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ईरान का वो न्यूक्लियर ठिकाना, जहाँ बंकर बस्टर बमों का पहुँचना भी मुश्किल: जानें- ‘पिकैक्स माउंटेन’ क्यों बनती जा रही युद्ध की दिशा तय करने वाली जगह

ईरान और इजरायल-अमेरिका संघर्ष का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। एक-दूसरे पर जमकर मिसाइलें दागी जा रही हैं। हजारों लोगों की मौत हो गई और मिडिल ईस्ट के कई अन्य देश इससे प्रभावित हैं। एक ओर इजरायल और अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को स्थायी रूप से खत्म करने की कोशिश में जुटे हैं तो वहीं दूसरी ओर ईरान अपने परमाणु संसाधनों और तकनीक को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें पहले से कहीं अधिक गहराई में छिपाने की रणनीति अपना रहा है।

इसी रणनीति के केंद्र में एक रहस्यमयी जगह है जिसे खुफिया एजेंसियाँ ‘पिकैक्स माउंटेन’ के नाम से पहचानती हैं। यह स्थान अब इस युद्ध की सबसे बड़ी पहेली बन चुका है क्योंकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि इस ठिकाने को पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया तो ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म करना लगभग असंभव होगा।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगी अमेरिकी नजर

अमेरिका पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि युद्ध के दौरान उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता खत्म करना है। इसी उद्देश्य से अमेरिका और इजरायल पिछले कुछ समय से ईरान के कई परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते रहे हैं।

पिछले साल जून में अमेरिका ने ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर‘ के तहत ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों ‘फोर्डो, नतान्ज और इस्फहान’ पर शक्तिशाली बमों से हमला किया था। उस समय अमेरिका और इजरायल ने दावा किया था कि इन हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भारी क्षति पहुँची है।

हालाँकि, बाद में सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों और खुफिया रिपोर्टों ने यह संकेत दिया कि ईरान ने अपने परमाणु ढाँचे को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया बल्कि इन हमलों के बाद उसने अपने कई संवेदनशील कार्यक्रमों को पहले से अधिक गहराई में ट्रांसफर करना शुरू कर दिया था।

‘पिकैक्स माउंटेन’ का रहस्य

अमेरिका के ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करने के सपने और परमाणु बम के बीच ‘पिकैक्स माउंटेन’ खड़ा है। यह स्थान ईरान के नतान्ज परमाणु केंद्र के पास जाग्रोस पर्वतमाला में स्थित है और स्थानीय तौर पर इसे ‘कुह-ए कोलांग गाज ला’ के नाम से भी जाना जाता है।

एक्सपर्ट का अनुमान है कि यह सुविधा पहाड़ के भीतर लगभग 330 फीट यानी करीब 100 मीटर की गहराई में बनाई गई है। यह गहराई ईरान के प्रसिद्ध फोर्डो यूरेनियम संवर्धन संयंत्र से भी अधिक बताई जा रही है। यही वजह है कि सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि इस ठिकाने को हवाई हमलों से नष्ट करना बेहद कठिन हो सकता है। यानी यह एक ऐसा ठिकाना है जिसे बंकर बस्टर बम से भी नष्ट करना मुश्किल है।

सैटेलाइट तस्वीरों में इस स्थान पर भारी निर्माण गतिविधियाँ दिखाई दी हैं। पहाड़ के भीतर जाने वाले 2 सुरंगों के दरवाजों को मिट्टी और पत्थरों से और मजबूत किया गया है। इसके अलावा वहाँ खुदाई से निकले मलबे के बड़े ढेर और भारी मशीनरी भी देखी गई है जो इस बात का संकेत देती है कि अंदर अभी भी निर्माण और विस्तार का काम जारी है।

फरवरी 2026 की पिकैक्स माउंटेन की सैटेलाइट तस्वीर

ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम का सवाल

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार ईरान के पास अभी भी 60% तक संवर्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम का एक बड़ा भंडार मौजूद है। यह मात्रा लगभग 900 पाउंड बताई जाती है। परमाणु विशेषज्ञों के मुताबिक, इतनी मात्रा में उच्च स्तर तक एनरिच्ड यूरेनियम को यदि और आगे रिफाइन किया जाए तो इससे कई परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। बताया जाता है कि इतनी मात्रा करीब 11 बम बनाने के लिए पर्याप्त है।

यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को चिंता है कि यह सामग्री यदि पूरी तरह सुरक्षित और छिपी रही तो भविष्य में ईरान अपेक्षाकृत कम समय में परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर सकता है।

खुफिया रिपोर्टों में यह आशंका जताई गई है कि ईरान ने इस यूरेनियम का कुछ हिस्सा फोर्डो संयंत्र और इस्फहान के परमाणु परिसर के बीच विभिन्न अलग-अलग जगहों पर रख दिया था। वहीं, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बीच यूरेनियम का बड़ा हिस्सा ‘पिकैक्स माउंटेन’ में छिपाया जा रहा है।

‘पिकैक्स माउंटेन’: यूरेनियम संवर्धन से आगे की सोच

अमेरिकी थिंक टैंक ‘फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज’ के विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान नतान्ज के पास एक नया यूरेनियम संवर्धन संयंत्र तैयार करने की कोशिश कर रहा है। यदि ऐसा हुआ तो यह संयंत्र ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लंबे समय तक जीवित रखने में मदद कर सकता है।

कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि पिकैक्स माउंटेन केवल यूरेनियम संवर्धन के लिए ही नहीं बल्कि सेंट्रीफ्यूज मशीनों के निर्माण के लिए भी इस्तेमाल हो सकता है। सेंट्रीफ्यूज वे मशीनें होती हैं जिनकी मदद से यूरेनियम को हाई लेवल तक संवर्धित किया जाता है। यदि ईरान इन मशीनों का उत्पादन सुरक्षित स्थान पर जारी रखता है तो किसी भी हमले के बाद वह अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू कर सकता है।

ईरान की आधिकारिक प्रतिक्रिया

ईरान की सरकार लगातार यह कहती रही है कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार, ‘पिकैक्स माउंटेन’ में कोई परमाणु हथियार कार्यक्रम नहीं चल रहा है। उनका कहना है कि यह स्थान सेंट्रीफ्यूज प्रोडक्शन प्लांट के रूप में विकसित किया जा रहा है।

कुछ समय पहले जब इस स्थान के बारे में सवाल उठाए गए तो ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी ने भी इस पर ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने इतना जरूर कहा कि ईरान ने अपने किसी भी परमाणु स्थल को पूरी तरह बंद नहीं किया है और भविष्य में वे जारी भी रह सकते हैं या बंद भी किए जा सकते हैं।

ईरान में जमीनी कार्रवाई करेगा अमेरिका

सैन्य विशेषज्ञों के बीच एक बड़ी बहस इस बात को लेकर चल रही है कि यदि यह फैसिलिटी वास्तव में इतनी गहराई में है तो इसे खत्म करने के लिए केवल हवाई हमले पर्याप्त नहीं होंगे। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के गहरे भूमिगत बंकरों को पूरी तरह निष्क्रिय करने के लिए जमीनी सैनिकों की कार्रवाई जरूरी हो सकती है।

इसका मतलब यह होगा कि यदि अमेरिका या उसके सहयोगी देश ‘पिकैक्स माउंटेन’ को पूरी तरह निष्क्रिय करना चाहते हैं तो उन्हें ईरान की जमीन पर विशेष बलों को भेजना पड़ सकता है। हालाँकि, यह विकल्प बेहद खतरनाक होगा क्योंकि इससे युद्ध का दायरा और अधिक बढ़ सकता है।

युद्ध की दिशा तय करने वाला ठिकाना

अभी तक ‘पिकैक्स माउंटेन’ सिर्फ एक गुप्त भूमिगत ठिकाना माना जा रहा था लेकिन अब इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे सुरक्षित ठिकाना समझा जा रहा है। माना जा रहा है कि ईरान ने यहाँ अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी महत्वपूर्ण चीजें और संवर्धित यूरेनियम छिपाकर रखा है।

अगर यह ठिकाना सुरक्षित रहता है और ईरान यहाँ से अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाता रहता है तो अमेरिका और इजरायल के लिए अपना मुख्य लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। वहीं, अगर किसी तरह इस ठिकाने को नष्ट या बंद कर दिया जाता है तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बहुत बड़ा झटका लग सकता है और उसकी परमाणु क्षमता कई साल पीछे चली जाएगी।

यही कारण है कि ‘पिकैक्स माउंटेन’ अब सिर्फ एक पहाड़ी ठिकाना नहीं बल्कि इस पूरे युद्ध का ऐसा केंद्र बन गया है जिस पर आने वाले समय में बड़े फैसले और रणनीतियां निर्भर कर सकती हैं।

लखनऊ के इमामबाड़े में महिलाओं को सिर ढकने के लिए किया जा रहा मजबूर, मौलाना बोले- बिना हिजाब के रोकेंगे एंट्री: विरोध में उतरे महिला संगठन

लखनऊ के मशहूर इमामबाड़े में अब महिलाएँ बगैर सिर ढके नहीं जा पाएँगी। इमामबाड़ा प्रशासन के इस ड्रेस कोड का विरोध हो रहा है। महिलाओं का कहना है कि मस्जिद में जाने वक्त तो समझ में आता है कि सिर ढक कर जाना चाहिए, लेकिन इमामबाड़ा में मस्जिद के बाहर सैर करने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। ऐसे आदेश से उनका आना कम हो जाएगा। फिर ये ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ का भी उल्लंघन है।

शिया समुदाय की माँग को मान गया इमामबाड़ा प्रशासन

लखनऊ के ऐतिहासिक इमामबाड़े में एंट्री के वक्त महिलाओं को सिर ढक कर जाना होगा, वरना प्रवेश नहीं दिया जाएगा। इमामबाड़ा प्रशासन ने शिया समुदाय के माँग को मान लिया है।

शिया समुदाय ने कई सालों से इसकी माँग कर रहा था। हुसैनी टाइगर्स के कार्यकर्ताओं की माँग पर हुसैनबाद ट्रस्ट के सचिव एडीएम पश्चिम एचपी शाही ने मंजूरी दे दी। एसडीएम का कहना है कि बड़ा इमामबाड़ा शिया समुदाय का धार्मिक स्थल है, इसलिए समुदाय की माँग के मुताबिक महिलाओं के लिए सिर ढकना अनिवार्य कर दिया गया है।

अब जो पर्यटक यहाँ घूमने आएँगे उन्हें दुपट्टा उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए टिकट काउंटर के साथ ही दुपट्टा देने के लिए भी काउंटर बनेगा।प्रवेश के वक्त ही सिर ढकने के लिए कहा जाएगा। जो महिला सिर नहीं ढकेगी, उसे प्रवेश नहीं दिया जाएगा।

इमामबाड़ा प्रशासन के फैसले पर शिया मौलाना कल्बे जव्वाद ने सही कदम करार दिया है। उनका कहना है कि हर धार्मिक स्थल के कानून होते हैं। बिना हिजाब में जाने से रोकने का हमें पूरा हक है। इमामबाड़ा धार्मिक जगह है, वहाँ बिना सिर ढके एंट्री नहीं मिलेगी।

महिलाओं को अंदर जाने से रोका जा रहा है

इमामबाड़ा में मस्जिद के अलावा भी पर्याप्त जगह है जहाँ घूमने हर धर्म-संप्रदाय के लोग जाते हैं। ऐसे में इमामबाड़ा में एक हिन्दू लड़की को प्रवेश करने से रोका गया। लड़की का दावा है कि उसे सिर ढकने के लिए कहा गया। उसे इमामबाड़े में हिजाब पहन कर आने को कहा गया।

इतना ही नहीं इमामबाड़ा घूमने के लिए गई हिन्दू लड़कियों को ‘डेथ टू अमेरिका एंड इजरायल’ लिखी जगह पर लात मारने के लिए कहा गया।

पर्यटकों पर थोपा जा रहा आदेश

कई महिला संगठनों ने इमामबाड़ा प्रशासन और हुसैनाबाद ट्र्स्ट के फैसले पर ऐतराज जताया है। इनका कहना है कि इमामबाड़ा सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं पर्यटन स्थल भी है। यहाँ मस्जिद के अलावा भी देखने के लिए बहुत कुछ है। पर्यटक इसलिए यहाँ आते हैं। ऐसे में सभी पर अपना रीति-रिवाज नहीं थोप सकते।

आली संस्था की रेनू मिश्रा ने कहा कि राज्य सरकार या हाई कोर्ट को पहल कर इस पर रोक लगानी चाहिए। इस तरह के फैसले महिलाओं को मध्यकालीन युग में ले जाते हैं। भारत का संविधान भी उनको इस बात की इजाजत नहीं देता है।

बज्में ख्वातीन संस्था की शहनाज सिदरत का कहना है कि इस्लाम में कहा गया है कि किसी के ऊपर कोई आदेश नहीं थोपा जा सकता। जो पर्यटक घूमने आते हैं, उन्हें गेट पर ही सिर ढकने के लिए मजबूर करना सही नहीं है। अगर कोई नहीं ढकना चाहता, तो उसकी एंट्री बैन करना गलत है।

महिलाओं का मानना है कि यहाँ दीवारों पर लोग लिख कर खराब करते हैं, उन्हें तो कोई नहीं रोकता। हर जगह गंदगी फैलाने वालों पर तो कोई एक्शन नहीं लेता। पर्यटक जो यहाँ आते हैं, उनमें से बड़ी संख्या गैर मुस्लिम होती है। उन्हें सिर ढकने के लिए मजबूर करना तानाशाही रवैया है। महिलाओं ने यह भी पूछा है कि आखिर महिलाएँ ही सिर ढक कर क्यों जाएँ?

क्या इंडिया टुडे कॉन्कलेव में लॉरा लूमर और राजदीप सरदेसाई की ‘जुबानी जंग’ एक सुनियोजित तमाशा थी?

इंडिया टुडे ग्रुप ने इस हफ्ते ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची में एक नाम ऐसा था जिसने तुरंत विवाद खड़ा कर दिया। यह नाम था लॉरा लूमर। एक अमेरिकी कमेंटेटर, जो डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक दायरे और MAGA इकोसिस्टम से जुड़ी मानी जाती हैं। लूमर ने भड़काऊ बयानबाजी और उकसावे के कारण अपनी पहचान बनाई है।

हालाँकि, इस कार्यक्रम में उनका नाम आने पर जो विवाद हुआ, वह सिर्फ उनकी राजनीति की वजह से नहीं था। असली वजह उनकी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के बारे में नस्लभेदी अपमानजनक टिप्पणियाँ करने को लेकर है। इसी कारण उनके आमंत्रण को लेकर काफी आलोचना और बहस शुरू हो गई।

जब लूमर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करके खुद बताया कि वह कॉन्कलेव में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रही हैं, तो भारतीयों ने तुरंत उनके पुराने पोस्ट ढूँढने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया पर उनके पुराने पोस्ट के स्क्रीन शॉट तेजी से वायरल होने लगे। उन पोस्ट में लूमर ने भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इवेडर्स’ कहा था, भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाया था और भारतीयों की बौद्धिक क्षमता पर भी सवाल उठाए थे।

एक और विवादित मामले में लूमर ने भारतीय-अमेरिकी टेक्नोलॉजिस्ट श्रीराम कृष्णन पर तीखा हमला किया था, जब उन्हें व्हाइट हाउस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए सीनियर पॉलिसी एडवाइजर बनाया गया था। लूमर ने सवाल उठाया था कि अमेरिका में प्रभावशाली पदों पर प्रवासियों को क्यों रखा जाना चाहिए।

लूमर ने पहले भी कमला हैरिस की भारतीय पृष्ठभूमि का मजाक उड़ा चुकी हैं और ‘करी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए टिप्पणी की थी, जिससे काफी गुस्सा और आलोचना हुई थी। भारत विरोधी बयानों के अलावा लूमर पहले भी कई विवादों में रह चुकी हैं।

उन्होंने 11 सितंबर के हमलों को लेकर साजिश से जुड़ी बातें फैलाने की कोशिश की थी और कोविड-19 महामारी के दौरान भी गलत जानकारी फैलाने के आरोप लगे थे। यहाँ तक कि रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने भी एक बार उन्हें ‘पागल साजिश थ्योरी फैलाने वाली’ कहकर खारिज कर दिया था।

लॉरा लूमर की इस पृष्ठभूमि को देखते हुए सोशल मीडिया पर तुरंत एक सवाल उठने लगा। सवाल यह था कि एक बड़ा भारतीय मीडिया मंच ऐसे व्यक्ति को क्यों आमंत्रित करेगा, जिसने बार-बार भारत और भारतीयों का अपमान किया हो?

इस पर लोगों की नाराजगी बहुत तेजी से सामने आई। सोशल मीडिया यूजर्स ने लूमर के पुराने पोस्ट के स्क्रीनशॉट फिर से शेयर करने शुरू कर दिए। इन पोस्ट में वह भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाती नजर आई थीं, भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इनवेडर्स’ कहती थीं और भारतीय प्रवासियों को ‘हाई-स्किल्ड वर्कर्स’ बताने का भी मजाक बनाती थीं, जबकि भारत में बुनियादी ढाँचे की कमी होने की बात कहती थीं।

आलोचकों ने इस निमंत्रण को हैरान करने वाला और नुकसान पहुँचाने वाला कदम बताया। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति का भारत विरोधी बयानों का रिकॉर्ड रहा है, उसे इतना बड़ा मंच देना गलत है। इससे ऐसे नफरत भरे विचारों को मान्यता मिलने का खतरा पैदा होता है, जिनका विरोध करने की बात भारतीय मीडिया संस्थान अक्सर करते हैं।

लेकिन इसके बाद एक नया मोड़ आया। कॉन्क्लेव के सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लूमर से उनके पुराने बयानों को लेकर सीधा सवाल किया। उन्होंने लूमर के कई विवादित ट्वीट्स का जिक्र किया और पूछा कि क्या उन्हें उन पर पछतावा है। राजदीप ने लूमर से कहा, “आपके बयान खुलकर नस्लभेदी और इस्लामोफोबिक हैं।”

इस पर लूमर ने जवाब देते हुए माना कि उनके कुछ पुराने पोस्ट सच में हद पार कर गए थे। लूमर ने कहा, “दूसरे ट्वीट्स में मैंने जो कुछ बातें लिखी थीं, उनमें से कुछ मुझे नहीं कहना चाहिए थीं।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके बयानों से भारतीयों की भावनाएँ आहत हुई हैं तो वह इसके लिए माफी माँगती हैं। लूमर ने एक और चौंकाने वाली बात कही कि भारतीयों को लेकर उनके कुछ ट्वीट्स ‘एक्स’ ने खुद की हटा दिए थे और उनके पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

साथ ही कुछ मुद्दों पर उन्होंने अपनी बात पर कायम रहने की कोशिश भी की। लूमर ने H-1B वीजा कार्यक्रम के विरोध के लिए माफी माँगने से इनकार कर दिया और कहा कि एक अमेरिकी एक्टिविस्ट के तौर पर उनका काम अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने अपनी बात को थोड़ा नरम करते हुए यह भी कहा कि उन्हें भारतीय का हिंदुओं से कोई नफरत नहीं है और वह कट्टर इस्लामी द्वारा हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी बोल चुकी हैं।

दोनों की यह बातचीत बहुत जल्द ही वायरल हो गई। सरदेसाई द्वारा लूमर से सवाल पूछने वाले वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गए। ऑनलाइन दुनिया के कई लोग, चाहे वे इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस के समर्थक हों या खुद को नॉन-लेफ्ट कहने वाले हों, इस पर को पत्रकारिता की जीत बताने लगे।

सरदेसाई को उस पत्रकार के रूप में सराहा गया जिसने ‘एक नस्लभेदी को उसकी जगह दिखाने का साहस किया।’ वहीं लूमर की आंशिक माफी को भी कहानी की जीत यानी नैरेटिव विक्ट्री के रूप में पेश किया गया।

कुछ और लोग भी थे जिन्होंने ऑनलाइन लूमर की भद्दी टिप्पणियों को लेकर उन्हें ‘कॉनफ्रंट’ के लिए राजदीप सरदेसाई को ‘धन्यवाद’ कहा। और बस यहीं से पूरी चर्चा का फोकस बदल गया।

शुरुआत में असली विवाद यह था कि लूमर को आखिर बुलाया ही क्यों गया। लेकिन कुछ ही घंटों में बातचीत इस बात पर आ गई कि मंच पर उनसे कितने प्रभावी तरीके से सवाल पूछे गए।

इंडिया टुडे द्वारा लौरा लूमर को सम्मेलन में आमंत्रित करने पर राजदीप सरदेसाई ने आक्रोश क्यों नहीं जताया?

इस पूरे मामले का एक और पहलू है जो और ज्यादा सवाल खड़े करता है और वह है खुद राजदीप सरदेसाई की भूमिका। अगर सरदेसाई सच में लूमर द्वारा भारत और भारतीयों के बारे में कही गई गंदी बातों से नाराज थे, तो उम्मीद की जाती कि यह नाराजगी कॉन्क्लेव में कैमरे चलने से पहले ही सामने आ जाती।

आखिरकार, सरदेसाई सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय पत्रकारों में से एक माने जाते हैं। ‘एक्स’ पर वह अक्सर ‘स्टोरीज दै कॉट माई आई’ नाम से एक लोकप्रिय थ्रेड चलाते हैं, जिसमें वे उन मुद्दों को सामने लाते हैं कि जिन्हें वे सार्वजनिक चर्चा के लायक मानते हैं। जब भी उन्हें लगता है कि कोई नेता, संस्था या सार्वजनिक व्यक्ति हद पार कर रहा है, तो वह उसकी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते।

इसी वजह से कॉन्क्लेव से पहले के दिनों में इस मुद्दे पर उनकी चुप्पी कई लोगों को हैरान करने वाली लगती है।

जब लूमर ने बताया कि वह इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा आयोजित कॉन्क्लेव में बोलने के लिए भारत आ रही हैं, तो तुरंत ही विरोध शुरू हो गया। भारतीयों का मजाक उड़ाने और अमेरिका में उनकी जगह पर सवाल उठाने वाले उनके पुराने ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे।

लेकिन उस समय सरदेसाई की ओर से कोई सार्वजनिक आपत्ति सामने नहीं आई.

यही वह समय था जब वह अपनी हैरानी या नाराजगी जाहिर कर सकते थे। नेटवर्क के एक वरिष्ठ संपादकीय चेहरे के तौर पर वह आसानी से ‘एक्स’ पर पोस्ट करके सवाल उठा सकते थे कि आखिर कोई मीडिया संस्था ऐसे व्यक्ति को क्यों बुला रही है जिसका रिकॉर्ड भारतीयों का अपमान करने का रहा है।

इसके बजाए, सरदेसाई कॉन्क्लेव में ही मंच पर पहुँचे और वहीं लूमर से उनके बयानों को लेकर सवाल किए। यह बातचीत लगभग एक ‘तैयार पैकेज’ की तरह सामने आई, जिसमें उनके आपत्तिजनक ट्वीट्स पर सवाल पूछे गए, लूमर ने माना कि उनमें से कुछ गलत थे और फिर लाइव दर्शकों के सामने उन्होंने आंशिक माफी भी दे दी।

यह पल जल्दी ही वायरल हो गया।

लेकिन बाद में जब इस पूरे क्रम को देखा जाए, तो यह कम अचानक और ज्यादा पहले से तय किया हुआ लगता है। पहले कोई सार्वजनिक आपत्ति न होना और फिर सही समय पर मंच पर सीधा सामना होना, यह संभावना भी पैदा करता है कि यह बातचीत पहले से ही कैमरों के सामने होने के लिए तय थी, न कि सार्वजनिक बहस की अनिश्चित स्थिति में।

यहीं से हम फिर बड़े सवाल पर लौटते हैं।

क्योंकि घटनाओं का यह कर्म लगभग एक सावधानी से लिखी गई ‘स्क्रिप्ट’ जैसा लगता है। पहले एक ऐसे विवादित व्यक्ति को बुलाना जिसके पुराने बयान आपत्तिजनक रहे हों, फिर जब वे बयान दोबारा सामने आएँ तो गुस्सा बढ़ने देना और उसके बाद कार्यक्रम के दौरान एक नाटकीय टकराव दिखाना।

इस टकराव से वायरल कंटेंट बनता है, मेहमान आंशिक माफी देता है और मेजबान नेटवर्क की छवि अचानक बदल जाती है। अब उसे उस मंच के रूप में नहीं देखा जाता जिसने विवादित आवाज को मंच दिया, बल्कि उस मंच के रूप में दिखाया जाता है जिसने उससे जवाब माँगा।

यहीं से पूरी कहानी बदल जाती है।

‘इंडिया टुडे ने भारत विरोधी नस्लवादी टिप्पणीकार को मंच दिया’ वाली कहानी को ‘देखिए इंडिया टुडे ने उसका सामना कैसे किया’ में कैसे बदल दिया गया?

‘इंडिया टुडे ने ऐसे व्यक्ति को क्यों बुलाया जिसने बार-बार भारतीयों का अपमान किया?’ इस सवाल की जगह कहानी बदलकर ‘देखिए इंडिया टुडे ने उनसे कैसे सवाल किए’ बन जाती है।

असल में पूरे विवाद को एक तरह के दृश्य और तमाशे के जरिए शांत कर दिया जाता है।

इसी वजह से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पूरा मामला, निमंत्रण से लेकर मंच पर टकराव और फिर माफी तक, एक तरह का नैरेटिव डैमेज कंट्रोल था या शायद नैरेटिव लॉन्ड्रिंग भी।

आखिरकार, नतीजा ऐसा दिखाई देता है जिससे इस पूरे मामले में शामिल लगभाग हर पक्ष को फायदा मिलता नजर आता है।

लूमर इस पूरे मामले के बाद ऐसी स्थिति में बाहर आईं जहाँ उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने कुछ बयानों को थोड़ा नरम किया और भारत के प्रति कम विरोधी छवि दिखाने की कोशिश की। सरदेसाई को सोशल मीडिया पर उनसे सवाल करने के लिए खूब सराहना मिली। वहीं इंडिया टुडे ग्रुप भी बातचीत का फोकस उस असहज सवाल से हटाने में सफल रहा, जिससे शुरुआत में पूरा विवाद शुरू हुआ था।

वायरल वीडियो के इस दौर में जो चीज एक पत्रकार और एक विवादित कमेंटेटर के बीच अचानक हुई बहस जैसी दिख रही थी, वह शायद कुछ और भी हो सकती है। यह एक ऐसा सुविधाजनक नाटक भी हो सकता है जिसने छवि से जुड़े संकट को एक ऐसे पल में बदल दिया, जहाँ सब कुछ पहले से तय तरीके से जवाबदेही दिखाने जैसा लगे।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘ब्रेन वॉशिंग’ से लेकर अवैध धर्मांतरण से पैदा हुए बच्चों के धर्म के निर्धारण के नियम: जानिए क्या है महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026, जो लगाएगा ‘लव जिहाद’ पर लगाम

‘महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2026’ महाराष्ट्र विधानसभा में पेश हो चुका है। इसमें लालच, बहला-फुसला कर या झाँसा देकर अवैध तरीके से कराए गए धर्मांतरण को रोकने के लिए सख्ती बरती गई है। ऐसे मामले में 7 साल जेल और 1 लाख से 5 लाख तक जुर्माना का प्रावधान है।

धर्मांतरण से 60 दिन पहले सूचित करने को भी अनिवार्य कर दिया गया है। नाबालिग, महिला, एससी-एसटी और मानसिक रूप से अस्वस्थ्य व्यक्ति के केस में सजा का प्रावधान ज्यादा है। बार-बार ऐसा करने पर आरोपितों को 10 साल सजा दी जा सकती है।

विधेयक में बच्चों के धर्म निर्धारण के प्रावधान

धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 के मुताबिक, अगर किसी महिला की जबरदस्ती या झाँसे में लेकर शादी कर दी जाती है। ऐसी स्थिति में जो बच्चा पैदा होता है, तो उस बच्चे को माँ के मूल धर्म का माना जाएगा, यानी वह धर्म जो धर्मांतरण से पहले वह अपनाती थी। इस केस में बच्चे को माता-पिता की संपत्ति से भरण-पोषण पाने का अधिकार भी मिलेगा।

कानून में ‘ब्रेनवॉशिंग’ को अपराध माना गया है। बिल में ‘शिक्षा के माध्यम से ब्रेनवॉशिंग’ को अवैध धर्मांतरण का जरिया बताया गया है। इसमें एक धर्म को दूसरे से बेहतर बताना भी ‘लालच’ की श्रेणी में आएगा। साथ ही, किसी धर्म के रीति-रिवाजों को नकारात्मक तरीके से पेश करना ‘अवैध प्रभाव’ की श्रेणी में आएगा।

विधेयक में पुलिस को कार्रवाई की विशेष शक्ति दी गई है। पुलिस को अगर लगता है कि जबरन धर्मांतरण हुआ है या कानून का पालन नहीं किया गया है, तो बिना औपचारिक शिकायत के भी स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करने कर सकती है।

खास बात है कि विधेयक में ‘प्रलोभन’ का दायरा बढ़ा दिया गया है। शिक्षा के अलावा, पैसा देकर या गिफ्ट देकर, रोजगार की सुविधा मुहैया कराकर या फिर धार्मिक संस्थानों द्वारा मुफ्त शिक्षा देकर धर्मांतरण करना ‘लालच’ की श्रेणी में ही आएगा। किसी गरीब को शादी का वादा कर या दैवी उपचार का झाँसा देकर धर्मांतरण करना भी इस कानून के तहत अपराध है।

विधेयक में संस्थाओं पर कार्रवाई का भी प्रावधान है। यदि कोई संस्था या संगठन इसमें शामिल पाया जाता है, तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है और जिम्मेदार लोगों को 7 साल तक की जेल हो सकती है।

धर्म बदलने से 60 दिन पहले जानकारी देना जरूरी

विधेयक में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को लिखित सूचना देनी होगी। इसमें व्यक्ति का नाम, उम्र, किस धर्म में है, किसे ज्वाइंन करना है- जैसी जानकारी देनी होगी।

इसके बाद स्थानीय जिला प्रशासन इसकी जाँच करेगा कि वह व्यक्ति किसी दबाव में या लालच में धर्मांतरण तो नहीं कर रहा। सारी जाँच के बाद ही उसे धर्मांतरण की अनुमति दी जाएगी। शादी के 25 दिन के अंदर इसका पंजीकरण करना भी जरूरी होगा, वरना इसे मान्यता नहीं दी जाएगी।

अगर कोई कानून का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। धर्म परिवर्तन के नियमों का पालन अगर नहीं किया जाता है, तो धर्मांतरण को अवैध घोषइक किया जाएगा। उसे जेल और जुर्माना या दोनों सजा का सामना करना पड़ सकता है। उसे 7 साल जेल हो सकती है। एक लाख का जुर्माना लगाया जा सकता है। अगर मामला किसी महिला, नाबालिग,एससी, एसटी से जुड़ा होता है, तो 5 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

मास कन्वर्जन को लेकर सख्ती

दो या दो से अधिक लोगों के एक साथ धर्म परिवर्तन को मास कन्वर्जन माना जाएगा। ऐसे मामलों में आयोजकों और धर्मांतरण से जुड़े लोगों को सख्त सजा देने का प्रावधान है। दोबारा ऐसा ही होता है तो उस व्यक्ति को 7 लाख रुपए तक जुर्माना देने पड़ सकता है।

धर्म परिवर्तन की शिकायत पीड़ित, उसके भाई-बहन, माता-पिता और दूसरे रिश्तेदार भी कर सकते हैं। पुलिस ऐसे मामलों को दर्ज करने में कोताही नहीं बरत सकती। कई बार जबरन धर्मांतरण के शिकार लोगों के पुनर्वास और रहने-खाने की व्यवस्था भी सरकार कर सकती है।

किन-किन राज्यों में लागू है धर्मांतरण कानून

पिछले 8 सालों में बीजेपी शासित कई सरकारों ने इस तरह के धर्मांतऱण को रोकने के लिए कानून बनाए हैं, ताकि किसी व्यक्ति को, खासकर महिलाओं को आसानी से अवैध तरीके से धर्मांतरण नहीं कराया जा सके। इन कानूनों का मकसद लव जिहाद से हिंदू लड़कियों और महिलाओं को छुटकारा दिलाना है। उन्हें जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन कराने और शादी कराने से रोकना है।

2017 से 9 राज्यों ने अवैध धर्म-परिवर्तन को रोकने काननू बनाए गए। इनमें 2017 में झारखंड, 2018 में उत्तराखंड , 2019 में हिमाचल प्रदेश, 2020 में उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में 2021 में कानून बनाया गया। हरियाणा और कर्नाटक में 2022 जबकि राजस्थान में 2025 में कानून बना।

इन सभी कानूनों का घोषित मकसद जोर-जबरदस्ती, धोखाधड़ी और लालच देकर योजनाबद्ध तरीके से धर्म-परिवर्तन कराने पर लगाम लगाना है। इन सभी जगहों पर धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से इजाजत लेना जरूरी है। गैर-कानूनी धर्म-परिवर्तन के मामले में आपराधिक मुकदमों में सबूत देने की जिम्मेदारी आरोपित पर होती है।

दरअसल ये कानून देश में हो रहे सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण, लव जिहाद, लैंड जिहाद से लोगों को बचाने के लिए जरूरी है। लड़कियों को प्रेम जाल में फँसा कर आए दिन धर्म परिवर्तन कराने की घटनाएँ सामने आ रही हैं।

महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने किया विरोध

हालाँकि महाराष्ट्र की 35 सिविल सोसाइटी ने महाराष्ट्र सरकार के प्रस्तावित धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध किया और इसे महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया। इनलोगों ने सरकार से कानून वापस लेने का आग्रह किया है। इसे साधारण भाषा में ‘लव जिहाद’ कानून कहा जा रहा है।

इन संगठनों को खास कर जिन बिन्दुओं पर आपत्ति हैं उनमें धर्मांतरण से पहले स्थानीय प्रशासन से अनुमति लेना, धर्म परिवर्तन से कम से कम 60 दिन पहले सूचना देना और धर्मांतरण के बाद 25 दिनों के भीतर पंजीकरण कराना शामिल है। ऐसा न करने पर धर्मांतरण को अमान्य घोषित किया जा सकता है।

संगठनों को उन प्रावधानों पर भी आपत्ति है, जिसमें रिश्तेदारों को जबरदस्ती का आरोप लगाते हुए आपराधिक शिकायतें दर्ज करने की अनुमति दी गई है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की वकील लारा जेसानी का मानना है कि इस कानून को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और महिलाओं को अपनी पंसद के साथी से शादी करने या अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करने से रोकने के लिए किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम पुरुषों से शादी करने वाली हिंदू महिलाओं को असमान रूप से निशाना बनाया जाएगा।

ऐसे मामले जिसमें लड़कियाँ अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करती हैं और शादी करती है, उन्हें 60 दिन पहले बताने में क्या दिक्कत है। उन्हें 25 दिन के अंदर पंजीकरण कराने से भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

दिक्कत तो नाम बदल कर लड़की को प्रेम जाल में फँसा कर अवैध संबंध बनाने में है, क्योंकि इसका मकसद सिर्फ लड़की को प्यार से या दबाव डालकर धर्मांतरण के लिए मजबूर करना है। उससे निकाह कर प्रताड़ित करना है।

ऐसे मामलों में धर्मांतरण और निकाह एक हथियार की तरह इस्तेमाल होते हैं, ताकि लड़की को काबू में रखा जा सके। उसका शोषण किया जा सके। अपने परिजनों की इच्छा के विरुद्ध गई लड़की को सामाजिक मदद भी मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कहाँ गया उसका व्यक्तिगत अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, जो संविधान के मूलभूत अधिकारों में शामिल हैं और उसे भी मिले हुए हैं।

आत्मरक्षा के लिए उठाई आवाज तो UK में सिख रेस्टोरेंट मालिक गिरफ्तार, इस्लामी और खालिस्तानी कट्टरपंथी बना चुके हैं निशाना: जानें- कौन हैं हरमन सिंह

ब्रिटेन के लंदन में एक सिख समुदाय के रेस्टोरेंट मालिक हरमन सिंह कपूर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, हरमन सिंह ने अपने रेस्टोरेंट में हलाल मीट बेचने से इनकार किया था। इसके बाद हरमन और उनके परिवार को पाकिस्तानियों की तरफ से जान से मारने की धमकी मिलने लगी। इसे देखते हुए हरमन ने रेस्टोरेंट बंद करने का फैसला लिया था।

हरमन सिंह की गिरफ्तारी की वीडियो भी सामने आई है, जिसमें पुलिस उन्हें उनके ही रेस्टोरेंट से गिरफ्तार कर ले जा रही है। हरमन सिंह ने भी ‘एक्स’ पर एक ट्वीट का जवाब देते हुए अपनी गिरफ्तारी की पुष्टि की। उन्होंने लिखा, “मैंने तो बस अपने परिवार की रक्षा की, फिर भी मुझे ही गिरफ्तार कर लिया गया। हमारी सुरक्षा करने के बजाए पुलिस ने मेरे धर्म को निशाना बनाया। मेरे सिख होने और मेरी आस्था को लेकर मुझे टारगेट किया गया। यह बहुत चिंता की बात है।”

हरमन सिंह को पाकिस्तानियों ने दी धमकी

दरअसल, हरमन सिंह ब्रिटेन के लंदन में 16 साल से ‘रंगरेज रेस्टोरेंट एंड बार’ नाम से रेस्टोरेंट चलाते हैं। रेस्टोरेंट में हरमन सिंह हलाल मीट नहीं बेचते और इसको लेकर गेट पर साइनबोर्ड भी लगाया गया है। वे कहते हैं, “मुझे गर्व है कि मैं हलाल खाना नहीं बेचता। इसी वजह से कुछ लोग नाराज हैं और मेरे रेस्टोरेंट के बार में झूठे रिव्यू डाल रहे हैं। रंगरेज रेस्टोरेंट ऐसे लोगों को खुश करने के लिए जानवरों पर होने वाली क्रूरता का समर्थन नहीं करेगा।”

उन्होंने एक वीडियो भी शेयर किया, जिसमें हथियारबंद कुछ लोगों ने हरमन सिंह के रेस्टोरेंट पर धावा बोल दिया। हरमन सिंह ने दावा किया कि इन मुस्लिम लोगों ने रेस्टोरेंट में हलाल मीट न बेचने का विरोध किया और रेस्टोरेंट के बाहर उत्पात मचाया। इन लोगों ने जबरन रेस्टोरेंट के भीतर घुसने की कोशिश की और गेट ब्लॉक कर नारेबाजी भी की। वीडियो में मौके पर पुलिस भी नजर आ रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हरमन सिंह के रेस्टोरेंट पर हमला करने वाले पाकिस्तानी हैं। कुछ ट्वीट्स में दावा किया गया कि हरमन सिंह और उनके परिवार को लगातार जान से मारने की धमकी मिल रही है। यहाँ तक कि बच्चों उत्पात मचाने वाले लोगों ने हरमन सिंह के बच्चों का वीडियो भी बनाया और रेप की धमकी तक दी।

हरमन सिंह ने आत्मरक्षा के लिए उठाई तलवार

इस मामले को लेकर हरमन सिंह ‘एक्स’ पर लगातार एक्टिव हैं। हरमन ने खुद को मिल रही धमकियों के खिलाफ आत्मरक्षा की ठानी। उन्होंने एक वीडियो भी रिलीज किया, जिसमें हथियार उठाने की बात कही। वहीं हरमन सिंह ने आरोप भी लगाया कि इस मामले में पुलिस उनकी कुछ सहायता नहीं कर रही है।

एक वीडियो पोस्ट करते हुए हरमन सिंह ने कहा, “सब जानते हैं कि मुझे हर दिन कुछ शांतिप्रिय समुदायों द्वारा गंभीर हमलों का सामना करना पड़ता है। पुलिस की मदद अब तक अपर्याप्त रही है। मुझे और मेरे परिवार को हर दिन मानसिक और शारीरिक रूप से धमकियाँ दी जाती हैं। इस वजह से मेरे पास हथियार उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं अपने परिवार की रक्षा खुद करूँगा। मुझे पुलिस पर भरोसा नहीं है। अगर कोई मुझसे भिड़ना चाहे, तो कृपया मरने के लिए तैयार रहें। मुझे अब डर नहीं लगता। कृपया मेरे परिवार के पास न आएँ।”

हरमन ने यह भी कहा, “मेरे धर्म में कहा जाता है: जब शांति बनाए रखने के सभी विकल्प खत्म हो जाते हैं, तब उसे लागू करने के लिए तलवार की आवश्यकता होती है।”

इससे पहले हरमन ने रेस्टोरेंट बंद करने का भी फैसला लिया था, लेकिन कुछ समय बाद इसे दोबारा खोला गया। इसके बाद ही हरमन सिंह की 14 मार्च 2026 को रेस्टोरेंग से ही गिरफ्तारी की गई।

खालिस्तानी और मुस्लिम विरोधी हैं हरमन सिंह कपूर

भारतीय मूल के हरमन सिंह कपूर सिख एक्टिविस्ट हैं, जो खालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ मुखर हैं। हाल के महीनों में वे और उनकी पत्नी खुशी कपूर मुस्लिमों के खिलाफ भी वोकल हो गए थे। यही वजह रही कि हाल कि दिनों में उनके रेस्टोरेंट को निशाना बनाया गया, खासकर हलाल मीट न बेचने को लेकर।

साल 2023 में हरमन सिंह ने दावा किया था कि खालिस्तानी मूवमेंट की आलोचना करने के बाद उनकी कार पर गोली चलाई गई और तोड़फोड़ की गई। उन्होंने खालिस्तानी आतंकवादी द्वारा कनाडा की नैंसी ग्रेवाल की हत्या पर भी काफी ट्वीट्स किए।

एक ट्वीट में हरमन सिंह ने लिखा, “खालिस्तान कोई राष्ट्र हीं, यह एक विचारधारा है, एक बेहद भ्रामक और मूर्खतापूर्ण विचारधारा। इसे जायज ठहराने के लिए कट्टरपंथी जाट हिंसा और धमकियों का सहारा लेते हैं। जो भी इन पर सवाल उठाने की हिम्मत करता है, वह निशाना बन जाता है(मुझ समेत)।” उन्होंने सभी पश्चिमी देशों से यह भी माँग की इन सभी कट्टर खालिस्तानियों को भारत वापस भेज दिया जाए।

रेस्टोरेंट बंद करने से ठीक पहले हरमन सिंह और उनकी पत्नी ने एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में लव जिहाद के मामलों के बारे में पैरेंट्स को चेतावनी दी थी। कपूर ने कहा था कि कई लड़कियों को पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लड़कों द्वारा ब्रेनवॉश किया जा रहा है और वे परिवार से संपर्क खो रही हैं और उन्होंने ऐसे में कई केसों की जाँच की थी।

इतना ही नहीं हरमन सिंह ने हाल ही में ईरान की इस्लामिक रिजीम के विरोध में भी ट्वीट किए। यहाँ तक कि ट्रंप के पाकिस्तान को दोस्त कहने पर भी वह नाराज हुए। वे अपने एक्स अकाउंट पर मुस्लिमों के अपराधों को लगातार दुनिया के सामने लाते रहे हैं। खासकर लंदन के मेयर सादिक खान को लेकर कई विरोधी ट्वीट्स भी हरमन सिंह ने किए हैं।

सिख संगठनों की चुप्पी

हरमन सिंह कपूर की गिरफ्तारी के मामले ने सिख समुदाय में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वे खुद को सिख बताते हैं और लंदन में अपने रेस्टोरेंट को पाकिस्तानी और खालिस्तानी हमलों से बचाने की कोशिश करते रहे, लेकिन अब पुलिस ने उन्हें ही हिरासत में ले लिया।

अब सवाल यह है कि क्या प्रमुख सिख संगठन जैसे SGPC या अकाल तख्त इस पर आवाज उठाएँगे। कपूर ने हमेशा खालिस्तानी उग्रवाद के खिलाफ बोला है, जिससे कुछ सिख गुट उनसे नाराज भी रहे। फिर भी, अगर यह गिरफ्तारी अन्यायपूर्ण साबित हुए तो समुदाय उनका साथ देगा या नहीं।

अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहींया है और यह चुप्पी सोचने पर मजबूर करती है। सिख संगठन अक्सर अपने लोगों के हक में खड़े होते हैं, खासकर विदेशों में हो रहे उत्पीड़न पर। लेकिन इस इतने बड़े विवादास्पद मुद्दे पर कोई बयान अब तक सामने नहीं आया है।

खार्ग द्वीप पर हमले से बौखलाया ईरान, कहा- अमेरिकी तेल और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को राख में बदल देंगे: यूएई-कतर-ईराक समेत कई US बेस पर किया हमला

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का रविवार (15 मार्च 2026) को 16वां दिन है। अमेरिकी हमला 15वें दिन ईरान के खार्ग द्वीप पर किया गया। इस पर हमला यूएई के अमेरिकी बेस से किया गया था। इसको देखते हुए ईरान ने यूएई को एक बार फिर धमकी दी है। उसने 3 बड़े एयरपोर्ट खाली करने को कहा है साथ ही रिहायशी इलाकों में हमले नहीं करने की बात भी कही है।

यूएस राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी हमलों ने खार्ग द्वीप का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया है.। उन्होंने आगे खार्ग द्वीप पर और भी हमले करने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि मनोरंजन के लिए भी इसे कुछ और बार निशाना बनाया जा सकता हैं। उनकी इस धमकी के बाद ईरान ने हमले तेज कर दिए हैं। ईरान ने यूएई, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जमकर मिसाइलों और ड्रोन हमला हुआ।

ईरानी हमलों के बीच अमेरिका ने ओमान में मौजूद अपने सरकारी कर्मचारियों को देश छोड़ने का आदेश दिया है। इसमें कहा गया है कि ऐसे कर्मचारी, जिनकी वहाँ इमरजेंसी ड्यूटी नहीं है, वे अपने परिवार के सदस्यों को लेकर ओमान से तुरंत निकल जाएँ।

रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के 90 से ज्यादा सैन्य ठिकानों पर हमला किया है। इन हमलों में एयर डिफेंस सिस्टम, नौसैनिक अड्डे और एयरपोर्ट शामिल हैं। लेकिन तेल के बुनियादी ढाँचे पर हमला नहीं किया गया है। खार्ग ट्वीप वह बंदरगाह है, जहाँ से ईरान का 70 फीसदी तेल का व्यापार होता है। इस पर कब्जा करने की रणनीति अमेरिका ने बनाई है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को आने जाने से रोकेगा, तो अब उसके तेल के बुनियादी ढाँचे पर भी हमला किया जाएगा। उन्होंने दूसरे देशों से भी युद्धपोत भेजकर होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आह्वान किया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने ये भी दावा किया है कि ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह नष्ट हो चुकी है, लेकिन ड्रोन हमलों का खतरा अब भी बना हुआ है।

वहीं, ईरान ने भी हिजबुल्लाह, हूती जैसे संगठनों के साथ मिलकर इजरायल और आसपास के देशों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दागीं। ईराक की राजधानी बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास पर दूसरी बार हमला किया। खाड़ी क्षेत्र में सऊदी अरब और कतर पर भी हमला किया गया। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ईरान का नया सुप्रीम लीडर मजतबा खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गया है। हालाँकि ईरान ने कहा है कि खामेनेई पूरी तरह ठीक हैं।

यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने तेहरान पर एयरस्ट्राइक किए थे। इन हमलों में कई ठिकानों को नुकसान पहुँचाया गया। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई समेत बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारी मारे गए थे। संयुक्त राष्ट्र ने इस जंग में नागरिक की मौत पर गहरी चिंता जताई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए यह युद्ध लंबा खिंच सकता है। प्रभावी कूटनीति और वैश्विक सहयोग से ही दोनों पक्षों को मनाया जा सकता है और युद्ध समाप्त कराया जा सकता है।

भदोही में दलित चौकीदार को पेट्रोल डालकर यादव दबंगों ने जिंदा जलाया, SC-ST एक्ट में जेल: अखिलेश यादव की चुप्पी पर सवाल, PDA के D के साथ कब होंगे खड़े?

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले (संत रविदास नगर) के ज्ञानपुर थाना क्षेत्र के पिपरगाँव गाँव में 9 मार्च 2026 की सुबह एक दलित को दबंगों ने पेट्रोल डालकर जिंदा जला दिया। जानकारी के मुताबिक, दलित चौकीदार जैसलाल सरोज को पेट्रोल डालकर जिंदा जलाने का आरोप ग्राम प्रधान रामनाथ यादव के पुत्र कमलेश यादव (30) पर है। ये विवाद एक हैंडपंप की मरम्मत को लेकर शुरू हुआ, जो पुरानी रंजिश में बदल गया। हालाँकि पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में हत्या की धाराओं के साथ SC-ST एक्ट भी लगा है।

ये मामला सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहा है, लेकिन पीडीए का राज अलापने वाले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनकी पार्टी की ओर से अब तक कोई बयान या संवेदना तक नहीं आई है। यही चुप्पी सपा की पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

क्या है पूरी वारदात, जिसमें चली गई गरीब चौकीदार की जान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ज्ञानपुर पुलिस स्टेशन से जुड़े चौकीदार जैसलाल सरोज गाँव के प्रधान के घर हैंडपंप पाइप की मरम्मत की माँग लेकर गए। वहाँ विवाद बढ़ा। पुलिस के अनुसार कमलेश यादव ने पेट्रोल की गैलन लाकर पीड़ित पर डाला और आग लगा दी। प्रधान की पत्नी चिंता देवी ने दावा किया कि पीड़ित खुद आग लगाकर भागे, लेकिन पीड़ित परिवार और गाँववासियों का आरोप साफ है।

एसपी अभिमन्यु मांगलिक और डीएम शैलेश कुमार ने मौके पर पहुँचकर परिवार को न्याय का आश्वासन दिया। आरोपित कमलेश को गिरफ्तार कर लिया गया। मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम के बाद मामले में हत्या की धाराएँ जोड़ी गईं। पुलिस जाँच जारी है और पुरानी रंजिश (पिछले साल दलित बस्ती-यादव बस्ती के झगड़े) को भी अहम मान रही है।

अखिलेश यादव और सपा की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

हालाँकि पीडीए का नारा लगाने वाली सपा पूरी तरह चुप है। अखिलेश यादव ने न तो ट्वीट किया, न प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, न ही किसी सपा नेता ने परिवार से मुलाकात की। जब दलित पीड़ित होता है और आरोपित यादव या मुस्लिम समुदाय से जुड़ा होता है तो सपा की आवाज क्यों गायब हो जाती है? यही सवाल पूरे उत्तर प्रदेश में उठ रहे हैं।

सपा की राजनीति पर नजर डालें तो पैटर्न साफ दिखता है। जब कोई दलित युवक ऊँची जाति या भाजपा कार्यकर्ता द्वारा पीटा जाता है, अखिलेश तुरंत ‘संविधान पर हमला’ और ‘पीडीए पर अत्याचार’ का राग अलापते हैं। अयोध्या में दलित महिला की मौत पर, आगरा हिंसा पर या सपा सांसद के घर पर हमले पर उन्होंने तुरंत बयान दिए। लेकिन भदोही जैसे मामलों में चुप्पी साथ ली जाती है। चूँकि यादव समुदाय सपा का वोट बैंक है। क्या यही वजह है कि दलित पीड़ित ‘दिखता’ ही नहीं?

पीडीए का डी क्या सिर्फ वोटबैंक है?

क्या पीडीए सिर्फ चुनावी नारा है या वाकई दलित उत्थान का एजेंडा? यह चुप्पी न सिर्फ दलित समाज को ठगा महसूस कराती है, बल्कि पूरे सामाजिक न्याय के दावे पर सवाल उठाती है।

सपा की यह दोहरी नीति समाज को बाँट रही है। उत्तर प्रदेश में दलित-यादव एकता का सपना दिखाकर वोट माँगने वाली पार्टी, जब अपनी जाति का आरोपित सामने आता है तो दलित पीड़ित को भूल जाती है। क्या यह सपा की तुष्टिकरण राजनीति का हिस्सा है? क्या अखिलेश यादव को याद नहीं कि वे खुद ‘समाजवादी’ कहलाते हैं? समाज को जगाने की जरूरत है। दलित अत्याचार पर चुप्पी किसी भी पार्टी की हो, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

यह घटना सिर्फ भदोही की नहीं, पूरे देश की है। अगर सपा सच में पीडीए की बात करती है तो अखिलेश यादव को तुरंत बयान देना चाहिए, परिवार से मिलना चाहिए और न्याय की माँग करनी चाहिए। चुप्पी से सवाल और बढ़ेंगे। क्या यादव-दलित एकता सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या सपा अब दलितों को सिर्फ वोट बैंक मानती है? समय आ गया है कि समाज इस दोहरे मापदंड पर बहस करे। खून किसी भी जाति का हो, अपराधी को सजा मिलनी चाहिए और राजनीतिक चुप्पी टूटनी चाहिए। अन्यथा सामाजिक न्याय का नारा सिर्फ चुनावी जुमला साबित होगा।

इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है, लेकिन राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। दलितों की आवाज दबाने वाली चुप्पी समाज को कमजोर करती है। अब बहस शुरू होनी चाहिए कि क्या पीडीए में से डी वाला हिस्सा सपा के सिर्फ दलितों को ठगने के लिए हैं?

लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन विधेयक 2026 पेश, सेल्फ-आईडेंटिटी का प्रावधान खत्म: जानिए क्या-क्या बदलाव हुए

भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी पहचान से जुड़े कानून में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक नया कदम उठाया है। शुक्रवार (13 मार्च 2026) को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ वीरेंद्र कुमार ने लोकसभा में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया।

यह विधेयक पहले से लागू ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 यानी ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 2019 में कई अहम बदलाव प्रस्तावित करता है।

सरकार का कहना है कि 2019 के कानून को लागू करते समय यह महसूस किया गया कि ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति‘ की परिभाषा बहुत व्यापक और अस्पष्ट है, जिसके कारण यह तय करना मुश्किल हो रहा था कि वास्तव में किन लोगों को इस कानून के तहत मिलने वाले संरक्षण और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए।

इसी वजह से नया संशोधन विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की अधिक स्पष्ट परिभाषा तय करने, पहचान प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में बदलाव करने, गंभीर अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करने और प्रशासनिक ढाँचे में सुधार करने का प्रयास करता है।

सरकार के अनुसार इस संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून का संरक्षण उन लोगों तक पहुँचे जो बायोलॉजिकल कारणों की वजह से समाज में गंभीर भेदभाव और बहिष्कार का सामना करते हैं।

क्या होगी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की नई परिभाषा

नए संशोधन विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा में बदलाव है। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्ति उन लोगों को माना जाएँगे जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरवानी, जोगता या नपुंसक जैसे पारंपरिक समुदायों से जुड़ी होती है। भारत में लंबे समय से इन समुदायों को सामाजिक रूप से ट्रांसजेंडर पहचान के रूप में देखा जाता रहा है।

इसके साथ ही ऐसे लोगों को भी ट्रांसजेंडर की श्रेणी में शामिल किया गया है जिनमें जन्म से बायोलॉजिकल डायवर्सिटी होती हैं, जिन्हें इंटरसेक्स डायवर्सिटी कहा जाता है। इसका मतलब उन व्यक्तियों से है जिनके शरीर में जन्म के समय पुरुष या महिला के सामान्य विकास से अलग बायोलॉजिकल लक्षण पाए जाते हैं।

इसमें कई प्रकार की स्थितियाँ शामिल हो सकती हैं जैसे प्राथमिक यौन लक्षणों में अंतर, बाहरी जननांगों की संरचना में भिन्नता, क्रोमोसोम के पैटर्न में बदलाव, रिप्रोडक्टिव ग्लैंड्स के विकास में अंतर या शरीर में हार्मोन के उत्पादन और प्रतिक्रिया में असामान्यता।

विधेयक में यह भी कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को जबरन अंग-भंग, मजबूर कर के, लिम ऐम्प्यटैशन या किसी सर्जिकल, रासायनिक अथवा हार्मोनल प्रक्रिया के माध्यम से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया गया हो तो ऐसे मामलों को भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की श्रेणी में शामिल माना जाएगा।

किन लोगों को इस परिभाषा में शामिल नहीं किया जाएगा

इस संशोधन विधेयक में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया गया है। इसमें कहा गया है कि केवल अलग-अलग सेक्सुअल ओरिएंटेशन रखने वाले लोग या अपनी सेल्फ रीलज़ैशन लैंगिक पहचान के आधार पर स्वयं को किसी अन्य जेंडर के रूप में बताने वाले व्यक्ति इस एक्ट के तहत ट्रांसजेंडर की परिभाषा में शामिल नहीं होंगे।

सरकार का कहना है कि 2019 के कानून में परिभाषा बहुत व्यापक होने के कारण यह तय करना मुस्किल हो गया था कि वास्तविक रूप से किन लोगों को इस कानून के तहत मिलने वाले लाभ और संरक्षण दिए जाएँ। इसलिए संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि ट्रांसजेंडर पहचान केवल व्यक्तिगत पसंद, विशेषता या स्वयं घोषित पहचान के आधार पर नहीं दी जा सकती।

ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र की प्रक्रिया में बदलाव

ट्रांसजेंडर पहचान से जुड़ा प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। अभी तक व्यवस्था यह थी कि कोई व्यक्ति अपनी सेल्फ रीलज़ैशन के आधार पर आवेदन करता था और जिला मजिस्ट्रेट दस्तावेजों की जाँच के बाद प्रमाण पत्र जारी करते थे।

लेकिन नए संशोधन के तहत पहचान की प्रक्रिया में मेडिकल बोर्ड को शामिल किया जाएगा। प्रस्ताव के अनुसार एक डेसिग्नेटेड मेडिकल बोर्ड बनाया जाएगा जिसकी अध्यक्षता मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी करेंगे। यह बोर्ड संबंधित व्यक्ति के मामले की जाँच करेगा और अपनी सिफारिश देगा।

इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट उस सिफारिश की समीक्षा करेंगे और उसके आधार पर ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र जारी करेंगे। यदि आवश्यक समझा गया तो जिला मजिस्ट्रेट अन्य मेडिकल एक्सपर्ट से भी सलाह ले सकते हैं।

2019 के एक्ट की धारा 4(2) में यह प्रावधान था कि किसी व्यक्ति को अपनी सेल्फ रीलज़ैशन लैंगिक पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता मिल सकती है।

नए संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव किया गया है। सरकार का कहना है कि इस प्रावधान के कारण पहचान की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक समस्याएँ सामने आ रही थीं और कानून के कई प्रावधानों को लागू करना मुश्किल हो रहा था। इसलिए पहचान के लिए अब चिकित्सा मूल्यांकन और प्रशासनिक जाँच को आवश्यक बनाने का प्रस्ताव किया गया है।

जेंडर परिवर्तन सर्जरी के बाद की नई प्रक्रिया

यदि कोई व्यक्ति जेंडर परिवर्तन सर्जरी कराता है तो उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया में भी संशोधन प्रस्तावित किया गया है। विधेयक के अनुसार जिस चिकित्सा संस्थान में सर्जरी की जाएगी, उसे संबंधित व्यक्ति की जानकारी जिला प्रशासन को देनी होगी। इसके बाद व्यक्ति को चिकित्सा अधीक्षक या मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र के साथ जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करना होगा।

जिला मजिस्ट्रेट उस आवेदन की जाँच करने के बाद जेंडर परिवर्तन को मान्यता देने वाला प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। इसके बाद व्यक्ति अपने आधिकारिक दस्तावेजों में जेंडर से जुड़ी जानकारी में बदलाव करा सकता है।

संशोधन विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि जिस व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाण पत्र मिल जाता है, उसे अपने जन्म प्रमाण पत्र और अन्य सरकारी दस्तावेजों में अपना पहला नाम बदलने का अधिकार होगा।

इसका उद्देश्य यह है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की सामाजिक पहचान को कानूनी मान्यता मिले और उन्हें सरकारी दस्तावेजों में अपनी पहचान से जुड़ी परेशानियों का सामना न करना पड़े।

जबरन ट्रांसजेंडर पहचान थोपने पर कड़ी सजा

नए संशोधन में अपराधों के लिए सजा को काफी सख्त बनाने का प्रस्ताव भी किया गया है। 2019 के एक्ट में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए अधिकतम दो साल की सजा का प्रावधान था, जिसे सरकार ने अपर्याप्त माना है।

नए विधेयक में ऐसे मामलों के लिए अलग-अलग स्तर की सजाएँ तय की गई हैं। यदि किसी व्यक्ति का अपहरण करके उसे ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर किया जाता है और इस प्रक्रिया में अंग-भंग या अन्य किसी भी तरह से गंभीर शारीरिक नुकसान पहुँचाया जाता है तो दोषी को दस साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है और कम से कम दो लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।

यदि ऐसा अपराध किसी बच्चे के साथ किया जाता है तो सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है और काम से काम पाँच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है।

भीख मंगवाने या जबरन श्रम कराने के मामलों में सजा

विधेयक में उन मामलों को भी गंभीर अपराध माना गया है जिनमें किसी व्यक्ति को जबरन ट्रांसजेंडर के बनाने के लिए मजबूर किया जाता है और फिर उसे भीख माँगने, बंधुआ मजदूरी या अन्य प्रकार के शोषण में लगाया जाता है।

ऐसे मामलों में वयस्क पीड़ित के लिए दस साल तक की कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। यदि पीड़ित बच्चा है तो सजा चौदह साल तक हो सकती है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बनी राष्ट्रीय परिषद की संरचना में भी संशोधन का प्रस्ताव किया गया है। नए प्रावधान के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों को क्षेत्रीय आधार पर नामित किया जाएगा।

उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व क्षेत्रों से बारी-बारी से प्रतिनिधियों को परिषद में शामिल किया जाएगा। साथ ही परिषद में शामिल होने वाले अधिकारी निदेशक स्तर से नीचे के नहीं होने चाहिए। इसका उद्देश्य परिषद को अधिक प्रभावी और प्रतिनिधि बनाना बताया गया है।

रक्तदान नीति पर सरकार का पक्ष

इस पूरे मुद्दे के साथ रक्तदान नीति को लेकर भी चर्चा सामने आई है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि कुछ समूहों को रक्तदान से बाहर रखने का निर्णय वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर लिया गया है।

इन समूहों में ट्रांसजेंडर व्यक्ति, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुष और महिला यौन कर्मी शामिल हैं। सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार इन समूहों में HIV और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों की दर सामान्य आबादी की तुलना में छह से तेरह गुना अधिक पाई गई है।

सरकार का तर्क है कि रक्तदान करने की इच्छा से अधिक महत्वपूर्ण उस मरीज की सुरक्षा है जिसे रक्त चढ़ाया जाना है। इसलिए सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोच्च प्राथमिकता है।

LPG-पेट्रोल-डीजल के लिए पैनिक होना बंद करें, इंडक्शन की अचानक खरीदारी भी बढ़ाएगी दिक्कत: समझें- घबराहट में कैसे हम खुद को कर रहे हैं परेशान

मिडिल ईस्ट वॉर के बीच भारत में राजनीतिक फायदे के लिए कुछ अफवाहें जोरदार तरीके से फैलाई जा रही है, जिसमें एलपीजी-सीएनसी-पीएनजी, पेट्रोल-डीजल की कमीं की बात कही जा रही है इन अफवाहों की वजह से लोग पैनिक में आ रहे हैं और अव्यवस्था फैल रही है।

किस तरह की अव्यवस्था फैल रही है? ये अव्यवस्था है अचानक एलपीजी एजेंसियों पर लोगों की लंबी लाइनों की, पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइनों की, सीएनजी पंपों पर भी कमोवेश यही स्थिति। जिन लोगों के घरों में सिलेंडर हैं, फिर भी वो भविष्य की चिंताओं में अभी से लाइन में लग गए हैं, तो ये अव्यवस्थाएँ सामने आ रही हैं। ऐसे में वो लोग भी परेशान हो रहे हैं, जिन्हें वाकई जरूरत है।

कैसे पैदा की जा रही है भीड़ वाली सिचुएशन?

इस बात को एक उदाहरण से समझें कि एक एलपीजी गैस की एजेंसी पर आम तौर पर 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, इससे पूरे इलाके का काम चल जाता है। आम तौर पर लोगों के पास 2 सिलेंडर होते हैं। बड़े परिवारों के पास 4 या 6 भी, क्योंकि उनके पास 2 सिलेंडर वाले 2-3 कनेक्शन हो सकते हैं परिवार के अलग-अलग लोगों के नाम पर। लेकिन जब एलपीजी की कमीं की अफवाह फैलाई जाती है, तो ये सभी 3 लोग सिलेंडर की लाइन में लग जाते हैं, ये होते हुए भी कि उनके घरों में पहले से 3 सिलेंडर आम तौर पर भरे हैं और अगले 1-2 माह तक उन्हें नए सिलेंडर की जरूरत नहीं है, फिर भी पैनिक सिचुएशन की वजह से वो भी लाइनों में लग गए हैं।

ऐसे में जिस एलपीजी एजेंसी के पास हर दिन 200 सिलेंडर की सप्लाई होती है, वहाँ 2000 लोग सिलेंडर की डिमाँड लेकर अचानक आ गए। सिलेंडर की उपलब्धता आम दिनों जितनी ही यानी 200 की ही है, तो 1800 लोग बिना सिलेंडर के रह गए और वो हल्ला मचा रहे हैं कि सिलेंडर नहीं मिला। हकीकत ये है कि उनके घरों में पहले सिलेंडर हैं और भोजन सबके यहाँ बना है।

ऐसे में जो 200 आम लोग आम दिनों की सप्लाई वाले सर्कल में जिनका वाकई सिलेंडर खत्म हुआ है, उन्हें भी सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। तो पैनिक सिचुएशन क्रिएट हो रही है। हर दिन के हिसाब से इसी तरह के हल्ले में लोग जुड़ते चले जा रहे हैं और 4-5 दिनों में सिलेंडर की चाहत रखने वालों की संख्या 5-6000 को पार गई। हालाँकि घर में काम रुकने वालों की संख्या बेहद कम यानी 500-600 ही हैं, जो ऐसी पैनिक सिचुएशन की वजह से अब सिलेंडर नहीं पा रहे हैं।

इसी में सक्रिय होते हैं जमाखोर, ब्लैक में सिलेंडर बेचने वाले माफिया और दलाल… फिर जो सिलेंडर बुकिंग के माध्यम से 850 या 900 का मिल रहा है, वो पैनिक सिचुएशन का फायदा उठाकर वही सिलेंडर 2000-2500 रुपए में बेचने लग जाते हैं। साथ ही अपनी नाजायज ताकत का इस्तेमाल करते हुए उन 200 सिलेंडरों पर भी डाका डालते हैं, जो आम लोगों के लिए है। हालाँकि ये स्थानीय प्रशासन की विफलता भी होती है।

कुल मिलाकर इससे स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती ही जाती है। यही नहीं करना है। लोगों को शांत रहने की जरूरत है और गैस की सप्लाई डिमांड के हिसाब से एजेंसी भी बढ़ाएगी तो 4-6 दिनों में स्थिति सामान्य होती जाएगी।

क्या है एलपीजी को लेकर आधिकारिक आँकड़ा

सरकार की तरफ से पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी (मार्केटिंग और ऑयल रिफाइनरी) सुजाता शर्मा ने बताया कि जंग से पहले, हर दिन औसतन 55.7 लाख सिलेंडर बुक किए जाते थे। अब यह आँकड़ा बढ़कर करीब 76 लाख बुकिंग प्रतिदिन तक पहुँच गया है।

सरकार का कहना है कि जंग के हालात के बीच LPG सिलेंडर की बुकिंग में यह अचानक आया उछाल लोगों में घबराहट की वजह से है। इस स्थिति से निपटने के लिए एलपीजी कंपनियों ने बुकिंग की समयसीमा को शहरी इलाकों के लिए 25 दिन और ग्रामीण इलाकों के लिए बढ़ाकर 45 दिन कर दी है, ताकि जमाखोरी न हो सके। हालाँकि सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस स्थिति से निपटने के लिए LPG डिस्ट्रिब्यूटर्स के पास गैस का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

ऐसी ही स्थिति पेट्रोल-सीएनजी-डीजल पंपों पर

एलपीजी को लेकर मचे भगदड़ जैसी ही स्थिति सीएनजी, पेट्रोल-डीजल की हो चली है। वाहन चालक अपने वाहनों में टंकी तो फुल करा ही रहे हैं, पैनिक फैलाकर बनाई गई इमरजेंसी वाली हालत के हिसाब से वो कनस्तरों में भी पेट्रोल-डीजल भर ले रहे हैं। चूँकि भारत के लोग भविष्य की बहुत ज्यादा चिंता करते हैं ऐसे में वो वर्तमान को भी अव्यवस्था की भेंट चढ़ा रहे हैं और पैनिक फैलाकर बढ़ाई गई सामान की माँग को भी सप्लाई की तुलना में 2-3 गुना बढ़ा दे रहे हैं। यहाँ भी वाकई जरूरतमंद लोग पिस रहे हैं।

इंडक्शन की तरफ शिफ्ट हो रहे लोग, अचानक बढ़ी माँग

अब बात करते हैं अचानक बाजार में बढ़ी इलेक्ट्रिक चूल्हे यानी इंडक्शन की माँग की। ये अचानक बढ़ी माँग और पैनिक सिचुएशन आपकी गर्मी के मौसम को भी खराब करने वाली है। पहली बात तो ये कि आम दिनों में जिस दुकान से 1 या 2 इंडक्शन की बिक्री होती थी, आप ने हो-हल्ले के बीच मुँहमाँगे दामों पर एक ही दिन में सारा स्टॉक खाली कर दिया। अब इंडक्शन की डिमांड बढ़ गई। यहाँ भी जिनका गैस वाकई खत्म हुआ है, वो इंडक्शन भी नहीं पा रहे हैं, तो हर तरफ पैनिक फैल सकता है।

इसका दूरगामी असर देखिए- लोग इंडक्शन भी खरीद रहे हैं, लाइनों में लगकर गैस सिलेंडर भी ले रहे हैं। और अब घरों में एलपीजी का इस्तेमाल कम करके खाना इंडक्शन पर बना रहे हैं। मार्केट में सिर्फ इंडक्शन की माँग ही नहीं बढ़ रही, साथ ही इंडक्शन पर चढ़ने वाले बर्तनों की भी माँग बढ़ गई। उनकी कीमतें काफी बढ़ गई। आम लोग अपनी जेबें ढीली कर रहे हैं, क्यों? क्योंकि एक फर्जी सा माहौल बनाया गया कि एलपीजी की कमी ‘हो’ सकती है।

इस दूरगामी असर में आपकी गर्मी कैसे खराब होगी?

दिल्ली जैसे शहर में बीते 2 साल से गर्मियों में पीक पर 8000 मेगावॉट से 8500 मेगावॉट बिजली की माँग होती है। सरकारें और वितरण कंपनियाँ इसी हिसाब से बिजली की खरीद करती हैं, ताकि गर्मी में आम लोगों तक बिजली की निर्बाध सप्लाई बनाई रखी जा सके। लेकिन पैनिक सिचुएशन की वजह से लोग इंडक्शन पर शिफ्ट हो रहे हैं, तो बिजली की माँग भी अचानक डेढ़ गुनी तक हो जाएगी।

ऐसे में जो सरकार और बिजली वितरण कंपनी अपनी सालाना जरूरत के हिसाब से 8000 से 8500 मेगावॉट की बिजली खरीद रही है, वो माँग के मुताबिक 9500 से 10,500 मेगावॉट की बिजली कहाँ से लाएगी?

बात सिर्फ आम लोगों तक ही नहीं है, इसी पैनिक सिचुएशन की वजह से छोटे मोटे व्यवसाय, होटल, रेस्टोरेंट भी इंडक्शन की तरफ शिफ्ट होंगे, और जब माँग आम स्थिति की तुलना में डेढ़ गुना बढ़ जाएगी तो ट्रांसमिशन लाइनों से लेकर बिजली की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा। अचानक बढ़ी माँग पूरी न कर पाने की वजह से सरकारों की स्थिति बिगड़ेगी, बिजली कंपनियाँ रेट भी बढ़ा सकती हैं, साथ ही बिजली की कटौती भी बढ़ेगी।

ऐसे में क्या करें और क्या न करें?

सबसे पहले काम ये करें कि सामान्य जीवन जिए। किसी पैनिक में न पड़ें। देश में आम माँग की तुलना में आम सप्लाई लाइन पर कोई असर नहीं पड़ा है। ऐसे में लाइनों में न लगें। मिडिल ईस्ट में तनाव कम हो या न हो, सरकार ने अपनी जरूरत के हिसाब से 42 देशों से आपके लिए पेट्रोल-डीजल की व्यवस्था कर रखी है। ऐसे में न तो पेट्रोल-डीजल की कमीं आम लोगों को होगी, न ही सीएनजी-पीएनजी-एलपीजी की। किसी युद्ध का भारत के लोगों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

ऐसे में एक-दूसरे की देखा-देखी इंडक्शन की तरफ न दौड़ें और सामान्य जिंदगी जिएँ। इंडक्शन की तरफ दौड़ने से आपकी गर्मी खराब होनी तय है। अगर यही स्थिति रही, तो गर्मियों में लंबी बिजली कटौती के लिए भी तैयार रहें और इसके लिए सरकार को न कोसें। क्योंकि सरकार और बिजली कंपनियाँ उसी माँग के आधार पर चल रही हैं, जितनी अब तक आम तौर पर रही है। डिमाँड आप बढ़ाएँगी, तो परेशान भी आप ही होंगे। सरकार तो खैर आगे-पीछे कुछ न कुछ इंतजाम कर ही लेगी। ये बात सारी दुनिया पर लागू है।

मिडिल ईस्ट वार पर आपको क्यों नहीं पड़ना चाहिए फर्क?

सबसे पहले तो ये समझें कि जो ब्रेंट ऑयल या कोई भी मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल है, वो सीधे आप तक नहीं पहुँच रहा है। वो कच्चा तेल होता है। अभी आने वाला तेल आप तक पहुँचने में 4-5 महीने तक का समय लग जाता है। यानी अभी तो आपके पास 4-5 महीने तक पैनिक की कोई वजह नहीं है।

दूसरा कि मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल आपके लिए होता ही नहीं है। आपके लिए सरकार अन्य देशों से जरूरत का सामान मँगा ही रही है। ये तेल होता है देश की बड़ी बड़ी रिफायनरियों के लिए। इन रिफायनरियों में जो कच्चा तेल आता है, वो रिफाइन होकर दूसरे देशों यानी यूरोप-अफ्रीकी देशों में बेचा जाता है। इसमें सरकारी कंपनियों के साथ ही नायरा एनर्जी, रिलायंस जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं।

ऐसे में उन रिफायनरियों को मिलने वाले तेल और उनके बिजनेस से आम लोगों को क्यों परेशान होना चाहिए ये सोचने वाली बात है।

फिर अभी भारत सरकार ने अपने रणनीतिक तेल भंडारों को छुआ तक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, पूरी दुनिया में 1 बूँद की सप्लाई रुकते तक भी भारत के पास इतना तेल है कि वो आम लोगों की जिंदगियों पर कुछ महीनों तक कोई फर्क नहीं पड़ने देगी।

इसे इस बात से समझें कि एशिया-प्रशांत इलाके के देशों यानी साउथ-ईस्ट देशों जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, ताईवान, कंबोडिया, जापान जैसे देश कच्चा तेल और यूरोप के देश कच्चा तेल मँगाने की जगह भारत की रिफायनरियों से रिफाइन किया गया तेल मंगाते हैं। उन देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम करीब डेढ़ से 2 गुना हो चुका है। लेकिन भारत में मोदी सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम में 1 पैसे का इजाफा नहीं किया गया है। जबकि सीएनजी-पेट्रोल पंपों पर लाइन तो पड़ोसी बाँग्लादेश में भी लग चुकी है। लेकिन भारत के लोग क्यों परेशान हो रहे हैं?

देश में पैनिक फैलाकर राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं लोग, दुश्मन देश

भारत के लोग सिर्फ इसलिए परेशान हो रहे हैं क्योंकि उनके आसपास राजनीतिक आग्रहों से ग्रस्त लोगों ने पैनिक फैलाया हुआ है। वो तो चाहते हैं कि लोग सरकार से नफरत करें और सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएँ और उन्हें सत्ता मिल जाए।

यही बात भारत के दुश्मन देशों और उन कथित पश्चिमी मित्र देशों पर भी लागू होती है। वो भारत की तरक्की बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो भी देश में सत्ता परिवर्तन और कठपुतली सरकार चाहते हैं। वो भारत का विकास रोकना चाहते हैं, अमेरिकी डीप स्टेट से जुड़े लोगों के बयान से लेकर अमेरिकी डिप्टी विदेश मंत्री तक भी ये बयान दे चुके हैं। वो नहीं चाहते कि भारत में स्थायित्व रहे और वो विकसित देश बने, क्योंकि ऐसा होने पर भारत कभी उनका पिछलग्गू नहीं रहेगा। बीते 12 सालों में मोदी सरकार की स्वतंत्र विदेश नीति इसी रास्ते पर चल रही है।

भारत के पड़ोस को देखिए, फिर करिए गहरा विचार

आप अपने आसपास के देशों को देखें फिर इस बात पर विचार करें। उदाहरण के लिए… पड़ोसी नेपाल में अमेरिकी कठपुतली सत्ता में आ चुका है। बांग्लादेश में भी छात्र आंदोलन के नाम पर भारत की मित्र सरकार को अपदस्थ कर दिया गया। आज बांग्लादेश की हालत खराब है। श्रीलंका में भी सत्ता परिवर्तन किया गया। पाकिस्तान पहले से अमेरिका की कठपुतली बना हुआ है। मौलाना मुनीर ट्रंप के यहाँ अक्सर हाजिरी मारने जाता है। म्यांमार की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। मालदीव में भी सत्ता परिवर्तन कुछ सालों में हुआ है और राजनीति को एंटी इंडिया की चाशनी में डुबो दिया गया है।

ईरान पर अमेरिकी आक्रमण जारी ही हैं, बाकी मिडिल ईस्ट अमेरिकी कठपुतली बने हुए हैं। अफगानिस्तान में किसी के घुसने की हालत नहीं है। चीन की इकोनमी पर अमेरिकी दबाव जगजाहिर है। साउथ कोरिया में राष्ट्रपति जेल (अमेरिका का कितना हाथ- ये अंदरुनी लोग बताएँगे) में हैं। जापान ने अपनी सैन्य नीति परिवर्तित कर ली है। रूस भी अमेरिका के साथ पींगे बढ़ा रहा है। हर तरफ यही खेल, कि किस तरह से भारत को पंगु बनाया जाए।

देश की ताकत बनिए, कमजोर नहीं

अब ये आप लोगों पर है कि आप क्या सोचते हैं इस बारे में और देश के साथ इस स्थिति में कैसे खड़े होते हैं। पैनिक होती भीड़ की शक्ल में… या समझदार आत्मनिर्भर भारत के मजबूत प्रहरी की शक्ल में। ऐसे में पैनिक फैलाना बंद करें और देश के साथ मजबूती से खड़े हों। कोई भी स्थिति स्थाई नहीं होती, ये वक्त भी गुजर जाएगा। फिर रही बात ट्रंप की, तो 2-3 साल में उसका भी बोरिया बिस्तर सिमट जाएगा। भारत शान से आगे बढ़ता जाएगा, जिसपर आने वाले दशक में आपको भी गर्व होगा। और ये बात पूरी दुनिया को दिखेगी भी।

LPG, LNG और दुनिया को चलाने वाले अन्य पेट्रोलियम ईंधन: जानिए क्या हैं इनके बीच अंतर और भारत इन्हें कहाँ से लाता है

मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण पेट्रोलियम ईंधन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। कई देशों में पेट्रोल, डीजल और LPG जैसी चीजों की कमी होने लगी है। भारत में ज्यादातर पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कमी नहीं है लेकिन कुछ जगहों पर LPG की कमी देखी गई है। इसलिए सरकार ने तय किया है कि घरेलू उपभोक्ताओं को परेशानी न हो और इसके लिए LPG की बिक्री व्यावसायिक संस्थानों के लिए सीमित की जाएगी।

इस कमी की मुख्य वजह यह है कि भारत पेट्रोलियम उत्पादों खासकर LPG के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोत होते हैं- कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) और प्राकृतिक गैस। ज्यादातर तेल के कुओं से तेल और गैस दोनों निकलते हैं जबकि कुछ कुओं से केवल गैस ही मिलती है। बाद में इन दोनों को रिफाइनरियों में अलग-अलग पेट्रोलियम उत्पादों में बदला जाता है।

LNG vs LPG

इन दिनों LNG और LPG की सप्लाई को लेकर काफी चर्चा हो रही है। LNG और LPG दोनों गैस ईंधन हैं, जिन्हें आसानी से ले जाने और स्टोर करने के लिए तरल (लिक्विड) रूप में रखा जाता है। लेकिन इन दोनों की बनावट और स्रोत अलग-अलग होते हैं।

प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन के दो मुख्य स्रोतों में से एक है जबकि दूसरा कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) है। गैस और कच्चे तेल दोनों से कई तरह के पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाए जाते हैं।

प्राकृतिक गैस अपने सामान्य रूप में बड़ी मात्रा में टैंकरों के जरिए स्टोर या ट्रांसपोर्ट नहीं की जा सकती क्योंकि गैस होने के कारण एक बड़े टैंकर में भी इसकी मात्रा कम ही आ पाती है। इसलिए प्राकृतिक गैस को ठंडा करके लगभग -161°C तापमान तक लाया जाता है जिस पर यह लिक्विड बन जाती है।

इसी तरल रूप को LNG कहा जाता है। इसे टैंकों में आसानी से स्टोर किया जा सकता है और बड़े LNG टैंकरों के जरिए लंबी दूरी तक ले जाया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि LNG कोई अलग पेट्रोलियम उत्पाद नहीं है बल्कि यह ठंडा करके तरल बनाई गई प्राकृतिक गैस ही होती है। कच्चे तेल की तरह प्राकृतिक गैस को भी रिफाइन करके कई तरह के हाइड्रोकार्बन उत्पाद बनाए जाते हैं।

LPG (Liquefied Petroleum Gas) कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस दोनों से बनने वाला ईंधन है। यह मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का मिश्रण होता है, जो गैस प्रोसेसिंग और तेल रिफाइनिंग के दौरान निकलते हैं। स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के लिए इसे दबाव देकर तरल बनाया जाता है और इसलिए इसे LPG कहा जाता है। हालाँकि, इसे तरल बनाने के लिए ज्यादा दबाव नहीं लगता।

LNG में ज्यादातर मीथेन गैस होती है जबकि प्रोपेन और ब्यूटेन की मात्रा कम होती है। इसलिए LNG से LPG कम बनती है। दुनिया में ज्यादा LPG कच्चे तेल से बनती है क्योंकि उसमें कई तरह के हाइड्रोकार्बन होते हैं। भारत में LPG का सबसे ज्यादा उपयोग रसोई गैस के रूप में होता है। इसके अलावा छोटे उद्योग, हीटिंग, कृषि ड्रायर और कुछ पेट्रोकेमिकल उद्योगों में भी इसका उपयोग होता है।

LNG के भी कई उपयोग हैं। इसे एक खास टर्मिनल पर फिर से गैस बनाया जाता है और पाइपलाइन से भेजा जाता है। भारत में इससे मिलने वाली प्राकृतिक गैस का उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, सिटी गैस नेटवर्क और वाहनों के लिए CNG बनाने में होता है।

भारत में कहाँ से आते हैं तेल और गैस?

भारत में तेल और गैस की जरूरत घरेलू उत्पादन और आयात दोनों से पूरी होती है। देश में कुछ कच्चा तेल समुद्र के अंदर के क्षेत्रों जैसे मुंबई हाई और जमीन पर मौजूद क्षेत्रों जैसे असम और गुजरात से निकलता है लेकिन यह देश की कुल जरूरत का केवल छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाता है। इसलिए भारत को ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मँगाना पड़ता है जैसे- इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और रूस।

LNG के मामले में भी भारत आयात पर काफी निर्भर है क्योंकि देश में प्राकृतिक गैस का उत्पादन जरूरत से कम है। भारत को सबसे ज्यादा LNG कतर से मिलती है, इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और अन्य देशों से भी सप्लाई होती है। इन आयातों का बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जो दुनिया का एक अहम समुद्री ऊर्जा मार्ग है और अभी ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध के कारण प्रभावित है।

LPG का कुछ उत्पादन भारत में रिफाइनरी और गैस प्लांट्स में होता है लेकिन यह माँग के लिए काफी नहीं है। भारत हर साल लगभग 31 मिलियन टन LPG इस्तेमाल करता है जबकि देश में सिर्फ करीब 13 मिलियन टन ही बन पाती है। इसलिए भारत को बड़ी मात्रा में LPG आयात करनी पड़ती है। इसके मुख्य सप्लायर सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत हैं। हालाँकि, भारत हाल के समय में US जैसे अन्य देशों से भी आयात बढ़ा रहा है। कुल मिलाकर भारत की LPG जरूरत का करीब 40% देश में बनता है जबकि बाकी 60% आयात के जरिए आता है।

सिर्फ LPG की ही कमी क्यों?

अब सवाल उठता है कि जब LPG कच्चे तेल और LNG से बनती है, तो देश में पेट्रोल-डीजल की कमी नहीं है लेकिन LPG की कमी क्यों हो रही है।

इसकी मुख्य वजह रिफाइनरी की सीमाएँ हैं। तेल रिफाइनरी एक तय तकनीक और कच्चे तेल के हिसाब से बनी होती हैं। एक बैरल कच्चे तेल से कितना पेट्रोल, डीजल या LPG निकलेगी यह पहले से लगभग तय होता है। इसलिए अचानक LPG का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। इसके लिए रिफाइनरी में बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जिसमें बहुत पैसा और कई साल लगते हैं।

प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी गैसें सीमित मात्रा में ही निकलती हैं। इन्हें ज्यादा बढ़ाने के लिए या तो अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों को कम करना पड़ेगा या नई महँगी मशीनें लगानी पड़ेंगी।

दूसरी वजह स्टोरेज और सप्लाई सिस्टम है। LPG को दबाव वाले टैंक और खास सिलेंडरों में ही रखा और ले जाया जा सकता है, इसलिए इसे ज्यादा मात्रा में जमा करना मुश्किल होता है। जबकि पेट्रोल और डीजल जैसे तरल ईंधन सामान्य टैंकों में आसानी से स्टोर किए जा सकते हैं। LPG की पूरी सप्लाई व्यवस्था लगातार चलने वाले सिस्टम पर आधारित है। यानी इसे लंबे समय तक बड़े भंडार के रूप में जमा करके नहीं रखा जाता। वहीं, कच्चे तेल, पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधनों के रणनीतिक भंडार बनाए जाते हैं जो लगभग दो महीने की माँग पूरी कर सकते हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)