यह दूसरा मजहब यदि सचमुच सहिष्णु है तो तत्काल कम से कम काशी और मथुरा के मंदिरों को खुद खाली करे और हिंदुओं के साथ वहाँ भव्य मंदिर बनवाए। बाकी, 30 हज़ार मंदिरों की तो बात भी नहीं हुई है….
जस्टिस गांगुली का कहना है कि अल्पसंख्यकों ने अरसे तक वहाँ मस्जिद देखी है, जिसे तोड़ डाला गया। साथ ही संविधान के अस्तित्व में आने से पहले वहॉं मस्जिद थी। इसलिए उन्हें इस फ़ैसले को समझने में मुश्किल आ रही है।
बाबरी मस्जिद का टूटना भले ही भारतीय कानून की दृष्टि में एक आपराधिक घटना है, लेकिन हिन्दुओं के इतिहास के हिसाब से यह उस आस्था के साथ न्याय है जिसके मंदिर की दीवार पर मस्जिद खड़ी की गई थी।
देश के कई मुस्लिम आज भी कबायली प्रवृतियों का अनुसरण करते नजर आते हैं। अल्पसंख्यक इलाकों में अशिक्षा, भुखमरी, दरिद्रता और तमाम प्रकार की गरीबी आज भी उसी तरह से नजर आती है, जिस हाल में बहादुर शाह जफ़र छोड़कर गए थे।
इस यात्रा ने सत्ता में भाजपा को स्थापित करने के बीज बोए। आज उसकी जड़ें इतनी फैल गई हैं कि जो नेहरू कभी राम को बेदखल करने पर अमादा थे, आज उनकी ही राजनीति के वारिस मंदिर-मंदिर प्रदक्षिणा को मजबूर हैं। बाकायदा मुनादी की जाती है उनके जनेऊधारी हिन्दू होने की।
यह सोचे जाने की ज़रूरत है कि सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी के धर्म को गाली देने की हिम्मत कहाँ से आती है? ऐसी आस्था जिसने न मज़हबी हिंसा की, न जबरिया मतांतरण, उससे शोएब दानियाल जैसों की दुश्मनी क्या है?
आज़ादी के बाद से ही 'सेक्युलरासुर' सरकारें गौ भक्तों को हिकारत भरी नज़रों से देखती रही हैं। 7 नवंबर 1966 को गौ भक्तों के दमन का वह आदेश भी "इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा" के अंदाज़ में ही दिया गया था।
समय आ गया है कि पोलिटिकल साइंटिस्ट का ढोंग करने वाले प्रोपेगंडाबाजों को मान लेना चाहिए कि बहुंसख्यकों की प्रकृति ही सेक्युलर मानी जाती है। अनगिनत पंथों में फैले हुए हिन्दू धर्म ने हमेशा आस्था, विचारधारा, पंथ और मान्यताओं के लिए छतरी का काम किया है। जबकि......
गाजियाबाद... वो शहर, जो रिकॉर्डधारी है - प्रदूषण रैंकिंग में लगातार देश के अग्रणी शहरों की सूची में बने रहने के लिए। एक है झरिया। वो शहर, जहाँ लोग चाहे जिस भी रंग का शर्ट पहन सुबह घर से निकलें, शाम को लौटते सभी एक ही रंग का शर्ट पहन कर - काला!
इमरजेंसी के दौरान इंदिरा का समर्थन। चुनाव में कॉन्ग्रेस का समर्थन। मुस्लिम लीग का समर्थन। फिर कॉन्ग्रेस के विरोध के लिए पवार के साथ मंच साझा करना। 2 राष्ट्रपति चुनावों में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार का समर्थन। बालासाहब ठाकरे के रहते ही शिवसेना 'सौदेबाजी' में पारंगत हो गई थी।