Thursday, January 28, 2021
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8 घटनाएँ मंदिरों की अमानत में खयानत की: क्या किसी सरकार ने इसकी सुध ली?

"सेक्युलर" राष्ट्र का रोना रोने वाले आध्यात्म केंद्रों पर उसी आसुरिक-सेक्युलर साम्राज्य के हमले पर तालियाँ पीटते हैं, समझकर कि सरकार कोई अच्छा काम कर रही है।

तिरुपति मंदिर में भगवान बालाजी के मुकुट और आभूषण चोरी होने और मामला दो साल तक दबे रहने पर आउटरेज केवल वही कर सकता है, जिसे सेक्युलर-समाजवादी भारतीय गणराज्य की गुलामी और भेदभाव की ज़ंजीरों में जकड़े हिन्दू धर्म/हिंदुत्व की बेड़ियों का पता न हो। जानने वालों के हिसाब से यह तो छोटी सी बात है- जब पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का खज़ाना, जिसे मंदिर की, देवता की सम्पत्ति माना जाता है, जिसकी रक्षा के लिए लोगों ने अपनी जान इसलिए हुत कर दी ताकि जब ‘स्वामी’ आएँ तो उन्हें उनकी सम्पत्ति अक्षुण्ण मिले, उसे ‘स्टेट’ की मशीनरी ने छीन लिया, तो एक मुकुट गुम जाना क्या चीज़ है। जिस ज़माने में किसी को ₹5000 बिना सूद के नहीं मिलते, सरकार बहादुर को मंदिर के खजाने से अरबों का ‘लोन’ बिना किसी गिरवी, बिना किसी सूद के मिल जाता है।

तो आउटरेज का कोई मतलब नहीं है- क्योंकि पता है कि हिन्दू खुद ही न इस मुद्दे पर जागरुक है न उद्वेलित, इसलिए सरकारें भी मस्त नींद से ग्रस्त हैं। अनभिज्ञ आउटरेज से कुछ नहीं होगा- जानकारी पहले ज़रूरी है। जानना ज़रूरी है कि मंदिरों की हुंडी में, दान-पेटिका में जो पैसा श्रद्धालु अपने देवता के प्रति कृतज्ञता में, मंदिर के काम के लिए, पुजारी जी की आजीविका के लिए डालते हैं, उस पैसे पर सरकारें कैसे डाका डालती हैं।

50,000 एकड़ ‘गायब’, वापिस आया केवल 3,000

तमिलनाडु के ‘मंदिर भक्षक विभाग’ Hindu Religious and Charitable Endowments (HR&CE) Department को मद्रास हाईकोर्ट ने पिछली फरवरी में फटकारा कि राज्य के मंदिरों की अचल सम्पत्ति में से 50,000 एकड़ ज़मीन गायब कैसे हो गई। केस पढ़ कर पता चला कि ज़मीन भी ‘गायब’ होने वाली चीज़ है- घर की चाभी और नाक पोंछने के बाद रुमाल की तरह। 6 हफ्ते का समय मिला हिसाब-किताब पता लगाकर अदालत में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए। 6 महीने से भी अधिक बाद अक्टूबर में छाती चौड़ी कर मंदिर-भक्षक विभाग ने बताया कि महज़ 3,000 एकड़ ज़मीन वापिस निकाल ली है।

तिरुपति में सालों से जारी लूट

फ़िलहाल मुकुट-चोरी के लिए सुर्खियों में आया देश के सबसे सम्पन्न मंदिरों में से एक तिरुमला देवस्थानं यानी तिरुपति बालाजी मंदिर लुट रहे मंदिरों में भी शायद अव्वल है। 2009 में 300 सोने के सिक्के गायब हुए तो मंदिर के अधिकारियों ने पूरी जाँच कराने से इनकार कर आरोपित पुजारी को बलि का बकरा बना दिया। 2013 में बालाजी की सम्पत्ति में मौजूद आभूषण ₹45,000 करोड़ के थे, लेकिन यह जाँचना ज़रूरी नहीं समझा गया कि उनकी क्या हालत है। 2008 में सतर्कता विभाग (Vigilance Department) ने कोई ख़ुफ़िया जाँच की, कुछ और लोगों की गर्दन नपी (शायद इसलिए ताकि खेल के असली खिलाड़ियों को बचाया जा सके), लेकिन हिन्दुओं के पढ़ने के लिए जाँच रिपोर्ट नहीं मुहैया कराई गई

वेदान्ता को कौड़ियों के भाव मंदिर की ज़मीन

2010 में ओडिशा की राज्य सरकार ने (वही सरकार, जिसने कुछ समय पहले ‘हिन्दू सेंटीमेंट्स’ की आड़ में अभिजित अय्यर-मित्रा को एक मज़ाकिया वीडियो के लिए जेल की हवा खिला दी थी) जगन्नाथ मंदिर की सैकड़ों एकड़ ज़मीन वेदान्ता फाउंडेशन को बेच दी। किससे पूछकर?

कश्मीर में पंडित ही नहीं, मंदिर भी लुटे

कश्मीर में भी पंडितों की संस्था ने हिन्दू मंदिरों की सम्पत्ति को भू-माफिया और अन्य ताकतों के इशारों पर मंदिर और ट्रस्ट की बजाय लोगों की निजी सम्पत्ति के तौर पर रजिस्टर किए जाने का आरोप लगाया। राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक हिन्दुओं को ही नहीं, Archaeological Survey of India की रिपोर्ट की भी झुठला दिया। 2013 के इस मामले में हिन्दुओं ने भूख हड़ताल से लेकर हर दरवाज़े के चक्कर काटने तक सारे करम कर डाले, लेकिन सरकार टस-से-मस नहीं हुई; सदन के पटल पर भी नहीं। 370 हटाने के अपने प्रशंसनीय कदम के बाद से कश्मीरी पंडितों को छोड़कर दलितों-व्यापारियों-मुस्लिमों आदि अन्य सबके हितों की दुहाई दे रहे गृह मंत्री-प्रधानमंत्री-राज्यपाल इस पर अपनी कृपा-दृष्टि डालेंगे?

पद्मनाभ स्वामी से भी चोरी

केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर से भी चोरी हो चुकी है। 2016 में ₹186 करोड़ के 769 सोने के कलश गायब हैं। चाँदी की छड़ें गायब हैं। उस समय कॉन्ग्रेस की सरकार थी, और माकपा विपक्ष में थी। ज़ाहिर तौर पर कॉन्ग्रेस के लिए यह मुद्दा इसलिए नहीं होगा क्योंकि उसके समय का मामला है और माकपा ने तो सबरीमाला को नहीं छोड़ा, फिर यह तो पैसे का मामला है। यहाँ भी जवाब भाजपा-संघ को देना चाहिए कि केरल में, या देश के किसी भी हिस्से में, उन्होंने इस पर कितने मिनट ‘मन की बात’ की।

1,000 मंदिर एक झटके में हड़पे

ईश्वर को अफीम मानने वाली और सबरीमाला में हिन्दुओं की आस्था को धक्का पहुँचाने के लिए तत्पर खड़ी माकपा सरकार ने जब सितंबर 2017 में (सबरीमाला के एक साल पहले) 1,000 मंदिरों को हड़प लिया तो मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस और हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार संघ-भाजपा कहाँ थे? जनता द्वारा शुरू किए गए, स्वः-स्फ़ूर्त सबरीमाला आंदोलन का क्रेडिट लूटने के लिए दौड़ रहे इन दोनों खेमों को बताना चाहिए कि किसी चाय की टपरी पर नुक्क्ड़ सभा भी हुई इनकी ओर से इस मुद्दे पर?

‘वो मंत्री जी ने कहा था’

2006 में जस्टिस टिपणिस समिति ने सिद्धिविनायक मंदिर के पैसे की लूट को लेकर लिखा कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं-मंत्रियों ने सिफारिशें कर-कर के पैसा “गणपति बाप्पा” से नोंचा। भाजपा-कॉन्ग्रेस-शिवसेना-एनसीपी सभी बीएमसी या राज्य सरकार की मलाई इस कालखंड में चाट रहीं थीं। गंगा में खड़े होने को लेकर तो नेताओं का विश्वास नहीं हो सकता, लेकिन इन पार्टियों के अध्यक्ष यह हलफ़नामा दे सकते हैं अदालत में कि जाँच में इन पार्टियों से उस समय जुड़ा रहा एक भी नेता जाँच के फंदे में नहीं फँसेगा?

‘हमहूँ हैं लाइन में’

बिहार में नीतीश और भाजपा दोनों के समर्थक अक्सर गला छुड़ाने के लिए ‘सुशासन कुमार’ के पहले 5 “स्वर्णिम” सालों (2005-10) का हवाला देते हैं। और 2006 में बिहार के धार्मिक ट्रस्ट प्रशासक आचार्य किशोर कुणाल ने आरोप लगाया कि कुप्रबंधन और सरकारी हेराफेरी और हस्तक्षेप के चलते बिहार के मंदिरों ने ₹2,000 करोड़ गँवाए। क्या नीतीश सरकार इस स्थिति में है कि एक श्वेत-पत्र लाकर पूरे ₹2,000 करोड़ का ठीकरा अपने पूर्ववर्ती लालू-राज, जंगल-राज के सिर फोड़ दे?

‘कट्टर हिन्दू शेरनी’ सो रहा है

बात-बेबात के मुद्दों पर तीर-कमान हो जाने वाले हिंदूवादी हिन्दू सभ्यता के अस्तित्व के लिए ज़रूरी सबसे अहम स्तम्भों, हमारे मंदिरों, हमारे देवताओं, हमारी परम्पराओं की रक्षा और अक्षुण्णता को लेकर बहुत ही ज़्यादा उदासीन हैं। हर बात पर भारत के “हिन्दू राष्ट्र” हो जाने का इंतज़ार करने की दुहाई देने वाले, “सेक्युलर” राष्ट्र-राज्य का रोना रोने वाले न केवल आस्था के, आध्यात्म के, शक्ति के (सामाजिक भी, सांस्कृतिक भी, आध्यात्मिक भी) केंद्रों पर उसी आसुरिक-सेक्युलर साम्राज्य के हमले पर उदासीन रहते हैं, बल्कि तालियाँ पीटते हैं, यह समझकर कि सरकार कोई बहुत अच्छा काम कर रही है।

किसी एक-आध मंदिर के स्थानीय हाथों में कुप्रबंधन को बहाना बनाकर न केवल सरकार मंदिरों पर डाका डालती है, बल्कि आम हिन्दू इसमें तालियाँ बजा-बजा कर सहायता करता है, ऐसा करने वाले को वापिस सत्ता में लाकर संदेश देता है कि इस काम का जनता इनाम देती है। और जब उसी मंदिर के साथ सबरीमाला जैसा शील-भंग होता है, पद्मनाभ स्वामी, सिद्धिविनायक जैसी डकैती होती है, हज़ारों एकड़ ज़मीन गायब हो जाती है, चर्च ग्रस लेता है तो हम बैठ कर कभी कल्कि अवतार के आने की प्रतीक्षा करते हैं और कभी नेताओं को भगवान विष्णु का 14वाँ-25वाँ अवतार बताकर खुद को भरमाते फिरते हैं।

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