सनातन में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ था। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
पूतना और होलिका को खलनायिका से नायिका बनाने की कोशिश बाल-हत्या के महिमामंडन की कोशिश है। उसे ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर ढका नहीं जा सकता। ब्राह्मण तो वे दधीचि थे, जिन्होंने वृत्रासुर को मारने के लिए अपनी अस्थियाँ दे दीं, वज्र का निर्माण करने वास्ते।
बरसाना से रवाना होते ही दूर दराज से पहुँच रहे लोगों की भीड़ जुटना शुरू हो जाती है। कोई बरसाना में मौजूद मंदिरों के दर्शन कर रहा था तो कोई मंदिरों में खेले जाने वाली लड्डू मार होली का आनंद ले रहा था। यही क्रम देर रात तक चलता रहा।
महाशिवरात्रि की शाम के बाद वहाँ ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जैसा पिछले कुछ दशकों में शायद ही देखने को मिला हो। पूरा मंदिर प्रकाश से जगमग था और फूलों से सजाया गया था। पर्व के अवसर पर महा अभिषेक सहित कई अन्य प्रकार के पूजा-पाठ का आयोजन किया गया।
शिव महापुराण के द्वादश्ज्योतिर्लिन्ग्स्तोत्रं में उल्लेखित बारह ज्योतिर्लिंगों में से कुछ की भौगोलिक स्थितियों के बारे में भक्तों के मत अलग-अलग हैं। कारण यह है की स्तोत्र (श्लोक) में इन ज्योतिर्लिंगों की भौगोलिक स्थिति अस्पष्ट है, जिस कारण लोग अपने अपने तरीके से व्याख्या करते हैं।
चार बच्चों के पिता शरीफ बचपन से बसवन्ना की शिक्षाओं से प्रभावित रहे हैं। तीन साल से वे लिंगायत धर्म के बारे में शिक्षा ले रहे थे। बीते साल नवंबर में दीक्षा ली थी। अब 26 फरवरी को मुख्य पुरोहित की जिम्मेदारी वे सॅंभालेंगे।
इस मंदिर का गुंबद दुनिया में सबसे ऊँचा है। मंदिर के निर्माण में अब तक 2 करोड़ किलो सीमेंट का प्रयोग किया जा चुका है। 10 हज़ार श्रद्धालु एक ही वक्त में पूजा कर सकते हैं। 20,000 लोगों के ठहरने की भी व्यवस्था होगी।
सबसे पहले 67 एकड़ की भूमि का माप लिया जाएगा और ज़मीन को सीमांकित किया जाएगा। इसके बाद मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निवेदन किया जाएगा कि वो मंदिर का शिलान्यास करें। मंदिर परिसर का कुल क्षेत्रफल 100 एकड़ हो सकता है।
कई लोग मानते हैं कि 8वीं या 9वीं शताब्दी में माँ सरस्वती को जापान में बेंजाइटन के रूप में पूजा जाने लगा। लेकिन, पाँचवीं-छठी शताब्दी में लिखी गई बौद्ध पुस्तकों में बेंजाइटन का जिक्र है। उनकी प्रतिमाएँ सफ़ेद होती हैं और उनके हाथ में वीणा होता है।
"आप गतिशीलता का तभी आनंद ले पाएँगे या उत्सव मना पाएँगे, जब आपका एक पैर स्थिरता में दृढ़ता से जमा होगा। और दूसरा गतिशील।" मकर संक्रांति का पर्व इस बात का भी उद्घोष है कि गतिशीलता का उत्सव मनाना तभी संभव है, जब आपको अपने भीतर स्थिरता का एहसास हो।