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20000 एकड़ मंदिरों की ज़मीन पर अवैध कब्जा, तेलंगाना सरकार ने सब खाली कराने का दिया आदेश

हिन्दुओं की सम्पत्ति को भारत का 'सेक्युलर' राष्ट्र राज्य जिस तरह अधिग्रहित करता है और गैर-हिन्दू कार्यों में उसका उपयोग करता है, वैसा वह एक भी मुस्लिम या ईसाई संस्थान के साथ करने की हिमाकत क्या कर सकता है?

तेलंगाना सरकार ने अब हिन्दू मंदिरों की ज़मीनों पर से अवैध कब्ज़े खाली कराने के लिए कमर कस ली है। 20,000 एकड़ की ज़मीनों पर से अवैध कब्ज़ा खाली कराने के लिए तेलंगाना के एंडोमेंट (सरकार द्वारा अधिग्रहित मंदिरों के मामलों का मंत्रालय) मंत्री ए इंद्र करण रेड्डी ने अधिकारियों को अवैध कब्जेदारों को हटाने और ज़मीन खाली कराने के निर्देश जारी कर दिए हैं। 

जिसे सस्ते में ज़मीन दी, उसने महंगे किराए पर उठा दी

हिन्दू मंदिरों की ज़मीनों पर प्रदेश में काफ़ी समय से यह फर्जीवाड़ा जारी है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक 20,124.08 एकड़ की मंदिरों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा हुआ है। यह कब्ज़ा ऐसे होता है कि मंदिर की ज़मीन जिसे रियायती दरों पर किराए पर दी जाती है, वह उसका प्रयोग खुद न कर आगे दूसरों को ज़्यादा महंगे दामों पर किराए पर दे देते हैं। इससे राज्य सरकार को राजस्व-हानि होती है। जितनी ज़मीनों पर अवैध कब्ज़ा है (20,124.08 एकड़), वह राज्य सरकार द्वारा कुल किराए पर दिए गए क्षेत्रफ़ल (21,238.26 एकड़) का लगभग पूरा हिस्सा है। मंत्री करण रेड्डी ने सोमवार को अधिकारियों को निर्देश दिया है कि चाहे कब्ज़ा करने वाला कितना भी रसूखदार हो, कोई मुरौव्वत नहीं की जानी चाहिए

सवाल: आखिर हिन्दू मंदिरों की ज़मीनें बाँटी ही क्यों गईं?

यह अच्छी बात है कि राज्य सरकार अपने राजस्व के नुकसान को लेकर सजग है और भ्रष्टाचार रोकने और सरकार की आमदनी बढ़ाने का प्रयास कर रही है। लेकिन इसके पीछे उससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर राज्य सरकार की यह हिम्मत कैसे हुई कि हिन्दू मंदिरों की ज़मीनें मंदिर के कार्यों के बाहर किसी को किराए पर उठा दी जाएँ? क्या इसीलिए हिन्दू (और केवल हिन्दू, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 25-30 बाकी अन्य सभी पंथों और मज़हबों को अपने समुदाय के संस्थानों को सरकारी हस्तक्षेप से स्वतंत्र हो संचालित करने का अधिकार देते हैं) मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण किया जाता है, ताकि उनकी संपत्ति का मनमर्ज़ी दुरुपयोग हो?

तेलंगाना में सरकार ने कुल 87,235 एकड़ मंदिरों की भूमि का अधिग्रहण किया हुआ है। इसमें से केवल 2,458.05 एकड़ मंदिरों के खुद के पास है- अर्चकों द्वारा नियंत्रित भूमि के रूप में। बाकी ज़मीन का क्या हिसाब है? हिन्दुओं की सम्पत्ति को भारत का ‘सेक्युलर’ राष्ट्र राज्य जिस तरह अधिग्रहित करता है और गैर-हिन्दू कार्यों में उसका उपयोग करता है, वैसा वह एक भी मुस्लिम या ईसाई संस्थान के साथ करने की हिमाकत क्या कर सकता है? बेहतर होगा कि उपरोक्त 20,000 एकड़ ज़मीन को जब तेलंगाना सरकार अवैध कब्ज़े से मुक्त करा ले, तो उसे दोबारा हड़पने की अपेक्षा उसे जिन-जिन मंदिरों से ‘लूटा’ है, उन्हें लौटा दिया जाए।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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