Thursday, September 24, 2020
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क्राइस्टचर्च में 50 लोगों की जान लेने वाला हेडमास्टर का बेटा नहीं, उसे कहिए आतंकी: वामपंथी मीडिया गिरोह

एक विचित्र प्रचलन दिखने लगा है मीडिया में, जहाँ भारत पर हुए आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड के 'बाप हेडमास्टर थे', 'बेटे ने बारहवीं का इम्तिहान पास किया', 'आतंकी ओसामा एक अच्छा पिता था', और 'अहमद डार को सेना के अफसर ने डाँट लगाई थी' आदि कहकर उसके आतंक को जस्टिफाय करने की कोशिश की जाती है।

सुबह-सुबह एक ख़बर आई जिसमें एक बंदूकधारी युवक ने न्यूज़ीलैंड के दो मस्जिदों में गोलियाँ चलाते हुए लगभग 50 लोगों की जान ले ली और क़रीब 20 को घायल कर दिया। कहा जा रहा है कि यह घटना न्यूज़ीलैंड के इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। बंदूक़धारी युवक ने इस पूरे कृत्य को फेसबुक लाइव के ज़रिए शेयर किया था।

आगे, उसने जो कारण बताए थे, उनमें से एक यह था कि बाहर से आने वाले ‘मुस्लिम प्रवासी जो बहुत ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं’ उन्हें रोकने की ज़रूरत है। फिर उसने ‘क्रूसेड’ (रिलिजन के नाम पर युद्ध) आदि का ज़िक्र किया। उसने एक ‘नए समाज की स्थापना’ की बात की और बताया कि उसकी वैचारिक समीपता चीन से है। कॉरपोरेट कल्चर को उसने इस पूरी ‘समस्या’ का एक कारण बताया।

ये तो हो गई घटना, जो कि आपराधिक घटना है। एक अपराध हुआ है, जिसके कारण मौतें हुई हैं। महीने भर पहले पुलवामा में आतंकी हमला हुआ था। कुछ समय पहले बुरहान वनी जैसे आतंकियों ने सेना और समाज को परेशान कर रखा था। आए दिन छिटपुट हिंसा की घटनाएँ इसी देश में होती रहती हैं, जिसे हम मीडिया के ज़रिए जानते हैं।

इस घटना, या वैसी कोई भी घटना जहाँ सफ़ेद चमड़ी के लोगों के देश में हानि होती है तो चाहे वहाँ दो मरे, या बीस, वो ग्लोबल ट्रेंड बन जाता है। उस पर खूब चर्चा होती है, आतंकवाद की भर्त्सना होती है। भारत के लोग भी अमूमन प्रोफाइल काला करके, हैशटैग सहमति देकर इसमें अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं। ये सब एक ट्रेंड की तरह हर ‘श्वेत देश’ में, जिनकी जड़ें यूरोप में हों, जो बेहतर अर्थव्यवस्था रही हों, छोटी से छोटी आतंकी घटना के बाद दिखने लगता है।

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ऐसा ही आतंकी हमला उरी में हुआ था, पुलवामा में हुआ था, पठानकोट में हुआ था, संकटमोचन मंदिर में हुआ था, सरोजिनी नगर मार्केट में हुआ था, मुंबई लोकल ट्रेनों में हुआ था, मुंबई शहर में 2008 में हुआ था… भारत से ज़्यादा ऐसे हमले बहुत कम देशों ने झेले हैं। वहीं, आईसिस के आतंक से सीरिया कैसे उबर रहा है, उस पर वैश्विक सन्नाटा खूब फबता है।

इसी सन्नाटे के बाद एक और विचित्र प्रचलन दिखने लगा है हमारी मीडिया में जहाँ भारत पर हुए आतंकी हमलों के मास्टरमाइंड के ‘बाप हेडमास्टर थे’, ‘बेटे ने बारहवीं का इम्तिहान पास किया’, ‘आतंकी ओसामा एक अच्छा पिता था’, और ‘अहमद डार को सेना के अफसर ने डाँट लगाई थी’ आदि कहकर उसके आतंक को जस्टिफाय करने की कोशिश की जाती है। 

आज बरखा दत्त ने ट्वीट किया है कि क्राइस्टचर्च के बंदूक़धारी युवक को जो भी आतंकवादी नहीं कहेगा वो स्वयं भी एक सायकोपाथ है। मैं बार-बार उस अपराधी को जानबूझकर ‘बंदूक़धारी युवक’ कह रहा हूँ क्योंकि श्वेत देशों की मीडिया में भारत पर हमला करने वाले आतंकियों को ‘रायफल बेयरिंग यंग मैन’ से लेकर ‘गनमैन’ जैसे शब्दों से ट्रिवियलाइज करने की कोशिश की जाती है। भूरी चमड़ी वाले तथाकथित थर्ड वर्ल्ड कंट्री के लोगों की जान भी क़ीमती है, ये श्वेत चमड़ी वाले देशों की मीडिया को जानने की ज़रूरत है।

बरखा दत्त का अचानक से सेंसिटिव हो जाना उसकी संवेदना नहीं धूर्तता का परिचायक है। पत्रकारिता का ये समुदाय विशेष, ये पाक अकुपाइड पत्रकार, ये वामपंथियों का गिरोह भारत पर हुई आतंकी घटनाओं पर विशेष कारण बताकर उसे सही साबित करने की कोशिश में लगा रहता है, और विदेशी हमलों पर आँसू दिखाकर दूसरों को गरियाने की कोशिश करता है।

इससे पता चलता है कि न सिर्फ वैश्विक परिदृश्य में, बल्कि भारतीय मीडिया के एक हिस्से के लिए आतंक की परिभाषा भी अलग होती है। क़ायदे से देखा जाए तो न्यूज़ीलैंड में मस्जिद पर हुआ हमला आतंकी गतिविधि नहीं, एक सामाजिक अपराध है। ओरलैंडो के समलैंगिक बार में किया गया हमला एक अपराध है, आतंकी गतिविधि नहीं। जबकि किसी सैन्य संगठन पर, प्रतिष्ठान पर, सैनिकों के समूह पर हमला करना आतंकी गतिविधि है, जिसे पश्चिमी देशों ने लम्बे समय तक ‘कन्फ्लिक्ट’ कहकर नकारा था। 

ये मैं क्यों बता रहा हूँ? ये इसलिए बता रहा हूँ कि हम अभी भी तीसरी दुनिया ही हैं जिन्हें अभी भी दुनिया के तीसरे दर्जे का नागरिक ही माना जाता है। आतंकी हमलों में तो सबको, पूरी दुनिया को साथ आना चाहिए। इनके मीडिया संस्थानों को अपने शब्द चुनते वक़्त भौगोलिक सीमाएँ और नाम नहीं देखने चाहिए। लेकिन क्या ऐसा होता है? 

गूगल में जब आप ‘टेरर अटैक’ टाइप करेंगे तो सबसे पहला सजेशन 9/11 का आता है मानो उससे पहले कोई घटना हुई ही ना हो! फिर अगर आप विकिपीडिया पर ‘टेरर अटैक इन …’ करके देशों के नाम देकर खोजेंगे तो आपको हर यूरोपी देश के लिए लगभग 1800 से लेकर आजतक के हर हमले की जानकारी मिल जाएगी। वही हाल अमेरिका का भी है। लेकिन भारत के नाम आपको ये आँकड़ें 1970 के बाद से मिलेंगे। और उसमें भी अगर आपको हमलों के नाम और बाक़ी जानकारी चाहिए तो 1984 के बाद से आँकड़े मिलेंगे।

जब बात आँकड़ों की हो ही रही है तो भारत में 1970 के बाद से 2015 तक कुल 9,982 आतंकी घटनाओं में  18,842 मौतें हुईं, 28,814 लोग घायल हुए। अगर 1984 से 2016 तक के आँकड़ें लें तो क़रीब 80 आतंकी हमलों में 1985 मौतें हुईं, और लगभग 6000 से ज़्यादा घायल हुए। अगर और क़रीब के दिनों को लें, तो 2005  से अब तक हुए आतंकी हमलों में 707 मौतें हुईं, और 3200 के क़रीब घायल हुए हैं।

अब आईए यूरोप पर जहाँ, तुर्की और रूस को छोड़कर, आतंकी हमलों में 2004 से अब तक 615 मौतें हुईं और 4000 के लगभग लोग घायल हुए। अमेरिका में 2000 से अबतक क़रीब 3188 मौतें हुईं जिसमें से 2996 लोग सिर्फ 9/11 वाले हमले में मारे गए। यानि, बाक़ी के हमलों में 192 लोग मरे। अमेरिका के लगभग 90% से ज़्यादा हमलों में ईकाई अंकों में मौतें हुई हैं। यूरोप में आतंकी हमले भी 2004 के बाद से ही शुरू माने जा सकते हैं, क्योंकि उससे पहले वो वैश्विक आतंकवाद से पीड़ित नहीं दिखते। 

आज जब यूरोप या अमेरिका के किसी हवाई अड्डे पर पटाखे की भी आवाज़ आती है तो हर चैनल, हर वेबसाइट, हर सोशल मीडिया पर, जिसमें भारत के संस्थान भी शामिल हैं, उसे अपनी पहली ख़बर बनाकर कवरेज करते हैं। लेकिन स्वयं भारत, बांग्लादेश, अफ़्रीका आदि में हो रही मौतों को उतनी तरजीह नहीं दी जाती। 

ये बस कुछ आँकड़े हैं जिस पर ध्यान देने से पता चलता है कि आतंकवाद की परिभाषाएँ कैसे देश, सीमा, रंग और नस्ल देखकर बदलती रहती है। अफ़्रीकी जानों की क़ीमत नहीं है, इसलिए पश्चिमी मीडिया में दसियों लोगों की हत्या की खबरें नहीं आती। सीरिया, लीबिया, इराक़ आदि उन्हीं की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं का परिणाम है, इसलिए वहाँ ओबामा को शांति का नोबेल पुरस्कार दे दिया जाता है। 

भारत की मीडिया और बरखा दत्त जैसे लोग भले ही ये लॉजिक लगा लें कि क्राइस्टचर्च के बंदूक़धारी युवक को किसी भारतीय सेना के अफसर ने डाँटा नहीं था, या वो कश्मीर के हेडमास्टर का बेटा नहीं था, इसलिए वो आतंकी है, लेकिन सत्य यही है कि बंदूक लेकर टहलने वाले किसी भी बाप, बेटे, दामाद या जीजा को सिर्फ इसलिए जस्टिफाय नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी बिटिया आठ साल की है जिसे सफ़ेद कबूतरों का उड़ना देखना अच्छा लगता है। उस बच्ची का अपने बाप के आतंकी होने में कोई दोष नहीं, लेकिन उसकी निश्छलता उसके बाप के अपराध को कम नहीं कर सकती। 

आर्टिकल को वीडियो रूप में यहाँ देखें

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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