Monday, May 25, 2020
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धर्मनिरपेक्ष-महाकाव्यमिदं रामायणं धर्मव्यतिरिक्तं न विद्यते अपितु सर्वश्रेष्ठधर्मण: शिक्षक:

पुन: अद्यत्वे दूरदर्शने रामायणस्य प्रसार: भवति। मूलरूपेण तत् आदिमहाकाव्यं आदिमा-संस्कृत-भाषायां लिखितं तर्हि पठामः तत्सारं तस्यामेव प्राचीनतमायां भाषायाम्। रामायणकथा गङ्गासदृश सतत प्रवाहमाना विविध-ज्ञान-युक्ता।

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डॉ. सोनिया अनसूया
Studied Sanskrit Grammar & Ved from traditional gurukul (Gurukul Chotipura). Assistant professor, Sanskrit Department, Hindu College, DU. Researcher, Centre for North East Studies.

यावत् स्थास्यन्ति गिरय: सरितश्च महीतले।
तावद् रामायाणी गाथा लोकेषु प्रचरिष्यते।।

नेदं कविगुरोर्दम्भोक्तिरपितु त्रिकालाबाधितदृष्टे: महर्षेर्भूतार्थकथनमिदम्। अन्यूनद्विसहस्रवर्षेभ्यो न केवलं भारते वर्षे अपितु द्वीपान्तरेषु अनेकेष्वियं रामायणकथा मनुष्यहृदयानि आवर्जयति। विश्वेऽस्मिन् लौकिकवाङ्मये न दृश्यते ग्रन्थान्तरं यस्य जनानां चरित्रे चिन्तने च इयान् गभीर: प्रभावोऽनुभूयतेति। युक्तमेव आह विपश्चिन्मैक्डोनल महोदय:-

“Probably no work of world literature, secular in origin, has ever produced so profound an influence on the life and thought of a people as the Ramayana.”

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रामायणं जनसामान्यस्य आदिमं काव्यम्। वाल्मीकिपूर्ववर्तिसमग्रमपि साहित्यं धर्मप्रवणत्वाद् धार्मिकम् आध्यात्मिकं चाभवत्। रामायणम् आदिमहाकाव्यं महर्षिवाल्मीकिश्चादिकवि: कवीनां गुरु: तथ्यमेतद् उत्तररामचरिते प्रकृष्टतया उद्धृतम्- “ऋषे! आद्य: कविरसि। आम्नायादन्यत्र नूतनश्छान्दसामवतार:”

धर्मनिरपेक्षमहाकाव्यमिदं धर्मव्यतिरिक्तं न विद्यते अपितु सर्वश्रेष्ठधर्मण: शिक्षक:। रामायणमहाकाव्यं मानवताधर्मं शिक्षयति। रामायणस्य नायको मर्यादापुरुषोत्तमश्रीरामचन्द्र: शबर्या: हस्तेन बदरीफलं भुक्त्वा शिक्षयति यत् नास्ति जगति कोऽपि जन: अस्पृश्य:। सर्वेऽपि मनुष्या: समानताधिकारिण:।

विपुले संस्कृतवाङ्मये रामायणं बीजरूपमहाकाव्यम्। उत्तरवर्तीनां काव्यानाम् उपजीव्य अयं ग्रन्थ:। न केवलं संस्कृतभाषायां अपितु अनेकासु भाषासु रामायाणमाश्रित्य काव्यानि प्रवृत्तानि। वस्ततस्तु रामायणमेव गीतिकाव्यस्य आधारभूतं काव्यं महाकाव्यानां विकासपरम्परायां आदिमं सोपानम्।

वाल्मीकिरेव तादृशो प्रगतिशीलो लोकभावाभिज्ञ: सरसभावानुविद्धो मानवमनोविज्ञानविदग्ध: कविरासीद् यो रामचरितं आश्रित्य लौकिकभावमयं महाकाव्यं रचितवान्। सहजतया एव उपदेशं कृतवान् – रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत्। नवरसरुचिरा इयं कृति: रसानां समावेशाद् जनसामान्यस्य चित्तं आकर्षति। प्रमुखतया करुणरसस्य चाभिव्यक्तौ चरमोत्कर्षत्वं लक्ष्यते। किमधिकं रामायणस्य आविर्भाव: करुणरसादेव-

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मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्।।


करुणरसप्राधान्यादेव रामायणं जनानां हृत्प्रियं काव्यम्। रामायणं न केवलं रामचरितमेव प्रस्तौति अपितु रामायणे दर्शन-उपनिषद्-स्मृति-नीतिशास्त्र-विज्ञान-मनोविज्ञान-आयुर्वेद-धनुर्वेदानां सार: तत्संबद्धा उपयोगिनो विषयाश्च प्रकीर्णरूपेण परिचर्चां भजन्ते।

रामायणं परमपवित्रं महाकाव्यं भारतीयसाहित्यस्य विश्वजनीनवाङ्मयस्य च कीर्तिस्तंभरूपम्। परमपूता अयोध्यानगरी भगवत्पादन्यासनिर्मला भारतवर्षस्य शोभां वर्धयति। रामायणस्य पवित्रतामनुभूय केचन मनीषिणः मन्यन्ते- “एकैकमक्षरं पुन्सां महापातकनाशनम्”।

रामायणस्य तादृशी लोकप्रियता यथा न केवलमेतद् विदुषामेव विभूषणं अपि तु सामान्यरूपेण सर्वजनानां धनिनां-निर्धनानां विदग्धानामज्ञानाम्, पुरुषाणां स्त्रीणां आबालवृद्धानां कण्ठाभरणतां आपद्यते। भारतीयमहापुरुष-चरित्रचित्रणात् सर्वेषां पूज्येयं कृति:। न केवलं भारते सकलेऽपि विश्वे श्रीरामचन्द्र: आदर्शरूपेण मूर्धास्थानं भजते। आचारसंहितारूपेण इदं सर्वत्र आद्रियते, भक्तानां भवनेषु च प्रतिदिनं पारायाणिक्रियते, अत एव उच्यते त्रिविक्रमभट्टेन-

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सदूषणामपि निर्दोषा, सखरापि सुकोमला।
नमस्तस्मै कृता येन, रम्या रामायाणी कथा।।

रामायाणी कथा गङ्गासदृशी जनानां क्लेशकष्टनिवारणी। रामायणस्य पाठेनैव जना: स्वजीवनं वाक्साफाल्यं च मन्यन्ते। महाकवितुलसीदासोऽपि अवधिभाषामाध्यमेन रामचरितस्य लेखनं चकार। तस्य रामचरितस्य पाठ: आवर्षं भक्तगृहेषु श्रोतुं शक्यते। अनेन ज्ञायते यत् रामचन्द्रस्य चरित्रं मनुष्येषु तावद् उन्नतं स्थानं प्राप्तवदस्ति न तावत् अन्यस्य कस्यापि महापुरुषस्य।

न केवल: भगवान् श्रीरामचन्द्र: अपितु मिथिलानरेशस्य पुत्री सीता अपि जनेषु मातृतुल्या आदृता। पतिव्रतेयं सर्वासां स्त्रीणां मध्ये आदर्शरूपा। तस्या: जीवनं स्वच्छशुभ्रहिमसदृक्पवित्रं जन्मस्थानमपि यज्ञभुमिरेव मन्यते । अत एव पवित्रताशिरोमणिं तां जना:”सीता माता” इति सादरं व्यवहरन्ति। अत एव इयं रामायाणी गङ्गा भुवनत्रय पावनीति प्रशस्यते –

वाल्मीकिगिरिसंभूत, रामाम्भोनिधिसंगता।
श्रीमद् रामायाणी गङ्गा, पुनाति भुवनत्रयम्।।

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