RaGa और धोनी के भक्तों को हुआ एक समान कॉन्स्टिपेशन, हार को चुपचाप गए डकार

धोनी फैंस घर से नंगे पाँव निकल पड़े। क्रांति का सैलाब सोशल मीडिया पर जमकर बहा। चारों ओर "नहीं धोनी, नहीं धोनी" की चीत्कार सुनाई देने लगी।

एक महान लेखक ने एक बार अपने एक फेसबुक पोस्ट में 3 हैशटैगों के साथ लिखा था- “एक पुराने और बड़े दुःख को भुलाने का सबसे आसान तरीका यह है कि किसी दूसरे बड़े दुःख को अपना लिया जाए।”

देश का कट्टर युवा जागा ही था कि युवराज के राज्याभिषेक में बाधा आ गई। बाधा क्या आई कि युवराज नाराज ही हो गए। फरमान जारी किया गया और गाँव-नगर में ढिंढोरा पिटवाने का राज-आदेश दे दिया गया कि युवराज नाराज हैं और कई दिनों से “कॉन्गलेच के छोना बाबू थाना नहीं था रहे।” तमाम विश्लेषकों के माथे बल पड़ गया। राजनीति के गलियारों में हलचल मच गई।

इस बाबू को थाना थिलाने के प्रयोजन से कॉन्ग्रेस के ‘दद्दावरों’ को मैदान में उतारा गया, क्योंकि उनकी रगों में अभी तक एक गुलाब के फूल वाले समाजवादी नेता का नमक बह रहा था। दद्दावरों को राज धर्म निभाने का वास्ता दिया गया, नेहरूघाटी सभ्यता के दौरान खाई गई अटूट कसम उन्हें आज भी याद थी। दद्दावरों ने दाँतुन के डॉक्टर से हाल ही में लगवाए नए दाँतों का सेट मुँह में डालते हुए कहा – “हाँ हमारी ही गलती थी, आप कहें तो परिवार समेत इस्तीफ़ा आपके चरणों में बिछा दें, लेकिन आप अपना इस्तीफ़ा रोक दीजिए।”

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किन्तु, छोना बाबू नहीं डिगे। दल का मनोबल टूटने लगा, दद्दा अपनी टोपी राज दरबार में ही छोड़कर भारी मन से लौटने लगे। इन सब के बीच चुपचाप जो एक घटना दम तोड़ती रही, वो थी समानांतर रूप से डीएम तोड़ती हुई कॉन्ग्रेस की लोकसभा चुनाव में हार की जलालत!

इस इस्तीफे और युवराज को मनाने के खेल से कॉन्ग्रेस को चुनाव की हार का गम भुलाने में बड़ी राहत मिली। इस सारे ‘इस्तीफ़ा प्रकरण’ के बीच कॉन्ग्रेस की हार की घटना का दुःख एक कोने में चुपचाप अपनी मौत मरता रहा। तमाम दिन तैमूर के डायपर बदलने की खबर लिखने वाली गोदी मीडिया ने भी कॉन्ग्रेस की इस हार के दुःख को प्राथमिकता नहीं दी।

एकजुट होकर सबने लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को मिली बड़ी हार के दुःख को युवराज के इस्तीफे के दुःख में तब्दील कर दिया और दिखा दिया कि नेहरू जी के बिस्कुट में वाकई में नमक था। अब पार्टी कार्यकर्ता और तमाम वरिष्ठ-बुजुर्ग नेतृत्व की जान में जान आ चुकी है। सब अपने नकली दाँतों का सेट वापस मुँह में ठूँसकर खूब खिलखिला रहे हैं। इस ख़ुशी के शोर का कारण कॉन्ग्रेस के पार्टी प्रवक्ता बता रहे हैं कि लोकसभा सीट नहीं बचा पाए तो क्या, राहुल गाँधी जी को तो बचा लिया है। ये स्वर सुनते ही स्वर्ग में नेहरू जी की आत्मा फूट-फूटकर मुस्कुराई है।

लेकिन राहुल गाँधी को आखिरकार एक तेज दौरा इस्तीफे का फिर आया और इसमें त्यागपत्र देने से उन्हें कोई नहीं बचा पाया। सबका मनोबल सड़क पर आ गया। अब जनता को इस सदमे से भी जूझना था। बहन प्रियंका के पति और राहुल गाँधी जी के जीजा जी भी आज अश्रुपूरित चिट्ठी लिखकर अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर ही चुके हैं। राहुल गाँधी भी आज घोषणा कर चुके हैं कि वो खड़े रहेंगे।
यकीन ना हो तो अपनी आँखों से देख लो –

यूनेस्को द्वारा प्रमाणित ‘बेस्ट जीजाजी’ ने राहुल को क्या लिखा पत्र में?

क्रिकेट फैंस गहरी साँसें लेकर अपनी जिम्मेदारी पर ही आगे पढ़ें

इसी बीच विश्वविजय पर निकली BCCI की क्रिकेट टीम का कारवाँ भी इंद्रदेव ने सेमीफाइनल मुकाबले में रुकवा दिया। कुछ जानकारों का तो यह भी कहना है कि मोदी जी की सरकार आने के बाद ही भारतीय क्रिकेट टीम सेमीफाइनल मुकाबले में हारी है, वरना जब-जब इस देश में कॉन्ग्रेस का शासन था, तब कभी भारतीय टीम सेमीफाइनल में नहीं हारा करती थी। लेकिन कुछ फैक्ट चेकर्स ने इस दावे में ‘राइट एंगल’ तलाशते हुए पता लगाया कि कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान तो अपनी टीम को सीधा बांग्लादेश जैसी अल्पविकसित टीम से हार मिली थी और उसके हाथों भारतीय क्रिकेट टीम को वर्ल्ड कप मुकाबले से बाहर होना पड़ा था। यह वर्तमान हार से कहीं ज्यादा ‘अपमानास्पद’ था।

सेमीफाइनल में मिली हार को पचाने के लिए फेसबुक के कुछ प्रगतिशील लेखक भी आगे आए। उन्होंने इस हार के बाद अपनी दिल की कलम से तुरंत पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए यहाँ तक लिख दिया-

“सुन ले पाकिस्तान! कुछ तो बात है टीम इंडिया के फ़साने में
2 दिन लगते हैं तुम्हारे बाप को हराने में।”

खैर, अब नया चैलेंज वर्ल्ड कप से बाहर होने के गम से भी बाहर निकलने का था। इस बीच व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर एक खबर आग की तरह फैला दी गई- “महेंद्र सिंह धोनी क्रिकेट को कहेंगे अलविदा।”

करुण रस में डूबी हुई इन पंक्तियों को पढ़ते ही कट्टर फैन के कानों से लहू दौड़ने लगा। धोनी फैंस घर से नंगे पाँव निकल पड़े। क्रांति का सैलाब सोशल मीडिया पर जमकर बहा। चारों ओर “नहीं धोनी, नहीं धोनी” की चीत्कार सुनाई देने लगी। हालाँकि, अब तक तो कम से कम धोनी को क्रिकेट से इस्तीफा देने से रोक लिया गया है। क्रिकेट के यूट्यूब पर रन बनाने वाले कुछ विश्लेषकों का तो यहाँ तक भी कहना है कि धोनी के आखिरी ओवरों के स्ट्राइक रेट को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपने इस्तीफे पर दोबारा विचार करना चाहिए।

फैंस, चाहे राहुल गाँधी के हों या फिर धोनी के, हर जगह जीतते नजर आ रहे हैं। ‘वो’ युवराज को कॉन्ग्रेस में बने रहने के लिए मना चुके हैं और ‘ये’ धोनी को जमे रहने के लिए! इस बीच ख़ुशी की एक बात यह है कि इस्तीफे की आड़ में हम लोग 2 बड़ी हारों को चुपके से डकार गए। उस लेखक की कालजयी पंक्तियाँ बरबस याद आ रही हैं जिसने कहा था- “एक पुराने और बड़े दुःख को भुलाने का…”

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