ये साध्वी ऋतम्भरा ही थीं, जिन्होंने कहा, "हॉं हम हिंदू हैं, हिंदुस्तान हमारा है।" जिनमें खुलकर यह कहने का साहस था, "महाकाल बनकर दुश्मन से टकराएँगे, जहॉं बनी है मस्जिद, मंदिर वहीं बनाएँगे।"
भारत की पत्रकारिता में यह रवीश का सबसे बड़ा योगदान है। अच्छी योजनाओं और सरकारी कार्यों में भी, खोज-खोज कर कमियाँ बताई जाने लगी हैं। देखा-देखी बाकी वामपंथी एंकरों और पुराने चावल पत्रकारों ने भी, अपनी गिरती लोकप्रियता बनाए रखने के लिए, अपने दैनिक शौच से पहले और फेफड़ों से चढ़ते हर खखार (हिन्दी में बलगम) के बाद, मोदी और सरकार को गरियाना अपना परम कर्तव्य बना लिया है।
NDTV और द वायर जैसे ही मीडिया गैंग अयोध्या में जारी व्यवस्थाओं को लेकर लगातार ही भ्रामक खबरें दे रहे हैं। NDTV का अपनी रिपोर्ट में कहना है कि वहाँ पर आने वाले दिनों में बहुत सरे लोग जमा होने जा रहे हैं लेकिन इंतजाम ठीक नहीं किए जा रहे हैं।
तीन दशकों में पूरी दुनिया के सोचने, समझने और शिक्षा को बेहतर तरीके से पहुँचाने का तरीका बदल जाता है, लेकिन भारत उसी वामपंथी नीति पर अटका था, जो कि इसकी जड़ों को दीमक की तरह खोखला करता रहा।