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MCD में नियुक्त कर सकते हैं LG, दिल्ली सरकार की सलाह जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट, जानिए कौन होते हैं एल्डरमैन जिनकी नियुक्ति पर था विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम (MCD) में नामित सदस्यों की नियुक्ति पर केजरीवाल सरकार को झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि MCD में मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार दिल्ली के उपराज्यपाल (LG) को है और वह इसके लिए दिल्ली सरकार की सलाह पर काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 अगस्त, 2024) को यह निर्णय दिया। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस पीएस नरसिम्हन ने यह निर्णय दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली नगर निगम में 10 मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार उपराज्यपाल को है और इसके लिए वह दिल्ली सरकार की सलाह या सहायता मानने पर निर्भर नहीं है। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली LG को यह शक्तियाँ उसे 1993 के MCD कानून से मिलती हैं।

कोर्ट ने कहा, “1993 का दिल्ली नगर निगम अधिनियम ने पहली बार LG को मनोनीत करने की शक्ति प्रदान की थी। LG द्वारा उपयोग की गई शक्ति उस योजना को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत शक्ति बाँटी गई है। दिल्ली LG से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के अनुसार काम करें ना कि मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला 15 माह पहले रिजर्व कर लिया था और अब सुनाया है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की AAP सरकार की याचिका पर दिया है। AAP सरकार ने MCD में मनोनीत सदस्यों की राज्यपाल द्वारा नियुक्ति के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी।

AAP सरकार ने दलील दी थी कि LG ने बिना सरकार के सलाह के ही MCD में नियुक्तियाँ की और 1991 के कानून के बाद पहली बार यह हुआ। AAP सरकार ने दलील दी थी कि LG या तो सरकार के दिए गए नाम मानें या फिर इससे अपनी असहमति जताने के साथ इसे राष्ट्रपति को भेज दें।

गौरलतब है कि AAP सरकार लगातार LG के विरुद्ध कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट जाती रही है। इस निर्णय से दिल्ली की केजरीवाल सरकार को बड़ा झटका लगा है। वर्तमान में MCD को लेकर दिल्ली में काफी गुस्सा है। MCD में वर्तमान में AAP सत्ता में है। MCD में कुल 250 सदस्य होते हैं। इनमें से 240 सीटों पर चुनाव होता है जबकि 10 सीटों पर सदस्यों को नामित किया जाता है। इनको मनोनीत करने का अधिकार अब राज्यपाल को मिल गया है। इन्हें एल्डरमैन कहा जाता है।

कुरान की कसम तुझे मार दूँगा… मदरसे में भिड़े दो नाबालिग और एक रात हो गई मोहम्मद अयान की हत्या, पूछताछ के बाद पुलिस ने 12 साल के बच्चे को पकड़ा

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में गुरुवार-शुक्रवार (1-2 अगस्त 2024) की रात को एक मदरसे में 12 साल के छात्र की हत्या कर दी गई थी। हत्या चाकुओं से गोद कर की गई थी। इस मामले में पुलिस ने जाँच के बाद रविवार (4 अगस्त) को उसी मदरसे में पढ़ने वाले दूसरे नाबालिग छात्र को गिरफ्तार किया। हत्या की वजह कुछ दिनों पहले दोनों छात्रों में गाली-गलौज होना बताया जा रहा है। पुलिस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है।

यह घटना बलरामपुर जिले के थानाक्षेत्र तुलसीपुर की है। यहाँ नेपाल सीमा से कुछ ही किलोमीटर दूरी पर इटवा रोड पर मदरसा जामिया नईमिया अरबी कॉलेज है। इसी मदरसे के कक्षा 2 में दीनी और मज़हबी तालीम लेने वाले 12 वर्षीय छात्र मोहम्मद अयान की 2 अगस्त की रात को निर्ममता से चाकुओं से गोद कर हत्या कर दी गई थी, तब अयान के अब्बा महफूज़ आलम ने इस घटना की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई थी। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 (3), के तहत दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी थी।

मृतक बलरामपुर जिले के ही थानाक्षेत्र जारवा का रहने वाला था। जाँच के दौरान पता चला कि इसी मदरसे में बलरामपुर जिले का ही निवासी एक अन्य 12 वर्षीय छात्र भी दीनी और मज़हबी तालीम लेता है। 5-6 दिनों पहले मोहम्मद अयान की आरोपित से किसी बात कर नोकझोंक हो गई थी, तब अयान ने अपने सहपाठी को माँ-बहन की गंदी-गंदी गालियाँ दी थीं। बताया जा रहा है कि तब मोहम्मद अयान ने ईशा की नमाज़ के बाद मस्जिद में कुरान की कसम खाई थी कि वो जुम्मेरात तक आरोपित छात्र को मार डालेगा।

बताया जा रहा है कि मोहम्मद अयान द्वारा मस्जिद में कुरान की कसम खा कर दी गई इस धमकी को आरोपित ने गंभीरता से लिया। उसने सोचा कि क्यों न वो ही पहले आगे बढ़ कर मोहम्मद अयान को मार डाले। यही सोच कर उसने एक चाकू खरीदा और अपने सूटकेस में छिपा कर रख लिया। 1 अगस्त को वह रात में मदरसे के कमरा नंबर 15 में चाकू ले कर गया। यहाँ मोहम्मद अयान कुछ अन्य छात्रों के साथ सो रहा था। आरोपित भी जाकर मोहम्मद अयान के बगल में लेट गया और सबके गहरी नींद में आने का इंतज़ार करने लगा।

पुलिस की पूछताछ में आरोपित ने बताया कि जब उसे विश्वास हो गया कि सब लोग गहरी नींद में हैं तब उसने बिस्तर से अयान का मुँह और गर्दन जोर से दबा दिया। बिस्तर में दबा होने की वजह से अयान की चीख अन्य छात्र नहीं सुन पाए। इसी दौरान आरोपित ने साथ लाए चाकू से अयान के पेट में कई वार किए। काफी देर तक जब अयान के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई तो आरोपित छात्र वहाँ से चुपके से निकल गया। निकलते हुए उसने बिस्तर से मृतक का शरीर ढक दिया।

आरोपित ने अपने कमरे में आकर अयान के खून से सने कपड़े उतारे और उन्हें सूटकेस में छिपा दिया। इसी दौरान आरोपित ने नए कपड़े पहने और अनजान बन कर घूमने लगा। शुरुआती पूछताछ में आरोपित ने पुलिस को इधर-उधर घुमाने की कोशिश की लेकिन बाद में उसने सब कुछ सच-सच उगल दिया। आरोपित बाल अपचारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने आरोपित की निशानदेही पर उसके खून से सने कपड़े बरामद कर लिए हैं। आगे की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

भारतीय हॉकी की जिस ‘दीवार’ को भेद न सके अंग्रेज, उनसे कभी पूछा गया था- क्या आप पाकिस्तानी हैं: टोक्यो ओलंपिक में भी श्रीजेश के दम से ही आया था मेडल

पेरिस ओलंपिक 2024 में भारत की हॉकी टीम के सेमीफाइनल में पहुँचने के बाद गोलकीपर परात्तू रवींद्रन श्रीजेश की काफी चर्चा है। चारों ओर श्रीजेश की तारीफ हो रही है। कोई उन्हें हॉकी का ‘लीजेंड’ कह रहा है तो कोई उन्हें भारतीय हॉकी की ‘दीवार’ बता रहा है। कारण है रविवार को मैच के वक्त किया गया उनका प्रदर्शन।

दरअसल, रविवार (4 अगस्त 2024) को क्वार्टर फाइनल मुकाबले में जिस समय भारतीय टीम के खिलाड़ी रोहिदास को रेड कार्ड दिखाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, उस समय टीम पर प्रेशर बना, लेकिन पेनल्टी शूट आउट में 4-2 से ब्रिटेन को हराकर भारत सेमीफाइनल में एंट्री कर गया।

पेनल्टी शूटआउट के समय श्रीजेश ने जैसे ही दूसरा गोल रोका। हर तरफ से भारत की जीत का शोर गूँजने लगा। कॉमेंट्री कर रहे लोग भी कुछ पल को शांत हो गए। फिर एकदम से रुंधे गले से आवाज आई और श्रीजेश को लीजेंड कहते सुना गया। श्रीजेश की यह तारीफ करने वाले कोई और नहीं बल्कि प्रसिद्ध कमेंटेटर सुनील तनेजा थे।

सोशल मीडिया पर भी उनके गोल रोकने के टेक्निक की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करके उनको सरकार से सम्मान दिलाने की माँग हो रही है। एक यूजर ने लिखा, “ये कल्पना से बाहर की बात है कि कोई गोलकीपर भी मैच जिता सकता है पर श्रीजेश ने ऐसा एक बार नहीं कई बार कर के दिखाया है। बड़े मैच तो अपने दम पर जीताना उनकी आदत बन गई है। आस्ट्रेलिया के खिलाफ और कल इंग्लैंड के खिलाफ जीत में उनका योगदान सबसे बड़ा रहा है।”

बता दें कि ये पहली बार नहीं है कि मैच में जीत के लिए सारा श्रेय श्रीजेश को दिया जा रहा हो। टोक्यो ओलंपिक के वक्त भी जब पुरुषों की हॉकी टीम ने कास्य पदक जीता था। उस समय भी श्रीजेश की काफी चर्चा हुई थी, लोगों ने उनकी तुलना हॉकी के भगवान से की थी और तब भी उन्हें भारतीय हॉकी टीम की दीवार का टैग दिया गया था। उनके लाजवाब प्रदर्शन के लिए उन्हें पूर्व में कई बार तमाम तारीफें मिली हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक बार उन्हें अपने ही देश में पाकिस्तानी कह दिया गया था।

जब श्रीजेश को अपने ही देश में सुनना पड़ा ‘पाकिस्तानी’

बात साल 2013 की है। मुंबई मिरर में प्रकाशित एक​ रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय खिलाड़ी श्रीजेश को नहीं पहचान पाने पर शिवसैनिकों की काफी किरकिरी हुई थी। शिवसेना के प्रतिनिधि ने राष्ट्रीय भारतीय हॉकी टीम के गोलकीपर श्रीजेश से पूछा था, ”क्या आप पाकिस्तानी हैं?” ये सुनते ही श्रीजेश हैरान हो गए थे। हालाँकि, उन्होंने जबाव देने में बिल्कुल भी देर नहीं लगाई। टीम इंडिया के खिलाड़ी ने शिवसैनिको से कहा था, “यार अपने इंडिया के प्लेयर को तो पहचानते नहीं हो, पाकिस्तानी प्लेयर्स को कैसे पहचानोगे।”

ये वाकया उस समय का है जब 2013 में हॉकी इंडिया लीग में हिस्सा लेने के लिए भारत आए पाकिस्तानी खिलाड़ियों के विरोध में मुंबई में शिवसैनिकों ने जमकर हंगामा किया था। उस समय शिवसैनिकों ने हॉकी इंडिया के दफ्तर पहुँचकर वहाँ पर जमकर बवाल काटा था। इसके साथ ही शिवसैनिक पाकिस्तानी खिलाड़ियों को वापस भेजने की माँग भी कर रहे थे। उस समय मुंबई हॉकी संघ के अधिकारियों ने करीब 150 शिवसेना के प्रदर्शनकारियों को बताया था कि आयोजन स्थल पर कोई भी पाकिस्तानी खिलाड़ी मौजूद नहीं है। हालाँकि बाद में मुंबई हॉकी एसोसिएशन के एक अधिकारी ने बाद में मिरर को बताया कि पाकिस्तानी खिलाड़ी वास्तव में आयोजन स्थल पर ही मौजूद थे। 

‘लव जिहाद’ रोकने के लिए UP के रास्ते पर असम, आजीवन कारवास का आएगा कानून: बोले CM सरमा- इजाजत के बाद ही एक दूसरे की प्रॉपर्टी खरीद सकेंगे हिंदू-मुस्लिम

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि राज्य सरकार स्थानीय जनसांख्यिकी की सुरक्षा के लिए जल्द ही कई कानून लाएगी। CM सरमा ने ऐलान किया है कि राज्य के कुछ इलाकों में मुस्लिमों के जमीन खरीदने पर भी रोक लगाई जाएगी और साथ ही लव जिहाद के विरुद्ध भी कड़ा कानून बनाया जाएगा।

CM हिमंता बिस्वा सरमा ने यह ऐलान रविवार (4 अगस्त, 2024) को भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में किया। उन्होंने कह़ा कि वह कुछ दिनों में लव जिहाद को लेकर क़ानून लाएंगे जिसमें आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान होगा। इसके अलावा उन्होंने ऐलान किया कि राज्य के मूल निवासियों के भूमि अधिकारों को बचाने के लिए भी कानून लाया जाएगा।

CM सरमा ने कहा कि वह ऐसा कानून लाएँगे, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे की जमीन बिना मुख्यमंत्री अनुमति के नहीं खरीद सकेंगे। उन्होंने ऐलान किया कि असम के गोलपाड़ा जिले में एक समुदाय के लोगों की जमीन की बिक्री की बिलकुल ही इजाजत नहीं दिया जाएगी क्योंकि वह इस जिले में अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

इसके अलावा असम के जनजातीय समुदाय के लोगों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए भी एक कानून बनाया जाएगा। असम CM हिमंता बिस्वा सरमा ने इस बीच नौकरियों को लेकर भी बात की। उन्होंने 1 लाख नौकरियों का वादा राज्य से किया था। यह वादा पूरा हो चुका है।

CM सरमा ने ऐलान किया कि राज्य में सरकारी नौकरियों में उन लोगों को ही लिया जाएगा, हो असम राज्य में जन्मे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा राज्य की बदलती जनसांख्यिकी को लेकर बढती चिंताओं के चलते किया जा रहा है। नौकरियों में स्थानीय लोगों को लेने की नीति दो महीने के भीतर लाई जाएगी।

CM सरमा ने लव जिहाद पर एक्शन की बात भी कही है। उन्होंने ऐलान किया कि राज्य में जो भी व्यक्ति लव जिहाद के जरिए धर्म परिवर्तन करवाते पकड़ा जाएगा, उसे आजीवन कारावास की सजा का क़ानून बनाया जाएगा। CM सरमा इससे पहले भी राज्य में बदलती जनसांख्यिकी का मुद्दा उठाते रहे हैं।

उन्होंने हाल ही में छत्तीसगढ़ में बताया था कि असम में 1951 में मुस्लिम आबादी 12% थी जो अब बढ़ कर 40% हो चुकी है। उन्होंने कहा था कि 2041 तक असम मुस्लिम बाहुल्य राज्य बन जाएगा। उन्होंने झारखंड में बढ़ती घुसपैठ को लेकर भी चेताया थ।

लव जिहाद को लेकर हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी एक कानून पास किया गया है। उत्तर प्रदेश में जबरन धर्मांतरण रोकने वाले कानून को और भी मजबूत किया गया है। इसके अंतर्गत अब आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है इसमें जुर्माने की राशि भी बढ़ाई गई है।

ब्रिटेन की सड़कों पर इस्लामी कट्टरपंथियों का कब्जा, लग रहे ‘अल्लाहू अकबर’ के नारे: 6,7 और 9 साल की ब्रिटिश बच्चियों की प्रवासी ने की हत्या, भड़के दंगे

ब्रिटेन के साउथपोर्ट शहर में एक 17 वर्ष लड़के ने तीन ब्रिटिश बच्चियों की हत्या कर दी। हत्यारा प्रवासी बताया जा रहा है। बच्चियों की उम्र केवल 6,7 और 9 साल थी। बच्चियों की हत्या के बाद ब्रिटेन में दंगे भड़क गए हैं। दंगों में ब्रिटेन में रहने वाले मुस्लिम और ब्रिटिश लोग आमने सामने आ गए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन के साउथपोर्ट शहर में गायिका टेलर स्विफ्ट के एक योगा एवं म्यूजिक कार्यक्रम में सोमवार (29 जुलाई, 2024) को इस प्रवासी ने चाकू से हमला बोल दिया। इस हमले में तीनों बच्चों की मौत हो गई। कई जगह दावा किया गया कि हमला करने वाला प्रवासी इस्लामी कट्टरपंथी है।

हमलावर को ब्रिटिश पुलिस ने पकड़ लिया है। पुलिस ने उसका नाम बताने से इनकार किया है। हालाँकि मीडिया रिपोर्ट्स में उसका नाम एक्सेल रबुदाकाना बताया गया है, वह एक अश्वेत है। उसकी एक फोटो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। पुलिस का दावा है कि यह हमलावर ब्रिटेन में ही जन्मा है।

इस हमले के बाद ब्रिटेन में लोग आक्रोशित हो गए और अवैध प्रवासियों और इस्लामी कट्टरपंथ से देश को बचाने की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए। ब्रिटेन के कई शहरों में इसके जवाब में मुस्लिम समूह भी सड़कों पर उत्पात मचाते देखे गए हैं। एक्स (पहले ट्विटर) पर वायरल कई वीडियो में दावा किया गया है कि मुस्लिमों ने कई जगह पर चाकू और कुल्हाड़ी के साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को धमकाया। मुस्लिम डिफेन्स लीग पर उत्पात मचाने का आरोप है।

ऐसे ही एक वायरल वीडियो में दावा किया गया कि एक ब्रिटिश व्यक्ति को घेरकर मुस्लिमों ने मारा। दूसरे वीडियो में मुस्लिमों को पुलिस पर हमला करते हुए दिखाया गया है। कई मुस्लिम प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

एक वीडियो में दावा किया गया है कि मुस्लिम भीड़ ब्रिटेन के शहरों में सड़कों पर अल्लाहू अकबर के नारे लगा रही है। ब्रिटेन के लोग इन प्रवासियों को देश से भगाने की माँग कर रहे हैं। ब्रिटेन की पुलिस मुस्लिम प्रदर्शनकारियों के सामने लाचार नजर आ रही है।

ब्रिटेन की पुलिस पर आरोप है कि वह उन लोगों को पकड़ रही है जो बच्चों को मारने वालों का विरोध कर रहे हैं जबकि हमला करने वालों पर वह नरमी बरत रही है। ब्रिटिश पुलिस ने 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टारमर ने कहा है कि जिन लोगों ने भी इन प्रदर्शनों में हिस्सा लिया है उनको छोड़ा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा है कि प्रदर्शन करने वाले पछताएँगे। उन्होंने इस पूरे प्रदर्शन का ठीकरा दक्षिणपंथी समूहों पर फोड़ दिया है। उनका कहना है कि पुलिस जल्द ही प्रदर्शन में हिस्सा लेने वालों को झेलना पड़ेगा।

विरोध शेख हसीना की सरकार का, लेकिन हिंदुओं को निशाना बना रहे इस्लामी कट्टरपंथी: बांग्लादेश में इस्कॉन-काली मंदिर पर हमला, 1 ही थाने में 13 पुलिसकर्मियों की हत्या

बांग्लादेश में इस समय शेख हसीना सरकार के इस्तीफे की माँग को लेकर प्रदर्शन चल रहा है। इस बीच 100 लोगों की मौत हो गई है। वहीं सैंकड़ों घायल हैं। इनमें कई पुलिसकर्मी भी हैं। बताया जा रहा है कि इस प्रदर्शन के बीच 19 पुलिस थानों समेत 26 पुलिस संबंधित जगहों को निशाना बनाया गया। इसके अलावा इस प्रदर्शन में हिंदुओं के घरों, उनके मंदिरों को भी चुन-चुन कर अटैक किया जा रहा है।

स्थानीय मीडिया की मानें तो पुलिस की जिन जगहों पर हमला हुआ है उसमें चार जिलों के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय, मैमनसिंह में रेंज डीआईजी का कार्यालय और दो पुलिस चौकियाँ भी हैं। इन जगहों पर हुए हमले की जानकारी बांग्लादेश पुलिस ने रविवार को दी।

सबसे भीषण हमला सिराजगंज के इनायतपुर पुलिस थाने पर हुआ है। यहाँ 13 पुलिसकर्मियों की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। एडिशनल डीआईजी ने इस संबंध में बताया कि प्रदर्शनकारी इनायतपुर थाने पर मार्च करते हुए आए और यहाँ हमला किया। इसके बाद इन्होंने स्टेशन पर आग लगा दी और पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया।

इनायतपुर के अलावा बताया जा रहा कोमिला में रविवार (4 अगस्त 2024) को हुए हमले में 14 पुलिसकर्मियों को मारा गया है। इसमें एक पुलिसकर्मी हाईवे पुलिस का भी था। कुल मिलाकर बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन के बीच एक ही दिन में करीबन 300 पुलिसकर्मी घायल हुए।

वहीं सामने आई रिपोर्टों से ये भी पता चलता है कि इस्कॉन और काली मंदिर सहित हिंदुओं के घरों को भी निशाना बनाया गया जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ा। इसके अलावा सरकारी प्रतिष्ठानों को भी तीन दिन के लिए बंद करना पड़ा। सेना आश्वासन दे रही है कि वो स्थिति को नियंत्रित कर लेंगे। हालाँकि उनके एक्शन से ऐसा लग नहीं था। रविवार को जब हर जगह प्रदर्शनकारी हिंसक थे तब जाकर उन्होंने हवा में गोलियाँ चलाईं ताकि भीड़ तितर-बितर हो। इससे पहले भीड़ प्रधानमंत्री शेख हसीना के चचेरे भाई के घर को आग के हवाले कर चुकी थी। इसके अलावा वो शेख मुजीबुर रहमान की मूर्ति को भी तोड़ चुकी थी।

पहले महिला अधिकारी को डंडे से पीटने की धमकी, अब कहा – माफ़ी माँगने का सवाल ही नहीं: ममता बनर्जी के मंत्री बोले – इस्तीफा भेज दूँगा

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के नेता अखिल गिरि बतौर मंत्री वन अधिकारी को धमकाते दिखे और वीडियो वायरल हो गया। महिला अधिकारी को उन्होंने डंडे से मारने की बात कही थी, जिसके बाद वो पार्टी के निशाने पर आ गए थे। अब अखिल गिरि ने मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया है, लेकिन माफी माँगने से इनकार कर दिया है। अखिल गिरि ने कहा कि मुझसे पार्टी ने इस्तीफा माँगा, मैंने दे दिया। इस मामले में माफी माँगने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टीएमसी ने अखिल गिरि को इस्तीफा देने और राज्य के वन विभाग की एक महिला अधिकारी से माफी माँगने के लिए कहा, लेकिन गिरि ने कहा कि वह इस्तीफा दे देंगे, लेकिन माफी नहीं माँगेंगे। अखिल गिरि रामनगर से विधायक हैं। उन्होंने अपना इस्तीफा ई-मेल के माध्यम से भेज दिया है। हार्ड कॉपी वो विधानसभा में ममता बनर्जी को सौंपेंगे।

बता दें कि एक वायरल वीडियो में वन रेंजर मनीषा साहू को धमकाते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने साहू को धमकाते हुए कहा था कि ताजपुर समुद्र तट के पास वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण हटाये जाने के बाद उनका कार्यकाल घटा दिया जाएगा। घटना का वीडियो सामने आने के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शांतनु सेन ने कहा, “पार्टी के निर्देश के बाद, प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी ने रविवार दोपहर अखिल गिरि को फोन किया और उन्हें महिला अधिकारी से माफी माँगने और तुरंत अपना इस्तीफा देने का निर्देश दिया।”

अखिल गिरि ने कहा कि “किसी अधिकारी से माफी माँगने का सवाल ही नहीं उठता।” हालाँकि उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए खेद जताया। उन्होंने कहा, “मैं आज रात अपना इस्तीफा ईमेल कर दूँगा और कल विधानसभा में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को व्यक्तिगत रूप से सौंप दूँगा।”

बता दें कि अखिल गिरि ने जिस महिला अधिकारी मनीषा शॉ को निशाना बनाया, उन्होंने बाद में कहा कि हम वन भूमि को मुक्त कराने गए थे, जिस पर हमारी बार-बार चेतावनी के बाद भी जबरन अतिक्रमण किया गया था। ऑपरेशन के दौरान गिरि मौके पर पहुँचे और वन विभाग की टीम से बहस करने लगे। उन्हें महिला वन अधिकारी से यह कहते हुए देखा गया कि आप एक सरकारी कर्मचारी हैं। बोलते समय अपना सिर (मेरे सामने) झुकाएँ। देखें कि एक हफ्ते में आपके साथ क्या होता है? ये गुंडे… सुनिश्चित करेंगे कि आप रात को घर न जा पाएँ। अपना व्यवहार सुधारें, वरना मैं तुम्हें डंडे से पीटूँगा।

ये राजनीति ख़ून माँगती है… जाति पूछ-पूछ कर जाति मिटाने की बातें, ध्रुवीकरण के जरिए आँकड़ों को नेता बनाएँगे हथियार: जाति जनगणना पर क्यों गलत हैं योगेंद्र ‘सलीम’ यादव

कॉन्ग्रेस पार्टी आजकल हर आलोचना का जवाब एक ही वाक्य से दे रही है – जाति जनगणना करा के रहेंगे। पार्टी न इसके फायदे गिना पा रही है, न ही ये कि इसके बिना नुकसान क्या है। लेकिन हाँ, जाति जनगणना के नाम पर राजनीति खूब हो रही है। 3000 से भी अधिक जातियों और 25,000 से भी अधिक उपजातियों वाले देश में जातिगत पहचान को और आगे किया जा रहा है, जातिगत भेदभाव को और गहरा किया जा रहा है, जाति आधारित राजनीति को फिर ज़िंदा किया जा रहा है।

चलिए, बिना समय गँवाए सीधे मुद्दे पर चलते हैं। योगेंद्र ‘सलीम’ यादव – कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकारों में से एक रहे इस शख्स को आगे किया है अपने एजेंडे का बचाव करने के लिए। कारण – योगेंद्र यादव शब्दों को चबा-चबा कर बोलते हैं, अंग्रेजी में लिखते हैं और खुद को ‘सेफोलॉजिस्ट’ जैसी भारी-भरकम उपाधि से नवाज़ते हैं। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लेख लिख कर समझाया है कि जाति जनगणना क्यों ज़रूरी है।

योगेंद्र यादव जी, X-Ray मशीन जाति नहीं पूछती

आइए, सीधे देखते हैं कि योगेंद्र यादव ने क्या लिखा है और क्यों उनका प्रपंच इस बार नहीं चलेगा। वो अपनी बात शुरू करते हैं एक ‘X-Ray सवाल’ से, कि किसी भी चीज के पक्ष या विपक्ष में होने की शर्त होती है कि अगर वो ज़रूरी और संभव है तो उत्तर ‘हाँ’ होता है और वो जोखिम भरा या फिर पहुँच से बाहर हो तो उत्तर ‘ना’ होता है। ठीक है, बहुत बढ़िया। अब योगेंद्र यादव ‘हाँ’ या ‘ना’ के निर्णय के लिए 5 बिंदु गिनाते हैं, और उनके ही बिंदुओं के हिसाब से पता चल जाता है कि जाति जनगणना ज़रूरी नहीं है।

चूँकि योगेंद्र यादव ने अपनी बात X-Ray से शुरू की है, इसीलिए पहले तो उन्हें ये बताना ज़रूरी है कि आज तक किसी भी X-Ray मशीन ने किसी व्यक्ति की जाति नहीं बताई उसके शरीर को स्कैन कर के। कहाँ फ्रैक्चर है ये तो बताया, शरीर के अंदर क्या समस्याएँ हैं ये भी दिखाया, लेकिन किसी की जाति नहीं बताई। दूसरी बात, एक्स-रे मशीन किसी के शरीर को स्कैन करने से पहले जाति नहीं पूछती। लैब/अस्पताल वाला पैसे लेता है, बिना जाति पूछे मशीन उसकी तस्वीर निकाल देती है।

खैर, पॉइंट्स पर भी आ ही जाते हैं। सबसे पहले योगेंद्र यादव कहते हैं कि कोई समस्या अथवा रोग है या नहीं, इस पर निर्भर करता है कि उसका समाधान किया जाए या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में जातिगत भेदभाव रहा है, लेकिन जिन जातियों को OBC या SC/ST में डाला गया है, उनमें भी आपस में भेदभाव है। ये हम नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के होने वाले मुख्य न्यायाधीश BR गवई ने SC/ST में आरक्षण के आधार पर उपवर्गीकरण का आदेश देते हुए कहा।

उदाहरण के तौर पर, अक्सर ये कहा जाता है कि कोई ब्राह्मण किसी डोम समाज के व्यक्ति के घर में पानी नहीं पीता, लेकिन उदाहरण के लिए ये पूछा जा सकता है कि क्या OBC में शामिल यादव, निषाद, कुर्मी अथवा SC/ST में ही शामिल जाटव, मीणा या फिर पासी समाज के लोग क्या किसी मुसहर या फिर डोम समाज के घर में पानी पीते हैं? एक-दूसरे की जाति में शादी-विवाह करना तो दूर की बात है, क्या इसे भेदभाव की श्रेणी में गिना जा सकता है या नहीं?

तो हाँ, भेदभाव है और इतिहास में भी रहा है। लेकिन, क्या दमा के रोग में गठिया की दवा चलाई जा सकती है? अगर योगेंद्र यादव कहते हैं कि किस जाति के कितने लोग हैं ये गिनती कर लेने से रोग खत्म हो जाएगा या समस्या का समाधान हो जाएगा, तो या तो उनके अंदर का ‘सलीम’ कुछ ज़्यादा ही जाग उठा है या फिर ‘बुद्धिजीवी’ होने की आड़ में वो प्रपंच चला रहे। दूसरी बात, वो कहते हैं कि जाति जनगणना का मतलब सिर्फ जाति गिनने से नहीं है, बल्कि ये एक बड़ी इमारत का स्टोरहाउस है।

बहुत अच्छे! लेकिन, क्या वो भूल जाते हैं कि आज तक ऐसे जितने भी आँकड़े आए हैं उनका इस्तेमाल ग़रीबों के उत्थान के लिए कम और राजनीति के लिए अधिक हुआ है। उदाहरण के रूप में आप ‘मंडल आयोग’ को ही ले लीजिए। इसने OBC को 52% आरक्षण देने की सिफारिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत से अधिक किए जाने को असंवैधानिक करार चुका है। VP सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने OBC समाज के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था की।

उस दौरान पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए, सैकड़ों छात्रों ने आत्मदाह कर लिया, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और खुद VP सिंह नेपथ्य में चले गए। अगर ये फैसला उतना ही क्रांतिकारी होता, तो OBC समाज विश्वनाथ प्रताप सिंह को वैसे ही पूज रहा होता, जैसे दलित भीमराव आंबेडकर को पूजते हैं। बाद में ओबीसी में भी सुप्रीम कोर्ट को क्रीमीलेयर की व्यवस्था करनी पड़ी, अर्थात, जो अमीर हो गए उन्हें आरक्षण छोड़ने का नियम बनाना पड़ा।

OBC के नाम पे राजनीति ही हुई, समाज को क्या मिला?

OBC समाज के नेता होने के नाम पर करोड़ों रुपयों के घोटालों में लालू यादव के नाम आए, मुलायम सिंह यादव पर सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगा, और यहाँ तक कि बिहार में कुछ खास सामान्य वर्ग की जातियों को निशाना बनाते हुए ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा दिया जाने लगा। OBC आरक्षण का हुआ क्या? रोहिणी आयोग ने पाया कि OBC के लिए आरक्षित नौकरियों/एडमिशन में 97% सीटें सिर्फ एक चौथाई जातियों को गई।

और तो और, आयोग ने अध्ययन के बाद ये भी पाया कि 24.95% सीटें तो OBC की सिर्फ 10 जातियों में बँट गईं। समस्या ये है कि एक बार इस तरह के फैसले ले लिए जाते हैं तो पीछे मुड़ कर देखने, पुनः समीक्षा या परिस्थितियों के हिसाब से बदलाव का कोई मौका नहीं रहता 100 साल बाद भी। सिफारिशों के बावजूद OBC वर्ग में उपवर्गीकरण की सलाह ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। जब ऐसा कुछ फैसला होगा, फिर योगेंद्र यादव जैसे लोग आग लगवाने के लिए बाहर निकलेँगे और लेख लिखेंगे।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार के नेतृत्व वाले पैनल ने भी OBC के उपवर्गीकरण की सिफारिश की। योगेंद्र यादव कहते हैं कि जाति के अलावा अन्य चीजें भी नोट की जाएँगी, जैसे खाना गैस चूल्हे पर बनता है या मिट्टी के चूल्हे पर, बिजली-पानी की व्यवस्था है, घर की स्थिति कैसी है, इत्यादि। अगर समाजिक-आर्थिक सर्वे ही कराना है और उद्देश्य अंतिम पायदान पर खड़े लोगों का उत्थान तो फिर जाति पूछने की ज़रूरत ही नहीं। बिना जाति पूछे ही सर्वे करा कर उन तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुँचाए जा सकते हैं।

बिहार में जाति जनगणना से क्या पटना अब न्यूयॉर्क बन गया?

अब योगेंद्र यादव के तीसरे पॉइंट पर आते हैं, योगेंद्र यादव का कहना है कि ये इस पर निर्भर करता है कि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध समय के हिसाब से व्यावहारिक होना चाहिए। बिहार में जाति जनगणना के मॉडल की वो बात करते हैं। 500 करोड़ रुपए लगा कर क्या हुआ? कुछ जातियों ने अपनी जनसंख्या छिपाने का आरोप लगाया, आपस में सोशल मीडिया में सिर-फुटव्वल हुई, हर जाति के ठेकेदारों ने इस हिसाब से खुद को तौला और शुरू हो गई नेतागिरी।

ऐसा कुछ तो नहीं है न कि जाति जनगणना करा लिए जाने के बाद से पटना में न्यूयॉर्क जैसे विकास हो गया है? उलटे सत्ता बदल गई, नीतीश कुमार ने एक बार फिर से राजद के साथ गठबंधन तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया। जाति जनगणना अगर इतना ही सुंदर और व्यावहारिक फैसला होता तो फिर गठबंधन में दरार क्यों आ गई? इसका उद्देश्य था कि हर नेता अपनी-अपनी जाति की जनसंख्या जान ले, बस हो गया। जाति के नाम पर घृणा फैलाने वाले कुछ अन्य जातियों को गाली दे दें, हो गया।

चौथे पॉइंट में योगेंद्र यादव कहते हैं कि जातिगत जनगणना का खर्च असंभव नहीं होना चाहिए। भारत में ऐसे कार्यों के लिए किन्हें लगाया जाता है? शिक्षकों को, सरकारी कर्मचारियों को। इससे पठन–पाठन का नुकसान होता है। सभी जातियों को, क्योंकि 14 साल तक के बच्चों के लिए या 8वीं कक्षा तक के लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। यहाँ आरक्षण नहीं है। शिक्षक हमेशा जनगणना से लेकर चुनावी ड्यूटी तक पर लगे रहें, और योगेंद्र यादव जैसे लोग जाति जनगणना की बातें कर-कर के अपना उल्लू सीधा करते रहें, यही उद्देश्य है।

योगेंद्र यादव पाँचवें पॉइंट में कहते हैं कि प्रक्रिया जोखिम भरी नहीं होनी चाहिए और इसका नुकसान इसके लाभ से कम होने चाहिए, फिर उत्तर ‘हाँ’ होता है। ये जोखिम भरा तो है। जिस भारत में जातिवाद मिटाने की बात की जाती है, जहाँ जाति को लेकर कई भीषण संघर्ष हो चुके, वहाँ आप जातिगत पहचान को ही सबकी प्राथमिक पहचान बना दे रहे हैं, क्या ये उचित है? भारतीयता और सामाजिक पहचान गई तेल लेने, सब अपनी-अपनी जाति के आधार पर ही जाने जाएँ, है न?

इसके तहत पहले कथित सवर्णों और पिछड़ों को लड़ाया जाएगा, फिर OBC आरक्षण की सच्चाई सामने आएगी कि कुछ ही समूह सारा लाभ खा रहे हैं और फिर SC/ST को लेकर ये बात सामने आएगी कि कुछ समूह तमाम आरक्षण के बावजूद हाशिए पर पड़े ही हुए हैं, इससे आंतरिक संघर्ष और बढ़ेगा, जाति के आधार पर पहचान ऊपर आ जाएगी और बाकी चीजें नीचे चली जाएँगी तो देश गृहयुद्ध की तरफ बढ़ेगा। तो हाँ, ये खतरनाक है। नेता लोग भी चुनाव जीतने के लिए इस संघर्ष का इस्तेमाल करेंगे, खून बहने से राजनीति को आज तक अफ़सोस नहीं हुआ है।

जाति पूछने पर क्यों भड़कते हैं राहुल गाँधी?

योगेंद्र यादव तर्क देते हैं कि गाँवों-बस्तियों में सबको एक-दूसरे की जाति पता है, इसीलिए जाति पूछना बड़ी बात नहीं है। फिर संसद में राहुल गाँधी की जाति जब पूछ दी गई थी तो वो क्यों उखड़ गए थे? अखिलेश यादव क्यों उखड़ गए थे? यानी, एक नेता को विशेषाधिकार है कि वो अपनी जाति न बताए, लेकिन वही नेता चाहता है कि देश के लोग अपना नाम पीछे लें और अपनी जाति आगे करें। वाह! यही वो राजनीति है तो आपसी संघर्ष माँगती है, ख़ून माँगती है, गृहयुद्ध माँगती है।

‘Caste Identity’ को और मजबूत कर ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के पीछे और क्या उद्देश्य हो सकता है। असली मंशा तो राम मंदिर को लेकर एक हुए हिन्दुओं को बाँटना है। ‘फूट डालो और राज करो’ – शायद अंग्रेजों के ज़माने में ही कॉन्ग्रेस ने ये सीख लिया होगा। हमारी नीतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक उत्थान की होनी चाहिए, क्योंकि इनके बिना प्रतिनिधित्व संभव नहीं है। प्रतिनिधित्व जबरन नहीं दिया जा सकता, क्योंकि इसके लिए पहला सक्षम बनाना आवश्यक है। ऐसा नहीं होगा तो घाटा सरकारी कामकाज का है।

वोट बैंक की राजनीति से बचना है तो बिना जाति पूछे हर परिवार का सामाजिक-आर्थिक सर्वे करवाइए। भेदभाव का मूल कारण दुनिया भर में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई है। योगेंद्र यादव जाति जनगणना के बाद इस पर आधारित फैसलों के ‘Quiet implementation’ की बात करते हैं, क्या ये लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं है? 150 करोड़ लोगों के देश में ‘चुपचाप’ सब कुछ कैसे किया जा सकता है? उस देश में, जहाँ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं।

और हाँ, चोरी का काम तो शैतान का होता है। चोरी-छिपे कुछ करने की सलाह दी जा रही है, तो समझ लीजिए कि कोई झोल है। योगेंद्र यादव कहते हैं कि बिना X-Ray के निर्णय नहीं लिया जा सकता कि ऑपरेशन होगा या नहीं। यहाँ तो वो बिना X-Ray के सीधे अंगदान की बात कर रहे हैं, जबकि मरीज को सिर्फ बुखार ही हुआ है। जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए जागरूकता अभियान चलाइए, पिछड़े समाज को सरकारी योजनाओं के लाभ दिलाइए और उनके क्षेत्रों में विकास कार्य की गति को तेज़ कीजिए – उद्देश्य ये होना चाहिए, जाति गिन कर राजनीति करना नहीं।

एक तरफ योगेंद्र यादव ‘बाबासाहब के सपनों’ की बात करते हुए जाति मिटाने की भी बात करते हैं, दूसरी तरफ ये भी चाहते हैं कि हर कोई अपनी जातिगत पहचान आगे करे। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? योगेंद्र यादव राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के रणनीतिकार रहे हैं। राहुल गाँधी जाति पूछने पर भड़क जाते हैं, बाकी पूरे देश की जाति जानना चाहते हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं? और हाँ, योगेंद्र यादव का इतिहास भी तो दागदार रहा है।

उन्होंने CAA को लेकर कैसे झूठ फैलाया था, हमें याद करना चाहिए। योगेंद्र यादव ‘इच्छाधारी’ हैं, ‘किसान आंदोलन’ के समय वो ‘किसान नेता’ बने हुए थे। NPR को लेकर उन्होंने झूठ बोला था कि इसके तहत माता-पिता के जन्मस्थान के बारे में पूछा जाएगा, जबकि ऐसा कुछ था ही नहीं। उन्होंने झूठ फैलाया था कि मुस्लिमों को भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा। इस कारण NPR के आँकड़े इकट्ठे कर रही कर्मचारियों पर हमले भी हुए थे, वो कर्मचारी मुस्लिम महिलाएँ ही निकली थीं।

चीन पर सबसे बड़े डिजिटल स्ट्राइक की तैयारी, 400 कंपनियों पर गिर सकती है गाज: मनी लॉन्ड्रिंग का शक, लोन वाले एप रडार पर

भारत से पैसों की उगाही कर चीन भेजने के मामले में सरकार सख्त कदम उठा रही है। भारत सरकार अगले 3 माह में सिस्टमेटिक तरीके से 400 चीनी कंपनियों पर ताला लगाने वाली है। इन कंपनियों पर भारत में अवैध तरीके से काम करने, मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हैं। ऐसी कंपनियाँ देश के 17 राज्यों में हैं, जो ऑनलाइन लोन, जॉब पोर्टल की शक्ल में काम कर रही हैं और भारतीय पैसों को अवैध तरीके से चीन भेज रही हैं।

इन कंपनियों में डायरेक्टर तो भारतीय हैं, लेकिन पैसे चीनी कंपनियों के लगे हुए हैं। कुछ कंपनियों में पैसों का डायवर्जन किया गया है, इसका मतलब है कि फंडिंग उन्होंने किसी और काम को दिखाकर लिया है, लेकिन मार्केट में काम कुछ और कर रही हैं।

मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने मोबाइल स्क्रीन और बैटरी बनाने वाले लगभग 40 चीनी कंपनियों के खिलाफ भी जाँच शुरू की है। सूत्रों ने दावा किया है कि लगभग 600 चीनी कंपनियाँ जाँच के दायरे में आई थी। इनमें से 300 से लेकर 400 कंपनियों का कामकाज संदिग्ध पाया गया है। इन पर कार्रवाई होना लगभग निश्चित हो चुका है। इनमें लोन एप और ऑनलाइन जॉब ऑफर करने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।

कुछ कंपनियों में एक भारतीय डायरेक्टर होता है, लेकिन उनका बैंक अकाउंट चीन में होता है और कोई लेनदेन दर्ज नहीं होता है। कुछ मामलों में, कंपनियां अपने पंजीकृत कार्यालयों पर उपलब्ध नहीं होती हैं। कुछ अन्य मामलों में, निवेश तो है, लेकिन वे अन्य व्यवसायों में लगे हुए हैं, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी का संकेत मिलता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि डिजिटल लोन देने वाली कंपनियां पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी हैं। ये आरबीआई की गाइडलाइन्स का पालन नहीं कर रही हैं। इसके चलते कई कस्टमर धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं, साथ ही इस तरह के लोन देने वाली कंपनियाँ लोगों का मानसिक शोषण भी करने लगती हैं। ये काफी भारी रेट पर ब्याज वसूल रही हैं। इन पर रोक लगाने के लिए सरकार की तरफ से यह जाँच शुरू की गई थी। इसी तरह फर्जी जॉब ऑफर देकर भी लोगों को फंसाया जा रहा है।

प्रक्रिया को पूरा करने में लगता है तीन माह तक का समय

कंपनियों को बंद करने की प्रक्रिया कंपनी अधिनियम की धारा 248 के तहत 3 महीनों में होती है, जिसमें पहले एक नोटिस भेजा जाता है, उन्हें जवाब देने का समय दिया जाता है। एक महीने के बाद, दूसरा नोटिस भेजा जाता है। यदि तब भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो कंपनी को बंद कर दिया जाता है।

बता दें कि इससे पहले भी भारतीय सरकार ने ऐसे कड़े कदम उठाए हैं। 2020 में, टिकटॉक और वीचैट सहित 59 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया था। ये ऐप्स डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से संबंधित चिंताओं के कारण प्रतिबंधित किए गए थे। इसी तरह 2021 में 43 और चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया था।

महिला पुलिस इंस्पेक्टर पर तलवार से हमला, जवानों को दाँत से काटा, धारदार हथियारों का प्रयोग… पंजाब में कानून-व्यवस्था का बुरा हाल, नशे में धुत थे हमलावर

पंजाब के अमृतसर में पुलिस पर हमले की खबर है। यहाँ विवाद सुलझाने गई एक महिला इंस्पेक्टर पर तलवार मारी गई है। तलवार के हमले में महिला थानेदार बुरी तरह से घायल हो गईं हैं। महिला SHO को बचाने के चक्कर में उनके सहयोगी पुलिसकर्मी भी हमले का शिकार हुआ है। दोनों घायलों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। हमले के बाद हमलावर फरार हो गए थे जिसमें से सुखजीत सिंह नाम के एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। फरार चल रहे अन्य आरोपितों की तलाश में दबिश दी जा रही है। घटना शुक्रवार (2 जुलाई, 2024) रात की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना अमृतसर जिले के थाना क्षेत्र वेरका की है। यहाँ SHO के तौर पर महिला इंस्पेक्टर अमनजोत कौर तैनात हैं। शुक्रवार को पुलिस को सूचना मिली कि मुढाल गाँव में 2 पक्ष आपस में भिड़ गए हैं। इस सूचना पर SHO अमनजोत कौर अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुँचीं। बताया जा रहा है कि विवाद कर रहे दोनों ही पक्ष नशे में धुत थे। पुलिस ने उन्हें जैसे-तैसे काबू किया। इस बीच इंस्पेक्टर अमनजोत कौर उन्हें दोबारा झगड़ा न करने की हिदायत दे रहीं थीं।

आरोप है कि इसी बीच दोनों पक्षों ने पुलिस पर ही हमला बोल दिया। हमले में तलवारों के साथ अन्य धारदार हथियारों का प्रयोग किया गया। कुछ पुलिसकर्मियों को दाँतों से भी काटा गया। हमलावरों ने SHO अमनजोत कौर को खासतौर पर निशाना बनाया। पुलिस ने हमलावरों को संभालने की काफी कोशिश की। हमले में इंस्पेक्टर अमनजोत कौर बुरी तरह से घायल हो गईं। उनके साथ एक अन्य पुलिसकर्मी भी घायल हुआ है। मामले की सूचना मिलने पर अतिरिक्त पुलिस बल घटनास्थल पर पहुँचा। पुलिस फ़ोर्स को आता देख कर हमलावर मौके से भाग निकले।

पुलिस कमिश्नर रणजीत सिंह ढिल्लो ने बताया है कि महिला इंस्पेक्टर पर हमले के बाद केस दर्ज कर लिया गया है। एक आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार हमलावर की पहचान सुखजीत सिंह उर्फ़ फौजी के तौर पर हुई है। हमलावर सुखजीत सिंह फिलहाल सेना में नौकरी कर रहा है। अन्य आरोपित फरार हैं जिनकी धरपकड़ के लिए दबिश दी जा रही है। घायल महिला इंस्पेक्टर और उनके सहयोगी की हालत खतरे से बाहर है। आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 109, 131, 132 और 221 के तहत कार्रवाई की गई है। मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।