सिंध से आई दमी कोहली जोधपुर के पास एक रिफ्यूजी कैंप में रहती है। सालभर से यहीं पढ़ाई कर रही है। 11वीं की परीक्षा भी यहीं से पास की। बावजूद इसके राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने उसका 12वीं का परीक्षा फॉर्म खारिज कर दिया है।
अब केरल विधानसभा में राज्य सरकार द्वारा पास किए गए प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रहा। क्योंकि इस प्रस्ताव पर आगे काम करने के लिए पिनरई विजयन सरकार को राज्यपाल के हस्ताक्षर लेने अनिवार्य हैं, जो खुले तौर पर इसका विरोध कर चुके।
लगभग 1000 वहाबी प्रचारक (कट्टर इस्लाम के प्रचारक) केरल में आए। विचारधारा को फैलाया, पानी की तरह पैसा बहाया। कई नई मस्जिदों का निर्माण कराया, सब सऊदी अरब स्टाइल में। लेकिन यह सुनिश्चित किया कि इन मस्जिदों से कट्टरपंथी विचारधारा का प्रचार किया जाएगा।
कॉन्ग्रेस चाह कर भी नेहरू-गाँधी से ऊपर नहीं उठ पा रही। स्टेडियम, हॉस्टल, अस्पताल, सरकारी योजनाओं में इनके नाम के राजनीतिक इस्तेमाल के बाद अब जनता पर इनको थोपने की योजना। कमलनाथ सरकार ने MPPSC के परीक्षा पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए इसमें भी नेहरू को घुसा दिया।
"मेरी माँ ने 'डायरेक्ट एक्शन डे' के दौर को तब देखा था, जब वह एक बच्ची थीं और उन्हें गहरा आघात पहुँचा था। उन्होंने देखा था कि पार्क सर्कस में अपने घर के पास मुसलमानों द्वारा एक हिन्दू को कैसे मार दिया गया था।"
"अति दुःखद है कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व व खासकर प्रियंका गाँधी की इस मामले में चुप्पी साधे रखना। अच्छा होता कि वह यूपी की तरह उन गरीब पीड़ित माँओं से भी जाकर मिलतीं, जिनकी गोद केवल उनकी पार्टी की सरकार की लापरवाही के कारण उजड़ गई हैं।"
“नफ़रत फैलाने वाली भीड़ के ख़िलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इस कार्यक्रम के आयोजकों और मास्टरमाइंड की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें तुरंत निष्कासित कर दिया जाना चाहिए।”
पद यात्रा, मुंडन, धरना-प्रदर्शन के बाद ही शुरू हो पाई नियुक्ति प्रक्रिया। फिर भी मेरिट लिस्ट में आईं आरक्षित वर्ग की महिलाओं को नहीं दिया नियुक्ति पत्र। अतिथि विद्वान भी भविष्य को लेकर सशंकित।
कोटा में 962 बच्चों की मौत कॉन्ग्रेस सरकार की नाकामी दिखाती है, इसीलिए वहाँ मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा। एक बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खेल रहे प्रदर्शनकारी मीडिया के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।