Sunday, October 17, 2021
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5G इंटरनेट से भी फास्ट है एक्टिविज्म: इधर से पिटीशन डालो, उधर से तारीख लो – टूलकिट सेलेब्रिटी के लिए स्पेशल ऑफर

"राजधानी की रफ़्तार से मालगाड़ी चलने का ट्रायल रुकना चाहिए क्योंकि फसल समय पर मंडियों में पहुँच जाएगा और चीजों का दाम नहीं बढ़ेगा, किसानों को कोई फायदा नहीं होगा।" - कोर्ट ने फटाफट इस याचिका पर आपातकालीन सुनवाई की।

देश में 5G टेस्टिंग को रुकवाने के लिए जूही चावला ने मुकदमा दायर कर दिया। इन दिनों मुक़दमे कुछ न कुछ रुकवाने के लिए ही किए जा रहे हैं। सेंट्रल विस्टा से लेकर वैक्सीन ट्रायल और कानून से लेकर इन्वेस्टीगेशन तक, सब कुछ रुकवाने के लिए लोग अदालत पहुँच जाते हैं। कभी-कभी लगता है जैसे हज़ारों लोग ऐसी चीजों की लिस्ट बनाने में लगे हुए हैं जो चल रही हैं। लिस्ट बनाई जा रही हैं, मॉडिफाई की जा रही हैं, फाइनल की जा रही हैं, ड्राइव में डाली जा रही हैं। उद्देश्य वही एक; चलने वाली हर चीज को रुकवा देना है। जो चल रहा है, उसे रुकवाना है। जो दौड़ रहा है, उसका गीयर चेंज करवाना है। जिसने चलना नहीं शुरू किया है, उसके रास्ते में गड्ढा खुदवा देना है। 

लिस्ट भी इसी दर्शन के हिसाब से बन रही हैं। एक लिस्ट में ऐसी चीजें हैं, जो दौड़ रही हैं। दूसरी में ऐसी जो केवल चल रही हैं। तीसरी ऐसी चीजें की हैं, जो चलने वाली हैं। उनकी एक सब्सिडियरी लिस्ट हैं, जिसमें ऐसी चीजें हैं जो एक वर्ष बाद चल सकती हैं। डेटा इकट्ठे किए जा रहे हैं।

घुटे हुए आधा दर्जन साहबों के सामने टेबल पर लिस्टों की ढेर लगी है। साहब ने एक लिस्ट देखा और फिर चश्मे को पोंछा। फिर लिस्ट देखा और मन ही मन बोले; अच्छा, ये भी चल रहा है! हमने तो सोचा था कि ये चल नहीं पाएगा। चलने दो, कल ही पिटीशन डलवाता हूँ। देखूँगा कैसे चलता है। फिर उन्होंने आवाज़ लगाईं; अरे आहूजा, ये चलने वाली चीजों की नई लिस्ट है। एक काम कर, ये वह ड्रामा इन डेमोक्रेसी वाले परवेज़ को भेज। बोल लिस्ट में पहली जो तीन चीज है, उन्हें रोकवाने के लिए हाई कोर्ट में कल ही पिटीशन डलवाए। कोई जरूरत हो तो बताए। और हाँ, कुछ इधर-उधर करे तो याद दिला देना कि साला केवल नुक्कड़ नाटक खेलने के लिए सात साल तक PSU से CSR फंड्स लेकर गया है। उसमें से कितने का नाटक खेला है और कितने की नौटंकी, सब मुझे पता है।

साहब मन ही मन खुद को शाबाशी देते हुए आगे की लिस्ट पर बढ़ जाते हैं। लिस्ट देखते हुए कहते हैं; ये भी चल रहा है? इस सरकार को सब कुछ चलाना है। साले बेवकूफ हैं सब। जनता का भला करके ही मरेंगे। ठीक है, देखता हूँ बेटा कि कितने दिन चलते हो। अरे निकुंज, ये लिस्ट सितारा देवी को भेज और बोल कि अगले हफ्ते भर में चार पिटीशन फाइल करे। बोल कि अपनी एक्टिविस्ट वाली प्रोफाइल मीडिया में एक्टिवेट करवाए, केस की हियरिंग चार दिन के भीतर मैं तिवारी को बोलकर इंश्योर करवा दूँगा।

साहब के कमरे में रुका समय साहब को निहारे जा रहा है। 

खैर, मुक़दमे की सुनवाई में जूही चावला के किसी फैन ने गाना गा दिया। अब फैन है तो गाना ही गाएगा न, गाली थोड़े देगा। पर बेचारे का भाग्य देखिए कि गाना गाने के लिए अदालत ने अवमानना का नोटिस थमा देने की धमकी दे दी। फैन बेचारा मन ही मन सोच रहा होगा कि; गाना तो मीका और हनी सिंह भी गाते हैं, उन्हें तो कभी अदालत ने नोटिस थमाने की धमकी तो नहीं दी! घुटा हुआ फैन होता तो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देता और कहता कि अवमानना के नोटिस की धमकी संगीत और कला पर हमला है। न्याय व्यवस्था पर सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है और इस धमकी से कला का अपमान करवा रही है। एनजीओ का मालिक होगा तो गायका-धिक्कार के हनन के विरोध में अदालत के खिलाफ ऊँची अदालत में केस कर देगा। 

पर फैन लोगों की समस्या यह है कि वे बेचारे फैन ही हो सकते हैं, एक्टिविस्ट नहीं बन सकते। एक्टिविज्म केवल उनके अंदर होता है जिनके ये फैन होते हैं। 

फैन के गाने की चर्चा की वजह से ही देश को पता चला कि जूही चावला भी अब एक्टिविस्ट बन गई हैं। सरकार हो या पत्रकार, मानवा-धिक्कार वाला सबके ऊपर भारी पड़ता है इसलिए एक्टिविज्म सबसे पसंदीदा प्रोफेशन है। मेम साहब ने मुख्य प्रोफेशन से संन्यास ले लिया। किसी ने पूछा क्यों लिया तो जवाब मिला; अब क्वालिटी टाइम बिताना चाहती हैं। आम इंसान होता तो पूछता; तो अभी तक जो बिताया वो रद्दी टाइम था? पर ख़ास आदमी था तो फट से सुझाव दे दिया; क्वालिटी टाइम बिताना है तो एक्टिविस्ट बन जाओ। 

साहब तीस वर्षों तक अफसरशाही में रहे। उनमें से सात वर्ष शिक्षा मंत्रालय में सेक्रेटरी थे। कुछ नया नहीं किया पर रिटायर होते ही क्वालिटी टाइम बिताने के उद्देश्य से शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए एनजीओ खोल लिया। सरकारी और प्राइवेट सेक्टर से फण्ड से की व्यवस्था हो गई है। क्वालिटी टाइम बीत रहा है। जरूरत पड़ने पर कोई चलती हुई चीज रुकवाने के लिए इस्तेमाल हो जाते हैं। उसकी जरूरत न हुई तो हर छह-आठ महीने में एक बार देश में लोकतंत्र की गिरावट पर कोई ज्वाइंट लेटर साइन करने के काम आ जाते हैं। 

एक्टिविज्म का भला हो रहा है और क्वालिटी टाइम बीत जा रहा है। एक साहब को और क्या चाहिए? कल को देख सकते हैं कोई और एक्टर क्वालिटी टाइम बिताते-बिताते बोर हुआ तो अदालत पहुँच गया। अदालत पूछेगा; क्या कष्ट है? वो बोलेगा; कुछ खास नहीं, ये जो FDI देश में आ रही है, उसकी वजह से उद्योग बढ़ जाएँगे। बढ़ जाएँगे तो पर्यावरण को नुकसान पहुँचेगा। मैं बस इतना चाहता हूँ कि देश में FDI बंद होना चाहिए। पर्यावरण का नाश FDI से हो रहा है। 

अदालत से जवाब आएगा; अच्छा, आप एक पेटिशन लगा दें। सुनवाई करवा देता हूँ। कल की तारीख दूँ? अगर कहें तो आज की दे देता हूँ। रात दस बजे सुनवाई कर लेते हैं।

मल्होत्रा साहब यह सुन लेंगे तो अपना सिर दीवार पर यह सोचते हुए मार लेंगे कि; सोलह बरस हो गए मेरे मकान का केस चलते हुए, अदालत बहादुर मुझे आठ महीने में एक बार तारीख केवल इसलिए देते हैं ताकि बता सकें कि आठ महीने बाद ही फिर तारीख दे पाएँगे और यहाँ इसे कल की तारीख देने को तैयार हैं। 

कोई क्रिकेटर किसी दिन अदालत पहुँच जाएगा। बोलेगा; ये सरकार जो राजधानी की रफ़्तार से मालगाड़ी चलवाना चाहती है, उसका ट्रायल रुकना चाहिए क्योंकि किसानों के प्रोडूस समय पर मंडियों में पहुँच जाएँगे और सप्लाई रोबस्ट हो जाएगी तो चीजों का दाम नहीं बढ़ेगा और किसानों को कोई फायदा नहीं होगा। अदालत बोलेगी, ठीक है, आप एक काम करो, पेटीशन फाइल कर दो, हम केस सुन लेंगे। उसकी भी केस की सुनवाई वर्चुअल हुई तो क्रिकेटर का कोई फैन कमेंट्री में चिल्ला सकता है; ये लगा VSNL चौका!

अदालत केस लेती रहेगी, तारीख देती रहेगी और सरकार अपना समय अदालतों  में खर्च करती रहेगी और उधर अमेरिका में बैठा कोई एनजीओ रिपोर्ट पब्लिश करके भारत में लोकतंत्र की डाउनग्रेडिंग करता रहेगा।

 

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