं मालूम। जुबैर ने गार्ड सेन से आगे पूछा, “क्या तुम हिंदू हो?” सेन ने हामी भरी। इसके बाद जुबैर वहाँ से चला गया। लेकिन सेन ने बताया कि वह आसपास सड़क पर घूमता रहा।

सेन ने आगे बताया, ” मैं लगभग 4 बजे मैं राजज सिनेमा के पास एक ईरानी चाय की दुकान पर चाय पीने गया। तब वहाँ मुझे वही आदमी (जुबैर अंसारी) दिखा। चाय पीने के बाद मैं 4.30 बजे अपनी ड्यूटी वाली जगह पर वापस आ गया। वही आदमी मेरे पास आया और कहने लगा- तुम हिंदू हो, है न? उसने फिर मेरे दाएँ हाथ को पकड़ा और चाकू से हमला कर दिया। मैंने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसने चाकू मेरी पींठ पर घोंप दिया।”

(फोटो साभार: IANS)

सेन ने आगे बताया, “मैं जैसे-तैसे उसके हमले से बचकर सुपरवाइजर के केबिन में पहुँचा और सारा मामला बताने लगा। तभी जुबैर अंसारी वहाँ पहुँच गया औऱ सुपरवाइजर से भी वही पूछा- तुम भी हिंदू हो, है न? अगर नहीं हो तो कलमा पढ़कर सुनाओ। जब मिश्रा कलमा नहीं पढ़ सके, तो जुबैर ने उनको चाकू से गोद डाला। डर के मारे मैं वहाँ से भाग गया और इमारत के पीछे जाकर छिप गया। 5-7 मिनट बाद जब मुझे कोई हलचल सुनाई नहीं दी, तब मैंने मिश्रा सर को फोन किया। उस समय मिश्रा सर रो रहे थे और उन्होंने मुझसे कहा- मैं मर जाऊँगा। मैं केबिन में पहुँचा तो दो और गार्ड मौके पर मौजूद थे। वे मिश्रा सर और मुझे अस्पताल ले गए।”

90 मिनट के जुबैर गिरफ्तार, फोन में मिला कट्टरपंथी कंटेन्ट

सूचना मिलते ही महाराष्ट्र पुलिस की एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने CCTV की मदद से आरोपित जुबैर अंसारी की पहचान की और 90 मिनट के भीतर उसके मीरा रोड ईस्ट के नया नगर इलाके स्थित घर से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गार्ड सुब्रतो सेन की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई।

पुलिस ने बताया कि आरोपित जुबैर अंसारी मूलरूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला था। वह साइंस से ग्रेजुएट है और 2010 से 2019 तक अमेरिका में भी रह चुका है। नौकरी नहीं मिली तो वह वापस भारत लौट आया और मीरा रोड में अकेले रहने लगा। यह भी बताया गया कि वह केमिस्ट्री की ऑनलाइन कोचिंग पढ़ाता था।

महाराष्ट्र ATS ने जुबैर के घर की छापेमारी

मामला गंभीर होने के चलते अब इसकी जाँच महाराष्ट्र ATS को सौंपी गई है। जाँच एजेंसियाँ इस हमले को संभावित ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के रूप में देख रही हैं। ATS ने आरोपित जुबैर अंसारी के किराए घर पर छापेमारी की। छापेमारी में जुबैर के घर से हाथ से लिखे गए कुछ नोट्स बरामद हुए। जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोट्स में ISIS में भर्ती होने की इच्छा जताई गई थी और गार्ड पर हमले को इस ओर अपना पहला कदम बताया गया था।

जाँच एजेंसियों मान रही हैं कि कि वह एकांतवास में रहता था इसीलिए इंटरनेट कट्टरपंथी विचारधारा का कंटेन्ट देखता था, जिससे प्रभावित होकर उसने यह हमला किया। फिलहाल उसके मोबाइल फोन और लैपटॉप की फोरिंसिक जाँच की जा रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वह किसी विदेशी आतंकी नेटवर्क या हैंडलर के संपर्क में था या नहीं।

क्या है ‘लोन वुल्फ’ हमला?

मुंबई में हिंदू गार्ड पर धर्म पूछकर और कलमा न सुनाने पर चाकू से किए गए इस हमले को जाँच एजेंसियाँ ‘लोन वुल्फ‘ आंतकी हमले के रूप में देख रही हैं। यानी वो आतंकी हमला, जिसमें कोई अकेला व्यक्ति किसी बड़े आतंकी संगठन के सीधे आदेश या मदद के बिना अकेले ही हमला करता है। ऐसा हमलावर अक्सर इंटरनेट, सोशल मीडिया या कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर खुद ही योजना बनाता है और उसे अंजाम देता है।

चूँकि इसमें कोई बड़ा नेटवर्क या कोई बड़ा संगठन शामिल नहीं होता, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए ऐसे हमलों का पहले से पता लगाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि ‘लोन वुल्फ’ आज दुनिया भर में सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। मुंबई में गार्ड पर हमला भी इसी तरह प्लान किया गया था, यहाँ आरोपित इंटरनेट से कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था और वह हिंदुओं से नफरत करने लगा इसीलिए उसने पीड़ितों से धर्म पूछकर उनपर हमला किया।

अपर्णा यादव के बहाने सपा में संग्राम: जानिए- क्यों ‘परिवार’ बनाम ‘कंट्रोल’ की लड़ाई में फिर भिड़े अखिलेश-शिवपाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपर्णा यादव को लेकर उठा ताजा विवाद महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के भीतर वर्षों से सुलग रहे सत्ता संघर्ष की एक और खुली परत है। मामला तब भड़का जब भाजपा के विरोध प्रदर्शन के दौरान अपर्णा यादव भी सड़कों पर उतरीं और सपा-कॉन्ग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उनके झंडे जलाए गए।

यही वह बिंदु था जिसने सपा कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के भीतर आक्रोश पैदा किया और अपर्णा के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया शुरू हुई। लेकिन यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है – क्योंकि इस विरोध के बीच शिवपाल यादव ने इसे ‘परिवार’ का मामला बताते हुए सार्वजनिक प्रतिक्रिया से बचने की सलाह दी जबकि अखिलेश यादव ने इस लाइन को खारिज कर दिया।

यहीं से साफ हो गया कि यह टकराव अपर्णा के विरोध से ज्यादा उस नियंत्रण की लड़ाई है, जो सपा की राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुकी है।

अपर्णा के बहाने फिर उठा पुराना सवाल

अपर्णा यादव का विरोध किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं बल्कि उनके राजनीतिक रुख से उपजा। भाजपा के प्रदर्शन में शामिल होकर सपा और कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी करना और झंडे जलाने जैसी घटनाओं ने सपा के भीतर स्वाभाविक आक्रोश पैदा किया।

यह सिर्फ एक राजनीतिक असहमति नहीं थी बल्कि इसे सपा के खिलाफ ‘खुले मोर्चे’ के रूप में देखा गया। ऐसे में पार्टी के भीतर प्रतिक्रिया आना तय था। लेकिन यहीं पर शिवपाल यादव का ‘परिवार’ वाला तर्क और अखिलेश यादव का ‘पार्टी लाइन’ वाला रुख आमने-सामने आ गया।

यह वही बिंदु है जहाँ सपा के भीतर वर्षों पुराना सवाल फिर खड़ा हो गया है- क्या पार्टी में फैसले रिश्तों के आधार पर होंगे या एक केंद्रीकृत नेतृत्व के हिसाब से?

2012 में सत्ता के साथ बदला संतुलन

अखिलेश और शिवपाल में टकराव काफी पहले से रहा है। 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था बल्कि सपा के भीतर शक्ति संतुलन के बदलने की शुरुआत भी थी।

एक ओर युवा चेहरा था, जिसे आगे बढ़ाया गया, वहीं दूसरी ओर संगठन और जमीन पर पकड़ रखने वाले शिवपाल यादव थे। शुरुआत में यह द्वंद्व दबा रहा लेकिन जैसे-जैसे फैसलों पर नियंत्रण का सवाल उठा, यह टकराव खुलने लगा। टिकट वितरण, प्रशासनिक हस्तक्षेप और संगठनात्मक निर्णयों में बढ़ती खींचतान ने दोनों खेमों को अलग-अलग ध्रुवों में बदल दिया।

2016 का विस्फोट: जब चाचा-भतीजे आमने-सामने आ गए

2016 में कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद ने इस संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया। अखिलेश यादव ने इस विलय को सिरे से खारिज किया जबकि शिवपाल यादव इसके समर्थन में थे। इसके बाद घटनाएँ तेजी से बढ़ीं- मंत्रालय छीने गए, पद बदले गए और अंततः बर्खास्तगी तक की नौबत आ गई।

यह टकराव इतना गहरा था कि पार्टी दो हिस्सों में बँटती नजर आई और मामला चुनाव आयोग तक पहुँच गया। 2017 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे साफ हो गया कि अब सपा में अंतिम निर्णय का केंद्र बदल चुका है।

परिवार में दखल का नैरेटिव: प्रतीक-अपर्णा प्रकरण की चर्चा

सपा की राजनीति में यह नैरेटिव भी लंबे समय से चलता रहा है कि प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के निजी संबंधों में आई खटास तक में राजनीतिक प्रभाव की भूमिका रही। यह आरोप और चर्चाएँ भले ही आधिकारिक रूप से स्थापित न हों लेकिन यह धारणा जरूर बनी कि सत्ता के समीकरणों का असर परिवार के निजी दायरे तक पहुँच गया था।

यहाँ यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब शिवपाल यादव ‘परिवार’ की मर्यादा की बात करते हैं, तो वह सिर्फ एक रिश्ते की रक्षा नहीं बल्कि उस पूरे ढाँचे की बात कर रहे होते हैं जिसे धीरे-धीरे राजनीतिक नियंत्रण के आगे कमजोर किया गया।

शिवपाल का असंतोष और मुलायम का कड़ा आकलन

शिवपाल यादव का असंतोष कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है और समय-समय पर उनके बयानों में यह झलकता भी रहा है कि उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिल रही।लेकिन करहल में दिया गया वह चर्चित बयान, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना एक गलती थी, पूरे विवाद को एक अलग ही गंभीरता देता है।

यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं बल्कि उस पीढ़ीगत और नेतृत्वगत टकराव का संकेत माना गया, जो वर्षों से सपा के भीतर पनपता रहा है। आज जब शिवपाल खुद को ‘मामूली सिपाही’ बताते हैं, तो यह उसी लंबे असंतोष और हाशिए पर चले जाने की भावना का विस्तार प्रतीत होता है।

‘औरंगजेब’ से तुलना और सत्ता का चरित्र

उल्लेखनीय है कि अमर सिंह ने एक समय दावा किया था कि मुलायम सिंह यादव ने खुद उनसे कहा था कि अखिलेश यादव का व्यवहार औरंगजेब जैसा है। यह आरोप भले ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहा ह, लेकिन इसने उस धारणा को मजबूत किया कि सपा में सत्ता संघर्ष ने रिश्तों की सीमाओं को कई बार पीछे छोड़ दिया। सार्वजनिक मंचों पर टकराव, माइक को लेकर धक्का-मुक्की जैसी घटनाएँ भी इसी तनाव की झलक देती रही हैं।

मजबूरी की सुलह, मगर दरार कायम: 2022 के बाद अब तक की स्थिति

मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव ने एक बार फिर परिवार को साथ खड़ा किया लेकिन यह एक भावनात्मक और राजनीतिक मजबूरी ज्यादा लगी। शिवपाल यादव ने समर्थन दिया और सपा में वापसी भी हुई लेकिन घटनाओं की हालिया कड़ी यह दिखाती है कि अंदरूनी दरार खत्म नहीं हुई। अपर्णा यादव के मुद्दे पर सामने आया ताजा टकराव इसी बात की पुष्टि करता है।

चुनावी असर: क्या फिर दोहराएगा इतिहास?

चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में इस तरह का टकराव सपा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती है, कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होता है और विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है।

सबसे अहम यह कि जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने ही भीतर संतुलन नहीं बना पा रही।ऐसे में, पूरे घटनाक्रम को अगर एक रेखा में समझा जाए तो स्पष्ट होता है कि अपर्णा यादव इस कहानी का कारण नहीं, बल्कि एक ट्रिगर हैं।

असली कहानी वही पुरानी है- सत्ता, नियंत्रण और वर्चस्व की। एक तरफ शिवपाल यादव हैं, जो परिवार और परंपरा की बात करते हैं, दूसरी तरफ अखिलेश यादव हैं, जो केंद्रीकृत नियंत्रण के साथ पार्टी को चलाना चाहते हैं।

जब तक यह टकराव बना रहेगा, तब तक हर नया विवाद, चाहे वह अपर्णा का हो या किसी और का, सपा के भीतर इस संघर्ष को फिर से सतह पर लाता रहेगा। यही इस पूरी कहानी का सार है, और यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है।

जिन IPS के खौफ से हाजिरी लगा अपराधियों ने किए सरेंडर, उनको घसीटने का ख्वाब देख रही TMC: जानिए- कौन हैं अजय पाल शर्मा, जिन्हें बंगाल में ECI ने बनाया पर्यवेक्षक

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के चर्चित IPS अफसर अजय पाल शर्मा को बंगाल चुनाव में पर्यवेक्षक बनाए जाने के बाद सियासी बवाल मच गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता उन्हें धमकाने लगे हैं। बंगाल में बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण का विधानसभा चुनाव होना है। जिन इलाकों में दूसरे चरण का चुनाव हो रहा है, उन्हें पारंपरिक रूप से TMC का गढ़ माना जाता रहा है।

इन इलाकों में मतदाताओं पर दबाव की कोशिशें ना हों और चुनाव निष्पक्ष रहे इसके लिए चुनाव आयोग ने सख्त रणनीति अपनाई है और कई सख्त अधिकारियों को पुलिस पर्यवेक्षक के रूप में तैनात किया गया है। इसी कड़ी में अजय पाल शर्मा की भी दक्षिण 24 परगना का ऑब्जर्वर बनाया गया है। हालाँकि, अजय पाल को लेकर विवाद शुरू हो गया है और TMC व समाजवादी पार्टी ने उन पर सवाल उठाए हैं।

जहाँगीर को ‘चेतावनी’ देने पर शुरू हुआ विवाद

अजय पाल शर्मा को लेकर विवाद TMC के उम्मीदवार जहाँगीर को चेतावनी देने से शुरू हुआ। अजय पाल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें वह TMC प्रत्याशी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले जहाँगीर खान के घर पर जाकर उनके ‘गुंडों’ को सख्त चेतावनी देते दिख रहे हैं।

बीजेपी की आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने भी X पर यह वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में अजय पाल कह रहे हैं, “जहाँगीर के घरवाले भी खड़े हैं। उसको बता देना कायदे से, बार-बार जो खबरें आ रही हैं कि उसके लोग धमका रहे हैं। तो फिर अच्छे से खबर लेंगे, बाद में रोना पछताना मत।”

अमित मालवीय ने लिखा, “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट और यूपी पुलिस के सिंघम अजय पाल शर्मा को दक्षिण 24 परगना में पुलिस पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात किया गया है। उन्होंने तुरंत ही अपना रुख स्पष्ट कर दिया और अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी जहाँगीर खान के परिवार को कड़े शब्दों में चेतावनी दी।” मालवीय ने लिखा, “यह साफ संदेश है कि धमकियों और मनमानी का दौर खत्म हो गया है। कानून व्यवस्था कायम रहेगी और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने वालों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।”

बौखला गई TMC

अजय पाल शर्मा की सख्त चेतावनी सुन TMC बौखला गई और अजय पाल शर्मा के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। TMC के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “साफ-साफ शब्दों में अजय पाल शर्मा को बताना चाहता हूँ। आपके ऊपर हमारी नजर है। आप जो गैर-कानूनी काम कर रहे हैं, रात के अँधेरे में रेड कर रहे हैं। महिलाओं के साथ अश्लील व्यवहार कर रहे हैं।”

रिजू दत्ता ने कहा, “अपने बीजेपी के मालिकों के निर्देश पर जो असंवैधानिक काम आप कर रहे हैं। मैं आपको बता देना चाहता हूँ 4 तारीख को नतीजे आने के बाद आप जहाँ भी भाग जाएँ, आप छिप नहीं पाएँगे।”

रिजू दत्ता ने अजय पाल शर्मा को धमकाते हुए कहा, “आपको ऐसा लगता होगा कि दूसरे राज्य में हमारे बीजेपी के मालिक हमें बचा लेंगे। मैं सीधे तौर पर कहना चाहता हूँ कि आपके खिलाफ FIR होगी, चार्जशीट होगी और आपको घसीटकर कोर्ट में लाया जाएगा, जहाँ पर कानून सख्त-से-सख्त कार्रवाई आपके खिलाफ करेगा। कोई बीजेपी का मालिक आपको बचा नहीं पाएगा।”

TMC की राज्यसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने X पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए पोस्ट लिखा। महुआ ने लिखा, “मेरे फेयर & लवली बबुआ अजय पाल- हम तो वो लोग हैं जो कायदे से आपके छोटे फैंटा और बड़े फैंटा का भी इलाज कर लेते हैं। हीरो गिरी थोड़ा संभाल कर कीजिए।”

अजय पाल को लेकर बौखलाहट सिर्फ TMC तक ही सीमित नहीं रही बल्कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी बौखला गए और अजय पाल पर आरोप लगाने लगे। उन्होंने X पर IPS अधिकारी का एक वीडियो शेयर कर लिखा, “प. बंगाल में भाजपा ने ऑब्जवर के नाम पर रामपुर व संभल में टेस्ट किये हुए अपने एजेंट भेजे हैं लेकिन इनसे कुछ होने वाला नहीं। दीदी हैं, दीदी रहेंगी!”

अखिलेश ने आगे लिखा, “सही समय आने पर भाजपा और उनके संगी-साथियों के इन जैसे ‘एजेंडों के एजेंटों’ की सारी आपराधिक करतूतों की गहरी जाँच होगी और बेहद सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी। ये सब अधिकारी के रूप में अनरजिस्टर्ड लोगों के अनरजिस्टर्ड अंडरग्राउंड सदस्य हैं। हम न इन्हें भागने देंगे, न भूमिगत होने देंगे। ये खोज के लाए जाएँगे, खोद के लाए जाएँगे और अपने कुकृत्यों के लिए कानूनी सजा भी पाएँगे।”

यूँ ही नहीं है TMC की बौखलाहट

TMC की बौखलाहट यूँ ही नहीं है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा होना लंबे समय से आम रहा है, नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा वोट के लिए लोगों को धमकाना। यहाँ तक की हत्या और बमबाजी की खूब घटनाएँ सामने आती रही हैं। हालाँकि, इस बार चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि वो किसी भी सूरत में चुनावी हिंसा को बर्दाश्त नहीं करेगा। चुनाव आयोग ने बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की है और पुलिस अधिकारियों के भी लगातार तबादले किए हैं।

भयमुक्त चुनाव के लिए बंगाल में करीब 2,400 अर्धसैनिक बलों की कंपनियाँ तैनात की गई हैं जिनमें लगभग 2,40,000 जवान शामिल हैं। चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव भयरहित, हिंसारहित, धमकी रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ और सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे। बंगाल में बीजेपी के आक्रामक प्रचार और प्रबंधन के चलते TMC को इस बार सत्ता जाने का डर सता रहा है। इन चुनावों का दूसरा चरण ही TMC को अपने लिए राहत लग रहा है क्योंकि यहीं से उसे अधिक सीटें मिलने की उम्मीद है।

हालाँकि, चुनाव में वोटरों पर किसी भी तरह का दबाव ना बन पाए इसलिए चुनाव आयोग ने बाहरी अधिकारियों को भी पर्यवेक्षक बनाकर तैनात किया है। अजय पाल शर्मा जैसे ये पर्यवेक्षक चुनावों में किसी भी तरह की धमकी-हिंसा को रोकने के लिए जमीन पर लगातार काम कर रहे हैं। TMC से जुड़े लोगों द्वारा किसी भी तरह का दबाव ना बनाया जा सके इसकी पूरी तैयारी की जा रही है। इन अधिकारियों का यही आक्रामक रवैया TMC की आँख की किरकिरी बन गया है। वो अजय पाल पर निजी हमले से लेकर उन्हें धमकाने तक पर उतर आए हैं।

कौन हैं एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अजय पाल शर्मा?

2011 बैच के IPS अधिकारी अजय पाल शर्मा को उत्तर प्रदेश पुलिस में एक सख्त और तेज-तर्रार अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनकी कार्यशैली और अपराधियों के प्रति कड़े रुख के कारण उन्हें अक्सर ‘यूपी का सिंघम’ और ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ कहा जाता है।

26 अक्टूबर 1985 को लुधियाना में जन्मे अजय पाल शर्मा ने 19 दिसंबर 2011 को भारतीय पुलिस सेवा जॉइन की। हाल ही में उन्हें पदोन्नति देकर DIG बनाया गया है और इस समय वे प्रयागराज में जॉइंट पुलिस कमिश्नर के रूप में तैनात हैं। खास बात यह है कि IPS बनने से पहले उन्होंने डेंटल साइंस की पढ़ाई की थी और वह पेशे से डॉक्टर भी रह चुके हैं।

शिक्षा के मामले में भी उनका रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा है। उन्होंने UPSC की तैयारी 2008 में शुरू की थी। 2009 में प्रारंभिक सफलता मिलने के बावजूद इंटरव्यू पार नहीं कर सके लेकिन हार नहीं मानी और बाद में ऑल इंडिया 17वीं रैंक हासिल कर आईपीएस बने। स्कूल के दिनों में भी वह टॉपर रहे और हाईस्कूल में राज्य स्तर पर शीर्ष स्थान हासिल किया। साथ ही हिंदी, अंग्रेजी और गणित में पूरे 100 अंक प्राप्त किए।

उनकी पहली पोस्टिंग सहारनपुर में हुई जिसके बाद उन्होंने मथुरा, नोएडा, जौनपुर सहित कई जिलों में काम किया। 16 मार्च 2018 से 7 जनवरी 2019 तक वह गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के SSP रहे, जहाँ उन्होंने अपराध के खिलाफ सख्त अभियान चलाया। उनके कार्यकाल में कई इनामी बदमाश इलाके छोड़कर भाग गए। उनके खौफ से अपराधियों ने खुद थाने जाकर सरेंडर करना शुरू कर दिया था। अपराधी तख्ती लटकाकर थाने जाते और सरेंडर कर देते।

साल 2019 में उनका नाम पूरे प्रदेश में तब चर्चित हुआ जब रामपुर में छह साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपित को मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया। इस कार्रवाई के बाद उनकी छवि और भी सख्त अधिकारी के रूप में स्थापित हुई। इसके अलावा कैराना पलायन से जुड़े आरोपित की गिरफ्तारी भी उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।

अजय पाल शर्मा ने अपने करियर में 5 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक के कई इनामी अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की और कई को मुठभेड़ों में ढेर किया। खनन माफिया पर एनएसए लगाने जैसे कड़े कदम भी उठाए। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी नीति भी स्पष्ट रही, उन्होंने 63 से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करवाई, यहाँ तक कि नोएडा में एक इंस्पेक्टर पर उसी के थाने में केस दर्ज कराया।

कुल मिलाकर अजय पाल शर्मा की पहचान एक ऐसे पुलिस अधिकारी की है जो फिटनेस, अनुशासन और अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के लिए जाने जाते हैं। उनकी यही नीति अब बंगाल में TMC के लिए सिरदर्द बन रही है।

कश्मीर के जिस मदरसे से तालीम लेकर निकल रहे थे बड़े-बड़े आतंकी, उस पर लगा ताला: जानिए ‘सिराज-उल-उलूम’ का पुलवामा हमले से कैसे था कनेक्शन

जम्मू-कश्मीर के इमाम साहिब शोपियां स्थित राज्य के सबसे बड़ा मदरसा ‘दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम’ पर आतंकी गतिविधियों के चलते ताला लग गया है। मदरसे को प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी ने खड़ा किया था, जिससे कई आतंकी निकले थे। पुलवामा हमले का आतंकी सज्जाद अहमद भट ने भी इसी मदरसे से तालीम ली थी।

मदरसे पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने गैर कानूनी गतिविधियों के चलते UAPA एक्ट, 1967 के तहत कारवाई की है। प्रशासन का कहना है कि मदरसे से आतंकी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए फंडिंग की जा रही थी। प्रशासन को मदरसे की फंडिंग और खर्च में बड़ा अंतर मिला, जिसके कारण मदरसे को सील कर दिया गया।

वहीं पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की चीफ महबूबा मुफ्ती ने मदरसे पर सील लगाने को लेकर विरोध किया है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर महबूबा मुफ्ती ने लिखा, “दारुल उलूम जामिया सिराज उल उलूम को UAPA के तहत गैरकानूनी संगठन घोषित करना बेहद अन्यायपूर्ण फैसला है। इस संस्थान ने ऐसे कई डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर तैयार किए हैं, जिन्होंने देश की ईमानदारी और समर्पण के साथ सेवा की है।”

15 एकड़ की जमीन पर फैला मदरसा 25 साल पुराना

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दारुल उलूम जामिया सिराज-उल-उलूम नाम से यह मदरसा लगभग 25 साल पुराना है, जिसे जमात-ए-इस्लामी ने विदेशी फंडिंग जुटाकर खड़ा किया था। यह मदरसा 15 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है और इसके साथ 5 एकड़ का एक बाग भी है। मदरसे को सील करने से पहले इसमें लगभग 500 छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे।

मदरसे पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने के आरोप लगे। विभिन्न राष्ट्रीय जाँच एजेंसियों ने इन आरोपों की जाँच की तो सही पाया। मदरसे के कई मौलवियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है। अब मदरसे में ताला लगा हुआ है। मदरसे के दरवाजे पर सील के पोस्टर लगे हैं और बाहर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती है।

मदरसे से तालीम लेकर निकला पुलवामा का आतंकी सज्जाद भट्ट

मदरसे को सील करने की वजह इसके आतंकी गतिविधियों से जुड़ा होना है। ये वही मदरसा है जहाँ से 2019 के पुलवामा आतंकी हमले का आरोपित सज्जाद भट ने भी तालीम ली थी, इस हमले में CRPF के 40 जवानों ने बलिदान दिया था।

फिर जब इस हमले की जाँच हुई, तो मदरसे ने खुद कबूला कि इस मदरसे से 11 छात्र आतंकी बने हैं। इनमें PhD आतंकी के नाम से कुख्यात मोहम्मद शफी बट और कुख्यात आदिल अहमद भी शामिल थे। हालाँकि, ये सभी एनकाउंटर में मारे गए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस मदरसे के अधिकतर छात्र पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे।

मदरसे के मौलवी भी निकले आतंकी और OGW

इतना ही नहीं इस मदरसे से आतंकी की मदद करने वाले ओवर ग्राउंड वर्कर यानी OGW भी निकले हैं। साल 2020 में ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शोपियां से 3 ओवर ग्राउंड वर्कर गिरफ्तार किए थे। तब पूछताछ में सामने आया था कि ये तीनों जमात-ए-इस्लामी के लिए काम करते थे और शोपियां के इसी मदरसे से पढ़कर निकले थे।

इस मदरसे के न सिर्फ छात्र बल्कि पढ़ाने वाले मौलवी भी आतंकी गतिविधियों में शामिल रह चुके हैं। इसी मदरसे में पढ़ाने वाला शौकत अहमद शेख LeT से जुड़ा था और लश्कर के लिए आतंकियों की भर्ती करता था। शौकत को NIA ने गिरफ्तार किया था। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, शौकत ने 20 छात्रों का ब्रेनवॉश कर उन्हें आतंकी बनाया था।

मदरसे पर कार्रवाई

आतंकी गतिविधियों में लिप्त मदरसे पर कश्मीर के मंडलायुक्त अंशुल गर्ग ने UAPA अधिनियम की धारा 8(1) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इसे प्रतिबंधित संस्थान घोषित किया है। उन्होंने यह कार्रवाई शोपियां के SSP द्वारा जारी किए गए डोजियर और मदरसे पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साक्ष्यों के आधार पर की है।

SSP के डोजियर में साफ कहा गया कि मदरसा बाहर से मजहबी तालीम की जगह लगता है। लेकिन इसके कामकाज और पैसों के हिसाब में बड़ी गड़बड़ियाँ हैं। यह कई गैरकानूनी कामों में भी शामिल है। इसका रजिस्ट्रेशन नहीं है। इसने सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया है। और कानून से बचने के लिए यह तरह-तरह के तरीके अपनाता है।

देवगुड़ी गायब, चर्च-कब्रिस्तान-क्रॉस उगे… बस्तर से सरगुजा तक सैकड़ों गाँवों में गिनती के बचे हिंदू: जानिए छत्तीसगढ़ में डेमोग्राफी बदलने के लिए कहाँ से आ रहा पैसा, कौन भेज रहा

छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों से धर्मांतरण को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और विस्तृत जानकारी सामने आई है। जानकारी के अनुसार, राज्य के जशपुर, बस्तर और अंबिकापुर जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब यहाँ कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में यह भी पता चला है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका से आने वाली करोड़ों रुपए की विदेशी फंडिंग काम कर रही है। मिशनरीज ने सेवा के नाम पर अपना नेटवर्क इतना फैला लिया है कि अब आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराएँ भी बदलने लगी हैं।

गाँव के गाँव ने बदला धर्म: मंदिर गायब, चर्च की भरमार

छत्तीसगढ़ के जनजातीय जिलों जैसे जशपुर, अंबिकापुर और रायगढ़ में स्थिति बहुत बदल चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि यहाँ के सैकड़ों गाँवों में अब एक भी मंदिर नहीं बचा है, जबकि हर गाँव में 3 से 4 चर्च का होना एक सामान्य बात हो गई है।

जशपुर जिला तो लंबे समय से इन गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ के गाँवों में अब लोग अपनी परंपरा के उलट शवों को जला नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें दफना रहे हैं। इन कब्रों पर अब हिंदू प्रतीकों की जगह क्रॉस के निशान बने हुए दिखाई देते हैं। जनजातीयों की संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और उनकी जगह ईसाई रीतियों ने ले ली है।

मिशनरी के निशाने पर कौन? उरांव के बाद अब अन्य जनजातियाँ

मिशनरीज ने बहुत सोच-समझकर अपनी रणनीति बनाई है। उनका मुख्य निशाना समाज के वे लोग हैं जो गरीब हैं, बीमार हैं या खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। पहले उनका ध्यान ‘उरांव’ जनजाति पर था, लेकिन अब उन्होंने मांझी, भुईंया और पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों को भी अपने दायरे में ले लिया है।

इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता, इसलिए मिशनरी इनके दुख-तकलीफ में खड़े होने का नाटक करते हैं। वे गाँवों में स्कूल खोल रहे हैं और मुफ्त इलाज का लालच देकर लोगों को अपने धर्म की ओर खींच रहे हैं। गाँवों में तैनात पादरी लोगों की मदद करने के बहाने उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

75 प्रतिशत ईसाई, हिंदू अल्पसंख्यक

अंबिकापुर के पास सलाईनगर गाँव की स्थिति बहुत डराने वाली है। यह गाँव तीन हिस्सों में बँटा है, जिसमें से दो बस्तियाँ पूरी तरह ईसाई हो चुकी हैं और केवल बीच की बस्ती में कुछ हिंदू बचे हैं। गाँव के 75 प्रतिशत लोग ईसाई बन चुके हैं। यहाँ 4 चर्च हैं पर एक भी मंदिर नहीं।

इसी तरह भैंसाखार गाँव में अब केवल एक ही हिंदू परिवार बचा है। रायगढ़ के नौनयजोर गाँव में तो स्थिति और भी अलग है। यहाँ के सभी 250 परिवार ईसाई बन चुके हैं। गाँव के हर घर पर सफेद झंडे लगे हैं जिन पर क्रॉस का निशान है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब यहाँ कोई हिंदू परिवार नहीं रहता।

प्रार्थना सभाओं और ‘चंगाई’ का खेल

बेलजौरा गाँव की कहानी भी ऐसी ही है। यहाँ 60 प्रतिशत लोग धर्मांतरित हो चुके हैं। लोग बताते हैं कि जब घर में कोई बीमार होता है, तो पादरी उनके घर पहुँच जाते हैं और प्रार्थना करने लगते हैं। इसे ‘चंगाई सभा’ कहा जाता है।

धर्म परिवर्तन के बाद सबसे पहले घर से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और तस्वीरें हटवाई जाती हैं। घर का तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है और नाम न बदलने की शर्त पर उन्हें ईसाई बना दिया जाता है। मिशनरीज का मुख्य निशाना महिलाएँ हैं, जिन्हें बहला-फुसलाकर प्रार्थना सभाओं में लाया जाता है।

अमेरिका से छत्तीसगढ़ तक: करोड़ों की विदेशी फंडिंग का खुलासा

धर्मांतरण का यह खेल केवल स्थानीय स्तर पर नहीं चल रहा है, बल्कि इसके तार सात समंदर पार अमेरिका से जुड़े हैं। जाँच में ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नामक एक अमेरिकी संगठन का नाम सामने आया है। इस संगठन की वेबसाइट भारत में प्रतिबंधित है। यह संस्था दुनिया भर से फंड जुटाती है और भारत में प्रति चर्च हर महीने लगभग 3,205 रुपए भेजती है।

इनका एकमात्र उद्देश्य ‘हर गाँव में एक चर्च’ बनाना है। ED की जाँच में पता चला है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 95 करोड़ रुपए विदेशी डेबिट कार्ड के जरिए भारत लाए गए। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतरी जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में खर्च किए गए।

ED की बड़ी कार्रवाई: 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कार्रवाई की है। जाँच के दौरान माइक मार्क नामक व्यक्ति के पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले हैं। उसे बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पकड़ा गया था। इन कार्डों का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में ATM से कैश निकालने के लिए किया जा रहा था।

ED का मानना है कि यह एक संगठित नेटवर्क है जो देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। राजनाँदगाँव जिले में गिरफ्तार पादरी डेविड चाको भी इसी अमेरिकी संगठन से जुड़ा था। वह राज्य भर में ‘स्लीपर सेल’ तैयार कर रहा था, जो लोगों को धर्मांतरण का प्रशिक्षण देते थे।

बस्तर में बदलता स्वरूप: देवगुड़ी की जगह पक्के चर्च

बस्तर के जंगलों और गाँवों में एक बहुत गहरा बदलाव दिख रहा है। जहाँ पहले जनजातीय संस्कृति का प्रतीक ‘देवगुड़ी’ (पूजा स्थल) हुआ करती थी, वहाँ अब सुसज्जित और पक्के चर्च खड़े हो गए हैं।

कच्चे घरों वाले गाँवों के बीच ये पक्के चर्च इस बात का सबूत हैं कि विदेशी पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। पिछले 10 से 15 सालों में बस्तर में 3,000 से अधिक चर्च बन चुके हैं। करंजी और मोरठपाल जैसे गाँवों में पुराने आदिवासी पूजा स्थलों की सामाजिक भूमिका अब खत्म सी हो गई है और सड़क किनारे बने चर्च गाँवों की नई पहचान बन गए हैं।

सामाजिक तनाव और संस्कृति को बचाने की जंग

धर्मांतरण की इस रफ्तार ने गाँवों को दो हिस्सों में बाँट दिया है। जो लोग ईसाई बन चुके हैं, वे अब अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों और देवगुड़ी में नहीं जाते। इससे गाँवों में आपसी टकराव बढ़ गया है।

जनजातीय समाज के नेता राजाराम तोड़ेम का कहना है कि यह बस्तर की संस्कृति को खत्म करने की एक बड़ी साजिश है। हालाँकि, अब कुछ वर्षों से जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जागरूक भी हुआ है। जशपुर में हाल ही में रामकथा और जागरण कार्यक्रमों के जरिए लगभग 1,200 परिवारों ने वापस अपने मूल धर्म में वापसी की है।

सरकार का कड़ा रुख: नया कानून और सख्त जाँच

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ पेश किया है। इस कानून का उद्देश्य बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण पर कड़ी रोक लगाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि ED की जाँच ने साफ कर दिया है कि विदेशी फंडिंग के जरिए देश विरोधी गतिविधियाँ चलाई जा रही थीं। पुलिस अब चंगाई सभाओं पर भी नजर रख रही है।

छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में धर्मांतरण एक गंभीर चुनौती बन चुका है। एक तरफ सेवा और चंगाई के नाम पर लोगों की आस्था बदली जा रही है, तो दूसरी तरफ विदेशी फंड की मदद से पक्के चर्चों का जाल बिछाया जा रहा है। यह केवल धर्म परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन जनजातीय संस्कृति और देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर सोनिया और राहुल गाँधी के विरोध से छिड़ी नई बहस, क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर राजनीति कर रही है कॉन्ग्रेस?: जानें चीन का कनेक्शन

देश में चुनावी माहौल के बीच राहुल गाँधी के अंडमान-निकोबार दौरे और ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पर उनके रुख ने एक बार फिर विकास, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ऐसे समय पर द्वीपसमूह पहुँचे हैं जब इस बहुचर्चित परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से मंजूरी मिल चुकी है और केंद्र सरकार इसे भारत के लिए एक बड़े आर्थिक और सामरिक गेमचेंजर के रूप में पेश कर रही है।

कॉन्ग्रेस नेता इस परियोजना को लेकर स्थानीय जनजातीय समुदायों खासतौर पर शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों, विस्थापन की आशंका और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित असर को मुद्दा बना रहे हैं।

वहीं सरकार का दावा है कि यह परियोजना न सिर्फ भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में नई पहचान दिलाएगी, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का रणनीतिक जवाब भी साबित होगी।

ऐसे में राहुल गाँधी का यह दौरा सिर्फ एक क्षेत्रीय दौरा नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक, पर्यावरणीय और रणनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। जहाँ एक तरफ विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर जोर है, तो दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अस्तित्व को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े किए जा रहे हैं।

राहुल गाँधी के दौरे का क्या है मकसद?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी दो दिवसीय दौरे पर अंडमान-निकोबार पहुँचे हैं। उनका कहना है कि वे ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के जमीनी हालात समझना चाहते हैं। इससे पहले उन्होंने जनजातीय प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर उनके अधिकारों की रक्षा का भरोसा भी दिया था।

दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने साफ कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और किसी भी परियोजना का लाभ सबसे पहले द्वीपवासियों को मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बड़े कॉर्पोरेट समूह इस क्षेत्र में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे स्थानीय हितों पर असर पड़ सकता है।

सोनिया गाँधी का भी विरोध

इससे पहले सोनिया गाँधी भी इस परियोजना का खुलकर विरोध कर चुकी हैं। उन्होंने अपने लेख में इसे पर्यावरणीय आपदा बताते हुए कहा था कि इससे निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

उन्होंने द हिंदू में 8 सितंबर 2025 को प्रकाशित अपने लेख ‘द मेकिंग ऑफ एन इकोलॉजिकल डिजास्टर इन द निकोबार’ में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को 72000 करोड़ रुपए की योजन को ‘पूरी तरह बेकार और खर्चीली’ योजना करार दिया।

उन्होंने कहा कि यह परियोजना निकोबार आइलैंड के जनजातीय समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा है और क्षेत्र की अनोखी जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है। सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह जनजातियों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं कर रही है।

उनके अनुसार यह परियोजना आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकती है। जानकारी के मुताबिक, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है। कोलकाता स्थित ईस्टर्न जोनल बेंच ने इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए हरी झंडी दी, लेकिन साथ ही पर्यावरण संरक्षण के कड़े उपाय अपनाने की शर्त भी लगाई है। NGT का मानना है कि परियोजना जरूरी है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?

सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये स्ट्रेट ऑफ मलक्का स्ट्रेट से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का  स्ट्रेट वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।

यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर के ‘चोक प्वाइंट पॉलिटिक्स’ का केंद्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट।

पावर प्लांट जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार में एक नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण की योजना तैयार की गई है, जिसे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दोनों के लिए अहम माना जा रहा है।

ग्रेट निकोबार आइलैंड पर बनने वाला यह एयरपोर्ट सैन्य और असैन्य दोनों तरह के उपयोग के लिए विकसित किया जाएगा। इसके एयरसाइड और हवाई यातायात नियंत्रण (एटीसी) की जिम्मेदारी इंडियन नेवी के पास रहेगी, जबकि यात्रियों से जुड़ी सुविधाएँ, पार्किंग और टर्मिनल संचालन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) संभालेगा।

यह हवाई अड्डा पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ रणनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा, खासकर हिंद महासागर क्षेत्र में निगरानी और त्वरित सैन्य तैनाती के लिहाज से। योजना के अनुसार 2050 तक द्वीप की आबादी लगभग 6.5 लाख तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वर्तमान में यहाँ करीब 6500 लोग ही रहते हैं।

क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट?

मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से 30-40% वैश्विक व्यापार गुजरता है। इस मार्ग के करीब मौजूदगी भारत को वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर देती है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को भारत की अर्थव्यवस्था, समुद्री व्यापार और रणनीतिक ताकत के लिहाज से एक गेमचेंजर परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का मानना है कि इसके जरिए भारत एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन सकता है, जिससे लाखों नौकरियाँ पैदा होंगी।

अभी हाई लॉजिस्टिक्स लागत भारत के निर्यात और व्यापार को प्रभावित करती है, लेकिन ग्रेट निकोबार आइलैंड में आधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने से कंटेनर सीधे यहाँ पहुँच सकेंगे, जिससे समय और लागत दोनों में कमी आएगी। साथ ही विदेशी जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी और भारत की समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मजबूत होगी।

इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 90000 से 92000 करोड़ रुपए है और इसे नरेंद्र मोदी सरकार के तहत विकसित किया जा रहा है। साल 2024 में गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया गया, जिसे चार चरणों में विकसित किया जाएगा।

पहला चरण 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य है, जिसमें 40 लाख TEU कंटेनर हैंडलिंग क्षमता होगी, जबकि 2058 तक यह बढ़कर 1.6 करोड़ TEU तक पहुँच सकती है।

रणनीतिक दृष्टि से भी यह प्रोजेक्ट बेहद अहम है। चीन ने हंबनटोटा पोर्ट, क्याउकप्यू पोर्ट और ग्वादर पोर्ट जैसे बंदरगाहों में निवेश कर हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है, जिसे भारत के लिए चुनौती माना जाता है। ऐसे में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से भारत की निगरानी क्षमता, सैन्य तैनाती और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी।

यह परियोजना भारत की समुद्री कमजोरियों को दूर करने का प्रयास भी जारी है। वर्तमान में भारत के पूर्वी तट के कई बंदरगाहों की गहराई 8 से 12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि वैश्विक स्तर पर बड़े बंदरगाह 12 से 20 मीटर गहरे होते हैं।

इसी वजह से भारत का लगभग 25% कार्गो कोलंबो पोर्ट, सिंगापुर पोर्ट और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों के जरिए ट्रांसशिप होता है। इससे हर साल करीब 1500 करोड़ रुपए का सीधा नुकसान और कुल मिलाकर 3000 से 4500 करोड़ रुपए तक का आर्थिक प्रभाव पड़ता है।

चीन को टक्कर देने की रणनीति

चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में कई बंदरगाह विकसित किए हैं। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत करे।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के जरिए भारत समुद्री निगरानी बढ़ा सकता है, सैन्य तैनाती को आसान बना सकता है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है।

पर्यावरण बनाम विकास की बहस

इस परियोजना को लेकर सबसे बड़ी बहस पर्यावरण को लेकर है। विरोध करने वालों का कहना है कि इससे जैव विविधता को नुकसान होगा, जंगलों की कटाई बढ़ेगी और आदिवासी समुदायों का विस्थापन हो सकता है।

वहीं सरकार ने बताया है कि परियोजना सभी पर्यावरणीय नियमों के तहत बनाई जा रही है और नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त उपाय किए जाएँगे। इस मुद्दे पर देश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।

राहुल गाँधी का विरोध ऐसे समय में सामने आया है जब सरकार इस परियोजना को भारत के भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में पेश कर रही है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह विरोध पूरी तरह पर्यावरणीय चिंताओं पर आधारित है या इसमें राजनीतिक पहलू भी शामिल है।