चार बच्चों के पिता शरीफ बचपन से बसवन्ना की शिक्षाओं से प्रभावित रहे हैं। तीन साल से वे लिंगायत धर्म के बारे में शिक्षा ले रहे थे। बीते साल नवंबर में दीक्षा ली थी। अब 26 फरवरी को मुख्य पुरोहित की जिम्मेदारी वे सॅंभालेंगे।
इस मंदिर का गुंबद दुनिया में सबसे ऊँचा है। मंदिर के निर्माण में अब तक 2 करोड़ किलो सीमेंट का प्रयोग किया जा चुका है। 10 हज़ार श्रद्धालु एक ही वक्त में पूजा कर सकते हैं। 20,000 लोगों के ठहरने की भी व्यवस्था होगी।
सबसे पहले 67 एकड़ की भूमि का माप लिया जाएगा और ज़मीन को सीमांकित किया जाएगा। इसके बाद मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निवेदन किया जाएगा कि वो मंदिर का शिलान्यास करें। मंदिर परिसर का कुल क्षेत्रफल 100 एकड़ हो सकता है।
कई लोग मानते हैं कि 8वीं या 9वीं शताब्दी में माँ सरस्वती को जापान में बेंजाइटन के रूप में पूजा जाने लगा। लेकिन, पाँचवीं-छठी शताब्दी में लिखी गई बौद्ध पुस्तकों में बेंजाइटन का जिक्र है। उनकी प्रतिमाएँ सफ़ेद होती हैं और उनके हाथ में वीणा होता है।
"आप गतिशीलता का तभी आनंद ले पाएँगे या उत्सव मना पाएँगे, जब आपका एक पैर स्थिरता में दृढ़ता से जमा होगा। और दूसरा गतिशील।" मकर संक्रांति का पर्व इस बात का भी उद्घोष है कि गतिशीलता का उत्सव मनाना तभी संभव है, जब आपको अपने भीतर स्थिरता का एहसास हो।
काशी विद्वत परिषद के रामनारायण द्विवेदी ने ऑपइंडिया को बताया कि परिषद की बैठक में ये प्रस्ताव रखा गया था कि सुबह की आरती और दर्शन के समय जो लोग शिवलिंग का स्पर्श दर्शन करना चाहते हैं या फिर स्पर्श कर के पूजन करना चाहते हैं, उनके लिए ड्रेस कोड तय किए जाएँ।
"पुलिस ने धैर्य दिखाया और गोली नहीं चलाई। लखनऊ में 56 पुलिसकर्मियों पर गोली किसने चलाई? जो लोग कह रहे हैं कि उनके पास कोई कागज़ ही नहीं हैं, वो आख़िर हैं कौन? 6000 साल से भी ज़्यादा पुराने बाकू के फायर टेम्पल पहुँचे एक पाकिस्तानी युवक की दर्दनाक कहानी सुनिए..."
आज से सवा सौ साल पहले निकोलस नोतोविच ने एक अनुभवी लामा से मुलाक़ात की। उसने प्राचीन पाली भाषा में लिखे कुछ ऐसे दस्तावेज दिखाए, जिससे निकोलस के होश उड़ गए। सिल्क रूट से हिमालय पर पहुँचे ईसा मसीह ने बौद्ध भिक्षुओं से आत्म व परमात्मा के गुर सीखे।
1991 के प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप एक्ट के हिसाब से भी इस स्थल का 15 अगस्त, 1947 को मूल स्वरूप हिन्दू मंदिर ही था। इस धार्मिक स्वरूप की तस्दीक करने और ऐतिहासिक परिस्थितियों के साक्ष्य इकट्ठा करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) से सर्वेक्षण कराया जाना जरूरी है।
आधिकारिक रूप से BHU प्रशासन द्वारा SVDV से डॉ. फिरोज खान के इस्तीफे की पुष्टि करते ही छात्रों ने इसे धर्म, सत्य और मालवीय मूल्यों की जीत बताया है। अब उसी BHU के कला संकाय के संस्कृत विभाग में डॉ. फिरोज खान पढ़ाएँगे जिसका यही छात्र तहे-दिल से स्वागत करेंगे।