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दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ बनाने की कोशिश? यूक्रेनी-अमेरिकी ‘एजेंट्स’ की गिरफ्तारी से तेज हुई चर्चा: जानें- कैसे भारत-बांग्लादेश-म्यांमार में विदेशी मिशनरियाँ कर रही साजिश

अगस्त 2024 में तत्कालीन बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अमेरिका की एक कथित साजिश को लेकर चेतावनी दी थी। उसके कुछ दिनों बाद ही उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। शेख हसीना ने कहा था कि भारत के पूर्वोत्तर, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साजिश रची जा रही है। तब से अब तक बहुत कुछ हुआ है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उनकी बातों में दम था।

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए ने 6 यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। इनकी कड़ियों को अगर जोड़ा जाए, तो ये पता चलता है कि भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में अमेरिका की साजिश चल रही है।

सभी यूक्रेनी मिजोरम के रास्ते म्यांमार जाकर ‘चिन नेशनल आर्मी’ से जुड़े उग्रवादियों को हथियार और ट्रेनिंग दे रहे थे। एक अमेरिकी नागरिक कोलकाता एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया।

इन विदेशी नागरिकों पर अवैध या आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए आपराधिक साजिश रचने के आरोप में ‘गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम’ (UAPA) की धारा 18 के तहत मामला दर्ज किया गया।

NIA द्वारा गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक की पहचान मैथ्यू एरॉन वैन डाइक के रूप में हुई। वह ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ (SOLI) के संस्थापक हैं, जो एक गैर-लाभकारी सुरक्षा अनुबंध फर्म है।

गिरफ्तार किए गए छह यूक्रेनियों की पहचान हुरबा पेट्रो, स्लीवियाक तारास, इवान सुकमानोव्स्की, स्टेफानकिव मारियन, होनचारुक मैक्सिम और कामिंस्की विक्टर के रूप में हुई है।

NIA ने गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिकों की कस्टडी माँगते हुए कोर्ट को बताया कि आरोपी वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन फिर उन्होंने मिजोरम के प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध तरीके से एंट्री की। वहाँ से सीमा पार कर म्यांमार में घुस गए और भारत विरोधी जातीय संघर्ष में शामिल ग्रुपों से संपर्क साधा। उन्हें कथित तौर पर प्रशिक्षण और उपकरण उपलब्ध कराए।

पकड़े गए सभी 6 यूक्रेनी नागरिक ड्रोन तकनीक में माहिर बताए जा रहे हैं। खुफिया सूत्र बताते हैं कि ये लोग म्यांमार के आतंकी ग्रुप को ड्रोन वॉरफेयर सिखाने आए थे। अगर म्यांमार के आतंकी समूह आधुनिक ड्रोन से लैस हो गए, तो इसका सीधा असर भारत के मिजोरम, मणिपुर और नगालैंड की सुरक्षा पर पड़ेगा।

NIA के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए विदेशी नागरिक यूरोप से भारत के रास्ते ड्रोन की एक बड़ी खेप लाए थे। जाँच में पता चला कि सभी आरोपी वैध वीज़ा पर भारत में दाखिल हुए थे, लेकिन अनिवार्य ‘प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट’ के बिना मिजोरम पहुँच गए।

NIA द्वारा विदेशी नागरिकों की गिरफ़्तारी ने उन दबी हुई अटकलों को फिर से हवा दे दी है कि अमेरिका और कई अन्य विदेशी ताकतें म्यांमार में सत्ता-विरोधी ताकतों को ‘सॉफ्ट’ और ‘हार्ड’ दोनों तरह का समर्थन दे रही हैं।

तब डैनियल कोर्टनी, अब मैथ्यू वैनडाइक: क्या अमेरिकी मिशनरी और पूर्व सैनिक दक्षिण एशिया में ‘ईसाई राष्ट्र’ के एजेंडे को बढ़ावा दे रहे हैं?

पूर्वोत्तर भारत के रास्ते म्यांमार में एंट्री करने के ईसाई मिशनरियों से जुड़े विदेशी नागरिकों के पहले भी कई मामले सामने आए हैं।

डैनियल स्टीफन कोर्टनी का मामला काफी सुर्खियों में रहा। वह साल 2009 में टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था, यहाँ एक दशक से भी ज्यादा समय तक रुका और लोगों का धर्मांतरण कराया। तत्कालीन आंध्र प्रदेश में इस दौरान ईसाइयत काफी फैला।

कोर्टनी को भारत से 2017 में भेजा गया था और उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। साल 2023 में हालाँकि उसने टूरिस्ट वीजा पर भारत में दोबारा एंट्री की। वह मणिपुर में समाज सेवा करने और ईसाइयत का प्रचार करने के बहाने धर्मांतरण में शामिल था। उसने इलाके में बाइबिल बांटी थी और हिंदुओं के साथ- साथ मोदी सरकार के खिलाफ लोगों में नफरत फैलाने की कोशिश की। भारत में टूरिस्ट वीजा पर रहते हुए किसी भी धर्म का प्रचार करना या धर्मांतरण में शामिल होना गैर-कानूनी है।

5 अगस्त 2023 को, डैनियल स्टीफन कोर्टनी ने मणिपुर से एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उन्होंने दावा किया कि ईसाइयों पर ज़ुल्म हो रहे हैं और इस समुदाय को जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है। OpIndia ने पहले बताया था कि कैसे अमेरिका का यह ईसाई मिशनरी, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के खिलाफ नफ़रत और गलत जानकारी फैला रहा था। केन्द्र सरकार को वह ‘कट्टर हिंदू सरकार’ कह रहा था। उसने मणिपुर में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा भड़काने का आरोप सरकार पर लगाया और कहा कि पूर्वोत्तर ईसाइयों के लिए एक पवित्र भूमि है।

खास बात यह है कि कोर्टनी अमेरिकी सेना का एक रिटायर्ड सैनिक है, जिस पर मणिपुर और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में जातिवादी हिंसक गुटों को हथियार, विस्फोटक, आधुनिक संचार उपकरण, ड्रोन और ‘लॉजिस्टिक्स’ पहुँचाने में मदर करने के आरोप लगे। दिसंबर 2024 में उसका एक पुराना वीडियो (संभवतः अगस्त 2023 का) सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें कोर्टनी को एक हिंसा-ग्रस्त इलाके में कुकी उग्रवादियों को बुलेटप्रूफ जैकेट और ड्रोन बाँटते हुए देखा गया। ये मैतेई हिन्दुओं से मुकाबला करने के लिए दिए गये थे।

ब्रिटेन के एक नागरिक डैनियल न्यूई को एक ज़िंदा कारतूस के साथ जून 2024 में गिरफ्तार किया गया था। न्यूई को लेंगपुई हवाई अड्डे पर पकड़ा गया और उस पर हथियार अधिनियम, 1959 के तहत मामला दर्ज किया गया। हालाँकि बाद में उसे बरी कर दिया गया, लेकिन ऐसे मामलों में बरी होना कोई हैरानी की बात नहीं है।

अमेरिका के एक प्रचारक फ्रैंकलिन ग्राहम को नवंबर 2025 में वीजा देने से मना कर दिया गया। वह 30 नवंबर को नागालैंड के कोहिमा में एक ईसाई कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जाना चाहता था। दरअसल ग्राहम का संगठन ‘समैरिटन्स पर्स’ देश में धर्म-परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रहा है। यह संगठन धर्म-प्रचार के साथ-साथ लोगों के बीच भोजन वितरण और दूसरी मदद करता है।

अब आइए हाल ही में गिरफ्तार किए गए अमेरिकी नागरिक मैथ्यू वैनडाइक की बात करते हैं। 1981 में बाल्टीमोर मैरीलैंड में पैदा हुए वैनडाइक लीबिया में युद्धबंदी रह चुका है। उसने कर्नल मोहम्मद गद्दाफी के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया था।

मैथ्यू वैनडाइक ने 2014 में, ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल’ की स्थापना की थी। ISIS ने उनके दोस्त अमेरिकी पत्रकार जेम्स फोली और स्टीवन सॉटलॉफ की हत्या कर दी थी, उसके बाद उन्होंने संगठन बनाया था। एक लाइसेंस्ड 501(c)(3) गैर-लाभकारी संस्था के तौर पर काम करने वाली एक निजी सुरक्षा ठेका कंपनी है।

यह संगठन दावा करता है कि वह आतंकवादी समूहों और तानाशाही शासनों का सामना कर रही ‘कमजोर’ लोगों को निशुल्क जरूरी सामान, सैन्य प्रशिक्षण और परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराता है। इराक में अपनी पहली तैनाती के दौरान SOLI ने ‘निनवेह प्लेन प्रोटेक्शन यूनिट्स’ (NPU) को प्रशिक्षित किया था। यह एक सीरियन ईसाई समूह है, जो ISIS के खिलाफ लड़ रहा है।

वैनडाइक और SOLI ने रूस-यूक्रेन युद्द के दौरान लगातार यूक्रेन का समर्थन किया है। जब से युद्ध शुरू हुआ है, SOLI यूक्रेन के सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण, परामर्श और जरूरी सामान मुहैया करा रहा है। वैनडाइक का यूक्रेन के साथ गहरा सैन्य और वैचारिक जुड़ाव रहा है। वेनेज़ुएला में सत्ता परिवर्तन में अमेरिका के अभियान में वह खुले तौर पर शामिल रहा है। ऐसे में उसका 6 यूक्रेनी नागरिकों के साथ पूर्वोत्तर में गिरफ्तारी काफी मायने रखता है।

वैनडाइक की सोशल मीडिया प्रोफाइल से भी काफी कुछ पता चलता है। यह अलग-अलग देशों में उसकी गतिविधियों की एक डिजिटल डायरी जैसी है। म्यांमार में सक्रिय ‘जातीय सशस्त्र संगठनों’ (EAOs) के प्रति उसका समर्थन इससे साफ दिखता है।

मैथ्यू वैनडाइक के सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि उनका ईसाई धर्म में गहरा विश्वास है। वह दुनिया में किसी को भी, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हों या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, बेझिझक ‘बुरा ईसाई’ होने का सर्टिफिकेट दे देता है।

हालाँकि, म्यांमार में वैनडाइक जैसे और भी कई लोग सक्रिय हैं। इनमें से एक हैं- अमेरिका के पूर्व स्पेशल फोर्सेज अधिकारी और ईसाई पादरी डेव यूबैंक। इनकी संस्था ‘फ्री बर्मा रेंजर्स’ (FBR) म्यांमार में जातीय संघर्ष में शामिल संगठनों को ‘मानवीय सहायता’ उपलब्ध करना का दावा करते हैं, असल में ये सालों से धर्मांतरण में जुटे हुए हैं।

अब भारत के रास्ते म्यांमार के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के दखल की बात करें, तो मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने मार्च 2025 में ही भारत और म्यांमार की खुली सीमाओं पर विदेशियों की मौजूदगी पर चिंता जताई थी। इनमें से ज्यादातर ऐसे यूक्रेनी हैं, जिन्हें युद्ध का अनुभव है और सेना में रह चुके हैं। मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि विदेशी नागरिक, विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन के लोग, खुली सीमाओं के रास्ते मिजोरम होते हुए म्यांमार में प्रवेश कर रहे हैं। ये विदेशी नागरिक म्यांमार में विद्रोहियों को प्रशिक्षण देने के मकसद से घुस रहे हैं।

मिजोरम विधानसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने खुलासा किया कि जून से दिसंबर 2024 के बीच 2000 से भी ज्यादा विदेशी नागरिक आइजोल आए थे। हालाँकि उन्हें कभी भी सड़कों पर घूमते हुए नहीं देखा गया। इससे संदेह और भी गहरा हो गया कि वे मिजोरम में केवल इसलिए आए थे ताकि यहाँ से म्यांमार में प्रवेश कर सकें और पड़ोसी देश के आंतरिक मामलों में दखल दे सकें।

CM लालदुहोमा ने यह भी कहा था कि जो लोग मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसे थे, उनमें से कुछ पहले रूस-यूक्रेन युद्ध में भी हिस्सा ले चुके थे। लालदुहोमा के इस खुलासे से अब तक लगाए जा रहे उन कयासों को और बल मिला कि म्यांमार-मिजोरम सीमा पश्चिमी भाड़े के सैनिकों के लिए एक प्रवेश द्वार बन गई है।

CM लालदुहोमा ने कहा, “हमारे पास पक्की जानकारी है कि यूक्रेन युद्ध के अनुभवी सैनिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार के चिन प्रांत में गए, ताकि वे सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) से लड़ रहे विद्रोही गुटों को ट्रेनिंग दे सकें।”

उस समय, CM लालदुहोमा ने तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी के मिजोरम दौरे पर हैरानी भी जताई थी। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि भारत के पूर्वोत्तर और म्यांमार में हो रहे घटनाक्रमों में अमेरिकी सरकार की काफी दिलचस्पी है।

कॉन्ग्रेस सरकार की ‘पर्यटन को बढ़ावा देने’ की नीति का फायदा उठाकर मिजोरम-म्यांमार सीमा को पश्चिमी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियाँ एक्टिव हुईँ

यह ध्यान रखना जरूरी है कि मिजोरम के रास्ते म्यांमार में घुसने वाले विदेशी भाड़े के सैनिकों और ईसाई मिशनरियों का जो खतरा आज बना हुआ है, उसकी जड़ें कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के वक्त फैली। 2011 में यूपीए सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मणिपुर, नागालैंड और मिज़ोरम में ‘संरक्षित क्षेत्र परमिट’ (PAP) की शर्तों में ढील दी थी। इसका फायदा उठाकर ये लोग ‘पर्यटक’ वीज़ा पर भारत आए और खुली सीमाओं के रास्ते म्यांमार में घुस गए।

म्यांमार में अमेरिका-यूक्रेन बनाम रूस-चीन की सत्ता की खींचतान: कौन किसका साथ दे रहा है और क्यों?

चूंकि म्यांमार को हमेशा से ही सत्ता पर कब्जे के लिए एक रणभूमि माना जाता रहा है, खासकर हिंद महासागर में चीन और अमेरिका के बीच उसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, तो ऐसे में रूस-यूक्रेन का कनेक्शन आखिर कहाँ से सामने आया?

इस सवाल का जवाब उन पक्षों में छिपा है, जिनका इन देशों ने ऐतिहासिक रूप से साथ दिया है। रूस और चीन हमेशा से ही मिन आंग ह्लाइंग के नेतृत्व वाले म्यांमार के सैन्य शासन (मिलिट्री जुंटा) के समर्थक रहे हैं। इस सैन्य ‘तात्माडॉ’ शासन भी ने भी रूस और चीन के समर्थन का पूरा मान रखा। तात्माडॉ ने यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन किया, जबकि मॉस्को ने नेपीताव को लड़ाकू विमान, ड्रोन और निगरानी उपकरण मुहैया कराए, जिनका इस्तेमाल तात्माडॉ विद्रोही गुटों के खिलाफ करता है।

रूस म्यांमार को तेल की आपूर्ति करने वाला एक भरोसेमंद देश भी रहा है। मार्च 2025 में, म्यांमार के सैन्य शासन ने रूस को संघर्ष वाले इलाकों से रत्न और खनिज निकालने, और तटीय शहर दावी में एक तेल रिफाइनरी और एक बंदरगाह बनाने के लिए आमंत्रित किया।

और यहीं पर अमेरिका और अमेरिकी भाड़े के सैनिक तस्वीर में आते हैं। अमेरिका, रूस के खिलाफ यूक्रेन को सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से समर्थन देता है। अमेरिका, रूस और चीन समर्थित म्यांमार के सैन्य शासन के खिलाफ म्यांमार के जातीय सशस्त्र संगठनों (EAOs) का भी समर्थन करता है।

दरअसल चीन और अमेरिका दोनों ही दशकों से म्यांमार के राजनीतिक मामलों में दखल देते रहे हैं। 1950, 1970 और 1980 के दशकों में CIA ने उत्तरी म्यांमार में राष्ट्रवादी चीनी (KMT) के बचे हुए गुटों का समर्थन किया था, जबकि चीन ने बर्मी कम्युनिस्ट पार्टी के छापामारों को गुप्त समर्थन दिया था।

हाल में, अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने ‘बर्मा यूनिफाइड थ्रू रिगरस मिलिट्री अकाउंटेबिलिटी एक्ट’ यानी ‘बर्मा एक्ट’ (BURMA Act) पारित किया। इस एक्ट का उद्देश्य ‘लोकतंत्र समर्थक संगठनों’ को तकनीकी और मानवीय सहायता पहुँचाना है।

इनमें ‘पीपल्स डिफेंस फोर्स’ (PDF) और EAOs जैसे संगठन शामिल हैं। सिर्फ ‘तकनीकी और गैर-घातक’ शब्द का यह अर्थ नहीं है कि अमेरिका ने म्यांमार में सैन्य शासन विरोधी ताकतों को सैन्य सहायता न देने का वादा किया था। इस एक्ट में हथियारों और गोला-बारूद को छोड़कर, सैन्य सहायता की दूसरी चीजें शामिल की गई थी। इनमें बॉडी आर्मर, वर्दी, रडार, और चिकित्सा उपकरण शामिल हैं।

हालाँकि इस एक्ट को अभी अमेरिकी सीनेट द्वारा अनुमोदित किया जाना बाकी है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका में शक्तिशाली राजनीतिक ताकतें म्यांमार के मामलों में दखल देने के लिए सक्रिय हैं।

कई रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की योजना बांग्लादेश में एक ‘विशाल सप्लाई डंप’ स्थापित करने की है। इसका मकसद म्यांमार में जुंटा-विरोधी सैन्य अभियानों को समर्थन देना है। इसके तहत अराकान आर्मी और चिन नेशनल फ्रंट जैसे विद्रोही समूहों को हथियार और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान की जाएगी।

दरअसल म्यांमार में एक अमेरिका-समर्थक शासन स्थापित होने से हिंद महासागर क्षेत्र में अमेरिका की उपस्थिति का विस्तार होगा। इससे अमेरिका को इस क्षेत्र में रूस, चीन और यहाँ तक कि भारत के मुकाबले बढ़त हासिल करने का अवसर मिलेगा। साथ ही, इससे इस क्षेत्र में रूस और चीन के आर्थिक और रणनीतिक हितों को भी नुकसान पहुँचेगा।

इससे भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर भी हमेशा खतरा बना रहेगा। म्यांमार के जुंटा सैन्य शासन का समर्थन चीन भी करता है, खासकर उन EAOs (जातीय सशस्त्र संगठनों) के खिलाफ जो मुख्य रूप से ईसाई हैं। ताकि उसे हथियारों की आपूर्ति और ‘बेल्ट एंड रोड’ परियोजना तक पहुँच मिल सके। हालाँकि मैथ्यू वैनडाइक और 6 यूक्रेनी नागरिकों की गिरफ्तारी के साथ, भारत ने एक कड़ा संदेश दिया है कि नई दिल्ली की तटस्थता को राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उसकी कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए।

चूँकि अब हम म्यांमार के संदर्भ में रूस, यूक्रेन, चीन और अमेरिका के ‘सॉफ्ट पावर’ से लेकर ‘हार्ड पावर’ तक के समीकरण को समझ चुके हैं, तो आइए अब शेख हसीना के उस आरोप पर फिर से विचार करें जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका दक्षिण एशिया में एक ईसाई राष्ट्र बनाने की साज़श रच रहा है।

शेख हसीना की 2024 की ‘ईसाई राष्ट्र’ वाली चेतावनी, जो पहले केवल एक हताशापूर्ण राजनीतिक बयान लग रही थी, अब एक हकीकत नजर आ रही है

जून 2024 में, बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने एक सनसनीखेज दावा किया था। उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश पूर्वोत्तर और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर ‘पूर्वी तिमोर जैसा एक ईसाई राष्ट्र’ बनाने की साजिश रची जा रही है।

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और इस्लामी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को खुला समर्थन दिया था। इन दोनों ही संगठनों ने अंततः हसीना-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया और हसीना को प्रधानमंत्री पद से अवैध रूप से हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब ये संगठन बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। अमेरिका पर बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन की साजिश रचने के आरोप भी लगते रहे हैं।

अवामी लीग के नेताओं ने इस बात की पुष्टि की थी कि शेख हसीना एक ऐसी साजिश के बारे में बात कर रही थीं, जिसका मकसद ‘जो’ लोगों के लिए एक ईसाई राष्ट्र ‘जोगम’ बनाना था। इन लोगों को ‘जोमी’, ‘चिन-कूकी-मिजो’ के नाम से भी जाना जाता है।

कहा जाता है कि यह प्रस्ताव ‘जालेंगम’ [आज़ादी की धरती] पर प्रस्तावित कूकी राज्य है। इस अलग राष्ट्र में म्यांमार के सागाइंग डिवीज़न और चिन राज्य के बड़े हिस्से, भारत के मिजोरम, मणिपुर के कूकी-बहुल इलाके और बांग्लादेश के चटगांव डिवीजन के बंदरबान जिले और आस-पास के इलाके शामिल होंगे।

इन लोगों की ऐतिहासिक जड़ें म्यांमार की चिन पहाड़ियों और भारत के मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के आस-पास के इलाकों में मिलती हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, ‘ज़ो’ लोगों का ईसाई मिशनरियों से काफी मेल-जोल बढ़ा। 20वीं सदी की शुरुआत में बड़े पैमाने पर लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने में गहरे बदलाव आए।

आजादी के बाद यह समुदाय राष्ट्रीय सीमाओं में बँट गया। भारत ने इन्हें ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में मान्यता दी, जिससे इन्हें कुछ संवैधानिक सुरक्षाएँ मिलीं। म्यांमार में ये कई उग्रवादी समूह के रूप में जाने जाते हैं। इनमें ‘चिन नेशनल फ्रंट’ की सशस्त्र शाखा ‘चिन नेशनल आर्मी’, ‘चिनलैंड डिफेंस फोर्स’ और ‘चिन नेशनल डिफेंस फोर्स’ शामिल हैं।

ये लोग म्यांमार की सैनिक सरकार (जंटा) के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए हैं। बांग्लादेश में, ‘कूकी-चिन नेशनल फ्रंट’ चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में हत्याएँ और लूटपाट की घटनाएँ अंजाम देते रहे हैं।

मिजोरम में सत्ताधारी ‘जोरम पीपुल्स मूवमेंट’, विपक्षी ‘मिज़ो नेशनल फ्रंट’ और कांग्रेस मिजोरम स्थित संगठन ‘ज़ो रीयूनिफिकेशन ऑर्गनाइज़ेशन’ (ZRO) की एकीकरण की माँग के समर्थक बताए जाते हैं। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों में फैले सभी ‘ज़ो-बहुल’ इलाकों को एक साथ लाना है। ऐसी खबरें हैं कि चर्च से जुड़े संगठन, विशेष रूप से अमेरिका स्थित ‘बैपटिस्ट चर्च’, इस ‘जो-एकीकरण’ की माँग को हवा दे रहे हैं।

OpIndia ने पहले भी इस बात को उजागर किया है कि कैसे इन चर्च संगठनों के तार अमेरिका की खुफिया एजेंसी ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी’ (CIA) से जुड़े हुए बताए जाते हैं।

OpIndia लगातार अमेरिका स्थित संगठन ‘वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल’ की गतिविधियों को लेकर आगाह करता रहा है। इस ईसाई NGO को USAID (अब बंद हो चुकी) से फंडिंग मिली थी। इसका भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों और लोगों की फंडिंग का इतिहास रहा है। World Vision की गतिविधियाँ सिर्फ पूर्वोत्तर भारत तक ही सीमित नहीं हैं। यह एक मानवीय संगठन होने का दिखावा करता है, लेकिन असल में यह एक कट्टरपंथी ईसाई संगठन है। यह अन्य कट्टरपंथी ईसाई संगठनों के साथ मिलकर पिछले सात दशकों से भोले-भाले हिंदुओं, खासकर बच्चों और महिलाओं का धर्मांतरण करवा रहा है। नेहरू सरकार ने इस कट्टरपंथी ईसाई संगठन को पूरी छूट दे रखी थी।

1972 में, इंदिरा गाँधी सरकार ने World Vision के बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दे दी थी। ग्राहम खुद इस बात से हैरान थे, क्योंकि उस समय वहाँ की अस्थिर स्थिति के चलते विदेशियों को इस भारतीय राज्य में जाने की अनुमति नहीं मिलती थी। इंदिरा गाँधी के शासनकाल में World Vision ने खुलेआम धर्मांतरण की गतिविधियाँ चलाईं। इस दौरान हजारों हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया गया।

साल 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया। इससे भारत में इसकी धर्मांतरण की गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia ने पहले भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज (World Council of Churches), वर्ल्ड इवेंजेलिकल एलायंस ( World Evangelical Alliance) और वर्ल्ड विजन ( World Vision) जैसे अमेरिकी ईसाई संगठनों ने धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के खिलाफ किस तरह से विरोध जताया।

सितंबर 2024 में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमेरिका की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान ‘चिन समुदाय’ के सदस्यों से मुलाकात की। भारत के एक सीमावर्ती राज्य के मुख्यमंत्री होने के बावजूद, उन्होंने म्यांमार और बांग्लादेश में फैले ‘ज़ो समुदाय’ (जिसमें चिन, कूकी और मिज़ो लोग शामिल हैं) के बीच जातीय और धार्मिक आधार पर एकता बनाए रखने का आह्वान किया।

उनके भाषण के लिखित अंश में कहा गया था, “मैं इस अवसर का लाभ उठाते हुए एक बेहद गंभीर और ज्वलंत मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ। मुझे इस बात की आशंका है कि हमारा धर्म एकता और भाईचारे का स्रोत बनने के बजाय, कहीं आपसी फूट और विभाजन का कारण न बन जाए। ईसाइयत का काम तो अपने अनुयायियों का सही मार्गदर्शन करना और चर्च को एक मजबूत, एकजुट और अभेद्य किले में तब्दील करना होना चाहिए।”

लालदुहोमा ने आगे कहा, “मैं यहाँ मौजूद सभी लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि मैंने संयुक्त राज्य अमेरिका आने का निमंत्रण इसलिए स्वीकार किया है, ताकि हम सभी के लिए एकता का मार्ग खोज सकें। हम एक ही लोग हैं, भाई-बहन हैं और हम आपस में बँटकर या एक-दूसरे से अलग होकर नहीं रह सकते… भले ही किसी देश की सीमाएँ हों, लेकिन एक सच्चा राष्ट्र इन सीमाओं से परे होता है। हमें अन्यायपूर्ण तरीके से बाँटा गया है, हमें तीन अलग-अलग देशों में तीन अलग-अलग सरकारों के अधीन रहने के लिए मजबूर किया गया है और यह ऐसी बात है जिसे हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते।”

भारत में हुई तीखी प्रतिक्रिया के जवाब में, मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने ‘सांस्कृतिक एकता’ की वकालत की थी, न कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती दी थी।

प्रस्तावित ‘जो’ राज्य ‘जालेंगम’ का मानचित्र जिसमें बांग्लादेश, म्यांमार और मिज़ोरम शामिल हैं। (साभार-स्वराज्य )

जून 2023 में, वर्ल्ड कूकी-ज़ो इंटेलेक्चुअल काउंसिल (WKZIC) ने संयुक्त राष्ट्र और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने संघर्ष-ग्रस्त मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों से एक अलग कूकी राज्य बनाने के लिए उनके हस्तक्षेप की माँग की थी।

दुनिया में कहीं भी कोई जातीय संघर्ष होता है, अमेरिका की दखलंदाजी होने लगती है

भारत-म्यांमार-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में धर्म-आधारित संघर्ष भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं, वहीं, कुछ उग्रवादी कुकी-चिन समूहों ने अफीम और नशीले पदार्थों की तस्करी के नेटवर्क पहले ही स्थापित कर लिए हैं और ‘जमातुल अंसार’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठनों के साथ हाथ मिला लिया है। मणिपुर में यह पहले ही देखा जा चुका है कि कैसे ईसाई कुकी-चिन उग्रवादी समूहों ने मैतेई हिंदुओं के साथ संघर्ष शुरू कर दिया था।

मणिपुर और मिजोरम के स्थानीय लोग चिंतित है कि कई इलाकों में म्यांमार से आए घुसपैठियों की संख्या उनसे ज्यादा हो गई है। भारतीय अधिकारी लगातार मणिपुर में अवैध प्रवासियों को नकली आधार कार्ड और वोटर आईडी जारी करने वाले एक रैकेट का भंडाफोड़ करते रहे हैं। कई बार म्यांमार के नागरिकों के पास से नकली आधार कार्ड मिले, जिसके सहारे ये लोग मिजोरम और मणिपुर में रह रहे थे।

मोदी सरकार भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्रों पर बाड़बंदी का विस्तार करने के प्रयास कर रही है। 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने के निर्णय की घोषणा की। 8 फरवरी 2025 को, शाह ने आंतरिक सुरक्षा और पूर्वोत्तर राज्यों की डेमोग्राफी को बदलने से बचाने के लिए म्यांमार में आसानी से आवाजाही को रोकने की घोषणा की।

हालाँकि कई नागा और कुकी ईसाई संगठन इसके विरोधी हैं। जनवरी 2025 में ‘यूनाइटेड नागा काउंसिल’ (UNC) मिजोरम की ‘मिजो जिरलाई पॉल’ (MZP), और कुछ संगठनों ने केंद्र सरकार से भारत-म्यांमार सीमा बाड़बंदी परियोजना को रोकने की माँग की।

उन्होंने इसे भारत सरकार की एक ‘नापाक साजिश’ बताया, जिसका उद्देश्य ‘कृत्रिम सीमाएँ’ थोपकर नागा लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीनों से बेदखल करना है। जबकि मैतेई हिंदुओं ने इस बाड़बंदी परियोजना का स्वागत किया। उनका कहना था कि इससे मणिपुर में जारी संकट पर अंकुश लगेगा।

यह स्पष्ट है कि मणिपुर संकट से लेकर म्यांमार संघर्ष तक में विदेशी नागरिक और ईसाई मिशनरी का हाथ रहा है। ये लोग पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय हैं। वे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ‘छद्म युद्ध’ छेड़ रहे हैं, जिसका मकसद ईसाई राष्ट्र की स्थापना करना है।

इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे एक ऐसा संघर्ष-क्षेत्र तैयार करना चाहते हैं जिसे ईसाई कठपुतली आसानी से नियंत्रित कर सके। लेकिन भारत ऐसे नापाक हरकत को कभी सफल नहीं होने देगा। अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के हित में कई कदम उठाए गए हैं। अमेरिकी और यूक्रेनी ईसाई विद्रोहियों के समर्थकों की हालिया गिरफ्तारियाँ इसी बात की पुष्टि करती हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

AI समिट में देश को नंगा करना चाहते थे राहुल गाँधी, खुद के विधायकों ने कर दिया नंगा: राज्यसभा चुनाव का सबक यह भी- कॉन्ग्रेसी माँगे फुल टाइम-सीरियस नेतृत्व

कॉन्ग्रेस के प्रति जनता के साथ-साथ नेताओं और विधायकों, सांसदों का भी धीरे-धीरे मोहभंग हो रहा है। अब हालत यह है कि एक साथ तीन राज्यों के विधायकों ने पार्टी समर्थित राज्य सभा उम्मीदवारों को वोट नहीं किया, जिसकी वजह से वे हार गए।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। पार्टी अध्यक्ष खरगे काफी बुजुर्ग हो चुके हैं। युवाओं को पार्टी से जोड़ने में वे असमर्थ हैं। राहुल गाँधी के मुद्दों ने जनता को जोड़ने के बजाए भ्रमित करने की कोशिश की है। नतीजा है कि पार्टी धीरे-धीरे सिकुड़ती जा रही है और जनता में अपना विश्वास खोती जा रही है।

बिहार में एक भी सीट नहीं जीत पाई विपक्ष

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अब महागठबंधन का एक भी उम्मीदवार राज्यसभा चुनाव नहीं जीत पाया। सभी 5 सीटें एनडीए की झोली में गई। महागठबंधन के 4 विधायकों ने वोट ही नहीं डाला।

इन विधायकों की नाराजगी उम्मीदवार को लेकर थी। उनका कहना है कि पार्टी ने अगर मुस्लिम, दलित को प्रत्याशी बनाया होता तो वह वोट डालते, लेकिन एक बिजनेसमैन को टिकट देकर पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं का अपमान किया। दरअसल राज्यसभा चुनाव को लेकर उम्मीदवारों के चुनाव के वक्त पार्टी ने पुराने नेताओं को दरकिनार किया। उसकी जगह बिजनेसमैन एडी सिंह को उम्मीदवार बनाया।

यहाँ तक कि जिस बैठक में नाम तय किए गए, उसमें कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम भी नहीं बुलाए गए थे। इससे पता चलता है कि पार्टी को न तो प्रदेश नेताओं से मतलब है और न ही कार्यकर्ताओं की भावनाओं से। इसका नतीजा रहा कि महागठबंधन के उम्मीदवार हार गए।

हरियाणा में कॉन्ग्रेस की साँसे फूली

हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों में से एक सीट जीतने में भी कॉन्ग्रेस की साँसे फूलने लगी। ये तब हुआ जब उसके पास 37 विधायक थे और उसे 28 से 30 वोट की जरूरत थी। दरअसल कॉन्ग्रेस के 5 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी और 4 वोट को अवैध घोषित कर दिया। हालाँकि बीजेपी का भी एक वोट अवैध घोषित हुआ।

इनेलो के 2 विधायकों ने वोट नहीं डाले। भले ही कॉन्ग्रेस ने जैसे तैसे अपनी सीट बचा ली, लेकिन विधायकों के बागी तेवर कॉन्ग्रेस के लिए चिंता का विषय हैं। ऐसा तब हुआ जब विधायकों को चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश भेज दिया गया था। पार्टी के अंदर चल रहे खींचतान से परेशान होकर हरियाणा प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राम किशन गुज्जर ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया।

ओडिशा में भी क्रॉस वोटिंग

ओडिशा की 4 राज्य सभा सीटों में से दो बीजेपी , एक बीजेडी और एक बीजेपी समर्थक निर्दलीय उम्मीदवार जीत गए। निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व केन्द्रीय मंत्री दिलीप रे के जीतने पर बवाल मचा हुआ है, क्योंकि उन्हें बीजेडी और कॉन्ग्रेस विधायकों के वोट जरूर मिले होंगे। इस मामले में कॉन्ग्रेस ने अपने तीन विधायकों रमेश जेना, दशरथी गमांग और सोफिया फिरदौस को सस्पेंड कर दिया है।

सोफिया फिरदौस राज्य की पहली मुस्लिम विधायक हैं। वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोहम्मद मोकीम की बेटी हैं। पार्टी ने 2024 के ओडिशा विधानसभा चुनावों में मोहम्मद मोकीम की जगह फिरदौस को उम्मीदवार बनाया, जो विजयी रहीं। वह ओडिशा की बाराबती-कटक सीट से विधायक बनी। ऐसे में सवाल उठता है कि सोफिया फिरदौस हो या बाकी के विधायक, इनलोगों ने क्रॉस वोटिंग क्यों की। पार्टी की विचारधारा से वह प्रभावित थी और कॉन्ग्रेस की पुरानी परंपरा से आती हैं, तो फिर क्यों छोड़ा ‘हाथ’?

3 साल में राहुल गाँधी ने मिलने का वक्त नहीं दिया

याद कीजिए सोफिया मोहम्मद के पिता मोहम्मद मोकिम ने ओडिशा में पार्टी की हालत पर चिंता जताई थी और सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर कॉन्ग्रेस की ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि 3 साल की कोशिशों के बावजूद वह राहुल गाँधी ने नहीं मिल पाए।

उन्होंने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पार्टी युवाओं से जुड़ नहीं पा रही है। उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पतन, नेतृत्व की नाकामियों और तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया था।

पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम ने चेतावनी दी थी कि पार्टी बाहरी विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों की वजह से अपनी विरासत खो रही है। पार्टी के फैसले इसे अंदर से खोखला कर रही है।

कॉन्ग्रेस पार्टी में वैचारिक शून्यता के साथ साथ पार्टी नेतृत्व का कार्यकर्ताओं से ‘दूरी’ इसके विघटन की अहम वजह है। जब कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक को राहुल गाँधी से मिलने के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है और फिर भी वह नहीं मिल पाते हैं, तो आम कार्यकर्ता कहाँ मिल पाएँगे। इससे नेतृत्व और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच की खाई साफ नजर आती है।

संसद सत्र चालू, राहुल गए विदेश

राहुल गाँधी जो मुद्दे संसद में उठाते हैं उससे भी कार्यकर्ता खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता है। एपस्टीन फाइल्स के मुद्दे पर पूरा बजट सत्र हंगामा की भेंट चढ़ गया। यहाँ तक कि देश में एलपीजी की कालाबाजारी और केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री के आश्वासन पर कि देश में तेल और एलपीजी की कोई समस्या नहीं है, राहुल गाँधी को बोलने का मौका मिला।

उन्होंने एलपीजी और तेल की किल्लत पर सरकार को घेरने के बजाए एपस्टीन फाइल्स का मुद्दा उठाने की कोशिश की। जनता को एलपीजी की कालाबाजारी से दिक्कत है, ब्लैक मार्केट में हजारों रुपए में गैस सिलेंडर लेने के लिए जनता मजबूर है, लेकिन राहुल गाँधी को ये बात समझ में नहीं आई और एलपीजी पर बात न कर उन्होंने जनता से मुँह फेरा।

यूँ भी जब संसद में राहुल गाँधी की उपस्थिति पर सत्ता पक्ष सवाल उठाते रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा संसद सत्र के दौरान उनके विदेश यात्राओं को लेकर कहा था कि राहुल गाँधी विदेश में रहते हैं और उनकी उपस्थिति 51-52 फीसदी है, जबकि औसत सांसदों की उपस्थिति 80 फीसदी है।

संसद सत्र के दौरान राहुल गाँधी जर्मनी, इंग्लैंड, सिंगापुर और वियतनाम जैसे देशों की यात्रा पर थे। ऐसे में ‘पार्ट टाइम पॉलिटिक्स’ कर वह कैसे पार्टी को एकजुट रख पाएँगे। बीजेपी ने भी इस पर राहुल गाँधी पर तंज कसा और कहा कि राहुल गाँधी संसद में बोलने की शिकायत करते हैं, तो वे मौजूद भी तो रहें। असल में वे विदेश यात्राओं पर होते हैं।

देश में अहम चुनाव और राहुल गए विदेश

राहुल गाँधी अक्सर अहम चुनाव के वक्त विदेश चले जाते हैं। इसको लेकर भी कार्यकर्ताओं और जनता में छवि ‘नॉन सीरियस’ नेता की बनी है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गाँधी बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाल रहे थे। उसके समाप्त होते ही दक्षिण अमेरिका के 4 देशों की यात्रा पर चले गए। उनकी यह यात्रा कितने दिनों की होगी, ये बात उनके नेताओं को भी पता नहीं थी।

राहुल की यात्रा की वजह से महागठबंधन की सीट शेयरिंग फॉर्मूला भी फँस गया। बिहार की चुनाव रणनीति और प्रचार पर जब उन्हें ध्यान देना चाहिए था, वह विदेश भाग गए।

यहाँ तक कि लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जब वह भारत जोड़ो यात्रा कर जनता को जोड़ने की कवायद कर रहे थे, 10 दिनों के लिए गायब हो गए, हालाँकि भारत जोड़ो यात्रा नहीं रुकी।

दिसंबर 2023 में हुए तीन बड़े राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनावों से कॉन्ग्रेस बुरी तरह हार गई। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में मायूसी थी, लेकिन राहुल गाँधी के विदेश जाने की खबर आई। हालाँकि इंडिया गठबंधन के अंदर इस पर चर्चा होने लगी और राहुल गाँधी को विदेश यात्रा रोकनी पड़ी।

दिसंबर 2021 में जब उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। हर पार्टी पूरे जी जान से चुनाव में लगी हुई थी। ऐसे में राहुल गाँधी विदेश में थे। कॉन्ग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। ऐसा ही कर्नाटक चुनाव 2018 में भी हुआ। पार्टी नेतृत्व को राहुल गाँधी के अचानक विदेश दौरे की वजह से सरकार गठन और विभागों के वितरण के लिए इंतजार करना पड़ा।

एआई समिट का विरोध

दिल्ली के भारत मंडपम में जब फरवरी 2026 में एआई समिट हुआ, उसमें दुनियाभर के टेक लीडर्स और बिजनेसमैन पहुँचे। पूरी दुनिया की नजर उस वक्त भारत पर थी। ऐसे में यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने विरोध प्रदर्शन कर देश की इज्जत डूबोने की कोशिश की। उस दौरान कॉन्ग्रेस का एक बड़ा वर्ग यूथ कॉन्ग्रेस के विरोध प्रदर्शन को देश के खिलाफ एक्शन माना।

यही वजह थी कि कॉन्ग्रेस के प्रवक्ताओं ने तुरंत इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। करीब 7 घंटे बाद कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस पर ट्वीट कर यूथ कॉन्ग्रेस की कार्रवाई को सपोर्ट करने की कोशिश की। इस मुद्दे पर कई दिनों बाद राहुल गाँधी की मुँह खुली। यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने शर्ट पहनी थी, जिस पर लिखा था- मोदी इन कॉन्प्रोमाइज्ड।

दरअसल ये भारत-यूएस ट्रेड डील के विरोध में प्रदर्शन था। यूथ कॉन्ग्रेस ने विश्वभर के प्रतिनिधियों के सामने देश का अपमान किया। कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इसका विरोध किया, लेकिन राहुल गाँधी के यूथ कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहते हुए कहा कि इन्होंने एआई समिट में ‘अपना काम’ कर दिया।

राहुल ने कहा था इंडियन स्टेट से लड़ाई है

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का बयान देश में सुर्खियों में रहा। इसमें उन्होंने इंडियन स्टेट से लड़ने की बात कही थी। इस पर केस भी दर्ज किया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश से लड़ने की बात कहना दरअसल जनता को जानबूझकर विद्रोह करने के लिए भड़काना और अराजकता पैदा करने की कोशिश है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “यह मत सोचो कि हम निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। यदि आप मानते हैं कि हम बीजेपी या आरएसएस नाम के राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं तो आप समझ नहीं पाएँगे कि क्या हो रहा है। बीजेपी और आरएसएस ने हमारे देश की हर एक संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम बीजेपी, आरएसएस और भारतीय स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”

राहुल गाँधी बगैर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष न हों, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के साथ-साथ कॉन्ग्रेस के कर्ता-धर्ता भी वही हैं। कॉन्ग्रेस के मुद्दे जनता को जोड़ नहीं पाती हैं। इसके अलावा राहुल गाँधी की विदेश यात्रा से पार्टी की कार्यप्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है।

कॉन्ग्रेस में खरगे भले पार्टी अध्यक्ष हों, लेकिन चलती गाँधी परिवार की ही है, खास कर राहुल गाँधी की। सोनिया गाँधी बीमार रहती हैं। प्रियंका गाँधी भी राहुल के पीछे-पीछे चलने में विश्वास रखती हैं। ऐसे में राहुल गाँधी का पार्ट टाइम पॉलिटिक्स ने पार्टी का बेडा गर्क कर रखा है। पार्टी धीरे- धीरे सिकुड़ती जा रही है। भारत की सबसे पुरानी पार्टी जनता पर बेअसर होती जा रही है, इसके पीछे राहुल गाँधी की पॉलिटिक्स ही जिम्मेदार है।

ईरान vs इजरायल-अमेरिका युद्ध के असली ‘विजेता’ बनते व्लादिमीर पुतिन: जानें- कैसे रूस के लिए ‘वरदान’ बन गया मिडिल ईस्ट का संकट

आज पूरी दुनिया की नजरें ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ी जंग पर टिकी हैं। हर कोई डरा हुआ है कि कहीं यह तीसरा विश्व युद्ध न बन जाए। लेकिन इस बारूद के ढेर से हजारों किलोमीटर दूर बैठा एक शख्स शायद मन ही मन मुस्कुरा रहा है, वह हैं रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।

देखा जाए तो यह युद्ध पुतिन के लिए किसी ‘वरदान’ से कम नहीं है। जब से रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, दुनिया भर ने पुतिन को अलग-थलग कर दिया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट के इस संकट ने उन्हें एक नई ‘लाइफलाइन’ दे दी है।

इसके पीछे की सीधी सी बात यह है कि जब दुनिया में तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। रूस के पास तेल और गैस का भंडार है, तो जितना महँगा तेल बिकेगा, पुतिन की तिजोरी उतनी ही भरेगी। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि अब अमेरिका और यूरोप का पूरा ध्यान यूक्रेन से हटकर मिडिल ईस्ट पर टिक गया है।

सीधे शब्दों में कहें तो, पश्चिम के देश अब ईरान और इजरायल की आग बुझाने में उलझ गए हैं और पुतिन को यूक्रेन के मोर्चे पर बड़ी राहत मिल गई है। यह पुतिन के लिए सिर्फ एक संकट नहीं, बल्कि अपनी ताकत और अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने का एक सुनहरा मौका साबित हो रहा है।

ईरान-इजरायल युद्ध: पुतिन की जीत के 5 सबसे बड़े कारण

तेल की आसमान छूती कीमतें: रूस की तिजोरी में ‘डॉलर की बरसात’- मिडिल ईस्ट में मचे बवाल का सबसे बड़ा फायदा रूस की जेब को हुआ है। असल में दुनिया का 20% तेल जिस रास्ते (होर्मुज जलडमरूमध्य) से होकर गुजरता है, वहाँ जंग के कारण खतरा बढ़ गया है। इस डर से कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार निकल गई हैं।

चूंकि रूस की पूरी कमाई तेल और गैस बेचने से होती है, इसलिए तेल जितना महँगा हो रहा है, रूस को हर दिन बैठे-बिठाए करोड़ों डॉलर का एक्स्ट्रा मुनाफा हो रहा है। यही मोटी कमाई पुतिन को यूक्रेन के साथ युद्ध जारी रखने की ताकत दे रही है और उन पर लगे विदेशी प्रतिबंधों के असर को भी बेअसर कर रही है।

यूक्रेन से दुनिया का ध्यान भटकना- पिछले दो सालों से पूरी दुनिया और मीडिया सिर्फ रूस-यूक्रेन युद्ध की बातें कर रहे थे। लेकिन जैसे ही ईरान और इजरायल के बीच मिसाइलें चलनी शुरू हुईं, सबका ध्यान उस तरफ चला गया। अब अमेरिका और यूरोप के देशों की पहली कोशिश मिडिल ईस्ट की इस आग को शांत करने की है।

पुतिन के लिए यह किसी लॉटरी से कम नहीं है, क्योंकि अब उन पर दुनिया का दबाव कम हो गया है। इस ‘सुनहरे मौके’ का फायदा उठाकर वे अब यूक्रेन के खिलाफ अपनी सैन्य रणनीति को और भी ज्यादा आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।

अमेरिकी हथियारों और संसाधनों का बँटवारा- पहले अमेरिका अपने ढेर सारे हथियार और सैन्य मदद यूक्रेन को भेज रहा था, लेकिन अब उसे अपने सबसे पुराने दोस्त इजरायल की मदद के लिए अपने खजाने खोलने पड़े हैं। अब अमेरिका की मिसाइलें और आधुनिक हथियार यूक्रेन के बजाय मिडिल ईस्ट (इजरायल) भेजे जा रहे हैं।

अगर अमेरिका के पास हथियारों का स्टॉक कम हो जाता है, तो जाहिर है कि यूक्रेन को मदद मिलनी कम हो जाएगी और उसकी सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी। इसका सीधा-सीधा फायदा रूस की सेना को होगा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं बचेगा।

प्रतिबंधों के दबाव में आई ढील- सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो यह है कि अमेरिका ने तेल के दामों को बढ़ने से रोकने के लिए अपने नियमों में थोड़ी ढील दे दी है। कुछ खबरों की मानें तो ईरान से होने वाली तेल की सप्लाई रुकने की वजह से अमेरिका ने दबी जुबान में रूसी तेल को बाजार में आने की मंजूरी दे दी है। पुतिन के लिए तो यह किसी लॉटरी जैसा है, क्योंकि 2022 से रूस की कमाई रोकने के लिए अमेरिका ने जो कड़े प्रतिबंध लगाए थे, उनकी पकड़ अब ढीली पड़ती नजर आ रही है।

बढ़ता हुआ कूटनीतिक प्रभाव- पुतिन इस पूरे झगड़े का फायदा खुद को दुनिया का एक बड़ा और समझदार नेता दिखाने के लिए कर रहे हैं। रूस के ईरान के साथ तो अच्छे रिश्ते हैं ही, साथ ही वह इस इलाके के बाकी देशों से भी बातचीत कर रहा है।

वहीं दूसरी तरफ, अमेरिका और उसके साथी देशों (नाटो) के बीच इस बात को लेकर अनबन शुरू हो गई है कि ईरान और रूस से कैसे निपटा जाए। पुतिन इसी आपसी फूट का फायदा उठा रहे हैं और उनकी एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

रूस किस साइड है?

दिखावे के लिए तो रूस ऐसा जताता है जैसे वह किसी की तरफ नहीं है और बीच-बचाव कर रहा है, लेकिन असल में वह ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। रूस और ईरान की दोस्ती और हथियारों का लेनदेन बहुत पुराना है। जब यूक्रेन के साथ युद्ध में रूस फँसा था, तब ईरान ने उसे ड्रोन और तकनीक देकर बड़ी मदद की थी, और अब पुतिन वही पुराना अहसान चुका रहे हैं।

यहाँ तक कि कुछ खबरों में तो यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के नए सबसे बड़े नेता मोजतबा खामेनेई को इलाज के लिए खास रूसी विमान से मॉस्को (रूस) ले जाया गया है। यह बात साफ दिखाती है कि दोनों देश अब एक-दूसरे के कितने करीब आ चुके हैं।

युद्ध शुरू होने से पहले रूस का रुख

जंग शुरू होने से पहले ही रूस ने अमेरिका और उसके साथी देशों को खरी-खोटी सुनाई थी। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) ने बार-बार चेतावनी दी थी कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका अपनी मनमानी कर रहा है और उसकी यही नीतियाँ पूरे इलाके को तबाही की ओर ले जाएँगी।

पुतिन का कहना था कि जब तक इजरायल और फिलिस्तीन का पुराना झगड़ा नहीं सुलझता, तब तक वहां शांति नहीं हो सकती। रूस ने अमेरिका को ‘आग से न खेलने’ की सलाह दी थी, लेकिन अंदर ही अंदर रूस को पता था कि अगर वहां तनाव बढ़ता है, तो अंत में फायदा उसी का होने वाला है।

पुतिन को मिल रहे अन्य फायदे और जमीनी हकीकत

जैसे-जैसे जंग बढ़ रही है, पुतिन के हाथ कुछ और बड़े जैकपॉट लग रहे हैं। सबसे पहली बात तो ये कि ईरान अब पूरी तरह रूस की मुट्ठी में आ गया है। जंग की वजह से उसे हथियारों और मदद के लिए रूस की जरूरत है, जिसका फायदा उठाकर रूस अब ईरान की मिलिट्री तकनीक और ठिकानों का इस्तेमाल अपने काम के लिए कर सकता है।

दूसरी तरफ, पुतिन पूरी दुनिया को ये ढोल पीटकर बता रहे हैं कि अमेरिका सबको सुरक्षा देने में फेल हो गया है। ट्रंप का नाटो देशों को धमकाना और चीन के साथ उनका बिगड़ता रिश्ता पुतिन के लिए किसी सुनहरे मौके जैसा है। इसके अलावा, अब रूस, चीन और ईरान ने मिलकर अपना एक अलग गुट बना लिया है, जो तेल के बाजार और डॉलर की बादशाहत को खत्म करने की तैयारी में है।

ईरान और इजरायल के बीच जलता हुआ मिडिल ईस्ट पुतिन के लिए एक ऐसी बिसात बन गया है जहाँ उनके दुश्मन (अमेरिका और पश्चिम) उलझे हुए हैं और उनकी खुद की आर्थिक और सैन्य स्थिति मजबूत हो रही है। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो पुतिन न केवल यूक्रेन में अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे, बल्कि वह दुनिया के नए शक्ति केंद्र के रूप में भी उभर सकते हैं।

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर चादर बिछाकर इफ्तार: जानिए हाईवे पर यूट्यूबर सबा इब्राहिम जैसी हरकत करने वालों के लिए है कौन सा कानून, क्या मिल सकती है सजा

नमाज के लिए सड़कों को ब्लॉक करना अब मजहबी तत्वों के लिए सामान्य बात हो गई है, लेकिन इफ्तार के लिए हाईवे पर ही चादर बिछाकर बैठ जाना ये सोशल मीडिया पर नया कारनामा है। इसे करने वाली कोई और नहीं बल्कि मशहूर यूट्यूबर और टीवी एक्टर शोएब इब्राहिम की बहन सबा इब्राहिम हैं।

13 मार्च 2026 को अपलोड किए गए सबा के व्लॉग में उन्होंने रमजान में अपने ससुराल जाने की जर्नी को दिखाया है। इसकी शुरुआत में ही देख सकते हैं कि सबा इब्राहिम और उनके शौहर बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर उतरते हैं और उसके बाद फोटोशूट होता है, फिर वहीं वह एक चादर बिछाकर अपने पूरे परिवार के साथ हाईवे पर बैठकर इफ्तार करते हैं।

इस दौरान उनके साथ उनकी खाला, एक कृष्णा नाम का लड़का और उनका एक साल का बेटा भी था। लेकिन सबा और शौहर को किसी की कोई परवाह नहीं हुई।

इफ्तार के बाद सबा ये कहते हुए भी दिखती हैं कि उन्हें बहुत मजा आया और ये उनका पहला अनुभव था। उनकी इस वीडियो को अब तक 11 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं और लगातार इसपर चर्चा जारी है।

वीडियो का प्रभाव

सबा इब्राहिम लॉकडाउन के बाद सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुई हैं और वर्तमान में उनके 30 लाख से अधिक फॉलोअर्स हैं। ऐसे में उनकी गतिविधियों का असर बड़ी संख्या में लोगों, खासकर युवाओं पर पड़ सकता है। कई लोग उन्हें फॉलो करते हैं और उनके जीवनशैली से प्रेरित होते हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि सार्वजनिक मंचों पर जिम्मेदार व्यवहार दिखाया जाए।

यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि हाईवे पर इस तरह इफ्तार करना किसी मजहबी परंपरा का हिस्सा नहीं है। इसके विपरीत, यह कानून के अनुसार गलत है और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 8-ख जोड़ी जाती है। अब ये धारा क्या है, आइए जानते हैं

क्या है हाईवे अवरोध करने पर कानून

राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 8-ख के अंतर्गत राष्ट्रीय राजमार्गों (नेशनल हाईवे) को क्षति पहुँचाने या उनमें व्यवधान उत्पन्न करने को एक गंभीर दंडनीय अपराध माना गया है।

इस प्रावधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसा कोई कार्य करता है जिससे राजमार्ग में अवरोध हो जाए या उस पर यात्रा करना और संपत्ति का परिवहन असुरक्षित हो जाए, तो उसे पाँच वर्ष तक के कारावास, जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जा सकता है।

यह धारा विशेष रूप से राजमार्गों की सुरक्षा के लिए वर्ष 1995 में जोड़ी गई थी जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा विशेष समझौतों के तहत विकसित या अनुरक्षित किया जाता है, ताकि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को शरारती तत्वों और जानबूझकर किए जाने वाले नुकसान से बचाया जा सके। इसके अलावा आईपीसी की धारा 341 भी गलत तरीके से लोगों/वाहनों के रास्ता रोकने पर लगाई जाती है।

उदाहरण से समझाएँ तो नेशनल हाईवे पर प्रदर्शन करना या धरना देना, जिससे और लोगों के लिए रास्ता जाम हो जाए व एम्बुलेंस, बसें या ट्रक न निकल पाएँ, तो यह धारा 8-ख और IPC 341 दोनों के तहत अपराध बन सकता है।

इसी प्रकार हाईवे के बीच लाकर कोई निर्माण सामग्री या फिर अपनी गाड़ी खड़ी करना भी इन धाराओं के तहत दंडनीय है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ट्रक, ट्रैक्टर या अपनी गाड़ी बीच में छोड़ता है तो कानून उस पर एक्शन ले सकता है।

सबा इब्राहिम से जुड़े मामले में भले ही यातायात बाधित नहीं हुआ, लेकिन वीडियो में साफ दिख रहा है कि उस हाईवे पर गाड़ियाँ आ जा रही थीं। यूट्यूबर ने कुछ व्यूज के लिए न कानून की परवाह की और न ही परिवार की सुरक्षा की। अब लोग इसी कारण से उनपर सवाल उठा रहे हैं।

अखिलेश यादव ने कांशीराम को दिया धोखा: UP में ‘बहुजन दिवस’ के नाम पर सपा ने की खानापूर्ति, खुद मुंबई में सितारों संग सजाई ‘महफिल’

समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती को ‘PDA दिवस’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) के रूप में मनाने का भव्य ऐलान किया था। पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेश में जिला स्तर पर कार्यक्रमों का निर्देश जारी किया। लेकिन रविवार (15 मार्च 2026) को जब दलित-बहुजन समाज कांशीराम की जयंती मना रहा था, अखिलेश यादव मुंबई पहुँच गए। वहाँ उन्होंने ‘Vision India: Creative Economy Summit’ में भाग लिया और बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान से मुलाकात की। सपा की PDA रट लगाने वाले अखिलेश का यह व्यवहार न सिर्फ पाखंड का उदाहरण है, बल्कि उनकी राजनीति की खोखलापन को भी उजागर करता है।

क्या है पूरा मामला, पहले ये समझ लें

दरअसल, समाजवादी पार्टी की ओर से खुद अखिलेश यादव ने ऐलान किया था कि सपा ने 15 मार्च 2026 को कांशीराम जयंती को ‘बहुजन समाज दिवस अर्थात PDA दिवस’ मनाएगी। प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने सर्कुलर जारी कर सभी जिलों में कार्यक्रम करने के निर्देश दिए। लेकिन अखिलेश खुद उत्तर प्रदेश में कहीं नजर नहीं आए।

इसके बजाय उन्होंने मुंबई का रुख किया। वहाँ ‘Vision India: Creative Economy Summit’ में शामिल होकर उन्होंने एक्स पर लिखा, “जो इंसान, इंसानियत और दुनिया को बेहतर बनाए वही क्रिएटिविटी है।” ट्वीट में उन्होंने क्रिएटिव इकॉनमी पर लंबा भाषण दिया और तस्वीरें शेयर कीं।

इसी दिन अखिलेश ने सलमान खान के बांद्रा स्थित घर पहुँचकर मुलाकात की। उन्होंने ट्वीट किया, “मुंबई मिलन! @BeingSalmanKhan” और फोटो शेयर की।

जब पत्रकारों ने पूछा कि PDA दिवस के दिन आप मुंबई में सलमान खान से मिल रहे हैं, तो अखिलेश ने जवाब दिया कि सलमान के पिता सलीम खान की तबीयत खराब है, इसलिए आए हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सलीम खान की तबीयत कई दिनों से खराब बताई जा रही थी। मुलाकात एक दिन पहले या बाद में भी हो सकती थी। लेकिन अखिलेश ने PDA दिवस की ‘खानापूर्ति’ के लिए मुंबई की राह पकड़ ली। सलमान से मिलने के बाद उन्होंने कांशीराम को भारत रत्न देने की माँग भी की, लेकिन यह सब उत्तर प्रदेश से दूर…मुंबई से।

इसके विपरीत, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने अखिलेश के PDA ऐलान पर पहले ही तीखा हमला बोला था। उन्होंने कहा कि सपा का PDA असल में ‘परिवार दल अलायंस’ है। मायावती ने सपा पर नौटंकीबाजी का आरोप लगाया और कहा कि सपा का चाल-चरित्र-चेहरा हमेशा दलित-पिछड़ा विरोधी रहा है। बसपा ने अपने स्तर पर कांशीराम जयंती के कार्यक्रम किए, जबकि सपा ने सिर्फ खानापूर्ति की। अखिलेश यादव सपा के मुखिया हैं, लेकिन PDA दिवस पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं को संबोधित करने की बजाय बॉलीवुड की चकाचौंध चुनी।

दलितों पर अत्याचार की खबर आते ही अखिलेश यादव ने मूँद ली आँखें

यह पहला मौका नहीं है जब अखिलेश यादव की PDA राजनीति की असली सूरत सामने आई हो। सपा की यह PDA सिर्फ वोट बैंक की रणनीति है। जब दलितों पर अत्याचार होता है और अपराधी यादव समुदाय से जुड़ा होता है, तो अखिलेश और सपा पूरी तरह चुप हो जाते हैं। ताजा उदाहरण भदोही (संत रविदास नगर) की घटना है। जहाँ दलित चौकीदार जैसलाल सरोज को पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया गया। आरोपित का नाम कमलेश यादव है, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन अखिलेश यादव ने इस घटना पर एक शब्द भी नहीं कहा। न ट्वीट, न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न परिवार से मुलाकात। जब पीड़ित दलित होता है और अपराधी यादव, तो सपा की ‘PDA’ की ‘डी’ (दलित) गायब हो जाती है। जब अपराधी यादव होता है तो चुप्पी, वरना ‘संविधान बचाओ’ का राग अलापती है। यह PDA राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड है। अखिलेश यादव दलितों के नाम पर वोट माँगते हैं, लेकिन जब उनके अपने समुदाय का कोई व्यक्ति दलित पर अत्याचार करता है, तो आँखें बंद कर लेते हैं।

अखिलेश यादव की प्राथमिकता परिवारवाद, सेलिब्रिटी कल्चर और सैफई महोत्सव

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अखिलेश यादव की यह हरकत 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी को भी उजागर करती है। PDA का नारा पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का दावा करता है, लेकिन अखिलेश का मुंबई भ्रमण साबित करता है कि उनकी प्राथमिकता परिवारवाद, सेलिब्रिटी कल्चर और सैफई महोत्सव जैसी चकाचौंध है।

सपा उत्तर प्रदेश की पार्टी है, लेकिन मुखिया मुंबई में क्रिएटिव इकॉनमी समिट में व्यस्त हैं। क्या यह सामाजिक न्याय है? क्या PDA दिवस मनाने के लिए सिर्फ ट्वीट और सर्कुलर काफी है, जबकि नेता खुद मौजूद नहीं?

अखिलेश यादव ने कांशीराम जयंती पर PDA दिवस का ऐलान किया, लेकिन खुद मुंबई चले गए। सलमान खान से हाथ मिलाया, सलीम खान की तबीयत का बहाना बनाया, लेकिन दलितों की पीड़ा पर चुप रहे। भदोही जैसी घटनाओं में चुप्पी साध लेना उनकी सोच को दर्शाता है। सपा यादव-केंद्रित पार्टी है। PDA का ‘डी’ सिर्फ चुनावी जुमला है। असली दलित उत्थान तो बसपा जैसे दलों के पास है, जो कांशीराम की विरासत को सच्चे अर्थों में निभाती है।

अखिलेश यादव PDA दिवस मनाने के लिए जोर-शोर से डंका बजा रहे थे, लेकिन कल इनको बुलावा मिला तो मुंबई चले गए, सलमान खान-रितेश देशमुख और बाकी सब से मिले, X पर इसकी स्टोरी भी डाली लेकिन कांशीराम जयंती को सिर्फ एक पोस्ट में निपटा दिया। हालाँकि उन्होंने पीडीए दिवस तो मनाया, लेकिन उससे एक दिन पहले यानी 14 मार्च 2026 को सपा की महारैली कर के। जिसमें पीडीए के नाम पर सिर्फ इफ्तार पार्टी में हिस्सा लिया।

यह पूरा घटनाक्रम सपा की क्रेडिबिलिटी पर सवाल खड़ी करती है। अखिलेश यादव की यह दोहरी नीति न सिर्फ दलित समाज को ठगा रही है, बल्कि पूरे PDA गठबंधन को कमजोर कर रही है। उत्तर प्रदेश की जनता अब ऐसे पाखंड को पहचान चुकी है। फिलहाल अखिलेश यादव का मुंबई वाला ‘मिलन’ PDA दिवस की सच्चाई को बेनकाब कर चुका है।

सड़कों पर नमाज पढ़ने की जिद: मजबूरी या मजहब की आड़ में ताकत का मुजाहिरा

एक हफ्ते में ईद है, कहने को तो ये शांति और भाईचारे का दिन है लेकिन कट्टरपंथियों के एक बड़े तबके के लिए यह शक्ति प्रदर्शन का भी दिन भी होता है। हमारे ऐसा कहने के पीछे कि कई वजह हैं और उनमें से एक प्रमुख वजह है- ‘सड़क बंद कर नमाज पढ़ने की जिद’। ये कोई गढ़ी हुई थ्योरी नहीं है बल्कि यही हकीकत है। अभी से सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल होने लगे हैं जिनमें मुस्लिमों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया जाने लगा है।

इन दिनों सैयद अयूब नाम के एक मुस्लिम इन्फ्लुएंसर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। अयूब इस वायरल वीडियो में कह रहा है, “संभल नहीं पूरे हिंदुस्तान में रोड पर नमाज अता की जाएगी। किसी की माँ जनी तो इंशाअल्लाह मुसलमानों को रोककर दिखाए।” अयूब ने आगे कहा, “रोड पर नमाज पढ़ने नहीं देंगे, रोड पर नमाज पढ़ेंगे तो हम केस करेंगे, हम जेलों में डालेंगे। ये धमकियाँ दूसरों को देना, मुस्लिम इससे डरने वाला नहीं है।”

यह इकलौते अयूब की धमकी नहीं है, यह जिद एक बड़े तबके की है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए सैकड़ों ऐसे वीडियो आपको नजर आ जाएँगे। सवाल उठते है कि क्या यह केवल मजहबी क्रिया है या बात इससे आगे की है। यह जिद और धमकी सुनकर साफ समझ आता है कि बात इससे आगे की ही है। इसके पीछे एक गहरा संदेश छिपा हुआ है और वो संदेश है ‘शक्ति प्रदर्शन’ का।

जब किसी शहर की व्यस्त सड़क, चौराहे या सार्वजनिक स्थान पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर नमाज पढ़ते हैं और उस कारण ट्रैफिक रुक जाता है, आम लोगों की आवाजाही बाधित होती है और पूरा इलाका ठहर जाता है यानि एक अघोषित ‘बंद’ जैसी स्थिति बन जाती है। यह एक प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश है कि हम यहाँ इतने हैं, हमारी संख्या इतनी अधिक है और हम सार्वजनिक जगहों पर भी अपने तरीके से व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मानसिकता के पीछे भीड़तंत्र वाली सोच है। यह कोई कल शुरू हुई प्रथा नहीं है, दशकों से यही चल रहा है और अब तो दायरा बढ़ने लगा है। अब शुक्रवार को जुमे की नमाज के लिए सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर कब्जा जमाया जाने लगा है।

भारत में मुस्लिम आबादी 16-17% है लेकिन मस्जिदों की संख्या लाखों में है। वक्फ बोर्ड के पास लाखों एकड़ जमीन है, जहाँ नई मस्जिदें बन सकती हैं। फिर क्यों सड़कें? क्योंकि यह मजबूरी नहीं बल्कि इरादतन किया जाने वाला काम है। यह दिखावा है कि ‘हम जहाँ चाहें, वहाँ कब्जा कर सकते हैं’।

सड़कों पर नमाज का यह तमाशा मजहबी नहीं है बल्कि एक सुनियोजित धमकी और शक्ति प्रदर्शन है। मुसलमानों की यह आदत सालों से चल रही है जहाँ वे जानबूझकर सड़कों को ब्लॉक करके, ट्रैफिक को ठप करके और आम लोगों को परेशान करके यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे बहुमत में आकर क्या-क्या कर सकते हैं। यह प्रदर्शन कहता है कि ‘देखो, हम सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं तो कल हम और बड़े पैमाने पर निकलेंगे और तुम क्या कर लोगे?’। यह जिहादी मानसिकता है जो हिंदू बहुल भारत में बहुसंख्यकों को चुनौती देती है।

कौन है हैदराबाद का ‘मुल्ला’ सैयद अयूब, जो सड़कों को नमाज पढ़ने के लिए मुस्लिमों को उकसा रहा: 2024 में अवैध फंडिंग और धोखाधड़ी के लिए हो चुका है गिरफ्तार, 20 लाख से ज्यादा हैं फॉलोअर्स

ईद से कुछ ही दिन पहले हैदराबाद के ‘मुल्ला’ सैयद अयूब का एक विवादित वीडियो सामने आया है। वीडियो में उन्होंने मुसलमानों से सड़कों पर नमाज पढ़ने की अपील की है। रविवार यानी 15 मार्च 2026 को यह वीडियो पोस्ट किया गया था। NGO ‘हैदराबाद यूथ करेज’ का खुद को ऑर्गनाइजर बताने वाले सैयद अयूब के इंस्टाग्राम पर करीब 20 लाख फॉलोअर्स हैं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि अयूब मुसलमानों से सड़कों पर नमाज पढ़ने की अपील कर रहा है। यह अपील सिर्फ संभल के मुस्लिमों से ही नहीं की जा रही है, बल्कि पूरे देश से की जा रही है। उसने कहा, “सिर्फ संभल में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सड़कों पर नमाज़ पढ़ी जाएगी, इंशाअल्लाह। अगर ईद की जमातें बड़ी होती हैं, तो मुसलमान बाहर निकल कर सड़कों पर नमाज पढ़ेंगे।”

उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को भी चुनौती दी, जिन्होंने सड़कों पर नमाज़ पढ़ने को लेकर चेतावनी दी थी। वीडियो में उन्होंने कहा, “अगर किसी को लगता है कि वे मुसलमानों को सड़क पर नमाज पढ़ने से रोक सकते हैं, तो वे कोशिश करके देख लें। मुस्लिम मुकदमों या जेल भेजने की धमकियों से नहीं डरते।”

अयूब ने UP के सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए अपमानजनक शब्द का भी इस्तेमाल किया। योगी सरकार की आलोचना करते हुए उसने कहा कि मुस्लिमों पर बेवजह पाबंदियाँ लगाई जा रही है। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और राज्य के कई हिस्सों में सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर बहस छेड़ गई।

क्या है संभल का मामला ?

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब संभल प्रशासन ने ईद और जुमे की नमाज के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर पहले ही सख्त चेतावनी जारी कर दी है।

गुरुवार (12 मार्च 2026) को संभल में तैनात पुलिस अधिकारी कुलदीप कुमार ने ‘पीस समिति’ की एक बैठक बुलाई। इस बैठक में यह साफ कर दिया गया कि सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं होगी। बैठक के दौरान दिए गए उनके बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया।

बैठक में उन्होंने कहा कि ईद से पहले प्रशासन पूरी तरह से सतर्क है और शांति तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि जो लोग मस्जिदों के बाहर सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ते हुए पाए जाएँगे, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक सड़कों पर नमाज पढ़ते हुए पाया गया, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। अगर जरूरी हुआ, तो लोगों को जेल भी भेजा जा सकता है।”

उन्होंने क्षेत्र में शांति बनाए रखने को लेकर कहा कि अगर लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हो रही घटनाओं से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं, तो वे उन जगहों पर जाने के लिए आजाद हैं, लेकिन भारत में अशांति फैलाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, सड़कों पर धार्मिक सभाओं की इजाजत देने से अक्सर ट्रैफिक की समस्या पैदा होती है। लोगों की आवाजाही में रुकावट आती है, इसलिए पाबंदियाँ लगाई जाती हैं।

गाजा के लिए अयूब का रमजान प्रोजेक्ट

अपनी विवादित टिप्पणियों के अलावा सैयद अयूब एक और अभियान में शामिल हैं। वह युद्धग्रस्त गाजा के लोगों को अपने ‘हैदराबाद यूथ करेज’ एनजीओ के माध्यम से इफ्तार का खाना और पीने का पानी पहुँचा रहे हैं।

अयूब अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर इस अभियान से जुड़े अपडेट शेयर करते रहते हैं और अपने फॉलोअर्स से इस पहल के लिए दान करने की अपील करते हैं।

हाल ही में सैयद अयूब को दिल्ली के उत्तम नगर में देखा गया। वह हिन्दू युवक तरुण कुमार की हत्या के आरोपितों में शामिल मुस्लिम महिला और उसके परिवार से मिलने आया था। तरुण कुमार की हत्या इस्लामी भीड़ ने की थी।

2024 में अवैध उगाही और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तारी

सैयद अयूब को पहले भी कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अप्रैल 2024 में उसे हैदराबाद पुलिस ने उसे धोखाधड़ी और अवैध धन उगाही के आरोप में शिकायत दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उस पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग कर गाजा संकट का हवाला देकर धन जुटाने और उस धन के उपयोग को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप है।

यह शिकायत वकील पी. साई किशोर ने हैदराबाद के सैदाबाद पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी। IPC की धारा 420 के तहत दर्ज FIR के अनुसार, अयूब ने ऑनलाइन चंदा यह दावा करते हुए इकट्ठा किया था कि वे खुद गाजा जाकर राहत सामग्री पहुँचाएँगे।

शिकायत में कहा गया था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने निजी बैंक खाते की जानकारी साझा की थी। इसके अलावा, उन्होंने हैदराबाद हवाई अड्डे से और बाद में मिस्र से तस्वीरें पोस्ट की, ताकि लोगों को लगे कि वह राहत सामग्री लेकर गाजा जा रहा है।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, पोस्ट लोगों को गुमराह करने के लिए डाले गए थे, क्योंकि हालात को देखते हुए सड़क मार्ग से गाजा तक सहायता भेजना लगभग असंभव था। अयूब पर दानदाताओं को गुमराह करने और झूठे वादे कर फंड जमा करने का भी आरोप लगाया गया था।

शिकायत में उनके NGO के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की गई और अनुरोध किया गया कि ‘हैदराबाद यूथ करेज’ के सोशल मीडिया पेजों को ब्लॉक कर दिया जाए।

2020 में फंड के दुरुपयोग के आरोप में सैयद अयूब की गिरफ्तारी

यह पहली बार नहीं था जब अयूब को गिरफ्तार किया गया था। साल 2020 में, हैदराबाद टास्क फोर्स पुलिस ने उन्हें उसी NGO के अध्यक्ष सलमान खान के साथ गिरफ्तार किया था।

पुलिस ने बताया कि दोनों ने गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों की मदद के लिए आमलोगों से फंड जमा किए और इसका दुरुपयोग किया।

जाँच में पता चला कि NGO ने अपने फेसबुक पेज का इस्तेमाल आर्थिक तंगी से जूझ रहे मरीजों के वीडियो पोस्ट करने के लिए किए और जनता से उनके इलाज के लिए पैसे देने की अपील की।

इस दौरान एक पुरानी बीमारी से पीड़ित महिला का फोटो पोस्ट किया गया और इलाज के लिए चंदा इकट्ठा किये गए। लेकिन कुछ ही दिनों में अच्छी खासी रकम आरोपितों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए गए।

पुलिस ने बताया कि ₹15 लाख सलमान खान के बैंक खाते में और ₹15 लाख सैयद अयूब के एक रिश्तेदार के खाते में ट्रांसफर किए गए। शेष रकम एक दूसरे खाते में ही पड़ी रही।

दानदाताओं ने जब शिकायत की, तो पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया। बाद में, टास्क फोर्स ने हैदराबाद से अयूब और सलमान खान को गिरफ्तार कर लिया। कार्रवाई के दौरान उनके मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए।

सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर चल रही बड़ी बहस

सड़कों पर नमाज पढ़ने का मुद्दा सिर्फ संभल तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में सड़कों पर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई है, क्योंकि इससे ट्रैफिक जाम हो सकता है और आम लोगों को परेशानी हो सकती है।

अगर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर इकट्ठा होकर नमाज पढ़ते हैं, तो इससे ट्रैफिक जाम हो सकता है और वहाँ रहने वाले लोगों को दिक्कतें पेश आ सकती हैं। इसलिए पुलिस लोगों से कह रही है कि सड़कों के बजाय मस्जिदों, ईदगाहों या नमाज के लिए तय की गई दूसरी जगहों पर ही अपनी नमाज अदा करें।

अधिकारियों ने साफ किया कि ये पाबंदियाँ किसी भी धार्मिक गतिविधि को रोकने के लिए नहीं लगाई गई हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए लगाई गई हैं कि सार्वजनिक जगहों पर सभी लोगों की पहुँच बनी रहे।

मेरठ में भी पाबंदियाँ

मेरठ पुलिस ने रविवार (15 मार्च 2026) को ईद से पहले एक चेतावनी जारी की थी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अविनाश पांडे ने चेतावनी दी कि सड़कों पर नमाज पढ़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि नियमों का उल्लंघन करने वालों को पुलिस जाँच का सामना करना पड़ सकता है। यदि कानून-व्यवस्था का गंभीर उल्लंघन पाया गया, तो इसका असर पासपोर्ट जैसे सरकारी दस्तावेजों पर भी पड़ सकता है। बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि सड़क पर नमाज पढ़ने और पासपोर्ट रद्द होने के बीच कोई सीधा कानूनी नियम नहीं है, लेकिन यदि जाँच में किसी आपराधिक संलिप्तता या बार-बार नियमों के उल्लंघन का पता चलता है, तो अधिकारी मौजूदा कानूनों के तहत आगे की कार्रवाई कर सकते हैं।

(मुूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

USCIRF की रिपोर्ट में RSS पर बैन की सिफारिश, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और इस्लामी गैंग… सब हो गए खुश: जानें इस अमेरिकी आयोग का भारत-विरोधी इतिहास

अमेरिका के एक सरकारी आयोग ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने अपनी ताजी रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। आयोग का दावा है कि यह संगठन हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख केंद्र है और इसके कारण भारत में मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित और आदिवासी समुदाय भय के माहौल में जी रहे हैं।

हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब USCIRF ने भारत और हिंदू संगठनों को निशाने पर लिया हो। पिछले कई वर्षों से यह आयोग लगातार ऐसी रिपोर्टें जारी करता रहा है जिनमें भारत को ‘धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करने वाला देश’ बताया जाता है। भारत सरकार हर बार इन रिपोर्टों को ‘पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित’ बताकर खारिज करती रही है।

दिलचस्प बात यह है कि USCIRF की इस सिफारिश के सामने आते ही भारत में वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रेसी नेता और कई इस्लामी संगठनों से जुड़े लोग खुलकर खुश होते दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों ने इसे ‘सच्चाई सामने आने’ जैसा बताने की कोशिश की। इसमें ये बात जोड़ना अहम है कि कई मौकों पर खुद अमेरिकी सरकार ने भी इसकी सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया। भारत के मामले में 2020 की रिपोर्ट भी खारिज कर दी गई थी। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह आयोग कितना प्रभावशाली है, इसकी रिपोर्टों की विश्वसनीयता क्या है और क्यों बार-बार भारत इसकी रिपोर्ट्स के केंद्र में होता है।

USCIRF क्या है और इसकी रिपोर्टें क्यों विवादों में रहती हैं

USCIRF यानी अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) एक अमेरिकी संघीय आयोग है जिसे 1998 में बनाए गए International Religious Freedom Act के तहत स्थापित किया गया था। इसका घोषित उद्देश्य दुनिया के विभिन्न देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति की निगरानी करना और अमेरिकी सरकार को सलाह देना है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह आयोग अक्सर निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बजाय राजनीतिक एजेंडे के तहत रिपोर्ट जारी करता है। इसकी रिपोर्टें अक्सर उन्हीं देशों के खिलाफ अधिक कठोर होती हैं जो अमेरिका की विदेश नीति से पूरी तरह सहमत नहीं होते।

भारत जैसे देशों को लेकर USCIRF की रिपोर्टों पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। भारत सरकार कई बार कह चुकी है कि यह आयोग भारत की जटिल सामाजिक संरचना और संवैधानिक व्यवस्था को समझने में पूरी तरह विफल है। भारत के विदेश मंत्रालय ने 2024 में USCIRF की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा था कि यह संगठन ‘पूर्वाग्रह से भरा और राजनीतिक एजेंडे वाला’ है।

RSS पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश, रिपोर्ट में क्या कहा गया?

USCIRF की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भारत में हिंदू राष्ट्रवाद का प्रमुख संगठन है और इसके प्रभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति खराब हुई है। आयोग ने अमेरिकी सरकार से सिफारिश की है कि वह इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने या प्रतिबंध जैसी कार्रवाई पर विचार करे। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ी है। इसमें भाजपा सरकार, नागरिकता संशोधन कानून (CAA), धर्मांतरण विरोधी कानून और गौ-संरक्षण कानूनों को भी निशाना बनाया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया, “व्यक्तियों और संस्थाओं पर लक्षित प्रतिबंध लगाए जाएँ, जैसे भारत की रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), क्योंकि वे धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं और उन्हें सहन करते हैं। यह प्रतिबंध उन व्यक्तियों या संस्थाओं की संपत्तियों को फ्रीज करके और/या उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने से रोककर लागू किया जाए।”

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से कहा है कि भारत के आरएसएस के साथ ही रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) पर भी बैन लगाना चाहिए। आयोग ने रिपोर्ट में आरएसएस और रॉ के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

USCIRF की रिपोर्ट में RSS पर बैन की सिफारिश(फोटो साभार: Report)

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ

रिपोर्ट में राम मंदिर के निर्माण और बाबारी मस्जिद के विध्वंस को लेकर कई बातें लिखी गई हैं। इसमें लिखा है कि साल 2024 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बिगड़ गई। हालाँकि भारत ने इन आरोपों को पहले भी पक्षपातपूर्ण बताया है। रिपोर्ट में 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाने से राम मंदिर को जोड़ा गया है। बाबरी विध्वंस की वही पुरानी कहानी लिखी गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बस जरा सा जिक्र कर उसे किनारे कर दिया गया है।

रिपोर्ट में ‘एंटी कन्वर्जन लॉ’ का भी जिक्र किया गया है। लिखा गया है कि साल भर में, 28 में से 12 राज्यों ने नए धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करने या मौजूदा कानूनों को और सख्त बनाने की कोशिश की।

इसमें छत्तीसगढ़ के ईसाई पादरी द्वारा जबरन हिंदुओं का धर्म परिवर्तन, असम सरकार ने असम हीलिंग (प्रिवेंशन ऑफ ईविल) प्रैक्टिसेज बिल, राजस्थान में लव जिहाद के लिए नया कानून और गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट समेत अन्य मामलों का जिक्र किया गया।

रिपोर्ट में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर भी निशाना साधा गया है। लिखा गया है कि जून चुनावों से पहले मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण और भेदभावपूर्ण बयानबाजी की गई।

USCIRF की रिपोर्ट, भारत पर लिखे हिस्से की कॉपी

खुशी से झूम उठे वामपंथी मीडिया, कॉन्ग्रसी इकोसिस्टम और इस्लामी गैंग से जुड़े लोग

USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे।

कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सोशल मीडिया पर USCIRF की रिपोर्ट को साझा करते हुए भाजपा सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की।

सुप्रिया श्रीनेत ने एक्स पर लिखा, “आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह सिफारिश अमेरिकी सरकार के आयोग यूएससीआईआरएफ ने ट्रंप प्रशासन को दी है। महात्मा गाँधी की हत्या के बाद सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना बिना किसी कारण के नहीं था। यह कट्टरता को बढ़ावा देता है, सांप्रदायिक तनाव को भड़काता है और भारत को वैश्विक स्तर पर शर्मिंदा करता है।”

USCIRF की रिपोर्ट सामने आने के बाद भारत में एक खास तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। वामपंथी मीडिया संस्थान, कुछ कॉन्ग्रेसी नेता और कई स्वयंभू एक्टिविस्ट सोशल मीडिया पर इसे ‘भारत में हिंदुत्व की पोल खुलना’ बताने लगे। कई वामपंथी पत्रकारों और एक्टिविस्टों ने भी इसे भारत के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय ‘सत्यापन’ की तरह पेश किया।

अमेरिका के इस्लामी संगठन Indian American Muslim Council (IAMC) ने बयान जारी कर कहा कि USCIRF की सिफारिश पर भारत को CPC घोषित किया जाए और Bajrang Dal, VHP जैसे संगठनों पर भी सैंक्शन लगाए जाएँ। Hindus for Human Rights और अन्य विदेशी-फंडेड ग्रुप्स ने भी रिपोर्ट को प्रमाण मानकर भारत पर हमला तेज कर दिया। मुस्लिम मिरर जैसे इस्लामी न्यूज आउटलेट भी इसमें शामिल रहे।

ये वही लोग हैं जो CAA-NRC को ‘मुस्लिम विरोधी’, राम मंदिर को ‘बहुसंख्यकवाद’, Article 370 खत्म करने को ‘कश्मीर पर अत्याचार’ कहते रहे। उनका खुश होना स्वाभाविक है – USCIRF ने उनके एजेंडे को अमेरिकी सरकारी मंच दे दिया। लेकिन हकीकत यह है कि ये गैंग भारत की बढ़ती आर्थिक-रणनीतिक स्वायत्तता (रूस से तेल खरीद, QUAD में स्वतंत्र रुख, आत्मनिर्भर भारत) से चिढ़ता है, न कि किसी काल्पनिक ‘अल्पसंख्यक उत्पीड़न’ से। ये अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी लॉबी का हिस्सा हैं, जो भारत को कमजोर करने के लिए USCIRF जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं।

साल 2020 से लगातार सीपीसी में डालने की सिफारिश

USCIRF ने 2020 से लगातार भारत को CPC की सूची में डालने की सिफारिश की है। 2020 रिपोर्ट में पहली बार CPC सिफारिश की गई थी, लेकिन अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने खारिज करते हुए कहा कि भारत में ये सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि कुछ सामुदायिक घटनाएँ थीं। अमेरिकी राजदूत सैमुएल ब्राउनबैक ने कहा था कि पाकिस्तान में तो सरकार स्तर पर ब्लास्फेमी कानून से अल्पसंख्यक जेलों में हैं, भारत में ऐसा नहीं। लेकिन USCIRF नहीं माना।

हर बार एक ही रोना, 2023-2024 की रिपोर्ट्स में भी एक जैसी बात

USCIRF की रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है। साल 2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट में साल 2024 में भी यही सुझाव था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

साल 2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है। कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं और वो है भारत को बदनाम करना।

USCIRF कमिश्नरों के पाकिस्तान, मिशनरी, सोरोस और एंटी-हिंदू काम के लिंक

USCIRF कमिश्नरों की नियुक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति और कॉन्ग्रेस द्वारा होती है। साल 2026 की रिपोर्ट के समय मुख्य कमिश्नर के तौर पर जो नाम सामने हैं, उन सभी का अतीत भारत के खिलाफ आग उगलने वाला, हिंदुत्व के खिलाफ बकवास करने वाला और वामपंथी इकोसिस्टम से जुड़े रहने का है। कोई सोरोस से फंडिंग पाता है, तो किसी ने पाकिस्तान में शिक्षा प्राप्त की है। हमने पिछले साल भी इनके बारे में बताया था। इस बार चेयर के तौर पर पाकिस्तानी आसिफ महमूद की जगह विकी हार्ट्जलर का नाम है, पिछले साल की पोजिशन की दोनों ने अदला-बदली की है।

भारत सरकार बता चुकी है पक्षपाती और राजनीतिक एजेंडा सेट करने वाला

भारत सरकार ने USCIRF की रिपोर्टों को लगातार खारिज किया है। बीते साल भी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि यह आयोग “तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और भारत की बहुलतावादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करता है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहाँ लगभग सभी प्रमुख धर्मों के लोग रहते हैं और अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता रखते हैं। भारत सरकार का यह भी कहना है कि USCIRF अक्सर अलग-थलग घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और भारत की संस्थाओं तथा न्यायिक फैसलों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का हिस्सा है USCIRF रिपोर्ट

अमेरिका के United States Commission on International Religious Freedom की रिपोर्ट ने एक बार फिर भारत को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है। इस बार निशाने पर RSS है, जिस पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है। राम मंदिर से लेकर नागरिकता कानून और दिल्ली दंगों तक भारत के लगभग हर बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे को इस आयोग की रिपोर्टों में विवादित तरीके से पेश किया गया है।

सवाल यह है कि क्या किसी विदेशी आयोग को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जटिल सामाजिक व्यवस्था पर अंतिम फैसला सुनाने का अधिकार होना चाहिए? और क्या इन रिपोर्टों का उद्देश्य सचमुच धार्मिक स्वतंत्रता की चिंता है या फिर भारत के खिलाफ एक वैश्विक नैरेटिव तैयार करना?

सदियों पुरानी परंपरा जब मंदिरों से निकल गाँव में जुटते हैं ‘भगवान’, लगती है देव सभा: जानें- ओडिशा के ‘पंचू डोला मेला’ का इतिहास

होली के रंगोत्सव के बाद ओडिशा में एक और रंगों का पर्व मनाया जाता है। इसे पंचू डोला मेला कहा जाता है। भुवनेश्वर से 15 किलोमीटर दूर खुर्दा जिले के हरिराजपुर गाँव में इसकी शुरुआत डोला पूर्णिमा के कुछ दिनों बाद होती है। राधा- कृष्ण की भक्ति से जुड़े इस त्योहार की धूम से पूरा ओडिशा रंगमय हो जाता है। इसलिए इसे होली-2 भी कहा जाता है। इसमें गुलाल की बौछार, पारंपरिक मिठाईयाँ और ईश्वर के प्रति आस्था का गजब का मेलजोल है।

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इस दौरान फूलों से सजाए गए राधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूलों पर रख कर गाँवों में घुमाया गया। फाल्गुन महीने की पूर्णिमा के पाँच दिन बाद शुरू होता है। 2026 में मार्च के दूसरे सप्ताह में ये महोत्सव शुरू हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित हुए। नृत्य संगीत से साथ उत्साहपूर्वक लोगों ने भव्य यात्रा निकाली।

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देवता जुटते हैं एक जगह

इस उत्सव की खासियत यह है कि भुवनेश्वर के आसपास के कई गाँवों से देवी-देवता भव्य जुलूसों के साथ एकत्र होते हैं। गाँव-गाँव के लोग और इस रंगारंग कार्यक्रम को देखने आये आगंतुक एक साथ जुटते हैं हरिराजपुर में।

यहाँ अधिष्ठाता देवता पश्चिमासंभू सोमनाथ देव का वास है। वे प्रतिकात्मक तौर पर सभी मंदिर के देवताओं को उत्सव में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। राधा-कृष्ण और भगवान शिव की मूर्तियाँ खास तरह से सजाए गए डोला बिमान नाम की खूबसूरत लकड़ी की पालकियों में आती हैं। इन पालकियों की बनावट भी मंदिर की तरह होती है। पालकियों को भक्त प्रणाम कर अपनी श्रद्धा दिखाते हैं।

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जैसे ही हर देवता उत्सव स्थल पर पहुँच जाते हैं। पूरा वातावरण उत्साह से भर उठता है। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ शंख की आवाज और ढोल की थाप पर लोग नाचते गाते रंग बिरंगे गुलाल से उनका स्वागत करते हैं। एक- एक कर पालकी कतार में लगाई जाती है। इसके बाद भव्य आध्यात्मिक सभा का आयोजन होता है। इसमें अनेक गाँवों के लोग और उनके देवता मौजूद रहते हैं।

4 शताब्दी पुरानी परंपरा

छोटे से गाँव में आसपास के दर्जनों देवी-देवता इस खास कार्यक्रम में आते हैं, जिससे छोटा सा गाँव भक्तिमय हो जाता है। भक्तों के लिए इन देवताओं का एक साथ मिलन काफी मायने रखता है। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं। इसे अत्यंत शुभ और विकास का प्रतीक माना जाता है।

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शाम होते ही पंचू डोला मेला की दिव्य सभा के पास सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। कीर्तन और भक्तिगीतों से इलाका गूँज उठता है। गाँव की गलियाँ रोशनी से जगमगा उठती हैं । खाने-पीने के स्टॉल लगते हैं और लोग इसका आनंद उठाते हैं। ढोल और झांझरियाँ की गूँज रातभर सुनाई देती है। स्टॉलों में स्थानीय हस्तशिल्प की वस्तुएँ भी मिलती हैं।

भक्तों और वहाँ पहुँचे मेहमानों के लिए सबसे खास होता है देर रात देवताओं की पालकियों में निकलने वाला जुलूस। ये जुलूस सुबह तक निकलते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पालकी के साथ चलते हैं, गीत गाते हैं और मिल कर उत्सव मनाते हैं। खूबसूरत आतिशबाजी से आसमान जगमगा उठता है। गीतों, जयकारों और आतिशबाजी से पूरे वातावरण में जादुई दृश्य छा जाता है।

ओडिशा का यह उत्सव चार शताब्दियों से मनाया जाता है। शुरुआत में यह एक गाँव में होने वाला उत्सव था, जिसमें धीरे धीरे कई गाँव शामिल हुए और यह ओडिशा का बड़ा महोत्सव बन गया। अनुष्ठानों और उत्सवों के अलग यह एक गहरी भावना को दर्शाता है।

उत्सव के दौरान भक्तिमय वातावरण में लोग प्रार्थना करते हैं, पारंपरिक मिठाइयाँ बाँटते हैं और घर पर मेहमानों को आमंत्रित करते हैं। एक तरह से यह उत्सव पारिवारिक मिलन का भी जरिया बन जाता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महोत्सव आस्था, संस्कृति और आनंद का संगम बन जाता है, जो लोगों को उनकी साझा विरासत की याद दिलाता है।

पंचू डोला मेला में जुटने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक महज त्योहार नहीं है। यह ओडिशा की परंपराओं का जीवंत उत्सव है, जहाँ भक्ति रंगों से सराबोर हो जाते हैं, संगीत हवा में गूँजता है और पूरा समुदाय उत्सव की खुशी में रंग जाता है।

आरफा जी, स्ट्रैटेजी बदलो, सच नहीं बदल पाएगा- भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा

‘सेकुलरिज्म’ की चादर ओढ़े एक इंसान में कितनी हिंदू घृणा भरी हो सकती है- अगर आपको चरम देखना है तो आप आरफा खानम शेरवानी को देखिए। अभी तक अपनी एकतरफा पत्रकारिता के लिए कुख्यात इस महिला ने अब खुलकर बोला है कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा।

अपने ही 2 दिन पुराने ट्वीट पर कमेंट करते हुए आरफा ने ये जहर उगला है। पुराने ट्वीट में इस महिला ने लिखा था- “कोई भी भारत को मुस्लिम मुल्क नहीं बनाना चाहता और भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न की होगा। हमने एक सेकुलर, लिबरल, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक के लिए लड़ाई लड़ी थी।”

आरफा खानम शेरवानी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

क्या है आरफा का ‘सेकुलरिज्म’

पहली नजर में आरफा का कथन आपको बड़ा उदारवादी और संवैधानिक मूल्यों की बात करता हुआ लग सकता है, पर सवाल यह है कि असल में आरफा के लिए ‘सेकुलर’, ‘लिबरल’ और ‘डेमोक्रेटिक रिपब्लिक’ का वास्तविक अर्थ क्या है।

खुद को पत्रकार कहने वाली आरफा के पुराने रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है कि उनके लिए ‘सेकुलरिज़्म’ का मतलब साफ है- एक ऐसा तंत्र जहाँ मुस्लिम अपनी मजहबी पहचान के नाम पर चाहे जो मर्जी वो करें… वहीं हिंदू न खुलकर अपनी पहचान बताए, न अपने धर्म की बातें करें, न अपने हक के लिए लड़े और सबसे महत्वपूर्ण चीज- वो न ही उन कट्टरपंथी तत्वों को उजागर करे जो सालों से उन्हें काफिर कहकर खत्म करने का सपना देखते हैं।

आज तमाम खबरें आती हैं जब भारत में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों और नेटवर्क का खुलासा होता है। उनके पास से बकायदा ऐसे ब्लूप्रिंट मिलते हैं जो बताते हैं कि वो भारत को कैसे 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने की तैयारी में है। उनकी प्लानिंग तक उजागर होती है कि वो धर्मांतरित करके, लव जिहाद के जरिए, घुसपैठ करवाकर डेमोग्राफी बदलना चाहते हैं…।

लेकिन, इन विषयों पर आरफा और कथित सेकुलर बुद्धिजीवियों एक शब्द नहीं बोलते। उलटा वो अपने पाठकों के दिमाग में ये डालते हैं कि कोई भी भारत को मुस्लिम राष्ट्र नहीं बनाना वाला…। क्या ये कहते हुए आरफा जैसे लोग हर आतंकी, हर कट्टरपंथी और हर घुसपैठिए की जिम्मेदारी ले रहे हैं? या ये सिर्फ उनकी बदली स्ट्रैटेजी का एक हिस्सा है।

भारत, सनातन धर्म और हिंदू राष्ट्र

आज भारत में रहकर वो ये बोल पा रही हैं कि भारत न कभी हिंदू राष्ट्र था और न कभी बनेगा। क्यों…? क्योंकि वो यही सोचती हैं कि भारत की नींव ही मुगलों के आने के बाद पड़ी, उनके हिसाब से भारत में उससे पहले कुछ था ही नहीं।

अब आरफा के लिए ये स्वीकारना कितना भी मुश्किल क्यों न हो मगर हकीकत यही है कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें और परंपराएँ हजारों वर्षों से सनातन सभ्यता के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं। यह भूभाग वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, अनगिनत धार्मिक स्थलों, तीर्थ परंपराओं और सांस्कृतिक उत्सवों से निर्मित हुआ है।

सेकुलर चाहकर भी इन तथ्यों को नहीं बदल सकते और न ही इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के उन अनेक अध्ययनों को नकार सकते हैं, जो साबित करते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा, जिनसे पता चलता है कि मुगल आक्रांताओं के आने के बाद भारत की सभ्यता बनी नहीं, बल्कि नष्ट हुई।

हिंदुओं के आवाज उठाने पर खतरे पर आ जाता है सेकुलरिज्म

आरफा के हिसाब से अगर उत्तम नगर के तरुण के साथ हुई बर्बरता को देखकर हिंदू बच्चा कोई बयान दे देता है तो इसका मतलब ये होता है कि हिंदुओं ने उसे कट्टर बना दिया। किंतु आरफा वो इस्लामी कट्टरपंथ में सने बच्चे नहीं दिखते जो खुलेआम भारत के खिलाफ जंग छेड़ने की बातें कहते हैं। उन्हें उन बच्चों में जहर नहीं दिखता तो जो मोदी-शाह के लिए अपशब्द उगलते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं। उस समय उन्हें सेकुलर, लोकतंत्र, लिबरल जैसे शब्द नहीं याद आते।

इन्हें समस्या तभी होती है जब हिंदू अपने धर्म की बात करें या मुस्लिम समुदाय द्वारा किए गए किसी अपराध पर अपना आक्रोश जाहिर करें। उत्तम नगर मामले के बाद भी यही होता देखा गया। आरफा को बेचैनी इसी बात से हुई कि आखिर वहाँ का हिंदू क्यों महसूस कर रहा है कि वो हिंदू है और किसी हिंदू के मारे जाने पर उसे गुस्सा भी क्यों आ रहा है।

अगर हिंदू तरुण हत्याकांड जैसी घटनाओं में हिंदू परिवार के साथ खड़े होने के बजाय लोग मानव-श्रृंखला बनाकर मुस्लिम आरोपितों को बचाने लगते, तो शायद आरफा के लिए सेकुलरिज्म का अर्थ सच में सार्थक हो जाता। हालाँकि अफसोस, पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश हिंदुओं ने ‘मोहम्मद दीपक’ जैसी हरकतें करना छोड़ दिया है। इसलिए अब आरफा को हर समय देश का लोकतंत्र और सेकुलरिज्म खतरे में दिखाई देता है।

आरफा जैसों की स्ट्रैटेजी

दिलचस्प बात यह है कि भारत में रहकर भारत की सभ्यागत पहचान को नकारने की हिम्मत भी आरफा जैसे लोगों को सिर्फ भारत में ही मिलती है। वरना किसी देश की संस्कृति को नकारने या उससे छेड़छाड़ करने पर कोई कट्टर देश क्या करता होगा, इसका उदाहरण चीन है। वहाँ उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैंपों में इसलिए रखा जाता है, क्योंकि सरकार को लगता है कि वे उसकी सभ्यता के लिए खतरा हैं।

आज स्थिति यह बन गई है कि भारत में कई बार हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व व्यक्त करने या अपनी धार्मिक परंपराओं को निभाने पर भी आलोचना का सामना करना पड़ता है। तुरंत उन पर ‘बहुसंख्यकवाद’ या ‘कट्टरवाद’ का आरोप लगा दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, आरफा खानम शेरवानी जैसे लोग खुले मंचों पर मुस्लिम समाज को स्ट्रैटेजी बदलने की सीख देते हैं, उन्हें समझाती हैं कि कैसे इस्लामिक सोसायटी बनने तक उन्हें मुस्लिम बनकर प्रोटेस्ट नहीं करना है… इसके बावजूद उन्हें लेफ्ट लिबरल वर्ग में निष्पक्ष पत्रकार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है है।

हालाँकि, अब ये पैटर्न आगे नहीं बढ़ने वाला, न आरफा जैसों की पुरानी रणनीति काम आने वाली है। अबब हिंदू जान रहे हैं कि भारत का इतिहास क्या है। हिंदू जान रहे हैं कि देश को हिंदू राष्ट्र कहकर वो इतिहास नहीं बदल रहे।