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खुद के लिए चाहिए ‘हलाल’ सिस्टम, लेकिन काँवड़िया रूट में ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी: लिबरल थेथरई के बीच हलाल के बारे में जानिए सब कुछ

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के जिला प्रशासन में हाल ही में एक आदेश जारी किया है। इस आदेश में कहा गया है कि जिले के भीतर जिन रास्तों से कांवड़िये निकलते हैं, उन पर पड़ने वाली खान-पान की दुकानों पर दुकानदार के नाम का बोर्ड लगे। यह आदेश काँवड़ यात्रा में असुविधा ना हो, इसके लिए किया गया है। इस आदेश पर सोशल मीडिया पर लिबरल-वामपंथी समुदाय काफी उछलकूद मचाए हुए है। हालाँकि, यही गैंग तब कोई प्रश्न नहीं उठाता जब खाने-पीने के सामानों में 18% समुदाय की ‘हलाल’ को जिद बहुसंख्यकों पर थोपी जाती है।

जहाँ एक ओर इस मुद्दे पर बहस चल रही है कि किसी दुकानदार को अपना नाम दिखाना अनिवार्य किया जाए या नहीं, वहीं इस बीच यह जान लेते हैं कि देश की बहुसंख्यक आबादी पर थोपे जाने वाला हलाल प्रमाणन क्या है, यह कैसे काम करता है, इसकी अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है और इससे मुस्लिम संगठनों को कितनी कमाई होती है।

हलाल है क्या?

हलाल और हराम दो शब्द हैं। हलाल का मतलब है जिसकी अनुमति हो और हराम का मतलब है जिसकी अनुमति ना हो। हलाल मुस्लिमों के खाने-पीने के सामान और विशेष कर मांस से सम्बन्धित है। यानी जो हलाल उत्पाद हैं, उन्हें मुस्लिम खा सकते हैं। जो उत्पाद या हराम हैं, उन्हें मुस्लिम नहीं खा सकते।

मांस का हलाल होना इस बात का प्रमाणन है कि वह उसी तरीके से काटा गया है, जैसा इस्लामी किताबों में बताया गया है। यानी मांस काटने की एक निश्चित इस्लामी विधि ही हलाल है। मांस का हलाल होना इस बात से प्रमाणित होता है कि उस पशु को किसने काटा है, कैसे काटा है, किस दिशा में काटा है और उसको काटने वाले का मजहब क्या है।

जानवर को क्यों करते हैं हलाल?

किसी जानवर को जब हलाल तरीके से काटा जाता है, तो उसके शरीर से तेजी से खून निकलता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस्लाम के भीतर किसी भी जानवर के खून के सेवन की इजाजत नहीं है। यह हराम की श्रेणी में है, यह नहीं लिया जा सकता। इसीलिए हलाल प्रक्रिया में काटे जाने वाले जानवर के शरीर से तेज गति से खून निकलना जरूरी है। जानवर के शरीर से खून निकलने के बाद वह खाने योग्य हो जाता है क्योंकि खून बह चुका है।

जानवर को कैसे करते हैं हलाल?

किसी पशु का मांस हलाल होने के लिए इस्लामी कानून (शरिया) के अनुसार, एक तेज चाकू के उपयोग की आवश्यकता होती है, जिसमें किसी तरह की जंग ना हो और उसकी धार मुड़ी ना हो। इस बात पर जोर दिया जाता है कि चाकू का ब्लेड जानवर की गर्दन से 2-4 गुना बड़ा हो।

हलाल केवल एक समझदार, वयस्क मुस्लिम व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए, जो इस्लामी रीति-रिवाजों से परिचित हो। एक गैर-मुस्लिम द्वारा जिबह किए गए जानवर हलाल नहीं कहे जाएँगे।मारे जाने वाले जानवर को काटने से पहले अच्छी तरह से खिलाया जाना चाहिए, पीने के लिए साफ पानी दिया जाना चाहिए और इसे उसके बेजान होने से पहले किया जाना चाहिए।

यूरोपीय संघ में हलाल प्रमाणन विभाग का भी कहना है कि हलाल के समय अल्लाह के नाम का आह्वान (कलमा पढ़ा जाना) किया जाना चाहिए: बिस्मिल्लाह रहमाने… अल्लाह-हू-अकबर।अलग-अलग जानवरों को अलग-अलग तरीकों से हलाल किया जाता है।

उदाहरण के लिए, एक भेड़ को क्षैतिज स्थिति में हलाल किया जाता है, जबकि जुगाली करने वालों को एक सीधी स्थिति में लिटाकर, पिछले पैर से दबाकर हलाल किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश हलाल बूचड़खाने जानवर को लिटाकर ही हलाल करते हैं। हलाल के लिए, चीरा गर्दन पर और आहार नली नीचे लगाया जाना चाहिए। श्वासनली, आहारनाल, गले की नसें और जानवर की कैरोटिड धमनियों को बिना किसी रुकावट या देरी के तेज गति में काटा जाना चाहिए।

कौन देता है हलाल का प्रमाण पत्र?

भारत में खाने पीने के सामान का प्रमाणन करने वाला FSSAI हलाल सर्टिफिकेट नहीं देता है। भारत में, कई धार्मिक निकाय हैं जो उत्पादों को तथाकथित प्रमाण पत्र जारी करते हैं, इस्लामी विश्वास के अनुसार उनकी ‘शुद्धता’ तय करते हैं। भारत में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र (जमीयत उलमा-ए-हिंद की एक राज्य इकाई) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट जैसे कुछ संगठन कोई उत्पाद हलाल है नहीं, इसका प्रमाण पत्र जारी करते हैं।

हलाल की क्या इकॉनमी?

अब तक हमने जान लिया कि हलाल है क्या, इसकी क्या जरूरत और इसका प्रमाण पत्र कौन देता है। लेकिन अब यह प्रमाणन कोई फ्री में तो करेगा नहीं, इसके लिए पैसे लगते होंगे। जब सरकार ही किसी उत्पाद के प्रमाणन के लिए शुल्क लेती है तो ये संगठन क्यों ना ले। जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट की वेबसाइट बताती है कि वह हलाल इकोसिस्टम में आने वाली एक कम्पनी से ₹60,000 रजिस्ट्रेशन और फिर ₹1500 प्रति उत्पाद हलाल प्रमाणन के लिए लेते हैं। इसके ऊपर से GST भी लगता है।

यानी मान लीजिए आप खाने-पीने के 10 उत्पाद बनाते हैं और उसको हलाल प्रमाणन की आवश्यकता है तो आपको ₹75,000 + GST देना होगा। यह धनराशि सिर्फ तीन साल के लिए है, इसके बाद आपको दोबारा फीस देनी होगी। चूंकि, अलग-अलग कम्पनियाँ अलग स्तर पर उत्पाद बनाती हैं, इसलिए यह धनराशि बढ़ती जाती है।

यह धनराशि अंत में हमसे और आपसे वसूली जाती है। हलाल का प्रमाणन भारत के बाजार में भले किसी ने ना माँगा हो, मुस्लिम देशों में उत्पाद के लिए यह जरूरी है। हालाँकि, भारत में भी कम्पनियाँ अपने उत्पाद हलाल प्रमाणन के साथ ही बेचती हैं। यानी 18-20% आबादी की मर्जी बाकी 80% लोगों पर थोपी जाती है।

जब हलाल सही तो नाम दिखाना क्यों नहीं?

अब यह अब बात करने के बाद मूल प्रश्न पर लौटते हैं। प्रश्न है कि आखिर हलाल क्यों? तो इसका उत्तर है कि मुस्लिमों की धार्मिक मान्यता हलाल खाद्य पदार्थ खाने की है, इसलिए हलाल। यानी मुस्लिमों को अपनी पसंद का खाना और वह खाना किस तरीके से बने, यह निर्णय करने का अधिकार है।

अब हलाल मांस में एक शर्त है कि जानवर काटने वाला कसाई मुस्लिम ही हो, किसी दूसरे धर्म के आदमी ने अगर जानवर काटा तो वह हलाल नहीं होगा। यानी सीधे तौर पर बाकी लोगों को इस धंधे से बाहर करना। तो जब मुस्लिम का काटा मांस ही मुस्लिम खाएँगे, उसका प्रमाणन मुस्लिम ही देंगे फिर हिन्दुओं का अपने आराध्य की कांवड़ उठाते समय किस दुकान से सामान ले रहे हैं, यह जान जाना कोई बहस की बात कैसे? वह भी तब जब ना इससे कोई दूसरा व्यक्ति धंधे से बाहर हो रहा है, ना इस प्रकार नाम दिखने का कोई पैसा लिया जा रहा है।

‘तुम जब नॉर्थ की हो तो बेंगलुरु में काम क्यों करती हो’: कर्नाटक में ‘लोकल कोटा’ से जो आग लगाना चाहती है कॉन्ग्रेस, उसमें झुलसी महिला ने शेयर की आपबीती

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने कन्नड़ लोगों को प्राइवेट नौकरियों में 50 से 75% तक का आरक्षण देने वाला बिल भले ही IT कंपनी संगठन NASSCOM के विरोध के बाद रोक दिया हो, लेकिन इस बीच कर्नाटक सरकार के फैसले से एक नई बहस छिड़ गई है। इसका मूल यही है कि आखिर अगर ये बिल लागू हो जाता तो इसके परिणाम क्या होते और कैसे इसका असर गैर कन्नड़ लोगों पर पड़ता। इस बहस में तमाम सोशल मीडिया यूजर्स अपने तर्क दे रहे हैं और इसी बीच एक महिला की आईडी से उसका पोस्ट वायरल हुआ है जिसमें उसने बेंगलुरु में काम करने का अनुभव साझा किया है।

ये पोस्ट बताता है कि कैसे एक हिंदी भाषी राज्य से गैर हिंदी भाषी राज्य में जाने पर लोगों को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिस महिला की बात हो रही है उसका यूजर नेम @shaaninani है। पोस्ट के अनुसार महिला बताती हैं कि वो बेंगलुरु में काम करती थीं और उनकी शादी पंजाब में हुई थी। नॉर्थ इंडिया के रीति-रिवाजों के अनुसार उन्हें 1 साल तक चूड़ा पहनना था। उन्होंने ऐसा किया भी। मगर जब वो बेंगलुरु में इसे पहनकर गईं और ऑटो में सफर किया तो वहाँ उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा।

@shaaninani ने अपने पोस्ट में बताया , “मैं बेगलुरु में डेढ़ साल से काम कर रही थी। शादी पंजाब में हुई थी तो मुझे चूड़ा एक साल तक पहनना था क्योंकि वो मेरी संस्कृति का हिस्सा था और इससे ये साफ था कि मैं नॉर्थ इंडिया से हूँ।” आगे उन्होंने बताया कि उन्हें फ्लैट से ऑफिस और ऑफिस से फ्लैट के बीच में बहुत कुछ झेलना पड़ता था। बेंगलुरु में लोकल ऑटो ड्राइवर उनसे पूछते थे, “तुम जब नॉर्थ की हो तो फिर बेंगलुरु में काम क्यों करती हो, क्या कन्नड़ सीख रही हो, क्या मौसम के अलावा कुछ और अच्छा लगता है, पैसे ज्यादा माँगते थे क्योंकि मैं नवविवाहिता थी और ऐसे दर्शाते थे जैसे वो हिंदी-अंग्रेजी का एक शब्द भी नहीं समझ पा रहे।”

शानी ने लिखा कि उनका स्थानीय लोगों के साथ बहुत बुरा अनुभव रहा है। इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि एक बार उन्होंने पावर कट की शिकायत करने के लिए BESCOM को फोन किया, लेकिन वहाँ कॉल उठाने वाले व्यक्ति ने कॉल ये कहकर काट दिया, “नो हिंदी, नो इंगलिश, सिर्फ कन्नड़।” महिला के अनुसार, वहाँ लोगों को सिर्फ कन्नड़ भाषी लोगों की चिंता है।

इसके बाद महिला ने बताया कि उनके आसपास बहुत नकारात्मकता थी। उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ का मौसम भी नहीं पसंद था। हमेशा बारिश होती थी। बाहर नहीं जा सकते थे। अगर चले जाओ तो कैब नहीं मिलती थी। अगर कैब मिल गई तो कहीं जाने में घंटों लग जाते थे। महिला बताती हैं कि उन्होंने इन्हीं सब वजहों के बाद अपनी जॉब छोड़ दी थी। उन्हें घर की याद आने लगी थी। आगे महिला ने ये भी लिखा कि गुड़गाँव आने के बाद उनके एनर्जी लेवल में बहुत बदलाव आया। अब वो लंबी लंबी वॉक पर जाती हैं, अच्छा खाना खाती है, जहाँ मन हो घूमती हैं। कोई ऑटोड्राइवर उनसे बेतुके सवाल नहीं करता है।

नोट- ये खबर सोशल मीडिया पर वायरल होते @shaaninani के पोस्ट पर आधारित है।

6 साल की बेटी के साथ बस से जा रही थी महिला, मुहम्मद कुन्ही दिखाने लगा गुप्तांग: फोटो वायरल होने के बाद पुलिस ने किया गिरफ्तार, केरल का मामला

केरल के कासरगोड में बस में सवार एक महिला और उसकी बेटी के सामने एक आदमी ने अपना गुप्तांग लहराया। महिला ने अश्लीलता करने वाले इस युवक फोटो खींच लिया और पुलिस को बता दिया। पुलिस ने युवक की तलाश करके उसे गिरफ्तार कर लिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार (15 जुलाई, 2024) को एक महिला अपनी 6 वर्षीय बेटी के साथ कासरगोड के कान्हनगाड़ से बेकाल जा रही थी। महिला के साथ बस में अधिक यात्री नहीं थे। इसी दौरान महिला के बराबर वाली सीट पर एक व्यक्ति बैठा हुआ था।

इस व्यक्ति ने कुछ देर के बाद अश्लीलता चालू कर दी। उसने अपना गुप्तांग लहराना चालू कर दिया। उसने महिला और उसकी बेटी को अपना गुप्तांग दिखाया। महिला ने उसकी हरकत को इसके बाद कैमरे में रिकॉर्ड करना चालू कर दिया और फोटो-वीडियो ले ली।

महिला ने इसके बाद यह सूचना बस के कंडक्टर को दी लेकिन तब तक वह बस से उतर गया था। इसके बाद महिला ने बेकाल पुलिस थाने में व्यक्ति के विरुद्ध मामला दर्ज करवाया और उसकी फोटो वीडियो भी दी। इसके बाद पुलिस ने उसकी तलाश चालू कर दी।

पुलिस ने इस व्यक्ति को बुधवार (17 जुलाई, 2024) को गिरफ्तार कर लिया। महिला को गुप्तांग दिखाने वाले मुहम्मद कुन्ही है। उसकी उम्र 51 वर्ष है। पुलिस अब इस मामले में जाँच कर रही है। पुलिस जाँच करने के बाद आगे की कार्रवाई करेगी।

इससे पहले अगस्त 2023 में भी कासरगोड में 51 साल के एक आदमी ने एक लड़की को गुप्तांग दिखाया था। उसने यह हरकत चलती ट्रेन में की थी। उसका नाम जॉर्ज जोसफ था। उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। उसने इससे पहले भागने की गिरफ्तार किया था। यह घटना कोयंबटूर-मंगलुरु इंटरसिटी एक्सप्रेस में उस समय हुई, जब ट्रेन 31 जुलाई, 2024 को कन्नूर जिले से गुजर रही थी। इस मामले में IPC के सेक्शन 119a के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मुहर्रम जुलूस में बजेगा ढोल, जो मुस्लिम नहीं देख सकते वे घर बैठें: मद्रास हाई कोर्ट ने ‘तौहीद जमात’ के कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने पर प्रशासन को भी फटकारा

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के इरवाडी शहर में ढोल, संगीत और कुथिराई पंचा (रथ यात्रा) के साथ मुहर्रम समारोह आयोजित करने की इजाजत दी। कोर्ट ने इस दौरान उन मुस्लिमों को घर में रहने की सलाह दी जिन्होंने इस तरह के आयोजन से आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों को कट्टरपंथी ताकतों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि मजहबी जुलूस निकालने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(बी) और (डी) के तहत संरक्षित है और कट्टरपंथी तौहीद जमात को यह बताने की हक नहीं है कि अन्य समुदाय के लोगों को त्योहार कैसे मनाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी के मौलिक अधिकार खतरे में हों तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वो उन अधिकारों को बनाए रखने का प्रयास करें। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा,

“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिला प्रशासन ने कट्टरपंथी तत्वों द्वारा दी गई धमकियों के आगे घुटने टेक दिए। अगर किसी के मौलिक अधिकार खतरे में हैं तो प्रशासन का कर्तव्य है कि वह अधिकारों को बनाए रखे और अधिकारों के प्रयोग में बाधा डालने वालों को दबाए। मौलिक अधिकारों को कट्टरपंथी ताकतों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अगर जिला प्रशासन कानून और व्यवस्था के मुद्दों का हवाला देकर अधिकारों के प्रयोग को प्रतिबंधित करने का आसान और आलसी विकल्प अपनाता है, तो यह उनकी नपुंसकता को दर्शाता है।”

इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि जैसे जगह के साथ भाषा बदलती है वैसे रीति-रिवाज में बदलाव होता है। अगर इरवाडी के लोग संगीत, ढोल की थाप और रथ जुलूस में विश्वास करते हैं तो उनसे सऊदी अरब के व्यवहार के अनुरूप होने की उम्मीद करना तालिबानी दृष्टिकोण से कम नहीं हैं। कोर्ट ने इस दौरान कट्टरपंथी संगठन ‘तौहीद-ए-जमात’ को भी फटकार लगाई। कोर्ट ने उन्हें कहा कि अगर इस समूह का ये मानना है कि ऐसे कार्यक्रम उनकी मान्यता के मुताबिक नहीं है तो वो इसमें शामिल न हों और अपने घर में रहें, लेकिन किसी और को ऐसा करने से न रोकें।

उल्लेखनीय है कि मुहर्रम जुलूस को लेकर कुछ समय पहले मद्रास हाईकोर्ट में ये याचिका गई थी जहाँ तौहीद जमात ने इस बात का विरोध किया था कि मुहर्रम ढोल के साथ नहीं मनाया जाना चाहिए। वहीं थमीम सिंधा मदार नामक व्यक्ति ने बताया था कि एरवाडी शहर में मुस्लिम श्रद्धालुओं का एक वर्ग परंपरागत रूप से वर्षों से ढोल और संगीत के साथ मुहर्रम जुलूस निकालता रहा है, जिसे संथानाकुडु जुलूस और कुथिराई पंच के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस वर्ष उन्हें मुस्लिम श्रद्धालुओं के एक अन्य वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसी याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और कट्टरपंथी समूह को फटकार लगाई।

मुहर्रम जुलूस में हुआ विवाद तो हिंदू नाबालिग को जलती भट्ठी में झोंका, भाई को भी जलाने का प्रयास: छत्तीसगढ़ के कोरबा का मामला, जाँच में जुटी पुलिस

छत्तीसगढ़ के कोरबा में मुहर्रम के मौके पर ताजिया जुलूस के दौरान एक हिन्दू नाबालिग को जलती आग में झोंक दिया गया। नाबालिग के भाई को भी आग में फेंकने का प्रयास किया गया। दोनों लड़कों का दूसरे पक्ष के लड़कों से किसी बात को लेकर विवाद हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोरबा के करतला थाना क्षेत्र नोनबिर्रा गाँव में यह घटना हुई। बताया गया कि यहाँ मुहर्रम ताजिया जुलूस निकाले जाने के दौरान दो किशोर अपनी दुकान पर बैठे हुए थे। इसी दौरान यहाँ कुछ युवक आए और उनसे विवाद करने लगे।

हमला करने वाले युवकों की तादाद अधिक थी। उन्होंने दोनों किशोर से विवाद करने के बाद उन्होंने पास में जल रही आग में फेंक दिया। सूचना के अनुसार एक किशोर तो आग में झुलसने से बच गया लेकिन दूसरा किशोर गंभीर रूप से घायल हो गया।

आग से झुलसे किशोर को इसके बाद उसके परिजन अस्पताल में इलाज के लिए ले गए। यहाँ उसका इलाज अभी जारी है। मामले में इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। इस घटना को लेकर शिकायत दर्ज करवा दी गई है। आग में झुलसे किशोर और उन पर हमला करने वालों के बीच कोई पुराना विवाद बताया जा रहा है।

मामले में FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने इस मामले में बताया कि आग में झुलसे किशोर के परिजनों द्वारा FIR दर्ज करवाई गई है, अभी इस मामले में जाँच जारी है। पुलिस ने कहा है कि वह घटना में शामिल लोगों से पूछताछ कर रहे हैं। अभी तक घटना में शामिल आठ नाबालिगों को हिरासत में लिया गया है।

गौरतलब है कि मुहर्रम जुलूस के दौरान हिंसा की खबरें देश के अलग-अलग हिस्सों से आई हैं। बिहार के मोतिहारी में इसको लेकर बड़ा बवाल हुआ है तो वहीं कानपुर में भी लाठी डंडे चलने की सूचना है। इसके अलावा प्रयागराज में भी मुहर्रम जुलूस के दौरान मारपीट की खबर है।

ST वर्ग के लिए था जो पैसा, उससे कॉन्ग्रेस के मंत्री ने खरीदी शराब और लक्जरी कारें: वाल्मीकि निगम घोटाले में ED ने पत्नी से भी की पूछताछ

कर्नाटक के वाल्मीकि कॉरपोरेशन घोटाले के पैसों का इस्तेमाल शराब खरीदने और लोकसभा चुनाव के दौरान गाड़ियों की खरीद में किया गया था। ईडी ने बुधवार (17 जुलाई 2024) को इसका खुलासा किया। ईडी ने इस मामले में कॉन्ग्रेस विधायक और राज्य के पूर्व कैबिनेट मंत्री बी नागेंद्र को गिरफ्तार किया है। नागेंद्र 18 जुलाई तक ईडी की हिरासत में हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने बताया है कि विधायक बी नागेंद्र से जुड़े लोग “फंड डायवर्जन और कैश मैनेजमेंट” में शामिल हैं। एजेंसी ने दावा किया कि “आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 18 फर्जी खातों में (वाल्मीकि निगम के फंड से) करीब 90 करोड़ रुपए भेजे गए थे। फिर डायवर्ट किए गए फंड को फर्जी और फर्जी खातों के जरिए बाँट दिया गया। इन पैसों का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव के दौरान भारी मात्रा में शराब खरीदने और गाड़ियों को खरीदने में किया गया।

इस बीच, ईडी अधिकारी पूर्व मंत्री बी नागेंद्र की पत्नी मंजुला को शहर के डॉलर्स कॉलोनी स्थित आवास से बेंगलुरु के शांतिनगर स्थित ईडी दफ्तर ले गए। वहाँ मंजुला से काफी देर तक पूछताछ की। बता दें कि बी नागेंद्र की हिरासत अवधि गुरुवार (18 जुलाई 2024) को समाप्त हो रही है, जिसके बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा। ईडी बी नागेंद्र की हिरासत बढ़ाने की माँग करेगी।

बता दें कि ईडी ने बीते गुरुवार (12 जुलाई 2024) को कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक बी नागेंद्र को गिरफ्तार किया था। उनके घर पर 2 दिनों की छापेमारी के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। नागेंद्र को कर्नाटक के वाल्मीकि निगम में करोड़ों के अवैध ट्रांसफर घोटाला मामले में गिरफ्तार किया गया है।

बी नागेन्द्र ने जून माह में सिद्दारमैया सरकार से मंत्रिपद से इस्तीफ़ा दे दिया था। वह सिद्दारमैया सरकार में अनुसूचित जनजातीय कल्याण मंत्री थे। उन्होंने यह इस्तीफ़ा कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति कल्याण विकास निगम (KMVSTDC) में करोड़ों की गड़बड़ी में नाम सामने आने के बाद दिया था।

बी नागेन्द्र जी जिस महर्षि वाल्मीकि फंड घोटाले में गिरफ्तार किए गए हैं, उसकी जाँच CBI, ED और राज्य सरकार की SIT कर रही है। यह पूरा मामला लगभग ₹95 करोड़ सरकारी धन के दुरुपयोग और उसके अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किए जाने से जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा घोटाला?

कर्नाटक सरकार KMVSTDC प्रदेश की जनजातीय जनता के कल्याण के लिए चलाती है। इसके अंतर्गत जनजातीय जनसंख्या के लिए रोजगार समेत विशेष योजनाएँ लाई जाती हैं। कर्नाटक सरकार इसके लिए अलग से बजट देती है। इसी महर्षि वाल्मीकि फंड में घोटाले की बात सामने आई है।

यह पूरा मामला एक आत्महत्या से चालू हुआ था। मई, 2024 में इसी निगम से जुड़े एक 48 वर्षीय कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी मौत के बाद एक सुसाइड नोट मिला था। इसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके उच्चाधिकारियों ने उस पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वह निगम के खातों से पैसा ट्रांसफर करे।

उसने आरोप लगाया था कि यह काम निगम का पैसा हड़पने के लिए किया गया था। उसका आरोप था कि यह काम एक मंत्री के मौखिक आदेशों के आधार पर किया गया था। उसने अपने विभाग के अलावा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारियों पर भी आरोप लगाए थे। इसके बाद पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया था।

आत्महत्या करने वाले कर्मचारी चंद्रशेखर ने सुसाइड नोट में बताया था कि उसे उच्चाधिकारियों ने इस बात के लिए निर्देशित किया था कि वह निगम के एक खाते से दूसरे खाते में पैसा ट्रांसफर करने के लिए पत्र लिखे। यह पैसा यूनियन बैंक के वसंत नगर ब्रांच से एमजी रोड ब्रांच में डाला जाना था।

इसी के तहत वाल्मीकि निगम के खातों से निकाला गया पैसा इसके बाद अन्य खातों में भेज दिया गया। इस पूरे खेल में ₹187 करोड़ का लेनदेन हुआ। इसमें से लगभग ₹88 करोड़ अवैध खातों में भेजा गया। जब यह मामला खुला तो चंद्रशेखर डर गया और उसने आत्महत्या कर ली।

साथियों ने हाथ-पाँव पकड़ा, काज़िम अंसारी ने ताबतोड़ घोंपा चाकू… धराया VIP अध्यक्ष मुकेश सहनी के पिता का हत्यारा, रात के डेढ़ बजे घर में घुस कर मार डाला

बिहार के पशपालन एवं मत्स्यपालन मंत्री रहे मुकेश सहनी के पिता जीतन सहनी की हत्या दरभंगा के सुपौल बाजार स्थित जीरात मोहल्ले स्थित उनके आवास पर कर दी गई थी। अब इस मामले में हत्यारे काज़िम अंसारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। 70 वर्षीय जीतन सहनी का उनके घर में ही शव मिला था और सामान अस्त-व्यस्त थे। काज़िम अंसारी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। उसने 2022 में 1 लाख रुपए और फिर 2023 में 50,000 रुपए सूद पर लिया था।

इस तरह काज़िम अंसारी ने 70 वर्षीय जीतन सहनी से सूद पर डेढ़ लाख रुपए उधार ले रखे थे। इन्हीं पैसों को लेकर हत्याकांड को अंजाम दिया गया है। पैसों के अभाव में काज़िम अंसारी की दुकान बंद हो गई थी, बेरोजगार होने के बाद उसने 4% मासिक ब्याज पर अपनी जमीन गिरवी रखी हुई थी। वो पैसा नहीं चुका पा रहा था। 12 जुलाई को वो अपने साथी मोहम्मद सितारे उर्फ़ छेदी के साथ जीतन सहनी के पास गया था। उधर के हिसाब की बात करते हुए वो ब्याज की रकम कम करने और जमीन वापस लेने की बातें कर रहे थे।

इस दौरान दोनों में झगड़ा हो गया। मौके पर मौजूद मोहम्मद छेदी और VIP अध्यक्ष मुकेश सहनी के चचेरे भाई प्रमोद ने इसकी पुष्टि की है। फिर काज़िम अंसारी ने अपने साथियों के साथ मिल कर अपने लोन का कागज़ात जबरन छीनने की साजिश रची, इसके लिए घटना की रात उसने 10-11 बजे के बीच रेकी भी की थी जो CCTV में कैद है। रात के करीब डेढ़ बजे ये लोग पीछे के दरवाजे से घर में घुसे। इन्होंने जीतन सहनी को जगा कर अपने लोग के कागज़ात वापस माँगे।

‘दैनिक भास्कर’ की खबर के अनुसार, जीतन सहनी ने इन्हें गाली देना शुरू कर दिया। काज़िम अंसारी ने उन पर ताबड़तोड़ चाकू से वार करना शुरू कर दिया, जबकि उसके साथियों ने जीतन सहनी का हाथ-पाँव पकड़ रखा था। इन्होंने घर में रखी अलमारी को भी पानी में फेंक दिया, क्योंकि इन्हें न चाभी मिली न इनके कागज़ात। इन्होंने सोचा कि इससे ये उधार चुकाने से बच जाएँगे। वारदात के समय उसने जो कपड़े पहने थे, उन्हें भी पुलिस ने जब्त कर लिया है। उस पर फारेंसिक जाँच में खून मिला है। इधर पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव भी सांत्वना देने के लिए मुकेश सहनी के आवास पर पहुँचे।

‘जो आया है, उसे तो जाना ही है’: हाथरस हादसे पर बोले सूरजपाल- होनी को कौन टाल सकता है

उत्तर प्रदेश के हाथरस में सत्संग के दौरान भगदड़ में 123 लोगों की जान चली गई थी। इनमें अधिकांश महिलाएँ एवं बच्चे थे। इस घटना की जाँच के लिए SIT और न्यायिक जाँच कमिटी बनाई गई है। वहीं, आयोजकों पर FIR दर्ज करके कुछ को गिरफ्तार किया गया है। यह सत्संग सूरजपाल जाटव उर्फ नारायण हरि साकार उर्फ भोले बाबा द्वारा आयोजित किया गया था। अब उनका बयान आया है।

नारायण हरि साकार ने उस घटना को लेकर कहा, “2 जुलाई की घटना से मैं बेहद ही अवसाद हैं… अवसाद से ग्रसित हैं, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। जो आया है, उसे तो एक दिन जाना ही है। भले कोई आगे-पीछे हो। हमारे वकील डॉक्टर एपी सिंह जी एवं हमें भी जैसा कि प्रत्यक्षदर्शियों ने विषैला स्प्रे के बारे में बताया, ये पूर्णतया सत्य है कि कोई ना कोई साजिश जरूर हुई है।”

पेपर पर लिखे बयान को पढ़ते हुए सूरजपाल ने कहा, “सनातन रूप से संचालित सत्य के साथ में, जिसे कुछ लोग बदनाम करने में लगे हुए हैं। हमें SIT और न्यायिक आयोग पर भरोसा है और वे दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए साजिशकर्ताओं को बेनकाब करेंगे। मैंने कहा है कि दिवंगत आत्माओं के परिजनों और इलाजरत घायलों के साथ जीवनपर्यंत तन-मन-धन से खडे़ रहेंगे।”

सूरजपाल जाटव ने कहा कि अभी वे चिकित्सकों के परामर्श के अनुसार स्वास्थ्य लाभ के लिए अपनी जन्मभूमि बहादुरनगर कासगंज में हैं। इससे पहले हादसे के चार दिन बाद यानी 6 जुलाई को सूरजपाल ने बयान दिया था। घटना को दुखद बताते हुए उन्होंने कहा था, “पीड़ितों के परिवार की जिम्मेदारी हमारा ट्रस्ट लेगा और हम उनकी पूरी मदद करेंगे। जिनकी वजह से उपद्रव हुआ, प्रशासन उन्हें छोड़ेगा नहीं।”

हाथरस कांड के मुख्य आरोपित देव प्रकाश मधुकर को पुलिस ने 5 जुलाई 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया। हादसे के बाद मधुकर पर एक लाख रुपये का इनाम रखा गया था। दिल्ली के नजफगढ़-उत्तम नगर के बीच के एक अस्पताल में यूपी की हाथरस पुलिस पहुँची थी। वहाँ देव प्रकाश ने सरेंडर कर दिया था। इसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

प्राइवेट नौकरियों में 75% आरक्षण वाले बिल पर कॉन्ग्रेस सरकार का U-टर्न, वापस लिया फैसला: IT कंपनियों ने दी थी कर्नाटक छोड़ने की धमकी

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने निजी क्षेत्र की नौकर‍ियों में लोकल लोगों को र‍िजर्वेशन देने के फैसले से कदम वापस खींच लिए हैं। सिद्धारमैया के फैसले का भारी विरोध भी हो रहा था, जिसकी वजह से कॉन्ग्रेसी सरकार बुरी तरह से घिर गई थी। यही नहीं, इस फैसले की जानकारी देने वाले ट्वीट को भी मुख्यमंत्री को डिलीट करना पड़ा था।

प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण वाले बिल पर से कदम खींचने की जानकारी खुद मुख्‍यमंत्री सिद्धारमैया ने दी। उन्‍होंने एक्स पर लिखा, “निजी क्षेत्र के संगठनों, उद्योगों और उद्यमों में कन्नडिगाओं के लिए आरक्षण देने के लिए कैबिनेट द्वारा अनुमोदित विधेयक को अस्थाई रूप से रोक दिया गया है। आने वाले दिनों में इस पर फिर से विचार किया जाएगा और निर्णय लिया जाएगा।”

बता दें कि कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य में निजी संस्थानों में कन्नड़ लोगों के लिए आरक्षण लागू करने का फैसला लिया था। सिद्दारमैया कैबिनेट ने इस संबंध में एक बिल पर मुहर लगाई थी। इस बिल में कहा गया था कि कर्नाटक की गैर प्रबंधकीय नौकरियों में 75% और प्रबंधकीय नौकरियों में 50% आरक्षण कन्नड़ भाषाई लोगों को दिया जाएगा।

इस बिल के अनुसार, राज्य में स्थित सभी फैक्ट्रियों और दफ्तरों में नौकरी पर रखे जाने वाले लोग अब कन्नड़ ही होने चाहिए। इस बिल के अनुसार, राज्य में स्थित सभी दफ्तरों और फैक्ट्रियों में काम पर रखे जाने वाले ग्रुप सी और ग्रुप डी (सामान्यतः क्लर्क और चपरासी या फैक्ट्री के कामगार) के 75% लोग कन्नड़ होने चाहिए। इसके अलावा, बिल के अनुसार इससे ऊँची नौकरियों में 50% नौकरियाँ कन्नड़ लोगों को मिलनी चाहिए। हालाँकि इस बिल का काफी तीखा विरोध हुआ था।

प्रमुख कारोबारियों के बाद IT कंपनी संगठन NASSCOM (नेशनल असोसिएशन फॉर सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेस कंपनीज) ने इस निर्णय पर अपनी चिंताएँ जाहिर करते हुए कहा था कि सरकार को ये बिल वापस लेना चाहिए। NASSCOM ने एक पत्र जारी करके इस नए बिल को लेकर समस्याएँ बताई थी। NASSCOM ने इस बिल पर चिंता जताते हुए कहा, “इस तरह के बिल बेहद परेशान करने वाला है, यह ना केवल टेक इंडस्ट्री के विकास में बाधा डालेगा, बल्कि यहाँ नौकरियों और कर्नाटक के ब्रांड पर भी असर डालेगा। NASSCOM सदस्य इस बिल के प्रावधानों को लेकर काफी चिंतित हैं और राज्य सरकार से इसे वापस लेने की माँग करते हैं।” NASSCOM ने कहा कि इस बिल से राज्य के विकास और कम्पनियों के राज्य से बाहर जाने और स्टार्टअप को मुश्किल में पड़ने का खतरा है। NASSCOM ने कहा है कि इस कानून के कारण कम्पनियों को बाहर जाना पड़ सकता है जिससे उन्हें टैलेंट मिल सके।

देश भर की 3200 से अधिक टेक कम्पनियाँ NASSCOM की सदस्य हैं और 245 बिलियन डॉलर (लगभग ₹20 लाख करोड़) की इंडस्ट्री का प्रतिनिधित्व करती है। NASSCOM के विरोध के कारण कर्नाटक सरकार पर अब दबाव बन रहा है। NASSCOM से पहले NITI आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कान्त ने भी इस बिल को लेकर चिंताएँ जाहिर की थी।

अब सरकार की हो गई माफिया अतीक अहमद की ₹50 करोड़ की प्रॉपर्टी, किसानों-गरीबों को धमका कर किया था अवैध कब्ज़ा

उत्तर प्रदेश में ऑपरेशन माफिया के तहत चल रही कार्रवाई में कमिश्नरेट पुलिस प्रयागराज और राज्य सरकार ने बड़ी सफलता हासिल की है। माफिया अतीक अहमद की करीब 50 करोड़ रुपये की बेनामी संपत्ति अब राज्य सरकार की हो गई है। कमिश्नरेट पुलिस ने महज लगभग 11 महीने में कुर्की से लेकर जमीन को सरकारी बनाने की ऐतिहासिक कार्रवाई की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंगलवार (16 जुलाई 2024) को जिला न्यायालय की गैंगस्टर कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए राजमिस्त्री हुबलाल के नाम पर खरीदी गई जमीन को राज्य सरकार में निहित करने का आदेश दिया। जस्टिस विनोद कुमार चौरसिया ने पुलिस कमिश्नर की कार्रवाई को निष्पक्ष और न्यायसंगत करार देते हुए अर्जित संपत्ति को सरकार के पक्ष में करने को कहा है।

प्रयागराज के जिलाधिकारी इस आदेश के अनुपालन में अब खतौनी में हुबलाल के स्थान पर राज्य सरकार का नाम दर्ज कराएँगे। इसे प्रदेश में इस तरह की पहली कार्रवाई माना जा रहा है। इससे माफिया अतीक गैंग के सदस्यों को बड़ा झटका लगा है।

जानकारी के मुताबिक, माफिया अतीक के खिलाफ गैंगस्टर का मुकदमा पंजीकृत है। मुकदमे की विवेचना के दौरान पता चला कि एयरपोर्ट थाना क्षेत्र अतीक की लगभग 25 बीघा जमीन है, जो अनुसूचित जाति के राजमिस्त्री हुबलाल के नाम पर है। पूछताछ में हुबलाल ने बताया कि अतीक ने वर्ष 2015 में धमकाकर उसके नाम पर गरीब-किसानों की जमीन लिखवाई थी। इसके बाद छह नवंबर 2023 को गैंगस्टर एक्ट की धारा 14 (1) के तहत जमीन कुर्क की गई।

जब्त की गई प्रॉपर्टी की पत्रावली पुलिस कमिश्नर कोर्ट पहुँची, जहां अतीक के वारिस को पक्ष रखने का मौका दिया गया, लेकिन तीन माह बीत जाने बाद भी वह कोई साक्ष्य पेश नहीं कर पाए। इसके बाद पत्रावली जिला न्यायालय की गैंगस्टर कोर्ट में भेज दी गई। वहाँ सुनवाई के बाद कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट में की गई कार्रवाई को पुष्ट करते हुए संपत्ति राज्य सरकार में निहित करने का आदेश दिया।

गौरतलब है कि अतीक अहमद की हत्या बीते साल 15 अप्रैल को हुई थी। उमेश पाल की हत्या के मामले में पुलिस ने बीते साल अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ को रिमांड पर लिया था। प्रयागराज में 15 अप्रैल 2023 की रात करीब 10 बजे पुलिस अतीक और उसके भाई को जब मेडिकल जाँच के लिए अस्पताल लेकर जा रही थी, उसी वक्त पत्रकार बनकर आए तीन हमलावरों अरुण मौर्या, सनी और लवलेश तिवारी ने दोनों भाइयों को गोलियों से छलनी कर दिया।