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कॉन्ग्रेस के मुखपत्र National Herald ने भारत के लोकतंत्र को फिर दिखाया नीचा, उस बांग्लादेश के ‘निष्पक्ष चुनाव’ की दे रहा दुहाई जहाँ विपक्ष को बोलने की आजादी तक नहीं

बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद पूरे देश में हिंसा फैली, जो आज भी जारी है खासकर हिंदुओं के खिलाफ। फिर शेख हसीना की सरकार गिरने के लगभग 1.5 साल बाद बांग्लादेश में आम चुनाव हुए। इन चुनावों में भी हिंसा की कई खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ का मानना है कि ‘भारत को बांग्लादेश से सीखने की जरूरत है।’

दरअसल, खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकार’ बताने वाले सौरभ सेन ने नेशनल हेराल्ड के लिए एक आर्टिकल लिखा है। इस आर्टिकल को सौरभ सेन ने स्वीडन के मीडिया आउटलेट ‘नेत्र न्यूज’ के ऑडिट के हवाले से लिखा है, जो दावा कर रहा है कि बांग्लादेश में आम चुनाव 2026 में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई और उन दावों को खारिज किया जो बांग्लादेश के विपक्षी दल कहते आ रहे हैं कि चुनाव में धाँधली हुई है।

कॉन्ग्रेस की आवाज बनकर नैरेटिव गढ़ने वाले ‘नेशनल हेराल्ड’ ने राहुल गाँधी के ही स्वर में अपनी बात रखी है। आर्टिकल में भारत के चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए, सरकार पर तंज कसा गया और यहाँ तक कि संसद में महिला आरक्षण बिल पास न होने का ठीकरा भी सरकार पर ही फोड़ डाला।

नेशनल हेराल्ड के आर्टिकल की हेडलाइन- बांग्लादेश में हुए ‘ऑडिट’ से भारत के लिए सबक, से ही भारत-विरोधी स्वर गूँज रहे हैं। यहाँ लेखक सौरभ सेन दावा करते हैं कि बांग्लादेश तो भारत से कहीं आगे और बेहतर देश है और भारत को उससे कुछ सीखना चाहिए, जबकि हकीकत से इससे कहीं परे है। यहाँ खासतौर से हाल ही में बांग्लादेश के आम चुनाव 2026 को ‘पारदर्शी’ बताने का दावा कर भारत को सबक लेनी की बात कही जा रही है।

यहाँ नेशनल हेराल्ड उस देश के चुनावों में ‘पारदर्शी’ की बात कर रहा है, जहाँ कई सालों तक सत्ता में रही शेख हसीना की पार्टी ‘आवामी लीग’ को ही चुनाव लड़ने से रोका गया। पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इतना ही नहीं बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनाव पर कई सवाल खड़े हुए, जब चुनावों में हिंसा और हेराफेरी की खबरे सामने आईं।

सच: बांग्लादेश में चुनावी हिंसा और भारत में सख्त नियम

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में लिखा- भारत का चुनाव आयोग चाहे तो चुनाव और नतीजों की जाँच को और ज्यादा पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद बना सकता है।

जबकि सच क्या है, यह सबके सामने आ चुका है। कैसे बांग्लादेश में चुनावों में हिंसा की घटनाएँ सामने आईं। कहीं मतदान केंद्र पर बम धमाका हुआ, तो कहीं गोलीबारी हुई, कई मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों की आपसी झड़प में माहौल गरमाया। मानवाधिकार संगठन ओधिकार के अनुसार, 13 फरवरी से 28 फरवरी के बीच 104 हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई और 476 से ज्यादा लोग घायल हुए।

रही पारदर्शी की बात, तो बांग्लादेश चुनावों में जीत दर्ज करने वाली पार्टी BNP के नेताओं ने ही वोटिंग प्रक्रिया में ‘हेराफेरी‘ के आरोप लगाए। ऐसे ही चुनावों से पहले हवा बनाने वाली जमात-ए-इस्लामी ने भी यही आरोप लगाए।

तो यहाँ भारत को क्या सीखने की जरूरत है? वोटिंग प्रक्रिया में हेराफेरी या मतदाताओं पर हिंसा? क्योंकि हाल ही में बंगाल चुनाव देख लीजिए। पिछले बंगाल चुनाव 2021 में मिली सभी शिकायतों का चुनाव आयोग ने हल ढूँढा। भारत के चुनाव आयोग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए। जिस बंगाल में साल 2021 के चुनाव परिणामों के बाद हिंसा फैली, उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने मतदान के दौरान देशभर से आए भारी सुरक्षाबल को तैनात किया।

यानी अगर कोई प्रदेश हिंसा के लिए जाना भी जा रहा है, तो चुनाव आयोग अपनी तरफ से कायदे-कानून बनाने में कमी नहीं कर रहा है। जहाँ नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में बैलट पेपर पर हुए चुनावों की वाहवाही करते नहीं थक रहा है, वहीं भारत में EVM से ‘पारदर्शिता’ के साथ चुनाव संपन्न हो रहे हैं। और अब तो चुनाव आयोग EVM से छेड़छाड़ की घटना पर भी सख्त हो गया है।

तो इससे पता लगता है कि भारत का चुनाव आयोग चाहता नहीं, करके दिखाता है कि कैसे भारत में चुनाव पारदर्शी, स्वतंत्र और भरोसेमंद होते हैं।

सच: बांग्लादेश में ‘नाम’ का महिला आरक्षण और भारत में महिला आरक्षण पर सरकार ‘गंभीर’

आर्टिकल में यह भी लिखा गया, “भारत में बीजेपी ने महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में तेजी से पेश किया। पार्टी को पता था कि उसके पास इसे पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं है, फिर भी उसने ऐसा किया। इसका मकसद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के चुनावों से पहले महिलाओं के बीच अपनी छवि मजबूत करना था।”

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

यहाँ नेशनल हेराल्ड महिलाओं को आधार बनाकर बांग्लादेश की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहा है। बांग्लादेश की संसद ‘जातीय संगद’ में उन 50 सीटों पर महिला आरक्षण की बात हो रही है, जो 2011 में खुद एक महिला प्रधानमंत्री रह चुकीं शेख हसीना की सरकार में दिया गया था।

ये जो नेशनल हेराल्ड बांग्लादेश में महिलाओं के आरक्षण पर बात करता है, क्या इन्होंने कभी बांग्लादेश में महिालओं के हालात पर मुद्दा उठाया है। बांग्लादेश में महिलाओं की हालत क्या है? यह सबको पता है। आए दिन गैंगरेप की घटनाएँ और मारपीट की घटनाओं से साफ पता लगता है कि बांग्लादेश में महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता है।

खासकर हिंदू महिलाएँ, जो घर के भीतर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें घर में भी सुरक्षित नहीं छोड़ते हैं। महिलाओं को आरक्षण देने वाला बांग्लादेश ही है, जिसे महिला का शक्ति रूप ‘माँ दुर्गा’ की पूजा से दिक्कत है। हर साल दुर्गा पूजा में हिंसा की खबरें सामने आती हैं, कहीं देवी की मूर्ति तोड़ी जाती है, कहीं पत्थरबाजी होती है।

और बांग्लादेश में महिला आरक्षण पर बात करने वाला नेशनल हेराल्ड कॉन्ग्रेस की ही आवाज है, जिसने भारत की संसद में महिला आरक्षण कानून का विरोध किया। तो कहना बिल्कुल शोा नहीं देता कि भारत को यह सीखने की जरूरत है कि महिलाओं का कैसे सम्मान करना है?

‘नेशनल हेराल्ड’ चलाने वाली कॉन्ग्रेस को बांग्लादेश से ‘प्रेम’, पर भारत का ‘विरोध’

नेशनल हेराल्ड ने अपने आर्टिकल में भारत को बांग्लादेश से जो भी सीख लेने की बात कही, वह सीख अगर भारत ने ले ली तो उसकी भी हालत बांग्लादेश जैसी ही होगी। वही बांग्लादेश, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है, विरोध प्रदर्शनों को बल से दबाया जाता है, विपक्षी दलों को प्रतिबंध कर दिया जाता है और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं।

एक ओर कॉन्ग्रेस है, जो संसद में रोजाना लोकतंत्र और संविधान की बात कर लगातार सरकार पर हमलावर रहती है, और दूसरी ओर उसी का मुखपत्र जो लोकतंत्र के नाम पर डूबे हुए बांग्लादेश से भारत को सबक लेने की सीख दे रहा है। असल में कॉन्ग्रेस सिर्फ भारत-विरोधी बात करना जानती है, चाहे उसे भारत से कमतर देश से ही क्यों न भारत की तुलना करनी पड़े।

कॉन्ग्रेस पार्टी बुद्धीजीवी बनकर अपने समाचार पत्र में महिलाओं के आरक्षम की बात करती है, लेकिन जब महिलाओं के अधिकारों की बात आती है तो पीछे हट जाती है। इसका ताजा उदाहरण लोकसभा में देखने को मिला, जब सरकार महिला आरक्षण कानून लेकर आई और कॉन्ग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया।

तो कॉन्ग्रेस को नहीं बोलना चाहिए कि भारत को क्या और किससे सीखने की जरूरत है। ये वही लोग हैं जो वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, EVM की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं, लेकिन बैलेट पेपर की निष्पक्षता उन्हें अच्छी लगती है। ये वही लोग हैं, जो भारत के हित में एक बात कहने में हिचकते हैं, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों की वाहवाही करते नहीं थकते।

बंगाल चुनाव में BJP के लिए 2021 से 2026 तक में क्या बदला, क्यों जीत को लेकर आश्वस्त है पार्टी? समझें मतदान का दूसरा चरण ही सबसे बड़ी चुनौती क्यों

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण के लिए प्रचार का शोर सोमवार (27 अप्रैल 2026) की शाम थम गया। इस चरण में राज्य की महत्वपूर्ण सीटों पर मतदान होना है, जिसके नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएँगे। 2021 की तुलना में 2026 का यह चुनाव न केवल समीकरणों के लिहाज से अलग है, बल्कि बीजेपी की आक्रामकता और टीएमसी की रक्षात्मक मुद्रा ने इसे भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना दिया है।

शोर-शराबे, तीखे नारों और भारी सुरक्षा के बीच बंगाल की राजनीति उस मुहाने पर खड़ी है, जहाँ से राज्य की दशा और दिशा दोनों तय होनी है। 2021 के चुनावों में ‘अबकी बार 200 पार’ का नारा देने वाली बीजेपी ने इस बार अपनी रणनीति में जमीन-आसमान का अंतर पैदा किया है। जहाँ 2021 में एक ‘हवा’ बनाने की कोशिश थी, वहीं 2026 में बीजेपी एक सोची-समझी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तर्ज पर चुनावी मैदान में है।

चुनाव प्रचार का शोर थमने के बाद पर्दे के पीछे की उन रणनीतियों पर चर्चा शुरू हो चुकी होगी, जिन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के अभेद्य किले में सेंध लगाने की कोशिश की है। आखिर साल 2021 से 2026 के बीच बीजेपी में क्या बदला? अमित शाह के 15 दिनों के प्रवास से लेकर पीएम मोदी की ’15 गारंटी’ तक और संदेशखाली से लेकर आरजी कर कांड के आक्रोश तक, यहाँ हर उस पहलू का विश्लेषण है जो इस चुनाव को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे दिलचस्प मुकाबला बना रहा है।

साल 2021 से 2026 तक, बीजेपी के लिए क्या बदला?

साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी एक ‘उभरती हुई शक्ति’ थी, जिसके पास उत्साह तो था लेकिन संगठन की वैसी गहराई नहीं थी जो टीएमसी के दशकों पुराने कैडर का मुकाबला कर सके। 2021 में बीजेपी का नारा ‘अबकी बार 200 पार’ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था, लेकिन 2026 में पार्टी ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ पर उतर आई है। पिछले पाँच वर्षों में बीजेपी ने बूथ स्तर पर अपने ‘पन्ना प्रमुखों’ की फौज खड़ी की है और टीएमसी के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जमीनी स्तर पर प्रतिरोध तैयार किया है।

सबसे बड़ा बदलाव ‘साख’ का है। 2021 में बीजेपी को ‘बाहरी लोगों की पार्टी’ के रूप में पेश करने में ममता बनर्जी सफल रही थीं। लेकिन 2026 में, सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय चेहरों की मजबूती और मतुआ समुदाय के साथ-साथ उत्तर बंगाल में बढ़ते जनाधार ने बीजेपी को ‘बंगाल की अपनी पार्टी’ के रूप में स्थापित कर दिया है। अब बीजेपी केवल रैलियों की पार्टी नहीं रही, बल्कि वह हर पंचायत और हर ब्लॉक में टीएमसी को सीधी टक्कर दे रही है।

तीसरा मुख्य बदलाव विपक्ष की शून्यता है। 2021 तक वामदल और कॉन्ग्रेस के पास फिर भी कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन 2026 तक आते-आते ये दल लगभग अप्रासंगिक हो चुके हैं। इसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला है, क्योंकि जो मतदाता टीएमसी से नाराज है, उसके पास बीजेपी के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है। राजनीति के इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी को एक ‘प्राकृतिक विकल्प’ बना दिया है।

स्विंग वोटर का मनोविज्ञान, संदेशखाली से लेकर आरजी कर केस तक का प्रभाव

आम तौर पर चुनावों के समय दो तरह के मतदाता होते हैं। पहले वे जो विचारधारा या पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं (कैडर वोट), जो लगभग 20-30% होते हैं। लेकिन असली खेल शेष 70-80% ‘स्विंग वोटर्स’ का होता है। 2026 के चुनाव में यह स्विंग वोटर पूरी तरह से बदल चुका है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की हृदयविदारक घटना ने बंगाल के मध्यम वर्ग और ग्रामीण महिलाओं की आत्मा को झकझोर दिया है।

आरजी कर कांड ने विशेष रूप से शहरी और शिक्षित मतदाताओं को टीएमसी के खिलाफ खड़ा कर दिया है। जो महिलाएँ कभी ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं की वजह से ममता बनर्जी की मुरीद थीं, आज वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। संदेशखाली की घटना ने यह संदेश दिया कि स्थानीय स्तर पर टीएमसी के नेता ‘सामंत’ बन चुके हैं जो कानून से ऊपर हैं। इस आक्रोश ने उन मतदाताओं को बीजेपी की ओर धकेल दिया है जो पहले तटस्थ थे।

बीजेपी ने इस ‘भावना’ को कुशलता से वोट में बदलने का प्रयास किया है। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि यदि आप अपनी बहू-बेटियों की सुरक्षा चाहते हैं, तो ‘परिवर्तन’ अनिवार्य है। चूँकि वामदल और कॉन्ग्रेस इन मुद्दों पर केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित रहे, इसलिए जनता ने बीजेपी की आक्रामक सड़कों वाली लड़ाई को अधिक विश्वसनीय माना। यही कारण है कि यह विशाल ‘स्विंग वोटर’ इस बार बीजेपी के पक्ष में एक मूक क्रांति (Silent Revolution) की ओर बढ़ रहा है।

ममता सरकार के भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार

ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार इस चुनाव का सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी हर रैली में टीएमसी को ‘भ्रष्टाचार की जननी’ के रूप में चित्रित किया है। बीजेपी का आरोप है कि टीएमसी के शासन में ‘कट-मनी’ एक आधिकारिक कर बन चुका है। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से शिक्षक भर्ती घोटाले (SSC Scam) और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि दीदी ने बंगाल के मेधावी युवाओं का भविष्य बेच दिया है।

अमित शाह ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को तिजोरी से निकालकर जनता के बीच पहुँचाया। उन्होंने ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) द्वारा जब्त किए गए नोटों के पहाड़ों का जिक्र करते हुए पूछा कि “क्या यह पैसा बंगाल की जनता का नहीं है?” बीजेपी ने डेटा साझा करते हुए बताया कि कैसे केंद्र सरकार द्वारा भेजी गई ‘अम्फान’ और ‘यस’ चक्रवात की राहत राशि टीएमसी के स्थानीय नेताओं की जेबों में चली गई। भ्रष्टाचार के इस मुद्दे ने टीएमसी के ‘ईमानदार छवि’ वाले दावों को तार-तार कर दिया है।

भ्रष्टाचार के इस चक्रव्यूह में बीजेपी ने सिंडिकेट राज को भी निशाना बनाया है। घर बनाने के लिए बालू-मिट्टी से लेकर सरकारी ठेकों तक, हर जगह टीएमसी के बिचौलियों का कब्जा होने की बात कही गई है। मोदी-शाह की जोड़ी ने यह वादा किया है कि बीजेपी की सरकार बनते ही एक विशेष कार्यबल (STF) गठित किया जाएगा जो इन भ्रष्ट नेताओं की संपत्तियों को कुर्क कर गरीबों में बाँटेगा। यह संदेश उन युवाओं के बीच बहुत प्रभावी रहा है जो बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।

ममता बनर्जी को घेरने की ‘दोहरी चक्रव्यूह’ रणनीति

बीजेपी ने इस बार ममता बनर्जी को उनके ही घर में घेरने के लिए एक विशेष रणनीति अपनाई है। 2021 में नंदीग्राम की लड़ाई ने ममता को अपनी सीट बदलने पर मजबूर किया था, लेकिन 2026 में बीजेपी ने उन्हें दो ऐसी सीटों पर उलझा दिया है जहाँ से उनका जीतना साख का सवाल बन गया है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि ममता बनर्जी पूरे बंगाल में चुनाव प्रचार करने के बजाय अपनी खुद की सीटों को बचाने में अधिक समय खर्च करें।

बीजेपी के वरिष्ठ रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री को उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र में ‘असुरक्षित’ महसूस कराया जाए, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर पूरे राज्य के कार्यकर्ताओं पर पड़ता है। जब ममता बनर्जी एक ही क्षेत्र में बार-बार रैलियाँ करती हैं, तो बीजेपी इसे “ममता की घबराहट” के रूप में प्रचारित करती है। इससे न केवल टीएमसी का कैडर हतोत्साहित होता है, बल्कि निष्पक्ष मतदाताओं को भी लगता है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन की लहर चल रही है।

इस ‘घेराबंदी’ की रणनीति के तहत बीजेपी ने उन सीटों पर भारी भरकम केंद्रीय मंत्रियों और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों की फौज उतार दी है। इसका मकसद ममता बनर्जी को यह संदेश देना है कि इस बार लड़ाई केवल विपक्षी दल से नहीं, बल्कि एक संगठित राष्ट्रीय शक्ति से है। बीजेपी का मानना है कि यदि ममता बनर्जी अपनी सीट पर कम अंतर से भी जीतती हैं या कड़े मुकाबले में फंसती हैं, तो यह टीएमसी की नैतिक हार होगी, जिसका फायदा बीजेपी को बाकी के चरणों में मिलेगा।

टीएमसी की राजनीतिक हिंसा, ‘खेला’ बनाम ‘सुरक्षा’

बंगाल की राजनीति में हिंसा एक स्थायी तत्व रही है, लेकिन 2021 के बाद हुई चुनाव बाद की हिंसा (Post-poll violence) ने जनता के मन में गहरा डर पैदा किया था। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में इस ‘डर’ को ही अपना हथियार बनाया है। पार्टी का आरोप है कि टीएमसी चुनाव नहीं लड़ती, बल्कि वह प्रशासनिक मशीनरी और अपने ‘गुंडों’ के दम पर चुनाव को ‘हाईजैक’ करती है। बीजेपी ने टीएमसी के ‘खेला होबे’ नारे को हिंसा का प्रतीक बताकर उसके खिलाफ शांति और सुरक्षा’ का विकल्प रखा है।

टीएमसी नेताओं की हिंसा का जिक्र करते हुए बीजेपी ने बताया कि कैसे विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है, उनके घर जलाए जाते हैं और उन्हें आर्थिक रूप से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि “बंगाल में बम और बारूद का कारखाना नहीं, बल्कि उद्योगों का जाल बिछना चाहिए।” हिंसा के मुद्दे पर बीजेपी ने चुनाव आयोग पर भी दबाव बनाया कि संवेदनशील बूथों पर केवल केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए, ताकि मतदाता निडर होकर वोट डाल सकें।

बाहरी बनाम भीतर की लड़ाई में बीजेपी की बदली हुई आक्रामक रणनीति

साल 2021 के चुनावों में बीजेपी का पूरा फोकस ‘बाहरी’ बनाम ‘भीतरी’ की लड़ाई को संभालने और एक लहर पैदा करने पर था। उस समय बीजेपी ने टीएमसी के बागियों पर अधिक भरोसा किया था, लेकिन 2026 में रणनीति पूरी तरह बदल चुकी है। अब बीजेपी ने अपने कैडर को तैयार किया है और ‘सॉफ्ट’ के बजाय ‘अनपोलोजेटिक’ (बिना किसी हिचक के) राजनीति का रास्ता चुना है। पार्टी ने इस बार यह समझ लिया है कि बंगाल में केवल जय श्री राम का नारा काफी नहीं है, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार और स्थानीय आक्रोश को संगठन की शक्ति से जोड़ना होगा।

बीजेपी के प्रचार का तरीका अब केवल रैलियों तक सीमित नहीं है। अमित शाह और नितिन नबीन के नेतृत्व में इस बार बूथ स्तर पर ‘पन्ना प्रमुखों’ की सक्रियता 2021 के मुकाबले तीन गुना अधिक देखी जा रही है। 2021 में बीजेपी पर आरोप लगा था कि वह चुनाव के अंत में थक गई थी, लेकिन 2026 के दूसरे चरण तक आते-आते बीजेपी की ऊर्जा कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही है। पार्टी ने इस बार टीएमसी के ‘खेला होबे’ का जवाब ‘सेवा और न्याय’ के नैरेटिव से दिया है।

तीसरा बड़ा बदलाव उम्मीदवारों के चयन में है। 2021 में जहाँ दलबदलुओं की भीड़ थी, वहीं 2026 में बीजेपी ने अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को तरजीह दी है। इससे पार्टी के भीतर का असंतोष कम हुआ है। साथ ही चुनाव प्रचार की भाषा में भी तीखापन बढ़ा है। अब बीजेपी रक्षात्मक नहीं है, बल्कि वह टीएमसी के गढ़ में घुसकर सवाल पूछ रही है। यह आक्रामकता केवल भाषणों में नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाइयों और सड़क पर होने वाले प्रदर्शनों में भी साफ झलक रही है।

‘घुसपैठिया बनाम भारतीय’ को बनाया राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत मुस्लिम समर्थन रहा है, जो राज्य की आबादी का लगभग 27-30% है। हालाँकि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा हमेशा से गरम रहा है, लेकिन 2026 में बीजेपी ने इसे ‘भारतीय बनाम बाहरी’ के एक नए फ्रेम में पेश किया है।

बीजेपी का सीधा आरोप है कि टीएमसी ने अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) को बदल दिया है। इस बार बीजेपी ने केवल ‘घुसपैठ’ की बात नहीं की, बल्कि आधार कार्ड के अवैध वितरण और मतदाता सूची में फर्जी नामों के शामिल होने को लेकर चुनाव आयोग में भी कड़ी घेराबंदी की है।

अमित शाह ने अपनी रैलियों में स्पष्ट रूप से कहा है कि घुसपैठ बंगाल के युवाओं के रोजगार और यहाँ के संसाधनों पर डाका डाल रही है। बीजेपी ने सीएए (CAA) के कार्यान्वयन को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया है, जिससे मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों में उसकी पकड़ और मजबूत हुई है। इसके साथ ही, पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया है कि टीएमसी ‘घुसपैठियों की संरक्षक’ है, जबकि बीजेपी ‘धरती के पुत्रों’ की रक्षक है।

इस रणनीति का एक और पहलू ‘आंतरिक सुरक्षा’ से जुड़ा है। बीजेपी ने सीमावर्ती जिलों में बढ़ते अपराधों और तस्करी को सीधे तौर पर घुसपैठ से जोड़कर स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना को संबोधित किया है। बीजेपी का तर्क है कि यदि बंगाल को ‘सोनार बांग्ला’ बनाना है, तो सबसे पहले इसकी सीमाओं को सुरक्षित करना होगा। यह मुद्दा विशेष रूप से उत्तर बंगाल और सीमावर्ती दक्षिण बंगाल में बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

हालाँकि बीजेपी को भारी मात्रा में मुस्लिम वोट मिलने की उम्मीद नहीं है, लेकिन यदि वह टीएमसी के वोट बैंक में 5-10% की भी सेंध लगा पाती है या उन्हें वोट देने से रोक पाती है, तो यह बीजेपी के लिए बड़ी जीत होगी। यह रणनीति विशेष रूप से उन जिलों में महत्वपूर्ण है जहाँ मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है।

अमित शाह का 15 दिवसीय ‘बंगाल डेरा’

2026 के चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का बंगाल में लगातार 15 दिनों तक रुकना है। आमतौर पर राष्ट्रीय नेता रैलियाँ करके लौट जाते हैं, लेकिन शाह ने कोलकाता को अपना अस्थायी मुख्यालय बना लिया है। यह कदम दर्शाता है कि बीजेपी के लिए बंगाल की जीत कितनी महत्वपूर्ण है। शाह का यहाँ रुकना केवल प्रचार के लिए नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर फीडबैक लेने और रणनीति को वास्तविक समय (Real-time) में बदलने के लिए है।

अमित शाह की मौजूदगी ने स्थानीय कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा भर दी है। जब देश का गृह मंत्री स्वयं गलियों में पदयात्रा करता है और छोटे-छोटे समूहों के साथ बैठकें करता है, तो इसका संदेश बहुत गहरा जाता है। शाह ने इस दौरान उन ‘साइलेंट’ मतदाताओं से संपर्क साधने की कोशिश की है जो टीएमसी के डर से खुलकर सामने नहीं आते थे। उनके इस 15 दिवसीय प्रवास ने टीएमसी के उस तंत्र को चुनौती दी है जो प्रशासन के दम पर चुनावों को प्रभावित करने का आरोप झेलता रहा है।

शाह ने इस दौरान ‘डैमेज कंट्रोल’ पर भी ध्यान दिया है। यदि किसी क्षेत्र में टिकट वितरण को लेकर नाराजगी थी, तो उन्होंने स्वयं उसे सुलझाया। इसके अलावा, उन्होंने बंगाल के बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ बैठकें करके बीजेपी की छवि को ‘बंगाल विरोधी’ होने से बचाया है। शाह का यह ‘मैराथन प्रवास’ टीएमसी के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन गया है, क्योंकि उन्हें अब हर दिन शाह द्वारा उठाए गए नए मुद्दों का जवाब देना पड़ रहा है।

योगी-हिमंता और 6 मुख्यमंत्रियों का ‘हिंदुत्व मोर्चा’

बीजेपी ने इस बार अपने प्रचार को धार देने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा सहित 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मैदान में उतारा है। योगी आदित्यनाथ की रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ यह बताने के लिए काफी है कि बंगाल में ‘कठोर शासन’ और ‘हिंदुत्व’ के मॉडल की कितनी मांग है। हिमंता बिस्वा सरमा ने विशेष रूप से घुसपैठ और ‘मिया मुस्लिम’ की राजनीति पर टीएमसी को घेरा है, जो असम के अनुभवों से मेल खाता है।

योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ और ‘बुलडोजर मॉडल’ का जिक्र कर बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया है। उनका संदेश साफ है- “जो उत्तर प्रदेश में हो सकता है, वह बंगाल में क्यों नहीं?” यह नैरेटिव उन मतदाताओं को आकर्षित कर रहा है जो राज्य में बढ़ती हिंसा और सिंडिकेट कल्चर से परेशान हैं। अन्य मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों की विकास गाथाओं को बंगाल के सामने रखकर यह बताने की कोशिश की है कि बीजेपी शासित राज्य विकास की दौड़ में बंगाल से आगे निकल चुके हैं।

इन मुख्यमंत्रियों की तैनाती से बीजेपी ने एक और लक्ष्य साधा है, वो है ‘पैन-इंडिया’ (अखिल भारतीय) उपस्थिति का अहसास कराना। यह दिखाना कि बंगाल की लड़ाई में पूरा भारत बीजेपी के साथ खड़ा है। हिमंता बिस्वा सरमा का आक्रामक अंदाज टीएमसी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के दावों की हवा निकाल रहा है, जबकि योगी आदित्यनाथ का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बंगाल के पारंपरिक हिंदू मतदाताओं को एकजुट कर रहा है।

बिना झिझक हिंदुत्व, अमित शाह का ‘बाबरी’ वाला बयान

इस चुनाव में बीजेपी ने अपनी हिंदुत्ववादी छवि को छिपाने की कोशिश नहीं की है। अमित शाह का एक हालिया बयान चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमें उन्होंने कहा कि “जब तक बीजेपी का एक भी कार्यकर्ता जीवित है, बंगाल में कोई बाबरी मस्जिद नहीं बनने दी जाएगी।” यहाँ ‘बाबरी मस्जिद’ एक रूपक (Metaphor) है, जिसका उपयोग शाह ने तुष्टिकरण और धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड लेने के लिए किया है।

यह बयान सीधे तौर पर उन इलाकों को टारगेट करता है जहाँ हिंदुओं को अपनी धार्मिक पहचान और पूजा-पाठ में बाधा आने की शिकायत रहती है। 2021 में बीजेपी जहाँ ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात अधिक कर रही थी, वहीं 2026 में वह ‘हिंदू हितों की रक्षा’ की बात अधिक मुखरता से कर रही है। अमित शाह के इस बयान ने ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है, जिससे बीजेपी का कोर वोटर रिचार्ज हो गया है।

बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने जैसी उपलब्धियों को बंगाल के गाँव-गाँव तक पहुँचाया है। पार्टी का तर्क है कि यदि केंद्र में बीजेपी हिंदुओं के गौरव को वापस ला सकती है, तो वह बंगाल में भी दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा को ‘बिना किसी डर’ के आयोजित करने का वातावरण सुनिश्चित करेगी। यह आक्रामक हिंदुत्व ही है जो बीजेपी को टीएमसी के ‘इमाम भत्ता’ जैसे तुष्टिकरण के कदमों के खिलाफ एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करता है।

बीजेपी के 15 संकल्प: विकास का रोडमैप

बीजेपी ने इस चुनाव के लिए एक विस्तृत घोषणापत्र जारी किया है जिसे ’15 संकल्प’ का नाम दिया गया है। इसमें राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उद्योग-धंधों को पुनर्जीवित करने का वादा किया गया है। 2021 के मुकाबले यह संकल्प पत्र अधिक शोध-आधारित और बंगाल की विशिष्ट समस्याओं (जैसे जूट उद्योग का पतन, चाय बागान श्रमिकों की समस्या) को संबोधित करने वाला है।

प्रमुख संकल्पों में राज्य कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग को तुरंत लागू करना, किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि के बकाया के साथ अतिरिक्त लाभ देना और ‘सिंडिकेट राज’ को खत्म करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन शामिल है। बीजेपी ने वादा किया है कि वह बंगाल को फिर से विनिर्माण (Manufacturing) का केंद्र बनाएगी ताकि यहाँ के युवाओं को काम के लिए बेंगलुरु या पुणे न जाना पड़े।

इसके साथ ही बीजेपी ने आयुष्मान भारत योजना को राज्य में लागू करने का संकल्प लिया है, जिसे ममता सरकार ने अब तक रोक रखा था। इन 15 संकल्पों के माध्यम से बीजेपी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि उसके पास केवल ‘नारे’ नहीं, बल्कि बंगाल के पुनर्निर्माण का एक ठोस ‘ब्लूप्रिंट’ भी है। यह विकासवादी चेहरा उन मध्यमवर्गीय और शहरी मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए है जो राजनीति में बदलाव के साथ-साथ स्थिरता भी चाहते हैं।

पीएम मोदी की 15 गारंटी में ‘आधी आबादी’ पर फोकस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार बंगाल की महिलाओं (जिन्हें टीएमसी का पारंपरिक समर्थक माना जाता है) के लिए ’15 गारंटी’ की घोषणा की है। ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना (जिसमें महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है) का मुकाबला करने के लिए मोदी ने इस राशि को बढ़ाकर 3000 रुपए करने और सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33% आरक्षण देने की गारंटी दी है।

पीएम मोदी ने अपनी रैलियों में “मेरी माताओं और बहनों” को संबोधित करते हुए यह याद दिलाया है कि केंद्र की उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और मुफ्त राशन का सबसे अधिक लाभ उन्हें ही मिला है। मोदी की गारंटी का मतलब है – भरोसा। बीजेपी का मानना है कि बंगाल की महिलाएँ अब केवल नकद सहायता से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे अपने बच्चों के लिए सुरक्षा और रोजगार भी चाहती हैं।

इस बार ‘साइलेंट वोटर’ यानी महिलाओं का रुझान बीजेपी की ओर बढ़ा है। इसके पीछे का एक बड़ा कारण राशन वितरण में भ्रष्टाचार और स्थानीय टीएमसी नेताओं का व्यवहार भी है। मोदी ने महिलाओं के सशक्तिकरण को अपनी प्राथमिकता बताकर ममता बनर्जी के ‘महिला मुख्यमंत्री’ होने के भावनात्मक लाभ को कम करने का प्रयास किया है। अगर इस चुनाव में महिला मतदाताओं का 10-15% हिस्सा भी बीजेपी की ओर झुकता है, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

आरजी कर कांड के बाद से महिला सुरक्षा का मुद्दा

अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई वीभत्स घटना ने पूरे बंगाल को हिलाकर रख दिया था। 2026 के चुनाव में यह मुद्दा एक बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा है। बीजेपी ने इसे केवल एक अपराध के रूप में नहीं, बल्कि ‘सिस्टम की विफलता’ और ‘अपराधियों के संरक्षण’ के रूप में पेश किया है। इस कांड के बाद हुए बड़े-बड़े नागरिक प्रदर्शनों और ‘रेक्लेम द नाइट’ जैसे अभियानों ने टीएमसी सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया है।

बीजेपी का आरोप है कि ममता सरकार ने सबूतों को मिटाने और दोषियों को बचाने की कोशिश की। रैलियों में आरजी कर की पीड़िता का जिक्र कर बीजेपी महिला मतदाताओं को यह एहसास करा रही है कि “दीदी के राज में कोई सुरक्षित नहीं है।” यह मुद्दा शहरी और शिक्षित क्षेत्रों में टीएमसी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है, जहाँ लोग शासन में जवाबदेही और सुरक्षा की माँग कर रहे हैं।

इस घटना ने डॉक्टरों, छात्रों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया है। बीजेपी ने इस आक्रोश को चुनावी मोड में बदलते हुए वादा किया है कि वह राज्य में ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ और महिला सुरक्षा के लिए ‘पैनिक बटन’ जैसी व्यवस्था लागू करेगी। आरजी कर कांड केवल एक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह टीएमसी के ‘कानून के शासन’ के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।

संदेशखाली में हिंदू-मुस्लिम समीकरण और TMC के स्थानीय मुस्लिम नेताओं का अत्याचार

उत्तर 24 परगना का संदेशखाली इलाका 2026 के चुनाव का एक और केंद्र बिंदु है। यहाँ की महिलाओं द्वारा टीएमसी नेताओं (जैसे शाहजहाँ शेख) पर लगाए गए यौन उत्पीड़न और जमीन हड़पने के आरोपों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया था। बीजेपी ने इस मुद्दे को ‘हिंदू पीड़ित बनाम कट्टरपंथी मुस्लिम समर्थक’ के रूप में फ्रेम किया है। संदेशखाली की घटनाओं ने यह संदेश दिया कि टीएमसी के स्थानीय नेता किस हद तक निरंकुश हो चुके हैं। शेख शाहजहाँ के खिलाफ 700 मामले दर्ज हो चुके हैं।

संदेशखाली की लड़ाई ने हिंदू मतदाताओं के भीतर के उस डर को जगाया है जो लंबे समय से दबा हुआ था। बीजेपी ने यहाँ की पीड़ित महिलाओं को सम्मान देने और उन्हें इंसाफ दिलाने का वादा करके पूरे राज्य में एक संदेश भेजा है। यह मुद्दा केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने बंगाल के ग्रामीण इलाकों में टीएमसी के खिलाफ एक माहौल तैयार किया है।

बीजेपी का तर्क है कि संदेशखाली की घटना टीएमसी के ‘वोट बैंक’ मॉडल का नतीजा है, जहाँ अपराधियों को धर्म और राजनीति का संरक्षण मिलता है। इस नैरेटिव ने उन इलाकों में बीजेपी को फायदा पहुँचाया है जहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। संदेशखाली ने हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को, जाति से ऊपर उठकर, अपनी सुरक्षा के लिए एकजुट होने का एक साझा मंच प्रदान किया है।

TMC की राजनीतिक हिंसा यानी ‘बम और बारूद’ की राजनीति पर घेराबंदी

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा एक दुखद वास्तविकता रही है, जिसे बीजेपी ने इस बार अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बीजेपी नेतृत्व का आरोप है कि टीएमसी चुनाव जीतने के लिए लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘बम, गोली और डराने-धमकाने’ की राजनीति पर भरोसा करती है। संदेशखाली से लेकर वीरभूम तक, हिंसा के पैटर्न को बीजेपी ने ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड’ (राज्य द्वारा प्रायोजित) बताया है। अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि बंगाल में ‘खेला होबे’ का असली अर्थ विपक्षी कार्यकर्ताओं की हत्या और उनके घरों को जलाना बन गया है।

दूसरे चरण के मतदान से पहले, बीजेपी ने उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है जहाँ ‘बाहुबलियों’ का दबदबा है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि टीएमसी के स्थानीय नेता मतदाताओं को डरा रहे हैं ताकि वे बूथ तक न पहुँचें। इस हिंसा के खिलाफ बीजेपी ने ‘सुरक्षा और लोकतंत्र की बहाली’ का नारा दिया है। पार्टी का तर्क है कि जब तक टीएमसी का ‘डर का साम्राज्य’ खत्म नहीं होगा, तब तक बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। आरजी कर कांड के बाद पुलिस प्रशासन की भूमिका पर उठे सवालों ने बीजेपी के इस आरोप को और बल दिया है कि शासन और अपराधी अब एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं।

मतदान का दूसरा चरण बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्यों?

बंगाल चुनाव का दूसरा चरण बीजेपी और टीएमसी दोनों के लिए अग्निपरीक्षा है। इस चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है, उनमें से कई ‘मुस्लिम बाहुल्य’ क्षेत्र हैं जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर। ऐतिहासिक रूप से ये इलाके टीएमसी और कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। यहाँ बीजेपी के लिए जीत हासिल करना पहाड़ चढ़ने जैसा है, लेकिन इस बार समीकरण थोड़े अलग हैं।

इन क्षेत्रों में टीएमसी को इस बार ‘त्रिकोणीय’ और ‘चतुष्कोणीय’ मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूँ कबीर जैसे नेताओं की सक्रियता ने मुस्लिम वोट बैंक में बिखराव की स्थिति पैदा कर दी है। इसके अलावा इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। बीजेपी को उम्मीद है कि यदि मुस्लिम वोट बंटते हैं, तो वह ध्रुवीकरण के सहारे इन ‘अभेद्य’ सीटों पर भी कमल खिला सकती है।

दूसरा चरण इसलिए भी कठिन है क्योंकि यहाँ चुनावी हिंसा की संभावना सबसे अधिक रहती है। इन क्षेत्रों में बूथ कैप्चरिंग और डराने-धमकाने की खबरें अक्सर आती हैं। बीजेपी ने चुनाव आयोग से इन इलाकों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की माँग की है। बीजेपी जानती है कि यदि उसने दूसरे चरण के ‘मुस्लिम बेल्ट’ में अपनी स्थिति सुधार ली, तो आगे की राह बहुत आसान हो जाएगी।

ऑपइंडिया का विश्लेषण समझाता है बदलते हुए मुस्लिम वोटिंग के पैटर्न को

ऑपइंडिया के एक लेख में हमने एक महत्वपूर्ण पैटर्न की ओर इशारा किया है। पहले मुस्लिम वोट बैंक का एकमात्र लक्ष्य ‘बीजेपी को हराना’ होता था, जिसके लिए वे सबसे मजबूत गैर-बीजेपी पार्टी (अक्सर टीएमसी) को एकमुश्त वोट देते थे। लेकिन अब रुझान बदल रहा है। महाराष्ट्र और बिहार की तरह बंगाल में भी मुस्लिम मतदाता अब अपनी ‘स्वयं की पहचान’ वाली कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों (जैसे AIMIM या ISF) की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

इस बदलाव के दो मुख्य कारण हैं: पहला, टीएमसी द्वारा किए गए वादों और हकीकत के बीच का अंतर। दूसरा, मुस्लिम युवाओं के भीतर यह भावना कि मुख्यधारा की पार्टियाँ केवल उनका इस्तेमाल करती हैं और उन्हें वास्तविक नेतृत्व नहीं देतीं। यदि बंगाल के मुस्लिम मतदाता टीएमसी को छोड़कर ओवैसी या हुमायूँ कबीर की ओर झुकते हैं, तो यह सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा पहुँचाएगा क्योंकि इससे टीएमसी का ‘विनिंग कॉम्बिनेशन’ टूट जाएगा।

बीजेपी इस बिखराव का चुपचाप इंतजार कर रही है। उसे पता है कि उसे इन वोटों को पाने की जरूरत नहीं है, बस इनका टीएमसी से दूर होना ही उसकी जीत का रास्ता साफ कर देगा। यह वही पैटर्न है जिसने यूपी में सपा-बसपा और बिहार में महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया था। यदि दूसरे चरण में यह पैटर्न जमीन पर उतरता है, तो टीएमसी का सबसे मजबूत किला ढह सकता है।

फिलहाल नतीजों का इंतजार

बंगाल चुनाव 2026 का दूसरा चरण केवल सीटों का चुनाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का फैसला करेगा कि बंगाल ‘तुष्टिकरण और हिंसा’ के रास्ते पर चलेगा या ‘विकास और सुरक्षा’ के। बीजेपी ने 2021 की गलतियों से सीखकर एक ऐसा ‘चक्रव्यूह’ रचा है जिसमें टीएमसी फंसी हुई नजर आ रही है।

वैसे भी पश्चिम बंगाल के इस महासमर का दूसरा चरण बीजेपी के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति है। जहाँ टीएमसी अपनी सत्ता बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं बीजेपी एक नए, विकसित और सुरक्षित बंगाल का सपना दिखाकर लोगों को साथ जोड़ रही है। आरजी कर कांड का गुस्सा, संदेशखाली का दर्द और मोदी की गारंटी बनाम ममता की लक्ष्मी भंडार इन सबके बीच बंगाल का आम आदमी खड़ा है।

क्या अमित शाह का 15 दिन का संघर्ष रंग लाएगा? क्या योगी-हिमंता का हिंदुत्व मॉडल बंगालियों को पसंद आएगा? या फिर ममता बनर्जी एक बार फिर अपने ‘फाइटर’ अंदाज से सबको चौंका देंगी? इन सभी सवालों के जवाब 4 मई को ईवीएम खुलने के साथ मिलेंगे। लेकिन एक बात साफ है कि साल 2026 का यह चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि बंगाल की आत्मा को फिर से परिभाषित करने की लड़ाई है।

भारत-न्यूजीलैंड FTA साइन, एक्सपोर्ट पर टैक्स खत्म-युवाओं को स्पेशल वीजा: जानें भारतीयों को होंगे इससे क्या-क्या फायदे

भारत और न्यूजीलैंड के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सोमवार (27 अप्रैल 2026) को औपचारिक हस्ताक्षर हो गए हैं। दोनों देशों ने मार्च 2025 में इस समझौते पर बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी और कई दौर की गहन वार्ताओं के बाद आखिरकार यह डील अंतिम रूप तक पहुँची। यह समझौता भारत की इंडो-पैसिफिक व्यापार रणनीति को मजबूत करेगा, वहीं न्यूजीलैंड के लिए दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करेगा।

इस FTA समझौते पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार और निवेश मंत्री टॉड मैकले की मौजूदगी में औपचारिक हस्ताक्षर होंगे। इससे पहले रविवार (26 अप्रैल 2026) को मंत्री पीयूष गोयल ने समझौते के बारे में बताते हुए कहा, “ये FTA दरवाजे और सोच दोनों खोलता है। उद्योग को सामान्य से परे सोचना होगा और समझौते के पूरे दायरे का उपयोग करना होगा।”

उन्होंने यह भी बताया कि इस FTA से दोनों देशों के व्यापार, निवेश और रोजगार को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। भारत के निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में कई उत्पादों पर शुल्क-मुक्त पहुँच मिलेगी, जिससे कृषि, वस्त्र, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र को फायदा होगा। वहीं न्यूजीलैंड की कंपनियों को भारत के विशाल उपभोक्ताओं वाले बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे।

10 सालों में हुआ भारत-न्यूजीलैंड के बीच FTA

दरअसल, भारत और न्यूजीलैंड के बीच इस FTA की नींव असल में 2010 में रखी गई थी, 9 दौर की बातचीत के बाद 2015 में इस बातचीत पर लगाम लग गई थी। फिर मार्च 2025 में FTA पर बातचीत को दोबारा शुरू किया गया, जब दोनों देशों ने औपचारिक रूप से FTA वार्ता शुरू करने की घोषणा की। इसके बाद कई चरणों में बातचीत हुई, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं, निवेश, डिजिटल व्यापार और पेशेवरों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। 10 महीने की लंबी बातचीत के बाद 22 दिसंबर 2025 में दोनों पक्ष प्रमुख शर्तों पर सहमत हुए और समझौते को अंतिम रूप दिया गया।

भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देगा और द्विपक्षीय व्यापार को बेहतर तरीके से बढ़ाएगा। फिलहाल भारत और न्यूजीलैंड के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1.7 अरब डॉलर (लगभग ₹14,100 करोड़) के आसपास है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। न्यूजीलैंड सरकार ने भी इसे अपने निर्यातकों, निवेशकों और सेवा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक अवसर बताया है।

समझौते से भारत को क्या होगा फायदा?

भारत-न्यूजीलैंड के बीच यह समझौता भारतीय कारोबार, निवेश और रोजगार के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि समझौता लागू होते ही भारत के सभी 8,284 निर्यात उत्पादों को न्यूजीलैंड के बाजार में 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री पहुँच मिल जाएगी। पहले भारतीय सामान पर औसतन 2.2 प्रतिशत शुल्क लगता था, जबकि करीब 450 उत्पादों पर यह 10 प्रतिशत तक पहुँच जाता था। अब यह पूरी तरह खत्म हो जाएगा, जिससे भारतीय उत्पाद वहाँ और सस्ते और प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

इसका सीधा लाभ टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर, इंजीनियरिंग गुड्स, केमिकल्स, इलेक्ट्रिकल्स, फूड प्रोसेसिंग और कृषि उत्पादों को मिलेगा। खासतौर पर आगरा के चमड़ा उद्योग को बड़ी राहत मिलेगा, क्योंकि यहाँ देश के करीब 75 प्रतिशत लेदर फुटवियर का उत्पादन होता है। लेदर और फुटवियर पर लगने वाला 5 प्रतिशत शुल्क अब शून्य हो जाएगा। वस्त्र, होम टेक्सटाइल, हैंडलूम और मैन-मेड फाइबर को भी तुरंत ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी।

फार्मा और मेडिकल डिवाइस सेक्टर के लिए भी यह समझौता बेहद अहम है। न्यूजीलैंड अब भारतीय कंपनियों के GMP और GCP प्रमाणन को मान्यता देगा। इससे बार-बार होने वाले निरीक्षण खत्म होंगे, लागत घटेगी और भारतीय दवाओं व मेडिकल उपकरणों को वहाँ तेजी से मंजूरी मिल सकेगी। इसके अलावा AYUSH- जैसे आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी को भी इस समझौते में विशेष मान्यता दी गई है।

साथ ही भारतीय पेशेवरों के लिए विशेष वीजा व्यवस्था की गई है। शुरुआती तीन वर्षों के लिए हर साल 1,667 अस्थायी रोजगार वीजा जारी किए जाएँगे और कुल 5000 भारतीय पेशेवर एक समय में इस योजना का लाभ उठा सकेंगे।

समझौते से न्यूजीलैंड को क्या होगा फायदा?

भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता न्यूजीलैंड के लिए बहुत बड़ा मौका है। इस समझौते के तहत भारत, न्यूजीलैंड से आने वाले करीब 95% सामान पर आयात शुल्क कम करेगा या पूरी तरह हटा देगा। इसमें कीवीफ्रूट, चेरी, ब्लूबेरी, एवोकाडो, वाइन, ऊन, लकड़ी, समुद्री उत्पाद, मनुका हनी और कोयला जैसे प्रमुख उत्पाद शामिल हैं। इनमें से कई उत्पादों को समझौता लागू होते ही भारत में बिना किसी शुल्क के प्रवेश मिल जाएगा। इससे न्यूजीलैंड की कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में कारोबार करना आसान और सस्ता हो जाएगा।

भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता बड़ा उपभोक्ता बाजार है। ऐसे में न्यूजीलैंड के किसानों, बागवानी कारोबारियों और खाद्य कंपनियों को 140 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ताओं तक पहुँच मिलेगी। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने इसे ‘पीढ़ियों में एक बार मिलने वाला अवसर’ बताया है। उनका कहना है कि इस समझौते से देश के कृषि, बागवानी, वाइन, समुद्री खाद्य और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को बड़ा फायदा होगा।

इसके अलावा, न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब डॉलर (लगभग ₹1,88,397 करोड़) निवेश करने की योजना बनाई है। यह निवेश बुनियादी ढाँचे, विनिर्माण, कृषि तकनीक, शिक्षा, पर्यटन और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इससे न्यूजीलैंड की कंपनियों को भारत में लंबे समय तक कारोबार बढ़ाने का मौका मिलेगा। कुल मिलाकर, यह समझौता न्यूजीलैंड के निर्यात, निवेश और रोजगार को नई रफ्तार देने वाला साबित हो सकता है।

कॉन्ग्रेस-सपा मीडिया सेल पर UP पुलिस ने किया केस, गाजीपुर में लड़की की मौत के बाद फैला रहे थे ‘रेप कर हत्या’ वाला झूठ: पढ़ें- FIR की पूरी डिटेल

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक युवती की आत्महत्या को लेकर विपक्षी राजनीतिक दल लगातार माहौल बिगाड़ने की कोशिश में लगे हैं। सपा से लेकर कॉन्ग्रेस तक विपक्ष दल बार-बार इस मुद्दे पर झूठे खबरों के सहारे भड़काने की कोशिश में लगे हैं। अब विपक्ष की इन्हीं कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए UP पुलिस ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। पुलिस ने कॉन्ग्रेस और सपा से जुड़े सपा मीडिया सेल के खिलाफ FIR दर्ज की है।

क्या है मामला?

गाजीपुर के करण्डा थाना क्षेत्र के कटारिया गाँव में 14 अप्रैल 2026 की रात निशा/नेहा विश्वकर्मा घर से लापता हो गई। CCTV में वह रात करीब 2 बजे अकेले गंगा पुल की ओर जाती दिखी। जाँच में पता चला कि वह अपने दोस्त हरिओम से मिलकर लौटी थी और घरवालों को पता चलने के डर से परेशान थी। सुबह करीब 5:30 बजे उसने अपने पिता को फोन करके आत्महत्या की बात कही और कुछ ही मिनट बाद गंगा नदी में कूद गई।

पुलिस को मौके से उसका मोबाइल, चप्पल और दुपट्टा मिला और पोस्टमार्टम में मौत का कारण डूबना बताया गया। हालाँकि, परिवार ने शुरुआत में आत्महत्या की बात कही लेकिन बाद में इसे हत्या बताया और केस दर्ज कराया। इस मामले में एक आरोपित गिरफ्तार भी हुआ है। बाद में मामला राजनीतिक बन गया और विपक्ष ने गैंगरेप-हत्या की बात कही लेकिन पुलिस का कहना है कि अब तक जाँच में रेप या हत्या के कोई सबूत नहीं मिले हैं और मामला आत्महत्या का ही लग रहा है। हालाँकि, राजनीतिक दल और नेता फिर भी अफवाह फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पर यूपी पुलिस ने की FIR

कॉन्ग्रेस ने इस मुद्दे पर योगी आदित्यनाथ को घेरने के लिए झूठ का खूब सहारा लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की लेकिन गाजीपुर पुलिस ने उनका फैक्ट चेक कर लोगों को सच्चाई दिखाई। हालाँकि, कॉन्ग्रेस फिर भी नहीं मानी और लगातार इस मुद्दे पर झूठ फैलाती रही और अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी में लिखा गया है, “कटरिया गाँव की घटना को लेकर विश्वकर्मा समाज की एक बेटी के साथ बलात्कार एवं निर्मम हत्या और FIR कराने से रोकने जैसी गलत टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर Congress (@INCIindia) की ओर की गई है। जिसको लेकर गाँव में तनाव का माहौल बना हुआ है।”

कॉन्ग्रेस के खिलाफ दर्ज FIR

सपा की मीडिया सेल के खिलाफ भी दर्ज हुआ केस

सिर्फ कॉन्ग्रेस ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा की मीडिया सेल के खिलाफ भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। सपा के मीडिया सेल पर भी मामले में लोगों को गुमराह करने का आरोप है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी में लिखा गया है, “कटरिया गाँव की घटना को लेकर विश्वकर्मा समाज की एक बेटी के साथ बलात्कार एवं निर्मम हत्या और FIR कराने से रोकने जैसी गलत टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर Samajwadi Party Media Cell (@mediacellsp) की ओर से की गई है। जिसको लेकर गाँव में तनाव का माहौल बना हुआ है।”

सपा के खिलाफ दर्ज FIR

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी व अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने जिस तरह इस संवेदनशील मामले को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया वह सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि समाज को भड़काने की सुनियोजित कोशिश दिखाई देती है। बिना सबूत के ‘गैंगरेप’ और ‘हत्या’ जैसे गंभीर आरोप उछालकर इन दलों ने न केवल लोगों को गुमराह किया बल्कि एक पूरे क्षेत्र में तनाव फैलाने का जोखिम भी खड़ा कर दिया है।

अब UP पुलिस की यह कार्रवाई साफ संकेत है कि झूठ और अफवाह के सहारे माहौल बिगाड़ने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। राजनीतिक फायदे के लिए ऐसी गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी न सिर्फ कानून व्यवस्था को चुनौती देती है बल्कि न्याय प्रक्रिया को भी कमजोर करती है और इसी पर अब सख्ती जरूरी हो गई है।

‘अंतरात्मा की आवाज’ के नाम केजरीवाल ने कोर्ट को दिखाई ‘पीठ’, बताया ‘गाँधी’ का रास्ता: समझें ये कदम कैसे न्यायपालिका को चोट पहुँचाने का है प्रयास

दिल्ली के शराब घोटाला मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अब उनके समक्ष व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से पेश नहीं होंगे।

पत्र में केजरीवाल ने क्या कहा?

केजरीवाल के अनुसार, यह फैसला उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर लिया। उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘सत्याग्रह’ का हवाला देते हुए लिखा कि जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, न्याय की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं, तो उसे अपनी अंतरात्मा के अनुसार कदम उठाना चाहिए, चाहे उसके परिणाम उसके खिलाफ ही क्यों न जाएँ।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अब इस केस में न तो खुद कोर्ट में पेश होंगे और न ही उनके वकील उनकी ओर से कोई दलील देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस निर्णय के संभावित कानूनी परिणामों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे चलकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जाने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।

जानिए क्या कहता है कानून?

अब यहाँ सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि कानून इस पूरे घटनाक्रम को किस नजरिए से देखता है। आज तक ने इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों से बातचीत की है और बताया है कि इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तामता ने विस्तार से कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

उनके अनुसार, जब किसी आरोपित को ट्रायल कोर्ट से राहत मिलती है, तब भी उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक बॉन्ड भरना होता है। यह बॉन्ड आमतौर पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 437A के तहत होता है, जिसमें आरोपित यह वादा करता है कि यदि हाई कोर्ट में अपील होती है, तो वह सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होगा।

इस मामले में भी केजरीवाल ने ऐसा बॉन्ड भरा है। मतलब वह कानूनी रूप से बाध्य हैं कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान उपस्थित रहें। यदि वह कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो यह बॉन्ड का उल्लंघन माना जाएगा और कोर्ट उनके खिलाफ पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है।

यदि इसके बावजूद भी वे पेश नहीं होते हैं, तो गैर-जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। कानून का एक और महत्वपूर्ण पहलू इस मामले में सामने आता है, जिसे ‘एकतरफा सुनवाई’ या Ex-Parte कहा जाता है। यदि कोई आरोपित कोर्ट में उपस्थित नहीं होता है, तो कोर्ट उसके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।

इसका मतलब यह होता है कि केवल जाँच एजेंसी या विरोधी पक्ष की दलीलें सुनी जाएँगी और आरोपित को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलेगा। यदि इस तरह की सुनवाई में फैसला जाँच एजेंसी के पक्ष में जाता है, तो ट्रायल कोर्ट का राहत देने वाला फैसला पलट सकता है और मामला दोबारा ट्रायल के लिए भेजा जा सकता है।

ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल को फिर से आरोपित के रूप में पेश होना पड़ सकता है और पूरी कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर शुरू हो सकती है।

अब जानिए क्या है पूरा मामला?

मामला दिल्ली सरकार की 2021-22 की शराब नीति से जुड़ा है, जिस पर आरोप लगे कि इसमें नियमों को बदलकर कुछ निजी पक्षों को फायदा पहुँचाया गया और भ्रष्टाचार हुआ। जाँच एजेंसियों ने इस केस में केजरीवाल समेत कई लोगों को आरोपित बनाया और लंबी जाँच के बाद मामला कोर्ट तक पहुँचा।

इस केस में 27 फरवरी 2026 को ट्रायल कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए केजरीवाल और अन्य आरोपितों को राहत दे दी। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट ने जाँच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए और जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश तक कर दी।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जाँच एजेंसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दाखिल कर दी। यह अपील जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के सामने आई। हाई कोर्ट ने सुनवाई के शुरुआती चरण में ट्रायल कोर्ट के कुछ निर्देशों पर रोक लगाई और मामले को आगे सुनने का निर्णय लिया।

यहीं से इस केस ने एक नया मोड़ लिया, क्योंकि अब यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा नहीं रह गया था, बल्कि हाईकोर्ट में पूरी प्रक्रिया फिर से खुलने की स्थिति बन गई थी।

अरविंद केजरीवाल के बेतुके माँग ने मोड़ा केस का रुख

इसी दौरान अरविंद केजरीवाल ने माँग की कि इस केस की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से हटाकर किसी दूसरी बेंच को दे दी जाए। इस माँग के पीछे उन्होंने ‘कन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं।

चूँकि इस केस में जाँच एजेंसी केंद्र सरकार के अधीन है और उसकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश होते हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित हो सकती है। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि किसी जज के रिश्तेदार वकालत करते हैं या किसी पैनल में हैं, यह नहीं माना जा सकता कि वह पक्षपाती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस तरह के आधार पर जज खुद को अलग करने लगें, तो न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा और हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की कोशिश करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी आरोपित या पक्षकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह तय करे कि उसका केस कौन सा जज सुनेगा।

जब उनकी यह माँग खारिज हो गई, तो इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को एक विस्तृत पत्र लिखा। यह पत्र इस पूरे विवाद का सबसे अहम हिस्सा बन गया है। इस पत्र में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस कोर्ट से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद नहीं रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट की कार्यवाही सख्त नियमों और प्रक्रियाओं के तहत चलती है। इसमें व्यक्तिगत असहमति के आधार पर कोर्ट में पेश न होना न केवल खुद के केस को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।

यदि केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते हैं, तो हाई कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, जिसमें वारंट जारी करना और एकतरफा सुनवाई शामिल है। वहीं यदि हाई कोर्ट जाँच एजेंसी की अपील को स्वीकार कर लेता है, तो मामला फिर से निचली अदालत में जा सकता है और कानूनी लड़ाई एक बार फिर नए सिरे से शुरू हो सकती है।

जानवरों की चर्बी-मांस से ‘घी’ बनाने वाला अनवर कुरैशी गिरफ्तार, MP के ढाबों-होटलों में करता था सप्लाई: भारी मात्रा में माल जब्त, पढ़ें- FIR में क्या लिखा है

मध्य प्रदेश के खंडवा में शुक्रवार (24 अप्रैल 2026) को पुलिस ने अनवर कुरैशी नाम के एक व्यक्ति को नकली घी बनाने और बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया। आरोप है कि कुरैशी जानवरों की चर्बी, हड्डियों और खाल का इस्तेमाल कर घी जैसी चीज तैयार करता था। यह अवैध यूनिट इमलीपुरा इलाके में बेगम पार्क के पास एक संकरी गली में चल रही थी।

कुरैशी के घर पर अधिकारी (फोटो साभार: दैनिक जागरण)

अधिकारियों को लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि वहाँ जानवरों को काटा जा रहा है और उनकी चर्बी, हड्डियों और खाल को प्रोसेस कर खाने-पीने की चीजों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जिला प्रशासन, नगर निगम, पशु चिकित्सा विभाग और पुलिस की एक संयुक्त टीम बनाई गई और मौके पर छापा मारा गया।

अधिकारियों को शक है कि कुरैशी यह नकली घी स्थानीय बाजार में खासकर ढाबों और रेस्टोरेंट्स में सप्लाई कर रहा था। छापे के दौरान टीम को जानवरों की खाल और हड्डियों से भरे बोरे मिले। इसके अलावा चर्बी जैसे पदार्थ से भरे ड्रम और कंटेनर भी बरामद किए गए। मौके से बड़ी मात्रा में कच्चा माल, तैयार तरल पदार्थ और घी जैसी सामग्री मिली।

9 ड्रम और 79 कंटेनर जब्त

सिटी मजिस्ट्रेट बजरंग बहादुर ने मीडिया को बताया कि मौके से 79 कंटेनर बरामद किए गए, जिनमें से हर एक में करीब 30 किलो संदिग्ध पदार्थ भरा हुआ था। इसके अलावा 200 किलो क्षमता वाले 9 बड़े ड्रम भी मिले, जो जानवरों की चर्बी से भरे थे। पशु चिकित्सा विभाग ने सैंपल लेकर जाँच के लिए लैब भेज दिए हैं।

कुरैशी के घर पर अधिकारी (फोटो साभार: दैनिक जागरण)

अधिकारियों का कहना है कि पहली नजर में यह सामग्री जानवरों की चर्बी लग रही है, लेकिन इसकी असली प्रकृति और इस्तेमाल की पुष्टि लैब रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।

FIR में क्या कहा गया है?

मामले की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। FIR के अनुसार, नगर निगम खंडवा के जोन प्रभारी की शिकायत पर मोगट रोड थाने में मामला दर्ज किया गया है। यह केस मध्य प्रदेश कृषि गोवंश संरक्षण अधिनियम की धारा 7 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 292 के तहत अनवर शेख बिस्मिल्लाह कुरैशी के खिलाफ दर्ज हुआ है।

साभार: खंडवा पुलिस, मध्य प्रदेश

SHO धरवाल ने बताया कि उन्हें नगर निगम की ओर से एक पत्र मिला था, जिस पर जोन प्रभारी जाकिर अहमद और भुवन श्रीमाली के हस्ताक्षर थे, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई।

शिकायत के अनुसार, सिटी मजिस्ट्रेट, सिटी सीएसपी, तहसीलदार, नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर, मोगट रोड थाने के SHO और अन्य अधिकारियों की टीम ने बेगम पार्क के सामने, परदेशीपुरा इलाके में संयुक्त निरीक्षण किया।

साभार: खंडवा पुलिस, मध्य प्रदेश

यह जगह अनवर कुरैशी की बताई गई, जहाँ वह अपने घर के अंदर जानवरों की चर्बी पिघला रहा था। मौके पर उसने नगर निगम का जो लाइसेंस दिखाया, वह किसी और के नाम पर था और उसकी वैधता 2023 में ही खत्म हो चुकी थी। इसके बावजूद वह चर्बी, खाल, सींग और अन्य जानवरों के अवशेषों का अवैध रूप से भंडारण और व्यापार कर रहा था।

छापे के दौरान अधिकारियों ने 15 किलो क्षमता के 69 टिन चर्बी, 200 लीटर क्षमता वाले 9 ड्रम जिनमें अज्ञात केमिकल था, 600 चमड़े के टुकड़े, भैंस या इसी तरह के जानवरों के 35 बोरे सींग और 6 बोरे पाइप जैसे हिस्से बरामद किए।

स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल, विधायक कंचन तंवे की प्रतिक्रिया

खंडवा CSP अभिराम वरांगे ने बताया कि आरोपित कुरैशी को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि यह कारोबार कब से चल रहा था और इसमें और कौन-कौन लोग शामिल हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय लोगों ने कई बार इस जगह को लेकर शिकायत की थी, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

लोगों का कहना है कि यहाँ जानवर लाए जाते थे, उन्हें काटा जाता था और उनकी चर्बी, हड्डियों और खाल को पकाकर प्रोसेस किया जाता था। छापे के बाद स्थानीय निवासियों ने सवाल उठाया कि इतनी लंबे समय तक यह काम बिना किसी रोक-टोक के कैसे चलता रहा।

घटना के बाद खंडवा की विधायक कंचन तंवे मौके पर पहुँचीं और इस मामले को बेहद गंभीर बताया। उन्होंने जिला प्रशासन से सख्त कार्रवाई की माँग की और दोषियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात कही।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘योगी बंदर, चायवाला मोदी, तड़ीपार शाह’: ‘गलीचपने’ में सईदा फलक निकली ओवैसी की उस्ताद, जानें कौन है हिजाब की वकालत और हिंदू देवताओं का अपमान करने वाली AIMIM नेता

असदुद्दीन ओवैसी की मजहबी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता आए दिन विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। कभी मुंब्रा की पार्षद सहर शेख खुलेमंच से पूरे इलाके को ‘हरा रंग‘ में रंगने का ख्वाब बुनती हैं, तो कभी असदु्द्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ‘15 मिनट के लिए पुलिस हटाने‘ की धमकी देती हैं। तो अब ताजा उदाहरण हैं सईदा फलक। ये देश के उच्च पदों पर बैठे नेताओं के लिए ‘गंदी भाषा’ का इस्तेमाल करती हैं।

सईदा फलक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपमानजनक टिप्पणी की है। मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए सईदा फलक अपमानजनक टिप्पणी करते यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। लोग सईदा फलक की इन अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

सईदा फलक ने पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी पर की अपमानजनक टिप्पणी

सामने आए वीडियो में AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘बंदर’ कहती है। सईदा ने कहा, “ये ‘बंदर’ योगी बंगाल में कहता है कि बंगाल को काबा नहीं बनने देंगे। ये क्या आपके बाप की जागीर है।” वे चेतावनी देते हुए कहती है, “इंशाल्लाह, कयामत तक हम दाढ़ी करेंगे, हिजाब पहनेंगे, टोपी पहनेंगे, अजान पढ़ेंगे, नमाज पढ़ेंगे, शरियत पर चलेंगे।”

असदुद्दीन ओवैसी की हिजाब पहनने वाली महिला को भारत का प्रधानमंत्री बनने वाले बयान का जिक्र करते हुए सईदा फलक ने आगे कहा, “जब ओवैसी ऐसा कहते हैं, तो सब कहते हैं कि ये गजवा-ए-हिंद की बात कर रहे हैं… क्यों नहीं बन सकते? जब कल का तड़ीपार आज होम मिनिस्टर बनकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, जो कल का चायवाला था वो प्राइम मिनिस्टर बनकर देश को बेच रहा है।” सईदा की इस अपमानजनक टिप्पणी पर मुस्लिम भीड़ जोर-जोर से हँस रही है और नारेबाजी कर रही है।

सईदा फलक के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की

AIMIM नेता सईदा फलक की पीएम मोदी, केंद्रीय मंत्री अमित शाह और सीएम योगी आदित्यनाथ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ लोगों ने कार्रवाई की माँग की है। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर लोग यूपी पुलिस, गृह मंत्रालय और योगी कार्यालय को टैग करते हुए कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

अमिताभ चौधरी नाम के ‘एक्स’ यूजर लिखते हैं, “AIMIM नेता सईदा फलक सीएम योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अमित शाह के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर रही है।
@Uppolice
@myogioffice @AmitShahOffice मामले में दखल दें।”

‘फाइटर 3.0’ नाम से यूजर कहते हैं, “आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन मर्यादा की सीमा लांघकर की गई टिप्पणी बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकती। सईदा फलक द्वारा योगी आदित्यनाथ और अमित शाह पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियाँ सीधे-सीधे राजनीतिक शालीनता पर सवाल उठाती हैं। सीधा संदेश: असहमति हो सकती है, लेकिन अभद्रता नहीं।”

वे आगे कहते हैं, “राजनीति में स्तर गिराकर नहीं, तर्क और काम के दम पर जवाब दिया जाता है। जरूरत है कि ऐसी भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया जाए, ताकि सार्वजनिक विमर्श की गरिमा बनी रहे और कोई भी नेता सीमाएँ पार करने की हिम्मत न करे। @Uppolice @myogioffice @AmitShahOffice

दीपक शर्मा नाम के यूजर लिखते हैं, “हैलो @Uppolice सईदा फलक हमारे CM योगीजी के लिए बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रही है। इस खुदीली खातून के खिलाफ कार्यवाही करें।”

कौन हैं सईदा फलक?

हैदराबाद की रहने वाली 31 साल की सईदा फलक कराटे की खिलाड़ी रह चुकी हैं। सईदा ने 20 राष्ट्रीय और 22 अंतरराष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप जीते हैं। वे तेलंगाना की पहली खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्ल्ड कराटे चैंपियनशिप और एशियाई कराटे चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई किया। खिलाड़ी के तौर पर सईदा की सबसे बड़ी उपलब्धि 2016 में यूएस ओपन कराटे चैंपियनिशिप और 2022 में दुबई के शोरिन काई कराटे कप में स्वर्ण पदक जीतकर हासिल की। इसके अलावा सईदा फलक पेशेवर तौर पर एक एडवोकेट भी हैं।

खेल में करियर बनाने के बाद सईदा ने राजनीति ज्वाइन की। साल 2020 में सईदा ने ओवैसी की पार्टी AIMIM का दामन थाम लिया। तभी से वह AIMIM की विचारधारा का प्रचार करते नजर आती हैं। AIMIM ज्वाइन करने के बाद सईदा फलक की एक अलग पहचान बनी। सईदा को बुर्के में भड़काऊ भाषण देते देखा गया, जो सीधे नेताओं को टारगेट कर बोलती हैं, इसीलिए उन्हें ‘लेडी ओवैसी’ भी कहा जाने लगा।

सईदा फलक का हिजाब पर समर्थन और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान को लेकर

सईदा फलक एक तरफ हिजाब पहनने का समर्थन करती हैं और दूसरी तरफ महिलाओं की आवाज बुलंद करने के लंबे-लंबे भाषण देती हैं। यही वजह है कि सईदा को उनके ही भाषणों के लिए कई बार घेरा जा चुका है। 4 साल पहले न्यूज 18 की डिबेट में सईदा फलक ने कहा कि ‘मदरसों में लड़कियों को हिजाब की अहमियत समझाई जाएगी’, तब होस्ट अमन चोपड़ा ने उनसे सवाल किया, “आप भी हिजाब नहीं पहनती थी।” तो सईदा ने इसे विकल्प बताया, लेकिन अगली ही लाइन में इसे इस्लाम में जरूरी बताया, जिसके बाद वे टीवी डिबेट में घिरती नजर आईं।

और जब अकबरुद्दीन ओवैसी ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हुए कहा था, “कई इन लोगों के खुदा हैं। वो क्या-क्यो जो पूजा करते हैं। कितने राम-लक्ष्मण-दुर्गा क्या क्या है? हर 8 दिन में एक नया पैदा हो जाता है। अब हनुमान जयंती आ गई, लक्ष्मू मालूम थी और अब भाग्य लक्ष्मी आ गई।” तब सईदा फलक ने न्यूज 18 के साथ डिबेट में अकबरुद्दीन ओवैसी का बचाव किया था।

पहले भी सीएम योगी पर की अभद्र टिप्पणी, जानिए पुराने विवादित बयान

सईदा फलक को यूँ ही AIMIM में ‘लेडी ओवैसी’ नहीं कहा जाता है बल्कि उनके बयान भी ओवैसी से मिलते जुलते हैं। सईदा फलक कभी-भी मंच से किसी भी नेता को धमकी दे देती हैं, कभी किसी के लिए अपमानजनक भाषा इस्तेमाल करती हैं।

वे पहले भी सीएम योगी के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुकी हैं, “उनका (सीएम योगी) खुद का नाम पहले अजय बिष्ट था, नाम बदलकर योगी आदित्यनाथ रख लिया। तो बेहतर यह होगा कि एक बार फिर से वो अपना नाम बदलकर नाम बदलने वाला बंदर रख लें।”

हाल ही में बिहार चुनाव और मुंबई के BMC चुनावों में भी सईदा फलक के कई विवादित बयान सामने आए थे। किशनगंज में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए सईदा शेख ने पीएम मोदी और सीएम योगी को ‘छोटा शैतान‘ कहा था। वहीं BMC चुनावों में महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस को चुनौती देते हुए सईदा ने कहा था, “सुन लो फडणवीस, अगर अल्लाह ने चाहा तो एक दिन इसी नकाब और हिजाब को पहनकर एक मुस्लिम औरत हिंदुस्तान की प्राइम मिनिस्टर बनेगी।”

AIMIM नेताओं की ‘गलीचपने’ की रही पृष्ठभूमि

अब सईदा शेख की इन अपमानजनक टिप्पणियों को सुनने के बाद ज्यादा हैरानी भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि ये उसी पार्टी की नेता हैं, जिसमें सहर शेख और अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे नेता शामिल हैं। और यही AIMIM की पहचान है, कि देश के प्रधानमंत्री और प्रशासन को सीधी ‘गाली’ या ‘धमकी’ देकर चर्चा में आओ और फिर खुद को बड़ा नेता बनाओ। इन सभी नेताओं से ऐसे बयान करने की उम्मीद भी है, क्योंकि इनके मुखिया असदु्द्दीन ओवैसी ही आए दिन हिंदू-विरोधी और कट्टर बयान देते नजर आते हैं और मंच के सामने बैठी कौम इसपर ठहाके मारकर हँसती है।

कनाडा में SMS ब्लास्टर तकनीक से साइबर ठगी का खुलासा, फर्जी मोबाइल टावर से हजारों लोगों को बनाया शिकार: जानें भारत जैसे देश के लिए ये कितना बड़ा खतरा

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है। बैंकिंग से लेकर शॉपिंग, OTP से लेकर पर्सनल बातचीत सब कुछ इसी एक डिवाइस पर निर्भर है।

लेकिन अब साइबर अपराधियों ने इस भरोसेमंद सिस्टम को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है। कुछ समय पहले कनाडा में टोरन्टो पुलिस सर्विस ने एक ऐसे हाई-टेक साइबर फ्रॉड का खुलासा किया है, जिसने पूरी दुनिया के एक्सपर्ट्स को चौंका दिया है।

इस मामले में SMS ब्लास्टर नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जो एक नकली मोबाइल टावर की तरह काम करती है। आरोपित इस डिवाइस को कार में लेकर शहर में घूमते थे और जहाँ भी भीड़ होती, वहाँ यह फर्जी टावर एक्टिव कर देते थे।

जैसे ही आसपास के मोबाइल फोन इस नेटवर्क से जुड़ते है, लोगों को फर्जी SMS मिलने लगते है, जो दिखने में बिल्कुल असली लगते थे जैसे बैंक, सरकारी संस्था या किसी सर्विस प्रोवाइडर के नाम से।

इन मैसेज में दिए लिंक पर क्लिक करते ही यूजर्स का पर्सनल और बैंकिंग डेटा चोरी हो जाता था। पुलिस के मुताबिक, इस ऑपरेशन के दौरान 13 मिलियन से ज्यादा नेटवर्क डिसरप्शन हुए और हजारों लोग प्रभावित हुए।

यह सिर्फ एक देश का मामला नहीं, बल्कि एक ऐसा खतरा है जो तेजी से पूरी दुनिया में फैल रहा है और अब भारत जैसे देशों के लिए भी बड़ा अलार्म बन चुका है।

कनाडा में पहली बार सामने आया SMS ब्लास्टर केस

कनाडा में इस तरह का यह पहला मामला है, जिसने साइबर सिक्योरिटी सिस्टम की कमजोरियों को सामने ला दिया है। पुलिस ने इस पूरे ऑपरेशन को  प्रोजेक्ट लाइट्हाउस नाम दिया। जाँच की शुरुआत नवंबर 2025 में हुई, जब अधिकारियों को डाउनटाउन टोरंटो में एक संदिग्ध डिवाइस के बारे में जानकारी मिली।

धीरे-धीरे जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि यह कोई साधारण डिवाइस नहीं, बल्कि एक मोबाइल SMS ब्लास्टर है, जिसे कार के अंदर छिपाकर चलाया जा रहा था। इससे आरोपित आसानी से लोकेशन बदलते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों को निशाना बना रहे थे।

इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी उम्र 21 से 27 साल के बीच है। इन पर धोखाधड़ी, कंप्यूटर सिस्टम में हस्तक्षेप और लोगों की जान को खतरे में डालने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। पुलिस का कहना है कि यह एक संगठित साइबर क्राइम था, जो लंबे समय से चल रहा था।

क्या है SMS ब्लास्टर और कैसे करता है काम

अगर आसान भाषा में समझें, तो SMS ब्लास्टर एक नकली मोबाइल टावर है। तकनीकी तौर पर इसे IMSI कैचर भी कहा जाता है। इसका काम असली टावर की तरह सिग्नल देना और आसपास के मोबाइल फोन को अपनी तरफ खींचना होता है।

हमारा फोन हमेशा उसी नेटवर्क से जुड़ता है, जहाँ सिग्नल सबसे ज्यादा मजबूत होता है। स्कैमर्स इसी बात  का फायदा उठाते हैं। वे एक ऐसा डिवाइस तैयार करते हैं, जो असली टावर से भी ज्यादा स्ट्रॉन्ग सिग्नल देता है।

SMS ब्लास्टर (सोर्स – CBC)

जैसे ही आपका फोन इस फर्जी टावर से कनेक्ट होता है, वह असली नेटवर्क से कट जाता है और स्कैमर के कंट्रोल में आ जाता है। इसके बाद आपके फोन पर सीधे SMS भेजे जाते हैं। ये मैसेज इतने असली लगते हैं कि यूजर को शक ही नहीं होता।

कैसे हजारों लोगों को बनाया जाता है शिकार

इस स्कैम की सबसे बड़ी ताकत इसका दायरा और तेजी है। यह कोई ऐसा फ्रॉड नहीं है जिसमें एक-एक करके लोगों को कॉल या मैसेज किया जाता है, जैसा हम हर दिन अपने आस-पास देखते है।

फर्जी फोन कॉल जिसमें कभी बैंक अकाउंट बंद होने के नाम पर OTP माँगा जाता है,काभी ATM कार्ड को अनब्लॉक करने के नाम पर OTP के बहाने पैसे ट्रैन्स्फर कर लिए जाते है, जैसा हुमने जामतारा  सीरीज में देखा है।

लेकिन अगर बात SMS ब्लास्टर की करे तो यह एक साथ सैकड़ों-हजारों मोबाइल फोन को टारगेट कर सकता है। स्कैमर्स इसके लिए खासतौर पर भीड़भाड़ वाले इलाके चुनते हैं, जैसे मॉल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, बाजार, धार्मिक स्थल या बड़े इवेंट। वजह साफ है जितनी ज्यादा भीड़, उतने ज्यादा फोन एक साथ उनके जाल में फंस सकते हैं।

ये लोग अपने SMS ब्लास्टर डिवाइस को कार, बैग या किसी बॉक्स में छिपाकर रखते हैं। जैसे ही डिवाइस ऑन होता है, यह आसपास के मोबाइल फोन को अपने नेटवर्क से जोड़ना शुरू कर देता है।

चूँकि फोन हमेशा सबसे मजबूत सिग्नल से जुड़ता है, इसलिए वह असली टावर छोड़कर इस फर्जी टावर से कनेक्ट हो जाता है। इसके बाद स्कैमर्स उन सभी यूजर्स को एक साथ फर्जी SMS भेजते हैं।

टोरंटो केस में सामने आया कि हजारों फोन इस नेटवर्क से जुड़े और 13 मिलियन से ज्यादा बार नेटवर्क को लेकर समस्या का सामना करना पड़ा। इसका मतलब यह है कि एक ही डिवाइस से लंबे समय तक लगातार बड़े पैमाने पर हमला किया जा सकता है। कई बार लोग समझ ही नहीं पाते कि उनके फोन के साथ क्या हो रहा है और अनजाने में वे फ्रॉड का शिकार बन जाते हैं।

2G नेटवर्क कैसे है सबसे बड़ी कमजोरी

इस पूरे फ्रॉड का असली खेल 2G नेटवर्क पर निर्भर करता है। आमतौर पर आजकल ज्यादातर लोग 4G या 5G नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जो ज्यादा सुरक्षित होते हैं और इनमें बेहतर एन्क्रिप्शन होता है।

लेकिन SMS ब्लास्टर एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करता है जिसे ‘साइलन्ट डाउन्ग्रैड 2G’ कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि आपका फोन बिना आपको बताए 4G/5G से हटकर 2G नेटवर्क पर शिफ्ट हो जाता है।

2G नेटवर्क में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें सिक्योरिटी सिस्टम बहुत पुराना और कमजोर है। इसमें फोन और टावर के बीच मजबूत ऑथेंटिकेशन नहीं होता, जिससे स्कैमर्स आसानी से बीच में घुस सकते हैं। कई मामलों में एन्क्रिप्शन या तो बहुत कमजोर होता है या बिल्कुल नहीं होता, जिसे नल साइफर कहा जाता है।

जब आपका फोन इस 2G नेटवर्क पर आ जाता है, तो स्कैमर्स को आपके डिवाइस से कम्युनिकेशन कंट्रोल करने का मौका मिल जाता है। वे मैसेज भेज सकते हैं, डेटा इंटरसेप्ट कर सकते हैं और आपको पता भी नहीं चलता। यही वजह है कि भले ही आपके पास नया स्मार्टफोन हो लेकिन अगर वो 2G सपोर्ट करता है, तो आप इस फ्रॉड के दायरे में आ सकते हैं।

क्यों इतना खतरनाक है ये फ्रॉड

यह स्कैम बाकी साइबर फ्रॉड से इसलिए अलग और ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह सीधे नेटवर्क लेवल पर काम करता है। आमतौर पर फ्रॉड में यूजर से कोई गलती करवाई जाती है, जैसे लिंक पर क्लिक करना, ऐप डाउनलोड करना या कॉल पर जानकारी देना। लेकिन यहाँ मामला उल्टा है। आपका फोन खुद ही फर्जी नेटवर्क से जुड़ जाता है और आपको पता भी नहीं चलता कि आप खतरे में हैं।

इस फ्रॉड में टेलीकॉम कंपनियाँ भी ज्यादा मदद नहीं कर पातीं, क्योंकि जो मैसेज भेजे जा रहे हैं, वे उनके नेटवर्क से होकर नहीं गुजरते। यानी न तो उन्हें ट्रैक किया जा सकता है और न ही आसानी से ब्लॉक किया जा सकता है।

इसके अलावा ये मैसेज देखने में बिल्कुल असली लगते हैं जैसे बैंक, सरकारी विभाग या किसी बड़ी कंपनी के नाम से। ऐसे में यूजर आसानी से भरोसा कर लेता है और लिंक पर क्लिक कर देता है।

सोर्स – BBC

इसके बाद उसका बैंकिंग डेटा, OTP, पासवर्ड या अन्य पर्सनल जानकारी चोरी हो सकती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये सब चुपचाप होता है कि यूजर को काफी देर तक पता ही नहीं चलता कि उसके साथ फ्रॉड हो चुका है।

पब्लिक सेफ्टी के लिए भी है बड़ा खतरा

इस तकनीक का खतरा सिर्फ पैसों की ठगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर समस्या बन सकता है। जब आपका फोन फर्जी टावर से जुड़ जाता है, तो वह असली मोबाइल नेटवर्क से कट जाता है। इसका सीधा असर यह होता है कि आप कॉल या इंटरनेट का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते।

सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस दौरान इमरजेंसी सेवाएँ भी प्रभावित हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में फंस जाए जहाँ उसे तुरंत पुलिस, एंबुलेंस या फायर ब्रिगेड को कॉल करना हो, तो वह ऐसा नहीं कर पाएगा।

पुलिस के मुताबिक, नेटवर्क डिसरप्शन कुछ सेकंड से लेकर कई मिनट तक हो सकता है। अब सोचिए अगर किसी सड़क दुर्घटना, मेडिकल इमरजेंसी या किसी खतरे के समय आपका फोन नेटवर्क ही काम न करे, तो हालात कितने गंभीर हो सकते हैं। यही वजह है कि इसे सिर्फ साइबर फ्रॉड नहीं, बल्कि पब्लिक सेफ्टी का भी बड़ा खतरा माना जा रहा है।

स्कैमर्स के लिए क्यों फायदेमंद है यह तकनीक

SMS ब्लास्टर स्कैमर्स के लिए एक बेहद प्रभावी और फायदेमंद टूल बन चुका है। सबसे पहली बात, इसमें भेजे गए मैसेज लगभग 100% लोगों तक पहुँचते हैं। क्योंकि ये मैसेज सीधे फोन में जाते हैं, टेलीकॉम नेटवर्क इन्हें ब्लॉक नहीं कर पाता।

दूसरी बड़ी बात, इसकी लागत ज्यादा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसे डिवाइस 5000 से 10000 डॉलर यानि (लगभग 4-8 लाख रुपए) में मिल जाते हैं।

तीसरी और सबसे खतरनाक बात यह है कि स्कैमर्स इसमें अपने हिसाब से मैसेज तैयार कर सकते हैं। वे ऐसे मैसेज बनाते हैं जो बिल्कुल असली लगते हैं, जैसे आपका बैंक अकाउंट बंद होने वाला है, KYC अपडेट करें या बिजली बिल बकाया है।

ऐसे मैसेज लोगों में डर और घबराहट का माहौल बनाते हैं, जिससे वे बिना सोचे-समझे लिंक पर क्लिक कर देते हैं। कम लागत, ज्यादा पहुँच और पकड़ में न आने की वजह से यह तकनीक साइबर अपराधियों के लिए एक परफेक्ट हथियार बनती जा रही है।

भारत में क्या है स्थिति और खतरा

भारत में यह खतरा और भी ज्यादा गंभीर हो सकता है, क्योंकि यहाँ कई ऐसे फैक्टर हैं जो इस तरह के स्कैम को आसान बना देते हैं। सबसे पहला कारण है 2G नेटवर्क की मौजूदगी। भले ही शहरों में 4G और 5G आ चुका है, लेकिन देश के कई हिस्सों में अभी भी 2G नेटवर्क चलता है, जो इस तरह के हमले के लिए सबसे कमजोर कड़ी है।

दूसरा बड़ा कारण है भारत की विशाल आबादी और मोबाइल यूजर्स की संख्या। करोड़ों लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं, जिससे स्कैमर्स को एक बड़ा टारगेट बेस मिल जाता है।

तीसरा कारण है डिजिटल पेमेंट का तेजी से बढ़ता चलन। UPI, नेट बैंकिंग और मोबाइल वॉलेट के कारण लोग सीधे अपने फोन से पैसे का लेन-देन करते हैं, जिससे फ्रॉड का खतरा और बढ़ जाता है।

ऐसे में टेलीकॉम रेग्यलटोरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया और साइबर एजेंसियों के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन सकती है कि वे इस नई तकनीक से कैसे निपटें।

भारत में सामने आ चुके ऐसे मामले

भारत में भी इस तरह के साइबर फ्रॉड के मामले सामने आने लगे हैं, जो यह दिखाते हैं कि खतरा अब हमारे करीब पहुँच चुका है। हाल के महीनों में दिल्ली, नोएडा और चंडीगढ़ जैसे शहरों में एजेंसियों ने छापेमारी कर ऐसे नेटवर्क पकड़े हैं, जो बड़े पैमाने पर फर्जी SMS भेज रहे थे।

इसी तरह हैदराबाद के साइबराबाद इलाके में पुलिस ने एक बड़े गैंग का पर्दाफाश किया, जिसमें कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। ये लोग विदेशी नेटवर्क से जुड़े थे और लोगों को फर्जी बैंक मैसेज और ट्रेडिंग ऑफर भेजकर ठग रहे थे।

सरकारी आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। 2024 से 2025 के बीच साइबर फ्रॉड के मामलों में करीब 300% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं 2025 में लोगों को करीब 30000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है और SMS ब्लास्टर जैसी तकनीक इसे और खतरनाक बना सकती है।

कैसे पहचानें कि आप टारगेट हो सकते हैं

यह स्कैम काफी एडवांस है, फिर भी कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिनसे आप सतर्क हो सकते हैं। सबसे पहला संकेत है आपके फोन का अचानक 4G या 5G से 2G नेटवर्क पर आ जाना। अगर ऐसा बिना किसी वजह के होता है, तो यह एक चेतावनी हो सकती है।

दूसरा संकेत है एक साथ कई संदिग्ध मैसेज आना। अगर आपको लगातार बैंक, बिजली, KYC या डिलीवरी से जुड़े मैसेज मिलने लगें, तो सावधान हो जाना चाहिए।

तीसरा संकेत है मैसेज की भाषा। अगर उसमें जल्दी करने का दबाव हो जैसे अभी क्लिक करें, तुरंत अपडेट करें या वरना अकाउंट बंद हो जाएगा तो यह स्कैम हो सकता है। इन संकेतों को पहचानकर आप खुद को समय रहते बचा सकते हैं।

कैसे रखें खुद को सुरक्षित

इस तरह के खतरे से बचने के लिए सबसे जरूरी है सतर्क रहना। सबसे पहले किसी भी अनजान या संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से बचें, चाहे वह कितना भी असली क्यों न लगे। दूसरा कभी भी OTP, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी किसी के साथ शेयर न करें। कोई भी असली बैंक या संस्था SMS के जरिए आपसे ऐसी जानकारी नहीं माँगती।

तीसरा अगर आपके फोन में ऑप्शन हो तो 2G नेटवर्क को बंद कर दें। इससे इस तरह के हमले का खतरा कम हो सकता है। इसके अलावा हमेशा किसी भी मैसेज की पुष्टि ऑफिशियल ऐप या वेबसाइट से करें। अगर शक हो, तो सीधे संबंधित कंपनी या बैंक से संपर्क करें।

SMS ब्लास्टर जैसी तकनीक यह साफ दिखाती है कि साइबर अपराध अब एक नए स्तर पर पहुँच चुका है। पहले जहाँ स्कैम सिर्फ कॉल या लिंक तक सीमित था, अब यह सीधे मोबाइल नेटवर्क को निशाना बना रहा है।

‘तिलक-चंदन नहीं लगा पाएँगे पुलिसकर्मी’: बिहार DGP के बयान पर मचा बवाल, जानिए- ‘तिलक’ से जुड़े पुराने विवाद और क्या कहते हैं नियम

बिहार में पुलिस विभाग को लेकर राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार के एक बयान के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है। दरअसल, DGP विनय कुमार ने पूरे पुलिस महकमे को सख्त हिदायत देते हुए कहा है कि ड्यूटी के दौरान वर्दी में माथे पर तिलक, चंदन का टीका या किसी भी तरह के धार्मिक चिह्न लगाने की अनुमति नहीं होगी। उन्होंने इसे पुलिस मैनुअल के खिलाफ बताया है और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी है।

क्या है DGP का पूरा आदेश?

डीजीपी विनय कुमार ने स्पष्ट किया कि पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान निर्धारित ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि पुलिस की वर्दी में टोपी और बेल्ट पहनना अनिवार्य है बिना इनके ड्यूटी करने वाले पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई होगी।

इसके साथ ही आदेश में साफ कहा गया कि ड्यूटी के दौरान किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या धार्मिक पहचान दिखाना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा। महिला पुलिसकर्मियों के लिए भी ड्यूटी के दौरान अत्यधिक श्रृंगार पर रोक लगाई गई है। इन निर्देशों का मकसद पुलिस बल में एकरूपता और पेशेवर छवि बनाए रखना बताया गया है।

DGP का एक वीडियो भी सामने आया है जिसमें वह तिलक ना लगाने की बात करते दिख रहे हैं। DGP ने कहा, “वर्दी पहनकर आप टीका चंदन नहीं लगा सकते हैं। यदि आप लगा रहे हैं तो एक सेकेंड के लिए लगाकर उसको हटा दीजिए। वर्दी अगर आपने पहनी है तो आप दसों उँगलियों में अंगूठी नहीं पहन सकते हैं।”

उन्होंने कहा, “वर्दी के साथ किसी भी प्रकार का अलंकरण वर्जित है।” वो बताते हैं कि महिलाओं के लिए जो आदेश निकाला गया था उसमें वर्दी के साथ महिलाओं के आभूषण पहनने पर भी रोक लगाई गई थी।

DGP के बयान पर भड़के हिंदू संगठन

डीजीपी विनय कुमार के इस बयान पर हिंदू संगठन और कई अन्य लोग भड़क गए हैं। विश्वामित्र सेना ने इस आदेश पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार चौबे ने कहा कि चंदन-तिलक सनातन परंपरा और आस्था का प्रतीक है और इसे वर्दी के साथ जोड़कर प्रतिबंधित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहां हर नागरिक को अपनी धार्मिक पहचान और आस्था व्यक्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में किसी विशेष धार्मिक प्रतीक पर रोक लगाने का प्रयास संविधान की भावना के विपरीत है। विश्वामित्र सेना ने बिहार सरकार से माँग की है कि इस मामले में तत्काल स्थिति स्पष्ट की जाए। संगठन ने चेतावनी दी कि यदि इन निर्देशों को वापस नहीं लिया गया तो व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।

इस मामले पर सत्तारूढ़ बीजेपी के नेता भी DGP के बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। पूर्व विधायक और भाजपा नेता हरिभूषण ठाकुर ‘बचौल’ ने DGP के इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा बताया है। उन्होंने कहा, “DGP ने कहा है कि कोई भी चंदन लगाकर पुलिस की ड्यूटी पर नहीं आएगा। तो फिर कोई भी बुर्का पहनकर, मूँछ छिलाकर या लंबी दाढ़ी रखकर भी पुलिस ड्यूटी में नहीं आना चाहिए। यही लोकतंत्र का असली तकाजा है।”

इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी लोग इस बयान पर नाराजगी जता रहे हैं। एक यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘क्या बिहार पुलिस की ईमानदारी तिलक से तय होती है? क्या भ्रष्टाचार चंदन लगाकर आता है? क्या अपराधी तिलक देखकर बच जाते हैं?” इसके अलावा भी अन्य यूजर्स ने तीखी सवाल उठाए हैं।

DGP-सरकारी कर्मियों के तिलक पर नया नहीं बिहार में विवाद

यह पहली बार नहीं है जब बिहार में सरकारी वर्दी या दफ्तर में तिलक को लेकर बवाल मचा हो। 2007 में बिहार के कृषि विभाग के उप-निदेशक लक्ष्मण मिश्रा को कार्यालय में माथे पर तिलक लगाने के कारण निलंबन की सिफारिश का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा था कि वे 30 साल से तिलक लगाते आए हैं और यह उनका धार्मिक अधिकार है। उस समय पूरे कृषि विभाग के कर्मचारी अगले दिन तिलक लगाकर दफ्तर पहुँचे थे और तत्कालीन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने भी कहा था कि किसी को तिलक लगाने के कारण निलंबित नहीं किया जाना चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि 2009 में यही विवाद उलटा भी हो चुका है यानी तिलक लगाने वाला खुद DGP था। तब बिहार के पुलिस महानिदेशक आनंद शंकर ड्यूटी के दौरान माथे पर चंदन का तिलक लगाकर दफ्तर आते थे और इसी को लेकर बिहार पुलिसमेन एसोसिएशन ने उन पर निशाना साधा था। एसोसिएशन अध्यक्ष जितेंद्र नारायण सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि DGP का यह आचरण पुलिस मैनुअल की धारा 1061 का उल्लंघन है जो किसी भी पुलिस अधिकारी को ड्यूटी के दौरान तिलक या टीका लगाने से मना करती है।

यानी बिहार में तिलक का यह विवाद न नया है, न एकतरफा। कभी एक कर्मचारी को तिलक लगाने पर निलंबन की धमकी मिली, कभी खुद DGP पर तिलक लगाने के लिए सवाल उठे और अब एक बार फिर DGP ने ही तिलक पर रोक का फरमान जारी किया है। पुलिस मैनुअल की धारा 1061 हर बार बीच में आती है लेकिन उसे लागू करना हमेशा राजनीतिक और सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता रहा है।

2025 में मंगलसूत्र पर भी लगाई गई थी रोक

बिहार पुलिस मुख्यालय के ADG (विधि-व्यवस्था) पंकज दारद ने जुलाई 2025 में एक सर्कुलर जारी कर महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के दौरान झुमका, नथिया, चूड़ियां, कंगन, मंगलसूत्र और अन्य भारी गहने पहनने से पूरी तरह मना किया था। इसके साथ ही चटख रंग का लिप बाम और अत्यधिक मेकअप पर भी रोक लगाई गई थी। यह आदेश सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर तक की सभी महिला पुलिसकर्मियों पर लागू था।

यह आदेश DGP विनय कुमार की 23 जून 2025 को हुई समीक्षा बैठक के बाद आया था जिसमें उन्होंने पुलिस बल के अनुशासन पर चिंता जताई थी। इसके बाद 27 जून को कार्मिक एवं कल्याण प्रभाग ने आधिकारिक ज्ञापन जारी किया और सभी रेंज आईजी, एसएसपी तथा जिलों के एसपी को इसका सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी दी गई। नियम तोड़ने पर विभागीय कार्रवाई का प्रावधान रखा गया।

क्या कहते हैं नियम?

बिहार में तैनात एक वरिष्ठ IPS अधिकारी ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि DGP का यह आदेश कोई नया फरमान नहीं है बल्कि यह बिहार पुलिस के 1978 के मैनुअल पर आधारित है। इस मैनुअल में ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों के आचरण, वर्दी और धार्मिक चिह्नों को लेकर विस्तृत नियम पहले से दर्ज हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान ही कर्मियों को इन नियमों की जानकारी दे दी जाती है और यह कोई अचानक थोपा गया नियम नहीं है।

मैनुअल के अनुसार ड्यूटी पर तैनात किसी भी पुलिसकर्मी को किसी भी धर्म के चिह्न, प्रतीक या पहनावे को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है। इसमें हिंदू धर्म का तिलक या चंदन टीका, मुस्लिम धर्म की दाढ़ी सभी पर समान रूप से रोक लागू होती है। नियम का मूल उद्देश्य यही है कि वर्दी में खड़ा पुलिसकर्मी किसी एक धर्म या समुदाय का प्रतिनिधि नहीं बल्कि राज्य का प्रतिनिधि दिखे। हालाँकि, इस नियम में सिख धर्म को एक विशेष छूट दी गई है।

वो बताते हैं कि बाकी धर्मों में भी पूर्ण प्रतिबंध नहीं है लेकिन उसके लिए पहले अनुमति लेना अनिवार्य है। मसलन, नवरात्रि या किसी हिंदू पर्व पर तिलक लगाना हो या किसी मुस्लिम पुलिसकर्मी को रमजान या किसी खास मजहबी जरूरत के चलते दाढ़ी रखनी हो तो उसके लिए पहले वरिष्ठ अधिकारी से लिखित अनुमति लेनी होती है। बिना अनुमति के यह नियम का उल्लंघन माना जाता है।

दिग्गज फोटोग्राफर रघु राय का निधन, गधे की तस्वीर से शुरू हुए उनके सफर ने भारत की फोटो पत्रकारिता को दी वैश्विक पहचान: देखें उनके द्वारा ली गईं कुछ फेमस तस्वीरें

भारत में फोटो जर्नलिज्म को एक नई पहचान देने वाले महान फोटोग्राफर और फोटो पत्रकारिता के ‘जनक’ रघु राय का रविवार (26 अप्रैल 2026) को 83 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे राय ने नई दिल्ली के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली।

उनके बेटे नितिन राय के मुताबिक, पिछले करीब दो वर्षों से वे कैंसर से पीड़ित थे, जो बाद में दिमाग तक फैल गया था और उम्र से जुड़ी अन्य जटिलताओं ने उनकी हालत को और गंभीर बना दिया था। उनके निधन की खबर सामने आते ही कला, मीडिया और फोटोग्राफी जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

परिवार ने उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए इस दुखद समाचार की पुष्टि की। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के लोधी रोड श्मशान घाट में शाम 4 बजे किया जाएगा। उनकी पत्नी गुरमीत राय एक जानी-मानी लेखिका, शिक्षाविद और हेरिटेज कंजर्वेशनिस्ट हैं।

रघु राय का जाना सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं बल्कि उस नजरिए का अंत है जिसने भारत को दुनिया के सामने देखने और समझने का एक अलग तरीका दिया।

जन्म, शुरुआती जीवन और एक ‘संयोग’ से शुरू हुई यात्रा

1942 में अविभाजित भारत के झंग (अब पाकिस्तान) में जन्मे रघु राय का असली नाम रघुनाथ राय चौधरी था। उनका शुरुआती जीवन किसी भी आम भारतीय की तरह बीता और उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उस समय तक फोटोग्राफी उनके जीवन का हिस्सा नहीं थी।

1960 के दशक में जब वे दिल्ली अपने बड़े भाई और प्रसिद्ध फोटोग्राफर एस पॉल से मिलने आए, तभी उनकी जिंदगी ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। रघु राय की फोटोग्राफी की शुरुआत भी एक बेहद दिलचस्प और लगभग खेल-खेल में हुई घटना से जुड़ी है। हरियाणा के एक गाँव में उन्होंने पहली बार कैमरा उठाया और एक गधे के बच्चे की तस्वीर लेने की कोशिश की।

इस दौरान एक मजेदार स्थिति बन गई, जैसे ही वे तस्वीर लेने आगे बढ़ते, गधा भागने लगता और रघु राय उसके पीछे दौड़ पड़ते। यह नजारा देखकर आसपास खड़े बच्चे जोर-जोर से हंसने लगे। बच्चों की खुशी और उत्साह को देखकर उन्होंने भी इस पीछा करने वाले खेल को जारी रखा।

आखिरकार जब गधा थककर रुक गया, तब रघु राय को मौका मिला और उन्होंने बिल्कुल करीब से उसकी तस्वीर कैद कर ली। बाद में जब उन्होंने यह फोटो अपने भाई को दिखाई, तो वह इतने प्रभावित हुए कि इसे The Times, London भेज दिया। खास बात यह रही कि यह तस्वीर अखबार में उनके नाम से प्रकाशित भी हुई।

रघु राय द्वारा ली गई पहली तस्वीर (फोटो साभार: NDTV)

इस एक तस्वीर ने उनके भीतर छिपे कलाकार को पहचान दिलाई और यहीं से उन्होंने तय कर लिया कि फोटोग्राफी ही उनका भविष्य होगी। 1962 में उन्होंने The Statesman अखबार के साथ पेशेवर फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम शुरू किया। बाद में वे India Today से जुड़े और 1982 के बाद करीब एक दशक तक वहाँ फोटो एडिटर रहे।

फोटोग्राफी का नजरिया: सिर्फ तस्वीर नहीं, इतिहास का दस्तावेज

रघु राय का मानना था कि तस्वीर उस पल का दस्तावेज है, जिसे दोबारा नहीं लिखा जा सकता। यही सोच उनके पूरे काम में झलकती है। उनकी फोटोग्राफी केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें समाज, राजनीति, संस्कृति और मानवीय भावनाओं की गहराई दिखती थी।

1988 में धर्मशाला में महाभारत धारावाहिक देखते हुए दलाई लामा (फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)

उन्होंने भारत के गाँवों, शहरों, गलियों, घाटों, त्योहारों, संघर्षों और आम लोगों के जीवन को बेहद करीब से देखा और उसे अपने कैमरे में उतारा। उनके लिए कैमरा सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि समाज की आत्मा को समझने और दिखाने का माध्यम था।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी बहू सोनिया गांँधी और पोते-पोतियों प्रियंका और राहुल के साथ, दिल्ली, 1972(फोटो साभार: Raghu Rai, PHOTOINK)

आपातकाल के दौर में जब सेंसरशिप का दबाव था, तब भी उन्होंने प्रतीकों और संकेतों के जरिए सच्चाई को दुनिया तक पहुँचाने के तरीके खोजे, यह उनकी रचनात्मकता और साहस का प्रमाण है।

ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत दस्तावेज: जब तस्वीरें बन गईं सच की आवाज

रघु राय ने अपने करियर में भारत और दुनिया की बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं को कवर किया। उनकी सबसे चर्चित और प्रभावशाली तस्वीरों में ‘भोपाल गैस त्रासदी’ की तस्वीरें शामिल हैं। एक मासूम बच्चे की आधी दबी हुई लाश की तस्वीर ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। यह सिर्फ एक फोटो नहीं थी बल्कि कॉरपोरेट लापरवाही के खिलाफ एक वैश्विक प्रतीक बन गई।

रघु राय द्वारा ली गई यह तस्वीर भोपाल गैस कांड के दो दिन बाद की है। (फोटो साभार: Mint)

इसके अलावा उन्होंने ‘बांग्लादेश लिबरेशन वॉर’ (Bangladesh Liberation War) के दौरान शरणार्थियों की पीड़ा, ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले अमृतसर के हालात और भारत के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को अपने कैमरे में दर्ज किया। उनकी तस्वीरों में हमेशा एक कहानी होती थी, ऐसी कहानी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा असरदार होती थी।

महान हस्तियों के साथ अनूठा रिश्ता और दुर्लभ तस्वीरें

रघु राय का कैमरा सिर्फ घटनाओं तक सीमित नहीं था, उन्होंने भारत और दुनिया की कई महान हस्तियों को भी बेहद करीब से कैद किया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ लंबे समय तक काम किया और उनके जीवन के कई निजी और सार्वजनिक क्षणों को तस्वीरों में उतारा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी तस्वीरें ली थी। वहीं मदर टेरेसा के साथ उनका जुड़ाव बेहद खास रहा।

रघु राय द्वारा ली गई मदर टेरेसा की तस्वीर (फोटो साभार: नेशनल हेराल्ड)

अंतरराष्ट्रीय पहचान, Magnum Photos और वैश्विक मंच पर भारत की छवि

रघु राय को वैश्विक स्तर पर भी अभूतपूर्व पहचान मिली। महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर Henri Cartier-Bresson ने खुद उन्हें प्रतिष्ठित संस्था Magnum Photos के लिए नामांकित किया। यह सम्मान बहुत कम फोटोग्राफरों को मिलता है और किसी भारतीय के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

उन्होंने Time, Life, GEO, The New York Times, Newsweek, The Independent और The New Yorker जैसी दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं के लिए काम किया। उनकी तस्वीरें दुनिया के बड़े शहरों में प्रदर्शित हुईं और भारत की छवि को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान मिली।

वे तीन बार World Press Photo के ज्यूरी सदस्य रहे और दो बार यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय फोटोग्राफी प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई। यह उनके अनुभव और विश्वसनीयता का प्रमाण है।

सम्मान, पुरस्कार और रचनात्मक योगदान

रघु राय को उनके योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। 1972 में उन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया, जो उन्हें बांग्लादेश युद्ध के कवरेज के लिए मिला था। इसके अलावा उन्हें भारत सरकार का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और कई वैश्विक पुरस्कार भी प्राप्त हुए।

उन्होंने अपने जीवन में 18 से अधिक किताबें लिखीं, जिनमें Raghu Rai’s India, Delhi, Picturing Time, Tibet in Exile और Raghu Rai: People जैसी प्रमुख कृतियाँ शामिल हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनके काम को ‘Exposure: A Corporate Crime’ नाम की किताब और डॉक्यूमेंट्री के रूप में भी प्रस्तुत किया गया, जिसने इस त्रासदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से सामने रखा।

फोटोग्राफी से परे: सोच, दर्शन और विरासत

रघु राय का मानना था कि एक अच्छा फोटोग्राफर वही है, जो सिर्फ देखता नहीं बल्कि महसूस भी करता है। उनके अनुसार, कैमरे की कीमत या तकनीक से ज्यादा जरूरी है नजर और संवेदनशीलता। वे कहते थे कि जिंदगी खुद एक किताब है, जो कभी खत्म नहीं होती और हर पल कुछ नया सिखाती है।

यही कारण था कि उनकी तस्वीरों में हमेशा जीवन की सच्चाई, संघर्ष और सुंदरता एक साथ नजर आती थी। उनका पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे एक साधारण शुरुआत से कोई व्यक्ति अपनी दृष्टि और संवेदनशीलता के बल पर दुनिया को देखने का नजरिया बदल सकता है।

रघु राय के निधन के साथ भले ही एक युग समाप्त हो गया हो लेकिन उनकी तस्वीरें हमेशा जिंदा रहेंगी। उनके कैमरे में कैद भारत, उसकी आत्मा, उसकी पीड़ा और उसकी सुंदरता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर बनी रहेंगी।