भीमा कोरेगाँव: बाबासाहेब अंबेदकर ने नहीं दी थी ब्राह्मणों को गाली, झूठ बोलते हैं अर्बन नक्सली

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत कोरेगाँव की लड़ाई लगभग भुला दी गयी थी। कोरेगाँव स्मारक को दलित बनाम ब्राह्मण बनाने का छल बाबासाहेब अंबेदकर के बाद आए नवबौद्धों और अर्बन नक्सलियों ने किया है जिनका साथ वामपंथी इतिहासकारों ने दिया है।

भीमा कोरेगाँव की लड़ाई (1817)

ब्रिटिश शासनकाल में भारत में नियुक्त अधिकारी फिलिप मेसन ने अपनी पुस्तक ‘A Matter Of Honour’ में भीमा कोरेगाँव की लड़ाई का संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली विवरण लिखा है। दिसंबर 31, 1817 को बॉम्बे आर्मी के कप्तान स्टॉन्टन को 41 मील दूर पेशवाओं से संघर्ष कर रहे कर्नल बर्र को सैन्य सहायता प्रदान करने का आदेश मिलता है। स्टॉन्टन की टुकड़ी में बॉम्बे आर्मी (प्रथम बॉम्बे रेजिमेंट की दूसरी बटालियन) के प्राइवेट रैंक के 500 ‘सिपाही’, नयी बनी ‘ऑक्सिलिअरी हॉर्स’ (जिसे बाद में पूना हॉर्स के नाम से जाना गया) के 250 सैनिक तथा मद्रास आर्टिलरी की एक टुकड़ी सम्मिलित थी।

आर्टिलरी टुकड़ी में दो ‘सिक्स-पाउण्डर’ तोपें, 24 यूरोपीय तोपची, तोपगाड़ी खींचने वाले और तोपें साफ़ करने वाले भारतीय गन-लास्करों समेत कुल 100 सैनिक थे। आदेश मिलने के पश्चात कप्तान स्टॉन्टन रात 8 बजे 900 सैनिकों से भी कम संख्याबल के साथ निकल पड़ता है। सारी रात सत्ताईस मील चलने के पश्चात जनवरी 1, 1818 को प्रातः 10 बजे स्टॉन्टन की टुकड़ी आराम करने के लिए रुकती है। उसी समय पेशवा की मुख्य सेना की दृष्टि उन पर पड़ती है। पेशवा की सेना में 20,000 घुड़सवार तथा 8,000 पैदल सैनिक थे।

कोरेगाँव नामक गाँव समीप ही था जहाँ पत्थर के मकान और छुपने के कई स्थान थे। कप्तान स्टॉन्टन ने शीघ्रता से गाँव को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया किन्तु पेशवा के सेनापति ने भी उसी तत्परता से अरबी लड़ाकों की तीन टुकड़ियाँ भेज दीं। अरबों की प्रत्येक टुकड़ी में एक हजार सैनिक थे। उस समय पेशवा की सेना में अरबी लड़ाके भी भर्ती किए जाते थे। पेशवा और ब्रिटिश में से कोई भी कोरेगांव पर पूर्ण रूप से कब्जा करने में सफल नहीं हुआ और आमने-सामने का युद्ध प्रारंभ हो गया। एक घर से दूसरे घर कब्जा करते और शत्रु से छुड़ाते हुए दोनों सेनाओं के पैदल सैनिक एक दूसरे पर टूट पड़े।

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घुड़सवार यह कार्य नहीं कर सकते थे अतः रक्षात्मक मुद्रा में ही लड़ते रहे। कप्तान स्टॉन्टन के सैनिकों ने पिछली रात कूच करने से लेकर कोरेगाँव पहुँचने तक न कुछ खाया था न एक बूँद पानी ही पिया था। दो तोपों तथा पैदल सैनिकों के मध्य भीषण युद्ध चलता रहा। तभी अरबों ने एक ब्रिटिश अधिकारी (लेफ्टिनेंट चिसहोम) का शीश काटकर तोप को अपने कब्जे में ले लिया। उसी समय मृत होने का दिखावा कर रहे लेफ्टिनेंट पैटिन्सन ने शवों के ढेर से उठकर अपने साथियों को आवाज़ दी और तोप पर पुनः कब्जा कर लिया। संध्या होने तक पेशवा की सेना ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को समर्पण करने का न्योता भेज दिया। कम्पनी की सेना के बारह तोपची मारे जा चुके थे और आठ घायल थे। स्टॉन्टन ने अपने सिपाहियों (Sepoys) से कहा कि अब वे अंतिम साँस तक लड़ेंगे। जब कोई ब्रिटिश तोपची जीवित नहीं बचा तब सात भारतीय गन-लास्करों ने मोर्चा संभाला। स्टॉन्टन की टुकड़ी के बचे हुए सैनिकों ने रात के नौ बजे तक कोरेगाँव खाली करवा कर दम लिया।

स्टॉन्टन के थके मांदे सिपाही गाँव के कुँए तक पहुँचे और कुल पच्चीस घंटे बाद उनके हलक से पानी उतरा। अगले दिन प्रातःकाल पेशवा की सेना पीछे हट गई क्योंकि उन्हें संदेह हो गया था कि कर्नल बर्र को सैन्य सहायता देने के लिए कई अन्य टुकड़ियाँ निकल चुकी होंगी। स्टॉन्टन के सिपाहियों ने झंडे, बंदूकें इत्यादि उठाए और वर्दियाँ पहन कर ड्रम बजाते हुए सबसे नज़दीक स्थित गैरिसन टाउन की ओर चल पड़े। अपना स्टेशन छोड़ने के कुल 48 घंटे पश्चात गैरिसन टाउन पहुँचने पर स्टॉन्टन और उसके सैनिकों ने खाना खाया।

फिलिप मेसन के दिए आकड़ों के अनुसार स्टॉन्टन की टुकड़ी के कुल 900 सैनिकों में से लगभग 150 मारे गए थे। कोरेगांव की लड़ाई में न कोई पूर्ण रूप से विजयी हुआ न परास्त हुआ। जो रह गया वह था भारतीय ‘सिपाहियों’ का शौर्य जिसकी गाथा कई दशकों तक अंग्रेजों ने गाई। फिलिप मेसन की भारतीय सेना के इतिहास पर लिखी पुस्तक में दिए इस वृत्तान्त के आधार पर बहुत से तथ्य निकल कर सामने आते हैं। सर्वप्रथम तो यह कि कोरेगांव की लड़ाई में स्टॉन्टन की सैन्य टुकड़ी मुख्यतः उन अरबी मुसलमान लड़ाकों पर भारी पड़ी थी जो पेशवा के अधीन लड़े थे।

फिलिप मेसन ने अंग्रेजों के पराक्रम के गुण तो गाए ही हैं साथ में कोरेगाँव का उल्लेख पाँच स्थान पर किया है। ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में जहाँ ऊँची रैंक का अधिकारी अंग्रेज ही होता था वहीं ‘सिपाही’ के रूप में योद्धा जातियों के भारतीय सैनिक भर्ती किए जाते थे। ऐसी ही महान योद्धा जाति है ‘महार’। कोरेगांव की लड़ाई की प्रशंसा ब्रिटेन की संसद तक में हुई थी और कोरेगाँव में एक स्मारक भी बनवाया गया था। इस स्मारक पर उन 22 महारों के नाम भी लिखे हैं जो कम्पनी सरकार की ओर से लड़े थे। इससे यह प्रमाणित होता है कि कोरेगाँव की लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण थी ही नहीं, यह तो दो शासकों के मध्य एक बड़े युद्ध का छोटा सा हिस्सा मात्र थी।

कोरेगाँव में बाबासाहेब भीमराव रामजी अंबेदकर का पदार्पण

कोरेगाँव की इस लड़ाई का स्मारक ब्राह्मणों पर दलितों की विजय के रूप में दुर्भाग्य से परिवर्तित हो गया। सन 1818 के पश्चात् काठियावाड़ (1826) और मुल्तान (1846) की लड़ाई में भी महारों ने शौर्य का प्रदर्शन किया था। लेकिन सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बॉम्बे रेजिमेंट के कुछ महार सिपाहियों ने अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया था। उनकी इसी भूमिका के कारण अंग्रेजों ने षड्यंत्र रचकर महारों को ‘नॉन-मार्शल कास्ट’ घोषित कर दिया और मई 1892 के पश्चात अपनी सेना में भर्ती करने से मना कर दिया। तत्पश्चात महारों को ब्रिटिश सेना का अंग बनाने के लिए शिवराम जानबा कांबले द्वारा प्रयास किया जाता रहा जिसके फलस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध में महारों की दो पलटनें बनाई गयीं। परन्तु जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ महारों की भर्ती पुनः रोक दी गयी।

यहाँ पर बाबासाहेब भीमराव रामजी अंबेदकर का आगमन होता है। काम्बले ने अंबेदकर को कोरेगाँव स्मारक पर 1 जनवरी 1927 को भाषण देने का निमंत्रण भेजा। अंबेदकर स्वयं महार जाति के थे और उनके पिता अंग्रेजों की सेना में सैनिक थे अतः अंबेदकर ने न केवल निमंत्रण स्वीकार किया अपितु उन्होंने महारों को सेना में पुनः सम्मिलित किये जाने के लिए संघर्ष भी किया। यहाँ एक बात जानना आवश्यक है कि उस समय अंग्रेजों ने कई जातियों को नॉन मार्शल कास्ट घोषित कर दिया था इसलिए महाराष्ट्री ब्राह्मण, तमिल, तेलुगु आदि कई समुदाय के लोग सेना में जाने के लिए विचित्र तर्क भी दिया करते थे। स्टीफेन फिलिप कोहेन ने अपनी पुस्तक The Indian Army: Its Contribution to the Development of a Nation में लिखा है कि कुछ तेलुगु ब्राह्मण मद्रास प्रेसिडेंसी आर्मी में नौकरी करने हेतु मनुस्मृति उद्धृत करते थे जिससे अंग्रेजों को यह विश्वास हो जाए कि वे भी मार्शल-कास्ट में आते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत कोरेगाँव की लड़ाई लगभग भुला दी गयी थी। कोरेगाँव स्मारक को दलित बनाम ब्राह्मण बनाने का छल बाबासाहेब अंबेदकर के बाद आए नवबौद्धों और अर्बन नक्सलियों ने किया है जिनका साथ वामपंथी इतिहासकारों ने दिया है। बाबासाहेब अंबेदकर ने 1927 में कोरेगाँव में कोई ब्राह्मण विरोधी भाषण नहीं दिया था न ही यह कहा था कि कोरेगांव की लड़ाई में दलितों को ब्राह्मणों पर विजय प्राप्त हुई फिर भी दशकों तक सर्वत्र मिथ्या प्रचार किया जाता रहा और कोरेगांव स्मारक पर प्रत्येक पहली जनवरी को मेला लगता रहा।

नवबौद्धों के दृष्टिकोण से देखें तो महारों की वास्तविक विजय तो अरबी मुसलमानों की उस टुकड़ी पर थी जिसे पेशवा ने लड़ने भेजा था। क्या इस तथ्य को नकारा जा सकता है? यदि हाँ तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि कोरेगाँव की लड़ाई ब्राह्मण बनाम दलित नहीं थी। कोरेगाँव की लड़ाई से दलितों को एक और महत्वपूर्ण सबक सीखना है। उन्हें यह समझना होगा कि अंग्रेज हमें हमारे समाज में बाँटकर और अपनी सेना में संगठित रखकर जीतते थे। कुछ विधर्मियों द्वारा बरगलाए जाने पर हम समाज में आज भी बंटे हुए हैं। यदि आज भारत को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते देखना है तो भारत के प्रत्येक नागरिक को जातिगत हितों से ऊपर उठकर एक सेना के रूप में संगठित होना होगा। भारतीय सेना की महार रेजिमेंट इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। नवबौद्ध और दल-हित चिंतक गत सत्तर वर्षों में दलितों के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं। वे मतांतरण का उपकरण मात्र बन कर रह गये हैं।

हिन्दू धर्म से विरत होकर दलितों ने वस्तुतः कुछ विशेष अर्जित नहीं किया है। इतिहास में इसका एक स्पष्ट उदाहरण मिलता है। स्टीफेन कोहेन ने लिखा है कि जब अंग्रेजों ने महारों को अपनी सेना में लेने से मना कर दिया था तब कुछ ईसाई बन गये महारों ने अंग्रेजों के सम्मुख प्रार्थना की कि चूँकि अब वे ईसाई बन गए हैं इसलिए उन्हें सेना में भर्ती किया जाये। महारों की इस अपील को भी अंग्रेजों ने ठुकरा दिया था।

मेसन का एक महत्वपूर्ण अवलोकन है कि अंग्रेजों ने भारतीय योद्धाओं के कौशल को कुचलने का प्रयास नहीं किया अपितु उसे पहचान कर उसका समुचित प्रयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया। ऐसा ही प्रयोग वामपंथी इतिहासकार अपनी रोटी चलाने के लिए और राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए करते हैं। अंग्रेजों से पूर्व शिवाजी महाराज ने अपनी सेना में महारों को स्थान दिया था। कितनी बड़ी विडम्बना है कि उन्हीं शिवाजी को आदर्श मानने वाले भिड़े गुरुजी को मीडिया ने दंगे भड़काने का आरोपी बताया। यह सब षड्यंत्र समाज को विघटित करने के लिए किया जा रहा है जिसका परिणाम वैमनस्य के अलावा और कुछ नहीं।

जनवरी 2018 में भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के बाद इस केस में जून में गिरफ्तार किए गए माओवादी अर्बन नक्सली सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धवले, रोना विल्सन, शोमा सेन, महेश राउत, और फिर अगस्त में गिरफ्तार हुए वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्नन गोंसाल्वेस- ये सभी एक अलगाववादी विचारधारा के समर्थक हैं जिसका ध्येय है भारत का जाति आधारित विखंडन। इसीलिए देश विदेश के प्रोफेसरों और दलित चिंतकों ने आनंद तेलतुंबडे जैसे नक्सली को हिरासत से छुड़ाने के लिए मुहिम छेड़ी हुई है। उनका साथ देते हैं वे मार्क्सवादी बुद्धिजीवी इतिहासकार जिनके सरगनाओं में शामिल हैं रोमिला थापर और उनके जैसे झूठे इतिहासकार।

रोमिला थापर और उनके जैसे इतिहासकारों और उनसे प्रभावित समाजशास्त्रियों ने भारतीय वाङ्मय में निहित जातियों के समन्वय के विपरीत जातियों के संघर्ष पर प्रमुखता से विमर्श किया जिसके कारण आज नवबौद्ध इतने आक्रामक हैं। इन नवबौद्धों के जन्म की कहानी से ही भारत में मार्क्सवादी चिंतकों का उद्भव पता चलता है। वास्तव में रोमिला थापर आदि बुद्धिजीवियों के शैक्षणिक ‘गुरु’ थे दामोदर धर्मानंद कोसंबी और इनके पिता सीनियर कोसंबी से प्रभावित होकर ही भीमराव रामजी अंबेदकर बौद्ध बने थे। हालाँकि अरुण शौरी ने लिखा है कि अंबेदकर बौद्ध मत से भीतर तक प्रभावित नहीं थे लेकिन सच्चाई यही है कि वामपंथियों ने भीमा कोरेगाँव की लड़ाई में भारत की स्वतंत्रता से पहले ही बिना लड़े बढ़त बना ली थी। यदि हमें इसे जीतना है तो दलित समाज को बाबासाहेब के सिद्धांतों का सच बताना होगा।


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