Friday, November 27, 2020
Home विविध विषय कला-साहित्य उम्माह के पैरोकार इक़बाल ने कैसे बदल दिया था 'सारे जहाँ से अच्छा' तराना:...

उम्माह के पैरोकार इक़बाल ने कैसे बदल दिया था ‘सारे जहाँ से अच्छा’ तराना: कट्टरपंथी थे Pak के जनक

पाकिस्तान के जनक अल्लामा इक़बाल को भारत में सेक्युलर साबित करने की क्यों मची है होड़? इक़बाल, जिसने पहली बार भारत विभाजन की बात की, जिसने भारत को धमकाया और जिसकी विचारधारा की आड़ में मजहबी कट्टरता ऐसी फैली कि देश में आग लग गई। एक बात और... उनका परिवार पहले कश्मीरी पंडित था, जिसने बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया।

अल्लामा इक़बाल, जिन्हें मुफ्फकिर-ए-पाकिस्तान कहा जाता है, यानी पाकिस्तान का विचारक। ये सही भी है क्योंकि सबसे पहले ‘टू नेशन थ्योरी’ की बात इन्होंने ही की थी। इन्हें शायर-ए-मशरिक, अर्थात पूरब का शायर भी कहा जाता है। इक़बाल को हाकिम-उल-उम्मत, अर्थात उम्माह का विद्वान भी कहा गया है। यहाँ उम्माह आते ही आप समझ गए होंगे कि इसका अर्थ है मुस्लिमों का शासन। यही मुहम्मद इक़बाल की विचारधारा भी थी- पूरी दुनिया के मुस्लिम एक राष्ट्र के रूप में हैं। ‘तराना-ए-मिल्ली’ का सार यही है कि पैगम्बर मुहम्मद ही सारी दुनिया के मुस्लिमों के नेता हैं। इन्होंने इस्लाम में राष्ट्रवाद की भावना होने की बात को ही नकार दिया।

अल्लामा इक़बाल के बारे में एक बात जाननी ज़रूरी है कि उनका परिवार पहले कश्मीरी पंडित था, जिसने बाद में इस्लाम स्वीकार कर लिया था। उनका जन्म नवंबर 8, 1877 को सियालकोट में हुआ था। इक़बाल के ‘तराना-ए-हिंदी’ को न सिर्फ़ भारत में पढ़ाया गया बल्कि इसे देशभक्ति दिखाने के लिए भी गाया जाता रहा है। इक़बाल, जिसने पहली बार भारत विभाजन की बात की, जिसने भारत को धमकाया और जिसकी विचारधारा की आड़ में मजहबी कट्टरता ऐसी फैली कि देश में आग लग गई। कट्टरवाद के उस जनक को भारत में पूजा जाना आश्चर्यजनक है। हाँ, पाकिस्तान में उनका सम्मान होना समझ में आता है।

अल्लामा इक़बाल के दोनों तराने और उनके बीच का अंतर

इक़बाल ने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान 1904 में लिखा था। इसे मूलतः बच्चों के लिए लिखा गया था, जो देशभर में लोकप्रिय हुआ। समय के साथ सिर्फ़ इक़बाल ही नहीं बदले बल्कि उन्होंने अपने तराने को भी तोड़-मरोड़ के बदल दिया। मोहम्मद इक़बाल उस समय गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में लेक्चरर थे। उनके एक छात्र लाला हरदयाल ने उन्हें एक कार्यक्रम को सम्बोधित करने के लिए आमंत्रित किया था, जहाँ उन्होंने ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गाया। उन्होंने भाषण देने की जगह अपने इस तराने को ही गाया और सभा में लोगों ने इसकी खूब प्रशंसा की। हरदयाल ने बाद में ग़दर पार्टी की स्थापना की और सिविल सर्विस को ठोकर मार कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे।

अब आते हैं कट्टरपंथी इक़बाल पर, जिन्होंने ‘तराना-ए-मिल्ली’ लिख कर इस्लाम के शासन की बात की और उनकी देशभक्ति तेल लेने चली गई। ‘तराना-ए-हिंदी‘ की पहली पंक्तियाँ तो आपको याद ही होंगी। इसका अर्थ भी सभी को लगभग पता ही है- हिंदुस्तान बाकी सारी दुनिया से अच्छा है और ये एक ऐसा चमन है, जिसमें हम सब बुलबुल के रूप में रहते हैं । वो पंक्तियाँ कुछ इस तरह से हैं:

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

आज भारत में कथित बुद्धिजीवियों का ही एक बड़ा वर्ग है जो फैज अहमद फैज और मुहम्मद इक़बाल को पूजने में लगा हुआ है और चाहता है कि बाकी लोग भी ऐसा ही करें। ऊपर वाले तराने के ठीक 4 साल बाद यूरोप से लौटे मुहम्मद इक़बाल की ‘तराना-ए-मिल्ली‘ की पहली पंक्तियाँ देखिए, जो बताता है कि किस तरह उनके मन में भारत के लिए कोई सम्मान था ही नहीं और उनकी नज़र में इस्लाम ही एकमात्र सत्ता थी:

चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा
मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

इसका अर्थ है कि चीन और अरब हमारे हैं, हिंदुस्तान भी हमारा ही है। हम तो मुस्लिम हैं और ये सारी दुनिया ही हमारी है। यहाँ चीन का तात्पर्य पूरे मध्य एशिया से था। इसकी अगली पंक्तियों में उन्होंने लिखा है कि एक अल्लाह को मानना मुस्लिमों की साँस में, सीने में बसता है। इसकी अगली पंक्ति में वो लिखते हैं कि मुस्लिमों को मिटाना इतना आसान भी नहीं है। इसके बाद वो मंदिरों और मूर्ति पूजा का मखौल उड़ाते हुए लिखते हैं कि उन सबमें उनके ख़ुदा का घर सबसे ऊपर का स्थान रखता है। इसका एक अर्थ ये भी है कि मुस्लिमों का काबा जो है, उसका स्थान दुनिया के सारे मंदिरों से भी ऊपर है, सबसे ऊँचा।

इस्लाम की बात करते हुए इक़बाल लिखते हैं कि वो सब तलवारों से साए में बड़े हुए हैं और वो अर्धचंद्र का खंजर है न, वही उनके कौम की निशानी है। इस्लामिक मुल्कों के झंडों पर प्रतीकों में अर्धचंद्र और तारे मिलते हैं, यहाँ ‘क़ौमी निशाँ’ की बात इस्लाम के लिए ही हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। हिंदी तराने में हिमालय को भारत का संतरी बताने वाले मुहम्मद इक़बाल के लिए अब पहाड़ियों में भी इस्लाम घुस गया। तभी तो उन्होंने लिखा कि पश्चिम की वादियों में इस्लामी अजान ही गूँजता रहा और किसी में इतनी ताक़त नहीं हुई कि वो मुस्लिमों को आगे बढ़ने से रोक सके। इसके बाद इक़बाल स्पेन और टिगरिस के बहाने धमकाते हैं कि किस तरह इस्लाम ने वहाँ अपनी सत्ताएँ स्थापित की।

दोनों ही तरानों में इक़बाल का टोन बदलता नज़र आता है। एक में वो राष्ट्रवाद की बात करते हैं, दूसरे में उसी को नकार कर इस्लाम का बखान करते हैं। अंतर इतना है कि हिंदी तराने में इस्लाम की झलक मिलती है लेकिन ‘तराना-ए-मिल्ली’ में राष्ट्रवाद को नकार दिया जाता है। ‘तराना-ए-हिंदी’ की कुछ पंक्तियों को उद्धृत कर के ये कहा जाता है कि इक़बाल ख़ूब सेक्युलर थे, असल में इससे बड़ा मजाक कुछ हो ही नहीं सकता है। इक़बाल ने ‘हिन्दोस्ताँ हमारा’ से ‘सारा जहाँ हमारा’ तक का जो सफर तय किया, उसमें उनकी सोच नहीं बदली बल्कि उनके भीतर छिपी हुई सोच ही सामने आई। 1930 में उनका कट्टरवाद लाखों को अपने आगोश में ले लेता है।

मुस्लिम लीग के मंच पर अध्यक्षीय सम्बोधन

दरअसल, दिसंबर 29, 1930 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मुस्लिम लीग का 25वाँ वार्षिक सम्मलेन था और मुहम्मद इक़बाल ने अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में विभाजन की ऐसी नींव रखी, जिसका खामियाजा पूरे भारत को भुगतना पड़ा। उन्होंने धमकाया कि भारत में तब तक शांति का नामों-निशाँ भी नहीं हो सकता, जब तक मुस्लिमों को अलग देश और उन्हें अपना शासन न मिले। वहाँ ऐलान कर दिया कि एक मुस्लिम कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि उसके देश की नीतियाँ इस्लामी क़ानून से अलग हों क्योंकि इस्लाम में प्रारम्भ से ही सामाजिक व्यवस्था, न्याय और अन्य चीजों के लिए अलग से ही क़ानून है, जो इसे ईसाइयत से अलग बनाता है।

उनका सीधा कहना था कि इस्लाम की मजहबी व्यवस्था को मानने वाला मुस्लिम देश का क़ानून नहीं मानेगा, अगर वो इस्लामिक कानून से अलग हो। उन्होंने सेकुलरिज्म और राष्ट्रवाद को नकार दिया। आज उन्हीं की पंक्तियों को लेकर लोग उन्हें सेक्युलर बताने के लिए तुले हुए हैं। इसके बाद इक़बाल यूरोप और पश्चिम देशों में घूम-घूम कर न सिर्फ़ मुस्लिम लीग की विचारधारा के लिए समर्थन जुटाने लगे, बल्कि फंडिंग के लिए भी जी-जान लगा दिया। उनके जितने भी लेक्चर प्रकाशित हुए, उसमें मुहम्मद को नेता मानने की बात थी और उन मुस्लिम नेताओं की भी उन्होंने निंदा की, जो ‘इस्लामी समाज की भावनाओं’ को नहीं समझते थे।

उनका कहना था कि सेकुलरिज्म एक ऐसा हथियार है, जिसका इस्तेमाल कर के हिन्दू अब मुस्लिमों की विरासत, संस्कृति और राजनीतिक प्रभाव पर हावी हो जाएँगे। उनका कहना था कि इससे मुस्लिमों का मजहबी आधार कमजोर पड़ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि भले ही ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत लेकिन पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रान्त को एक अलग राज्य का दर्जा मिलना चाहिए, जो सत्ता चलाने के मामले में स्वतंत्र हो। वो भारत के अंदर एक ‘मुस्लिम भारत’ की स्थापना की अवधारणा को सही ठहराते थे। उन्होंने समुदाय विशेष से स्पष्ट पूछा था कि क्या वो देश का क़ानून ऐसा चाहते हैं, जो इस्लाम के अनुरूप न हो?

इक़बाल को सेक्युलर साबित करने के पीछे की मंशा क्या?

इसके बाद 1932 में भी अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में मुहम्मद इक़बाल ने ये बातें दोहराईं। एक शायर इक़बाल में से नेता इक़बाल या फिर कट्टरपंथी इक़बाल को निकाल बहार कर उन्हें सेक्युलर साबित करने की होड़ एक बेहूदा प्रतियोगिता है, जो ओसामा बिन लादेन को ‘एक अच्छा पति’ या फिर आतंकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ बताने वाली होड़ से अलग नहीं है। इक़बाल को इस्लामी कट्टरवाद से अलग नहीं किया जा सकता। अगर पाकिस्तान नहीं भी बनता और उनकी चलती तो आज यहाँ भारत में एक समांनातर इस्लामी सत्ता चलते रहती, जो भारत को एक नरक में तब्दील करने की ताक़त रखती।

ये भी बताते चलें कि मुहम्मद इक़बाल ने अपनी ज़िंदगी के अधिकतर हिस्से अहमदिया बन कर जिया। इसके बाद उन्होंने अहमदिया संप्रदाय को अलविदा कह दिया क्योंकि उन पर कट्टरपंथियों का दबाव था और वे लोग मानते थे कि अहमदिया विधर्मी हैं। आज पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर हो रहा अत्याचार किसी से भी छिपा नहीं है। वो 1931 तक अहमदिया नेताओं के संपर्क में थे और ‘ऑल इंडिया कश्मीर कमिटी’ का अध्यक्ष भी किसी अहमदिया खलीफा को बनाना चाहते थे। यानी, इक़बाल के नाम पर ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की बात करने वालों को पता होना चाहिए कि इक़बाल ने अहमदिया पंथ क्यों छोड़ा!

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

कॉन्ग्रेस का कोढ़ है धर्मांतरण, रोकने को देर से बने कानून कितने दुरुस्त?

जिस विषय में संविधान निर्माताओं को 1949 से पता था, उस पर कानून बनाने में इतनी देर आखिर क्यों? नियम बनने शुरू भी हुए हैं तो क्या ये काफी हैं, या हमें बहुत देर से और बहुत थोड़ा देकर बहलाया जा रहा है?

FIR में अर्णब पर लगाए आरोप साबित नहीं कर पाई मुंबई पुलिस: SC ने बॉम्बे हाई कोर्ट को भी लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यह भी कहा कि आपराधिक कानून, उत्पीड़न का औजार नहीं बनना चाहिए, जमानत मानवता की अभिव्यक्ति है।

मसूद की फौज दर्रे में घुसती और दो टुकड़े कर डालते मराठा: शिवा नाई, बाजी और शिवाजी के विशालगढ़ पहुँचने की गाथा

"मेरे बहादुरों। हमारे राजा जब तक गढ़ न पहुँच जाए, तब तक एक भी शत्रु इस दर्रे से होकर नहीं गुजरना चाहिए। मराठी आन की लाज हमारे हाथों में है। हर हर महादेव!"

BMC ने बदले की भावना से तोड़ा कंगना रनौत का ऑफिस, नुकसान की करे भरपाई: बॉम्बे HC ने लगाई फटकार

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बीएमसी को कंगना रनौत के ऑफिस में की गई तोड़फोड़ के लिए हर्जाना देना होगा। हाईकोर्ट ने कंगना के ऑफिस के नुकसान का आकलन करने के आदेश भी दिए हैं।

मैं नपुंसक नहीं.. हिंदुत्व का मतलब पूजा-पाठ या मंदिर का घंटा बजाना नहीं, फ़ोर्स किया तो हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊँगा: उद्धव ठाकरे

साक्षत्कार में उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्हें विरोधियों के पीछे पड़ने को मजबूर ना किया जाए। इसके साथ ही ठाकरे ने कहा कि हिंदुत्व का मतलब मंदिर का घंटा बजाना नहीं है।

देखिए 48 घंटों में द वायर ‘मोदी की रैली में कोई नहीं आता’ से ‘बिहार में मोदी को सब चाहते हैं’ कैसे पहुँच गया

द वायर सरीखे एजेंडापरस्त मीडिया समूहों के लिए इस श्रेणी का गिरगिटनुमा विश्लेषण या दावा कोई नई बात नहीं है। प्रोपेगेंडा ही इनका एकमात्र उद्देश्य है भले उसके लिए स्क्रीन पर कुछ अनर्गल ही क्यों न परोसना पड़े।

प्रचलित ख़बरें

‘उसे मत मारो, वही तो सबूत है’: हिंदुओं संजय गोविलकर का एहसान मानो वरना 26/11 तुम्हारे सिर डाला जाता

जब कसाब ने तुकाराम को गोलियों से छलनी कर दिया तो साथी पुलिसकर्मी आवेश में आ गए। वे कसाब को मार गिराना चाहते थे। लेकिन, इंस्पेक्टर गोविलकर ने ऐसा नहीं करने की सलाह दी। यदि गोविलकर ने उस दिन ऐसा नहीं किया होता तो दुनिया कसाब को समीर चौधरी के नाम से जानती।

फैक्टचेक: क्या आरफा खानम घंटे भर में फोटो वाली बकरी मार कर खा गई?

आरफा के पाँच बज कर दस मिनट वाले ट्वीट के साथ एक ट्वीट छः बज कर दस मिनट का था, जिसके स्क्रीनशॉट को कई लोगों ने एक दूसरे को व्हाट्सएप्प पर भेजना शुरु किया। किसी ने यह लिखा कि देखो जिस बकरी को सीने से चिपका कर फोटो खिंचा रही थी, घंटे भर में उसे मार कर खा गई।

हाथ में कलावा, समीर चौधरी नाम की ID: ‘हिंदू आतंकी’ की तरह मरना था कसाब को – पूर्व कमिश्नर ने खोला राज

"सभी 10 हमलावरों के पास फर्जी हिंदू नाम वाले आईकार्ड थे। कसाब को जिंदा रखना पहली प्राथमिकता थी। क्योंकि वो 26/11 मुंबई हमले का सबसे बड़ा और एकलौता सबूत था। उसे मारने के लिए ISI, लश्कर-ए-तैयबा और दाऊद इब्राहिम गैंग ने..."

जहाँ बहाया था खून, वहीं की मिट्टी पर सर रगड़ बोला भारत माता की जय: मुर्दों को देख कसाब को आई थी उल्टी

पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया सुबह साढ़े चार बजे कसाब से कहते हैं कि वो अपना माथा ज़मीन से लगाए... और उसने ऐसा ही किया। इसके बाद जब कसाब खड़ा हुआ तो मारिया ने कहा, “भारत माता की जय बोल” कसाब ने फिर ऐसा ही किया। मारिया दोबारा भारत माता की जय बोलने के लिए कहते हैं तो...

‘कबीर असली अल्लाह, रामपाल अंतिम पैगंबर और मुस्लिम असल इस्लाम से अनजान’: फॉलोवरों के अजीब दावों से पटा सोशल मीडिया

साल 2006 में रामपाल के भक्तों और पुलिसकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 5 महिलाओं और 1 बच्चे की मृत्यु हुई थी और लगभग 200 लोग घायल हुए थे। इसके बाद नवंबर 2014 में उसे गिरफ्तार किया गया था।

‘माझ्या कक्कानी कसाबला पकड़ला’ – बलिदानी ओंबले के भतीजे का वो गीत… जिसे सुन पुलिस में भर्ती हुए 13 युवा

सामने वाले के हाथों में एके-47... लेकिन ओंबले बिना परवाह किए उस पर टूट पड़े। ट्रिगर दबा, गोलियाँ चलीं लेकिन ओंबले ने कसाब को...

12वीं शताब्दी में विष्णुवर्धन के शासनकाल में बनी महाकाली की मूर्ति को मिला पुन: आकार, पिछले हफ्ते की गई थी खंडित

मंदिर में जब प्रतिमा को तोड़ा गया तब हालात देखकर ये अंदाजा लगाया गया था कि उपद्रवी मंदिर में छिपे खजाने की तलाश में आए थे और उन्होंने कम सुरक्षा व्यवस्था देखते हुए मूर्ति तोड़ डाली।

कॉन्ग्रेस का कोढ़ है धर्मांतरण, रोकने को देर से बने कानून कितने दुरुस्त?

जिस विषय में संविधान निर्माताओं को 1949 से पता था, उस पर कानून बनाने में इतनी देर आखिर क्यों? नियम बनने शुरू भी हुए हैं तो क्या ये काफी हैं, या हमें बहुत देर से और बहुत थोड़ा देकर बहलाया जा रहा है?

FIR में अर्णब पर लगाए आरोप साबित नहीं कर पाई मुंबई पुलिस: SC ने बॉम्बे हाई कोर्ट को भी लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यह भी कहा कि आपराधिक कानून, उत्पीड़न का औजार नहीं बनना चाहिए, जमानत मानवता की अभिव्यक्ति है।

संघियों-मनुवादियों को खत्म करने के लिए लश्कर-तालिबान से मदद की ग्राफिटी: मेंगलुरु की सड़कों पर खुलेआम चेतावनी

26/11 हमलों की बरसी के मौके पर मेंगलुरु की दीवारों पर भयावह बातें लिखी (ग्राफिटी) हुई थीं। जिसमें चेतावनी दी गई थी कि ‘संघी और मनुवादियों’ को ख़त्म करने के लिए लश्कर-ए-तैय्यबा और तालिबान की मदद ली जा सकती है।

हिन्दू युवती के पिता का आरोप मुश्ताक मलिक के परिवार ने किया अपहरण: पुलिस ने नकारा ‘लव जिहाद’ एंगल, जाँच जारी

युवती के घर वालों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने फैज़ल, इरशाद, सोनू, हिना, लाइबा और मुश्ताक मलिक पर अपहरण के दौरान मदद करने के लिए मामला दर्ज कर लिया है।

मसूद की फौज दर्रे में घुसती और दो टुकड़े कर डालते मराठा: शिवा नाई, बाजी और शिवाजी के विशालगढ़ पहुँचने की गाथा

"मेरे बहादुरों। हमारे राजा जब तक गढ़ न पहुँच जाए, तब तक एक भी शत्रु इस दर्रे से होकर नहीं गुजरना चाहिए। मराठी आन की लाज हमारे हाथों में है। हर हर महादेव!"

टोटल 7 हैं भाई, पर भौकाल ऐसा जैसे यही IIMC हों: क्यों हो रहा दीपक चौरसिया का विरोध?

IIMC में दीपक चौरसिया को बुलाए जाने का कुछ नए छात्र विरोध कर रहे हैं। कुछ पुराने छात्र इनके समर्थन में आगे आए हैं।

ये कौन से किसान हैं जो कह रहे ‘इंदिरा को ठोका, मोदी को भी ठोक देंगे’, मिले खालिस्तानी समर्थन के प्रमाण

मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे।

BMC ने बदले की भावना से तोड़ा कंगना रनौत का ऑफिस, नुकसान की करे भरपाई: बॉम्बे HC ने लगाई फटकार

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बीएमसी को कंगना रनौत के ऑफिस में की गई तोड़फोड़ के लिए हर्जाना देना होगा। हाईकोर्ट ने कंगना के ऑफिस के नुकसान का आकलन करने के आदेश भी दिए हैं।

ममता से असंतुष्ट मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने छोड़ा HRBC चेयरमैन का पद, विधान सभा चुनाव से पहले TMC छोड़ने की अटकलें तेज

सुवेंदु अधिकारी अपने गृह जिले पूर्वी मिदनापुर के अलावा पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा, पुरुलिया, झारग्राम और बीरभूम जिले के कुछ भागों में करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं।

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
80,429FollowersFollow
358,000SubscribersSubscribe