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कभी आपसी विवाद में घुसाया जातिवाद, कभी वसूली के लिए ठोका SC-ST एक्ट: फतेहपुर में परिवार के 3 लोगों की आत्महत्या का मामला पहला नहीं, पढ़ें कानून के दुरुपयोग के 5 मामले

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक ही परिवार के 3 लोगों द्वारा आत्महत्या का मामला सामने आया है। यहाँ अमर श्रीवास्तव, उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव और चाचा सुनील श्रीवास्तव अपने घर में मृत पाए गए। उन्होंने पहले जहर का सेवन किया, फिर ब्लेड से काट लिया। इस मामले में अमर श्रीवास्तव का सुसाइड नोट सामने आया है, जिसमें उन्होंने खुद को प्रताड़ित बताया है और कहा है कि रुपयों के लेन-देन के बीच कुछ लोग एससी-एसटी एक्ट में फँसाकर जेल भेजने की धमकी दे रहे थे, जिसके बाद उनके पास कोई चारा नहीं बचा, सिवाय खुद की जान देने के।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फतेहपुर जिले के चौफेरवा गाँव में अमर श्रीवास्तव (29 वर्ष), उनकी माँ सुशीला श्रीवास्तव (55 वर्ष) और चाचा सुनील श्रीवास्तव एक साथ मृत पाए गए। शुरुआती जाँच में तीनों के हाथ और गले की नसें कटी हुई मिलीं, जिससे हत्या की आशंका जताई गई। लेकिन घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट ने जाँच की दिशा बदल दी।

अमर के कथित सुसाइड नोट में लिखा था कि आर्थिक तंगी, कर्ज के बोझ और कुछ लोगों द्वारा एससी/एसटी एक्ट लगाकर ब्लैकमेल करने की धमकी के कारण वे मजबूर होकर यह कदम उठा रहे हैं। नोट में संजय सिंह, दिलीप त्रिवेदी (पप्पू), शुभम साहू, राहुल श्रीवास्तव और सोनू जैसे नामों का जिक्र है, जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें धमकाया और वसूली की।

अमर का सुसाइड नोट (फोटो साभार: Amar Ujala)

प्रयागराज जोन के एडीजी ज्योति नारायण ने पुष्टि की कि सुसाइड नोट प्रथम दृष्टया अमर के हाथ का लिखा प्रतीत होता है, जिसमें आर्थिक दबाव के साथ एससी/एसटी एक्ट की धमकी का जिक्र है। पुलिस ने नोट में उल्लिखित व्यक्तियों से पूछताछ शुरू की है, हैंडराइटिंग जाँच, पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार है।

यूँ तो एससी/एसटी (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक महत्वपूर्ण कानून है जो कमजोर वर्गों को जातिगत अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। इसका उद्देश्य दलितों और आदिवासियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकना और उन्हें न्याय दिलाना है।

हालाँकि हाल के वर्षों में इस एक्ट के दुरुपयोग की कई घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ व्यक्तिगत रंजिश, आर्थिक वसूली या बदले की भावना से झूठे मामले दर्ज कराए जाते हैं। इससे निर्दोष लोगों की जिंदगियाँ तबाह हो जाती हैं, व्यापार बर्बाद होते हैं, सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होती है, लंबी कानूनी लड़ाई में आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाते हैं और कुछ मामलों में तो परिवार स्तर पर त्रासदी घटित हो जाती है।

फतेहपुर का मामला पहला नहीं, अलीगढ़ में तो बाकायदा परिवार चला रहा था गिरोह

यह पहला मामला नहीं है। कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं जहाँ एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग गिरोहबंद तरीके से किया गया। अलीगढ़ के हस्तपुर गाँव में चंद्रावती देवी और उनके परिवार ने पिछले 10 वर्षों में 15 फर्जी केस दर्ज कराकर लगभग 46 लाख रुपए की सरकारी सहायता और मुआवजा हड़प लिया। वे एससी/एसटी एक्ट के तहत झूठे मामले बनाकर वित्तीय लाभ लेते रहे।

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने इसे गंभीर मानते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) को जाँच सौंपी और सख्त कार्रवाई की माँग की।

लखनऊ में वकील ने SC-ST एक्ट का बुना जाल, दर्ज कराए 20 मामले-HC ने भेजा जेल

लखनऊ में अधिवक्ता लाखन सिंह का मामला न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रहार है। उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत लगभग 20 झूठे मुकदमे दर्ज कराए, मुख्य रूप से भूमि विवाद में बदला लेने के लिए। एक मामले में उन्होंने सुनील दुबे और रामचंद्र जैसे लोगों पर फर्जी हत्या के प्रयास का आरोप लगाया।

जाँच में साबित हुआ कि आरोप पूरी तरह झूठे थे और कई केस फाइनल रिपोर्ट के साथ बंद हो गए। एससी/एसटी विशेष कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने लाखन सिंह को 10 वर्ष 6 महीने की कठोर कारावास और 2.51 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने अधिवक्ता पेशे को कलंकित किया और झूठे मुकदमों की फैक्ट्री चला रखी है। फैसला बार काउंसिल और जिला प्रशासन को भेजा गया ताकि आगे कार्रवाई हो।

लखनऊ के एक अन्य मामले में HC ने वकील को दी उम्रकैद की सजा

एक और गंभीर मामला लखनऊ के ही अधिवक्ता परमानंद गुप्ता का है। उन्होंने पड़ोसी अरविंद यादव और परिवार के खिलाफ भूमि विवाद में एससी/एसटी एक्ट के तहत फर्जी बलात्कार और उत्पीड़न का केस दर्ज कराया। उन्होंने अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली दलित महिला पूजा रावत को मजबूर कर झूठे बयान दिलवाए।

सीबीआई जाँच में साबित हुआ कि महिला घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थी। गुप्ता ने कुल 11 और उनकी पत्नी ने 18 फर्जी केस दर्ज कराए। लखनऊ की विशेष एससी/एसटी कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद और 5.10 लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई।

लाल सिंह को 32 साल बाद मिला न्याय, झगड़ा था मामूली

राजस्थान में लाल सिंह का मामला 32 साल पुराना है, जो SC/ST एक्ट के दुरुपयोग की लंबी मार झेलने का उदाहरण है। 1993 में जोधपुर जिले के सोवणिया गाँव में आटा चक्की संचालक से पिसाई के पैसे को लेकर विवाद हुआ। चक्की संचालक ने लाल सिंह पर जातिसूचक शब्दों से अपमान, रास्ता रोकने और मारपीट का आरोप लगाकर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया। निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया और 6 महीने की सजा दी, जो उन्होंने पूरी की।

हालाँकि राजस्थान हाई कोर्ट ने 32 साल बाद उन्हें निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक्ट का अपराध साबित करने के लिए अपमान जानबूझकर, केवल जाति आधार पर और सार्वजनिक रूप से होना चाहिए। विवाद आर्थिक था, गवाहों के बयान विरोधाभासी थे और FIR देरी से दर्ज हुई। कोर्ट ने दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की, जो संतुलित प्रयोग की जरूरत बताती है।

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर हो सकती है जेल

एससी/एसटी एक्ट में झूठी शिकायत पर शिकायतकर्ता को भी सजा मिल सकती है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 217 (पुरानी आईपीसी 182) और 248 (पुरानी 211) के तहत जानबूझकर गलत जानकारी देने पर 6 महीने से 3 साल या अधिक की जेल हो सकती है। लखनऊ में एक महिला को फर्जी शिकायत पर साढ़े तीन साल की सजा मिली भी।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि महज जाति का नाम लेने से एक्ट लागू नहीं होता, इरादा सार्वजनिक अपमान का होना चाहिए। झूठे मामलों में मुआवजा केवल चार्जशीट और प्रथम दृष्टया सही पाए जाने पर मिलता है। हाई कोर्ट में CrPC धारा 482 के तहत FIR रद्द कराई जा सकती है।

कुल मिलाकर एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बन चुका है। फतेहपुर जैसी त्रासदी से लेकर वकीलों द्वारा गिरोहबंद वसूली और लंबे समय तक निर्दोषों की जिंदगी तबाह होने तक ये मामले दिखाते हैं कि कानून की सुरक्षा कमजोर वर्गों के लिए है, लेकिन दुरुपयोग से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है।

फतेहपुर का यह मामला भी दर्शाता है कि कैसे एक्ट की धमकी से परिवार स्तर पर निराशा और आत्महत्या जैसी चरम स्थिति पैदा हो सकती है। पुलिस का वर्जन अभी प्रारंभिक है, लेकिन सुसाइड नोट ने स्पष्ट रूप से वसूली और ब्लैकमेल को वजह बताया है।

सामूहिक धर्मांतरण कराया तो उम्रकैद, ST को फँसाया तो ₹25 लाख जुर्माना: छत्तीसगढ़ में ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक’ कैबिनेट ने किया पास, जानें इससे जुड़ी हर एक बात

छत्तीसगढ़ की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में धर्मांतरण एक लंबे समय से अत्यंत संवेदनशील और चर्चा का विषय रहा है। राज्य की विष्णु देव साय सरकार ने इस दिशा में एक युगांतकारी कदम उठाते हुए ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ के प्रारूप को कैबिनेट में मंजूरी दे दी है।

यह विधेयक केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक अखंडता, जनजातीय पहचान और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को सुरक्षित करने का एक व्यापक सुरक्षा चक्र है। वर्तमान में जारी विधानसभा सत्र के दौरान इस विधेयक को सदन पटल पर रखा जाएगा, जिसके पारित होने के बाद यह एक अत्यंत प्रभावी कानून का रूप ले लेगा।

सरकार का स्पष्ट तर्क है कि धार्मिक आस्था एक व्यक्तिगत विषय है, लेकिन जब इसमें प्रलोभन, कपट या बल का समावेश हो जाता है, तो यह सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा बन जाता है। इसी खतरे को भाँपते हुए साय सरकार ने पुराने नियमों को बदलकर एक ऐसा ढांचा तैयार किया है, जो अवैध धर्मांतरण की जड़ पर चोट करता है।

पुराना कानून आउटडेटेड, अब नए जमाने के ‘डिजिटल लालच’ पर कसेगा शिकंजा

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को रोकने के लिए जो कानून अब तक चल रहा था, वह काफी पुराना था। साल 1968 का यह ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से विरासत में मिला था और राज्य बनने के समय से ही लागू था। लेकिन पिछले 50-60 सालों में दुनिया और अपराध करने के तरीके दोनों बदल गए हैं। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का कहना है कि अब पुराने कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर लोग अवैध तरीके से धर्म बदलवा रहे थे।

आज के दौर में केवल सीधा लालच ही नहीं, बल्कि इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसे डिजिटल रास्तों से भी लोगों को गुमराह किया जा रहा है। साथ ही, अब अकेले के बजाय पूरे-पूरे समूहों का धर्म बदलवाने यानी ‘सामूहिक धर्मांतरण’ की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। इन्हीं आधुनिक चुनौतियों और चालाकियों से निपटने के लिए सरकार ‘2026 का नया कानून’ लाई है। यह नया कानून न केवल पुराने नियमों की जगह लेगा, बल्कि इसे इतना सख्त और स्पष्ट बनाया गया है कि कोई भी अपराधी कानून की बारीकियों का फायदा उठाकर बच न सके।

चुपके से धर्म बदलना अब मुमकिन नहीं, DM को होगा बताना

नए कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब सब कुछ शीशे की तरह साफ होगा। छत्तीसगढ़ में अब कोई भी व्यक्ति अचानक या गुपचुप तरीके से अपना धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर कोई अपनी मर्जी से धर्म बदलना चाहता है, तो उसे एक तय सरकारी रास्ते से गुजरना होगा। नए नियमों के मुताबिक, धर्म बदलने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सबसे पहले जिला मजिस्ट्रेट यानी कलेक्टर (DM) को लिखित में जानकारी देनी होगी। यह सूचना एक तय समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य है।

जैसे ही आप प्रशासन को सूचना देंगे, सरकार इस जानकारी को सार्वजनिक कर देगी ताकि सबको पता चल सके। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि यह पक्का हो सके कि व्यक्ति किसी के डर, दबाव या लालच में आकर तो ऐसा नहीं कर रहा है। जानकारी पब्लिक होने के बाद 30 दिनों का समय दिया जाएगा।

इस दौरान अगर किसी को लगता है कि यह धर्मांतरण गलत तरीके से हो रहा है, तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है। प्रशासन उन शिकायतों की बारीकी से जाँच करेगा और सब कुछ सही पाए जाने पर ही आगे की अनुमति देगा। अगर कोई व्यक्ति इस कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर धर्म बदलता है, तो कानून की नजर में उसके नए धर्म को कोई मान्यता नहीं मिलेगी।

पूरे गाँव का धर्म बदलवाया तो होगी उम्रकैद, लगेगा 25 लाख का भारी जुर्माना

छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने ‘सामूहिक धर्मांतरण’ (एक साथ कई लोगों का धर्म बदलवाना) को राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना है। सरकार का मानना है कि यह केवल धर्म का मामला नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को बिगाड़ने की एक साजिश है। इसी डर को खत्म करने के लिए नए कानून में सजा को बढ़ाकर सीधा ‘टॉप लेवल’ पर पहुँचा दिया गया है। अब अगर कोई भी व्यक्ति या समूह मिलकर बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हुए दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम 10 साल और ज्यादा से ज्यादा आजीवन कारावास यानी पूरी जिंदगी जेल में काटने की सजा मिल सकती है।

सिर्फ जेल ही नहीं, दोषियों की जेब पर भी कड़ा प्रहार किया जाएगा। ऐसे मामलों में कम से कम 25 लाख रुपए का मोटा जुर्माना भरने का प्रावधान है। सरकार का मुख्य ध्यान बस्तर और जशपुर जैसे आदिवासी अंचलों पर है, जहाँ भोले-भाले लोगों को निशाना बनाने वाले गिरोह सक्रिय रहते हैं। सरकार को उम्मीद है कि इतनी कठोर सजा के डर से वे संगठन और गिरोह हतोत्साहित होंगे जो पूरी प्लानिंग के साथ गाँवों में जाकर लोगों का धर्मांतरण करवाते हैं। अब छत्तीसगढ़ में सामूहिक धर्मांतरण का खेल खेलना अपराधियों को पूरी जिंदगी के लिए सलाखों के पीछे पहुँचा सकता है।

महिलाओं और जनजातियों के धर्मांतरण पर डबल सजा, 20 साल तक की जेल

छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहाँ आदिवासियों की आबादी काफी ज्यादा है। अक्सर देखा गया है कि भोले-भाले ग्रामीणों और पिछड़े समाज के लोगों को झूठ बोलकर या लालच देकर आसानी से फँसा लिया जाता है। इसी ‘टारगेट’ को रोकने के लिए साय सरकार ने नए कानून में महिलाओं, बच्चों और पिछड़े वर्गों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार किया है। सरकार ने यह साफ कर दिया है कि समाज के इन संवेदनशील हिस्सों के साथ किसी भी तरह की धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सजा के नए प्रावधानों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति किसी नाबालिग (बच्चे), महिला, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के व्यक्ति का अवैध तरीके से धर्म बदलवाता है, तो उसे बहुत भारी कीमत चुकानी होगी। ऐसे दोषियों को 10 से 20 साल तक की जेल काटनी होगी और साथ ही कम से कम 10 लाख रुपए का जुर्माना भी देना होगा। जबकि सामान्य मामलों में सजा 7 से 10 साल और जुर्माना 5 लाख रुपए है। सजा का यह बड़ा अंतर साफ बताता है कि सरकार उन लोगों को कड़ी चेतावनी दे रही है जो समाज के कमजोर या आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों को अपना शिकार बनाते हैं।

जड़ों की ओर लौटना अब और आसान, ‘घर वापसी’ पर कोई पाबंदी नहीं

छत्तीसगढ़ के इस नए कानून का सबसे खास और चर्चित हिस्सा ‘घर वापसी’ से जुड़ा है। सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना मौजूदा धर्म छोड़कर वापस अपने पुराने या ‘पैतृक धर्म’ (वह धर्म जो उसके पूर्वजों का था) में लौटता है, तो इसे धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। यानी, अपनी जड़ों की ओर लौटने वाले लोगों के लिए कानून के दरवाजे पूरी तरह खुले रखे गए हैं।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ‘घर वापसी’ करने वालों को उन कड़े नियमों से नहीं गुजरना होगा, जो नए धर्मांतरण के लिए जरूरी हैं। ऐसे लोगों को न तो जिला मजिस्ट्रेट (DM) को पहले से कोई सूचना देने की जरूरत होगी और न ही उन्हें 30 दिनों तक किसी आपत्ति का इंतजार करना पड़ेगा। सरकार का मानना है कि अपनी मूल संस्कृति और धर्म में वापस आना हर व्यक्ति का अधिकार है, इसलिए इसमें कोई कानूनी अड़चन नहीं होनी चाहिए। यह उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है, जिन्होंने पहले कभी किसी दबाव, लालच या भ्रम में आकर अपना मूल धर्म छोड़ दिया था। अब वे बिना किसी डर या कागजी कार्रवाई के अपने पुराने धर्म को दोबारा अपना सकते हैं।

ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया वाली ‘धोखेबाजी’ अब नहीं चलेगी

आज के समय में धर्मांतरण का तरीका केवल आमने-सामने की मुलाकातों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब इंटरनेट का इस्तेमाल हथियार के रूप में हो रहा है। छत्तीसगढ़ का यह नया कानून इस मामले में बेहद एडवांस है, क्योंकि इसमें ‘डिजिटल धर्मांतरण’ को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। अक्सर देखा गया है कि सोशल मीडिया, चैटिंग ऐप्स और यहाँ तक कि ऑनलाइन गेमिंग के जरिए युवाओं और बच्चों को बहलाया-फुसलाया जाता है। अब ऐसे किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए किया गया धर्मांतरण सीधे जेल की राह दिखाएगा।

सरकार ने इस कानून में धोखाधड़ी के तरीकों को बहुत बारीकी से समझाया है। इसमें लालच देना, डराना-धमकाना, गलत जानकारी देना या किसी को सुनहरे सपने दिखाकर गुमराह करना… इन सभी को बहुत स्पष्ट तरीके से परिभाषित किया गया है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अपराधी कानून की किसी बारीकी या तकनीकी कमी का फायदा उठाकर बच नहीं पाएँगे। अब इंटरनेट के जरिए किसी को झूठ बोलकर धर्म बदलवाना कानूनी रूप से बहुत भारी पड़ेगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि चाहे साजिश जमीन पर रची जाए या आसमान (इंटरनेट) में, दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।

बिना वारंट गिरफ्तारी और ‘नो बेल’ का डर, विशेष अदालतों में होगा तुरंत फैसला

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस कानून को केवल फाइलों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे जमीन पर बेहद पावरफुल बनाया है। इस कानून के तहत किए गए सभी अपराध ‘संज्ञेय’ और ‘गैर-जमानती’ (Non-bailable) होंगे। इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर किसी पर अवैध धर्मांतरण का आरोप लगता है, तो पुलिस को उसे गिरफ्तार करने के लिए किसी वारंट का इंतजार नहीं करना होगा। साथ ही, पकड़े जाने के बाद आरोपित को कोर्ट से आसानी से जमानत भी नहीं मिलेगी। यह सख्ती इसलिए बरती गई है ताकि समाज में जहर घोलने वाले लोग कानून के शिकंजे से बच न सकें।

इतना ही नहीं, सरकार ने इन मामलों के जल्द निपटारे के लिए ‘विशेष न्यायालय’ (Special Courts) बनाने का भी फैसला किया है। अक्सर अदालतों में मामले सालों-साल चलते रहते हैं, लेकिन इन विशेष अदालतों में धर्मांतरण से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई बहुत तेजी से होगी। इसका फायदा यह होगा कि पीड़ितों को न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और गुनाह करने वालों को उनके अंजाम तक बहुत जल्द पहुँचाया जा सकेगा। यह पूरी व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि छत्तीसगढ़ में भाईचारे को बिगाड़ने वाली किसी भी साजिश को तुरंत और कड़ाई से कुचला जा सके।

अन्य राज्यों के मुकाबले क्यों अलग और ज्यादा सख्त है छत्तीसगढ़ का कानून

छत्तीसगढ़ से पहले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तराखंड जैसे कई राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ का विधेयक कई मायनों में उनसे अलग और कहीं अधिक सख्त है। सबसे बड़ा अंतर ‘सामूहिक धर्मांतरण’ की सजा में है, जहाँ अन्य राज्यों में अधिकतम सजा आमतौर पर 10 साल तक है, छत्तीसगढ़ में इसे आजीवन कारावास तक बढ़ा दिया गया है।

दूसरा प्रमुख अंतर जुर्माने की राशि है, जो यहाँ 25 लाख रुपए तक रखी गई है, जो देश में सर्वाधिक है। छत्तीसगढ़ का कानून विशेष रूप से जनजातीय समुदायों की ‘सांस्कृतिक अखंडता’ पर केंद्रित है, जबकि अन्य राज्यों के कानून अक्सर ‘लव जिहाद’ या विवाह के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर अधिक केंद्रित रहे हैं। छत्तीसगढ़ ने ‘घर वापसी’ को जो स्पष्ट कानूनी सुरक्षा दी है, वह भी इसे अन्य राज्यों के मुकाबले एक विशिष्ट और साहसी कानूनी ढांचा प्रदान करती है।

बस्तर-जशपुर के जनजातियों के लिए ‘सुरक्षा कवच’

छत्तीसगढ़ के बस्तर और जशपुर जैसे जनजातीय इलाकों में पिछले काफी समय से धर्मांतरण को लेकर माहौल तनावपूर्ण रहा है। कई बार तो स्थिति इतनी बिगड़ गई कि स्थानीय आदिवासियों और धर्म बदलने वाले समूहों के बीच हिंसक झड़पें और खूनी संघर्ष तक देखने को मिला। खासकर इन क्षेत्रों में ईसाई धर्म अपनाने के बाद होने वाले सामाजिक विवादों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी थी। बीते कुछ महीनों में इन जिलों से जबरन या धोखे से धर्मांतरण कराने की ढेरों शिकायतें और पुलिस केस (FIR) सामने आए हैं, जिससे समाज में दरार पैदा हो रही थी।

सरकार का मानना है कि नया कानून लागू होने के बाद इन विवादित इलाकों में शांति लौटेगी और स्थिति नियंत्रण में रहेगी। इस कानून को केवल दंड देने का जरिया नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सदियों पुरानी परंपराओं और उनकी अनोखी पहचान को बचाने वाली एक ‘ढाल’ के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि अगर जनजातीयों की जमीन, उनकी अपनी संस्कृति और उनके अस्तित्व को बचाना है, तो अवैध तरीके से हो रहे धर्म परिवर्तन को रोकना बेहद जरूरी है। यह कानून जनजातीयों को उनकी जड़ों से जोड़े रखने और बाहरी दखल को खत्म करने में मददगार साबित होगा।

आस्था की आजादी या मजबूरी का फायदा?

छत्तीसगढ़ के इस नए कानून को लेकर अब राज्य में दो तरह की विचारधाराएँ आमने-सामने आ गई हैं। एक तरफ विपक्षी दल और कुछ संगठनों का कहना है कि भारत का संविधान हर इंसान को अपनी पसंद का धर्म चुनने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। उनका तर्क है कि इतने कड़े नियम और जेल की सजा लोगों की निजी आजादी में दखल दे सकते हैं और इसका गलत इस्तेमाल भी हो सकता है।

दूसरी तरफ, BJP सरकार का कहना है कि यह कानून किसी की आस्था नहीं छीन रहा, बल्कि उस ‘धोखे’ को रोक रहा है जो लालच या डर दिखाकर किया जाता है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने साफ लफ्जों में कहा है कि अपनी मर्जी से धर्म बदलना गुनाह नहीं है, लेकिन किसी गरीब की लाचारी का फायदा उठाकर उसका धर्म बदलवाना एक सामाजिक अपराध है। सरकार के मुताबिक, यह कानून उन भोले-भाले लोगों के लिए एक रक्षा कवच है जिन्हें बाहरी ताकतें बहला-फुसलाकर अपना शिकार बनाती हैं। मकसद साफ है- धर्म परिवर्तन दिल से होना चाहिए, मजबूरी से नहीं।

धोखे का धंधा बंद, अब सिर्फ ‘दिल की मर्जी’ चलेगी

छत्तीसगढ़ का यह नया ‘फ्रीडम ऑफ रिलीजन बिल 2026’ राज्य के सामाजिक और कानूनी इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित होने वाला है। कैबिनेट से हरी झंडी मिलने के बाद अब सबकी नजरें विधानसभा पर हैं, जहाँ इसके पास होने की पूरी उम्मीद है। जैसे ही यह बिल कानून बनेगा, पूरे राज्य में धर्मांतरण से जुड़ी हर छोटी-बड़ी हलचल पर सरकार और प्रशासन की पैनी नजर रहेगी। इसका मकसद साफ है- कोई भी व्यक्ति किसी के दबाव या लालच में आकर अपना धर्म न बदले।

यह नया कानून छत्तीसगढ़ में एक ऐसी व्यवस्था बनाएगा जहाँ धर्म बदलना केवल और केवल इंसान का निजी फैसला और उसकी आस्था का मामला होगा, न कि किसी साजिश या प्रलोभन का नतीजा। विष्णु देव साय सरकार ने इस कड़े फैसले से जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि राज्य के हर नागरिक की परंपरा, संस्कृति और उसके विश्वास को सुरक्षित रखना उनकी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अब छत्तीसगढ़ में ‘धर्मांतरण का धंधा’ करने वालों के लिए कोई जगह नहीं होगी।

T20 वर्ल्ड कप जीत के जश्न में हार्दिक पांड्या विवादों में घिरे, तिरंगे के अपमान पर हुई शिकायत: सचिन तेंदुलकर-सानिया मिर्जा भी फँसे थे, जानें- राष्ट्र ध्वज से जुड़ा फ्लैग कोड

भारत की टी20 वर्ल्ड कप 2026 में ऐतिहासिक जीत के बाद जहाँ पूरे देश में जश्न का माहौल है, वहीं इसी जश्न से जुड़ा एक विवाद भी सामने आ गया है। भारतीय टीम के ऑलराउंडर हार्दिक पांड्या पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगा है।

फाइनल मैच के बाद अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में हुए जश्न के दौरान पांड्या की कुछ तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। इन वीडियो में वह अपनी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा के साथ जश्न मनाते हुए दिखाई दे रहे हैं और उनके कंधे पर भारतीय तिरंगा लिपटा हुआ है।

इसी को लेकर पुणे के एक वकील वाजिद खान ने शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया है कि पांड्या ने जश्न के दौरान राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा का ध्यान नहीं रखा। शिकायत में कहा गया है कि तिरंगे को शरीर पर लपेटकर और मंच पर लेटते हुए जश्न मनाना राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के खिलाफ है।

यह शिकायत शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में दी गई है। हालाँकि पुलिस ने अभी तक FIR दर्ज नहीं की है और मामले की जाँच की जा रही है।

क्या है पूरा मामला

शिकायत के मुताबिक, भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेले गए टी20 वर्ल्ड कप फाइनल में भारत की जीत के बाद मैदान पर खिलाड़ी और उनके परिवार के लोग जश्न मना रहे थे।

इसी दौरान हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा के साथ मैदान पर दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में पांड्या के कंधे पर तिरंगा लिपटा हुआ है और वह डांस करते हुए और ट्रॉफी के साथ तस्वीरें खिंचवाते नजर आ रहे हैं।

एक और वीडियो में दोनों को स्टेज के पास लेटे हुए भी देखा गया। आरोप लगाने वाले वकील का कहना है कि उस समय भी पांड्या के शरीर पर तिरंगा लिपटा हुआ था।

वकील वाजिद खान का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ इस तरह का व्यवहार उसकी गरिमा के खिलाफ है। उनका कहना है कि खिलाड़ियों को जश्न मनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का ध्यान रखना भी जरूरी है।

वकील ने पुलिस में क्या शिकायत की

पुणे के वकील वाजिद खान ने शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में लिखित शिकायत दी है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज पूरे देश का प्रतीक है और उसका सम्मान करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा, “आपने टी20 वर्ल्ड कप के जश्न की तस्वीरें देखी होंगी। हार्दिक पांड्या अपनी गर्लफ्रेंड के साथ जश्न मना रहे थे और उनके शरीर पर राष्ट्रीय ध्वज लिपटा हुआ था। बाद में वे उसी हालत में मंच पर लेटे हुए दिखाई दिए। यह राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के खिलाफ है।”

शिकायत दर्ज कराने के दौरान पुलिस ने उनसे पूछा कि घटना अहमदाबाद में हुई है, फिर शिकायत पुणे में क्यों की जा रही है। इस पर वकील ने कहा कि तिरंगा पूरे देश का प्रतीक है, इसलिए देश के किसी भी हिस्से में इसकी शिकायत की जा सकती है।

पुलिस ने फिलहाल उनकी शिकायत स्वीकार कर ली है और उन्हें उसकी कॉपी भी दे दी है। अब पुलिस वायरल वीडियो और तस्वीरों की जाँच कर रही है। जाँच के बाद ही यह तय होगा कि इस मामले में FIR दर्ज होगी या नहीं।

पहले भी तिरंगे को लेकर हो चुके हैं विवाद

यह पहला मौका नहीं है जब किसी खिलाड़ी का नाम राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े विवाद में आया हो। साल 2007 में महान क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर भी इसी तरह के विवाद में फंस गए थे। उनके जन्मदिन की एक तस्वीर वायरल हुई थी जिसमें तिरंगे के डिजाइन वाला केक काटा जा रहा था। कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान बताया और शिकायत भी दर्ज कराई थी।

इसी तरह साल 2015 में टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को भी विवाद का सामना करना पड़ा था। एक तस्वीर में वह स्टेडियम में कुर्सी पर बैठी दिखाई दे रही थीं और उनके सामने जमीन पर भारतीय तिरंगा नजर आ रहा था। इस तस्वीर को लेकर कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्होंने तिरंगे का अपमान किया है। बाद में इस मामले को लेकर काफी बहस हुई थी।

भारतीय तिरंगे के सम्मान से जुड़े नियम और सजा

भारत में राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को लेकर स्पष्ट कानून बनाए गए हैं। मुख्य रूप से यह नियम प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 के तहत आते हैं। इस कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति अगर सार्वजनिक जगह पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को जलाता है, फाड़ता है, गंदा करता है, पैरों तले रौंदता है या किसी भी तरह से उसका अपमान करता है, तो यह अपराध माना जाता है।

अगर कोई व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता है तो उसे सजा भी हो सकती है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। इसके अलावा फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में भी तिरंगे के इस्तेमाल को लेकर कई नियम तय किए गए हैं।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ जरूरी नियम बनाए गए हैं। इन नियमों के अनुसार तिरंगे को कभी भी जमीन या पानी पर गिरने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इसे देश की शान और सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

इसी तरह तिरंगे का इस्तेमाल कपड़े, कुशन, या किसी भी तरह की सजावट के रूप में नहीं किया जा सकता। यदि झंडा फट जाए या गंदा हो जाए तो उसे फहराना भी सही नहीं माना जाता। कुल मिलाकर राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल हमेशा सम्मानजनक तरीके से ही होना चाहिए, ताकि देश की पहचान और उसकी गरिमा बनी रहे। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य यही है कि तिरंगे का सम्मान हर परिस्थिति में सुरक्षित रखा जाए।

ईरान-इजरायल युद्ध का भारत पर पड़ने लगा असर, लागू किया गया ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’: जानें- क्या है यह कानून और इससे क्या बदलेगा?

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की सैन्य कार्रवाई के बाद पूरी दुनिया में ऊर्जा बाजार को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने भी एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

केंद्र सरकार ने सोमवार (09 मार्च 2026) को पेट्रोलियम उत्पादों और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता बनाए रखने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act – ECA) लागू करने का फैसला किया है ताकि देश में ईंधन की सप्लाई और वितरण पर सख्त निगरानी रखी जा सके।

सरकार का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। ऐसे में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों, प्राकृतिक गैस और अन्य ईंधनों की उपलब्धता प्रभावित न हो इसके लिए यह कदम उठाया गया है।

इस अधिनियम के लागू होने के बाद केंद्र सरकार को इन संसाधनों के उत्पादन,भंडारण,वितरण और आपूर्ति को नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाता है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस संबंध में एक गजट नोटिफिकेशन भी जारी किया है।

क्या है 1955 का आवश्यक वस्तु अधिनियम?

आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 संसद द्वारा बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रोज की जिंदगी की जरूरी चीजें लोगों को सही कीमत पर मिलती रहें।

इस कानून के जरिए केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए जरूरी वस्तुओं के उत्पादन,आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके ताकि किसी भी स्थिति में आम लोगों को इन वस्तुओं की कमी का सामना न करना पड़े।

समय के साथ इस कानून के तहत कई ऐसी वस्तुओं को आवश्यक वस्तु की श्रेणी में शामिल किया गया है जो लोगों के दैनिक जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं। इनमें खाद्यान्न, खाद्य तेल,दवाइयाँ, उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पाद जैसे सामान शामिल रहे हैं।

परिस्थितियों के अनुसार केंद्र सरकार के पास यह अधिकार भी होता है कि वह इस सूची में नई वस्तुएँ जोड़ सकती है या जरूरत पड़ने पर किसी वस्तु को इससे हटा भी सकती है। युद्ध, प्राकृतिक आपदा या आपूर्ति व्यवस्था में बाधा जैसी परिस्थितियों में अक्सर जमाखोरी और मुनाफाखोरी की स्थिति पैदा हो जाती है।

ऐसे हालात में यह कानून सरकार को हस्तक्षेप करने की शक्ति देता है जिससे बाजार में आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता बनी रहे और उनकी कीमतें नियंत्रण में रहें। इस अधिनियम की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित कर सके।

इसके तहत सरकार भंडारण की सीमा तय कर सकती है, व्यापार को नियंत्रित कर सकती है, कीमतों को निर्धारित कर सकती है और जमाखोरी जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध भी लगा सकती है।

इस कानून की धारा 5 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार भी है कि वह धारा 3 के अंतर्गत प्राप्त अपनी शक्तियों को राज्य सरकारों या अधिकृत अधिकारियों को सौंप सकती है। इसका उद्देश्य यह होता है कि स्थानीय स्तर पर भी इस कानून का प्रभावी और त्वरित तरीके से पालन कराया जा सके और जरूरत पड़ने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। वर्ष 2020 में संसद ने इस कानून में संशोधन भी किया था।

इस संशोधन के बाद केंद्र सरकार की शक्तियों को कुछ विशेष वस्तुओं जैसे अनाज, दालें, आलू, प्याज, खाद्य तिलहन और ईंधन तेल के मामले में केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित कर दिया गया।

इन असाधारण परिस्थितियों में युद्ध, अकाल, अत्यधिक मूल्य वृद्धि और गंभीर प्राकृतिक आपदाएँ जैसी स्थितियाँ शामिल की गई हैं। पेट्रोलियम उत्पादों को भी इस कानून के तहत आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा गया है और इनमें एलपीजी भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि एलपीजी की आपूर्ति और वितरण को भी इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत नियंत्रित किया जा सकता है।

क्यों अब सरकार को पड़ी इसकी जरूरत?

केंद्र सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज)के रास्ते आने वाली तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई प्रभावित हुई है।

कई गैस सप्लायर कंपनियों ने फोर्स मेज्योर (Force Majeure) का हवाला दिया है, जिसका मतलब यह है कि असाधारण परिस्थितियों के कारण वे अपनी तय आपूर्ति पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे हालात में गैस की उपलब्ध मात्रा को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की ओर मोड़ने की जरूरत है।

सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस, एलएनजी और री-गैसीफाइड एलएनजी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए बेहद जरूरी कच्चा माल हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए CNG, उर्वरक उत्पादन, LPG उत्पादन और कई अन्य औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार का मानना है कि प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस की समान और निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक गैस के उत्पादन, विभिन्न क्षेत्रों के लिए उसके आवंटन, आपूर्ति के डायवर्जन, वितरण, निपटान, अधिग्रहण, उपयोग और खपत को नियंत्रित करना जरूरी है।

इस अधिनियम का अब आपूर्ति पर क्या पड़ेगा असर?

केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करने के लिए कुछ स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं जिससे देश में गैस की उपलब्धता बनी रहे। साथ ही इसका मकसद गैस को उसे प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बराबरी से बाँटना भी है। सरकार का कहना है कि प्राकृतिक गैस की सप्लाई को अलग-अलग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में बाँटा जाएगा और उसी के अनुसार गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

सबसे पहले प्राथमिकता क्षेत्र-1 तय किया गया है। इसमें आने वाले क्षेत्रों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाएगी। इन क्षेत्रों में घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सप्लाई, परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाली कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG), एलपीजी उत्पादन और पाइपलाइन कंप्रेसर ईंधन और पाइपलाइन संचालन से जुड़ी जरूरी जरूरतें शामिल हैं। इन सभी क्षेत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 100% तक गैस आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।

इसके बाद प्राथमिकता क्षेत्र-2 में उर्वरक (फर्टिलाइजर) प्लांट्स को रखा गया है। इन संयंत्रों को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 70% तक गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही यह शर्त भी रखी गई है कि इन संयंत्रों को मिलने वाली गैस का उपयोग केवल उर्वरक उत्पादन के लिए ही किया जाएगा और किसी अन्य उद्देश्य के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।

प्राथमिकता क्षेत्र-3 में गैस मार्केटिंग कंपनियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रीय गैस ग्रिड के माध्यम से सप्लाई पाने वाले चाय उद्योग, विनिर्माण क्षेत्र और अन्य औद्योगिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस आपूर्ति मिलती रहे।

इसके अलावा प्राथमिकता क्षेत्र-4 में आने वाली सभी सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके नेटवर्क से जुड़े औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को उनकी पिछले छह महीनों की औसत गैस खपत के आधार पर 80% तक गैस सप्लाई मिलती रहे।

देश में कितनी है सालाना LPG खपत?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में हर साल करीब 3.13 करोड़ टन LPG की खपत होती है और इसमें करीब 87% हिस्सा घरेलू रसोई गैस का है। भारत अपनी LPG जरूरत का करीब 62% को बाहर से आयात करता है और मिडिल ईस्ट में संकट के बाद यह आयात प्रभावित हुआ है।

होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव के चलते यह संकट और गहरा गया है क्योंकि आयात का करीब 85-90% हिस्सा इसी रास्ते से आता है। देश में पर्याप्त है ईंधन का भंडार मिडिल ईस्ट में संकट के बीच कई जगहों पर गैस की कमी की खबरें हैं लेकिन मंत्रालय का कहना है कि देश में ईंधन का पर्याप्त भंडार मौजूद है।

इसके साथ ही पेट्रोलियम रिफाइनरियों को पेट्रोकेमिकल उत्पादन घटाकर LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। मंत्रालय ने एहतियाती कदम के तौर पर LPG सिलेंडर की दो बुकिंग के बीच का अंतराल भी 21 दिन से बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है ताकि जमाखोरी और कालाबाजारी रोकी जा सके।

क्यों वायरल हो रही काजल हिंदुस्तानी और साध्वी ऋतंभरा की Video: जानिए वृंदावन में हुई चर्चा में किसने क्या कहा

उत्तर प्रदेश के वृंदावन में 28 फरवरी 2026 से 2 मार्च 2026 तक संतों का एक भव्य कार्यक्रम ‘शताब्दी आनंद महोत्सव’ का आयोजन हुआ। इस आध्यात्मिक समागम में देश भर से साधु-संत और कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान मंच से दिए गए भाषणों की दो क्लिप सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रही हैं।

पहली क्लिप सामाजिक कार्यकर्ता काजल हिंदुस्तानी की है और दूसरी क्लिप विख्यात प्रखर वक्ता ‘दीदी माँ’ साध्वी ऋतंभरा की है। इन दोनों के बयानों को लेकर इंटरनेट पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। आईए इस बहस की वजह इन्हीं के बयानों से समझते हैं।

काजल हिंदुस्तानी का संबोधन और UGC का मुद्दा

कार्यक्रम में काजल हिंदुस्तानी ने जब मंच संभाला तो अपना पहले संतों का अभिवादन किया और उसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए कारसेवकों के बलिदान को याद किया। उन्होंने धर्म की बात करते हुए प्रभु श्रीराम में अपनी आस्था प्रकट की। इसके बाद उन्होंने मंच से यूजीसी का मुद्दा छेड़ा। लोग सोशल मीडिया पर उनके वक्तव्य के इसी हिस्से को शेयर कर रहे हैं।

इसमें वह कहती सुनाई पड़ती हैं, “हम हिंदू समाज को एक करने की बात करते हैं, लेकिन फिर एक राजा आता है और गलत फैसला लेकर यूजीसी (UGC) जैसा काला कानून ले आता है, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सेवक को बाँटने का काम करता है। यह अधर्म है।”

काजल कहती हैं,

“मैं नहीं जानती कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है, मैं तो उस धर्म और अधर्म को मानती हूँ जो भगवान कृष्ण ने गीता में बहुत सरल भाषा में सिखाया है। इसलिए यह अधर्म है। जब अर्जुन ने भगवान से कहा कि मैं द्रोणाचार्य को कैसे मार सकता हूँ, वे मेरे गुरु हैं, मैं अपने भाइयों को कैसे मार सकता हूँ, वे सब मेरे भाई हैं और मैं अपने भीष्म पितामह को कैसे मार सकता हूँ, वे मेरे पितामह हैं। तब भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया। भगवान कृष्ण ने कहा कि जिस द्रोणाचार्य को तुम अपना गुरु कह रहे हो, जब उनकी अपनी संतान अधर्म कर रही है और वे उन्हें नहीं रोक रहे हैं, तो वे भी अधर्मी हैं। जिस भीष्म पितामह को तुम अपना पितामह कह रहे हो, उस भीष्म पितामह ने तब अपनी आँखें बंद कर ली थीं जब तुम्हारा भाई दुर्योधन जाँघा ठोकर कहता था द्रौपदी को कि आ मेरी जाँघा पर बैठ और वो चुप था। भगवान ने अर्जुन से कहा कि वे सभी अधर्मी हैं, और जो अधर्म पर मौन रहते हैं और केवल उन्हें देखते रहते हैं, चाहे वह द्रोण हों, भीष्म हों या कर्ण, वे सभी मारे जाते हैं। वे सभी मारे जाएँगे। अगर यूजीसी जैसा काला कानून है और अगर हम चुप हैं, तो हम भी अधर्मी हैं।”

उन्होंने कहा, “हमें जातियों में क्यों बाँटा गया है? कोई भी संत जातियों में नहीं बँटा है। ब्राह्मणों को पहले ही बदनाम किया जा चुका है। कॉलेजों में नारे लगते हैं कि ‘ब्राह्मणों तेरी कब्र खुदेगी’, ब्राह्मणों की कब्र क्यों खुदेगी? ‘तिलक, तराजू और तलवार’ को मारने की बात होती है, क्यों मारें उन्हें? नारे लगते हैं कि ‘ब्राह्मण भारत छोड़ो’, ‘तुम्हारा खून बहेगा’, खून क्यों बहेगा? हमें यह सब कौन बाँट रहा है?”

काजल ने जाति के आधार पर होने वाले विभाजन को लेकर सवाल उठाते हुए न केवल ब्राह्मणों के खिलाफ हुई नारेबाजी की आलोचना की बल्किन कॉलेजों में छात्र राजनीति का विरोध किया। उन्होंने श्रोताओं से प्रधानमंत्री को पत्र लिखने का प्रस्ताव रखा, नेताओं से नाराजगी जाहिर की और हिंदू समाज की एकता पर बोलते हुए संदेश दिया कि यूजीसी कानून जैसे कानूनों को थोपना हिंदुओं को बाँटने का प्रयास है।

साध्वी ऋतंभरा का मंच से दिया गया बयान

काजल हिंदुस्तानी का ये वक्तव्य वायरल होने के बाद एक वीडियो साध्वी ऋतंभरा (दीदी माँ) की भी सामने आई है। उन्होंने जब मंच संभाला तो और समाज को एकजुट रहने की सीख दी। वीडियो में उन्हें कहते सुन सकते हैं, “इतने अपमानों के बाद हम इस स्थिति तक पहुँचे हैं, ऐसे में यदि आप सत्ता में बैठे नेतृत्व पर संदेह करेंगे, तो सत्य का विनाश हो जाएगा। अपनों के प्रति गुस्सा मंचों पर नहीं, बल्कि घर में व्यक्त किया जाता है। घर के गंदे कपड़े सड़क पर नहीं धोए जाते।”

साध्वी ऋतंभरा ने हिंदू समाज से एक ‘दानव’ को पहचानने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने ‘विमर्श’ या ‘नैरेटिव’ का नाम दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व में बैठे विदेशी तत्वों द्वारा भारत के भीतर जाति व्यवस्था का ऐसा जाल बुना गया है कि भाई-बहनों के सिर कट रहे हैं और साजिशें रची जा रही हैं।

साध्वी ऋतंभरा ने आगे कहा कि यदि हम आपस में बँट गए, तो हिंदू चेतना को कैसे बचा पाएँगे? उन्होंने हरिजन, स्वर्ण और पिछड़ों के रिश्तों को तोड़ने वाली साजिशों को धूल में मिलाने का आह्वान किया। साध्वी ने देवदासी और सती जैसे शब्दों के साथ जुड़े ऐतिहासिक बलिदानों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह सनातन संस्कृति को अपमानित करने के लिए विमर्श गढ़े गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो कुछ भी हमें मिला है, वह वर्षों के अपमान को सहने के बाद मिला है, इसलिए हमें आंतरिक मतभेदों को भुलाकर हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोना होगा।

सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग: समर्थन और विरोध के स्वर

इन बयानों के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। कुछ लोग हैं जो दोनों के वक्तव्यों को अपनी-अपनी जगह पर सही बता रहे हैं। वहीं कुछ को काजल हिंदुस्तानी के बयान में राजनीति दिख रही है और कुछ साध्वी ऋतंभरा की प्रतिक्रिया से असहमत होने के चलते उनके लिए अमर्यादित शब्द इस्तेमाल करने पर उतर आए हैं।

ऐसे में काजल ने तो अपने पूरे वक्तव्य को साझा करके कह दिया है कि उन्होंने राजनीति नहीं की, वो समय-समय पर हर वर्ग की आवाज बनी हैं। लेकिन साध्वी ऋतंभरा को अब जातिगत आधार पर निशाना बनाते हुए अपमानित किया जा रहा है।

हिंदू समाज और धर्म के लिए दिए गए उनके योगदान को दरकिनार करते हुए उनके चरित्र और मंशा पर अपमानजनक शब्दों से प्रहार हो रहा है। शायद ऐसे लोग भूल गए हैं कि साध्वी ऋतंभरा ही वो चेहरा थीं जिन्होंने 1990 के दशक में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा संचालित ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन’ में अहम भूमिका निभाते हुए सारे भारत में धर्म जागरण किया।

उन्होंने इस आंदोलन के लिए हिन्दू समाज की विभिन्न जातियों को एकता के सूत्र में बाँधा। इसी एकात्म हुई हिन्दू शक्ति ने इस आंदोलन की सफलता के रूप में अपने आराध्य श्री रामलला की जन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण का सम्पूर्ण न्यायालयीन अधिकार प्राप्त किया। फिलहाल साध्वी ऋतंभरा श्रीकृष्ण की लीला स्थली वृंदावन में वात्सल्य ग्राम चलाती हैं। वात्सल्य ग्राम की पूरी परिकल्पना के माध्यम से वे भारतीय पारिवारिक व्यवस्था की सकारात्मकता पर जनमानस का ध्यान आकर्षित कर उसका प्रसार करने का सम्पूर्ण प्रयास कर रही हैं।

₹25 लाख करोड़ की डील? रिलायंस इंडस्ट्रीज के टेक्सास में ऑयल रिफाइनरी लगाने के दावे की क्या है सच्चाई, जानिए सब कुछ

US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने 10 मार्च को महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि टेक्सास के ब्राउन्सविले में एक नई ऑयल रिफाइनरी ‘हिस्टोरिक $300 बिलियन डील’ का हिस्सा होगी। उन्होंने इसे अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी एनर्जी डील बताया और कहा कि 50 साल में पहली बार एक नया ऑयल रिफाइनरी अमेरिका में लग रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर अपने पोस्ट में ट्रंप ने कहा कि भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज इस प्रोजेक्ट में शामिल है। उन्होंने निवेश को आकर्षित करने का क्रेडिट अपनी सरकार के ‘अमेरिका फर्स्ट एनर्जी एजेंडा’ को दिया। उन्होंने रिफाइनरी को एक बड़ा इकोनॉमिक प्रोजेक्ट बताया, जो अमेरिकी एनर्जी प्रोडक्शन को बढ़ाएगा, हजारों नौकरियाँ पैदा करेगा, नेशनल सिक्योरिटी को मजबूत करेगा और ग्लोबल एक्सपोर्ट को ताकत देगा।

इसके अलावा, ट्रंप ने इस प्रोजेक्ट को इस बात का संकेत बताया कि घरेलू उत्पाद पर फोकस पॉलिसी और आसान रेगुलेटरी अप्रूवल की वजह से बड़े एनर्जी निवेशक अमेरिका में वापस आ रहे हैं।

प्रोजेक्ट में असल में क्या है

अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग की प्रेस रिलीज के मुताबिक, कंपनी टेक्सास में ब्राउन्सविले पोर्ट पर रिफाइनरी बनाने का प्लान बना रही है, जो US-मेक्सिको बॉर्डर के पास है। इस संयंत्र से हर दिन लगभग 1,68,000 बैरल क्रूड ऑयल बनने की उम्मीद है। इसे खास तौर पर अमेरिका में बनने वाले लाइट शेल ऑयल को रिफाइन करने के लिए डिजाइन किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस साइज की रिफाइनरी बनाने में आमतौर पर कई बिलियन डॉलर खर्च होते हैं, न कि सैकड़ों बिलियन डॉलर, जैसा कि ट्रंप ने कहा था। हर बैरल कैपेसिटी पर रिफाइनरी बनाने की आम लागत के आधार पर, यह अनुमान है कि इस लेवल के प्रोजेक्ट को बनाने में लगभग $6 से $7 बिलियन का खर्च आ सकता है।

इसलिए यह प्रोजेक्ट $300 बिलियन के पूँजी निवेश वाली कंपनी के बजाय एक नॉर्मल बड़ा एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट है।

प्रोजेक्ट में रिलायंस की भूमिका

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में खास तौर पर रिलायंस के एक बड़े फाइनेंशियल कमिटमेंट का जिक्र किया। हालाँकि प्रोजेक्ट डेवलपर्स के बयानों से पता चलता है कि रिलायंस ने ‘नौ अंकों का इन्वेस्टमेंट’ किया है। इसका मतलब है कि निवेश शायद $100 मिलियन और $999 मिलियन के बीच होगा।

साथ ही, रिलायंस ने रिफाइनरी के साथ 20 साल का ऑफटेक एग्रीमेंट साइन किया है। यह एग्रीमेंट यह वादा करता है कि कंपनी अगले 20 सालों में संयंत्र से बनने वाले पेट्रोलियम उत्पाद खरीदेगी। आसान शब्दों में, यह रिलायंस को रिफाइनरी के कंस्ट्रक्शन को फंड करने वाले प्राइमरी इन्वेस्टर के बजाय एक लॉन्ग टर्म बायर और कमर्शियल पार्टनर बनाता है।

रिलायंस का शामिल होना इसलिए भी खास है क्योंकि यह पहले से ही भारत में जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स का बड़ा हिस्सा चला रहा है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी माना जाता है।

$300 बिलियन का आँकड़ा कहाँ से आया

ट्रंप ने अपनी पोस्ट में जो $300 बिलियन यानी 25 लाख करोड़ रुपए का आँकड़ा बताया है, वह रिफाइनरी बनाने की लागत या रिलायंस के तुरंत होने वाले इन्वेस्टमेंट नहीं दिखाता है। इसके बजाय यह आँकड़ा कई सालों में कैलकुलेट किए गए अनुमानित आर्थिक आँकड़ा हो सकता है।

ऐसे अनुमान आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर की घोषणाओं में सीधे फाइनेंशियल इन्वेस्टमेंट के बजाय लाइफटाइम इकोनॉमिक असर के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

रिफाइनरी का प्रस्ताव क्यों रखा जा रहा है

यह प्रोजेक्ट अमेरिकी लाइट शेल ऑयल को प्रोसेस करने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है। US शेल बेसिन में फ्रैकिंग बढ़ने की वजह से यह बहुत ज़्यादा मात्रा में मिल रहा है। US गल्फ कोस्ट पर कई मौजूदा रिफाइनरियां मूल रूप से भारी इम्पोर्टेड क्रूड ऑयल को प्रोसेस करने के लिए बनाई गई थीं। इस वजह से, उनमें से कुछ देश में बनने वाले हल्के क्रूड ऑयल के लिए उपयोगी नहीं हैं।

यह नई फैसिलिटी कच्चे क्रूड के रूप में एक्सपोर्ट किए जाने के बजाय अमेरिका के अंदर रिफाइंड किए गए अमेरिकी शेल ऑयल की मात्रा बढ़ाने में मदद करेगी।

मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

जो गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: जानें- कितने खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे, UN ने किया है बैन

इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।

हेलो वामपंथियों, लो मिल गया रिजवान! तरुण हत्याकांड से लोगों का ध्यान भटकाने का अब कम करो प्रयास

दिल्ली के उत्तम नगर में हुए तरुण हत्याकांड को लेकर सोशल मीडिया पर अब एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तेज हो गई है। पहले जहाँ हिंदू लड़के की हत्या मामले में असली पीड़ित मुस्लिम परिवार को दिखाने की गई। वहीं अब ध्यान ज्यादा भटकाने के लिए यह दावा फैलाया जा रहा है कि 4 मार्च को हुए विवाद के बाद मुस्लिम परिवार का 14 साल का लड़का रिजवान भी ‘गायब’ है। उसका कहीं कोई पता नहीं चल पा रहा है।

इस नैरेटिव को हवा देने में कई तथाकथित सेकुलर और इस्लाम के नाम पर राजनीति और पत्रकारिता करने वाले कई चेहरे खुलकर सामने आ गए हैं। RJ सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा तक ने एक जैसा अभियान चलाते हुए सोशल मीडिया पर सवाल उठाया- “हेलो दिल्ली पुलिस, रिजवान कहाँ है?”

सवाल को उठाने का मकसद साफ है। पढ़ने वाले के मन में यह बैठाना कि उत्तम नगर की घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ने ही अपना बेटा नहीं खोया, बल्कि आरोपित मुस्लिम परिवार का भी एक बच्चा लापता है। पुलिस को टैग करने की रणनीति इसलिए अपनाई गई ताकि आरोपों को गंभीरता का रंग दिया जा सके। आम पाठक को लगे कि जब सीधे पुलिस से सवाल किया जा रहा है तो शायद बात में दम होगा।

इस अभियान में AIMIM से जुड़े नेता वारिस पठान से लेकर कई बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और इस्लामी कट्टरपंथी शामिल हैं। देख सकते हैं कैसे सबने लगभग एक जैसे शब्दों में ट्वीट कर इस कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की।

हालाँकि, यह नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं पाया क्योंकि द्वारका जिले के डीसीपी ने खुद पोस्ट करके इस सवाल का जवाब दिया। उन्होंने बताया कि जिस रिजवान को ‘लापता’ बताया जा रहा है, वह दरअसल इस मामले के मुख्य आरोपितों में से एक है। उसे गिरफ्तार किया जा चुका है और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के आदेश पर ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया गया है। यानी उसके गायब होने की कहानी पूरी तरह झूठी और भ्रामक है।

दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही पुलिस ने रिजवान के गायब होने के हल्ले पर सच्चाई सामने रखी, वैसे ही यही भीड़ दोबारा नया राग अलापने लगी। सवाल उठाया गया कि आखिर 14 साल के बच्चे को गिरफ्तार करने की जरूरत ही क्या थी।

सोशल मीडिया पर सक्रिय जाकिर अली त्यागी ने भी इसी सुर में लिखा कि परिवार के अनुसार वह ‘मासूम’ अभी 13–14 साल का है और उसे भी नहीं छोड़ा गया। उनके मुताबिक एक अकेले तरुण नाम के युवक की हत्या के आरोप में इतने लोगों- खासकर महिलाओं और बच्चों को घसीटना गलत है।

यह तर्क अपने आप में अजीब है। क्या किसी अपराध में शामिल व्यक्ति को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि उसकी उम्र कम है या वह किसी खास परिवार से आता है? अगर पुलिस के पास सबूत हैं कि रिजवान इस हत्या में शामिल था, तो कानून के मुताबिक उसे हिरासत में लिया जाना स्वाभाविक है।

दरअसल समस्या यह है कि कुछ लोग भीड़ हिंसा के उस पैटर्न को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं, जिसे देश कई बार देख चुका है। दिल्ली दंगों में बुर्का पहने महिलाओं की भीड़ द्वारा पुलिस पर हमला करने की घटनाएँ सामने आई थीं। कश्मीर में पत्थरबाजी के दौरान बच्चों को भीड़ का हिस्सा बनाकर आगे किया गया। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि कट्टरपंथी तत्व भीड़ तैयार करते समय उम्र और लिंग की परवाह नहीं करते।

उत्तम नगर की घटना में भी 4 मार्च को होली के दिन हुई हिंसा को लेकर कई चश्मदीद अपने बयान दे चुके हैं। पुलिस की जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की भूमिका खंगाली जा रही है। लेकिन इन सबके बीच ये वर्ग लगातार कोशिश कर रहा है कि असली मुद्दे से ध्यान भटक जाए। इनकी चिंता तरुण की हत्या पर नहीं, उसके परिवार के लिए नहीं, बल्कि आरोपितों के बचाव में है।

आज तरुण की हत्या पर संदेह करना साफ बताता है कि इस सेकुलर जमात के लिए सामने दिख रहा सच कोई महत्व नहीं रखता, इन्हें सिर्फ मजहब देखकर आवाज पीड़ित के लिए आवाज उठानी है। लेकिन ऐसे लोग ध्यान रखें, नैरेटिव कितना भी गढ़ा जाए, लेकिन तथ्य नहीं बदलते।

इस्लामी उम्माह के नाम पर भारत की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे इस्लामी कट्टरपंथी, हैदराबाद के अडानी-एलबिट प्लांट की जानकारियाँ की सार्वजनिक: जानें- कैसे दुश्मन मुल्कों तक पहुँचा रहे डिफेंस सीक्रेट

इस्लामिस्टों की वफादारी दूसरे देशों और नेताओं के लिए एक्सपोर्ट की जाती है। यह वफादारी अक्सर धर्म के आधार पर देशों और नेताओं के लिए बिना किसी शर्म के सपोर्ट और एकजुटता दिखाने के लिए दिखती है। इसके बदले भले ही भारत की विदेश नीति और नेशनल सिक्योरिटी को नुकसान उठाना पड़े।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की इजरायली हमलों में हत्या पर आँसू बहाने वाले ये लोग अब अपनी इजरायल विरोधी भडास को भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग पर आक्रमण कर निकाल रहे हैं। हैदराबाद में भारत-इजरायल जॉइंट अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया ड्रोन समेत डिफेंस से जुड़े कई हथियार बनाती है। इस पर ये लोग अब हमलावर हैं।

भारत के खिलाफ नफरत फैलाने के दौरान ये भूल जाते हैं कि वे भारत में रहते हैं और डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग उनके अपने देश को बाहरी खतरों से सुरक्षा मुहैया कराती है।

भारतीय इस्लामिस्ट हैदराबाद में अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की खतरनाक रूप से तोड़-मरोड़कर तस्वीर पेश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और पोस्ट पटे पड़े हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि भारत किस तरह ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार, खासकर हर्मीस 900 UAV ड्रोन एक्सपोर्ट कर रहा है।

वे इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते झगड़े के बीच भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। बताया जा रहा है कि अडानी-एलबिट जॉइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री में बनने वाली ड्रोन का इस्तेमाल इजरायल हमले में कर रहा है। पहले इसका इस्तेमाल गाजा में हुआ और अब ईरान में हो रहा है।

इस्लामिस्ट पोस्ट लिख रहे हैं और इमोशनल वीडियो बना रहे हैं, जिनमें अक्सर अडानी-एलबिट ज्वाइंट वेंचर की हैदराबाद फैक्ट्री की सही लोकेशन की डिटेल्स होती हैं। ऐसी ही एक पोस्ट में, मुशीर खान नाम के एक व्यक्ति ने दावा किया कि इजरायल पिछले 11 सालों से भारत में ड्रोन और मिसाइल बना रहा है और इन ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल पहले इजराइल के फिलिस्तीन के खिलाफ युद्ध में किया गया था और अब ईरान के खिलाफ किया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “किसी को यह पसंद नहीं आता, जब आपके पड़ोस में किसी दूसरे देश के लिए हथियार बनाने वाली फैक्ट्री हो।”

अनीस अहमद नाम के एक यूजर ने X पर यही वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा, “अगर पिछले 11 सालों से गौतम अडानी और इजरायल हैदराबाद में ड्रोन-मिसाइल बनाने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं… और उन्हीं हथियारों का इस्तेमाल गाजा पट्टी में नरसंहार और ईरान के खिलाफ किया जा रहा है… तो सवाल यह है कि एक नाजायज देश के साथ पार्टनरशिप करके दुनिया को क्या मैसेज दिया जा रहा है? असदुद्दीन ओवैसी साहब और राहुल गाँधी जी इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं? क्या यह सिर्फ एक अफवाह है… या एक बड़ा सच है जिसे दबाया जा रहा है?”

एक आदिल सिद्दीकी ने भी मुशीर खान का वीडियो शेयर करते हुए इस गलत दावे को आगे बढ़ाया कि इजरायल भारत में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है, ताकि गाजा और ईरान को निशाना बनाया जा सके।

कविश अजीज, जो खुद को पत्रकार कहता है और एक घोर कट्टरपंथी है। उसने दावा किया कि इजरायल भारत में हथियार बना रहा है, जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन के बाद ईरान में किया जा रहा है।

अजीज ने 9 मार्च 2026 के पोस्ट में लिखा, “क्या आप जानते हैं??? इज़राइल पिछले 11 सालों से हैदराबाद में मिसाइल और ड्रोन बना रहा है। अडानी डिफेंस ने 2016 में इजरायल के एल्बिट सिस्टम्स के साथ मिलकर हर्मीस 900 ड्रोन बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर बनाया था। ये वो ड्रोन हैं जिनका इस्तेमाल फिलिस्तीन युद्ध में किया गया था और अब ईरान युद्ध में किया जा रहा है। अडानी डिफेंस इजरायली हथियार इंडस्ट्री के साथ मिलकर Tavor TAR-21, X-95 Tavor, नेगेव लाइट मशीन गन, गैलिल ACE असॉल्ट राइफ़ल, गैलिल DMR, और मसाडा पिस्टल जैसे छोटे हथियार भी बनाती है। 2020 में भारतीय सेना के लिए 16,479 Negev NG-7 LMGs के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था।”

क्या भारत ने फिलिस्तीन और ईरान के खिलाफ इजरायल को अडानी-एलबिट के बनाए ड्रोन और मिसाइल सप्लाई किए? इन इस्लामिस्टों की सोच को समझने से पहले, जो डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग जैसे मामलों को भी इस्लामिक उम्माह के नजरिए से देखते हैं, उनके बारे में कुछ बातें साफ करना जरूरी है।हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी जरूरी नहीं कि मिसाइल ही बनाती हो।

2016 में अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस और इजरायली डिफेंस मैन्युफैक्चरर एलबिट सिस्टम्स ने भारत में हर्मीस 900 मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस अनमैन्ड एरियल व्हीकल बनाने के लिए एक जॉइंट वेंचर, अडानी-एलबिट एडवांस्ड सिस्टम्स इंडिया लिमिटेड बनाया था। 2018 में अडानी एलबिट JV ने तेलंगाना के हैदराबाद में अपनी पहली मानवरहित UAV मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी खोली। JV द्वारा भारत में बनाए गए हर्मीस 900 के वर्शन को दृष्टि 10 कहा जाता है। हालाँकि भारतीय सेना कंपनी की मुख्य कस्टमर है, लेकिन यह ड्रोन एक्सपोर्ट करने के लिए भी आजाद है।

यह याद रखना चाहिए कि 2024 में, भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट ग्रुप इस बात से नाराज था कि भारत ने हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी में बने 20 हर्मीस 900 ड्रोन इजरायल को सप्लाई किए थे। हालाँकि, ये भारत के पूरे डिफेंस इकोसिस्टम का बहुत छोटा हिस्सा था। अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री मुख्य रूप से भारतीय डिफेंस जरूरतों को पूरा करती है, इजरायल की नहीं।

ये ड्रोन खास तौर पर भारत की सुरक्षा कर रहे हैं, जहाँ ये इस्लामिस्ट रहते हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए संयंत्र बनाया गया है।

भारत को इजरायल के लिए एक बड़े हथियार एक्सपोर्टर के तौर पर दिखाना असलियत से बिल्कुल अलग है। भारत पहले फिलिस्तीन और अब ईरान के खिलाफ इजरायल को हथियार दे रहा है, ये कहना बिलकुल गलत है। भारत इजरायल से सबसे ज्यादा हथियार खरीदता है, जो इजरायल के कुल डिफेंस एक्सपोर्ट का 34% है। इजरायल ने हाल के सालों में भारत को बराक-8 मिसाइलें और हेरॉन ड्रोन सप्लाई किए हैं।

गाजा युद्ध के वक्त भारत ने साफ तौर पर कहा था कि वह गाजा में इस्तेमाल के लिए इजराइल को हथियार या गोला-बारूद सप्लाई नहीं करेगा। सभी एक्सपोर्ट एक एंड-यूजर एग्रीमेंट के तहत होंगे। अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने पहले ही तय कर दिया था कि हर्मीस 900 ड्रोन निगरानी और टोही मिशन के लिए बनाए गए थे और इन्हें हमले के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

ईरान-इजरायल युद्ध पर वापस आते हैं, इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भारत ने ईरान के खिलाफ इस्तेमाल के लिए इजरायल को हर्मीस 900 ड्रोन या कोई भी ‘मिसाइल’ एक्सपोर्ट की है। यह पूरा दावा कि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट ईरान के खिलाफ इजरायल के युद्ध के लिए ड्रोन बना रही है, पूरी तरह से एक प्रोपेगैंडा है और देश को जनता को गुमराह करने वाला है।

हर्मीस 900 एक इजरायली ड्रोन है, और इजरायली डिफेंस फोर्स पहले से ही बड़ी संख्या में हर्मीस 900 ड्रोन और उनके पुराने वर्जन हर्मीस 450 ड्रोन का इस्तेमाल करती हैं। हर्मीस असल में दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले मिलिट्री ड्रोन में से एक है। कई देशों ने इसे अपनी फोर्स के लिए खरीदा है। सिर्फ इसलिए कि हैदराबाद अडानी-एलबिट फैसिलिटी हर्मीस 900 ड्रोन बनाती है, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ईरान में लड़ाई में इस्तेमाल के लिए इन ड्रोन को इजरायल को एक्सपोर्ट कर रहा है।

कट्टरपंथी सोच वाले मुशीर खान ने ईरान के खिलाफ अपने हमले में इजरायल द्वारा हर्मीस 900 सर्विलांस ड्रोन का इस्तेमाल करने के बारे में अपने सवाल पर ChatGPT के जवाब पर भरोसा किया। लेकिन, चैटबॉट में कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि ईरान विरोधी ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन भारत में बने हैं। यह साफ है कि इजरायल लोकल बने हर्मीस 900 UAVs का इस्तेमाल कर रहा है। फिर भी मुशीर खान और दूसरे इस्लामी कट्टरपंथी झूठी और डरावनी स्टोरी बनाकर सोशल मीडिया पर फैला रहे हैं, ये पूरी तरह गैरजिम्मेदाराना रवैया है। इसमें साजिश की बू आती है क्योंकि इस दौरान बड़ी चालाकी से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

भारत की सोच संतुलित रहा है, चाहे वह इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध हो या ईरान और इजरायल-US के बीच चल रहा युद्ध। मोदी सरकार ने इजरायल के साथ डिफेंस टेक पार्टनरशिप के जरिए, ईरान के साथ एनर्जी और लॉजिस्टिक्स संबंधों के जरिए, और अरब देशों के साथ बड़े आर्थिक संबंधों के जरिए संबंधों को संतुलित बना कर रखा है। भारत अकेला ऐसा देश है, जिसके उन देशों के साथ अच्छे संबंध हैं जिनके साथ पुरानी दुश्मनी है या जो युद्ध में हैं, चाहे वह रूस-यूक्रेन हो, इजरायल-फिलिस्तीन हो, थाईलैंड-कंबोडिया हो, और इजरायल-ईरान हो या ईरान-गल्फ देश हों।

हालाँकि हैदराबाद में अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी की लोकेशन सीक्रेट नहीं है, लेकिन मैप इमेज को हाईलाइट करना, हमला करने के लिए उकसाने जैसा है।

भारत और इजरायल के बीच अडानी-एलबिट डिफ़ेंस मैन्युफ़ैक्चरिंग जॉइंट वेंचर को ईरान के साथ किसी तरह का ‘धोखा’ बताना बेबुनियाद, बेईमानी भरा और असल में भारतीय इस्लामिस्टों द्वारा भारत के साथ धोखा है। भारतीय इस्लामिस्ट जो प्रोपेगैंडा चला रहे हैं, वह एक कुत्ते के भोंकने जैसा है, जिसे कम IQ वाली सांप्रदायिक नफरत भड़काने, हैदराबाद में अडानी-एलबिट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी को टारगेट बनाने, भारत के अपने डिफेंस सेक्टर को नुकसान पहुँचाने और भारत के खिलाफ देश और दुनिया भर में गुस्सा भड़काने के लिए बनाया गया है।

इस्लामिस्ट भूल जाते हैं कि वे एक सुरक्षित और मजबूत भारत में रह रहे हैं, न कि युद्ध से जूझ रहे गाजा या ईरान में। किसी देश में बने हथियार न सिर्फ उस देश को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि वे जरूरी मिलिट्री लेवरेज और स्ट्रेटेजिक रिलेशन भी खरीदते हैं, जिससे वह देश लड़ाई और डिप्लोमेसी में मजबूत बनता है। भारत में कोई भी डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग प्लांट, जो भारतीय मिलिट्री को सप्लाई करता है और दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करता है, वह एक जरूरी पिलर है, जो भारत को दुनिया में सुरक्षित और मजबूत बनाए रखता है।

ये इस्लामिस्ट युद्ध में झुलस रहे गाजा और ईरान से दूर भारत में सुरक्षित हैं। ये एक मजबूत और स्थिर भारत में रह रहे है, जिसके अच्छे डिप्लोमैटिक और स्ट्रेटेजिक रिलेशन हैं। इसके बदौलत यहाँ शांति है।

भारत की विदेश और रक्षा नीति उन लोगों की भावनाओं या ‘धार्मिक’ भावनाओं से तय नहीं होती और न ही होनी चाहिए, जो विदेशी नेताओं और देशों को अपने देश और उसके हितों से ज्यादा अहमियत देते हैं।

हैदराबाद में चल रहे भारत-इजरायल जॉइंट वेंचर के खिलाफ भारतीय इस्लामी कैंपेन उस प्रोपेगैंडा कैंपेन जैसा है जो पाकिस्तानी जिहादी फरवरी 2026 के आखिर में ईरान और इजरायल+अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से कर रहे हैं। पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा सोशल मीडिया अकाउंट्स ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारतीय सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी के वीडियो बनाए और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए, जिसमें वे ‘मान रहे’ थे कि भारत ने ईरान के खिलाफ इजराइल की मदद की।

इन झूठे बयानों को ईरान के खिलाफ भारत का ‘खुला धोखा’ बताया, ताकि भारत के खिलाफ दुनिया भर में नफरत फैलाई जा सके। ये लोग यह साबित करने में लगे हैं कि भारत ने ईरान को धोखा दिया। इसके लिए झूठ प्रपंच और प्रोपेगेंडा सबकुछ फैला रहे हैं। यह तब भी फैलाई जा रही है, जब भारत ने कम से कम तीन ईरानी नौसैनिक जहाजों को पनाह देने की पेशकश की, और ईरान ने नई दिल्ली को धन्यवाद भी दिया।

भारतीय इस्लामिस्ट भारत से नफरत करने वाले पाकिस्तानी जिहादियों से अलग नहीं हैं। उनका बर्ताव असल में ईरान और फिलिस्तीन के साथ ‘इस्लामिक उम्मा सॉलिडैरिटी’, मोदी-विरोधी झुकाव, दंगा भड़काने की मंशा रखने वाले हैं, वे अपने देश के हितों को भूल जाते हैं। इस्लामिस्टों को पक्का पता है कि मोदी सरकार को ‘प्रो-इजरायल’ दिखाने से वे अपने आप ‘एंटी-मुस्लिम’ लगेंगे। चल रहे प्रोपेगैंडा का असली मकसद सिर्फ भारत की डिफस मैन्युफैक्चरिंग के खिलाफ नफरत पैदा करने तक ही सीमित नहीं लगता, बल्कि देश में अशांति फैलाना भी इसका मकसद है।

यह देखा गया कि कैसे, इजरायली हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के मारे जाने की खबरें आने के बाद, लखनऊ, जम्मू और कश्मीर, कारगिल और दूसरे इलाकों में शिया मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई लोगों ने तो युद्ध से जूझ रहे ईरान जाकर खामेनेई के लिए इजरायल और अमेरिका से लड़ने की इच्छा भी जताई। इनमें से ज्यादातर ने बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की कभी निंदा नहीं की। भारत की आधिकारिक विदेश नीति के खिलाफ जाकर भी विदेशी नेताओं और देशों को इस तरह का धर्म के आधार पर सपोर्ट करना खतरनाक और देशद्रोह जैसा है।

हालाँकि बातें अलग-अलग है। लेकिन, 2022 में नूपुर शर्मा के ‘ईशनिंदा’ वाले मामले में भी ऐसी ही कोहराम मचाया गया था। इन्हीं इस्लामिस्ट लोगों ने कुरान की एक बात कोट करने पर BJP की पूर्व प्रवक्ता के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग की थी। कुछ ही समय में देश भर में दंगाई कट्टरपंथी भीड़ ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। ये गुस्सा खाड़ी देशों तक फैल गया। ऐसा लगता है कि नूपुर शर्मा वाले मामले की तरह ही कट्टरपंथी अब अडानी-एलबिट जॉइंट डिफेंस वेंचर के पीछे पड़ गए हैं और हैदराबाद फैक्ट्री के खिलाफ डॉग-व्हिसलिंग कर रहे हैं।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

महाबोधि महाविहार सौंपने की माँग को लेकर सड़क पर बौद्ध, केंद्रीय मंत्री का मिला साथ: जानें- 1949 का वो कानून जिसमें चाहते हैं बदलाव और कोर्ट का क्या रहा है फैसला?

बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधि महाविहार, जो दुनिया भर के बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है, एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में है। वर्तमान में चर्चा इस बात पर गर्म है कि इस मंदिर का पूरा प्रबंधन बौद्ध समुदाय को सौंप दिया जाना चाहिए। इस आंदोलन को तब और मजबूती मिली जब भंते धम्मशिखर ने ‘बोधगया मंदिर अधिनियम 1949’ को एक ‘काला कानून’ करार दिया और इसे तुरंत बदलने की माँग की। उनका तर्क है कि यह कानून बौद्धों के धार्मिक अधिकारों पर एक पाबंदी की तरह है क्योंकि यह एक शुद्ध बौद्ध स्थल के प्रबंधन में गैर-बौद्धों की भागीदारी को अनिवार्य बनाता है।

रामदास आठवले का समर्थन

इस विवाद में केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के बयान ने घी का काम किया है। उन्होंने अपनी एक विस्तृत पोस्ट में लिखा, “अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर का निर्माण भारत के करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा विषय था। जब यह सपना साकार हुआ, तब पूरे देश ने उसका स्वागत किया। अलग-अलग विचारधाराओं और धर्मों के लोगों ने भी इसे सकारात्मक दृष्टि से स्वीकार किया, क्योंकि यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था और पहचान से जुड़ा प्रश्न था। यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और धार्मिक सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक भी बना।”

आठवले ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “उसी प्रकार बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार पूरी दुनिया के बौद्ध अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र तीर्थस्थल है। यहीं भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई और यहीं से शांति, करुणा और समता का संदेश पूरी दुनिया में फैला। इसलिए यह स्वाभाविक है कि इस पवित्र स्थल के प्रबंधन में बौद्ध समाज की निर्णायक भूमिका हो। यदि राम मंदिर के निर्माण को हिंदू समाज की आस्था के सम्मान के रूप में स्वीकार किया गया, तो महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्धों के हाथों में देने की माँग भी उसी सम्मान और समानता की भावना से देखी जानी चाहिए।”

रामदास अठावले ने संवैधानिक पहलुओं पर जोर देते हुए आगे लिखा, “इस विषय का एक महत्वपूर्ण पहलू संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा है। भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 के तहत प्रत्येक धर्म को अपनी आस्था का पालन करने और अपने धार्मिक संस्थानों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद 25 नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का संचालन और संस्थाओं का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब महाबोधि महाविहार बौद्ध धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है, तो उसके प्रबंधन में बौद्ध समाज को पूर्ण अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।”

रामदास आठवले ने अपनी माँग को स्पष्ट करते हुए अंत में लिखा, “वर्तमान में बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 के तहत महाबोधि महाविहार के संचालन के लिए एक प्रबंधन समिति बनाई गई है, जिसमें हिंदू और बौद्ध दोनों समुदायों की भागीदारी का प्रावधान है और जिला अधिकारी (DM) को अध्यक्ष बनाया जाता है। समय के साथ यह बहस तेज हुई है कि दुनिया के सबसे पवित्र बौद्ध स्थल के प्रबंधन में बौद्धों की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। जब अन्य धर्मों के प्रमुख धार्मिक स्थलों का संचालन उनके अपने समुदायों के हाथों में होता है जैसे सिखों के लिए गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी या मुसलमानों के लिए वक्फ बोर्ड तो महाबोधि महाविहार के मामले में भी समान सिद्धांत लागू होने चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस मुद्दे को किसी विवाद या टकराव के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और धार्मिक सम्मान के दृष्टिकोण से देखा जाए। जिस प्रकार देश ने राम मंदिर के निर्माण को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, उसी प्रकार यदि महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समाज को सौंपा जाता है, तो उसका भी स्वागत होना चाहिए। यह कदम न केवल बौद्ध समाज के विश्वास को मजबूत करेगा, बल्कि भारत की धार्मिक स्वतंत्रता और समावेशी लोकतांत्रिक परंपरा को भी और सशक्त बनाएगा। भारत की असली ताकत उसकी विविधता और परस्पर सम्मान में है। जब हम एक-दूसरे की आस्था और अधिकारों का सम्मान करते हैं, तभी संविधान की भावना मजबूत होती है। इसलिए महाबोधि महाविहार के प्रश्न का समाधान भी उसी संवैधानिक भावना समान अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर होना चाहिए।”

सोशल मीडिया पर क्यों हो रहा है कड़ा विरोध?

रामदास आठवले की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर एक नई जंग छिड़ गई है। कई हिंदू संगठनों और स्थानीय बिहारियों ने इस माँग का पुरजोर विरोध किया है। शुभम शर्मा नाम के एक यूजर ने आठवले की पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए लिखा कि उन्होंने बिहार चुनाव कवरेज के दौरान महाबोधि मंदिर का दौरा किया था और वहाँ पाया कि कुछ लोग मुख्य मंदिर से भगवान शिव, विष्णु और गणपति की मूर्तियों को हटाने के लिए लड़ रहे हैं। शुभम के अनुसार, हिंदू समाज किसी भी कीमत पर इस तरह के प्रचार को स्वीकार नहीं करेगा, खासकर तब जब यह एनडीए सरकार के एक केंद्रीय मंत्री की ओर से आ रहा हो।


विवाद का एक और पहलू क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा है। ‘द बिहार इंडेक्स’ नामक हैंडल ने लिखा कि बोधगया महाराष्ट्र नहीं है और बिहार में बौद्ध और हिंदू धर्म का बराबर सम्मान किया जाता है। उन्होंने आठवले पर बँटवारे की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक मराठी नव-बौद्ध बोधगया नहीं आए थे, तब तक यह कोई मुद्दा ही नहीं था।

इसी तरह सत्यम वत्स ने चेतावनी देते हुए लिखा कि महाबोधि मंदिर बिहार की संपत्ति है और यह बिहार के लोगों के संरक्षण में फला-फूला है। उन्होंने नव-बौद्धों और ‘भीमटों’ को किसी भी दुस्साहस के खिलाफ कड़े लहजे में चेतावनी दी। सोशल मीडिया पर लोग 1903 की पुरानी तस्वीरें भी साझा कर रहे हैं, जिनमें नागा साधुओं को मंदिर परिसर में ध्यान करते हुए दिखाया गया है। लोगों का तर्क है कि हिंदू और बौद्ध सदियों से यहाँ शांति से रहे हैं, लेकिन अब इसे कब्जाने की कोशिश की जा रही है।


महाबोधि महाविहार का गौरवशाली इतिहास

महाबोधि महाविहार का इतिहास बेहद प्राचीन और गहरा है। इसका निर्माण मूल रूप से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। यह वही स्थान है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध को निरंजना नदी के पास एक पीपल के पेड़ (बोधि वृक्ष) के नीचे कठिन तपस्या के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था। बाद के वर्षों में, पाल राजाओं के समय में भी यह बौद्ध धर्म का मुख्य केंद्र बना रहा। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी 7वीं शताब्दी में यहाँ की यात्रा की थी और इसकी महिमा का वर्णन किया था। हालाँकि, 13वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के हमले के बाद यहाँ बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होने लगा था।

ऐतिहासिक रूप से यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान मंदिर की ईंटों वाली संरचना और इसका पिरामिड जैसा शिखर गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी) के दौरान विकसित किया गया था। गुप्त शासक स्वयं हिंदू परंपराओं के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने बौद्ध स्थलों का जीर्णोद्धार और समर्थन किया। यह मंदिर परिसर केवल एक इमारत नहीं है, बल्कि इसमें सात पवित्र स्थल हैं जो बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के बाद के सात हफ्तों के ध्यान की याद दिलाते हैं। 1590 में एक हिंदू भिक्षु ने यहाँ मठ की स्थापना की थी और लंबे समय तक इस मंदिर का नियंत्रण हिंदुओं के पास रहा, जिसने आज के इस प्रबंधन विवाद की नींव रखी।

क्या है 1949 का मंदिर अधिनियम?

आजादी के बाद, मंदिर के प्रबंधन को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए सरकार ‘बोधगया मंदिर अधिनियम 1949‘ लेकर आई। इस कानून का उद्देश्य मंदिर का प्रशासन सुचारू रूप से चलाना और इसका संरक्षण सुनिश्चित करना था। इस अधिनियम के तहत एक प्रबंधन समिति बनाई गई जिसमें साझा प्रबंधन का प्रावधान रखा गया। इस कानून के अनुसार, समिति में कुल 9 सदस्य होते हैं, जिनमें 4 हिंदू और 4 बौद्ध सदस्य होते हैं।

गया के जिलाधिकारी (DM) इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं। कानून की एक दिलचस्प बात यह है कि यदि जिलाधिकारी हिंदू नहीं है, तो सरकार को एक हिंदू व्यक्ति को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करना होता है। बौद्ध समुदाय इसी ढांचे का विरोध कर रहा है और इसे अपने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप मानता है।

अदालत ने इस माँग पर क्या कहा था?

इस विवाद को लेकर अदालती लड़ाई भी काफी पुरानी है। 30 जून 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें 1949 के अधिनियम को चुनौती देते हुए मंदिर का पूरा प्रबंधन बौद्धों को सौंपने की माँग की गई थी। यह याचिका अधिवक्ता सुलेखा कुंभारे द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने दलील दी कि साझा प्रबंधन से बौद्धों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया।

जस्टिस की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वे अनुच्छेद 32 के तहत इस पर सीधे सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी कि वे अपनी माँग लेकर पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएँ। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि मंदिर के दशकों पुराने प्रबंधन ढांचे को बदलना इतना आसान नहीं है और इसके लिए विस्तृत कानूनी और ऐतिहासिक साक्ष्यों की आवश्यकता होगी।

मामला क्या है?

यह पूरा विवाद आस्था, इतिहास और कानूनी अधिकारों के बीच उलझा हुआ है। एक तरफ बौद्ध समुदाय है, जो इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और गरिमा का विषय मानता है और चाहता है कि उनका सबसे पवित्र स्थल केवल उन्हीं के द्वारा प्रबंधित हो। दूसरी तरफ हिंदू पक्ष और स्थानीय बिहारियों का तर्क है कि बुद्ध उनके लिए भी पूजनीय हैं और सदियों से हिंदू राजाओं और संन्यासियों ने इस मंदिर की रक्षा और सेवा की है। 1949 का कानून इन दोनों पक्षों के बीच एक पुल की तरह बनाया गया था, लेकिन अब इस पुल को हटाकर अधिकार की नई रेखा खींचने की माँग हो रही है। सोशल मीडिया पर चल रहा विरोध इस बात का संकेत है कि यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि समुदायों की गहरी पहचान से भी जुड़ गया है।