जब रिपोर्टर मरे बच्चे की माँ से भी ज़्यादा परेशान दिखने लगें…

कैसा लगेगा जब इन एंकरों के बच्चे तड़पते रहेंगे और एक आम आदमी इनसे पूछे कि आपको एक माँ के लिहाज से कैसा महसूस हो रहा है? वो माइक इनके मुँह में ठूँस दे और नाक से कैमरा सटा कर पूछे कि आप कैसा फ़ील कर रही हैं? अच्छा नहीं लगेगा, आप उन्हें झिड़क कर भगा देंगे।

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पत्रकारिता के नाम पर संवेदनहीनता और बेहूदगी आम हो चुकी है
पत्रकारिता के नाम पर संवेदनहीनता और बेहूदगी आम हो चुकी है

‘आप कैसा महसूस कर रहे हैं?’, ‘आपका बेटा जिंदगी के लिए तड़प रहा है, आप कुछ कहना चाहेंगे?’, ‘आपके पति की मौत हो गई, आपको कैसा फ़ील हो रहा है?’, आदि सवाल ऐसे हैं जो सवाल नहीं सामान्य बुद्धि के दायरे से बाहर के हैं। ये संवेदनहीनता से भरे तो हैं ही, साथ ही यह आपको एक पेशे का ऐसा चेहरा दिखाती है जो क्लेम करती है कि वो जो कर रहे हैं, वो जनता की आवाज बन कर कर रहे हैं।

सौ से ज्यादा बच्चे मर गए। वो मर गए। वो वापस नहीं आएँगे। हो सकता है, अगले साल फिर मर जाएँगे क्योंकि कुछ लोग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे। ऐसे में मीडिया की क्या ज़िम्मेदारी है? मीडिया के लिए, ऐसे विषयों पर, दो काम बनते हैं। पहला यह है कि वो उन लोगों से सवाल करे जो इन मौतों को एक तय तरीके से होने देते हैं। और दूसरा यह कि वो वह काम करें जो उन लोगों ने नहीं किया, यानी जागरूकता फैलाने का।

इसमें कुछ मीडिया वाले बदतमीज़ी करते हुए हॉस्पिटल में पहुँच गए जैसे कि उनके जाने से सब कुछ सही हो जाएगा। पत्रकारों को, जिसमें कुछ बड़े एंकर शामिल हैं, लगता है कि उन्हें डिप्लोमैटिक इम्यूनिटी टाइप की कोई चीज मिली हुई है जिस कारण वो ब्रह्मांड के किसी भी कोने में माइक ले कर जा सकते हैं। ये सोच गलत है, कई बार ग़ैरक़ानूनी भी, लेकिन हमारा पेशा इतना विकृत रूप ले चुका है कि आप उन पर सवाल नहीं उठा सकते।

आप जरा सोचिए कि जिस हॉस्पिटल का नाम गलत कारणों से न्यूज में आया हुआ हो, वो कितने दबाव में काम कर रहे होंगे। मैं यह भी मान लेता हूँ कि हॉस्पिटल साफ-सुथरा नहीं होगा, लेकिन यह बताने के लिए जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे बच्चों के वार्ड में आप यह दिखाने के लिए अराजकता फैलाने लगेंगे कि देखिए यहाँ कितनी गंदगी है?

अस्पतालों की गंदगी उत्तर भारत के लिए कोई ख़बर नहीं है। जो सरकारी अस्पतालों में गए हैं, उन्हें पता है कि वो गंदे हैं। ये कोई बताने की चीज नहीं है। बता भी दें तो कैमरा लेकर दिखाने से आप किसी की मदद नहीं कर रहे। यहाँ सबको वस्तुस्थिति पता है।

नर्स एक बीमार बच्चे के बेड के पास खड़ी होकर कुछ निर्देश दे रही है और हमारे पत्रकार माइक लेकर पिले पड़े हैं! ये कौन-सी पत्रकारिता है? इसका लक्ष्य क्या है? इससे समाज के किस हिस्से को आवाज मिल रही है या ऐसा कौन-सा मुद्दा आप दिखा रही हैं जो लोगों को पता नहीं है?

लोगों को आपके पहुँचने से पहले से मुद्दा पता है कि अस्पताल में बच्चे मर रहे हैं। लोगों को ये ख़बर तब से पता है जब से बाकी चैनल जगे नहीं थे। आज राहुल गाँधी लोकसभा में आँख मार दे या मोदी राहुल गाँधी की चुटकी ले ले तो आप इन सारी मौतों को भूल जाएँगे क्योंकि आप के लिए मौतें मुद्दा नहीं हैं। मुद्दा है आपका खलिहर होना और इस मातम में लोगों से पूछना कि उनको कैसा लग रहा है!

कैसा लगेगा जब इन एंकरों के बच्चे तड़पते रहेंगे और एक आम आदमी इनसे पूछे कि आपको एक माँ के लिहाज से कैसा महसूस हो रहा है? वो माइक इनके मुँह में ठूँस दे और नाक से कैमरा सटा कर पूछे कि आप कैसा फ़ील कर रही हैं? अच्छा नहीं लगेगा, आप उन्हें झिड़क कर भगा देंगे।

आप जैसे एंकरों ने अपनी तस्वीरें खींचने पर प्राइवेसी की दुहाई दी है। क्या उस बच्चे के पिता को प्राइवेसी का हक़ नहीं जिसके लिए प्राथमिकता उसके बच्चे की साँसें हैं, और यह कि वो दवाई कहाँ से लाएगा?

मीडिया अपने आप को समझता क्या है? ये ज़िम्मेदारी है मीडिया की? ऐसे आप रिपोर्टिंग करेंगे? ये मीडिया नहीं थिएटर है। यहाँ लोग चिल्लाएँगे नहीं, ड्रामा नहीं करेंगे, आवाज को मॉड्यूलेट नहीं करेंगे तो लोग उन्हें सुनेंगे नहीं। जबकि ऐसे कई एंकर हैं जो शांत हो कर अपनी बातें रखते हैं, और लोग सुनते हैं। ये फर्जी बुलबुला बना कर उसी में लोग जी रहे हैं जिसका परिणाम बाथ टब में श्री देवी की मौत कैसे हुई बताने के लिए चम्पक पत्रकार बाथ टब में लेट जाने पर दिखता है।

तो फिर ऐसे मामलों में मीडिया क्या करे? मीडिया को कम से कम आधे घंटे जागरूकता अभियान चलाना चाहिए चैनलों के माध्यम से। इन्हीं पत्रकारों को अगर लगता है कि लोग उन्हें सुनते हैं तो उन्हें स्थानीय भाषा में यूट्यूब या चैनल के माध्यम से डॉक्टरों की बातचीत दिखा कर लोगों को ऐसी बीमारियों से बचाव के तरीके बताने चाहिए। विज्ञापनों के बीच लोगों को साफ-सफ़ाई रखने का आग्रह करना चाहिए।

पत्रकारों का काम नौटंकी करके भीड़ जुटा कर लोगों को अचंभित करने का नहीं है कि लोग यह चर्चा करें कि ‘अरे देखो, कितना गंदा है हॉस्पिटल’। इससे किसे क्या लाभ होगा पता नहीं। क्या इस शो के दो दिन बाद भी कोई याद रखेगा कि हॉस्पिटल गंदा था? उस हॉस्पिटल का नाम भी ध्यान में रहेगा? ये इम्पैक्ट किसके लिए क्रिएट हो रहा है? क्या ये मनोरंजन है कुछ लोगों के लिए जिनके लिए आप पैकेज तैयार करते हैं? फिर आपने क्या योगदान दिया इस मुद्दे को लेकर बतौर पत्रकार? यही आधे घंटे अगर आपने किसी जानकार डॉक्टर से बात करते हुए, बार-बार यह बताया होता कि लक्षणों को तुरंत ऐसे पहचानें और अस्पताल जाएँ, तो कल को होने वाली कुछ मौतें कम हो सकती थीं।

जब मीडिया सरकार को निकम्मी मानती ही है, फिर मीडिया ने इस जानकारी के साथ खुद क्या किया? क्या हमने इस सीज़न की शुरुआत में ही कैलेंडर बनाया कि हर साल बच्चे मरते हैं, हम पहले ही जा कर हॉस्पिटल से और मंत्रालय से पता करें कि इस बार आपने बचाव के लिए क्या प्रयास किए हैं? ज़िम्मेदार पत्रकार तो पहले ही सरकार को आगाह करने की कोशिश करेगा। अगर सरकार या स्वास्थ्य तंत्र उदासीन दिखे, तो वो इस पर चर्चा करे कि मुज़फ़्फ़रपुर वालो, हमने तो तुम्हारे इलाके के लिए इतना प्रयास किया, देखो तुम्हारा नगर निगम, सदर अस्पताल, मंत्री, सांसद, विधायक, जिला परिषद सदस्य आदि सो रहे हैं।

लेकिन पत्रकार तो इन मौक़ों पर हमेशा सबसे बाद में आते हैं। इनके लिए कैलेंडर के हिसाब से सिर्फ जन्मदिन और श्रद्धांजलि के ही दिन बनते हैं। जबकि इन दोनों से किसको क्या लाभ होता है मुझे नहीं पता। अगर मीडिया, जो गले फाड़-फाड़ कर यह सवाल कर रही है कि किसी ने कुछ क्यों नहीं किया, स्वयं ही पहले कुछ करती, और जो आँकड़े ये हर साँस में गिना रही है कि इस साल इतने मरे, उस साल उतने मरे, वो पहले गिन लेती, तो शायद इस त्रासदी की चोट थोड़ी कम लगती।

हम सब जानते हैं कि इसमें दोष सरकार का है जो निकम्मी है, उपेक्षा करती है अपनी जनता का और ज़िम्मेदारी लेने से भागती है। ये बात सबको पता है। आँख मूँद कर ये बातें आप हर त्रासदी के बाद कह सकते हैं और आप गलत नहीं होंगे। लेकिन हम पत्रकारों की क्या ज़िम्मेदारी है? क्या हमने अपने अनुभव ये कुछ भी सीखा है? क्या हम प्रो-एक्टिव हैं किसी भी भयावह आपदा को लेकर? क्या हमें अंदाज़ा भी था कि इस साल भी बच्चे मरने वाले हैं या फिर हम उस दिन के बवाल में बिजी थे जिससे हमें ट्रैफिक और टीआरपी मिलें?

ये दोष मुझ पर भी है, और मेरे साथी पत्रकारों और संस्थानों पर भी। मीडिया को अपने ज़िम्मेदार होने का मेडल तब ही लटकाना चाहिए जब उसने ऐसी आपदाओं को आने से पहले ही लोगों को आगाह किया हो कि अब बारिश का मौसम आ रहा है, डेंगू फैलना शुरु होगा, हॉस्पिटलों की तैयारी पता की जाए। बारिश के बाद नालों के जाम होने पर सरकारों से सवाल पूछने से बेहतर है कि बारिश की शुरुआत में पूछा जाए कि क्या नालों की सफ़ाई हो गई?

अभी जो टीवी पर चल रहा है वो इतना घटिया और संवेदनहीन है कि उसमें दोष मढ़ने, नाटकीयता दिखाने और चेहरे पर पानी मार कर अपने आप को बदहवास दिखा कर यह बताने की होड़ मची है कि हमारे टीवी की एंकर उस माँ से ज़्यादा परेशान है जिसका मृत बच्चा उसकी गोद में पड़ा है और उसके आँसू सूख चुके हैं।