बीते साल जब दिल्ली की हवा बिगड़ रही थी तो केजरीवाल फैमिली के साथ दुबई प्राइवेट ट्रिप पर निकल गए थे। इस बार चुनाव चौखट पर है, इसलिए बने रहने की मजबूरी है। प्रदूषण के बहाने वे अपने 'बच्चा पॉलिटिक्स' को मॉंजने में जुट गए हैं।
इंदिरा, सोनिया और कल प्रियंका में मॉं खोजने वाले चाटुकारों के लिए परिवार के बाहर की महिलाओं का सम्मान मायने नहीं रखता। इसलिए, कभी वे एयरहोस्टेस की आत्महत्या को राजनीतिक हथियार बनाते हैं, तो कभी उपराज्यपाल पर ओछी टिप्पणी करते हैं।
याद रहे कि 84 के उलट 48 में भी एक दंगा हुआ था, कॉन्ग्रेसियों ने ही कराया था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो हुआ, वो लगभग सबको याद है लेकिन 1948 को भी याद रखना जरूरी है, ताकि कॉन्ग्रेस के असली DNA को पहचाने सकें।
दिल्ली प्रेस की पहुँच लाखों पाठकों तक है। इंग्लिश में कारवां, हिंदी भाषी के लिए सरिता और बच्चों के लिए चंपक। मतलब इनका फैलाया प्रोपेगेंडा और भी घातक है। इनसे बचना है क्योंकि इस बार इन्होंने बच्चों को भी नहीं बख्शा। आर्टिकल-370 के नाम पर चंपक में जो जहर इन्होंने बोया है, वो...
परिवार नियोजन कार्यक्रम न आज का है और न इससे जुड़े विज्ञापनों में हिंदू वेशभूषा वालों को दिखाने का चलन। पर, इससे कभी हिंदू भावना आहत नहीं होती। केवल समुदाय विशेष को 'हम दो' धर्म पर हमला दिखता है।
रवीश कुमार ने एक रिपोर्टर के रिपोर्ट का मजाक सिर्फ इसलिए उड़ाया क्योंकि वो रिपोर्टर उनके इतना बड़ा पत्रकार नहीं है और उसने रिपोर्ट अयोध्या के दीपोत्सव पर लिखी। आखिर रवीश से उम्मीद भी तो यही बची है।
एक के सामने जाति की चादर ओढ़े प्रभावशाली राजनीतिक बिरादरी था, तो दूसरे के सामने धर्म की खाल में लिपटे दरिंदे हैं। बावजूद इसके इन्होंने जो जज्बा दिखाया वो बताता है कि हमें विरासत के नाम पर उड़ान भरती महिलाओं से ज्यादा इनके हौसले की दरकार है।
क्षेत्र विशेष तक सीमित शिव सेना को एहसास है कि हालिया उभार मोदी की लोकप्रियता की बदौलत है। भाजपा से अलग होने का नतीजा भी वह 2014 के विधानसभा और 2017 के बीएमसी चुनाव में भुगत चुकी है। देर-सबेर उसका लौटना तय है। तब तक उसके राजनीतिक फुफकार के मजे लीजिए!
नीतीश कुमार के अलग होने के बाद मानों खुशियों ने लालू के परिवार से मुॅंह ही मोड़ लिया था। राजनीतिक दखल कमजोर पड़ गया और पार्टी की चूलें हिल गई। बेटे और बहू की तकरार भी सार्वजनिक चर्चाओं का हिस्सा बन गई। ऐसे में मोदी के कारण कैसे बदले समीकरण?
समीकरण कि अगर भाजपा को सत्ता से बाहर रखना ही ध्येय है तो शिव सेना के 56, कॉन्ग्रेस के 44 और एनसीपी के 54 की सरकार आराम से बहुमत के लिए ज़रूरी 145 विधायकों के सामने 154 खड़े कर सकती थी। लेकिन.....