Monday, September 28, 2020
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हम भी रेले गए थे, तुम भी रेले जाओगे: उद्धव ठाकरे को मिली कुमारस्वामी की चिट्ठी

राजनीति में जो भी होता है, हमारा परिवार वर्षों पहले कर चुका होता है। मैं दो-दो बार एक्सीडेंटल सीएम बना। मेरे पिता एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ख़ुद कहा था कि मनमोहन नहीं, बल्कि असली एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर तो वे हैं। इसलिए, याद रखिएगा हम भी रेले गए थे। आप भी रेले जाएँगे।

प्रिय उद्धव बाला साहब ठाकरे,

ख़बरों में देखा कि आपने कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। मैंने भी ली थी। आपने बहुमत भी साबित कर दिया। मैंने भी कर दिया था। आपने भी मोटाभाई का इगो हर्ट किया। मैंने भी किया था। आपने 3 दिन के भाजपाई सीएम से इस्तीफा दिलवा कर अपना राज़ क़ायम किया। मैंने भी ऐसा ही किया था। आपके शपथग्रहण समारोह में विपक्ष के कई नेता मौजूद रहे और इसे ख़ूब सुर्खियाँ मिलीं। मैंने भी बटोरी थी। मेरे शपथग्रहण समारोह में तो विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लग गया था। मायावती और सोनिया गाँधी ने एक-दूसरे से प्यार जताया था। ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल ने गलबहियाँ डाल कर विपक्षी एकता की मिसाल क़ायम की थी।

लेकिन प्रिय उद्धव, अंत में क्या हुआ? हम भी रेले गए, आप भी रेले जाएँगे। याद रखिए, मुख्यमंत्री तो मैं था लेकिन पावर सेंटर सिद्दारमैया था। ख़ुद के हालात देखिए। भले मुख्यमंत्री मातोश्री का हो लेकिन सत्ता तो ‘सिल्वर ओक’ से ही चलेगी न। मेरे पिता की कुछ महत्वाकांक्षाएँ थीं तो आपके बेटे की है। मेरा कार्यकाल रोते-रोते बीता और मैं 5 साल तो क्या, डेढ़ वर्ष भी पूरे नहीं कर पाया। फिर आपकी तीन पहिए वाली सरकार का संतुलन कब तक बना रहेगा, ये सोचने वाली बात है। हमनें डीके शिवकुमार पर भरोसा किया था, आपने संजय राउत पर किया है।

प्रिय उद्धव, हम दोनों ही खानदानी हैं। मुझे भी अपने बेटे का करियर बनाना था, वो भी चौपट होता दिख रहा है। आपने देखा न, हाल ही मैं कैसे मांड्या में रोया? ये वही लोकसभा क्षेत्र है, जहाँ से मेरे बेटे को लड़ाया गया था। वो हार गया। मुझे बहुत रोना आया और मैं रैली में ही रो पड़ा। मैं नहीं चाहता कि आपके मुख्यमंत्री बनने के कारण आदित्य का भी करियर बर्बाद हो। समय रहते संभल जाएँ। मेरी तरह आपका परिवार भी बड़ा है। मुझे पता है कि आपको भी अपनों का राजनीतिक भविष्य बनाना है। ये सही है कि आप मुंबई पर राज़ करने का दावा करते हैं, लेकिन मैसूर में अपने ठाठ भी किसी से कम हैं क्या?

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ऐसा नहीं है कि मैं कमज़ोर हूँ। ठाकरे खानदान के जो तेवर हैं, उससे कम नहीं है मेरा परिवार। अब देखिए न, मेरा बेटा ही मेरे पूर्व-प्रधानमंत्री पिता पर चिल्लाया। एक अखबार ने इस ख़बर को छापा। मेरे तेवर तो देखो। मैंने उस अख़बार के संपादक और इस ख़बर को लिखने वाले तक पर केस दर्ज कराया। मेरी पुलिस थी, उन्हें जम कर हड़काया। मीडिया भी अजीब है न! हम विपक्षी दल अपने राज्यों में पत्रकारों को पटक कर मारें, तब भी लोकतंत्र ख़तरे में नहीं आता। भाजपा शासित राज्यों में किसी पत्रकार के घर की खिड़की के शीशे पर कौवा बीट कर दे तो इसे भी ‘लोकतंत्र की हत्या’ की श्रेणी में रखा जाता है। बड़ा मज़ा आया ये खेल देख कर। लेकिन अब देखो उद्धव जी। अब मेरे पर ही राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज हुआ है। सिद्दरामैया भी लपेटे में आया है। मुझे भले ही जो सज़ा हो, मैं चाहता हूँ सिद्दा को भी सज़ा मिले।

मैं सोनिया गाँधी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री बना। आप सोनिया गाँधी की क़सम खा कर मुख्यमंत्री बने। मेरे पापा ने राजनीति में न जाने कितने सिद्दारमैया पैदा कर छोड़ दिए। आपके पापा ने भी जिसके सिर पर हाथ रख दिया, वही बेताज बादशाह बन गया। आपके पिताजी तो धरती छोड़ चले गए। मेरे ज़िंदा हैं। रोने के लिए। हम दोनों बाप-बेटे जब तक दिन में तीन बार रो न लें, तब तक हमारे मन में एक कुलबुलाहट सी मची रहती है। बस एक बार मुख्यमंत्री पद हथिया लेने की इतनी बड़ी सज़ा। अभी भी मौक़ा है उद्धव दादा। मेरे अनुभवों से सीखिए।

आपको क्या लगता है? अजित पवार ने कुछ नया किया। राजनीति में जो भी होता है, हमारा परिवार वर्षों पहले कर चुका होता है। मैं दो-दो बार एक्सीडेंटल सीएम बना। मेरे पिता एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ख़ुद कहा था कि मनमोहन नहीं, बल्कि असली एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर तो वे हैं। अजित ने अपने चाचा से बगावत की और 3 दिन के लिए डिप्टी सीएम बने। मैंने तो अपने पिता से ही बगावत कर 1 साल 8 महीने सरकार चलाई थी। मेरे पास शासकीय अनुभव था, तब भी मेरा ये हाल हुआ। आपने तो पहली बार कोई पद संभाला है।

आपने आरे जंगलों की कटाई रोक दी है। मुझ पर तो 300 नेताओं की फोन टैपिंग का मामला चल रहा है। क्या आप इससे ज्यादा तानाशाही दिखा पाओगे? मैं व्यथित हूँ। राजनीति से संन्यास की बातें करता हूँ। जब सीएम था, तब जो मेरा विरोध करते थे, उन्हें मैं लाठीचार्ज की खुली धमकी देता था। जब लोग किसी माँग को लेकर प्रदर्शन करते थे तो मैं सीधा कहता था कि मोदी को वोट देने वाले लोग मोदी के पास जा कर दुखड़ा रोएँ। उद्धव, कहीं ऐसा न हो कि आपका दुखड़ा सुनने वाला ही कोई न रहे। मेरा तो दिल यही कहता है- हम भी रेले गए थे, आप भी रेले जाओगे। मेरी पार्टी विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी है। आपकी दूसरे नंबर की है। ध्यान रखिएगा।

आपके बेटे को मीडिया भाव नहीं देता है। किसी ने तो पप्पू भी बुला दिया था। मेरे भी बेटे को भी मीडिया भाव नहीं देता है। मैंने तो इसके लिए मीडिया का खुला बहिष्कार भी कर डाला था। मैं वंशवादी राजनीति को देश के विकास का कारण मानता हूँ। मुझे पता है, आपकी भी आस्था वंशवादी राजनीति में ज़रूर होगी। ऐसा मत समझना कि कॉन्ग्रेस मेरे साथ मज़बूरी से खड़ी नहीं थी। मेरे बेटे की उम्मीदवारी का विरोध करने पर कॉन्ग्रेस ने अपने 7 नेताओं को पार्टी से निकाल बाहर किया था। अहा! क्या प्रेम दिखाती थी कॉन्ग्रेस! आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है न? मुझे डेजा-वू वाली फीलिंग आ रही है। उद्धव, याद रखना। हम भी रेले गए थे, आप भी रेले जाओगे।

मैं ईमानदार हूँ। जो सच है, उसे बोल देता हूँ। महाराष्ट्र में जो भी हुआ, वो मौक़ापरस्ती का एक उदाहरण है। ऐसी अवसरवादी राजनीति सभी करते हैं। मैंने भी की है। मैं कौन सा दूध का धुला हूँ? हाँ, दूध से याद आया। एक राज़ की बात सुनो। मोदीजी इसीलिए सफ़ेद दिखते हैं क्योंकि वो रोज़ वैक्स लगाते हैं। हम तो वैसे ही मुँह धो कर आ जाते हैं।

अंत में यही कहना चाहूँगा कि आपको जब इस्तीफा देना पड़े तो बंगलौर चले आना। साथ मिल कर रोएँगे। और हाँ, अब ये मत कहना कि आपसे मिलने लोग मातोश्री आते हैं, आप किसी से मिलने नहीं जाते। वो ज़माना बीत गया अब। मैंने देखा कि कैसे आप सरकार गठन से पहले होटलों के बैकडोर से शरद पवार व कॉन्ग्रेस नेताओं से मिलने जाया करते थे। मेरे पिताजी योग एक्सपर्ट हैं। वो हम दोनों को योग सिखाएँगे। शाह को कैसे भूलें, इसका उपाय बताएँगे। बाकी विशेष क्या कहूँ? बस हर छोटे-बड़े निर्णय लेने से पहले ‘सिल्वर ओक’ और ’10 जनपथ’ फोन घूमा कर अनुमति ज़रूर ले लेना।

तुम्हारा शुभचिंतक
हरदनहल्ली देवेगौड़ा कुमारस्वामी
जेपी नगर, बंगलौर

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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