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‘देश शरिया से नहीं चलेगा, सरकार बनते ही पूरे देश में लागू होगा समान नागरिक संहिता’: गृहमंत्री अमित शाह बोले- धारा 370 को कॉन्ग्रेस ने बच्चे की तरह पाला

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (26 अप्रैल 2024) को कहा कि देश शरिया से नहीं, समान नागरिक संहिता (UCC) चलेगा। उन्होंने कहा कि देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार सरकार बनते ही पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू किया जाएगा। ये ‘मोदी की गारंटी’ है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2024 के अपने घोषणा पत्र में पर्सनल लॉ को फिर से लागू करने की बात कही है।

मध्य प्रदेश के गुना संसदीय क्षेत्र में जनता को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, “कॉन्ग्रेस के घोषणा पत्र को ध्यान से पढ़िए। उन्होंने कहा है कि पर्सनल लॉ को फिर से लागू करेंगे। वे देश में मुस्लिम पर्सनल लॉ लाना चाहते हैं। क्या ये देश शरिया से चल सकता है? राहुल बाबा, आपको तुष्टिकरण के लिए जो करना है वो करो, लेकिन जब तक भाजपा है हम पर्सनल लॉ नहीं लाने देंगे।”

गृहमंत्री ने आगे कहा, “ये देश समान नागरिक संहिता से चलेगा। ये हमारे संविधान की स्पिरिट है। हम उत्तराखंड में यूसीसी लाए हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गारंटी है कि हम देश भर में यूसीसी को लागू करेंगे।” उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस 70 साल तक धारा 370 को अपने बच्चे की तरह पालती रही, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2019 को एक झटके में कश्मीर से धारा 370 को खत्म कर दिया।

अमित शाह ने कहा कि कॉन्ग्रेस ने राम मंदिर का मुद्दा 70 सालों तक दबाकर रखा। गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस देश के विकास में सबसे पहली प्राथमिकता एससी, एसटी और ओबीसी को दी है। लेकिन, कॉन्ग्रेस कहती है कि इस देश के संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार मुस्लिमों का है। उन्होंने कहा कि भाजपा कॉन्ग्रेस की इस मंशा को पूरी नहीं होने देगी।

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस देश से आतंकवाद और नक्सलवाद को समाप्त किया है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ओबीसी विरोधी पार्टी है। उसने वर्षों तक ओबीसी वर्ग के लोगों को केंद्रीय संस्थानों में आरक्षण नहीं दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले 10 साल में देश के करोड़ों गरीबों के लिए ढेर सारे काम किए हैं।

इसके बाद मध्य प्रदेश के राजगढ़ में भी उन्होंने जनसभा को संबोधित किया। इस सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह चुनावी मैदान में हैं। दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश का बंटाधार करने वाला व्यक्ति बताते हुए अमित शाह ने कहा, “दिग्विजय सिंह की राजनीति से स्थायी विदाई कर देनी चाहिए। यह आशिक का जनाजा है, जरा धूमधाम से निकालो और बड़ी लीड से हराकर घर बैठाओ।”

‘केजरीवाल के लिए राष्ट्रहित से ऊपर व्यक्तिगत हित’: भड़का हाई कोर्ट, जेल से सरकार चलाने के कारण दिल्ली के 2 लाख+ स्टूडेंट को न किताब मिली, न ड्रेस

शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार करने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई। हाई कोर्ट ने कहा कि अरविंद केजरीवाल राष्ट्रहित से ऊपर अपना व्यक्तिगत हित रखते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके जेल में होने के कारण दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में 2 लाख विद्यार्थियों को किताब एवं यूनिफॉर्म मिलने में देरी हो रही है।

दरअसल, ‘सोशल ज्यूरिस्ट’ नाम के एक NGO ने एक जनहित याचिका दाखिल करके कहा है कि नगर निगम के स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों को अब तक किताबें नहीं मिली हैं। इस पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस प्रीतम सिंह अरोड़ा ने कहा कि दिल्ली सरकार को सिर्फ सत्ता की चाह है।

बेंच ने कहा, “किताब और यूनिफॉर्म बँटवाना कोर्ट का काम नहीं है। हम ये इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि कोई अपना काम नहीं कर रहा है… आपके क्लाइंट (दिल्ली सरकार) को सिर्फ सत्ता में दिलचस्पी है। मैं नहीं जानता कि आप कितनी शक्ति चाहते हैं? समस्या यह है कि आप शक्ति को हथियाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके कारण आपको शक्ति नहीं मिल रही है।”

इस पर दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि MCD की स्थायी समिति की गैर-मौजूदगी में किसी अधिकारी को शक्ति देने के लिए मुख्यमंत्री की सहमति जरूरी है। मुख्यमंत्री अभी अभी हिरासत में हैं, इसलिए देरी हो रही है। इस पर कोर्ट ने कहा कि ये कोई बहाना नहीं हो सकता।

इस पर जस्टिस मनमोहन ने कहा कि खुद हाई कोर्ट अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने की माँग वाली कई याचिकाओं को खारिज कर चुका है। उन्होंने कहा, “आपने कहा है कि मुख्यमंत्री के हिरासत में होने के बावजूद सरकार जारी रहेगी। आप हमें उस रास्ते पर जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिस पर हम नहीं जाना चाहते थे। यदि आप चाहते हैं कि हम इस पर टिप्पणी करें, तो हम पूरी सख्ती से करेंगे।”

कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब ये नहीं है कि इस मामले को ऐसे ही छोड़ दिया जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर स्टैंडिंग कमिटी किसी भी वजह से नहीं बन पा रही है तो दिल्ली सरकार किसी उपयुक्त अथॉरिटी को वित्तीय अधिकार दे। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि वो इस मामले में दो दिन के अंदर जरूरी कार्रवाई करे।

भाजपा का दिल्ली सरकार पर हमला

दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रामवीर बिधूड़ी ने कहा क‍ि मुख्यमंत्री केजरीवाल की जेल से सरकार चलाने की जिद से संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की सिफारिश के अभाव में द‍िल्‍ली नगर न‍िगम में मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव स्थगित हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि दिल्ली में पिछले 35 दिनों से कैबिनेट की बैठक नहीं हुई है। राजधानी में बिजली और पानी का समर प्लान नहीं बना है। पिछले साल डूबने के बावजूद मॉनसून के दौरान राजधानी को बचाने के लिए कोई मीटिंग नहीं हो रही है। पूरा प्रशासन ठप पड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उपराज्यपाल को हस्तक्षेप करना चाहिए।

शराब घोटाले में नष्ट किए सबूत

शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट में अपनी बात रखी है। हलफनामे में ED ने कहा, “घोटाले की अवधि में और जब 2021-22 की दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति में घोटाला और अनियमितताएँ सार्वजनिक हो गईं, तब 36 व्यक्तियों (आरोपित और इसमें शामिल अन्य व्यक्तियों) द्वारा कुल 170 से अधिक मोबाइल फोन बदले/नष्ट किए गए।”

हलफनामे में आगे कहा गया है, “घोटाले और धन के लेन-देन के महत्वपूर्ण डिजिटल सबूतों को आरोपियों और इसमें शामिल अन्य व्यक्तियों द्वारा सक्रिय रूप से नष्ट कर दिया गया है। सबूतों के इतने सक्रिय और आपराधिक विनाश के बावजूद एजेंसी महत्वपूर्ण सबूतों को फिर से हासिल करने में सक्षम रही है, जो सीधे तौर पर प्रक्रिया में याचिकाकर्ता का खुलासा करती है।”

लोकसभा चुनाव 2024: बंगाल में हिंसा के बीच देश भर में दूसरे चरण का मतदान संपन्न, 61%+ वोटिंग, नॉर्थ ईस्ट में सर्वाधिक डाले गए वोट

लोकसभा चुनाव 2024 में दूसरे चरण के लिए मतदान समाप्त हो गया है। देश के 13 राज्यों की 88 लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ। ये मतदान 89 सीटों पर होना था, लेकिन मध्य प्रदेश की बैतूल लोकसभा सीट पर बीएसपी कैंडिडेट के निधन की वजह से मतदान नहीं कराया गया, यहाँ मतदान 7 मई को कराया जाएगा। हालाँकि जिन 88 लोकसभा सीटों पर मतदान हुआ, वहाँ 61.4% प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में सर्वाधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया, तो पश्चिम बंगाल में हिंसा की कभरें आई। वहीं, संदेशखाली में भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए, जिसके बाद एनएसजी तक को तैनात करना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जिन 88 सीटों पर शुक्रवार को वोटिंग हुई है उनमें अभी तक के आँकड़े के अनुसार, त्रिपुरा पूर्व सीट पर सबसे ज्यादा 78.53% मतदान दर्ज किया गया है। वहीं, सबसे कम 45.94% वोटिंग मध्य प्रदेश की रीवा पर सीट पर हुई है। वहीं, छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के 102 गाँवों में पहली बार लोकसभा के लिए मतदान हुआ।

आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में त्रिपुरा में सर्वाधिक 77.97 प्रतिशत मतदान दर्ज किया। इसके अलावा असम में 70.68 प्रतिशत, बिहार में 54.17 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 72.51 प्रतिशत, जम्मू और कश्मीर में 67.22 प्रतिशत, कर्नाटक में 64.57 प्रतिशत, केरल में 65.04 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 55.32 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 53.71 प्रतिशत, मणिपुर में 77.18 प्रतिशत, राजस्थान में 60.06 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 53.17 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 71.84 प्रतिशत मतदान हुआ है।

इन राज्यों में हुआ मतदान

बता दें कि लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में केरल की (20) सीटों, कर्नाटक (14), राजस्थान (13), महाराष्ट्र (8), उत्तर प्रदेश (8), मध्य प्रदेश (7), असम (5), बिहार (5) हैं, तो छत्तीसगढ़ (3), पश्चिम बंगाल (3), मणिपुर, त्रिपुरा और जम्मू-कश्मीर में 1-1 सीट पर मतदान कराया गया। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में इन 88 में से 52 सीटें भाजपा ने जीतीं थीं। वहीं कांग्रेस को 18 और शिवसेना और जदयू को चार-चार सीटों पर सफलता मिली थी। इसके अलावा 10 सीटें अन्य के खाते में गई थी।

लोकसभा चुनाव के इस दूसरे चरण में राहुल गाँधी, हेमा मालिनी, अरुण गोविल, ओम बिरला, एचडी कुमारस्वामी, शशि थरूर और राजीव चंद्रशेखर जैसे नामचीनों का भाग्य ईवीएम में बंद हो गया। इस चरण में 5 केंद्रीय मंत्री चुनाव मैदान में हैं, जिसमें केरल की अटिंगल सीट से वी. मुरलीधरन, केरल की तिरुवनंतपुरम सीट से राजीव चंद्रशेखर, राजस्थान की जोधपुर लोकसभा सीट से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, राजस्थान के बाड़मेर से केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी और बेंगलुरु उत्तर सीट से केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे चुनाव मैदान में हैं। 

पश्चिम बंगाल में हिंसा, एनएसजी की तैनाती, भारी हथियार बरामद

केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में बड़ी मात्रा में हथियार और गोला बारूद बरामद हुए। बताया जा रहा है कि यहाँ से उसे विदेश में बने हथियार तक बरामद हुए हैं। CBI की टीम केन्द्रीय सुरक्षा बलों के साथ यहाँ पहुँची। शाहजहाँ के एक करीबी हफीजुल खान के घर से यह हथियार बरामद किए गए हैं। हफीजुल भी तृणमूल कॉन्ग्रेस का नेता बताया जा रहा है। यहाँ हालात बिगड़ने पर एनएसजी तक को तैनात किया गया। इसके अलावा वोटिंग के दौरान पश्चिम बंगाल में कई जगहों पर हिंसा की खबरें आईं।

इसके अलावा तृणमूल कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि बंगाल की दो लोकसभा सीटों बालूरघाट और रायगंज में सेंट्रल फोर्सेस ने महिलाओं को वोटिंग से रोका। वहीं, बालूरघाट में बंगाल भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और तृणमूल कॉन्ग्रेस वर्कर्स के बीच झड़प भी हुई।

मणिपुर में ईवीएम तोड़ा, हंगामा

आउटर मणिपुर में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में उखरुल जिले के मतदान केंद्र 44/36 और 44/41 पर उपद्रवियों ने ईवीएम मशीन और वीवीपैट को नष्ट कर दिया। आउटर मणिपुर (एसटी) संसदीय क्षेत्र के उखरुल के सहायक रिटर्निंग अधिकारी कजलाई गंगमेई ने रिटर्निंग ऑफिसर को सूचना दी कि बदमाशों ने दोपहर करीब 3.40 बजे मतदान केंद्रों 44/36 और 44/41 पर ईवीएम और वीवीपैट को नष्ट कर दिया है।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव 2024 के लिए 7 चरणों में मतदान कराया जा रहा है। पहले चरण के लिए 19 अप्रैल को मतदान कराया गया था। दूसरे चरण के लिए शुक्रवार (26 अप्रैल 2024) को संपन्न हो गया। अभी 5 चरणों में मतदान कराया जाना और नतीजे 4 जून को सामने आएँगे।

जानिए कौन है भारत विरोधी पाकिस्तानी पत्रकार जहाँजैब अली: अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अपनी प्रोपेगेंडा से नहीं आता बाज

अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित जहाँजैब अली नाम के एक ‘पत्रकार’ ने गुरुवार (25 अप्रैल 2024) को अवनी डायस के ‘वीजा नवीनीकरण’ वाले संदिग्ध मुद्दे को उठाकर विवाद खड़ा कर दिया। ऑस्ट्रेलिया की एबीसी न्यूज़ की दक्षिण एशिया प्रमुख डायस ने 23 अप्रैल को कहा था कि मोदी सरकार के खिलाफ आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करने पर उन्हें भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।

बाद में पता चला कि अवनी डायस ने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था। उन्होंने काफी पहले ही अपने देश ऑस्ट्रेलिया जाने की योजना बना चुकी थी। जब जहाँजैब अली को संभावना जगी कि इस मुद्दे से भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव आ सकती है तो वे इस मुद्दे को उछालने से अपने आपको रोक नहीं सके।

जहाँजैब अली के नापाक मंसूबों के विपरीत, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रधान उप प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा, “भारत सरकार अपनी वीज़ा नीति पर बात कर सकती है। यह कोई ऐसी बात नहीं है, जिस पर मैं यहाँ से विचार करूँ।” दरअसल, यह पहली बार नहीं था कि अली को अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा नजरअंदाज किया गया था।

भारत के आंतरिक मामलों से संबंधित मुद्दों पर अमेरिकी सरकार की राय माँगने का उनका कुख्यात इतिहास रहा है। जहाँजैब अली मूल रूप से पाकिस्तान के रहने वाले हैं। उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के अनुसार, वह अक्टूबर 2014 से पाकिस्तानी चैनल ARY न्यूज़ से जुड़े हुए हैं। ऑपइंडिया ने पाया कि उन्होंने फरवरी और अगस्त 2023 के बीच ‘द फ्राइडे टाइम्स’ के लिए भी लिखा है।

खालिस्तान का मुद्दा उठाने पर पाकिस्तानी पत्रकार की निंदा

इस साल 17 अप्रैल को जहाँजैब अली ने खालिस्तान का मुद्दा उठाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि पीएम मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत सरकार द्वारा आतंकवादियों की एक्स्ट्रा टेरिटोरियल हत्याओं की बात कबूल की है। उन्हें अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता से कड़ी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, लेकिन मैथ्यू मिलर ने उनके प्रश्न पर विचार ही नहीं किया।

मैथ्यू मिलर ने जोर देकर कहा था, “जैसा कि मैंने पहले कहा है, संयुक्त राज्य अमेरिका इसके बीच में नहीं आने वाला है, लेकिन हम भारत और पाकिस्तान दोनों को तनाव से बचने और बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”

पिछले साल सितंबर में मैथ्यू मिलर ने खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और भारत-कनाडा के बीच राजनयिक विवाद को लेकर जहाँजैब अली के भारत विरोधी सवाल पर टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया था। बता दें कि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बिना कोई सबूत दिए निज्जर की हत्या में भारत की भूमिका का आरोप लगाया था।

जब जहाँजैब अली ने अमेरिकी हस्तक्षेप की गुहार लगाई

पिछले साल मार्च में पाकिस्तानी ‘पत्रकार’ ने तत्कालीन अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस से यह गुहार लगाई थी कि भारत सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत फिर से शुरू करे। उन्होंने नेड से पूछा, “कई विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के पास दोनों साझेदारों (पाकिस्तान और भारत) के बीच मध्यस्थता करने की शक्ति और अधिकार है… तो आप मध्यस्थता क्यों नहीं करते?”

इस पर अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा, “क्योंकि ये देशों का स्वयं का निर्णय है। यदि वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए किसी विशेष भूमिका पर सहमत होते हैं तो संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों देशों के भागीदार के रूप में उस प्रक्रिया का किसी भी तरह से समर्थन करने के लिए तैयार है।”

नेड प्राइस ने अली के सवाल को नजरअंदाज करते हुए ककहा, “हालाँकि, यह संयुक्त राज्य अमेरिका का काम नहीं है कि वह भारत और पाकिस्तान के एक-दूसरे से जुड़ने के तौर-तरीकों को निर्धारित करे। हम भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने के लिए रचनात्मक बातचीत और सार्थक कूटनीति का समर्थन करते हैं।”

अमेरिका-भारत संबंधों में खटास पैदा करने की कोशिश की

जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की राजकीय यात्रा से पहले यह पाकिस्तानी ‘पत्रकार’ भारत और अमेरिका के संबंधों में खटास लाना चाहता था। उन्होंने विदेश विभाग के प्रधान उप प्रवक्ता वेदांत पटेल से भारत में कथित ‘लोकतांत्रिक वापसी’ और पीएम मोदी से संबंधित ‘मानवाधिकार मुद्दे’ के बारे में पूछा।

पटेल ने जहाँजैब अली को चुप कराते हुए कहा, “ठीक है, मैंने कल आगामी राजकीय यात्रा के बारे में थोड़ी बात की थी और मैं फिर से दोहराऊँगा कि भारत के साथ हमारी साझेदारी सबसे अहम है। हम अपनी कुछ सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं पर भारत सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं। हम इस महीने के अंत में उनकी मेजबानी करने और अपनी भागीदारी को और गहरा करने के लिए उत्सुक हैं।”

BBC के ऑफिस के सर्वे पर भी फायदा उठाने की कोशिश की

फरवरी 2023 में अमेरिकी विदेश विभाग ने भारतीय कर अधिकारियों द्वारा दिल्ली और मुंबई में बीबीसी कार्यालयों पर छापे पर जहाँजैब अली के सवाल को नजरअंदाज कर दिया था। पाकिस्तानी पत्रकार जानना चाहते थे कि क्या अमेरिका मोदी सरकार के इस कदम से ‘चिंतित’ है। इस पर नेड प्राइस ने कहा, “हम भारतीय कर अधिकारियों द्वारा दिल्ली में बीबीसी कार्यालयों की तलाशी से अवगत हैं।”

अली ने इस पर भी अफसोस जताया कि 2002 के गुजरात दंगों पर बीबीसी द्वारा बनाई गई प्रोपेगैंडा डॉक्यूमेंट्री के आधार पर अमेरिका ने मोदी सरकार की आलोचना नहीं की। अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा था, “संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच घनिष्ठ राजनीतिक, आर्थिक और लोगों के बीच बेहद गहरे संबंध हैं। हम उन तत्वों को भी साझा करते हैं, जो अमेरिकी लोकतंत्र और भारतीय लोकतंत्र के लिए सामान्य हैं।”

दरअसल, फरवरी 2023 में टैक्स अधिकारियों ने बीबीसी के कार्यालयों का तीन दिनों तक सर्वेक्षण किया था। इसके बाद वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बीबीसी की टैक्स धोखाधड़ी को समझाया था। बीबीसी का नाम लिए बिना बयान में कहा गया था कि दिल्ली और मुंबई में एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह की इकाइयों के व्यावसायिक परिसरों पर आयकर अधिनियम, 1961 (अधिनियम) की धारा 133A के तहत सर्वे की गई थी।

दरअसल, एक सच्चे पाकिस्तानी के रूप में जहाँजैब अली भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों में खामियों का फायदा उठाने में शामिल रहे हैं। वे अपने पाकिस्तान समर्थक प्रोपेगेंडा को प्रश्नों के रूप में बहुत चतुराई से रखते हैं। वॉशिंगटन में अपने कार्यक्षेत्र और अमेरिकी विदेश विभाग तक आसान पहुँच को देखते हुए अली भारत विरोधी ताकतों की एजेंडा को पूरा करने के लिए मुखौटा के रूप में काम करते हैं।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इस लिंक को क्लिक करके आप विस्तार से पढ़ सकते हैं।)

बेटी से छेड़छाड़ कर रहा था नाबालिग मुस्लिम, माँ सरिता शर्मा ने विरोध किया तो घर में घुसकर मार दी गोली: मौत के बाद 2 साथियों संग हुआ फरार

दिल्ली के जहाँगीरपुरी में आफताब (नाबालिग, बदला हुआ नाम) और उसके साथियों ने सरिता शर्मा की गोली मार कर हत्या कर दी। सरिता शर्मा की बेटी के साथ आफताब छेड़छाड़ करता था। इस मामले में पुलिस को भी शिकायत दी गई थी। परिजन जब तक कुछ समझ पाते तब तक बदमाश घटना को अंजाम देकर मौके से फरार हो गए। वहीं आनन-फानन में महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार (26 अप्रैल 2024) को दिल्ली के जहाँगीरपुरी इलाके में स्थित जे ब्लॉक में आफताब और उसके साथियों ने सरिता शर्मा नाम की महिला को घर में घुसकर गोली मार दी और फरार हो गए। परिजन घायल महिला को बाबू जगजीवन राम अस्पताल लेकर पहुँचे, जहाँ डॉक्टरों ने महिला को मृत घोषित कर दिया। इस वारदात के पीछे की वजह सरिता शर्मा द्वारा अपनी नाबालिग बच्ची के साथ आफताब के छेड़छाड़ के विरोध को बताया जा रहा है, जिसमें सरिता शर्मा ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी।

आफताब बार-बार धमकी देता था कि उसके खिलाफ शिकायत वापस ली जाए, वर्ना वो उसे मार डालेगा और उसने इस वारदात को अंजाम भी दे दिया। इस वारदात की सूचना मिलने ही पुलिस मौके पर पहुँची और मामले की जाँच शुरू कर दी। मौके से कुछ ही दूरी पर लगे एक सीसीटीवी कैमरे में आफताब और उसके साथियों की मूवमेंट कैद हुई है, जिसमें अपराधी मुँह छिपाए और टोपी पहने नजर आ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रताप दुबे ने घटनास्थल का वीडियो शेयर कर इस मामले की जानकारी दी है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “दिल्ली के जहाँगीरपुरी क्षेत्र में आरोपित आफताब ने 36 साल की महिला सरिता शर्मा की गोली मारकर हत्या की। हमलावर ने घर में घुसकर मारी गोली। नाबालिग लड़की से एक तरफा प्यार में पागल लड़के ने लड़की की माँ को मार दी गोली। हमलावर अक्सर लड़की का पीछा करता था।”

पुलिस ने कहा है कि आफताब और उसके साथियों को पकड़ने के लिए स्पेशल टीमों का गठन किया गया है, जल्द ही आफताब और उसके साथियों को पुलिस पकड़ लेगी। इस मामले में परिजनों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजनों ने कहा कि सरिता की शिकायत पर अगर पुलिस ने समय से एक्शन लेकर आफताब के खिलाफ कार्रवाई की होती, तो आज ये घटना न घटती।

‘इस्लाम में दूसरे का अंग लेना जायज, लेकिन अंगदान हराम’: पाकिस्तानी लड़की के भारत में दिल प्रत्यारोपण पर उठ रहे सवाल, ‘काफिर किडनी’ पर हो चुका है बवाल

पाकिस्तान के कराची की रहने वाली 19 साल की भावी फैशन डिजाइनर आयशा रशीद को चेन्नई के अस्पताल में एक भारतीय मरीज का दिल प्रत्यारोपित कर नया जीवनदान दिया गया है। आयशा गंभीर हृदय संबंधी रोग से पीड़ित थीं और उन्हें पहली बार 2019 में चेन्नई के एमजीएम हेल्थकेयर में भर्ती कराया गया था। हालाँकि, दिल का प्रत्यारोपण से परिवार झिझक रहा था, क्योंकि उसके लिए 35 लाख रुपए का खर्च वहन आसान नहीं था।

बाद में बाद में अस्पताल की मेडिकल टीम ने इस पाकिस्तानी परिवार को ऐश्वर्यम ट्रस्ट से संपर्क कराया। इस ट्रस्ट ने दिल के प्रत्यारोपण के लिए इस परिवार को धन उपलब्ध कराया। आख़िरकार उन्हें लगभग छह महीने पहले अस्पताल में जीवनरक्षक सर्जरी मिली और वह भी मुफ़्त। वहीं, दिल देने वाला दाता दिल्ली का 69 वर्षीय ब्रेन-डेड मरीज था।

इस घटनाक्रम से नेटिज़न्स सोच रहे हैं कि 1.2 अरब लोगों के देश में एक पाकिस्तानी लड़की प्रतीक्षा सूची में टॉप पर कैसे पहुँची। भारत में उच्च हृदय रोग दर के लिए कुख्यात है और जिसका राष्ट्रीय स्तर पश्चिमी देशों के औसत से दोगुना है। नेटिजन्स इस बात पर भी आश्चर्यचकित दिखे कि एक मुस्लिम दूसरे का अंग कैसे ले सकता है, जबकि इस्लाम में अंगदान पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

अस्पताल के इंस्टीट्यूट ऑफ हार्ट एंड लंग ट्रांसप्लांट एंड मैकेनिकल सर्कुलेटरी सपोर्ट के सह-निदेशक डॉ. केजी सुरेश राव ने कहा, “विदेशियों को एक दिल तभी आवंटित किया जाता है, जब पूरे देश में कोई प्राप्तकर्ता नहीं होता है। चूँकि इस मरीज का दिल 69 साल के व्यक्ति का था, इसलिए कई सर्जन झिझक रहे थे। हमने जोखिम लेने का फैसला किया, क्योंकि आंशिक रूप से दाता के दिल की स्थिति अच्छी थी। हम ये भी जानते थे कि यह आयशा के लिए एकमात्र मौका है।”

हालाँकि, भारतीयों में हृदय रोग की व्यापकता और विशाल आबादी को देखते हुए यूजर्स को ये तर्क गले नहीं उतर रहा है। राकेश कृष्णन सिम्हा नाम के एक यूजर ने कहा कि विदेशियों, विशेष रूप से बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए लोगों के अंग प्रत्यारोपण पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “हर साल हजारों भारतीय हृदय प्रत्यारोपण के इंतजार में मर जाते हैं। हालाँकि, वामपंथी वास्तुकार चित्रा विश्वनाथ के ऐश्वर्यम ट्रस्ट के माध्यम से पाकिस्तानी लड़की ने एक भारतीय हृदय निःशुल्क प्राप्त किया। पाकिस्तानी लड़की के लिए दिल दिल्ली से चेन्नई लाया गया। डॉक्टरों का दावा है कि दिल्ली में कोई भी ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन कौन जानता है कि क्या ये डॉक्टर विवाद से बचना चाहते हों।”

एक अन्य यूजर ने लोगों से कॉन्ग्रेस और इंडी गठबंधन को वोट नहीं देने का आग्रह किया। उसने आरोप लगाया, “द्रमुक शासित चेन्नई ने एक पाकिस्तानी लड़की के हृदय प्रत्यारोपण की अनुमति दी, जो कभी अपना अंगदान नहीं करेगी। हजारों भारतीय तमिल लोग सरकारी अस्पताल में कतार में थे, लेकिन एमजीएम हेल्थकेयर ने एक पाकिस्तानी का हृदय प्रत्यारोपण मुफ्त में कर दिया।”

एक व्यक्ति ने टिप्पणी की, “अब वह पाकिस्तान वापस जाएगी, एक ‘जिहादी’ से शादी करेगी और कम से कम एक दर्जन बच्चों को जन्म देगी, जो भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ेंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या उसे एक भारतीय मरीज की कीमत पर दिल दिया गया? क्या एक भी भारतीय मरीज़ हृदय प्रत्यारोपण के इंतज़ार में नहीं थे? एक पाकिस्तानी लड़की को हृदय प्रत्यारोपण की मंजूरी किसने दी?”

अंग ले सकते हैं, लेकिन अंगदान कर नहीं सकते

कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि मुस्लिम केवल अंग ही क्यों लेते हैं, वे कभी अंगदान क्यों नहीं करते। यूजर्स का कहना है कि मुस्लिम अंगदान इसलिए नहीं करते, क्योंकि उनका मानना है कि यह उनकी धार्मिक मान्यताओं का उल्लंघन है। उन्होंने चुनौती दी कि जो लोग अंगदान नहीं करते, क्या उन्हें अंग लेने का अधिकार होना चाहिए।

यहाँ तक कि 1983 क्रिकेट विश्व कप विजेता भारतीय टीम के विकेटकीपर सैयद किरमानी ने 2018 में अपनी आंखें दान करने का अपना वादा वापस ले लिया था। उन्होंने चेन्नई के राजन आई केयर सेंटर में नेत्रदान के बारे में जागरूकता अभियान में भाग लेने के दौरान यह वादा किया था। उन्होंने दावा किया था, “इस्लाम में, हमें किसी मृत शरीर के अंगों को बाहर निकालना या दान करना नहीं चाहिए।”

उसी साल उत्तर प्रदेश के कानपुर के एक मुस्लिम डॉक्टर अरशद मंसूरी ने खुलासा किया था कि उन्हें धमकी दी जा रही है, क्योंकि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद अपने अंगदान करने का निर्णय लिया था। डॉक्टर मंसूरी के समुदाय के कुछ लोग उनकी नेक भावना से आहत दिखे और एक ऐसा कार्य करने के लिए उनसे नाराज़ थे जिसे वे ‘इस्लाम विरोधी’ मानते थे।

इतना ही नहीं, कानपुर के एक मदरसे के अरशद मौलवी मुनीफ बरकती ने दावा किया कि डॉक्टर ने उनसे यह सवाल किया था कि चिकित्सा उद्देश्यों के लिए किसी के शरीर या अंगों को दान करना इस्लाम में स्वीकार्य है या नहीं, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि मानव शरीर अल्लाह का एक उपहार है और वह कुरान के अनुसार, कोई व्यक्ति इसका स्वामी नहीं है।

जब किडनी काफिर हो गई

चौंकाने वाली बात यह है कि जो व्यक्ति किसी मुस्लिम को अंग देता है, वह भी कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार होता है। केरल के अलप्पुझा जिले के मावेलिक्कारा निवासी हिंदू महिला लेखा नंबूथिरी ने 2009 में किडनी दाताओं की तलाश में एक व्यक्ति के विज्ञापन पर आईं। उन्होंने 15 लाख रुपये तक के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और अपनी किडनी दान करने के लिए उत्सुक थीं।

साल 2012 में उन्होंने अपनी एक किडनी पट्टांबी के शफी को दे दी। शफी को किडनी रिप्लेसमेंट की गंभीर जरूरत थी। उसने खुद को गरीब बताते हुए मृत्यु शय्या पर होने का नाटक किया था। लेखा ने उसे अपना किडनी देने का निर्णय लिया और 2012 में दान कर दीं। वह खराब वित्तीय स्थिति से भी जूझ रही थीं और एक पट्टे के घर में रहती थीं।

लेखा के पति साजन भी एक मरीज थे। उनके उपचार के कारण घर की वित्तीय स्थिति खराब हो गई थी। इस कपल के दो बेटों का नामांकन कक्षा 8 और 10 में हुआ था। हालाँकि, उन्होंने इन कठिनाइयों के बावजूद मुफ्त अंगदान को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और 15 लाख रुपए तक के कई प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

साल 2023 में एक स्थानीय अखबार को इस घटना के बारे में पता चला तो इसे हिंदू-मुस्लिम के बीच सद्भाव के प्रतीक के रूप में इस खबर को लिखना चाहा। लेखा चीजों को सार्वजनिक करने से झिझक रही थी, क्योंकि वह अनावश्यक मीडिया का ध्यान नहीं चाहती थी। बाद में एक रिपोर्टर के समझाने के बाद पति-पत्नी इसके लिए सहमत हो गए। इसे ‘सांप्रदायिक किडनी’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।

लेखा के पति ने मीडिया को बताया कि उन्होंने अपनी कहानी साझा करने से पहले शफी से अनुमति माँगी थी तो वे नाराज हो गए, क्योंकि अंग दाता दूसरे धर्म से था। इससे वे गुस्सा हो गए और सांप्रदायिक घृणा की भावना से भर गए। लेखा के अनुसार, किडनी स्वीकार करने के लिए दोस्तों, परिवार और उसके समुदाय के लोगों ने उसका उपहास किया।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में रूकमा राठौड़ ने लिखा है। इस लिंक पर क्लिक करके इसे विस्तार से पढ़ सकते हैं।)

‘अभी वोट करने आने वाले होंगे मुस्लिम, फोर्स भेज दो’: DIG मुरादाबाद के नाम से फर्जी स्क्रीनशॉट वायरल, पुलिस के खंडन के बावजूद फैलाया जा रहा फेक न्यूज

लोकसभा चुनाव 2024 में दूसरे चरण के मतदान के दौरान मुरादाबाद रेंज के डीआईजी IPS मुनिराज के नाम से एक स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैला। ये मैसेज वॉट्सऐप ग्रुप ‘बेबाक खबर बेबाक अंदाज’ से जुड़ा है, जिसमें मुस्लिम बहुल इलाकों में 3 बजे के बाद वोटिंग बढ़ने से रोकने के लिए फोर्स भेजने की अपील की जा रही है। ये स्क्रीनशॉट पूरी तरह से फर्जी है, ऐसी सफाई डीआईजी रेंज मुरादाबाद के एक्स हैंडल पर दी गई है। इसके बावजूद इस मैसेज को इस्लामी और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम तेजी से फैला रहा है, जिसमें कई कथित ‘पत्रकार’ भी शामिल हैं।

इस स्क्रीनशॉट में DIG मुनिराज नाम से मैसेज भेजा गया दिख रहा है, जिसमें लिखा है, “अभी सब लोग नमाज पढ़ने गए है और 3 बजे के बाद ये फिर भारी वोट करेंगे। मुस्लिम बूथ्स पर 40 प्रतिशत वोटिंग हो गई है। कैसे भी 3 बजे फोर्स लगा दीजिए, आपको बहुत बहुत धन्यवाद।” इसके बाद एक और मैसेज भेजा गया है, जिसमें लिखा है ‘अमरोहा’ यानी ये मैसेज अमरोहा के लिए भेजा गया है।

इस वायरल मैसेज की जानकारी पुलिस तक पहुँची, तो पुलिस ने इस मैसेज का खंडन किया। पुलिस की तरफ से पोस्ट लिखा गया है, जिसमें लिखा है, “सर्व संबंधित को सूचित किया जाता है कि सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्मों पर IPS Muniraj के नाम से किसी अज्ञात द्वारा भ्रामक खबर फैलाने हेतु एक वॉट्सऐप ग्रुप “बेबाक खबर बेबाक अंदाज” का स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है, जबकि श्री मुनिराज जी, पुलिस उपमहानिरीक्षक, मुरादाबाद परिक्षेत्र मुरादाबाद “बेबाक खबर बेबाक अंदाज” वॉट्सऐप ग्रुप में नहीं हैं। तथ्यों की जानकारी कर आवश्यक विधिक कार्यवाही अमल में लायी जा रही है। ऐसी भ्रामक खबरों पर ध्यान न दें।”

इस खबर के खंडन के बावजूद ये फेक न्यूज तेजी से फैलाया गया। लोकेश राय नाम के पत्रकार ने लिखा, “इलेक्शन 2024 में क्या हो रहा है, ये देख लीजिए। एक सीनियर आईपीएस अफसर का मैसेज वायरल हुआ है। लगता है किसी संगठन के पदाधिकारी ने भेजा है।”

कॉन्ग्रेस कवर करने वाली ‘पत्रकार’ रोहिणी सिंह, जिनके एक्स पर 10 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स हैं, उन्होंने इस फेक न्यूज को रीट्वीट करते हुए लिखा, “ये क्या हो रहा है यूपी पुलिस? शर्मनाक।”

फेक न्यूज फैलाने के आरोपों में जिस बोलता हिंदुस्तान नाम के यूट्यूब चैनल पर रोक लग चुकी है, उसने भी इसे आगे बढ़ाया और लिखा, “मुस्लिम बूथों पर 40% वोटिंग हो चुकी है। जुमे की नमाज के बाद वोटरों की भीड़ उमड़ेगी, भारी फोर्स लगाओ।” यूपी के IPS अफसर के व्हाट्सएप मैसेज पर मचा हंगामा”। हालाँकि बाद में इस एक्स हैंडल ने पुलिस की प्रतिक्रिया साझा करके अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर लिया और नफरत फैलाने वाले फेक न्यूज को नहीं हटाया।

इस पूरे खेल में फेक न्यूज फैलाने में माहिर माना जाने वाला जुबैर भी शामिल रहा। बाला नाम के एक्स यूजर ने दावा किया कि जुबैर ने फेक न्यूज फैलाने वाले दो लोगों के ट्वीट्स को री-ट्वीट किया। साथ ही दोनों ही ट्वीट्स को री-ट्वीट करने से जुड़े स्क्रीनशॉट भी शेयर किए और लिखा, “यूपी के एक डीआईजी का फेक स्क्रीनशॉट सुबह से वायरल किया जा रहा है, जिसके मकसद का केंद्र अधिकारी के खिलाफ सांप्रदायिक नफरत पैदा करना है। इस स्क्रीनशॉट का फैक्ट चेक करने की बचाय अल्ट न्यूज का को-फाउंडर और कॉन्ग्रेस आईटी सेल का सदस्य मोहम्मद जुबैर (@Zoo_Bear) इसे अपने टूलकिट के माध्यम से आगे बढ़ा रहा है। वो एक अधिकारी पर हमले के लिए भीड़ को उकसाने की कोशिश कर रहा है। वो (जुबैर) इस तरह के अपराधों को हमेशा अंजाम देता रहा है। यूपी पुलिस को इसके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।”

बता दें कि मुरादाबाद में पहले चरण के दौरान ही 19 अप्रैल को मतदान समाप्त हो चुका है। ऐसे में मुरादाबाद के अधिकारी के नाम से इस तरह का फेक न्यूज फैलाने का एक ही मकसद था कि अमरोहा में दूसरे चरण में हुए मतदान को खास सांप्रदायिक नजरिए से प्रभावित किया जा सके।

इस्लामी-वामी फिलीस्तीन समर्थकों का आतंक देख US भूला मानवाधिकारों वाला ज्ञान, भारत के समय खूब फैलाया था प्रोपगेंडा: अमेरिका का दोहरा चरित्र बेनकाब

भारत में हिंसक प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई देखकर लोकतंत्र का ज्ञान देने वाला अमेरिका कुछ समय से खूब चर्चा में है। इन दिनों वहाँ फिलीस्तीन के लिए ‘आजादी’ माँगने की मुहीम छिड़ी हुई है। इस्लामी और वामपंथी छात्र मिलकर अमेरिका के कॉलेजों में प्रोटेस्ट कर रहे हैं और सड़कों पर बवाल किया हुआ है। शुरू में प्रशासन ने इसे सामान्य प्रदर्शन समझकर होने दिया था, लेकिन बाद में जब चीजें क्लासरूम के साइलेंट प्रदर्शन से निकलकर कॉलेज परिसर में हड़कंप मचाने, पुलिस पर हमले, तोड़फोड़ पर आ गईं, तो बिन देरी किए कार्रवाई शुरू हुई।

अब तस्वीरें सामने आ रही हैं जिनमें उपद्रव करने वाले प्रदर्शनकारियों को पुलिस हर तरीके से रोकने का प्रयास कर रही है। इस दौरान पुलिस और उनमें झड़पें भी हो रही हैं। जो पत्रकार इन चीजों को रिकॉर्ड कर रहा है उसको भी सरेआम पीटा जा रहा है। खुद को प्रोफेसर बताने वाली महिला को पकड़कर हथकड़ी लगाई जा रही है। उसके हाथ मरोड़े जा रहे हैं… आदि आदि।

ये अमेरिका से आई नई तस्वीर नहीं है। पिछले दिनों पुलिस पर हमला होने से बाद वहाँ ऐसी कार्रवाई लगातार चल रही है। हिंसक प्रदर्शन को रोकने के लिए अलग-अलग यूनिवर्सिटियों से प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए जा रहे हैं… और ये गिरफ्तारी एक दो नहीं, बल्कि सैंकड़ों की तादाद में हो रही है। अकेले कोलंबिया यूनिवर्सिटी से ही बीते दिनों 130 छात्र पकड़े गए थे। वहीं येल यूनिवर्सिटी से भी 40 के आसपास छात्रों को पकड़ा गया था। इसी तरह अन्य यूनिवर्सिटों में भी बात न मानने पर, गलत आचरण करने पर, हुड़दंग मचाने पर, लोगों को उकसाने पर प्रदर्शनकारी पकड़े गए थे। गुरुवार रात तक इनकी संख्या 300 तक पहुँच गई थी।

इसके अलावा हालिया कार्रवाई की बात करें तो हालात काबू पाने के लिए अब पुलिस हिरासत से ज्यादा बड़ा एक्शन ‘वोक’ छात्रों पर हो रहा है… हाल में अमेरिकी यूनिवर्सिटी प्रिंसटन ने भारतीय मूल की एक छात्रा अचिंत्या सिवालिंगम को बात न सुनने पर अमेरिका में पढ़ने से बैन ही कर दिया है। इसी तरह पीएचडी का एक छात्र हसन सैयद भी गिरफ्तार किया गया है। यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता ने कहा है कि ये लोग लगातार चेतावनी दिए जाने के बाद भी सुनने को तैयार नहीं थे इसलिए इनके खिलाफ ये कार्रवाई हुई।

अब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे वोक छात्रों के खिलाफ प्रशासन का ऐसा एक्शन गलत है या सही… इस पर चर्चा व्यापक स्तर पर चल रही है लेकिन इस बीच एक पक्ष जो सामने आया है वो अमेरिका के दोहरे चेहरे का है। एक चेहरा तो वो जो दिखाता है कि अमेरिका अपने देश में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अमेरिका कुछ भी कर सकता है। चाहे फिर उसके लिए उन्हें उग्र प्रदर्शनकारी पर लाठी-डंडे चलाने पड़ें, उन्हें बंदूक दिखाकर डराना पड़े या कोई अनुशासनहीन छात्र को कॉलेज के साथ-साथ देश से भी प्रतिबंधित करना पड़े… उन्हें इससे गुरेज नहीं है।

इस कार्रवाई ने बता दिया है कि अमेरिका की पहली प्राथमिकता अपने देश के सामान्य जनजीवन की सुरक्षा करना, सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान न पहुँचने देना है। ठीक वैसे ही प्राथमिकता जो साल 2019-20 में भारत की थी जब देश में कॉलेजों से शुरू हुई हिंसा सड़कों तक आने लगी थी, लेकिन उस समय जब भारत ने अपने देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए तो अमेरिका ने अपने समाचार पत्रों और चैनलों के जरिए सरकार को फासीवादी दिखाना शुरू कर दिया। उन वामपंथियों को बुद्धिजीवी बनाकर भारत की वो तस्वीर दिखाई जिससे साबित हो कि भारत का लोकतंत्र कमजोर है, यहाँ प्रदर्शन करने की आजादी नहीं है, सरकार अपनी मनमानी करती है, मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा आदि-आदि।

आज भी समय-समय पर जब घोर इस्लामी और वामपंथी तत्वों को वैश्विक स्तर पर कोई भारत विरोधी प्रोपगेंडा फैलाना होता है तो उनकी सहायता अमेरिका के नामी समाचार चैनल ही करते हैं। इसके अलावा मानवाधिकारों का हवाला देकर उपद्रवियों की रिहाई की माँग की जाती है वो भी तब जब आरोपितों के विरुद्ध सबूत इकट्ठा करके कार्रवाई की जा रही हो।

इस समय अमेरिका में जो कुछ भी चल रहा है उससे अमेरिका कुछ सीखे न सीखे पर इतना सीखने की जरूरत जरूर है कि देश का लोकतंत्र देश के लोगों से ही होता है, जब उनकी जान पर खतरा बनता है और देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के प्रयास होते हैं तो कड़ी कार्रवाई करनी पड़ती है, सरकार को सख्त होना पड़ता है, कड़े फैसले लेने पड़ते है। किसी के प्रदर्शन करने के अधिकार के कारण सारी जनता के जीवन को मुश्किल में नहीं छोड़ा जाता।

भारत में जब ऐसी स्थिति आई थी उस समय अमेरिका दूर से केवल स्थिति देख टीका-टिप्पणी करने में लगा था, मगर आज वही दृश्य उनके सामने आ गए हैं जिससे निपटने के लिए वो जो कार्रवाई कर रहे हैं, वो खुद उनपर भारी पड़ रही है। हर जगह उनकी आलोचना हो रही है, उन्हें मानवाधिकारों का ज्ञान मिल रहा है… मगर इस दौरान वो सब लोग शांत हैं जिन्होंने अपने आसपास ऐसे प्रदर्शनों के बाद होती हिंसा और उससे नुकसान होते देखे हैं। वो चुपचाप अमेरिका के दोहरे चरित्र को देख रहे हैं। उन्हें पता है कि अमेरिका में जब स्थिति सामान्य होगी वो फिर सब भूल जाएँगे, सेकुलरिज्म को बचाने के आड़ में कट्टरपंथ को बढ़ावा देने की बातें होंगे, लोकतंत्र के नाम पर अराजकता फैसलने देने की पैरवी होगी, भारत की कार्रवाई पर सवाल उठाए जाएँगे, प्रोपगेंडा चलाने वालों को विश्लेषक, बुद्धिजीवी कहकर स्पेस दिया जाएगा। अभी हाल में भी तो ऐसा हुआ ही है… अमेरिका के राज्य विभाग की हाल में आई रिपोर्ट में भी उन्होंने भारत के ऊपर सवाल उठाए हैं जिसे विदेश मंत्रालय ने बेहद पक्षपाती रिपोर्ट बताया है…।

वक्फ संपत्तियों से कब्जा नहीं हटवा सकता वक्फ बोर्ड का CEO, केवल ट्रिब्यूनल को हक: मद्रास HC का फैसला, तमिलनाडु का 2010 का कानून रद्द

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) संशोधन अधिनियम 33, 2010 को वक्फ अधिनियम 1995 के तहत अमान्य करार दे दिया है, क्योंकि यह संविधान के दायरे से बाहर है। इस संशोधन के जरिए तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के सीईओ को एस्टेट अधिकारी के रूप में कार्य करने का अधिकार प्रदान किया था।

एस्टेट अधिकारी के रूप में वक्त बोर्ड के सीईओ उन वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण करने वालों को बेदखल करने का आदेश दे सकता है, जिन्हें तमिलनाडु सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जादारों की बेदखली) अधिनियम 1976 के दायरे में लाया गया था।

मुख्य न्यायाधीश एसवी गंगापुरवाला और न्यायमूर्ति डी भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण करने वालों को केंद्रीय कानून में साल 2013 में किए गए संशोधन के बाद स्थापित वक्फ न्यायाधिकरणों के माध्यम से ही बेदखल किया जा सकता है। यानी कोई व्यक्ति यदि वक्फ सम्पत्ति पर अवैध कब्जा करता है तो उसे मात्र वक्फ ट्रिब्यूनल ही हटा सकता है ना कि इस नए संशोधन द्वारा नियुक्त अधिकारी। इसके खिलाफ कई रिट याचिका दाखिल की गई थीं।

इन याचिकाओं में कहा गया था कि राज्य का 2010 का संशोधन वक्फ अधिनियम 1995 के प्रतिकूल था। कुछ अपीलें भी जुड़ी हुई थीं, जो जुलाई 2023 में पारित एकल न्यायाधीश पीठ के आदेश को रद्द करने के लिए दायर की गई थीं। इस मामले में सभी याचिकाकर्ता और अपीलकर्ता या तो किरायेदार थे जिनका पट्टा समाप्त हो गया था या उन्हें वक्फ से संबंधित संपत्तियों/परिसरों के संबंध में अतिक्रमणकारी माना गया था।

याचिकाकर्ताओं और अपीलकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि संसद ने वक्फ संशोधन अधिनियम 2013 के माध्यम से वक्फ संपत्तियों के अनधिकृत कब्जे और उनकी बेदखली से निपटने के लिए वक्फ अधिनियम 1995 में संशोधन किया था। इसमें ऐसे अतिक्रमणों या अनधिकृत कब्जे से निपटने के लिए स्पष्ट रूप से धारा 54 बनाई गई थी।

संशोधित कानून की धारा 85 में सिविल कोर्ट, राजस्व अदालत और किसी भी अन्य प्राधिकारी के वक्फ के मामले में सुनवाई करने के क्षेत्र पर रोक लगा दी गई है। इसमें तमिलनाडु अधिनियम के तहत एस्टेट अधिकारी का अधिकार भी शामिल होगा। यह भी तर्क दिया गया कि केंद्रीय अधिनियम का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों से अनधिकृत कब्जेदारों को बेदखल करने के लिए एक व्यापक और देश भर में समान तंत्र तैयार करना है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इसको देखते हुए तमिलनाडु अधिनियम 2010 स्वयं शून्य हो जाता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि केंद्रीय अधिनियम के साथ टकराव वाले राज्य के किसी भी राज्य कानून को खत्म कर दिया जाएगा। इस मामले में भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल पेश हुए और अपना तर्क रखा। कोर्ट ने भी कहा कि इस मामले में राज्य के क़ानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता थी। ऐसे में कोर्ट ने अतिक्रमण सम्बन्धी ट्रिब्यूनल के अधिकार को ही मानते हुए इस कानून संशोधन को अमान्य करार दे दिया।

स्त्री धन पर सिर्फ पत्नी का हक, पति या सुसराल वालों का नहीं: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, शख्स से कहा- बीवी को देने पड़ेंगे 25 लाख रुपए

महिलाओं के जेवर-गहनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा है कि महिला का स्त्रीधन उसकी पूर्ण संपत्ति है, उसमें किसी को हिस्सेदारी देने की मजबूरी नहीं है। महिला अपनी मर्जी से उस स्त्रीधन को खर्च कर सकती है, वो ही उसकी पूरी तरह से मालकिन है। ससुराल के लोग उस स्त्रीधन में से कुछ भी नहीं पा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही ये भी कहा कि संकट के समय अगर पत्नी चाहे, तो पति इस स्त्री धन का इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन उस स्त्री धन को लौटाने की जिम्मेदारी भी पति की होगी। वो उसे लेकर भूल नहीं सकता। ये पति का नैतिक दायित्व होगा कि वो पत्नी के स्त्रीधन को लौटाए या उसके बराबर मूल्य चुकाए। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति को उसकी पत्नी के 25 लाख के स्त्रीधन को लौटाने का आदेश भी दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए पति को अपनी पत्नी के सभी आभूषण छीनने के लिए 25 लाख रुपये की आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। महिला अब 50 वर्ष की है। सुप्रीम कोर्ट ने जीवन-यापन की लागत में वृद्धि और समता एवं न्याय के हित को ध्यान में रखते हुए महिला को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के 5 अप्रैल, 2022 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तलाक मंजूर करते हुए पति और सास से सोने के मूल्य के रूप में 8.9 लाख रुपये वसूलने के फैमिली कोर्ट के 2011 के आदेश को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को नकार दिया कि एक नवविवाहित महिला को पहली रात ही सारे सोने के आभूषणों से वंचित कर दिया जाना विश्वसनीय नहीं है।

ये था पूरा मामला

महिला ने आरोप लगाया कि उसके गहने शादी के पहले ही दिन उसके पति ने ले लिए थे और रिश्ते में खटास आने के बाद और उनके अलग होने के फैसले के बाद उसने अपनी संपत्ति वापस पाने के लिए पारिवारिक अदालत का दरवाजा खटखटाया। 2009 में पारिवारिक अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और उसके पति को उसे 8.9 लाख रुपये देने का आदेश दिया, लेकिन केरल हाईकोर्ट ने आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि पत्नी यह साबित करने में असफल रही है कि उसका ‘स्त्रीधन’ उसके पति ने लिया था।