अलगाववादी दुकान बंद रखने के लिए पहुँचाते है पैसे: J&K से लौटे डॉक्टर ने किए कई बड़े खुलासे

"कई बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अलगाववादी नेताओं के हैं। वो इन्हें बंद रखते हैं, ताकि सरकार पर दबाव बने। जबकि छोटे दुकानदारों के ये हवाला से रुपए मँगवा कर बाँटते हैं और दुकानें बंद रखने को कहते हैं।"

जम्मू कश्मीर में सब कुछ कैसा चल रहा है? मीडिया के एक वर्ग की मानें तो सरकार वहाँ के लोगों की आवाज़ दबा रही है क्योंकि सब कुछ शांत सा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की मानें तो लोग भारतीय सेना से ही सहमे हुए हैं। सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि पाबंदियाँ हटाई जा चुकी हैं और जनजीवन सामान्य है। रवीश कुमार की मानें तो इंटरनेट पर प्रतिबन्ध से छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म नहीं भर पा रहे। वामपंथी गिरोह की मानें तो जम्मू कश्मीर में वहाँ की जनता पर अत्याचार किया जा रहा है। पाकिस्तान झूठा दावा करता रहा है कि कर्फ्यू लगा कर वहाँ के नागरिकों का दमन किया जा रहा है। आख़िर में फिर वही सवाल। सच क्या है?

यही जानने के प्रयासों के क्रम में हमारी बात डीएमसीएच (दरभंगा मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल) में कार्यरत एक डॉक्टर से हुई, जो हाल ही में जम्मू कश्मीर से लौटे हैं। डॉक्टर प्रशांत वत्स हाल ही में ‘नेशनल मेडिकोज आर्गेनाईजेशन’ संगठन के बैनर तले कश्मीर गए थे। वह वहाँ सामाजिक कार्यों से गए थे, नागरिकों को मेडिकल सुविधाएँ मुहैया कराने। एक आम भारतीय की तरह अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने वाले फ़ैसले को लेकर उनके मन में भी उत्सुकता थी। कुछ सवाल थे। हालाँकि, उनके मन में कुछ आशंकाएँ भी थीं लेकिन ये भाव भी था कि आख़िर कश्मीरी भी तो अपने हैं, भारतीय हैं। ऐसे में वह देश-सेवा का भाव लिए निकल पड़े।

जब उनकी फ्लाइट राजधानी श्रीनगर में लैंड हुई, तब शाम के 4.30 बज चुके थे। आपको पता ही है कि राज्य में अभी इंटरनेट पर प्रतिबन्ध है और मोबाइल सेवाओं पर भी फ़िलहाल रोक लगाई गई है। हाँ, संपर्क के लिए लैंडलाइन की व्यवस्था है। इसीलिए कॉल करने के लिए डॉक्टर प्रशांत ने टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर पर उपलब्ध लैंडलाइन सेवा का इस्तेमाल किया। इस दौरान उन्होंने हालात के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए वहाँ उपस्थित सुरक्षा बलों के अधिकारियों से बातचीत भी की। इसके बाद जम्मू कश्मीर में पर्यटन घटने का रोना रोने वालों की पोल खुल गई।

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जवानों ने बताया कि टूरिस्ट सेवाओं में कोई रुकावट नहीं आई है और पर्यटक भले ही कम आ रहे हों लेकिन उन पर कोई पाबंदियाँ नहीं लगाई गई हैं। हाँ, टूरिज्म कम होने से स्थानीय लोगों पर ज़रूर असर पड़ा है। मीडिया का गिरोह विशेष लगातार ये चला रहा था कि बाहर से आए लोगों को जम्मू कश्मीर में फटकने भी नहीं दिया जा रहा और उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस कर दिया गया। जबकि, वहाँ दिन-रात स्थिति पर नज़र रख रहे जवानों ने बताया कि पर्यटकों के घूमने-फिरने पर कोई पाबन्दी नहीं है। दूसरा मिथक यह भी फैलाया गया था कि राज्य में परिवहन व्यवस्था ठप्प हो गई है और लोगों को कहीं भी आने-जाने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया गिरोह ने ख़बरें चलाई थीं कि आवागमन ठप्प हो गया है।

डॉक्टर प्रशांत जब एयरपोर्ट से बाहर निकले तो गिरोह विशेष द्वारा फैलाया गया ये झूठ भी बेनक़ाब हो गया। उन्होंने देखा कि टैक्सी सेवाएँ पूरी तरह से चालू थी। हाँ, टैक्सियों की संख्या थोड़ी कम ज़रूर थी लेकिन इतनी भी नहीं कि लोगों को कहीं आने-जाने के लिए दिक्कतों का सामना करना पड़े। एयरपोर्ट पर डॉक्टर प्रशांत और उनकी टीम को रिसीव करने लोग आए हुए थे। आवागमन की सुविधाओं के बारे में बात करते हुए डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि अगर रिसीव करने के लिए लोग नहीं भी आते तो भी वे सही गंतव्य तक पहुँच जाते क्योंकि टैक्सियाँ चल रही थीं।

डॉक्टर प्रशांत ने अपने अनुभव साझा करते हुए ऑपइंडिया को बताया कि मीडिया के एक गिरोह विशेष की पूरी रोजी-रोटी ही जम्मू कश्मीर को लेकर झूठा प्रोपेगंडा फैलाने से चलती है। एयरपोर्ट से आगे बढ़ते ही उन्हें एक पार्क में तिरंगा झंडा लहराता दिखा- पूरे शान के साथ। गर्व से भरे डॉक्टर प्रशांत पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के स्वप्न ‘एक देश, एक निशान’ को याद कर अभिभूत हो उठे। वो बताते हैं कि कश्मीर में तिरंगे को यूँ लहराते देख उनका मन गाड़ी से उतर कर झंडे को सलामी देने के लिए मचल उठा। हाँ, उन्होंने ये ज़रूर देखा कि जम्मू कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और सुरक्षा बल एहतियातन काफ़ी सावधानी बरत रहे हैं।

श्रीनगर के एक पार्क में लहराते तिरंगे को देख कर डॉक्टर वत्स को बरबस ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ‘एक देश, एक निशान’ याद आ गया

डॉक्टर प्रशांत ने जम्मू कश्मीर में लगभग 5 दिन गुजारे और उन्हें कहीं कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। वह 27 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक वहाँ रहे। उन्होंने बताया कि मीडिया के लोग केवल श्रीनगर के पॉश इलाक़ों से रिपोर्टिंग करते हैं और इसे ही पूरे कश्मीर के सन्दर्भ में पेश करते हैं। डॉक्टर प्रशांत और उनकी टीम ने जगह-जगह कैम्प लगाए, लोगों को ज़रूरी बातें बताईं और मुफ्त मेडिकल सुविधाएँ दी। इस दौरान उनकी टीम ने श्रीनगर, बडगाम और बारामूला में कैम्प लगाया। उन्होंने कुंजर में भी कैम्प लगाया, जो संवेदनशील इलाक़ों में से एक है। इस दौरान उन्होंने स्थानीय नागरिकों और अलगाववादियों तक से बातें की।

डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि श्रीनगर में कट्टरपंथियों की धमकी के कारण व्यापारियों के काम में बाधा आ रही है। वे स्थानीय दुकानदारों को दुकानें न खोलने को कहते हैं, जिससे बाजार पर असर पड़ा है। इन धमकियों के कारण दुकानदार कभी-कभार शाम के समय दुकानें खोलते हैं। स्थानीय इस्लामिक कट्टरपंथियों के डर से व्यापारियों को घाटा हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अलगाववादी नेताओं के स्वामित्व वाले ही हैं। अब जाहिर सी बात है अलगाववादी अपनी बाजार व दुकानें नहीं ही खोलेंगे ताकि मीडिया में न्यूज़ जाए कि सब कुछ ठप्प पड़ा हुआ है और इससे सरकार पर ही दबाव बनेगा। ख़ुद अलगाववादी नेता गिलानी का भी एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है।

श्रीनगर का लाल चौक: मीडिया के एक बड़े वर्ग के लिए पूरा कश्मीर यही है

डॉक्टर प्रशांत ने अपने कश्मीर के हालिया अनुभवों के आधार पर इस नैरेटिव को नकार दिया कि ‘कश्मीर में सुरक्षा बलों के कारण दुकानें नहीं खुल रहीं।’ स्थानीय नागरिकों की बात करते हुए डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि राज्य में अधिकतर नागरिकों को अनुच्छेद 370 के बारे में कुछ मालूम भी नहीं है और वे बस इस बात से चिंतित हैं कि पर्यटन कब सामान्य होगा। उन्होंने बताया कि डल झील और गुलमर्ग में पर्यटन काफ़ी कम हो गया है। उन्होंने बताया कि अलगाववादी हवाला से रुपए लेकर दुकानदारों व रेहड़ी वालों को बाँटते हैं और बदले में उन्हें दुकानें बंद रखने को कहते हैं। अलगाववादी दुकानें बंद रखने वाले लोगों के घाटे की भारपाई करते हैं।

कई कश्मीरी लोगों ने डॉक्टर प्रशांत से कहा कि वे अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का स्वागत करते हैं। जबकि कई लोगों में ऐसी भावना है कि वे कश्मीर को मुस्लिम बहुल बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इसके उलट, जो लोग भारत के अन्य हिस्सों में पढ़ाई करके आए हैं, वे चाहते हैं कि कश्मीर भी भारत के बाकि राज्यों की तरह बने। उन्होंने बताया कि उन्हें टैक्सी में जो ड्राइवर मिला, वो भी पत्थरबाजी किया करता था। कश्मीर में यूपी-बिहार से लाखों लोग काम करने जाते हैं और उनकी कमाई भी अच्छी होती है। राज्य में मिस्त्री, कचड़ा उठाने और मोची वगैरह जैसे काम में अधिकार बिहारी लोग ही हैं।

डॉक्टर प्रशांत कहते हैं कि जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का बसना अत्यावश्यक है क्योंकि इससे वहाँ की डेमोग्राफी में बदलाव आएगा। राज्य अगर ऐसी व्यवस्था कर पाए तो हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे को जान-समझ पाएँगे, आपसी द्वैष और टकराव की स्थिति को खुद ही नकार पाएँगे। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना पत्थरबाजों की पहचान कर के उन्हें राज्य से बाहर भेज रही है ताकि शांति-व्यवस्था बहाल की जा सके। डॉक्टर प्रशांत वत्स इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि कश्मीर के लोग कुछ दिनों बाद ख़ुद अलगाववादियों के चंगुल से बाहर निकलेंगे और रुपए ख़त्म होने के साथ ही दुकानें खोलने लगेंगे। उनका आकलन है कि कश्मीर के लोग जब भारत के अन्य हिस्सों को देखेंगे-समझेंगे और वहाँ के लोगों के रहन-सहन को जानेंगे, तब वे भी अलगाववादियों की करतूतों का विरोध करने लगेंगे।

उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में सरकारी दुकानें खुली हुई हैं। फ्लाइट के टिकट की बुकिंग के लिए श्रीनगर में 5 काउंटर्स बने हुए हैं और इंटरनेट बंद रहने के कारण लोग वहीं जाकर बुकिंग करते हैं। डॉक्टर वत्स का मानना है कि जम्मू कश्मीर के सामान्य नागरिक अच्छे हैं। हर 50-100 मीटर की दूरी पर सेना और सीआरपीएफ के जवान तैनात हैं। उन्होंने बताया कि कई दुकानदारों ने पिछले दरवाजें से दुकानें खोल रखी थीं। सुबह 7 बजे दुकानें खुलने के बाद लोग 10 बजे तक रोजमर्रा की ज़रूरत की चीजें ख़रीद कर घर में रख लेते हैं। फिर शाम को कुछ देर के लिए दुकानें खुलती हैं।

पर्यटन में कमी आई है लेकिन पर्यटकों पर कोई पाबंदियाँ नहीं हैं (चित्र: डॉक्टर प्रशांत वत्स गुलमर्ग के पास)

अगर सरकार की बात करें तो डॉक्टर प्रशांत वत्स मानते हैं कि सरकार जम्मू कश्मीर के लोगों की तमाम दिक्कतों से निपटने में काफ़ी मदद कर रही है। उन्होंने रास्ते पर आलू और प्याज से लदे कई ट्रक देखे, जो प्रशासन ने नागरिकों के लिए मँगाए थे। इससे पता चलता है कि सरकार महँगाई को लेकर भी गंभीर है और लगातार इस प्रयास में लगी है कि लोगों को रोजमर्रा की ज़रूरत की चीजें मुहैया कराने में दिक्कतें न आएँ। डॉक्टर प्रशांत वत्स के ग्राउंड पर के अनुभवों से न सिर्फ़ मीडिया के गिरोह विशेष की पोल खुलती है, बल्कि वामपंथियों व विपक्षियों के एक धड़े के झूठे दावे भी बेनक़ाब हो जाते हैं।

(यह लेख DMCH में कार्यरत डॉक्टर प्रशांत वत्स से ऑपइंडिया की बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। डॉक्टर वत्स MBBS की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और ‘दरभंगा मेडिकल कॉलेज एन्ड हॉस्पिटल’ में कार्यरत हैं। वह कश्मीर दौरे से वापस बिहार लौट आए हैं।)

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