मुझे यह कोई समझा दे कि भारत में 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' का नारा क्यों नहीं लगेगा? किसी कट्टरपंथी को इस नारे से आपत्ति क्यों है? तुम्हारे सामने अगर कोई 'पाकिस्तान मुर्दाबाद' कहता है, तो तुम इकट्ठा हो कर, पत्थर मारने की जगह 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' क्यों नहीं कहते?
जेएनयू में हजार वोट पाकर विद्यार्थी संघ का वाइस प्रेसिडेंट बनना किसी को यह अधिकार दे देता है कि वो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर सके? इनके हिसाब से वो मुट्ठी भर आतंकी कश्मीर घाटी के लाखों लोगों का भविष्य तय करेंगे क्योंकि उनको 'आजादी' चाहिए।
हाँ, हमें मौलिक आराधना करनी होगी, शक्ति का प्रत्युत्तर शक्ति से ही देना होगा, शिव और शक्ति को एक साथ साधना ही होगा, तभी इन म्लेच्छ शक्तियों की पराजय निश्चित होगी। जब तक सिद्धि न हो, समर को टाल कर सिद्धि करनी होगी…
वीडियो में 5:30 से 5:40 तक आप सुन सकते हैं, जहाँ सीधा-सीधा हमला धर्म पर ही था- किसी विचारधारा, किसी राजनीतिक दर्शन या व्यक्ति पर नहीं, सीधे धर्म पर। और राजदीप सरदेसाई को उस पर मौन सहमति देते देखा जा सकता है। न कोई सवाल, न टोकना, न कोई स्पष्टीकरण। उनकी मूक सहमति ऐसे थी जैसे...
किसी भी अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और उसमे लोगों की आस्था से छेड़छाड़ करना नहीं है। पशुओं पर अत्याचार की बात करने वाले पहले देखें कि मांस उद्योग के लिए जानवरों पर होने वाला क्रूरतापूर्ण व्यवहार कितना जायज़ है?
मेरे गर्वीले बिहारियों! मिजोरम या असम जैसे पहाड़ी आतंकवाद ग्रस्त राज्यों से तुलना कर बिहार को महान ठहराकर आप जैसे लोगों ने ही नीतीश तक को शिथिल बना दिया है। किसी नेता को यह उम्मीद ही नहीं है कि कोई उनसे सवाल भी पूछ सकता है ,क्योंकि हम सभी ने शूकरवृत्ति में ही मोक्ष मान लिया है।
जब हमले नहीं हों तो रवीश कहते हैं कि कश्मीरी संगीनों के साये में जी रहे हैं, उनकी आवाज़ दबाई जा रही है। जब आतंकी हमला होता है तो वह सरकार और सुरक्षा बलों को घेरते हैं। दोनों हाथों में लड्डू रखने के लिए मीठी आवाज़ में हर ख़बर में 'नौकरी' घुसेड़ देना ही काफ़ी है।
भूकंप, बाढ़ और जल-जमाव जैसी आपदाएँ झेलने के बाद बिहारवासी कम से कम ये सीख लेंगे कि आपदा की स्थिति में किसी और के बदले अपने आप पर भरोसा करना होगा क्योंकि जिनके भरोसे बैठे हैं उस सरकार, राजनैतिक दल, एनजीओ वगैरह में से तो कोई आता नहीं!
जब दर्शक बढ़ रहे हैं, उनका जन्म बिलकुल ही अलग समय में हुआ है, तब न्यूज वाले उनके दादा की जवानी के शो क्यों चला रहे हैं? याद कीजिए कि चौबीस घंटे का न्यूज टेलीविजन जब से आया है, आपने न्यूज डिबेट में क्या बदलाव देखे हैं? आपको याद नहीं आएगा।
जोगेंद्र नाथ मंडल ने जिस तर्ज पर इतिहास रचा उसका हश्र जानना जरूरी है। जोगेंद्र नाथ तो नेता थे, परिस्थितियाँ विपरीत हुईं तो गुमनामी में ही सही वापस भारत आ गए, लेकिन उनका क्या जो उनके आह्वान पर मात्र एक वोट बनकर पाकिस्तानी हुए।