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सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर नहीं, संस्कृति का केंद्र है: जानिए उन आचार्यों और राजाओं को, जिन्होंने हर आक्रमण के बाद भी यहाँ जीवित रखी शैव परंपरा

सोमनाथ मंदिर सिर्फ आस्था नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, संघर्ष और आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। जानिए किन संतों, राजाओं और भक्तों के कारण यहाँ आज भी शैव परंपरा जीवित है।

भारत में कुछ स्थान केवल धार्मिक स्थल भर नहीं हैं। वे देश की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक बन जाते हैं। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित प्राचीन सोमनाथ मंदिर ऐसा ही एक स्थान है।

सदियों से सोमनाथ केवल भगवान शिव का मंदिर नहीं रहा, बल्कि आस्था, संघर्ष, ज्ञान, भक्ति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

हाल ही में स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित सोमनाथ प्राणप्रतिष्ठा अमृत महोत्सव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंदिर के लंबे और निरंतर इतिहास का उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि अलग-अलग समय में संतों, राजाओं, विद्वानों, योद्धाओं और भक्तों ने मंदिर पर आए हर संकट के बाद उसे फिर से खड़ा किया और उसकी परंपरा को जीवित रखा। उनके भाषण में सोमनाथ को केवल कई बार पुनर्निर्मित हुए मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि हर चुनौती के बावजूद जीवित रही एक सतत सभ्यतागत परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया।

सोमनाथ सिर्फ एक मंदिर से कहीं ज्यादा

सोमनाथ की कहानी केवल आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें प्राचीन भारत तक जाती हैं, जब प्रभास शैव दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुका था। इतिहास में हुए हमलों से बहुत पहले ही सोमनाथ पश्चिम भारत का प्रमुख पूजा, तपस्या और दार्शनिक चर्चाओं का केंद्र बन गया था।

प्राचीन ऋषियों और आचार्यों ने इस क्षेत्र को शैव धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया। समय के साथ सोमनाथ का संबंध भारत के सबसे पुराने शैव संप्रदायों में से एक पाशुपत परंपरा से जुड़ गया।

मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि यहाँ विद्वान दर्शन पर चर्चा करते थे, योगी तपस्या करते थे और गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देते थे। इसी आध्यात्मिक और बौद्धिक वातावरण ने सोमनाथ को पूरे भारत में प्रसिद्ध बना दिया।

देश के अलग-अलग हिस्सों से यात्री, संत, व्यापारी और साधक प्रभास आने लगे और यह स्थान एक बड़ा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया।

सोम शर्मा और प्रभास का उदय

सोमनाथ के आध्यात्मिक इतिहास से जुड़े शुरुआती नामों में सोम शर्मा का विशेष महत्व है। शैव परंपराओं के अनुसार उन्हें रुद्र का 27वाँ अवतार माना जाता है और प्रभास में पाशुपत परंपरा की नींव रखने वाले प्रमुख ऋषियों में गिना जाता है।

पारंपरिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि सोम शर्मा ने सोमनाथ में भगवान शिव का पहला स्वर्ण मंदिर बनवाया था। लेकिन उनका महत्व केवल मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं था। उस समय भारत में कई धार्मिक विचारधाराएँ विकसित हो रही थीं और सोम शर्मा ने प्रभास की आध्यात्मिक पहचान को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

उनसे जुड़ी शैव विचारधारा ने बाद में पूरे पश्चिम भारत को गहराई से प्रभावित किया। उनसे जुड़ी परंपराओं में सोम सिद्धांत का भी उल्लेख मिलता है, जिसने शैव साधना और आध्यात्मिक अनुशासन को दार्शनिक दिशा दी। इसी कारण प्रभास धीरे-धीरे केवल तीर्थ स्थल नहीं, बल्कि शिक्षा और ध्यान का केंद्र भी बन गया।

लकुलीश और पाशुपत परंपरा

सोम शर्मा के बाद पश्चिम भारत के शैव इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नाम लकुलीश का माना जाता है। वर्तमान गुजरात के कायावरोहण में जन्मे लकुलीश को रुद्र का 28वाँ अवतार माना जाता है। उन्हें पाशुपत संप्रदाय को संगठित रूप देने वाला महान आचार्य कहा जाता है।

लकुलीश नाम लकुट शब्द से बना है, जिसका अर्थ डंडा या छड़ी होता है। मूर्तियों और चित्रों में उन्हें योग मुद्रा में हाथ में दंड लिए दिखाया जाता है, जो तपस्या, अनुशासन और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

परंपराओं के अनुसार लकुलीश का जन्म विश्वरूप और सुदर्शना के घर हुआ था। उनके बचपन और आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी कई कहानियाँ आज भी गुजरात में प्रसिद्ध हैं। कायावरोहण, देवखात झील और ब्रह्मेश्वर शिव मंदिर जैसे स्थान उनकी परंपरा से जुड़े हुए हैं।

इतिहासकारों को शिलालेखों में भी लकुलीश का उल्लेख मिलता है। लगभग 380-381 ईस्वी के मथुरा शिलालेख में उनके शिष्य कुशिक की दसवीं पीढ़ी का जिक्र मिलता है। इससे कई विद्वान मानते हैं कि लकुलीश दूसरी शताब्दी ईस्वी में हुए होंगे।

लकुलीश की शिक्षाएँ उनके चार प्रमुख शिष्यों कुशिक, गर्ग, मित्र और कौरुष के माध्यम से फैलीं। उनके अनुयायियों ने पाशुपत परंपरा को पश्चिम भारत के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुँचाया। कौशिक शाखा मेवाड़ में गर्ग शाखा गुजरात में मैत्रक शाखा सौराष्ट्र में और कौरुष शाखा आसपास के क्षेत्रों में प्रभावशाली बनी। इसी विस्तार के कारण प्रभास और कायावरोहण शैव शिक्षा और पूजा के बड़े केंद्र बन गए।

परंपरा को जीवित रखने वाले आचार्य

सोमनाथ का विकास केवल राजाओं के संरक्षण से संभव नहीं हुआ। आध्यात्मिक गुरुओं और पाशुपत आचार्यों ने लगातार मंदिर से जुड़ी धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

ऐसे ही एक महत्वपूर्ण नाम भाव बृहस्पति का है, जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया। आज आम लोगों में उनका नाम ज्यादा प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उन्होंने सोमनाथ को पूजा और ज्ञान दोनों के केंद्र के रूप में स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

प्राचीन भारत में मंदिर विश्वविद्यालयों की तरह काम करते थे। मंदिर परिसरों में दर्शन, व्याकरण, शास्त्र, योग और आध्यात्मिक साधनाओं पर चर्चा होती थी। सोमनाथ भी इसी परंपरा का हिस्सा था। भाव बृहस्पति जैसे विद्वानों ने यह सुनिश्चित किया कि मंदिर शिक्षा और आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ा रहे।

पाशुपत आचार्य केवल पुजारी नहीं थे। वे दार्शनिक, योगी, शिक्षक और मार्गदर्शक भी थे। उनकी वजह से कठिन राजनीतिक दौर में भी सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से जीवित बना रहा।

राजाओं का संरक्षण और प्राचीन पुनर्निर्माण

सोमनाथ की निरंतरता को कई शासकों ने भी सदियों तक सुरक्षित रखा। मंदिर के शुरुआती पुनर्निर्माण से जुड़े राजाओं में मैत्रक वंश के चक्रवर्ती महाराजा धारसेन का नाम प्रमुख है।

उनका योगदान इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पता चलता है कि सोमनाथ का इतिहास मध्यकालीन संघर्षों से भी कहीं पुराना है। मैत्रक काल में वल्लभी पश्चिम भारत का बड़ा शिक्षा और संस्कृति केंद्र बन गया था। इस दौर में शैव परंपराओं को भी राजकीय संरक्षण मिला।

धारसेन के पुनर्निर्माण ने प्रभास की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर मजबूत किया। प्राचीन भारत में मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं होते थे, बल्कि व्यापार, यात्रा, शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र होते थे। समुद्री व्यापार मार्गों के पास होने के कारण सोमनाथ का प्रभाव गुजरात से बहुत दूर तक फैला।

महमूद गजनवी का हमला और पुनर्जीवन

सोमनाथ के इतिहास का सबसे चर्चित अध्याय 11वीं शताब्दी में महमूद गजनी के हमले से जुड़ा है। लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मंदिर और उसकी परंपराओं को बाद में फिर से कैसे जीवित किया गया।

गजनवी के हमले के बाद गुजरात कठिन राजनीतिक और धार्मिक स्थिति से गुजर रहा था। उस समय सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम सोमनाथ के पुनर्निर्माण और पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासक बनकर सामने आए। भीमदेव केवल राजनीतिक शासक नहीं थे, बल्कि गुजरात की सांस्कृतिक पहचान को बचाने वाले राजा भी थे।

ऐतिहासिक विवरणों में बताया गया है कि उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण और धार्मिक परंपराओं को फिर से स्थापित करने में सहयोग दिया। बाद में सोलंकी काल गुजरात के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक दौरों में गिना गया।

इस समय मंदिर वास्तुकला, व्यापार, जल प्रबंधन, मूर्तिकला और साहित्य का तेज विकास हुआ। सोमनाथ का पुनर्जीवन इसी सांस्कृतिक पुनर्जागरण का हिस्सा बन गया।

आक्रमणों के खिलाफ व्यापक संघर्ष

सोमनाथ का इतिहास उत्तर-पश्चिम भारत में हुए बड़े संघर्षों से भी जुड़ा हुआ है। हिंदू शाही शासक जयपाल और आनंदपाल को तुर्क और गजनवी सेनाओं के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष करने के लिए याद किया जाता है।

हालाँकि उनका सीधा संबंध सोमनाथ के प्रशासन से नहीं था, लेकिन उनके युद्ध भारतीय राज्यों और परंपराओं की रक्षा के बड़े संघर्ष का हिस्सा थे। जयपाल ने सबुक्तगीन और बाद में महमूद गजनवी के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

उनके पुत्र आनंदपाल ने भी यह संघर्ष जारी रखा। इन शासकों का उल्लेख यह दिखाता है कि सोमनाथ की कहानी केवल गुजरात तक सीमित नहीं थी। उस समय भारत के अलग-अलग हिस्सों के शासक राजनीतिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे।

महाराजा भोज और सांस्कृतिक गौरव

सोमनाथ के पुनर्जीवन से जुड़े प्रमुख शासकों में मालवा के महाराजा भोज का नाम भी आता है। उन्हें केवल शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि विद्वान, कवि, वास्तुकार और संस्कृति के संरक्षक के रूप में भी याद किया जाता है।

ऐतिहासिक परंपराओं में माना जाता है कि भोज ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण में योगदान दिया। उनके लिए मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि राज्य की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे।

भोज का समर्थन इस विचार को दिखाता है कि मंदिरों को बचाना भारत की ज्ञान परंपरा, कला और सभ्यतागत स्मृति को बचाने जैसा था।

सोलंकी राजा और गुजरात का स्वर्णकाल

बार-बार हुए हमलों और राजनीतिक संकटों के बाद भी सोमनाथ को जीवित रखने में सोलंकी वंश की सबसे बड़ी भूमिका रही। कर्णदेव सोलंकी ने उस समय गुजरात को राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत किया, जब पश्चिम भारत में यह क्षेत्र बड़ी शक्ति बन रहा था।

सोलंकी शासन में मंदिर निर्माण, शहरों का विकास, जल प्रबंधन और व्यापार तेजी से बढ़ा। सोलंकियों के लिए मंदिर समृद्धि और गौरव के प्रतीक थे। उनके संरक्षण से सोमनाथ फिर से एक प्रतिष्ठित तीर्थ स्थल बन सका।

बाद में सिद्धराज जयसिंह ने गुजरात की सांस्कृतिक शक्ति को और आगे बढ़ाया। उनके शासन में शिक्षा संस्थान, झीलें, मंदिर और नगरों का विकास हुआ। उनका काल गुजरात के स्वर्ण युगों में गिना जाता है।

सिद्धराज ने केवल सैन्य शक्ति ही नहीं बढ़ाई, बल्कि उन धार्मिक संस्थानों को भी संरक्षण दिया जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक पहचान बनाई। सोमनाथ इसी पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहा है।

कुमारपाल सोलंकी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया। हालाँकि उन्हें जैन आचार्य हेमचंद्र से संबंध के लिए ज्यादा याद किया जाता है, लेकिन उन्होंने शैव परंपराओं को भी संरक्षण दिया।

उनके समय में मंदिरों, तीर्थ स्थलों और शिक्षा केंद्रों को मजबूत समर्थन मिला। भाव बृहस्पति का नाम अक्सर कुमारपाल के साथ लिया जाता है, क्योंकि दोनों ने मिलकर सोमनाथ की धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं को मजबूत किया।

वाघेला शासक और आध्यात्मिक संरक्षण

सोलंकी वंश के बाद गुजरात में वाघेला वंश उभरा। हालाँकि इस समय राजनीतिक परिस्थितियाँ कठिन होती जा रही थीं, फिर भी सोमनाथ की परंपराओं को बचाने के प्रयास जारी रहे।

विशालदेव वाघेला उन शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने गुजरात की सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा करने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी ने त्रिपुरांतक का भी उल्लेख किया, जिन्हें शैव परंपराओं में आध्यात्मिक ज्ञान का रक्षक माना जाता है।

इन लोगों का महत्व इसलिए है क्योंकि सोमनाथ केवल युद्धों से नहीं बचा, बल्कि लोगों ने उसकी परंपराओं, शिक्षाओं और स्मृतियों को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा।

इस्लामी आक्रमणों के बाद पुनर्जीवन

बार-बार हुए आक्रमणों से सोमनाथ कई बार क्षतिग्रस्त हुआ। कुछ समय ऐसे भी आए जब स्थानीय लोग खुले रूप से मंदिर जाने से डरने लगे। फिर भी इसकी परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

जूनागढ़ के चूड़ासमा शासकों ने कठिन समय में सोमनाथ में पूजा-पाठ को फिर से शुरू कराने में बड़ी भूमिका निभाई। महिपाल चूड़ासमा और रा’ खेंगार को मंदिर की धार्मिक परंपराओं को फिर से जीवित करने के लिए याद किया जाता है।

इन शासकों के लिए सोमनाथ सौराष्ट्र की पहचान और गौरव का प्रतीक था। राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद उन्होंने पूजा और तीर्थ यात्रा को जारी रखा।

अहिल्याबाई होल्कर का योगदान

कई सदियों बाद महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारत के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों की संरक्षक बनकर सामने आईं। उनका नाम काशी विश्वनाथ और सोमनाथ सहित कई प्रमुख मंदिरों के पुनर्निर्माण और संरक्षण से जुड़ा है।

जब राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता के कारण कई प्राचीन तीर्थ स्थल कमजोर पड़ रहे थे, तब अहिल्याबाई ने धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने का काम किया। उनके प्रयासों से कठिन समय में भी सोमनाथ पूजा और भक्ति से जुड़ा रहा।

गायकवाड़ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा

बड़ौदा के गायकवाड़ शासकों ने भी सोमनाथ और तीर्थ यात्रियों की सुरक्षा में योगदान दिया। हालाँकि उनके योगदान की चर्चा कम होती है, लेकिन ब्रिटिश प्रभाव बढ़ने के समय उन्होंने तीर्थ परंपरा को बनाए रखने में मदद की।

औपनिवेशिक शासन के दौरान मंदिरों की पुरानी परंपराओं को बचाए रखना आसान नहीं था। फिर भी गायकवाड़ शासकों ने यह सुनिश्चित किया कि सोमनाथ आध्यात्मिक रूप से सक्रिय बना रहे।

सोमनाथ के भूले-बिसरे नायक

सोमनाथ का इतिहास केवल राजाओं और संतों की कहानी नहीं है। यह उन साधारण योद्धाओं और स्थानीय नायकों की भी कहानी है जिन्होंने मंदिर के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

सौराष्ट्र की लोक स्मृतियों में सबसे ज्यादा याद किए जाने वाले नामों में हमीरजी गोहिल और वेगड़ाजी भील शामिल हैं। हमीरजी की वीरता पर आज भी लोकगीत गाए जाते हैं। उन्हें उस युवा योद्धा के रूप में याद किया जाता है जिसने सोमनाथ की रक्षा करते हुए अपने प्राण दे दिए।

वेगड़ाजी भील को भी बलिदान और संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी कहानियाँ दिखाती हैं कि सोमनाथ स्थानीय समाज की भावनाओं और पहचान से कितनी गहराई से जुड़ा था।

आधुनिक भारत में सोमनाथ का पुनर्निर्माण

आधुनिक दौर में सोमनाथ की नई यात्रा भारत की स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई। जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल प्रभास पाटन पहुँचे और घोषणा की कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाएगा।

इस निर्णय को केवल मंदिर निर्माण नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में देखा गया। के एम मुंशी ने इस सपने को साकार करने में बड़ी भूमिका निभाई। नवानगर के जाम साहब दिग्विजय सिंह और कई अन्य लोगों ने भी इस प्रयास में सहयोग दिया।

आखिरकार 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ। हालाँकि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपति के समारोह में शामिल होने के पक्ष में नहीं थे, फिर भी राजेंद्र प्रसाद कार्यक्रम में पहुँचे और सोमनाथ को भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।

एक अखंड सभ्यतागत यात्रा

सोमनाथ की कहानी सदियों तक फैली हुई है और इसमें ऋषि, संत, राजा, योद्धा और साधारण भक्त सभी जुड़े हुए हैं। सोम शर्मा और लकुलीश से लेकर भाव बृहस्पति तक, भीमदेव और भोज से लेकर अहिल्याबाई होल्कर तक, हमीरजी गोहिल से लेकर सरदार पटेल तक हर पीढ़ी ने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्जीवन में अपना योगदान दिया।

सोमनाथ पर कई बार हमले हुए, लेकिन उसकी परंपराएँ कभी खत्म नहीं हुईं। यही निरंतरता सोमनाथ को खास बनाती है। यह मंदिर केवल पत्थरों से नहीं बचा, बल्कि लोगों की सांस्कृतिक स्मृतियों और आस्था में जीवित रहा। आज भी सोमनाथ केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है। यह भारत की निरंतरता, संघर्षशक्ति और सभ्यतागत आत्मविश्वास का प्रतीक बनकर खड़ा है।

(नोट: मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित की गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
ભાર્ગવ રાજ્યગુરુ
Being learner, Spiritual, Reader

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