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शराब घोटाले के आरोपित दिल्ली के CM अरविंद केजरीवाल को जमानत: जाँच एजेंसी ED बोली- AAP मुखिया के रूप में उन पर चल सकता है केस

दिल्ली के मुख्यमंत्री और AAP के मुखिया अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली की राउज अवेन्यु कोर्ट ने शराब घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत दे दी है। CM केजरीवाल को प्रर्वतन निदेशालय ने दिल्ली शराब घोटाला मामले में 21 मार्च, 2024 को गिरफ्तार किया था।

दिल्ली की राउज अवेन्यु कोर्ट में एक विशेष अदालत ने इस मामले सुनवाई की। CM केजरीवाल ने इस अदालत के सामने नियमित जमानत के लिए याचिका लगाई हुई थी। इस मामले की सुनवाई जज नियय बिंदु ने की। उन्होंने पहले इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

गुरुवार (20 जून, 2024) को इस मामले का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने केजरीवाल को जमानत दे दी। CM केजरीवाल को कोर्ट ने ₹1 लाख के मुचलके पर जमानत दी है। उनके शुक्रवार (21 जून, 2024) को जेल से बाहर आने के कयास हैं। वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं।

इस मामले की सुनवाई के दौरान ED ने कोर्ट से माँग की कि केजरीवाल का मुचलका तब तक ना जमा किया जाए जब तक इस मामले के खिलाफ उच्च न्यायालय में चुनौती दी सके। इसके लिए ED ने 48 घंटों की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने एजेंसी की यह माँग मानने से इनकार कर दिया।

इस मामले की सुनवाई के दौरान ED ने स्पष्ट किया कि उसके पास दिल्ली शराब घोटाला के पक्के सबूत हैं। एजेंसी ने कहा कि उसके पास इस मामले में पैसे के लेनदेन तक की फोटो हैं। एजेंसी ने यह भी कहा कि CM केजरीवाल ने अपने फ़ोन का पिन बताने से भी मना किया, जो इस मामले में शंका पैदा करता है।

एजेंसी ने यह भी साफ़ कर दिया कि अगर केजरीवाल निजी तौर पर इस मामले में नहीं भी शामिल हैं तो भी उन पर मुकदमा चल सकता है क्योंकि AAP के मुखिया वही हैं और मामले में AAP को भी आरोपित बनाया गया है। वहीं केजरीवाल के पक्ष ने कहा कि उन पर लगाए आरोपों का कोई सबूत मौजूद नहीं है।

गौरतलब है कि दिल्ली शराब घोटाला मामले में CM केजरीवाल को ED ने 21 मार्च, 2024 को गिरफ्तार कर लिया था। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल ही इस पूरे मामले के सरगना हैं। एजेंसी का आरोप है कि दिल्ली में शराब नीति बदल कर निजी विक्रेताओं को फायदा पहुँचाया और उनसे बदले में लाभ प्राप्त कि।

जिस नाबालिग से किया था दुष्कर्म, उससे शादी के लिए कोर्ट ने आरोपित को दी अंतरिम जमानत: कर्नाटक हाई कोर्ट ने बताया विशेष परिस्थिति, जानिए पूरा मामला

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में बच्चों के यौन अपराध से संबंधित पॉक्सो अधिनियम के आरोपित को पीड़िता से विवाह करने के लिए 15 दिनों की अंतरिम जमानत दे दी है। पीड़िता अब वयस्क हो चुकी है और उसने एक बच्चे को भी जन्म दिया है, जिसकी उम्र एक साल है। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए पारित किया गया है।

कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायाधीश एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने कहा कि इस आदेश में उस माँ का भाग्य भी शामिल है, जिसे कम उम्र में ही बच्चे का पालन-पोषण करना होगा। यह एक माँ के लिए बेहद कठिन परिस्थिति है। इसलिए पीड़िता से विवाह के लिए आरोपित को अंतरिम जमानत दी जाती है। यह याचिका आरोपित ने दाखिल की थी।

कोर्ट ने कहा, “इन विशेष परिस्थितियों में माँ को इतनी कम उम्र में बच्चे का पालन-पोषण करना है, जो बेहद कठिन परिस्थितियों में है। इसलिए माँ और बच्चे की स्थिति को देखते हुए मैं याचिकाकर्ता को पीड़िता से विवाह करने की अनुमति देकर परिवारों की शिकायतों को दूर करना उचित समझता हूँ। पीड़िता अब 18 वर्ष से अधिक की हो चुकी है।”

न्यायाधीश ने आगे कहा, “उक्त विवाह के उद्देश्य से मैं सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता को अंतरिम जमानत देना उचित समझता हूँ, ताकि याचिकाकर्ता बाहर आकर पीड़िता से विवाह कर सके। मामले में मौजूद विशेष परिस्थितियों के कारण यह कदम उठाया गया है, क्योंकि माँ को बच्चे का पालन-पोषण करना है।”

न्यायालय ने कहा कि नवजात शिशु को नहीं पता है कि क्या हुआ है और उसे भविष्य में किसी भी तरह की बदनामी नहीं झेलनी चाहिए। आदेश में आगे कहा गया है, “इसलिए, बच्चे के हितों की रक्षा करने और बच्चे के पालन-पोषण में माँ की जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश जारी करना आवश्यक पाया गया है।”

दरअसल, पीड़िता की माँ ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उसकी बेटी और आरोपित याचिकाकर्ता के बीच स्कूल में प्रेम संबंध थे। दोनों अक्सर मिलते थे। 15 फरवरी 2023 को आरोपित उसकी बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर एक सुनसान जगह पर ले गया और उसका यौन उत्पीड़न किया। शिकायत में कहा गया है कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 साल और 9 महीने थी।

शिकायत के बाद पुलिस ने आरोपित के खिलाफ पॉक्सो सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया। जाँच के बाद पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। तब से वह न्यायिक हिरासत में है। इस दौरान न्यायालय ने पाया कि पीड़िता ने एक बच्चे को जन्म दिया है। दोनों पक्षों के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता और पीड़िता एक-दूसरे से प्यार करते हैं।

दोनों पक्षों के वकीलों का यह भी तर्क था कि दोनों के माता-पिता ने उनके रिश्ते में हस्तक्षेप किया था। साथ ही यह भी कहा गया कि यौन क्रिया के परिणामस्वरूप एक बच्चा पैदा हुआ, जो अब एक साल का है। याचिकाकर्ता पीड़िता से विवाह करना चाहता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसे और बच्चे के सामने मुश्किल स्थिति ना आए।

इस मामले में दोनों पक्षों के बीच समझौते के कारण अपराध को कम करने की माँग करते हुए याचिका दायर की गई थी। न्यायालय ने पाया कि पीड़िता अब वयस्क हो गई है और डीएनए रिपोर्ट से साबित हुआ कि आरोपित ही बच्चे का पिता है। इन सब तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने लड़की से शादी करने के लिए आरोपित को 15 दिनों की अंतरिम बेल दे दी।

राजू बन कर शाबिर ने किया हिन्दू महिला का शारीरिक शोषण, धर्म ना बदलने पर दी बेटे को मारने की धमकी: मध्य प्रदेश के ग्वालियर का मामला, गिरफ्तार

मध्य प्रदेश के ग्वालियर से लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। यहाँ एक मुस्लिम युवक एक हिन्दू महिला से 11 वर्षों तक एक युवक अपनी असल पहचान छुपा कर शारीरिक शोषण करता रहा। वह स्वयं को हिन्दू बताता रहा। अपना भेद खुलने पर उसने महिला पर भी इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाया। ऐसा ना करने पर उसने हिन्दू महिला और उसके नाबालिग बेटे को मारने की धमकी दी। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के के अनुसार, ग्वालियर शहर के गोला थाना क्षेत्र की रहने वाली एक 36 वर्षीय हिन्दू महिला ने शाबिर उर्फ़ शराफत अली के खिलाफ लव जिहाद का मामला दर्ज करवाया है। महिला ने बताया कि वह लगभग एक दशक से अपने पति से अलग रहती है। इस बीच ही उसकी पहचान शाबिर से हो गई। शाबिर ने हिन्दू महिला को अपना नाम राजू उर्फ़ राजकुमार बताया था। शाबिर मध्य प्रदेश के ही भिंड का ही रहने वाला है।

शाबिर ने महिला को प्यार का झाँसा दिया और उसके साथ शारीरिक शोषण किया। शाबिर से जब महिला ने शादी की बात चलाई तो असलियत सामने आई। महिला को पता लगा कि खुद को राजू बताने वाला युवक शाबिर है। अपनी पोल खुलने के बाद शाबिर ने महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाना चालू कर दिया। उसने महिला के बिंदी लगाने और सिन्दूर लगाने पर भी प्रश्न खड़े किए और इससे मना किया। वह लगातार महिला पर इस्लाम कबूल करके निकाह की बात कहता रहा।

जब महिला को सच्चाई पता लगी उसने इस बारे में में शाबिर से पूछा। इसके बाद वह महिला को धमकाने लगा। शाबिर ने महिला को धमकी दी कि यदि वह इस्लाम कबूल नहीं करती तो वह उसे और उसके 13 वर्षीय बेटे को मार देगा। इसके बाद पीड़िता पुलिस के पास पहुँची और शिकायत दर्ज करवाई। पुलिस ने जाँच के बाद आरोपित शाबिर को गिरफ्तार कर लिया है। मामले में जाँच करके आगे की कार्रवाई की जा रही है।

‘3.5 साल की बच्ची शायद ही समझ पाए कि कोई व्यक्ति उसके निजी अंगों को क्यों छू रहा’: POCSO के आरोपित को सिक्किम हाई कोर्ट ने किया बरी

सिक्किम उच्च न्यायालय ने हाल ही में लगभग 3 वर्षीय बच्ची से छेड़छाड़ के आरोपित को बरी कर दिया। न्यायालय ने गवाहों के इस दावे पर संदेह व्यक्त किया कि बच्ची को घबराया हुआ पाया गया था, क्योंकि आरोपित ने उसके निजी अंगों को छुआ था। इस पर कोर्ट ने कहा कि 3.5 साल की बच्ची को शायद ही यह समझ हो कि कोई उसके निजी अंगों को छू रहा है, जिससे वह घबरा जाए।

न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान और न्यायमूर्ति मीनाक्षी मदन राय की खंडपीठ ने 5 जून के अपने फैसले में कहा, “गवाहों ने नाबालिग बच्ची पर कथित यौन हमले के बारे में अलग-अलग बयान दिए हैं। हमारी राय में साढ़े तीन साल की बच्ची मुश्किल से ही समझ पाएगी कि कोई व्यक्ति उसके निजी अंग को कैसे छू रहा है। वह यह समझकर कैसे घबरा जाएगी कि यह यौन हमला है। यह अविश्वसनीय है।”

इसके बाद न्यायालय ने आखिरकार उस आरोपित को बरी कर दिया, जिस पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने यह भी बताया कि अपराध किए जाने की संभावना को स्थापित करने के लिए कोई सबूत नहीं था। कोर्ट ने यह भी पाया कि अपराध के तीन सप्ताह पर इस मामले में शिकायत दर्ज कराई गई थी।

दरअसल, इस मामले में निचली अदालत ने आरोपित को पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था और बीस साल जेल की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ आरोपित ने सिक्किम हाई कोर्ट में याचिका दी थी। इस मामले में बच्ची के नाबालिग भाई के आरोप के आधार पर 25 जून 2021 को मामला दर्ज कराया गया था।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, नाबालिग लड़के ने दावा किया था कि उसने अपीलकर्ता को उसकी बहन के मुँह और गुदा में उँगली डालते देखा था। अदालत को बताया गया कि उसने बाद में अपने माता-पिता को इसके बारे में बताया। बच्ची के पिता ने कोर्ट को बताया कि लड़के ने उसे बताया कि अपीलकर्ता ने उसकी बच्ची के निजी अंगों को छुआ था।

दूसरी ओर, बच्ची की माँ ने कहा कि अपीलकर्ता ने उसकी बेटी की फ्रॉक उतारी और उसके पूरे शरीर को छुआ। उसकी बच्ची की योनि से खून बह रहा था। बच्ची की माँ ने यह भी कहा कि उसने देखा कि उसकी नादान बेटी घबराई हुई थी और इसके बारे में बताने में असमर्थ थी। कोर्ट ने माता-पिता के बयान में कई खामियाँ पाईं। इसके आधार पर अपीलकर्ता को बरी कर दिया।

तमिलनाडु में जहरीली शराब पीने से 30+ की मौत, 100+ अस्पताल में भर्ती: पिछले साल भी मरे थे 22, लोगों ने पुलिस पर लगाया लापरवाही का आरोप

तमिलनाडु के कल्लाकुरुची जिले में जहरीली शराब पीने के कारण 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। जहरीली शराब पीने वाले कई लोग अभी भी अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती हैं। राज्य में जहरीली शराब से मौतों के बाद अब एमके स्टालिन की अगुवाई वाली DMK सरकार की किरकिरी हो रही है। वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों ने आरोप लगाए हैं कि पुलिस शराब के इस धंधे के बारे में जानती थीं लेकिन वह अनजान बनी रही और यह घटना हो गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चेन्नई से 240 किलोमीटर दूर राज्य के बीचोंबीच स्थित कल्लाकुरुची शहर में यह घटना हुई। यहाँ बुधवार (19 जून, 2024) को जहरीली शराब पीने के बाद लोग बीमार पड़ना चालू हुए। बताया गया कि इस जहरीली शराब का सेवन करने वाले अधिकांश लोग मजदूर थे और उन्होंने करुनापुरम इलाके से यह कच्ची शराब खरीदी थी। इन्होने यह शराब मंगलवार (18 जून, 2024) को पी थी। इसके बाद इन्हें सांस लेने में तकलीफ, दिखाई ना देना और डायरिया जैसी समस्याएँ होने लगीं।

इसके बाद मौतों का आँकड़ा लगातार बढ़ता गया। गुरुवार (20 जून, 2024) तक इस त्रासदी में 38 लोगों की मौत की सूचना है जबकि 100 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हैं। बताया गया कि मरने वालों में कुछ महिलाएँ भी शामिल हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस कच्ची शराब में मेथनॉल मिला हुआ था, जिसके कारण मौतें हुई हैं। राज्य में जहरीली शराब से हुई इस घटना के बाद DMK सरकार लीपापोती में जुटी है। कल्लाकुरुची जिले के डीएम का तबादला कर दिया है जबकि एसपी को निलम्बित कर दिया गया है।

घटना में मरने वालों के लिए राज्य सरकार ने ₹10 लाख का मुआवजा घोषित किया है। मामले की जाँच CB-CID को सौंपी गई है। कुछ लोगों को शुरूआती जाँच के बाद गिरफ्तार भी किया गया है। जहरीली शराब से मौत के मामले में पुलिस की लापरवाही की बात भी सामने आ रही है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस को कल्लाकुरुची में कच्ची शराब की बिक्री की जानकारी थी लेकिन वह मूकदर्शक बनी रही और घटना हो गई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए।

तमिलनाडु में हुई इस घटना के बाद राज्य सरकार के कच्ची शराब पर रोक के दावे भी फेल हो गए हैं। जहाँ एक ओर तमिलनाडु की DMK सरकार विकास और कानून व्यवस्था के दावे करती आई वहीं 2023 के बाद फिर से यह बड़ी घटना हो गई है। तमिलनाडु में मई, 2023 में भी जहरीली शराब पीने के कारण तमिलनाडु के चेंगलपट्टू और विल्लुपुरम जिले में 22 लोगो की मौत हो गई थी। बताया गया था कि उन लोगों ने शराब की जगह मेथनॉल पी लिया था जो कि जहरीला होता है।

2023 की इस घटना के बाद भी सरकार की हीलाहवाली के चलते यह बड़ी घटना फिर से घटित हो गई। अब राज्य का विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है। AIADMK के मुखिया E पलानीसामी ने कहा है कि उनके विधायक इस बात को लेकर चेता रहे थे लेकिन राज्य सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। वहीं भाजपा ने इस मामले में केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि शराब से हुई मौतों की जाँच CBI को सौंपी जाए। तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष भी कल्लाकुरुची पहुँचे हैं।

ABC पत्रकार अवनी डायस की रिपोर्ट भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को नुकसान पहुँचाने वाला: पूर्व ऑस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त बैरी ओ’फैरेल ने की निंदा

ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (ABC) न्यूज़ ने रविवार (16 जून) को भारत पर एक और हमला किया। इसमें मीडिया हाउस ने मोदी सरकार पर ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले खालिस्तानियों की हत्या की योजना बनाने का आरोप लगाया है। इस तरह का दुष्प्रचार अभियान चलाने वाले लोगों में एक अवनी डायस हैं। अवनी पहले भारत सरकार द्वारा अपना वीज़ा रद्द किए जाने को लेकर झूठ बोला था।

एबीसी की उस रिपोर्ट को भारत में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व उच्चायुक्त बैरी ओ’फैरेल ने दोनों देशों के संबंधों को कमजोर करने वाला प्रयास बताया है। इंडियनलिंक से बात करते हुए ओ’फैरेल ने कहा, “एबीसी का चार्टर है कि उसे निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ होना चाहिए और उसके पत्रकारों को उन मानकों को बनाए रखना चाहिए।” मुझे चिंता है कि इस तरह के कार्यक्रम के माध्यम से ऑस्ट्रेलिया-भारत संबंधों को संभावित नुकसान हो सकता है।”

उन्होंने आगे कहा, “रिपोर्ट निराशाजनक थी, क्योंकि ऐसा लग रहा था कि यह आलोचनाओं का एक समूह है, जिसमें दर्शकों को प्रस्तुत मुद्दों पर निर्णय लेने में सक्षम बनाने का प्रयास नहीं किया गया है। चाहे वह सांप्रदायिकता हो, खालिस्तान हो या कनाडा और अमेरिका के आरोप हों।” उन्होंने आगे कहा, “ऑस्ट्रेलिया का कनाडा से स्पष्ट रूप से अलग दृष्टिकोण है, जो भारत के साथ संवाद पसंद करता है। ऑस्ट्रेलिया भारत के साथ अपने संबंधों में अपने मूल्यों को लाना जारी रखता है।”

ओ’फैरेल ने आगे कहा, “प्रधानमंत्री ट्रूडो द्वारा पहली बार लगाए गए आरोपों (खालिस्तानी आतंकवादी निज्जर की मौत के संबंध में) के लगभग एक साल बाद हमने कनाडा में कोई अदालती कार्रवाई नहीं देखी है। जहाँ तक ​​मेरी जानकारी है, हमने संयुक्त राज्य अमेरिका में भी कोई अदालती कार्रवाई नहीं देखी है।”

पूर्व उच्चायुक्त ने कहा कि यह सुझाव देना कि भारतीयों का ऑस्ट्रेलियाई राजनीति में शामिल होना, उनकी अपनी उन्नति के लिए है या फिर ऑस्ट्रेलियाई सरकार के भारत के साथ संबंधों को प्रभावित करने के लिए है, उन नागरिकों के खिलाफ पूरी तरह से कलंक है जो उद्यमी और शांतिपूर्ण हैं।

बैरी ओ’फैरेल की टिप्पणी ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (एबीसी) में छपे लेख के जवाब में आई है, जिसका शीर्षक है – नरेंद्र मोदी की भारत सरकार और उसके सहयोगियों पर जासूसी करने, सिख आलोचकों को चुप कराने और ऑस्ट्रेलिया में अपनी दूर-दराज़ की विचारधारा को आगे बढ़ाने का आरोप।

बिहार का 65% आरक्षण खारिज लेकिन तमिलनाडु में 69% जारी: इस दक्षिणी राज्य में क्यों नहीं लागू होता सुप्रीम कोर्ट का 50% वाला फैसला

पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार के राज्य में आरक्षण सीमा को 50% से बढ़ा कर 65% करने के फैसले पर रोक लगा दी है। पटना हाई कोर्ट ने आरक्षण सीमा को 50% पर ही रखने का फैसला दिया है। बिहार ने आरक्षण सीमा को 50% से 65% करने का यह निर्णय 2023 में लिया था। इसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जहाँ बिहार के 65% आरक्षण को कोर्ट ने समाप्त कर दिया है, वहीं तमिलनाडु में पिछले तीन दशकों से लगातार 69% आरक्षण दिया जा रहा है और यह कोर्ट के फैसले से भी प्रभावित नहीं होता है।

बिहार ही नहीं इससे पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के भी आरक्षण सीमा को 50% से अधिक करने के निर्णयों को कानूनी रूप से चुनौती मिल चुकी है। इनमें से किसी भी राज्य को आरक्षण सीमा को 50% से अधिक नहीं करने दिया गया है। इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय है जो सरकारों को यह करने से रोकता है। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में दिया था और इसे अब इंदिरा साहनी मामले के नाम से जाना जाता है। हालाँकि, तमिलनाडु के मामले में यह इंदिरा साहनी मामला लागू नहीं हो रहा।

ऐसा तमिलनाडु में आरक्षण को लेकर बनाए गए कानूनों और कोर्ट के निर्णयों के कारण है। तमिलनाडु में वर्ष 1971 तक कुल 41% आरक्षण लागू था। लेकिन जब 1969 के में DMK के पूर्व मुखिया एम करूणानिधि पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने आरक्षण का ढाँचा बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने इसके लिए सत्तानाथान आयोग बनाया। यह राज्य के सभी वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को देख कर आरक्षण की सलाह देने के लिए बनाया गया था।

इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही करूणानिधि की सरकार ने राज्य में पिछड़े वर्ग का आरक्षण 25% से 31%, अनुसूचित जातियों और जनजातियों का आरक्षण 16% से 18% कर दिया। इसी के साथ राज्य में दिया जाने वाला आरक्षण 49% पहुँच गया। इसने 50% का आँकड़ा 1980 में पार किया जब तत्कालीन AIADMK सरकार के मुखिया एमजी रामचन्द्रन ने राज्य में पिछड़े वर्ग का आरक्षण 31% से बढ़ा कर 50% कर दिया। ऐसे में यह आरक्षण 68% पहुँच गया।

यह आरक्षण लगातार ऐसे ही चलता रहा और इसमें मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले के बाद अनुसूचित जनजातियों के 1% आरक्षण और जोड़ दिया गया और उन्हें अनुसूचित जातियों से अलग कर दिया गया। इस प्रकार राज्य का आरक्षण 69% हो गया। इसमें दिक्कत इंदिरा साहनी निर्णय के बाद आना चालू हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के 50% आरक्षण सीमा तोड़ने पर रोक लगा दी। तमिलनाडु ने इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। हालाँकि, अदालतों ने उन्हें राहत देने इनकार कर दिया।

इसके बाद तमिलनाडु ने अपने 69% आरक्षण के निर्णय को बचाने के लिए अपनी विधायी शक्तियों का सहारा लिया। 1993 में तत्कालीन AIADMK सरकार ने इसके लिए एक कानून पास करने का निर्णय लिया। तब जयललिता राज्य की मुख्यमंत्री थीं। उन्होंने 1993 में तमिलनाडु विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर इस आरक्षण को 69% कर दिया और फिर इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की मंजूरी भी ले ली। इस 69% आरक्षण को आगे कोर्ट में चुनौती ना दी जा सके, इसका भी उन्होंने प्रबंध कर दिया।

जयललिता ने इस 69% आरक्षण वाले कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा संविधान की नौवीं अनुसूची में डाले जाने वाले कानूनों को तब कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती जब तक इससे संविधान के मूल ढाँचे में बदलाव ना हो रहा हो। ऐसे में तमिलनाडु का 69% आरक्षण लगातार चल रहा है।

हज के लिए सऊदी अरब गए 90+ भारतीयों की मौत, अब तक 1000+ लोगों की भीषण गर्मी ले चुकी है जान: मिस्र के सबसे ज्यादा 658 जायरीनों का हुआ इंतकाल

सऊदी अरब में हज पर पहुँचे 1000 से ज्यादा जायरीनों की मौत हो चुकी है। अलग-अलग देशों से मिल रहे आँकड़ों के आधार पर ये संख्या निकली है। बताया जा रहा है कि हज पर जाने वाले कम से कम 90 भारतीयों की भी मौत हो चुकी है। सर्वाधिक मौतें मिस्र देश से हज यात्रा पर पहुँचे लोगों की हुई है।

एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब में अलग-अलग देशों से आए 1081 से ज्यादा जायरीनों की मौत भीषण गर्मी की वजह से हुई है। बताया जा रहा है कि मृतकों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है, जिन्होंने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया था। बता दें कि सऊदी अरब सरकार ने हज यात्रा पर पहुँचने वाले लोगों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाया हुआ है, इसके बावजूद भारी संख्या में बिना रजिस्ट्रेशन के भी लोग हज यात्रा में शामिल होने की कोशिश करते हैं।

सऊदी अरब में मिस्र से पहुँचे सर्वाधिक लोगों की मौत

एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, हज यात्रा पर पहुँचे लोगों में 1081 की मौत हो चुकी है, तो कई लोगों का इलाज चल रहा है। वहीं, बहुत लोग अभी लापता बताए जा रहे हैं। इस बीच, जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक, मृतकों की सर्वाधिक संख्या मिस्र देश से जुड़ी है। मिस्र से 658 लोग मारे जा चुके हैं, जिसमें से 630 लोग बिना रजिस्ट्रेशन के ही पहुँचे थे।

भारत के 90 से अधिक लोगों की मौत

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हज यात्रा पर इस साल 90 से अधिक भारतीयों की मौत हो चुकी है।, हालाँकि आधिकारिक रूप से मृतकों का आँकड़ा 68 ही बताया गया है। पिछले साल कुल मिलाकर 101 भारतीयों की मौत हुई थी। वहीं, पाकिस्तान के भी 35 से अधिक नागरिकों की मौत हो चुकी है।

बताया जा रहा है कि हर साल हजारों हज यात्री बिना परमिट के ही पहुँचते हैं, क्योंकि रजिस्ट्रेशन काफी महंगा है। ऐसे में सऊदी प्रशासन अवैध रूप से हज यात्रा करने के इच्छुक लोगों के खिलाफ अभियान चलाती रहती है। यही नहीं, इन लोगों को सऊदी सरकार द्वारा रजिस्ट्रेशन के माध्यम से आए लोगों की तरह एयर कंडीशन वाली सुविधाएँ भी नहीं मिल पाती और इन्हें घंटों तक पैदल चलते हुए बाहर ही नमाज पढ़नी पड़ती है।

एक अरब अधिकारी ने एएफपी से बताया कि सुरक्षा बलों द्वारा खदेड़े जाने जैसी घटनाओं की वजह से लोग थक चुके होते हैं, ऐसे में उन्हें बाहर रहकर नमाज पढ़ने और किसी सुविधा के न मिलने की वजह से काफी समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं। चूँकि सऊदी अरब सरकार इस यात्रा से जुड़ी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दे रही है, लेकिन माना जा रहा है कि अकेले बीते रविवार को ही 2700 से अधिक लोगों की हालत खराब हो गई थी, जिसकी मुख्य वजह भयंकर गर्मी थी।

गौरतलब है कि हज यात्रा इस्लाम के 5 प्रमुख स्तंभों में से एक है। आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम हर मुसलमान के लिए जीवन में एक बार हज करना अनिवार्य माना जाता है। हालाँकि लोगों में इस बात की भी धारणा है कि हज पर जान गँवाने वालों को जन्नत नसीब होती है। वैसे, सऊदी में इस समय भयंकर गर्मी का प्रकोप रहता है। पिछले महीने प्रकाशित सऊदी अरब के एक शोध में कहा गया कि हज करने वाले इलाके का तापमान हर दशक 0.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। सऊदी के मौसम विभाग ने बताया कि 17 जून को मक्का की ग्रैंड मस्जिद के पास तापमान 51.8 डिग्री सेल्सियस पहुँच गया था।

सादिक ने बकरीद पर शराब पीने से रोका तो बड़े भाई शाहजहाँ ने कर दी हत्या, केरल के अलप्पुझा का मामला: गिरफ्तार

केरल के अलप्पुझा में शाहजहाँ ने बकरीद के मौके पर शराब पीने से रोके जाने पर छोटे भाई सादिक की चाकू मार कर हत्या कर दी। शाहजहाँ अपने भाई की हत्या करने के बाद फरार हो गया। केरल पुलिस ने शाहजहाँ को गिरफ्तार करके हत्या का मामला दर्ज कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अलप्पुझा के कयमकुलम में रहने वाला 42 वर्षीय शाहजहाँ शराब का आदी था। वह रोज शराब पीकर घर आके लड़ाई करता था। वह बकरीद (17 जून, 2024) को भी घर से शराब पीने जाने की जिद कर रहा था। इसके लिए उसने घर में लड़ाई भी की थी। उसका छोटा भाई सादिक (38), शाहजहाँ के शराब पीने के खिलाफ था।

सादिक शाहजहाँ को शराब पीने नहीं जाने देना चाहता था। शाहजहाँ शराब पीने ना सजा सके, इसके लिए सादिक ने उसकी मोटरसाइकिल के तार काट दिए थे। इसके बाद भी शाहजहाँ नहीं माना और बकरीद के दिन शराब पीने बाहर चला गया। वह थोड़ी देर बाद शराब पीकर लौटा।

शराब पीकर लौटने के बाद शाहजहाँ घर पर लड़ाई-झगड़ा करने लगा। उसने अपने छोटे भाई सादिक से मारपीट भी चालू कर दी। दोनों भाईयों की लड़ाई यहाँ तक बढ़ी कि शाहजहाँ ने अपने छोटे भाई सादिक पर चाकू से वार कर दिया। शाहजहाँ ने सादिक के छाती के नीचे चाकू मारा जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया।

सादिक को इसके बाद अस्पताल ले जाया गया जहाँ अगली सुबह उसकी मौत हो गई। दूसरी तरफ हत्या करने के बाद शाहजहाँ मौके से फरार हो गया था। पुलिस ने उसकी तलाश की और उसे पास के ही इलाके के एक बार से गिरफ्तार कर लिया, उसे कोर्ट में पेश करके आगे की कार्रवाई की जा रही है। कोर्ट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

बताया गया कि दोनों भाई यहाँ अपनी माँ के साथ रहते थे। छोटा भाई सादिक का निकाह हुआ था लेकिन वह अपनी पत्नी से अलग हो चुका था।

पहले फिल्म देखेंगे, फिर देंगे फैसला: गुजरात हाई कोर्ट में ‘महाराज’ पर सुनवाई, आमिर खान के बेटे की डेब्यू फिल्म में हिंदू संतों को दिखाया गया है यौनाचारी

आमिर खान के बेटे जुनैद खान की आने वाली फिल्म ‘महाराज’ की रिलीज रोकने को लेकर उठ रही माँग पर गुजरात हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने इस दौरान कहा कि वो पहले ये फिल्म देखेंगे उसके बाद निर्णय लेंगे कि फिल्म पर रोक लगाई जानी चाहिए या फिर नहीं।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार संगीता विशेन की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करने के बाद कहा कि उन्होंने कोई भी निर्णय लेने से पहले फिल्म देखनी होगी, ताकि पता चले कि फिल्म में कहीं कोई धार्मिक भावनाएँ आहत तो नहीं की गईं, जैसा कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा है।

उल्लेखनीय है कि जुनैद खान की यह फिल्म ‘महाराज’ 14 जून को रिलीज होने वाली थी, लेकिन मामला अदालत जाने के बाद फिल्म पर अस्थायी रोक लगा दी गई। बाद में  यशराज फिल्म्स और नेटफ्लिक्स ने भी ‘महाराज’ की स्ट्रीमिंग रोकने के गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी जहाँ सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शालीन मेहता और जल उनवल्ला ने जज को इस केस पर कोई फैसला देने से पहले फिल्म देखने को कहा था। वहीं अदालत ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वे कि वे यशराज फिल्म्स और नेटफ्लिक्स के सुझावों के बाद फिल्म देखेंगे। आज न्यायाधीश ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया और कहा कि वह फिल्म देखकर ही निर्णय लेंगी।

बता दें कि ये फिल्म ‘महाराज लिबेल केस’ पर बन रही है। ये मामला धर्मगुरु जदुनाथजी बृजरतनजी महाराज से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने सन् 1862 में गुजराती अख़बार ‘सत्यप्रकाश’ नामक अख़बार में करसंदास मूलजी द्वारा लिखे गए एक लेख को लेकर मानहानि का मामला दर्ज करवाया था। इस लेख में वैष्णव पंथ के ‘पुष्टिमार्ग’ (वल्लभ संप्रदाय) के साधुओं के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे। आरोप लगाया गया था कि जदुनाथजी के कई महिलाओं से यौन संबंध हैं और लोगों को अपनी भक्ति साबित करने के लिए अपनी पत्नी साधुओं को सौंपनी पड़ती है।

जहाँ जुनैद खान इस फिल्म में उक्त पत्रकार का रोल करेंगे और हीरो होंगे, वहीं विलेन के रूप में एक हिन्दू साधु को दिखाया जाएगा जिसका रोल जयदीप अहलावत अदा करेंगे। फिल्म का पोस्टर रिलीज करते हुए बताया गया है कि आखिरकार 162 वर्षों बाद दिखाया जाएगा कि कैसे एक व्यक्ति ने अपने संकल्प की शक्ति से यथास्थिति को चुनौती दी। 1994 में जन्मे जुनैद खान आमिर खान और उनकी पहली पत्नी रीना दत्ता के बेटे हैं। आमिर खान अपने बेटे और साई पल्लवी को लेकर एक और फिल्म बना रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं का इस विषय पर कहना है कि 1862 के मामले में, जिसका निर्णय बॉम्बे सुप्रीम कोर्ट के अंग्रेज न्यायाधीशों द्वारा किया गया था, हिंदू धर्म, भगवान कृष्ण और भक्ति गीतों और भजनों के बारे में गंभीर रूप से ईशनिंदा वाली टिप्पणियाँ की गई थीं। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा कि फिल्म को बिन किसी ट्रेलर या प्रमोशन कार्यक्रम के रिलीज किया जा रहा है ताकि इसकी कहानी लोगों से छिपी रहे। अगर फिल्म रिलीज हुई तो उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत होंगी। फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से तत्काल अपील करने के बावजूद उन्हें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली