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दुनिया लॉकडाउन में लेकिन लल्लनटॉप अपने कर्मपथ से डिगा नहीं है

दी लल्लनटॉप अपनी ऑडियंस का ख़ास ध्यान रखते हुए उनके मतलब का फैक्ट चेक करते हुए यह भी साबित करते हुए देखा गया है कि सरसों के तेल से कोरोना वायरस से बचाव नहीं हो पाता है। यह वो ऑडियंस है जो दैनिक सस्ते इन्टरनेट की पूरी डेढ़ जीबी या तो टिकटॉक, या फिर दी लल्लनटॉप के चरणों में ही समर्पित करती है।

विदेश से भारत आए कोरोना संक्रमितों में से आधे इस्लामी मुल्कों से लौटे, सबसे ज्यादा 105 दुबई से

भारत में कोरोना संक्रमितों के आँकड़ों का विश्लेषण करने पर एक चौंकाने वाले बात सामने आती है। 300+ संक्रमण के मामले उन लोगों के हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से विदेश यात्रा का इतिहास रहा है। इनमें से भी 142 पॉजिटिव मामले उन लोगों के हैं, जो मध्य-पूर्व के इस्लामी मुल्कों से लौटे हैं।

इंडिया टुडे की फिर हुई बेइज्जती: मोदी सरकार के राहत पैकेज के पोस्टमॉर्टम में गणित से छेड़छाड़

राहत पैकेज की तुलना से पहले यह ध्यान रखना जरूरी है कि अन्य देशों ने व्यापक स्तर पर नुकसान देख ऐसी घोषणा की है। वहीं भारत ने स्थिति हाथ से निकलने से पहले एक कल्याणकारी पैकेज की घोषणा की है। आगे मुमकिन है कि सरकार अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की भरपाई के लिए किसी पैकेज की घोषणा करे।

मेरी 3 साल की बेटी के सिर में गोली मारी, वो बार-बार बोल रही थी- डैडी मुझे बचा लो…

एक बच्ची जो 10 दिन बाद अपना चौथा जन्मदिन मनाने वाली थी, उसे भी आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। उस पिता पर क्या गुजरी होगी जिसके ऊपर उसकी नन्ही बेटी का ​शव आकर गिरा होगा।

ग्लोबल लीडर बनने का चायनीज षड्यंत्र: हजारों मौत के बाद का प्रोपेगेंडा, कई देश आए वामपंथी लपेटे में!

सर्बिया के राष्ट्रपति ने तो यूरोपीय सहयोग और बंधुत्व को महज एक 'दिवास्वप्न' करार देते हुए कहा कि सिर्फ चीन ही था, जिसने उनकी मदद की। - चीन के इसी प्रोपेगेंडा का शिकार होने की लाइन में ईरान, इराक और इटली जैसे देश भी हैं। जहाँ रोजाना हजारों मौतें हो रहीं, वहीं चीन इस दुर्भाग्यपूर्ण समय को एक अवसर के तौर पर देख रहा।

कोरोना एक चीनी वैज्ञानिक प्रयोग का नतीजा? चमगादड़ से मनुष्य तक वायरस के सफर का पोस्टमॉर्टम

वैज्ञानिकों ने आगाह किया था कि ऐसी ही कोई बिमारी भविष्य में भी जन्म ले सकती है। 2002 के उत्तरार्ध में, एक रहस्यमयी निमोनिया जैसी बीमारी के मामले दक्षिण-पूर्वी चीन के गुआंगडोंग प्रांत में सामने आने लगे थे।

क्या अफगान-तालिबान शांतिवार्ता की घुटन का परिणाम है ISIS द्वारा गुरूद्वारे पर हमला, भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह की चुप्पी के मायने?

कल गुरूद्वारे पर हमले के बाद पूरा अफगानिस्तान अपने सिख-हिन्दू भाइयों के लिए उमड़ पड़ा और अपनी सहानुभूति व्यक्त कर उसके साथ खड़े होने की दृढ़ता दिखाई। इस हमले पर अभी तक तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस्लामिक स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी लेकर एक बार फिर अपना घिनौना चेहरा दुनिया के सामने रख दिया। इधर भारत में लिबरल-वामपंथी गिरोह इसको लेकर चुप्पी साधे हुए है। जैसे उसने सुकमा में नक्सली हमले के वक्त साधा था।

‘इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये सिख हैं, ये उस मजहब के नहीं जिससे आतंकी आते हैं’

"भारत में कुछ लोग इनके प्रवेश का विरोध करते हैं। इन्हें नागरिकता देने की बात पर राजनीति साधते हैं। वे चाहते हैं कि आतंकियों को भी नागरिकता दी जाए ताकि वे यहाँ उनका पालन कर सकें और हत्याएँ जारी रख सकें।"

जामिया का प्रोफेसर सस्पेंड, मजहब विशेष वाले ऑपइंडिया को बना रहे निशाना

अबरार अहमद ने ट्वीट कर बताया था कि सीएए का समर्थन करने वाले गैर मुस्लिम छात्रों को फेल कर दिया है। ऑपइंडिया ने इसकी रिपोर्ट की और यूनिवर्सिटी प्रशासन ने उसके ट्वीट के आधार पर कार्रवाई।

‘जामिया में जिहादियों और नक्सलियों की साँठगॉंठ, हिजाब वाली डायरेक्टर हमेशा नीचा दिखाती थी’

"मैंने जामिया से MA किया है। प्रथम वर्ष में 67% अंकों के साथ टॉप भी किया था। लेकिन हिजाब वाली एक डायरेक्टर मुझे हमेशा नीचा दिखाती थी, क्योंकि उन्हें मेरा नाम नहीं पसंद था। नक्सलियों के प्रति झुकाव रखने वाले एक अन्य प्रोफेसर ने मुझे हमेशा कम नंबर दिए। जिहादी नक्सलियों की सॉंठगॉंठ काफी मजबूत है।"

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